महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जिसकी दूसरे राजाओंसे तुलना नहीं हो सकती थी। राजा दिलीप युद्ध करते समय जलमें भी चले जाते तो उनके रथके पहिये वहाँ डूबते नहीं थे॥ राजानं दृढधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् ॥ ९ ॥ येऽपश्यन् भूरिदाक्षिण्यं तेऽपि स्वर्गजितो नराः । सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले तथा प्रचुर दक्षिणा देनेवाले सत्यवादी राजा दिलीपका जो लोग दर्शन कर लेते थे, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकके अधिकारी हो जाते थे॥ पञ्च शब्दा न जीर्यन्ति खट्वाङ्गस्य निवेशने ॥ १० ॥ स्वाध्यायघोषो ज्याघोषः पिबताश्नीत खादत । खट्वांग (दिलीप)-के भवनमें ये पाँच प्रकारके शब्द कभी बंद नहीं होते थे—वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायका शब्द, धनुषकी प्रत्यंचाकी ध्वनि तथा अतिथियोंके लिये कहे जानेवाले ‘खाओ, पीओ और अन्न ग्रहण करो’ ये तीन शब्द ॥ १० १/२ ॥ स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ ११ ॥ पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ १२ ॥ श्वैत्य सृंजय! वे दिलीप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे, तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तब औरोंकी क्या बात है? अतः जिसने कभी यज्ञ नहीं किया, दक्षिणाएँ नहीं बाँटीं, अपने उस पुत्रके लिये तुम शोक न करो—इस प्रकार नारदजीने कहा ॥ ११-१२ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
* यज्ञीय यूप या स्तम्भके ऊपर लगाये जानेवाले काठके छल्लेको ‘चषाल’ कहते हैं, इसीका उत्कृष्ट रूप ‘प्रचषाल’ है।
अध्याय (पृष्ठ 429)
द्विषष्टितमोऽध्यायः
राजा मान्धाताकी महत्ता
नारद उवाच
मान्धाता चेद्यौवनाश्वो मृतः सृञ्जय शुश्रुम ।
देवासुरमनुष्याणां त्रैलोक्यविजयी नृपः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता भी मरे थे, यह सुना गया है। वे देवता, असुर और मनुष्य—तीनों लोकोंमें विजयी थे ॥ १ ॥
यं देवावश्विनौ गर्भात् पितुः पूर्वं चकर्षतुः ।
मृगयां विचरन् राजा तृषितः क्लान्तवाहनः ॥ २ ॥
पूर्वकालमें दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उन्हें पिताके पेटसे निकाला था। एक समयकी बात है, राजा युवनाश्व वनमें शिकार खेलनेके लिये विचर रहे थे। वहाँ उनका घोड़ा थक गया और उन्हें भी प्यास लग गयी ॥ २ ॥
धूमं दृष्ट्वागमत् सत्रं पृषदाज्यमवाप सः ।
तं दृष्ट्वा युवनाश्वस्य जठरे सूनुतां गतम् ॥ ३ ॥
गर्भाद्वि जहतुर्देवावश्विनौ भिषजां वरौ ।
इतनेमें दूरसे उठता हुआ धूआँ देखकर वे उसी ओर चले और एक यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे। वहाँ एक पात्रमें रखे हुए घृतमिश्रित अभिमन्त्रित जलको उन्होंने पी लिया। उस जलको युवनाश्वके पेटमें पुत्ररूपमें परिणत हुआ देख वैद्योंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उसे पिताके गर्भसे बाहर निकाला ॥ ३ १/२ ॥
तं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देववर्चसम् ॥ ४ ॥
अन्योन्यमब्रुवन् देवाः कमयं धास्यतीति वै ।
मामेवायं धयत्वग्रे इति ह स्माह वासवः ॥ ५ ॥
देवताके समान तेजस्वी उस शिशुको पिताकी गोदमें शयन करते देख देवता आपसमें कहने लगे, यह किसका दूध पीयेगा? यह सुनकर इन्द्रने कहा—यह पहले मेरा ही दूध पीये ॥ ४-५ ॥
ततोऽङ्गुलिभ्यो हीन्द्रस्य प्रादुरासीत् पयोऽमृतम् ।
मां धास्यतीति कारुण्याद् यदिन्द्रो ह्यन्वकम्पयत् ॥ ६ ॥
तस्मात्तु मान्धातेत्येवं नाम तस्याद्भुतं कृतम् ।
तदनन्तर इन्द्रकी अंगुलियोंसे अमृतमय दूध प्रकट हो गया; क्योंकि इन्द्रने करुणावश ‘मां धास्यति’ (मेरा दूध पीयेगा) ऐसा कहकर उसपर कृपा की थी, इसलिये उसका ‘मान्धाता’ यह अद्भुत नाम निश्चित कर दिया गया ॥ ६ १/२ ॥
ततस्तु धारां पयसो घृतस्य च महात्मनः ॥ ७ ॥ तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् । अपिबत् पाणिमिन्द्रस्य स चाप्यह्नाभ्यवर्धत ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् महामना मान्धाताके मुखमें इन्द्रके हाथने दूध और घीकी धारा बहायी। वह बालक इन्द्रका हाथ पीने लगा और एक ही दिनमें बहुत बढ़ गया ॥ ७-८ ॥ सोऽभवद् द्वादशसमो द्वादशाहेन वीर्यवान् । इमां च पृथिवीं कृत्स्नामेकाह्ना स व्यजीजयत् ॥ ९ ॥ वह पराक्रमी राजकुमार बारह दिनोंमें ही बारह वर्षोंकी अवस्थावाले बालकके समान हो गया। (राजा होनेपर) मान्धाताने एक ही दिनमें इस सारी पृथ्वीको जीत लिया ॥ ९ ॥ धर्मात्मा धृतिमान् वीरः सत्यसंधो जितेन्द्रियः । जनमेजयं सुधन्वानं गयं पूरुं बृहद्रथम् ॥ १० ॥ असितं च नृगं चैव मान्धाता मनुजोऽजयत् । वे धर्मात्मा, धैर्यवान्, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। मानव मान्धाताने जनमेजय, सुधन्वा, गय, पूरु, बृहद्रथ, असित और नृगको भी जीत लिया ॥ १० १/२ ॥ उदेति च यतः सूर्यो यत्र च प्रतितिष्ठति ॥ ११ ॥ तत् सर्वं यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते । सूर्य जहाँसे उदय होते थे और जहाँ जाकर अस्त होते थे, वह सारा-का-सारा प्रदेश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका क्षेत्र (राज्य) कहलाता था ॥ ११ १/२ ॥ सोऽश्वमेधशतैरिष्ट्वा राजसूयशतेन च ॥ १२ ॥ अददद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते । हैरण्यान् यो जनोत्सेधानायतान् शतयोजनम् ॥ १३ ॥ राजन्! उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ योजन विस्तृत रोहितक, मत्स्य तथा हिरण्मय (सोनेकी खानोंसे युक्त) जनपदोंको, जो लोगोंमें ऊँची भूमिके रूपमें प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणोंको दे दिया ॥ १२-१३ ॥ बहुप्रकारान् सुस्वादून् भक्ष्यभोज्यान्नपर्वतान् । अतिरिक्तं ब्राह्मणेभ्यो भुञ्जानो हीयते जनः ॥ १४ ॥ अनेक प्रकारके सुस्वादु भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके पर्वत भी उन्होंने ब्राह्मणोंको दे दिये। ब्राह्मणोंके भोजनसे भी जो अन्न बच गया, उसे दूसरे लोगोंको दिया गया। उस अन्नको खानेवाले लोगोंकी ही वहाँ कमी रहती थी। अन्न कभी नहीं घटता था ॥ १४ ॥ भक्ष्यान्नपाननिचयाः शुशुभुस्त्वन्नपर्वताः । घृतह्रदाः सूपकूपाः दधिफेना गुडोदकाः ॥ १५ ॥ रुरुधुः पर्वतान् नद्यो मधुक्षीरवहाः शुभाः ।
वहाँ भक्ष्य-भोज्य अन्न और पीनेयोग्य पदार्थोंकी अनेक राशियाँ संचित थीं। अन्नके तो पहाड़ों-जैसे ढेर सुशोभित होते थे। उन पर्वतोंको मधु और दूधकी सुन्दर नदियाँ घेरे हुए थीं। पर्वतोंके चारों ओर घीके कुण्ड और दालके कुएँ भरे थे। वहाँ कई नदियोंमें फेनकी जगह दही और जलके स्थानमें गुड़के रस बहते थे ॥ १५½ ॥
देवासुरा नरा यक्षा गन्धर्वोरगपक्षिणः ॥ १६ ॥
विप्रास्तत्रागताश्चासन् वेदवेदाङ्गपारगाः ।
ब्राह्मणा ऋषयश्चापि नासंस्तत्राविपश्चितः ॥ १७ ॥
वहाँ देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, नाग, पक्षी तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण एवं ऋषि भी पधारे थे; किंतु वहाँ कोई मनुष्य ऐसे नहीं थे जो विद्वान् न हों ॥ १६-१७ ॥
समुद्रान्तां वसुमतीं वसुपूर्णां तु सर्वतः ।
स तां ब्राह्मणसात्कृत्वा जगामास्तं तदा नृपः ॥ १८ ॥
उस समय राजा मान्धाता सब ओरसे धन-धान्यसे सम्पन्न समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको ब्राह्मणोंके अधीन करके सूर्यके समान अस्त हो गये ॥ १८ ॥
गतः पुण्यकृतां लोकान् व्याप्य स्वयशसा दिशः ।
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ १९ ॥
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि शैत्येत्युदाहरत् ॥ २० ॥
उन्होंने अपने सुयशसे सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त करके पुण्यात्माओंके लोकोंमें पदार्पण किया। शैत्य सृंजय! वे पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तब औरोंकी क्या बात है। अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ॥ १९-२० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
राजा ययातिका उपाख्यान
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
राजा ययातिका उपाख्यान
नारद उवाच
ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
राजसूयशतैरिष्ट्वा सोऽश्वमेधशतेन च ॥ १ ॥
पुण्डरीकसहस्रेण वाजपेयशतैस्तथा ।
अतिरात्रसहस्रेण चातुर्मास्यैश्च कामतः ।
अग्निष्टोमैश्च विविधैः सत्रैश्च प्राज्यदक्षिणैः ॥ २ ॥
**नारदजी कहते हैं—**सूंजय! नहुषनन्दन राजा ययातिकी भी मृत्यु हुई थी, यह मैंने सुना है। राजाने सौ राजसूय, सौ अश्वमेध, एक हजार पुण्डरीक याग, सौ वाजपेय-यज्ञ, एक सहस्र अतिरात्र याग तथा अपनी इच्छाके अनुसार चातुर्मास्य और अग्निष्टोम आदि नाना प्रकारके प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥
अब्राह्मणानां यद् वित्तं पृथिव्यामस्ति किंचन ।
तत् सर्वं परिसंख्याय ततो ब्राह्मणसात्करोत् ॥ ३ ॥
इस पृथ्वीपर ब्राह्मणद्रोहियोंके पास जो कुछ धन था, वह सब उनसे छीनकर उन्होंने ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया ॥ ३ ॥
सरस्वती पुण्यतमा नदीनां
तथा समुद्राः सरितः साद्रयश्च ।
ईजानाय पुण्यतमाय राज्ञे
घृतं पयो दुदुहुर्नाहुषाय ॥ ४ ॥
नदियोंमें परम पवित्र सरस्वती नदी, समुद्रों, पर्वतों तथा अन्य सरिताओंने यज्ञमें लगे हुए परम पुण्यात्मा राजा ययातिको घी और दूध प्रदान किये ॥ ४ ॥
व्यूढे देवासुरे युद्धे कृत्वा देवसहायताम् ।
चतुर्धा व्यभजत् सर्वां चतुर्भ्यः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥
यज्ञैर्नानाविधैरिष्ट्वा प्रजामुत्पाद्य चोत्तमाम् ।
देवयान्यां चौशनस्यां शर्मिष्ठायां च धर्मतः ॥ ६ ॥
देवारण्येषु सर्वेषु विजहारामरोपमः ।
आत्मनः कामचारेण द्वितीय इव वासवः ॥ ७ ॥
देवासुरसंग्राम छिड़ जानेपर उन्होंने देवताओंकी सहायता करके नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा परमात्माका यजन किया और इस सारी पृथ्वीको चार भागोंमें विभक्त करके उसे ऋत्विज, अध्वर्यु, होता तथा उद्गाता—इन चार प्रकारके ब्राह्मणोंको बाँट दिया। फिर
शुक्रकन्या देवयानी और दानवराजकी पुत्री शर्मिष्ठाके गर्भसे धर्मतः उत्तम संतान उत्पन्न करके वे देवोपम नरेश दूसरे इन्द्रकी भाँति समस्त देवकाननोंमें अपनी इच्छाके अनुसार विहार करते रहे ।। ५–७ ।।
यदा नाभ्यगमच्छान्तिं कामानां सर्ववेदवित् ।
ततो गाथामिमां गीत्वा सदारः प्राविशद् वनम् ॥ ८ ॥
जब भोगोंके उपभोगसे उन्हें शान्ति नहीं मिली, तब सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता राजा ययाति निम्नांकित गाथाका गान करके अपनी पत्नियोंके साथ वनमें चले गये ॥ ८ ॥
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ ९ ॥
वह गाथा इस प्रकार है—इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्री आदि भोग्य पदार्थ हैं, वे सब एक मनुष्यको भी संतोष करानेके लिये पर्याप्त नहीं हैं; ऐसा समझकर मनको शान्त करना चाहिये ॥ ९ ॥
एवं कामान् परित्यज्य ययातिर्धृतिमेत्य च ।
पूरुं राज्ये प्रतिष्ठाप्य प्रयातो वनमीश्वरः ॥ १० ॥
इस प्रकार ऐश्वर्यशाली राजा ययातिने धैर्यका आश्रय ले कामनाओंका परित्याग करके अपने पुत्र पूरुको राज्यसिंहासनपर बिठाकर वनको प्रस्थान किया ॥ १० ॥
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ ११ ॥
श्वैत्य सृंजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी जीवित न रह सके, तब औरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम अपने उस पुत्रके लिये शोक न करो, जिसने न तो यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही दी थी। ऐसा नारदजीने कहा ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें
षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 434)
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
राजा अम्बरीषका चरित्र
नारद उवाच
नाभागमम्बरीषं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञां चैकस्त्वयोधयत् ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! मैंने सुना है कि नाभागके पुत्र राजा अम्बरीष भी मृत्युको प्राप्त हुए थे, जिन्होंने अकेले ही दस लाख राजाओंसे युद्ध किया था ॥ १ ॥
जिगीषमाणाः संग्रामे समन्ताद् वैरिणोऽभ्ययुः ।
अस्त्रयुद्धविदो घोराः सृजन्ताश्चाशिवा गिरः ॥ २ ॥
राजाके शत्रुओंने उन्हें युद्धमें जीतनेकी इच्छासे चारों ओरसे उनपर आक्रमण किया था। वे सब अस्त्रयुद्धकी कलामें निपुण और भयंकर थे तथा राजाके प्रति अभद्र वचनोंका प्रयोग कर रहे थे ॥ २ ॥
बललाघवशिक्षाभिस्तेषां सोऽस्त्रबलेन च ।
छत्रायुधध्वजरथांश्छित्त्वा प्रासान् गतव्यथः ॥ ३ ॥
परंतु राजा अम्बरीषको इससे तनिक भी व्यथा नहीं हुई। उन्होंने शारीरिक बल, अस्त्र-बल, हाथोंकी फुर्ती और युद्धसम्बन्धी शिक्षाके द्वारा शत्रुओंके छत्र, आयुध, ध्वजा, रथ और प्रासोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३ ॥
त एनं मुक्तसंनाहाः प्रार्थयन् जीवतैषिणः ।
शरण्यमीयुः शरणं तवास्म इति वादिनः ॥ ४ ॥
तब वे शत्रु अपने प्राण बचानेके लिये कवच खोलकर उनसे प्रार्थना करने लगे और हम सब प्रकारसे आपके हैं; ऐसा कहते हुए उन शरणदाता नरेशकी शरणमें चले गये ॥ ४ ॥
स तु तान् वशगान् कृत्वा जित्वा चेमां वसुन्धराम् ।
ईजे यज्ञशतैरिष्टैर्यथाशास्त्रं तथानघ ॥ ५ ॥
अनघ! इस प्रकार उन शत्रुओंको वशीभूत करके इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पाकर उन्होंने शास्त्रविधिके अनुसार सौ अभीष्ट यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ५ ॥
बुभुजुः सर्वसम्पन्नमन्नमन्ये जनाः सदा ।
तस्मिन् यज्ञे तु विप्रेन्द्राः संतृप्ताः परमार्चिताः ॥ ६ ॥
उन यज्ञोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा अन्य लोग भी सदा सर्वगुणसम्पन्न अन्न भोजन करते और अत्यन्त आदर-सत्कार पाकर अत्यन्त संतुष्ट होते थे ॥ ६ ॥
मोदकान् पूरिकापूपान् स्वादपूर्णांश्च शष्कुलीः । करम्भान् पृथुमृद्वीका अन्नानि सुकृतानि च ॥ ७ ॥ सूपान् मैरेयकापूपान् रागखाण्डवपानकान् । मृष्टान्नानि सुयुक्तानि मृदूनि सुरभीणि च ॥ ८ ॥ घृतं मधु पयस्तोयं दधीनि रसवन्ति च । फलं मूलं च सुस्वादु द्विजास्तत्रोपभुञ्जते ॥ ९ ॥ लड्डू, पूरी, पुए, स्वादिष्ट कचौड़ी, करम्भ, मोटे मुनक्के, तैयार अन्न, मैरेयक, अपूप, रागखाण्डव, पानक, शुद्ध एवं सुन्दर ढंगसे बने हुए मधुर और सुगन्धित भोज्य पदार्थ, घी, मधु, दूध, जल, दही, सरस वस्तुएँ तथा सुस्वादु फल, मूल वहाँ ब्राह्मणलोग भोजन करते थे ॥ ७—९ ॥
मादनीयानि पापानि विदित्वा चात्मनः सुखम् । अपिबन्त यथाकामं पानपा गीतवादितैः ॥ १० ॥ मादक वस्तुएँ पापजनक होती हैं, यह जानकर भी पीनेवाले लोग अपने सुखके लिये गीत और वाद्योंके साथ इच्छानुसार उनका पान करते थे ॥ १० ॥
तत्र स्म गाथा गायन्ति क्षीबा हृष्टाः पठन्ति च । नाभागस्तुतिसंयुक्ता ननृतुश्च सहस्रशः ॥ ११ ॥
पीकर मतवाले बने हुए सहस्रों मनुष्य वहाँ हर्षमें भरकर गाथा गाते, अम्बरीषकी स्तुतिसे युक्त कविताएँ पढ़ते और नृत्य करते थे ॥ ११ ॥ तेषु यज्ञेष्वम्बरीषो दक्षिणामत्यकालयत् । राज्ञां शतसहस्राणि दश प्रयुतयाजिनाम् ॥ १२ ॥ उन यज्ञोंमें राजा अम्बरीषने दस लाख यज्ञकर्ता ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें दस लाख राजाओंको ही दे दिया था ॥ १२ ॥ हिरण्यकवचान् सर्वान् श्वेतच्छत्रप्रकीर्णकान् । हिरण्यस्यन्दनारूढान् सानुयात्रपरिच्छदान् ॥ १३ ॥ वे सब राजा सोनेके कवच धारण किये, श्वेत छत्र लगाये, सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए तथा अपने अनुगामी सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न थे ॥ १३ ॥ ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । मूर्धाभिषिक्तांश्च नृपान् राजपुत्रशतानि च ॥ १४ ॥ सदण्डकोशनिचयान् ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत । उस विस्तृत यज्ञमें यजमान अम्बरीषने उन मूर्धाभिषिक्त नरेशों और सैकड़ों राजकुमारोंको दण्ड और खजानों-सहित ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया ॥ १४ १/२ ॥ नैवं पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे ॥ १५ ॥ यदम्बरीषो नृपतिः करोत्यमितदक्षिणः । इत्येवमनुमोदन्ते प्रीता यस्य महर्षयः ॥ १६ ॥ महर्षिलोग उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनके कार्योंका अनुमोदन करते हुए कहते थे कि असंख्य दक्षिणा देनेवाले राजा अम्बरीष जैसा यज्ञ कर रहे हैं, वैसा न तो पहलेके राजाओंने किया और न आगे कोई करेंगे ॥ स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि शैत्येत्युदाहरत् ॥ १७ ॥ शैत्य सृंजय! वे पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी जीवित न रह सके, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
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अध्याय (पृष्ठ 438)
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
राजा शशबिन्दु का चरित्र
नारद उवाच
शशबिन्दुं च राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
ईजे स विविधैर्यज्ञैः श्रीमान् सत्यपराक्रमः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! मेरे सुननेमें आया है कि राजा शशबिन्दु की भी मृत्यु हो गयी थी। उन सत्यपराक्रमी श्रीमान् नरेशने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १ ॥
तस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ।
एकैकस्यां च भार्यायां सहस्रं तनयाऽभवन् ॥ २ ॥
महामना शशबिन्दुके एक लाख स्त्रियाँ थीं और प्रत्येक स्त्रीके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥ २ ॥
ते कुमाराः पराक्रान्ताः सर्वे नियुतयाजिनः ।
राजानः क्रतुभिर्मुख्यैरीजाना वेदपारगाः ॥ ३ ॥
वे सभी राजकुमार अत्यन्त पराक्रमी और वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। वे राजा होनेपर दस लाख यज्ञ करनेका संकल्प ले प्रधान-प्रधान यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे ॥ ३ ॥
हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ।
सर्वेऽश्वमेधैरीजानाः कुमाराः शशबिन्दवः ॥ ४ ॥
शशबिन्दुके उन सभी पुत्रोंने सोनेके कवच धारण कर रखे थे। वे सब उत्तम धनुर्धर थे और अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे ॥ ४ ॥
तानश्वमेधे राजेन्द्रो ब्राह्मणेभ्योऽददत् पिता ।
शतं शतं रथगजा एकैकं पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ५ ॥
पिता महाराज शशबिन्दुने अश्वमेध-यज्ञ करके उसमें अपने वे सभी पुत्र ब्राह्मणोंको दे डाले। एक-एक राजकुमारके पीछे सौ-सौ रथ और हाथी गये थे ॥
राजपुत्रं तदा कन्यास्तपनीयस्वलंकृताः ।
कन्यां कन्यां शतं नागा नागे नागे शतं रथाः ॥ ६ ॥
उस समय प्रत्येक राजकुमारके साथ सुवर्ण-भूषित सौ-सौ कन्याएँ थीं। एक-एक कन्याके पीछे सौ-सौ हाथी और प्रत्येक हाथीके पीछे सौ-सौ रथ थे ॥ ६ ॥
रथे रथे शतं चाश्वा बलिनो हेममालिनः । अश्वे अश्वे गोसहस्रं गवां पञ्चाशदाविकाः ॥ ७ ॥ हर एक रथके साथ सोनेके हारोंसे विभूषित सौ-सौ बलवान् अश्व थे। प्रत्येक अश्वके पीछे हजार-हजार गौएँ तथा एक-एक गायके पीछे पचास-पचास भेड़ें थीं ॥ ७ ॥
एतद् धनमपर्याप्तमश्वमेधे महामखे । शशबिन्दुर्महाभागो ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥ ८ ॥ यह अपार धन महाभाग शशबिन्दुने अपने अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंके लिये दान किया था ॥ ८ ॥
वार्क्षाश्च यूपा यावन्त अश्वमेधे महामखे । ते तथैव पुनश्चान्ये तावन्तः काञ्चनाऽभवन् ॥ ९ ॥ उनके महायज्ञ अश्वमेधमें जितने काष्ठके यूप थे, वे तो ज्यों-के-त्यों थे ही, फिर उतने ही और सुवर्णमय यूप बनाये गये थे ॥ ९ ॥
भक्ष्यान्नपाननिचयाः पर्वताः क्रोशमुच्छ्रिताः । तस्याश्वमेधे निर्वृत्ते राज्ञः शिष्टास्त्रयोदश ॥ १० ॥ उस यज्ञमें भक्ष्य-भोज्य अन्न-पानके पर्वतोंके समान एक कोस ऊँचे ढेर लगे हुए थे। राजाका अश्वमेध-यज्ञ पूरा हो जानेपर अन्नके तेरह पर्वत बच गये थे ॥
तुष्टपुष्टजनाकीर्णां शान्तविघ्नामनामयाम् । शशबिन्दुरिमां भूमिं चिरं भुक्त्वा दिवं गतः ॥ ११ ॥ शशबिन्दुके राज्यकालमें यह पृथ्वी हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी थी। यहाँ कोई विघ्न-बाधा और रोग-व्याधि नहीं थी। शशबिन्दु इस वसुधाका दीर्घकालतक उपभोग करके अन्तमें स्वर्गलोकको चले गये ॥ ११ ॥
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ १२ ॥
श्वैत्य सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रोंसे तो बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञ और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो। ऐसा नारदजीने कहा ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें
षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 441)
षट्षष्टितमोऽध्यायः
राजा गयका चरित्र
नारद उवाच
गयं चामूर्तरयसं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यो वै वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥ १ ॥ **नारदजी कहते हैं—**संजय! राजा अमूर्तरयके पुत्र गयकी भी मृत्यु सुनी गयी है। राजा गयने सौ वर्षोंतक नियमपूर्वक अग्निहोत्र करके होमावशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ॥ १ ॥
तस्मै ह्यग्निर्वं प्रादात् ततो वव्रे वरं गयः । तपसा ब्रह्मचर्येण व्रतेन नियमेन च ॥ २ ॥ गुरूणां च प्रसादेन वेदानिच्छामि वेदितुम् । स्वधर्मेणाविहिंस्यान्यान् धनमिच्छामि चाक्षयम् ॥ ३ ॥ विप्रेषु ददतश्चैव श्रद्धा भवतु नित्यशः । अनन्यासु सवर्णासु पुत्रजन्म च मे भवेत् ॥ ४ ॥ अन्नं मे ददतः श्रद्धा धर्मे मे रमतां मनः । अविघ्नं चास्तु मे नित्यं धर्मकार्येषु पावक ॥ ५ ॥ इससे प्रसन्न होकर अग्निदेवने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की। (अग्निदेवकी आज्ञासे) गयने उनसे यह वरदान माँगा—'मैं तप, ब्रह्मचर्य, व्रत, नियम और गुरुजनोंकी कृपासे वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। दूसरोंको कष्ट पहुँचाये बिना अपने धर्मके अनुसार चलकर अक्षय धन पाना चाहता हूँ। ब्राह्मणोंको दान देता रहूँ और इस कार्यमें प्रतिदिन मेरी अधिकाधिक श्रद्धा बढ़ती रहे। अपने ही वर्णकी पतिव्रता कन्याओंसे मेरा विवाह हो और उन्हींके गर्भसे मेरे पुत्र उत्पन्न हों। अन्नदानमें मेरी श्रद्धा बढ़े तथा धर्ममें ही मेरा मन लगा रहे। अग्निदेव! मेरे धर्मसम्बन्धी कार्योंमें कभी कोई विघ्न न आवे' ॥ २—५ ॥
तथा भविष्यतीत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत । गयो ह्याप्य तत् सर्वं धर्मेणारीनजीजयत् ॥ ६ ॥ 'ऐसा ही होगा' यों कहकर अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। राजा गयने वह सब कुछ पाकर धर्मसे ही शत्रुओंपर विजय पायी ॥ ६ ॥
स दर्शपूर्णमासाभ्यां कालेष्वाग्रयणेन च । चातुर्मास्यैश्च विविधैर्यज्ञैश्चावाप्तदक्षिणैः ॥ ७ ॥ अयजच्छ्रद्धया राजा परिसंवत्सरान् शतम् ।
राजाने यथासमय सौ वर्षोंतक बड़ी श्रद्धाके साथ दर्श, पौर्णमास, आग्रयण और चातुर्मास्य आदि नाना प्रकारके यज्ञ किये तथा उनमें प्रचुर दक्षिणा दी ॥ ७ १/२ ॥
गवां शतसहस्राणि शतमश्वशतानि च ॥ ८ ॥
शतं निष्कसहस्राणि गवां चाप्ययुतानि षट् ।
उत्थायोत्थाय स प्रादात् परिसंवत्सरान् शतम् ॥ ९ ॥
वे सौ वर्षोंतक प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर एक लाख साठ हजार गौ, दस हजार अश्व तथा एक लाख स्वर्णमुद्रा दान करते थे ॥ ८-९ ॥
नक्षत्रेषु च सर्वेषु ददन्नक्षत्रदक्षिणाः ।
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्यथा सोमोऽङ्गिरा यथा ॥ १० ॥
वे सोम और अंगिराकी भाँति सम्पूर्ण नक्षत्रोंमें नक्षत्र-दक्षिणा देते हुए नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करते थे ॥ १० ॥
सौवर्णां पृथिवीं कृत्वा य इमां मणिशर्कराम् ।
विप्रेभ्यः प्राददद् राजा सोऽश्वमेधे महामखे ॥ ११ ॥
राजा गयने अश्वमेध नामक महायज्ञमें मणिमय रेतवाली सोनेकी पृथ्वी बनवाकर ब्राह्मणोंको दान की थी ॥
जाम्बूनदमया यूपाः सर्वे रत्नपरिच्छदाः ।
गयस्यासन् समृद्धास्तु सर्वभूतमनोहराः ॥ १२ ॥
गयके यज्ञमें सम्पूर्ण यूप जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए थे। उन्हें रत्नोंसे विभूषित किया गया था। वे समृद्धिशाली यूप सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको हर लेते थे ॥
सर्वकामसमृद्धं च प्रादादन्नं गयस्तदा ।
ब्राह्मणेभ्यः प्रहृष्टेभ्यः सर्वभूतेभ्य एव च ॥ १३ ॥
राजा गयने यज्ञ करते समय हर्षसे उल्लसित हुए ब्राह्मणों तथा अन्य समस्त प्राणियोंको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न उत्तम अन्न दिया था ॥ १३ ॥
स समुद्रवनद्वीपनदीनदवनेषु च ।
नगरेषु च राष्ट्रेषु दिवि व्योम्नि च येऽवसन् ॥ १४ ॥
भूतग्रामाश्च विविधाः संतृप्ता यज्ञसम्पदा ।
गयस्य सदृशो यज्ञो नास्त्यन्य इति तेऽब्रुवन् ॥ १५ ॥
समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कानन, नगर, राष्ट्र, आकाश तथा स्वर्गमें जो नाना प्रकारके प्राणिसमुदाय रहते थे, वे उस यज्ञकी सम्पत्तिसे तृप्त होकर कहने लगे, राजा गयके समान दूसरे किसीका यज्ञ नहीं हुआ है ॥
षट्त्रिंशद् योजनायामा त्रिंशद् योजनमायता ।
पश्चात् पुरश्चतुर्विंशद् वेदी ह्यासीद्धिरण्मयी ॥ १६ ॥
गयस्य यजमानस्य मुक्तावज्रमणिस्तृता ।
प्रादात् स ब्राह्मणेभ्योऽथ वासांस्याभरणानि च ।। १७ ।। यथोक्ता दक्षिणाश्चान्या विप्रेभ्यो भूरिदक्षिणः । यजमान गयके यज्ञमें छत्तीस योजन लम्बी, तीस योजन चौड़ी और आगे-पीछे (अर्थात् नीचेसे ऊपरको) चौबीस योजन ऊँची सुवर्णमयी वेदी बनवायी गयी थी*। उसके ऊपर हीरे-मोती एवं मणिरत्न बिछाये गये थे। प्रचुर दक्षिणा देनेवाले गयने ब्राह्मणोंको वस्त्र, आभूषण तथा अन्य शास्त्रोक्त दक्षिणाएँ दी थीं ।। १६-१७½ ।।
यत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ।। १८ ।। कुल्याः कुशलवाहिन्यो रसानामभवंस्तदा । वस्त्राभरणगन्धानां राशयश्च पृथग्विधाः ।। १९ ।। उस यज्ञमें खाने-पीनेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष थे। रसोंको कौशलपूर्वक प्रवाहित करनेवाली कितनी ही छोटी-छोटी नदियाँ तथा वस्त्र, आभूषण और सुगन्धित पदार्थोंकी विभिन्न राशियाँ भी उस समय शेष रह गयी थीं ।। १८-१९ ।।
यस्य प्रभावाच्च गयस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । वटश्चाक्षय्यकरणः पुण्यं ब्रह्मसरश्च तत् ।। २० ।। उस यज्ञके प्रभावसे राजा गय तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये। साथ ही पुण्यको अक्षय करनेवाला अक्षयवट तथा पवित्र तीर्थ ब्रह्मसरोवर भी उनके कारण प्रसिद्ध हो गये ।। २० ।।
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ २१ ॥
श्वैत्य सृंजय! वे धर्म-ज्ञानादि चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरोंके लिये क्या कहना है? अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये अनुताप न करो। ऐसा नारदजीने कहा ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
* एक विद्वान् व्याख्याकारने ऐसे स्थलोंमें योजनका अर्थ 'बित्ता' माना है। इसके अनुसार वह वेदी १८ हाथ लंबी १५ हाथ चौड़ी और १२ हाथ ऊँची थी।
अध्याय (पृष्ठ 445)
सप्तषष्टितमोऽध्यायः
राजा रन्तिदेवकी महत्ता
नारद उवाच
सांकृतिं रन्तिदेवं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
यस्य द्विशतसाहस्रा आसन् सूदा महात्मनः ॥ १ ॥
गृहानभ्यागतान् विप्रानतिथीन् परिवेशकाः ।
पक्वापक्वं दिवारात्रं वरान्नमामृतोपमम् ॥ २ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! सुना है कि संकृतिके पुत्र रन्तिदेव भी जीवित नहीं रह सके। उन महामना नरेशके यहाँ दो लाख रसोइये थे, जो घरपर आये हुए ब्राह्मण अतिथियोंको अमृतके समान मधुर कच्चा-पक्का उत्तम अन्न दिन-रात परोसते रहते थे ॥ १-२ ॥
न्यायेनाधिगतं वित्तं ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।
वेदानधीत्य धर्मेण यश्चक्रे द्विषतो वशे ॥ ३ ॥
उन्होंने ब्राह्मणोंको न्यायपूर्वक प्राप्त हुए धनका दान किया और चारों वेदोंका अध्ययन करके धर्मके द्वारा समस्त शत्रुओंको अपने वशमें कर लिया ॥ ३ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददन्निष्कान् सौवर्णान् स प्रभावतः ।
तुभ्यं निष्कं तुभ्यं निष्कमिति ह स्म प्रभाषते ॥ ४ ॥
ब्राह्मणोंको सोनेके चमकीले निष्क देते हुए वे बार-बार प्रत्येक ब्राह्मणसे यही कहते थे कि यह निष्क तुम्हारे लिये है, यह निष्क तुम्हारे लिये है ॥ ४ ॥
तुभ्यं तुभ्यमिति प्रादान्निष्कान् निष्कान् सहस्रशः ।
ततः पुनः समाश्वास्य निष्कानेव प्रयच्छति ॥ ५ ॥
'तुम्हारे लिये, तुम्हारे लिये' कहकर वे हजारों निष्क दान किया करते थे। इतनेपर भी जो ब्राह्मण पाये बिना रह जाते, उन्हें पुनः आश्वासन देकर वे बहुत-से निष्क ही देते थे ॥ ५ ॥
अल्पं दत्तं मयाद्येति निष्ककोटिं सहस्रशः ।
एकाह्ना दास्यति पुनः कोऽन्यस्तत् सम्प्रदास्यति ॥ ६ ॥
राजा रन्तिदेव एक दिनमें सहस्रों कोटि निष्क दान करके भी यह खेद प्रकट किया करते थे कि आज मैंने बहुत कम दान किया; ऐसा सोचकर वे पुनः दान देते थे। भला दूसरा कौन इतना दान दे सकता है? ॥ ६ ॥
द्विजपाणिवियोगेन दुःखं मे शाश्वतं महत् ।
भविष्यति न संदेह एवं राजाददद् वसु ॥ ७ ॥
ब्राह्मणोंके हाथका वियोग होनेपर मुझे सदा महान् दुःख होगा, इसमें संदेह नहीं है। यह विचारकर राजा रन्तिदेव बहुत धन दान करते थे ।। ७ ।।
सहस्रशश्च सौवर्णान् वृषभान् गोशतानुगान् ।
साष्टं शतं सुवर्णानां निष्कमाहुर्धनं तथा ।। ८ ।।
संजय! एक हजार सुवर्णके बैल, प्रत्येकके पीछे सौ-सौ गायें और एक सौ आठ स्वर्णमुद्राएँ—इतने धनको निष्क कहते हैं ।। ८ ।।
अध्यर्धमासमददद् ब्राह्मणेभ्यः शतं समाः ।
अग्निहोत्रोपकरणं यज्ञोपकरणं च यत् ।। ९ ।।
राजा रन्तिदेव प्रत्येक पक्षमें ब्राह्मणोंको (करोड़ों) निष्क दिया करते थे। इसके साथ अग्निहोत्रके उपकरण और यज्ञकी सामग्री भी होती थी। उनका यह नियम सौ वर्षोंतक चलता रहा ।। ९ ।।
ऋषिभ्यः करकान् कुम्भान् स्थालीः पिठरमेव च ।
शयनासनयानानि प्रासादांश्च गृहाणि च ।। १० ।।
वृक्षांश्च विविधान् दद्यादन्नानि च धनानि च ।
सर्वं सौवर्णमेवासीद् रन्तिदेवस्य धीमतः ।। ११ ।।
वे ऋषियोंको करवे, घड़े, बटलोई, पिठर, शय्या, आसन, सवारी, महल और घर, भाँति-भाँतिके वृक्ष तथा अन्न-धन दिया करते थे। बुद्धिमान् रन्तिदेवकी सारी देय वस्तुएँ सुवर्णमय ही होती थीं ।। १०-११ ।।
तत्रास्य गाथा गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।
रन्तिदेवस्य तां दृष्ट्वा समृद्धिमतिमानुषीम् ।। १२ ।।
राजा रन्तिदेवकी वह अलौकिक समृद्धि देखकर पुराणवेत्ता पुरुष वहाँ इस प्रकार उनकी यशोगाथा गाया करते थे ।। १२ ।। नैतादृशं दृष्टपूर्वं कुबेरसद्नेष्वपि । धनं च पूर्यमाणं नः किं पुनर्मनुजेष्विति ।। १३ ।। हमने कुबेरके भवनमें भी पहले कभी ऐसा (रन्तिदेवके समान) भरा-पूरा धनका भंडार नहीं देखा है; फिर मनुष्योंके यहाँ तो हो ही कैसे सकता है? ।। व्यक्तं वस्वोकसारेयमित्यूचुस्तत्र विस्मिताः । वास्तवमें रन्तिदेवकी समृद्धिका सारतत्त्व उनका सुवर्णमय राजभवन और स्वर्णराशि ही है। इस प्रकार विस्मित होकर लोग उस गाथाका गान करने लगे ।। १३ १/२ ।। सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत् ।। १४ ।। आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः । संकृतिपुत्र रन्तिदेवके यहाँ जिस रातमें अतिथियोंका समुदाय निवास करता था, उस समय वहाँ इक्कीस हजार गौएँ छूकर दान की जाती थीं ।। १४ १/२ ।। तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।। १५ ।। सूपं भूयिष्ठमश्रीध्वं नाद्य मांसं यथा पुरा । वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये रसोइये पुकार-पुकारकर कहते थे, आपलोग खूब दाल और कढ़ी खाइये। यह आज जैसी स्वादिष्ट बनी है, वैसी पहले एक महीनेतक नहीं बनी थी ।। १५ १/२ ।। रन्तिदेवस्य यत् किंचित् सौवर्णमभवत् तदा ।। १६ ।। तत् सर्वं वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत । उन दिनों राजा रन्तिदेवके पास जो कुछ भी सुवर्णमयी सामग्री थी, वह सब उन्होंने उस विस्तृत यज्ञमें ब्राह्मणोंको बाँट दी ।। १६ १/२ ।। प्रत्यक्षं तस्य हव्यानि प्रतिगृह्णन्ति देवताः ।। १७ ।। कव्यानि पितरः काले सर्वकामान् द्विजोत्तमाः । उनके यज्ञमें देवता और पितर प्रत्यक्ष दर्शन देकर यथासमय हव्य और कव्य ग्रहण करते थे तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको पाते थे ।। स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। १८ ।। पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। १९ ।।