महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दिदृक्षवः समाजग्मुः कर्णार्जुनसमागमम् । क्रीड़ामृग, पक्षीसमुदाय तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित दिव्य मनीषी पुरुष वायु तथा बादलोंको वाहन बनाकर कर्ण और अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ५३ १/२ ॥ देवदानवगन्धर्वा नागयक्षाः पतत्रिणः ॥ ५४ ॥ महर्षयो वेदविदः पितरश्च स्वधाभुजः । तपोविद्यास्तथौषध्यो नानारूपबलान्विताः ॥ ५५ ॥ अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे । महाराज! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, पक्षी, वेदज्ञ महर्षि, स्वधाभोजी पितर, तप, विद्या तथा नाना प्रकारके रूप और बलसे सम्पन्न ओषधियाँ—ये सब-के-सब कोलाहल मचाते हुए अन्तरिक्षमें खड़े हुए थे॥ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च ॥ ५६ ॥ भवश्चैव स्थितो याने दिव्ये तं देशमागमत् । ब्रह्मर्षियों तथा प्रजापतियोंके साथ ब्रह्मा और महादेवजी भी दिव्य विमानपर स्थित हो उस प्रदेशमें आये॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ ॥ ५७ ॥ अर्जुनो जयतां कर्णमिति शक्रोऽब्रवीत्तदा । उन दोनों महामनस्वी वीर कर्ण और अर्जुनको एकत्र हुआ देख उस समय इन्द्र बोल उठे—‘अर्जुन कर्णपर विजय प्राप्त करें’॥ ५७ १/२ ॥ जयतामर्जुनं कर्ण इति सूर्योऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥ हत्वार्जुनं मम सुतः कर्णो जयतु संयुगे । हत्वा कर्णं जयत्वद्य मम पुत्रो धनंजयः ॥ ५९ ॥ यह सुनकर सूर्यदेव कहने लगे—‘नहीं, कर्ण ही अर्जुनको जीत ले। मेरा पुत्र कर्ण युद्धस्थलमें अर्जुनको मारकर विजय प्राप्त करे।’ (इन्द्र बोले—) ‘नहीं, मेरा पुत्र अर्जुन ही आज कर्णका वध करके विजयश्रीका वरण करे’॥ ५८-५९॥ इति सूर्यस्य चैवासीद् विवादो वासवस्य च । पक्षसंस्थितयोस्तत्र तयोर्विबुधसिंहयोः । द्वैपक्ष्यमासीद् देवानामसुराणां च भारत ॥ ६० ॥ इस प्रकार सूर्य और इन्द्रमें विवाद होने लगा। वे दोनों देवश्रेष्ठ वहाँ एक-एक पक्षमें खड़े थे। भारत! देवताओं और असुरोंमें भी वहाँ दो पक्ष हो गये थे॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ । अकम्पन्त त्रयो लोकाः सहदेवर्षिचारणाः ॥ ६१ ॥
महामना कर्ण और अर्जुनको युद्धके लिये एकत्र हुआ देख देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंसहित तीनों लोकके प्राणी काँपने लगे ॥ ६१ ॥
सर्वे देवगणाश्चैव सर्वभूतानि यानि च ।
यतः पार्थस्ततो देवा यतः कर्णस्ततोऽसुराः ॥ ६२ ॥
सम्पूर्ण देवता तथा समस्त प्राणी भी भयभीत हो उठे थे। जिस ओर अर्जुन थे, उधर देवता और जिस ओर कर्ण था, उधर असुर खड़े थे ॥ ६२ ॥
रथयूथपयोः पक्षौ कुरुपाण्डववीरयोः ।
दृष्ट्वा प्रजापतिं देवाः स्वयम्भुवमचोदयन् ॥ ६३ ॥
रथयूथपति कर्ण और अर्जुन कौरव तथा पाण्डव दलके प्रमुख वीर थे। उनके विषयमें दो पक्ष देखकर देवताओंने प्रजापति स्वयम्भू ब्रह्माजीसे पूछा— ॥ ६३ ॥
कोऽनयोर्विजयी देव कुरुपाण्डवयोधयोः ।
समोऽस्तु विजयो देव एतयोर्नरसिंहयोः ॥ ६४ ॥
‘देव! इन कौरव-पाण्डव योद्धाओंमें कौन विजयी होगा? भगवन्! हम चाहते हैं कि इन दोनों पुरुषसिंहोंकी एक-सी ही विजय हो ॥ ६४ ॥
कर्णार्जुनविवादेन सर्वं संशयितं जगत् ।
स्वयम्भो ब्रूहि नस्तथ्यमेतयोर्विजयं प्रभो ॥ ६५ ॥
स्वयम्भो ब्रूहि तद्वाक्यं समोऽस्तु विजयोऽनयोः ।
‘प्रभो! कर्ण और अर्जुनके विवादसे सारा संसार संशयमें पड़ गया। स्वयम्भू! आप हमें इनके विजयके सम्बन्धमें सच्ची बात बताइये। आप ऐसा वचन बोलिये, जिससे इन दोनोंकी समान विजय सूचित हो’ ॥ ६५ ½ ॥
तदुपश्रुत्य मघवा प्रणिपत्य पितामहम् ॥ ६६ ॥
व्यज्ञापयत देवेशमिदं मतिमतां वरः ।
देवताओंकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ इन्द्रने देवेश्वर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके यह निवेदन किया ॥
पूर्वं भगवता प्रोक्तं कृष्णयोर्विजयो ध्रुवः ॥ ६७ ॥
तत् तथास्तु नमस्तेऽस्तु प्रसीद भगवन् मम ।
‘भगवन्! आपने पहले कहा था कि ‘इन दोनों कृष्णोंकी विजय अटल है।’ आपका वह कथन सत्य हो। आपको नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न होइये’ ॥ ६७ ½ ॥
ब्रह्मेशानावथो वाक्यमूचतुस्त्रिदशेश्वरम् ॥ ६८ ॥
विजयो ध्रुवमेवास्य विजयस्य महात्मनः ।
खाण्डवे येन हुतभुक्तोषितः सव्यसाचिना ॥ ६९ ॥
स्वर्गं च समनुप्राप्य साहाय्यं शक्र ते कृतम् ।
तब ब्रह्मा और महादेवजीने देवेश्वर इन्द्रसे कहा—‘महात्मा अर्जुनकी विजय तो निश्चित ही है। इन्द्र! इन्हीं सव्यसाची अर्जुनने खाण्डववनमें अग्निदेवको संतुष्ट किया और स्वर्गलोकमें जाकर तुम्हारी भी सहायता की।। ६८-६९½ ।। कर्णश्च दानवः पक्ष अतः कार्यः पराजयः ॥ ७० ॥ एवं कृते भवेत् कार्यं देवानामेव निश्चितम् । आत्मकार्यं च सर्वेषां गरीयस्त्रिदशेश्वर ॥ ७१ ॥ ‘कर्ण दानव-पक्षका पुरुष है; अतः उसकी पराजय करनी चाहिये—ऐसा करनेपर निश्चितरूपसे देवताओंका ही कार्य सिद्ध होगा। देवेश्वर! अपना कार्य सभीके लिये गुरुतर होता है।। ७०-७१ ।। महात्मा फाल्गुनश्चापि सत्यधर्मरतः सदा । विजयस्तस्य नियतं जायते नात्र संशयः ॥ ७२ ॥ ‘महात्मा अर्जुन सदा सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः उनकी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है।। ७२ ।। तोषिता भगवान् येन महात्मा वृषभध्वजः । कथं वा तस्य न जयो जायते शतलोचन ॥ ७३ ॥ ‘शतलोचन! जिन्होंने महात्मा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट किया है, उनकी विजय कैसे नहीं होगी।। ७३ ।। यस्य चक्रे स्वयं विष्णुः सारथ्यं जगतः प्रभुः । मनस्वी बलवान् शूरः कृतास्त्रोऽथ तपोधनः ॥ ७४ ॥ ‘साक्षात् जगदीश्वर भगवान् विष्णुने जिनका सारथ्य किया है, जो मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और तपस्याके धनी हैं, उनकी विजय क्यों न होगी?।। बिभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः । पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः ॥ ७५ ॥ ‘सर्वगुणसम्पन्न महातेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्वेदको धारण करते हैं; अतः उनकी विजय होगी ही; क्योंकि यह देवताओंका ही कार्य है।। ७५ ।। क्लिश्यन्ते पाण्डवा नित्यं वनवासादिभिर्भृशम् । सम्पन्नस्तपसा चैव पर्याप्तः पुरुषर्षभः ॥ ७६ ॥ ‘पाण्डव वनवास आदिके द्वारा सदा महान् कष्ट उठाते आये हैं। पुरुषप्रवर अर्जुन तपोबलसे सम्पन्न और पर्याप्त शक्तिशाली हैं।। ७६ ।। अतिक्रमेच्च माहात्म्याद् दिष्टमप्यर्थपर्ययम् । अतिक्रान्ते च लोकानामभावो नियतं भवेत् ॥ ७७ ॥ ‘ये अपनी महिमासे दैवके भी निश्चित विधानको पलट सकते हैं; यदि ऐसा हुआ तो सम्पूर्ण लोकोंका अवश्य ही अन्त हो जायगा।। ७७ ।।
न विद्यते व्यवस्थानं क्रुद्धयोः कृष्णयोः क्वचित् । स्रष्टारौ जगतश्चैव सततं पुरुषर्षभौ ॥ ७८ ॥ 'श्रीकृष्ण और अर्जुनके कुपित होनेपर यह संसार कहीं टिक नहीं सकता; पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण और अर्जुन ही निरन्तर जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ ७८ ॥
नरनारायणावेतौ पुराणावृषिसत्तमौ । अनियम्यौ नियन्तारावेतौ तस्मात् परंतपौ ॥ ७९ ॥ 'ये ही प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ नर और नारायण हैं; इनपर किसीका शासन नहीं चलता। ये ही सबके नियन्ता हैं; अतः ये शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हैं ॥ ७९ ॥
नैतयोस्तु समः कश्चिद् दिवि वा मानुषेषु वा । अनुगम्यास्त्रयो लोकाः सह देवर्षिचारणैः ॥ ८० ॥ सर्वदेवगणाश्चापि सर्वभूतानि यानि च । अनयोस्तु प्रभावेण वर्तते निखिलं जगत् ॥ ८१ ॥ 'देवलोक अथवा मनुष्यलोकमें कोई भी इन दोनोंकी समानता करनेवाला नहीं है। देवता, ऋषि और चारणोंके साथ तीनों लोक, समस्त देवगण और सम्पूर्ण भूत इनके ही नियन्त्रणमें रहनेवाले हैं। इन्हींके प्रभावसे सम्पूर्ण जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त होता है ॥ ८०-८१ ॥
कर्णो लोकानयं मुख्यानाप्नोतु पुरुषर्षभः । कर्णो वैकर्तनः शूरो विजयस्त्वस्तु कृष्णयोः ॥ ८२ ॥ 'शूरवीर पुरुषप्रवर वैकर्तन कर्ण श्रेष्ठ लोक प्राप्त करे; परंतु विजय तो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ही हो ॥ ८२ ॥
वसूनां समलोकत्वं मरुतां वा समाप्नुयात् । सहितो द्रोणभीष्माभ्यां नाकलोकमवाप्नुयात् ॥ ८३ ॥ 'कर्ण द्रोणाचार्य और भीष्मजीके साथ वसुओं अथवा मरुद्गणोंके लोकमें जाय अथवा स्वर्गलोक ही प्राप्त करे' ॥ ८३ ॥
इत्युक्तो देवदेवाभ्यां सहस्राक्षोऽब्रवीद् वचः । आमन्त्र्य सर्वभूतानि ब्रह्मेशानानुशासनम् ॥ ८४ ॥ देवाधिदेव ब्रह्मा और महादेवजीके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सम्पूर्ण प्राणियोंको बुलाकर उन दोनोंकी आज्ञा सुनायी ॥
श्रुतं भवद्भैर्यत् प्रोक्तं भगवद्भ्यां जगद्धितम् । तत्तथा नान्यथा तद्धि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ८५ ॥ वे बोले—'हमारे पूज्य प्रभुओंने संसारके हितके लिये जो कुछ कहा है, वह सब तुमलोगोंने सुन ही लिया होगा। वह वैसे ही होगा। उसके विपरीत होना असम्भव है; अतः अब निश्चिन्त हो जाओ' ॥ ८५ ॥
इति श्रुत्वेन्द्रवचनं सर्वभूतानि मारिष । विस्मितान्यभवन् राजन् पूजयांचक्रिरे तदा ॥ ८६ ॥ व्यसृजंश्च सुगन्धीनि पुष्पवर्षाणि हर्षिताः । नानारूपाणि विबुधा देवतूर्याण्यवादयन् ॥ ८७ ॥ माननीय नरेश! इन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त प्राणी विस्मित हो गये और हर्षमें भरकर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे। साथ ही उन दोनोंके ऊपर उन्होंने दिव्य सुगन्धित फूलोंकी वर्षा की। देवताओंने नाना प्रकारके दिव्य बाजे बजाने आरम्भ कर दिये ॥
दिदृक्षवश्चाप्रतिमं द्वैरथं नरसिंहयोः । देवदानवगन्धर्वाः सर्व एवावतस्थिरे ॥ ८८ ॥ पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुनका अनुपम द्वैरथ युद्ध देखनेकी इच्छासे देवता, दानव और गन्धर्व सभी वहाँ खड़े हो गये ॥ ८८ ॥
रथौ तयोः श्वेतहयौ दिव्यौ युक्तौ महात्मनोः । यौ तौ कर्णार्जुनौ राजन् प्रहृष्टावभ्यतिष्ठताम् ॥ ८९ ॥ राजन्! कर्ण और अर्जुन हर्षमें भरकर जिन रथोंपर बैठे हुए थे, उन महामनस्वी वीरोंके वे दोनों रथ श्वेत घोड़ोंसे युक्त, दिव्य और आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न थे ॥ ८९ ॥
समागता लोकवीराः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् । वासुदेवार्जुनौ वीरौ कर्णशल्यौ च भारत ॥ ९० ॥ भरतनन्दन! वहाँ एकत्र हुए सम्पूर्ण जगत्के वीर पृथक्-पृथक् शंखध्वनि करने लगे। वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनने तथा शल्य और कर्णने भी अपना-अपना शंख बजाया ॥
तद् भीरुसंत्रासकरं युद्धं समभवत्तदा । अन्योन्यस्पर्धिनोरुग्रं शक्रशम्बरयोरिव ॥ ९१ ॥ इन्द्र और शम्बरासुरके समान एक-दूसरेसे डाह रखनेवाले उन दोनों वीरोंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हुआ, जो कायरोंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥
तयोर्ध्वजौ वीतमलौ शुशुभाते रथे स्थितौ । राहुकेतू यथाऽऽकाशे उदितौ जगतः क्षये ॥ ९२ ॥ उन दोनोंके रथोंपर निर्मल ध्वजाएँ शोभा पा रही थीं, मानो संसारके प्रलयकालमें आकाशमें राहु और केतु दोनों ग्रह उदित हुए हों ॥ ९२ ॥
कर्णस्याशीविषनिभा रत्नसारमयी दृढा । पुरन्दरधनुःप्रख्या हस्तिकक्ष्या व्यराजत ॥ ९३ ॥ कर्णके ध्वजकी पताकामें हाथीकी साँकलका चिह्न था, वह साँकल रत्नसारमयी, सुदृढ़ और विषधर सर्पके समान आकारवाली थी। वह आकाशमें इन्द्रधनुषके समान शोभा पाती थी ॥ ९३ ॥
कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तकः । दंष्ट्राभिर्भीषयन् भाभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा ॥ ९४ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनके रथपर मुँह बाये हुए यमराजके समान एक श्रेष्ठ वानर बैठा हुआ था, जो अपनी दाढ़ोंसे सबको डराया करता था। वह अपनी प्रभासे सूर्यके समान जान पड़ता था। उसकी ओर देखना कठिन था ॥ ९४ ॥
युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । कर्णध्वजमुपातिष्ठत् स्वस्थानाद् वेगवान् कपिः ॥ ९५ ॥ उत्पपात महावेगः कक्ष्यामभ्याहनत्तदा । नखैश्च दशनैश्चैव गरुडः पन्नगं यथा ॥ ९६ ॥ गाण्डीवधारी अर्जुनका ध्वज मानो युद्धका इच्छुक होकर कर्णके ध्वजपर आक्रमण करने लगा। अर्जुनकी ध्वजाका महान् वेगशाली वानर उस समय अपने स्थानसे उछला और कर्णकी ध्वजाकी साँकलपर चोट करने लगा, जैसे गरुड़ अपने पंजों और चोंचसे सर्पपर प्रहार कर रहे हों ॥
सा किङ्किणीकाभरणा कालपाशोपमाऽऽयसी । अभ्यद्रवत् सुसंरब्धा हस्तिकक्ष्याथ तं कपिम् ॥ ९७ ॥ कर्णके ध्वजपर जो हाथीकी साँकल थी, वह कालपाशके समान जान पड़ती थी। वह लोहनिर्मित हाथीकी साँकल छोटी-छोटी घण्टियोंसे विभूषित थी। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस वानरपर धावा किया ॥
तयोर्घोरतरे युद्धे द्वैरथे द्यूत आहिते । प्रकुर्वाते ध्वजौ युद्धं पूर्वं पूर्वतरं तदा ॥ ९८ ॥ उन दोनोंमें घोरतर द्वैरथ युद्धरूपी जूएका अवसर उपस्थित था, इसीलिये उन दोनोंकी ध्वजाओंने पहले स्वयं ही युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ९८ ॥
हया हयानभ्यहेषन् स्पर्धमानाः परस्परम् । अविध्यत् पुण्डरीकाक्षः शल्यं नयनसायकैः ॥ ९९ ॥ एकके घोड़े दूसरेके घोड़ोंको देखकर परस्पर लाग-डाँट रखते हुए हिनहिनाने लगे। इसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने शल्यकी ओर त्यौरी चढ़ाकर देखा, मानो वे उसे नेत्ररूपी बाणोंसे बींध रहे हों ॥ ९९ ॥
शल्यश्च पुण्डरीकाक्षं तथैवाभिसमैक्षत । तत्राजयद् वासुदेवः शल्यं नयनसायकैः ॥ १०० ॥ इसी प्रकार शल्यने भी कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया; परंतु वहाँ विजय श्रीकृष्णकी ही हुई। उन्होंने अपने नेत्ररूपी बाणोंसे शल्यको पराजित कर दिया ॥
कर्णं चाप्यजयद् दृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अथाब्रवीत् सूतपुत्रः शल्यमाभाष्य सस्मितम् ॥ १०१ ॥
यदि पार्थो रणे हन्यादद्य मामिह कर्हिचित् ।
किं करिष्यसि संग्रामे शल्य सत्यमथोच्यताम् ॥ १०२ ॥
इसी तरह कुन्तीनन्दन धनंजयने भी अपनी दृष्टिद्वारा कर्णको परास्त कर दिया। तदनन्तर कर्णने शल्यसे मुसकराते हुए कहा—‘शल्य! सच बताओ, यदि कदाचित् आज रणभूमिमें कुन्तीपुत्र अर्जुन मुझे यहाँ मार डालें तो तुम इस संग्राममें क्या करोगे?’ ॥ १०१-१०२ ॥
शल्य उवाच
यदि कर्ण रणे हन्यादद्य त्वां श्वेतवाहनः ।
उभावेकरथेनाहं हन्यां माधवपाण्डवौ ॥ १०३ ॥
शल्यने कहा— कर्ण! यदि श्वेतवाहन अर्जुन आज युद्धमें तुझे मार डालें तो मैं एकमात्र रथके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंका वध कर डालूँगा ॥ १०३ ॥
संजय उवाच
एवमेव तु गोविन्दमर्जुनः प्रत्यभाषत ।
तं प्रहस्याब्रवीत् कृष्णः सत्यं पार्थमिदं वचः ॥ १०४ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! इसी प्रकार अर्जुनने भी श्रीकृष्णसे पूछा। तब श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे यह सत्य बात कही— ॥ १०४ ॥
पतेद् दिवाकरः स्थानाच्छुष्येदपि महोदधिः ।
शैत्यमग्निरियान्न त्वां हन्यात् कर्णो धनंजय ॥ १०५ ॥
‘धनंजय! सूर्य अपने स्थानसे गिर जाय, समुद्र सूख जाय और अग्नि सदाके लिये शीतल हो जाय तो भी कर्ण तुम्हें मार नहीं सकता ॥ १०५ ॥
यदि चैतत् कथञ्चित् स्याल्लोकपर्यासनं भवेत् ।
हन्यां कर्णं तथा शल्यं बाहुभ्यामेव संयुगे ॥ १०६ ॥
‘यदि किसी तरह ऐसा हो जाय तो संसार उलट जायगा। मैं अपनी दोनों भुजाओंसे ही युद्धभूमिमें कर्ण तथा शल्यको मसल डालूँगा’ ॥ १०६ ॥
इति कृष्णवचः श्रुत्वा प्रहसन् कपिकेतनः ।
अर्जुनः प्रत्युवाचेदं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥ १०७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर कपिध्वज अर्जुन हँस पड़े और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १०७ ॥
मम तावदपर्याप्तौ कर्णशल्यौ जनार्दन ।
सपताकध्वजं कर्णं सशल्यरथवाजिनम् ॥ १०८ ॥
सच्छत्रकवचं चैव सशक्तिशरकार्मुकम् ।
द्रष्टास्यद्य रणे कृष्ण शरैश्छिन्नमनेकधा ॥ १०९ ॥
‘जनार्दन! ये कर्ण और शल्य तो मेरे ही लिये पर्याप्त नहीं हैं। श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें आप देखियेगा, मैं कवच, छत्र, शक्ति, धनुष, बाण, ध्वजा, पताका, रथ, घोड़े तथा राजा शल्यके सहित कर्णको अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा ॥ १०८-१०९ ॥
अद्यैव सरथं साश्वं सशक्तिककवचायुधम् ।
संचूर्णितमिवारण्ये पादपं दन्तिना यथा ॥ ११० ॥
‘जैसे जंगलमें दन्तार हाथी किसी पेड़को टूक-टूक कर देता है, उसी प्रकार आज ही मैं रथ, घोड़े, शक्ति, कवच तथा अस्त्र-शस्त्रोंसहित कर्णको चूर-चूर कर डालूँगा ॥
अद्य राधेयभार्याणां वैधव्यं समुपस्थितम् ।
ध्रुवं स्वप्नेष्वनिष्टानि ताभिर्दृष्टानि माधव ॥ १११ ॥
‘माधव! आज राधापुत्र कर्णकी स्त्रियोंके विधवा होनेका अवसर उपस्थित है। निश्चय ही, उन्होंने स्वप्नमें अनिष्ट वस्तुओंके दर्शन किये हैं ॥ १११ ॥
द्रष्टासि ध्रुवमद्यैव विधवाः कर्णयोषितः ।
न हि मे शाम्यते मन्युर्यदनेन पुरा कृतम् ॥ ११२ ॥
कृष्णां सभागतां दृष्ट्वा मूढेनादीर्घदर्शिना ।
अस्मांस्तथावहसता क्षिपता च पुनः पुनः ॥ ११३ ॥
‘आप निश्चय ही, आज कर्णकी स्त्रियोंको विधवा हुई देखेंगे। इस अदूरदर्शी मूर्खने सभामें द्रौपदीको आयी देख बारंबार उसकी तथा हमलोगोंकी हँसी उड़ायी और हम सब लोगोंपर आक्षेप किया। ऐसा करते हुए इस कर्णने पहले जो कुकृत्य किया है, उसे याद करके मेरा क्रोध शान्त नहीं होता है ॥ ११२-११३ ॥
अद्य द्रष्टासि गोविन्द कर्णमुन्मथितं मया ।
वारणेनेव मत्तेन पुष्पितं जगतीरुहम् ॥ ११४ ॥
‘गोविन्द! जैसे मतवाला हाथी फले-फूले वृक्षको तोड़ डालता है, उसी प्रकार आज मैं इस कर्णको मथ डालूँगा। आप यह सब कुछ अपनी आँखों देखेंगे ॥
अद्य ता मधुरा वाचः श्रोतासि मधुसूदन ।
दिष्ट्या जयसि वार्ष्णेय इति कर्णे निपातिते ॥ ११५ ॥
‘मधुसूदन! आज कर्णके मारे जानेपर आपको मधुर बातें सुननेको मिलेंगी। हमलोग कहेंगे—‘वृष्णिनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज आपकी विजय हुई’ ॥
अद्याभिमन्युजननीं प्रहृष्टः सान्त्वयिष्यसि ।
कुन्तीं पितृष्वसारं च प्रहृष्टः सञ्जनार्दन ॥ ११६ ॥
‘जनार्दन! आज आप अत्यन्त प्रसन्न होकर अभिमन्युकी माता सुभद्राको और अपनी बुआ कुन्तीदेवीको सान्त्वना देंगे ॥ ११६ ॥
अद्य बाष्पमुखीं कृष्णां सान्त्वयिष्यसि माधव ।
वाग्भिश्चामृतकल्पाभिर्धर्मराजं च पाण्डवम् ॥ ११७ ॥
‘माधव! आज आप मुखपर आँसुओंकी धारा बहानेवाली द्रुपदकुमारी कृष्णा तथा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको अमृतके समान मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना प्रदान करेंगे’ ।। ११७ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनसमागमे द्वैरथे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ।। ८७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागमविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८७ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२८ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2319)
अष्टाशीतितमोऽध्यायः
अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिंके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति
संजय उवाच
तद् देवनागासुरसिद्धयक्षै-
र्गन्धर्वरक्षोऽप्सरसां च संघैः ।
ब्रह्मर्षिराजर्षिसुपर्णजुष्टं
बभौ वियद् विस्मयनीयरूपम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! उस समय आकाशमें देवता, नाग, असुर, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, अप्सराओंके समुदाय, ब्रह्मर्षि, राजर्षि और गरुड़—ये सब जुटे हुए थे। इनके कारण आकाशका स्वरूप अत्यन्त आश्चर्यमय प्रतीत होता था ॥ १ ॥
नानद्यमानं निनदैर्मनोज्ञै-
र्वादित्रगीतस्तुतिनृत्यहासैः ।
सर्वेऽन्तरिक्षं ददृशुर्मनुष्याः
खस्थाश्च तद् विस्मयनीयरूपम् ॥ २ ॥
नाना प्रकारके मनोरम शब्दों, वाद्यों, गीतों, स्तोत्रों, नृत्यों और हास्य आदिसे आकाश मुखरित हो उठा। उस समय भूतलके मनुष्य और आकाशचारी प्राणी सभी उस आश्चर्यमय अन्तरिक्षकी ओर देख रहे थे ॥
ततः प्रहृष्टाः कुरुपाण्डुयोधा
वादित्रशङ्खस्वनसिंहनादैः ।
विनादयन्तो वसुधां दिशश्च
स्वनेन सर्वान् द्विषतो निजघ्नुः ॥ ३ ॥
तदनन्तर कौरव और पाण्डवपक्षके समस्त योद्धा बड़े हर्षमें भरकर वाद्य, शंखध्वनि, सिंहनाद और कोलाहलसे रणभूमि एवं सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए समस्त शत्रुओंका संहार करने लगे ॥ ३ ॥
नराश्वमातङ्गरथैः समाकुलं
शरासिशक्त्यृष्टिनिपातदुःसहम् ।
अभीरुजुष्टं हतदेहसंकुलं
रणाजिरं लोहितमाबभौ तदा ॥ ४ ॥
उस समय हाथी, अश्व, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरा हुआ बाण, खड्ग, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे दुःसह प्रतीत होनेवाला एवं मृतकोंके शरीरोंसे व्याप्त हुआ वह वीरसेवित समरांगण खूनसे लाल दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥
बभूव युद्धं कुरुपाण्डवानां यथा सुराणामसुरैः सहाभवत् । तथा प्रवृत्ते तुमुले सुदारुणे धनंजयस्याधिरथेश्च सायकैः ॥ ५ ॥ दिशश्च सैन्यं च शितैरजिह्मगैः परस्परं प्रावृणुतां सुदंशितौ । जैसे पूर्वकालमें देवताओंका असुरोंके साथ संग्राम हुआ था, उसी प्रकार पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध होने लगा। अर्जुन और कर्णके बाणोंसे वह अत्यन्त दारुण तुमुल युद्ध आरम्भ होनेपर वे दोनों कवचधारी वीर अपने पैने बाणोंसे परस्पर सम्पूर्ण दिशाओं तथा सेनाको आच्छादित करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
ततस्त्वदीयाश्च परे च सायकैः कृतेऽन्धकारे ददृशुर्न किंचन ॥ ६ ॥ भयातुरा एकरथौ समाश्रयं- स्ततोऽभवत् त्वद्भुतमेव सर्वतः । तत्पश्चात् आपके और शत्रुपक्षके सैनिक जब बाणोंसे फैले हुए अन्धकारमें कुछ भी देख न सके, तब भयसे आतुर हो उन दोनों प्रधान रथियोंकी शरणमें आ गये। फिर तो चारों ओर अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ ६ १/२ ॥
ततोऽस्त्रमस्त्रेण परस्परं तौ विधूय वाताविव पूर्वपश्चिमौ ॥ ७ ॥ घनान्धकारे वितते तमोनुदौ यथोदितौ तद्वदतीव रेजतुः । तदनन्तर जैसे पूर्व और पश्चिमकी हवाएँ एक-दूसरीको दबाती हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरेके अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट करके फैले हुए प्रगाढ़ अन्धकारमें उदित हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान अत्यन्त प्रकाशित होने लगे ॥ ७ १/२ ॥
न चाभिसर्तव्यमिति प्रचोदिताः परे त्वदीयाश्च तथावतस्थिरे ॥ ८ ॥ महारथौ तौ परिवार्य सर्वतः सुरासुराः शम्बरवासवाविव । ‘किसीको युद्धसे मुँह मोड़कर भागना नहीं चाहिये' इस नियमसे प्रेरित होकर आपके और शत्रुपक्षके सैनिक उन दोनों महारथियोंको चारों ओरसे घेरकर उसी प्रकार युद्धमें डटे
रहे, जैसे पूर्वकालमें देवता और असुर, इन्द्र और शम्बरासुरको घेरकर खड़े हुए थे ॥ मृदङ्गभेरीपणवानकस्वनैः ससिंहनादैर्नदतुर्नरोत्तमौ ॥ ९ ॥ शशाङ्कसूर्याविव मेघनिःस्वनै- र्विरजतुस्तौ पुरुषर्षभौ तदा । दोनों दलोंमें होती हुई मृदंग, भेरी, पणव और आनक आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे दोनों नरश्रेष्ठ जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे, उस समय वे दोनों पुरुषरत्न मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ उदित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९ ½ ॥
महाधनुर्मण्डलमध्यगावुभौ सुवर्चसौ बाणसहस्रदीधिती ॥ १० ॥ दिधक्षमाणौ सचराचरं जगद् युगान्तसूर्याविव दुःसहौ रणे । रणभूमिमें वे दोनों वीर चराचर जगत्को दग्ध करनेकी इच्छासे प्रकट हुए प्रलयकालके दो सूर्योंके समान शत्रुओंके लिये दुःसह हो रहे थे। कर्ण और अर्जुनरूप वे दोनों सूर्य अपने विशाल धनुषरूपी मण्डलके मध्यमें प्रकाशित होते थे। सहस्रों बाण ही उनकी किरण थे और वे दोनों ही महान् तेजसे सम्पन्न दिखायी देते थे ॥ १० ½ ॥
उभावजेयावहितान्तकावुभा- वुभौ जिघांसू कृतिनौ परस्परम् ॥ ११ ॥ महाहवे वीतभयौ समीयतु- र्महेन्द्रजम्भाविव कर्णपाण्डवौ । दोनों ही अजेय और शत्रुओंका विनाश करनेवाले थे। दोनों ही अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् और एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले थे। कर्ण और अर्जुन दोनों वीर इन्द्र और जम्भासुरके समान उस महासमरमें निर्भय विचरते थे ॥ ११ ½ ॥
ततो महास्त्राणि महाधनुर्धरौ विमुञ्चमानाविषुभिर्भयानकैः ॥ १२ ॥ नराश्वनागानमितान् निजघ्नतुः परस्परं चापि महारथौ नृप । नरेश्वर! वे महाधनुर्धर और महारथी वीर महान् अस्त्रोंका प्रयोग करते हुए अपने भयानक बाणोंद्वारा असंख्य मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका संहार करते और आपसमें भी एक-दूसरेको चोट पहुँचाते थे ॥ १२ ½ ॥
ततो विसस्रुः पुनरर्दिता नरा नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाश्रयाः ॥ १३ ॥ सनागपत्त्यश्वरथा दिशो दश
तथा यथा सिंहहता वनौकसः ।
जैसे सिंहके द्वारा घायल किये हुए जंगली पशु सब ओर भागने लगते हैं, उसी प्रकार उन नरश्रेष्ठ वीरोंके द्वारा बाणोंसे पीड़ित किये हुए कौरव तथा पाण्डव-सैनिक हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित दसों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ १३ ½ ॥
ततस्तु दुर्योधनभोजसौबलाः
कृपेण शारद्वतसूनुना सह ॥ १४ ॥
महारथाः पञ्च धनंजयाच्युतौ
शरैः शरीरार्तिकरैरताडयन् ।
महाराज! तदनन्तर दुर्योधन, कृतवर्मा, शकुनि, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य और कर्ण—ये पाँच महारथी शरीरको पीड़ा देनेवाले बाणोंद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल करने लगे ॥
धनूंषि तेषामिषुधीन् ध्वजान् हयान्
रथांश्च सूतांश्च धनंजयः शरैः ॥ १५ ॥
समं प्रमथ्याशु परान् समन्ततः
शरोत्तमैर्द्वादशभिश्च सूतजम् ।
यह देख अर्जुनने उनके धनुष, तरकस, ध्वज, घोड़े, रथ और सारथि—इन सबको अपने बाणोंद्वारा एक साथ ही प्रमथित करके चारों ओर खड़े हुए शत्रुओंको शीघ्र ही बींध डाला और सूतपुत्र कर्णपर भी बारह बाणोंका प्रहार किया ॥ १५ ½ ॥
अथाभ्यधावंस्त्वरिताः शतं रथाः
शतं गजाश्चार्जुनमाततायिनः ॥ १६ ॥
शकास्तुषारा यवनाश्च सादिनः
सहैव काम्बोजवरैर्जिघांसवः ।
तदनन्तर वहाँ सैकड़ों रथी और सैकड़ों हाथीसवार आततायी बनकर अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे दौड़े आये, उनके साथ शक, तुषार, यवन तथा काम्बोजदेशोंके अच्छे घुड़सवार भी थे ॥ १६ ½ ॥
वरायुधान् पाणिगतैः शरैः सह
क्षुरैर्न्यकृन्तत् प्रपतन् शिरांसि च ॥ १७ ॥
हयांश्च नागांश्च रथांश्च युध्यतो
धनंजयः शत्रुगणान् क्षितौ क्षिणोत् ।
परंतु अर्जुनने अपने हाथके बाणों और क्षुरोंद्वारा उन सबके उत्तम-उत्तम अस्त्रोंको काट डाला। शत्रुओंके मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। अर्जुनने विपक्षियोंके घोड़ों, हाथियों और रथोंको तथा युद्धमें तत्पर हुए उन शत्रुओंको भी पृथ्वीपर काट गिराया ॥ १७ ½ ॥
ततोऽन्तरिक्षे सुरतूर्यनिःस्वनाः
ससाधुवादा हृषितैः समीरिताः ॥ १८ ॥
निपेतुरप्युत्तमपुष्पवृष्टयः
सुगन्धिगन्धाः पवनेरिताः शुभाः ।
तत्पश्चात् आकाशमें हर्षसे उल्लसित हुए दर्शकोंद्वारा साधुवाद देनेके साथ-साथ दिव्य बाजे भी बजाये जाने लगे। वायुकी प्रेरणासे वहाँ सुन्दर सुगन्धित और उत्तम फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १८ १/२ ॥
तदद्भुतं देवमनुष्यसाक्षिकं
समीक्ष्य भूतानि विसिस्मियुस्तदा ॥ १९ ॥
तवात्मजः सूतसुतश्च न व्यथां
न विस्मयं जग्मतुरेकनिश्चयौ ।
देवताओं और मनुष्योंके साक्षित्वमें होनेवाले उस अद्भुत युद्धको देखकर समस्त प्राणी उस समय आश्चर्यसे चकित हो उठे; परंतु आपका पुत्र दुर्योधन और सूतपुत्र कर्ण—ये दोनों एक निश्चयपर पहुँच चुके थे; अतः इनके मनमें न तो व्यथा हुई और न ये विस्मयको ही प्राप्त हुए ॥
अथाब्रवीद् द्रोणसुतस्तवात्मजं
करं करेण प्रतिपीड्य सान्त्वयन् ॥ २० ॥
प्रसीद दुर्योधन शाम्य पाण्डवै-
रलं विरोधेन धिगस्तु विग्रहम् ।
हतो गुरुर्ब्रह्मसमो महास्त्रवित्
तथैव भीष्मप्रमुखा महारथाः ॥ २१ ॥
तदनन्तर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने दुर्योधनका हाथ अपने हाथसे दबाकर उसे सान्त्वना देते हुए कहा—‘दुर्योधन! अब प्रसन्न हो जाओ। पाण्डवोंसे संधि कर लो। विरोधसे कोई लाभ नहीं है। आपसके इस झगड़ेको धिक्कार है! तुम्हारे गुरुदेव अस्त्रविद्याके महान् पण्डित थे। साक्षात् ब्रह्माजीके समान थे तो भी इस युद्धमें मारे गये। यही दशा भीष्म आदि महारथियोंकी भी हुई है ॥ २०-२१ ॥
अहं त्ववध्यो मम चापि मातुलः
प्रशाधि राज्यं सह पाण्डवैश्चिरम् ।
धनंजयः शाम्यति वारितो मया
जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ॥ २२ ॥
‘मैं और मेरे मामा कृपाचार्य तो अवध्य हैं (इसीलिये अबतक बचे हुए हैं)। अतः अब तुम पाण्डवोंके साथ मिलकर चिरकालतक राज्यशासन करो। अर्जुन मेरे मना करनेपर शान्त हो जायेंगे। श्रीकृष्ण भी तुमलोगोंमें विरोध नहीं चाहते हैं ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरो भूतहिते रतः सदा
वृकोदरस्तद्वशगस्तथा यमौ । त्वया तु पार्थैश्च कृते च संविदे प्रजाः शिवं प्राप्नुयुरिच्छया तव ॥ २३ ॥ व्रजन्तु शेषाः स्वपुराणि बान्धवा निवृत्तयुद्धाश्च भवन्तु सैनिकाः । न चेद् वचः श्रोष्यसि मे नराधिप ध्रुवं प्रतप्तासि हतोऽरिभिर्युधि ॥ २४ ॥ 'युधिष्ठिर तो सभी प्राणियोंके हितमें ही लगे रहते हैं। अतः वे भी मेरी बात मान लेंगे। बाकी रहे भीमसेन और नकुल-सहदेव, सो ये भी धर्मराजके अधीन हैं; (अतः उनकी इच्छाके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे) इस प्रकार पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जानेपर सारी प्रजाका कल्याण होगा। फिर तुम्हारी इच्छासे सगे-सम्बन्धी भाई-बन्धु अपने-अपने नगरको लौट जायँ और समस्त सैनिकोंको युद्धसे छुट्टी मिल जाय। नरेश्वर! यदि मेरी बात नहीं सुनोगे तो निश्चय ही युद्धमें शत्रुओंके हाथसे मारे जाओगे और उस समय तुम्हें बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ २३-२४ ॥ (वृद्धं पितरमालोक्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । कृपालुर्धर्मराजो हि याचितः शममेष्यति ॥ 'बूढ़े पिता धृतराष्ट्र और यशस्विनी माता गान्धारीकी ओर देखकर दयालु धर्मराज युधिष्ठिर मेरे अनुरोध करनेपर भी संधि कर लेंगे। यथोचितं च वै राज्यमनुज्ञास्यति ते प्रभुः । विपश्चित् सुमतिर्धीरः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ 'वे सामर्थ्यशाली, विद्वान्, उत्तम बुद्धिसे युक्त, धैर्यवान् तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अतः तुम्हारे लिये राज्यका जितना भाग उचित है, उसपर शासन करनेके लिये वे तुम्हें स्वयं ही आज्ञा दे देंगे। वैरं नेष्यति धर्मात्मा स्वजने नास्त्यतिक्रमः । न विग्रहमतिः कृष्णः स्वजने प्रतिनन्दति ॥ 'धर्मात्मा युधिष्ठिर वैर दूर कर देंगे; क्योंकि आत्मीयजनसे कोई भूल हो जाय तो उसे अक्षम्य अपराध नहीं माना जाता। श्रीकृष्ण भी यह नहीं चाहते कि आपसमें कलह हो, वे स्वजनोंपर सदा संतुष्ट रहते हैं। भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । वासुदेवमते चैव पाण्डवस्य च धीमतः ॥ स्थास्यन्ति पुरुषव्याघ्रास्तयोर्वचनगौरवात् । 'भीमसेन, अर्जुन और दोनों भाई माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव—ये सब लोग भगवान् श्रीकृष्ण तथा बुद्धिमान् युधिष्ठिरकी रायसे चलते हैं; अतः ये पुरुषसिंह वीर उन
दोनोंके आदेशका गौरव रखते हुए युद्धसे निवृत्त हो जायँगे। रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् ।। जीवने यत्नमातिष्ठ जीवन् भद्राणि पश्यति । ‘दुर्योधन! तुम स्वयं ही अपनी रक्षा करो। आत्मा ही सब सुखोंका भाजन है। तुम जीवन-रक्षाके लिये प्रयत्न करो। जीवित रहनेवाला पुरुष ही कल्याणका दर्शन करता है। राज्यं श्रीश्चैव भद्रं ते जीवमाने तु कल्पते ।। मृतस्य खलु कौरव्य नैव राज्यं कुतः सुखम् । ‘तुम्हारा कल्याण हो; तुम जीवित रहोगे, तभी तुम्हें राज्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति हो सकती है। कुरुनन्दन! मरे हुएको राज्य नहीं मिलता, फिर सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?। लोकवृत्तमिदं वृत्तं प्रवृत्तं पश्य भारत ।। शाम्य त्वं पाण्डवैः सार्धं शेषं कुरुकुलस्य च । ‘भारत! लोकमें घटित होनेवाले इस प्रचलित व्यवहारकी ओर दृष्टिपात करो; पाण्डवोंके साथ संधि कर लो और कौरवकुलको शेष रहने दो। मा भूत् स कालः कौरव्य यदाहमहितं वचः ।। ब्रूयां कामं महाबाहो मावमंस्था वचो मम । ‘कुरुनन्दन! ऐसा समय कभी न आवे जब कि मैं इच्छानुसार तुमसे कोई अहितकर बात कहूँ; अतः महाबाहो! तुम मेरी बातका अनादर न करो। धर्मिष्ठमिदमत्यर्थं राज्ञश्चैव कुलस्य च ।। एतद्धि परमं श्रेयः कुरुवंशस्य वृद्धये । ‘मेरा यह कथन धर्मके अनुकूल तथा राजा और राजकुलके लिये अत्यन्त हितकर है; यह कौरववंशकी वृद्धिके लिये परम कल्याणकारी है। प्रजाहितं च गान्धारे कुलस्य च सुखावहम् ।। पथ्यमायतिसंयुक्तं कर्णोऽप्यर्जुनमाहवे । न जेष्यति नरव्याघ्रमिति मे निश्चिता मतिः ।। रोचतां ते नरश्रेष्ठ ममैतद् वचनं शुभम् । अतोऽन्यथा हि राजेन्द्र विनाशः सुमहान् भवेत् ॥ ‘गान्धारीनन्दन! मेरा यह वचन प्रजाजनोंके लिये हितकर, इस कुलके लिये सुखदायक, लाभकारी तथा भविष्यमें भी मंगलकारक है। नरश्रेष्ठ! मेरी यह निश्चित धारणा है कि कर्ण नरव्याघ्र अर्जुनको कदापि जीत न सकेगा; अतः मेरा यह शुभ वचन तुम्हें पसंद आना चाहिये। राजेन्द्र! यदि ऐसा नहीं हुआ तो बड़ा भारी विनाश होगा। इदं च दृष्टं जगता सह त्वया कृतं यदेकेन किरीटमालिना । यथा न कुर्याद् बलभिन्न चान्तको
न चापि धाता भगवान् न यक्षराट् ॥ २५ ॥ 'किरीटधारी अर्जुनने अकेले जो पराक्रम किया है, इसे सारे संसारके साथ तुमने प्रत्यक्ष देख लिया है। ऐसा पराक्रम न तो इन्द्र कर सकते हैं और न यमराज। न धाता कर सकते हैं और न भगवान् यक्षराज कुबेर ।।
अतोऽपि भूयान् स्वगुणैर्धनंजयो
न चातिवर्तिष्यति मे वचोऽखिलम् ।
तवानुयात्रां च सदा करिष्यति
प्रसीद राजेन्द्र शमं त्वमाप्नुहि ॥ २६ ॥
'यद्यपि अर्जुन अपने गुणोंद्वारा इससे भी बहुत बढ़े-चढ़े हैं, तथापि मुझे विश्वास है कि मेरी कही हुई इन सारी बातोंको कदापि नहीं टालेंगे। यही नहीं, वे सदा तुम्हारा अनुसरण करेंगे; इसलिये राजेन्द्र! तुम प्रसन्न होओ और संधि कर लो ।। २६ ।।
ममापि मानः परमः सदा त्वयि
ब्रवीम्यतस्त्वां परमाच्च सौहृदात् ।
निवारयिष्यामि च कर्णमप्यहं
यदा भवान् सप्रणयो भविष्यति ॥ २७ ॥
'तुम्हारे प्रति मेरे मनमें भी सदा बड़े आदरका भाव रहा है। हम दोनोंकी जो घनिष्ठ मित्रता है, उसीके कारण मैं तुमसे यह प्रस्ताव करता हूँ। यदि तुम प्रेमपूर्वक राजी हो जाओगे तो मैं कर्णको भी युद्धसे रोक दूँगा ।। २७ ।।
वदन्ति मित्रं सहजं विचक्षणा-
स्तथैव साम्ना च धनेन चार्जितम् ।
प्रतापतश्चोपनतं चतुर्विधं
तदस्ति सर्वं तव पाण्डवेषु ॥ २८ ॥
'विद्वान् पुरुष चार प्रकारके मित्र बतलाते हैं। एक सहज मित्र होते हैं (जिनके साथ स्वाभाविक मैत्री होती हैं)। दूसरे हैं संधि करके बनाये हुए मित्र। तीसरे वे हैं जो धन देकर अपनाये गये हैं। जो किसीके प्रबल प्रतापसे प्रभावित हो स्वतः शरणमें आ जाते हैं, वे चौथे प्रकारके मित्र हैं। पाण्डवोंके साथ तुम्हारी सभी प्रकारकी मित्रता सम्भव है ।। २८ ।।
निसर्गतस्ते तव वीर बान्धवाः
पुनश्च साम्ना समवाप्नुहि प्रभो ।
त्वयि प्रसन्ने यदि मित्रतां गते
हितं कृतं स्याज्जगतस्त्वयाऽतुलम् ॥ २९ ॥
'वीर! एक तो वे तुम्हारे जन्मजात भाई हैं; अतः सहज मित्र हैं। प्रभो! फिर तुम संधि करके उन्हें अपना मित्र बना लो। यदि तुम प्रसन्नतापूर्वक पाण्डवोंसे मित्रता स्वीकार कर लो तो तुम्हारे द्वारा संसारका अनुपम हित हो सकता है' ।। २९ ।।
स एवमुक्तः सुहृदा वचो हितं विचिन्त्य निःश्वस्य च दुर्मनाब्रवीत् । यथा भवानाह सखे तथैव त- न्ममापि विज्ञापयतो वचः शृणु ॥ ३० ॥
सुहृद् अश्वत्थामाने जब इस प्रकार हितकी बात कही, तब दुर्योधन उसपर विचार करके लंबी साँस खींचकर मन-ही-मन दुःखी हो इस प्रकार बोला—'सखे! तुम जैसा कहते हो, वह सब ठीक है; परंतु इस विषयमें कुछ मैं भी निवेदन कर रहा हूँ, अतः मेरी बात भी सुन लो ॥ ३० ॥
निहत्य दुःशासनमुक्तवान् वचः प्रसह्य शार्दूलवदेष दुर्मतिः । वृकोदरस्तद्धृदये मम स्थितं न तत् परोक्षं भवतः कुतः शमः ॥ ३१ ॥
'इस दुर्बुद्धि भीमसेनने सिंहके समान हठपूर्वक दुःशासनका वध करके जो बात कही थी, वह तुमसे छिपी नहीं है। वह इस समय भी मेरे हृदयमें स्थित होकर पीड़ा दे रही है। ऐसी दशामें कैसे संधि हो सकती है? ॥ ३१ ॥
न चापि कर्णं प्रसहेद् रणेऽर्जुनो महागिरिं मेरुमिवोग्रमारुतः । न चाश्वसिष्यन्ति पृथात्मजा मयि प्रसह्य वैरं बहुशो विचिन्त्य ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा भयंकर वायु जैसे महापर्वत मेरुका सामना नहीं कर सकती, उसी प्रकार अर्जुन इस रणभूमिमें कर्णका वेग नहीं सह सकते। हमने हठपूर्वक बारंबार जो वैर किया है, उसे सोचकर कुन्तीके पुत्र मुझपर विश्वास भी नहीं करेंगे ॥ ३२ ॥
न चापि कर्णं गुरुपुत्र संयुगा- दुपारमेत्यर्हसि वक्तुमच्युत । श्रमेण युक्तो महताद्य फाल्गुन- स्तमेष कर्णः प्रसभं हनिष्यति ॥ ३३ ॥
'अपनी मर्यादा न छोड़नेवाले गुरुपुत्र! तुम्हें कर्णसे युद्ध बंद करनेके लिये नहीं कहना चाहिये; क्योंकि इस समय अर्जुन महान् परिश्रमसे थक गये हैं; अतः अब कर्ण उन्हें बलपूर्वक मार डालेगा' ॥ ३३ ॥
तमेवमुक्त्वाप्यनुनीय चासकृत् तवात्मजः स्वाननुशास्ति सैनिकान् । विनिघ्नताभिद्रवताहितान् मम सबाणहस्ताः किमु जोषमासत ॥ ३४ ॥
अश्वत्थामासे ऐसा कहकर बारंबार अनुनय-विनयके द्वारा उसे प्रसन्न करके आपके पुत्रने अपने सैनिकोंको आदेश देते हुए कहा—'अरे! तुमलोग हाथोंमें बाण लिये चुपचाप बैठे क्यों हो? मेरे शत्रुओंपर टूट पड़ो और उन्हें मार डालो' ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामवाक्येऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाका वचनविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2329)
एकोननवतितमोऽध्यायः
कर्ण और अर्जुनका भयंकर युद्ध और कौरववीरोंका पलायन
संजय उवाच
तौ शङ्खभेरीनिनादे समृद्धे
समीयतुः श्वेतहयौ नराग्र्यौ ।
वैकर्तनः सूतपुत्रोऽर्जुनश्च
दुर्मन्त्रिते तव पुत्रस्य राजन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप जब वहाँ शंख और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, उस समय वहाँ श्वेत घोड़ोंवाले दोनों नरश्रेष्ठ वैकर्तन कर्ण और अर्जुन युद्धके लिये एक-दूसरेकी ओर बढ़े ॥ १ ॥
(आशीविषावग्निमिवापधूमं
वैरं मुखाभ्यामभिनिःश्वसन्तौ ।
यशस्विनौ जज्वलतुर्मृधे तदा
घृतावसिक्ताविव हव्यवाहौ ॥)
वे दोनों यशस्वी वीर उस समय दो विषधर सर्पोंके समान लंबी साँस खींचकर मानो अपने मुखोंसे धूमरहित अग्निके सदृश वैरभाव प्रकट कर रहे थे। वे घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई दो अग्नियोंकी भाँति युद्धभूमिमें देदीप्यमान होने लगे।
यथा गजौ हैमवतौ प्रभिन्नौ
प्रवृद्धदन्ताविव वासितार्थे ।
तथा समाजग्मतुरुग्रवीर्यौ
धनंजयश्चाधिरथिश्च वीरौ ॥ २ ॥
जैसे मदकी धारा बहानेवाले हिमाचलप्रदेशके बड़े-बड़े दाँतोंवाले दो हाथी किसी हथिनीके लिये लड़ रहे हों, उसी प्रकार भयंकर पराक्रमी वीर अर्जुन और कर्ण युद्धके लिये एक-दूसरेके सामने आये ॥ २ ॥
बलाहकेनेव महाबलाहको
यदृच्छया वा गिरिणा यथा गिरिः ।
तथा धनुर्ज्यातलनेमिनिस्वनैः
समीयतुस्ताविषुवर्षवर्षिणौ ॥ ३ ॥