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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पद्मनाभो महायोगी महात्मा भूतभावनः । न संतापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमाः ॥ ३४ ॥ सुरश्रेष्ठगण! ये महायोगी भूतभावन महात्मा पद्मनाभ हैं; अतः तुम्हें अपने मनसे संताप, भय एवं शोकको दूर कर देना चाहिये ॥ ३४ ॥

विधिरेश प्रभावश्च कालः संक्षयकारकः । लोकान् धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना ॥ ३५ ॥ ये ही विधि हैं, ये ही प्रभाव हैं और ये ही संहारकारी काल हैं, इन्हीं परमात्माने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हुए यह भीषण सिंहनाद किया है ॥ ३५ ॥

स एष हि महाबाहुः सर्वलोकनमस्कृतः । अच्युतः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूतादिरीश्वरः ॥ ३६ ॥ ये सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण, सर्वलोकवन्दित ईश्वर महाबाहु कमलनयन अच्युत हैं ॥ ३६ ॥

(युधिष्ठिर उवाच)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रयाणकाले किं जप्यं मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकैः ॥ युधिष्ठिरने पूछा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले तत्त्व-चिन्तकोंको मृत्युकालमें किस मन्त्रका जप करना चाहिये ॥

किमनुस्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते । प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ कुरुश्रेष्ठ! मृत्युका समय उपस्थित होनेपर किसका चिन्तन करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त हो सकता है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥

भीष्म उवाच

सद्युक्तिसहितः सूक्ष्म उक्तः प्रश्नस्त्वयानघ । शृणुष्वावहितो राजन् नारदेन पुरा श्रुतम् ॥ भीष्मजीने कहा— राजन्! निष्पाप नरेश! तुमने जो प्रश्न उपस्थित किया है, वह उत्तम युक्तियुक्त और सूक्ष्म है। उसे सावधान होकर सुनो। जो पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे सुना था, वहीं मैं तुमसे कहता हूँ ॥

श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् । पुरा नारायणं देवं नारदः परिपृष्टवान् ॥ जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो इस जगत्के बीज (मूल कारण) हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है तथा जो इस जगत्के साक्षी हैं, उन्हीं भगवान् नारायणसे पूर्वकालमें नारदजीने इस प्रकार प्रश्न किया ॥

नारद उवाच

त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमसः परम् ।
आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ॥
भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितेन्द्रियैः ।
कथं भक्तैर्विचिन्त्योऽसि योगिभिर्मोक्षकांक्षिभिः ॥
नारदजीने पूछा— भगवन्! महर्षिगण कहते हैं, आप अविनाशी (नित्य), परब्रह्म, निर्गुण, अज्ञानान्धकार एवं तमोगुणसे अतीत, विद्याके अधिपति, परम धामस्वरूप, ब्रह्मा तथा उनकी प्राकट्यभूमि—आदिकमलके उत्पत्ति-स्थान हैं। भूत और भविष्यके स्वामी परमेश्वर! श्रद्धालु और जितेन्द्रिय भक्तों तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले योगियोंको आपके स्वरूपका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? ।।

किं च जप्यं जपेन्नित्यं कल्यमुत्थाय मानवः ।
कथं युञ्जन् सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ॥
मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर किस जपनीय मन्त्रका जप करे और योगी पुरुष किस प्रकार निरन्तर ध्यान करे? आप इस सनातन तत्त्वका वर्णन कीजिये ।।

श्रुत्वा तस्य तु देवर्षेर्वाक्यं वाचस्पतिः स्वयं ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुर्नारदं वरदः प्रभुः ॥
देवर्षि नारदका यह वचन सुनकर वाणीके अधिपति वरदायक भगवान् विष्णुने नारदजीसे इस प्रकार कहा ।।

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यानुस्मृतिम् ।
यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ॥
श्रीभगवान् बोले— देवर्षे! मैं हर्षपूर्वक तुम्हारे सामने इस दिव्य अनुस्मृतिका वर्णन करता हूँ। मृत्युकालमें जिसका अध्ययन और श्रवण करके मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।।

ओङ्कारमग्रतः कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद ।
एकाग्रः प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
ओं नमो भगवते वासुदेवायति ।
नारद! आदिमें ओंकारका उच्चारण करके मुझे नमस्कार करे। अर्थात् एकाग्र एवं पवित्रचित्त होकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इति ।।

इत्युक्तो नारदः प्राह प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥
सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् ।

भगवान्‌के ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले।।

नारद उवाच

अव्यक्तं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ।।
प्रपद्ये प्राञ्जलिर्विष्णुमक्षरं परमं पदम् ।
**नारदजीने कहा—**प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान्‌ विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ।।
पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् ।।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् ।
जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगत्‌के साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान्‌ विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ।।
भगवन्तं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।
जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्रों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान्‌ विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ।।
स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ।।
पद्मनाभं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् ।
समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान्‌ पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ।।
हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भं परतः परम् ।।
प्रभोः प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् ।
जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान्‌ श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।।
सहस्रशीर्षं पुरुषं महर्षिं तत्त्वभावनम् ।।
प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ।
जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान्‌ श्रीहरिकी शरण लेता हूँ।।
नारायणं पुराणर्षिं योगात्मानं सनातनम् ।।

संस्थानं सर्वतत्त्वानां प्रपद्ये ध्रुवमीश्वरम् ।
जो पुरातन ऋषि नारायण हैं, योगात्मा हैं, सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण तत्त्वोंके अधिष्ठान एवं अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ॥
यः प्रभुः सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।।
चराचरगुरुर्विष्णुः स मे देवः प्रसीदतु ।
जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रभु हैं, जिन्होंने इस समस्त संसारको व्याप्त कर रखा है; तथा जो चर और अचर प्राणियोंके गुरु हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पद्मयोनिः पितामहः ।।
ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ।
जिनसे पद्मयोनि पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है; तथा जो वेद और ब्राह्मणोंकी योनि हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके परावरे ।।
आभूतसम्प्लवे चैव प्रलीने प्रकृतौ महान् ।
एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
प्राचीन कालमें महाप्रलय प्राप्त होनेपर जब सभी चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवताओंका भी लय हो जाता है और संसारकी छोटी-बड़ी सभी वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं; तथा सम्पूर्ण भूतोंका क्रमशः लय होकर जब प्रकृतिमें महत्तत्त्व भी विलीन हो जाता है, उस समय जो एकमात्र शेष रह जाते हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
चार<sup></sup>, चार<sup></sup>, दो<sup></sup>, पाँच<sup></sup> तथा दो<sup></sup>—इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंद्वारा जिन्हें आहुति दी जाती है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
पर्जन्यः पृथिवी सस्यं कालो धर्मः क्रियाक्रिये ।
गुणाकरः स मे बभ्रुर्वासुदेवः प्रसीदतु ।।
मेघ, पृथ्वी, सस्य, काल, धर्म, कर्म और कर्मका अभाव—ये सब जिनके स्वरूप हैं, गुणोंके भण्डाररूप वे श्यामवर्ण भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों ।।
अग्नीषोमार्कंताराणां ब्रह्मरुद्रेन्द्रयोगिनाम् ।
यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।
जो अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके भी तेजको जीत लेते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।।
योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद ।
यज्ञगर्भ हिरण्याङ्ग पञ्चयज्ञ नमोऽस्तु ते ।।

योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है। सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पञ्चयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है॥ चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्तेऽस्तु वासुदेव प्रधानकृत् ॥ आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं। वासुदेव! आपको नमस्कार है॥ अजस्त्वमगमः पन्था ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृक् । विकर्तः पञ्चकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ॥ आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं। आप प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न—इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं। ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है॥ अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परोऽक्षरः । यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ॥ न प्रधानो न च महान् पुरुषश्चेतनो ह्यजः । अनयोर्यः परतरः तमस्मि शरणं गतः ॥ प्रकृति और महत्तत्त्व—ये दोनों जड हैं। पुरुष चेतन और अजन्मा है। इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ॥ चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्मेशानादयः प्रभुम् । निश्चयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गतः ॥ ब्रह्मा और शिव आदि देवता जिन भगवान्‌का सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ॥ ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ एकांशेन जगत् सर्वमवष्टभ्य विभुः स्थितः । अग्राह्यो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गतः ॥

जो सर्वव्यापी परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशसे धारण करके स्थित हैं, जो किसी इन्द्रियविशेषके द्वारा ग्रहण नहीं किये जाते तथा जो निर्गुण एवं नित्य हैं, उन परमात्माकी मैं शरणमें जाता हूँ॥

सोमार्काग्निमयं तेजो या च तारामयी द्युतिः ।
दिवि संजायते योऽयं स महात्मा प्रसीदतु ॥
आकाशमें जो सूर्य और चन्द्रमाका तेज प्रकाशित होता है तथा तारगणोंकी जो ज्योति जगमगाती रहती है, वह सब जिनका ही स्वरूप है, वे परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों॥

गुणादिर्निर्गुणश्चाद्यो लक्ष्मीवांश्चेतनो ह्यजः ।
सूक्ष्मः सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो समस्त गुणोंके आदि कारण और स्वयं निर्गुण हैं, आदि पुरुष, लक्ष्मीवान्, चेतन, अजन्मा, सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा योगी हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

सांख्ययोगाश्च ये चान्ये सिद्धाश्च परमर्षयः ।
यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
ज्ञानयोगी, कर्मयोगी तथा जो दूसरे-दूसरे सिद्ध और महर्षि हैं, वे जिन्हें जानकर इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

अव्यक्तः समधिष्ठाता ह्यचिन्त्यः सदसत्परः ।
आस्थितिः प्रकृतिश्रेष्ठः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो अव्यक्त, सबके अधिष्ठाता, अचिन्त्य और सत्-असत्से विलक्षण हैं, आधाररहित एवं प्रकृतिसे श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

क्षेत्रज्ञः पञ्चधा भुङ्क्ते प्रकृतिं पञ्चभिर्मुखैः ।
महान् गुणांश्च यो भुङ्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो जीवात्मारूपसे पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी मुखोंद्वारा शब्द आदि पाँच विषयोंका उपभोग करते हैं तथा स्वयं महान् होकर भी जो गुणोंका अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

सूर्यमध्ये स्थितः सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता ।
भूतबाह्या च या दीप्तिः स महात्मा प्रसीदतु ॥
जो सूर्यमण्डलमें सोमरूपसे स्थित होते हैं, उस सोमके भीतर जो अलौकिक दीप्ति है, वह जिनका स्वरूप है, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों॥

नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ।
निर्विकार नमस्तेऽस्तु साक्षी क्षेत्रे व्यवस्थितः ॥
सर्वस्वरूप परमेश्वर! आपको सब ओरसे नमस्कार है, आपके सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं। निर्विकार परमात्मन्! आपको नमस्कार है। आप प्रत्येक क्षेत्र (शरीर)-में साक्षीरूपसे स्थित हैं॥

अतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिङ्गैर्व्यक्तैर्न मीयसे । ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ॥ इन्द्रियातीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है। व्यक्त लिंगोंद्वारा आपका ज्ञान होना असम्भव है। संसारमें जो आपको नहीं जानते, वे जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े रहते हैं ॥

कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिताः । नान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्नारका द्विजाः ॥ जो काम और क्रोधसे मुक्त, राग-द्वेषसे रहित तथा आपके अनन्य भक्त हैं, वे ही आपको जान पाते हैं। जो विषयोंके नरकमें पड़े हुए द्विज हैं, वे आपको नहीं जानते हैं ॥

एकान्तिनो हि निर्द्वन्द्वा निराशीःकर्मकारिणः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विनिश्चिताः ॥ जो आपके अनन्य भक्त, द्वन्द्वोंसे रहित तथा निष्काम कर्म करनेवाले हैं, जिन्होंने ज्ञानमयी अग्निसे अपने समस्त कर्मोंको दग्ध कर दिया है, वे आपके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाले पुरुष आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥

अशरीरं शरीरस्थं समं सर्वेषु देहिषु । पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्रविशन्त्युत ॥ आप शरीरमें रहते हुए भी उससे रहित हैं तथा सम्पूर्ण देहधारियोंमें समभावसे स्थित हैं। जो पुण्य और पापसे मुक्त हैं, वे भक्तजन आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥

अव्यक्तं बुद्धयहङ्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च । त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ॥ अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, पञ्च महाभूत तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सभी आपमें हैं और उन सबमें आप हैं, किंतु वास्तवमें न उनमें आप हैं, न आपमें वे हैं ॥

एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् । समोऽसि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥ समत्वमभिकांक्षेऽहं भक्त्या वै नान्यचेतसा । एकत्व, अन्यत्व और नानात्वका रहस्य जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, वे आप परमात्माको प्राप्त होते हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंमें सम हैं। आपका न कोई द्वेषपात्र है और न प्रिय। मैं अनन्य चित्तसे आपकी भक्तिके द्वारा समत्व पाना चाहता हूँ ॥

चराचरमिदं सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। त्वया त्वय्येव तत् प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । चार प्रकारका जो यह चराचर प्राणिसमुदाय है, वह सब आपसे व्याप्त है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोये होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है ॥

स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यतस्तत्त्वस्तत्त्वसंज्ञितः ॥ अकर्महेतुरचलः पृथगात्मन्यवस्थितः ।

आप जगत्के स्रष्टा, भोक्ता और कूटस्थ हैं। तत्त्वरूप होकर भी उससे सर्वथा विलक्षण हैं। आप कर्मके हेतु नहीं हैं। अविचल परमात्मा हैं। प्रत्येक शरीरमें पृथक्-पृथक् जीवात्मारूपसे आप ही विद्यमान हैं।। न ते भूतेषु संयोगो भूततत्त्वगुणातिगः ।। अहङ्कारेण बुद्ध्या वा न ते योगस्त्रिभिर्गुणैः । वास्तवमें प्राणियोंसे आपका संयोग नहीं है। आप भूत, तत्त्व और गुणोंसे परे हैं। अहंकार, बुद्धि और तीनों गुणोंसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है।। न ते धर्मोऽस्त्यधर्मो वा नारम्भो जन्म वा पुनः ।। जरामरणमोक्षार्थं त्वां प्रपन्नोऽस्मि सर्वशः । न आपका कोई धर्म है और न कोई अधर्म। न कोई आरम्भ है न जन्म। मैं जरा-मृत्युसे छुटकारा पानेके लिये सब प्रकारसे आपकी शरणमें आया हूँ।। ईश्वरोऽसि जगन्नाथ ततः परम उच्यसे ।। भक्तानां यद्धितं देव तद् ध्याहि त्रिदशेश्वर । जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिये परमात्मा कहलाते हैं। देव! सुरेश्वर! भक्तोंके लिये जो हितकी बात हो, उसका मेरे लिये चिन्तन कीजिये।। विषयैरिन्द्रियैर्वापि न मे भूयः समागमः ।। पृथिवीं यातु मे घ्राणं यातु मे रसना जलम् । रूपं हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् ।। श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुनः । विषयों और इन्द्रियोंके साथ फिर मेरा कभी समागम न हो। मेरी घ्राणेन्द्रिय पृथ्वी-तत्त्वमें मिल जाय और रसना जलमें, रूप (नेत्र) अग्निमें, स्पर्श (त्वचा) वायुमें, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें और मन वैकारिक अहंकारमें मिल जाय।। इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासु स्वासु च योनिषु ।। पृथिवी यातु सलिलमापोऽग्निमनलोऽनिलम् । वायुराकाशमप्येतु मनश्चाकाश एव च ।। अहङ्कारं मनो यातु मोहनं सर्वदेहिनाम् । अहङ्कारस्ततो बुद्धिं बुद्धिरव्यक्तमच्युत ।। अच्युत! इन्द्रियाँ अपनी-अपनी योनियोंमें मिल जायें, पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश मनमें, मन समस्त प्राणियोंको मोहनेवाले अहंकारमें, अहंकार बुद्धि (महत्तत्त्व)-में और बुद्धि अव्यक्त प्रकृतिमें मिल जाय।। प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते । वियोगः सर्वकरणैर्गुणभूतैश्च मे भवेत् ।।

जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ।। निष्कैकवल्यपदं तात काङ्क्षेऽहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ॥ तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ। आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय। इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ।। त्वद्बुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ॥ मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ।। पूर्वदेहकृता ये मे व्याधयः प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋणं मे प्रतिमुञ्चतु ॥ पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ।। अनुध्यातोऽसि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः । तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥ देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ।। उपतिष्ठन्तु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उऋण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ।।

श्रीभगवानुवाच

अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातनः । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ श्रीभगवान् बोले— नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है। मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ।। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च ।

दशेन्द्रियाणि मनसि अहङ्कारे तथा मनः ॥ अहङ्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे। मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ॥

यतबुद्धीन्द्रियः पश्यन् बुद्ध्या बुद्धयेत् परात्परम् । ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है ॥

आत्मनाऽऽत्मनि संयोज्य परमात्मान्यनुस्मरेत् ॥ ततो बुद्धेः परं बुद्ध्वा लभते न पुनर्भवम् । मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ॥ अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् । स्वयं ही अपने-आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ॥

ओं नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्वते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥

इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहितः ॥ स्वपन् विबुध्यंश्च पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी-अनुस्मृति विद्या है। मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ॥

पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषतः ॥ श्रावयेच्छ्रद्दधानांश्च मद्भक्तांश्च विशेषतः । पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषतः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ॥

यद्यहङ्कारमाश्रित्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं तु तत् । यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है। परंतु वह आवागमनके चक्करमें डालनेवाला होता है ॥

अभ्यर्चयन् पितॄन् देवान् पठन् जुह्वन् बलिं ददत् ।।
ज्वलन्नग्निं स्मरेद् यो मां स याति परमां गतिम् ।
जो देवताओं और पितरोंकी पूजा, पाठ, होम और बलिवैश्वदेव करते तथा अग्निमें आहुति देते समय मेरा स्मरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।।
यज्ञं दानं तपस्तस्मात् कुर्यादाशीर्विवर्जितः ।
यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं; अतः यज्ञ, दान और तपका निष्कामभावसे अनुष्ठान करे ।।
नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।।
तस्याक्षयो भवेल्लोकः श्वपाकस्यापि नारद ।
नारद! जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे लिये केवल नमस्कारमात्र बोल देता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षयलोककी प्राप्ति होती है ।।
किं पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् ।।
श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिताः ।
फिर जो साधक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मेरे आश्रित हो श्रद्धा और विधिके साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ।।
कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्भक्तो नान्तमश्नुते ।।
मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यस्येव पदं मम ।।
देवर्षे! सारे कर्म और उनके फल आदि-अन्तवाले हैं; परंतु मेरा भक्त अन्तवान् (विनाशशील) फलका उपभोग नहीं करता; अतः तुम सदा आलस्यरहित होकर मेरा ही ध्यान करो। इससे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परमधामका दर्शन कर लोगे ।।
अज्ञानाय च यो ज्ञानं दद्याद् धर्मोपदेशतः ।
कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात् तेन तुल्यं च तत्फलम् ।।
जो धर्मोपदेशके द्वारा अज्ञानी पुरुषको ज्ञान प्रदान करता है अथवा जो किसीको समूची पृथ्वीका दान कर देता है तो उस ज्ञानदानका फल इस पृथ्वीदानके बराबर ही माना जाता है ।।
तस्मात् प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् ।
एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्यं च विन्दति ।।
नरश्रेष्ठ नारद! इसलिये साधु पुरुषोंको जन्म और बन्धनके भयको दूर करनेवाला ज्ञान ही देना चाहिये। इस प्रकार ज्ञान देकर मनुष्य कल्याण और बल प्राप्त करता है ।।
अश्वमेधसहस्राणां सहस्रं यः समाचरेत् ।

नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥
जो दस लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान कर ले, वह भी उस पदको नहीं पा सकता, जो मेरे भक्तोंको प्राप्त हो जाता है ॥

भीष्म उवाच

एवं पृष्टः पुरा तेन नारदेन सुरर्षिणा ।
यदुवाच तदा शम्भुस्तदुक्तं तव सुव्रत ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**सुव्रत! इस प्रकार पूर्वकालमें देवर्षि नारदके पूछनेपर कल्याणमय भगवान् विष्णुने उस समय जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें बता दिया ॥

त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणातिगम् ।
भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ॥
तुम भी एकचित्त होकर उन गुणातीत परमात्माका ध्यान करो और सम्पूर्ण भक्तिभावसे उन्हीं अविनाशी परमात्माका भजन करो ॥

श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं दिव्यं नारायणेरितम् ।
अत्यन्तभक्तिमान् देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ॥
भगवान् नारायणका कहा हुआ यह दिव्य वचन सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् देवर्षि नारद भगवान्‌के प्रति एकाग्रचित्त हो गये ॥

नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् ।
इदं जपन् वै प्राप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥
जो पुरुष अनन्यभावसे दस वर्षोंतक ऋषि-प्रवर नारायणदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने ।
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥
जिसकी भगवान् जनार्दनमें भक्ति है, उसे बहुत-से मन्त्रोंद्वारा क्या लेना है? 'ॐ नमो नारायणाय' यह एकमात्र मन्त्र ही सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला है ॥

इमां रहस्यां परमामनुस्मृति-
मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् ।
विहाय दुःखान्यवमुच्य सङ्कटात्
स वीतरागो विचरेन्महीमिमाम् ॥)
इस परम गोपनीय अनुस्मृति विद्याका स्वाध्याय करके मनुष्य भगवान्‌के प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाली बुद्धि प्राप्त कर लेता है। वह सारे दुःखोंको दूर करके संकटसे मुक्त एवं वीतराग हो इस पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करता है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम
नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भूमिके भीतर भगवान्
वाराहकी क्रीड़ानामक दो सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२२ १/३ श्लोक हैं)


* इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—नादनेन सहितः सनादनः। दकारस्थाने तकारो छान्दसः। जो नादके साथ हो, वह ‘सनादन’ कहलाता है। सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे ‘सनातन’ बनता है।
१. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट्, ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्।

गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन

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दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

योगं मे परमं तात मोक्षस्य वद भारत ।
तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ तात भरतनन्दन! आप मुझे मोक्षके साधनभूत परम योगका उपदेश कीजिये। मैं उसे यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**राजन्! इस विषयमें एक शिष्यका गुरुके साथ जो मोक्षसम्बन्धी संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

कश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम् ।
तेजोराशिं महात्मानं सत्यसंधं जितेन्द्रियम् ॥ ३ ॥
शिष्यः परममेधावी श्रेयोऽर्थी सुसमाहितः ।
चरणावुपसंगृह्य स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥
किसी समयकी बात है, एक विद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान् तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला— ॥ ३-४ ॥

उपासनात् प्रसन्नोऽसि यदि वै भगवन् मम ।
संशयो मे महान् कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत् सम्यग्ब्रूहि यत्परम् ॥ ५ ॥
'भगवन्! यदि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं तो मेरे मनमें जो एक बड़ा भारी संदेह है, उसे दूर करनेकी कृपा करें—मेरे प्रश्नकी विशद व्याख्या करें। मैं इस संसारमें कहाँसे आया हूँ

और आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये। इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये ॥ ५ ॥

कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम ।
सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीताः क्षयोदयाः ॥ ६ ॥

'द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वी आदि सम्पूर्ण महाभूत सर्वत्र समान हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर उन्हींसे निर्मित हुए हैं तो भी उनमें क्षय और वृद्धि—ये दोनों विपरीतभाव क्यों होते हैं? ॥ ६ ॥

वेदेषु चापि यद् वाक्यं लौकिकं व्यापकं च यत् ।
एतद् विद्वन् यथातत्त्वं सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥

'वेदों और स्मृतियोंमें भी जो लौकिक और व्यापक धर्मोंका वर्णन है, उनमें भी विषमता है। अतः विद्वन्! इन सबकी आप यथार्थरूपसे व्याख्या करें' ॥ ७ ॥

गुरुरुवाच

शृणु शिष्य महाप्राज्ञ ब्रह्मगुह्यमिदं परम् ।
अध्यात्मं सर्वविद्यानामागमानां च यद्वसु ॥ ८ ॥

**गुरुने कहा—**वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो बात पूछी है, वह वेदोंका उत्तम एवं गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्मतत्त्व है तथा यही समस्त विद्याओं और शास्त्रोंका सर्वस्व है ॥ ८ ॥

वासुदेवः परमिदं विश्वस्य ब्रह्मणो मुखम् ।
सत्यं ज्ञानमथो यज्ञस्तितिक्षा दम आर्जवम् ॥ ९ ॥

सम्पूर्ण वेदका मुख जो प्रणव है वह तथा सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम, सरलता और परम तत्त्व—यह सब कुछ वासुदेव ही है ॥ ९ ॥

पुरुषं सनातनं विष्णुं यं तं वेदविदो विदुः ।
स्वर्गप्रलयकर्तारमव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १० ॥

वेदज्ञजन उसीको सनातन पुरुष और विष्णु भी मानते हैं। वही संसारकी सृष्टि और प्रलय करनेवाला अव्यक्त एवं सनातन ब्रह्म है ॥ १० ॥

तदिदं ब्रह्म वार्ष्णेयमितिहासं शृणुष्व मे ।
ब्राह्मणो ब्राह्मणैः श्राव्यो राजन्यः क्षत्रियैस्तथा ॥ ११ ॥
वैश्यो वैश्यैस्तथा श्राव्यः शूद्रः शूद्रैर्महामनाः ।
माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ १२ ॥

वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे ॥ ११-१२ ॥

अर्हस्त्वमसि कल्याणं वार्ष्णेयं शृणु यत्परम् ।

कालचक्रमनाद्यन्तं भावाभावस्वलक्षणम् ॥ १३ ॥
त्रैलोक्यं सर्वभूतेशे चक्रवत्परिवर्तते ।
तुम भी यह सब सुननेके योग्य अधिकारी हो; अतः भगवान् श्रीकृष्णका जो कल्याणमय उत्कृष्ट माहात्म्य है, उसे सुनो। यह जो सृष्टि-प्रलयरूप अनादि, अनन्त कालचक्र है, वह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। सर्वभूतेश्वर श्रीकृष्णमें ये तीनों लोक चक्रकी भाँति घूम रहे हैं ।। १३ ½ ।।
यत्तदक्षरमव्यक्तममृतं ब्रह्म शाश्वतम् ।
वदन्ति पुरुषव्याघ्र केशवं पुरुषर्षभम् ॥ १४ ॥
पुरुषसिंह! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको ही अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सनातन परब्रह्म कहते हैं ॥ १४ ॥
पितॄन् देवानृषींश्चैव तथा वै यक्षराक्षसान् ।
नागासुरमनुष्यांश्च सृजते परमोऽव्ययः ॥ १५ ॥
ये अविनाशी परमात्मा श्रीकृष्ण ही पितर, देवता, ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, असुर और मनुष्य आदिकी रचना करते हैं ॥ १५ ॥
तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्मांश्च शाश्वतान् ।
प्रलयं प्रकृतिं प्राप्य युगादौ सृजते पुनः ॥ १६ ॥
इसी प्रकार प्रलयकाल बीतनेपर कल्पके आरम्भमें प्रकृतिका आश्रय ले भगवान् श्रीकृष्ण ही ये वेद-शास्त्र और सनातन लोक-धर्मोंको पुनः प्रकट करते हैं ॥ १६ ॥
यथर्तौवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ १७ ॥
जैसे ऋतु-परिवर्तनके साथ ही भिन्न-भिन्न ऋतुओंके नाना प्रकारके वे-ही-वे लक्षण प्रकट होते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक कल्पके आरम्भमें पूर्व कल्पोंके अनुसार तदनुरूप भावोंकी अभिव्यक्ति होती रहती है ।।
अथ यद्यद् यदा भाति कालयोगाद् युगादिषु ।
तत् तदुत्पद्यते ज्ञानं लोकयात्राविधानजम् ॥ ८ ॥
काल-क्रमसे युगादिमें जब-जब जो-जो वस्तु भासित होती है, लोक-व्यवहारवश तब-तब उसी-उसी विषयका ज्ञान प्रकट होता रहता है ।। १८ ।।
युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥ १९ ॥
कल्पके अन्तमें लुप्त हुए वेदों और इतिहासोंको कल्पके आरम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माके आदेशसे महर्षियोंने तपस्याद्वारा सबसे पहले उपलब्ध किया था ।। १९ ।।
वेदविद् वेद भगवान् वेदाङ्गानि बृहस्पतिः ।
भार्गवो नीतिशास्त्रं तु जगाद जगतो हितम् ॥ २० ॥

उस समय स्वयं भगवान् ब्रह्माको वेदोंका, बृहस्पतिजीको वेदांगोंका और शुक्राचार्यको नीति-शास्त्रका ज्ञान हुआ तथा उन लोगोंने जगत्के हितके लिये उन सब विषयोंका उपदेश किया ॥ २० ॥ गान्धर्वं नारदो वेद भरद्वाजो धनुर्ग्रहम् । देवर्षिचरितं गार्ग्यः कृष्णात्रेयश्चिकित्सितम् ॥ २१ ॥ नारदजीको गान्धर्व वेदका, भरद्वाजको धनुर्वेदका, महर्षि गार्ग्यको देवर्षियोंके चरित्रका तथा कृष्णात्रेयको चिकित्साशास्त्रका ज्ञान हुआ ॥ २१ ॥ न्यायतन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभिः । हेत्वागमसदाचारैर्यद्युक्तं तदुपास्यताम् ॥ २२ ॥ तर्कशील विद्वानोंने तर्कशास्त्रके अनेक ग्रन्थोंका प्रणयन किया। उन महर्षियोंने युक्तियुक्त शास्त्र और सदाचारके द्वारा जिस ब्रह्मका उपदेश किया है, उसीकी तुम भी उपासना करो ॥ २२ ॥ अनाद्यं तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकस्तद् वेद भगवान् धाता नारायणः प्रभुः ॥ २३ ॥ वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है। उसे न देवता जानते हैं न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत्पालक नारायण ही जानते हैं ॥ २३ ॥ नारायणादृषिगणास्तथा मुख्याः सुरासुराः । राजर्षयः पुराणाश्च परमं दुःखभेषजम् ॥ २४ ॥ नारायणसे ही ऋषियों, मुख्य-मुख्य देवताओं, असुरों तथा प्राचीन राजर्षियोंने उस ब्रह्मको जाना है; वह ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखोंका परम औषध है ॥ २४ ॥ पुरुषाधिष्ठितान् भावान् प्रकृतिः सूयते यदा । हेतुयुक्तमतः पूर्वं जगत् सम्परिवर्तते ॥ २५ ॥ पुरुषद्वारा संकल्पमें लाये गये विविध पदार्थोंकी रचना प्रकृति ही करती है। इस प्रकृतिसे सर्वप्रथम कारणसहित जगत् उत्पन्न होता है ॥ २५ ॥ दीपादन्ये यथा दीपाः प्रवर्तन्ते सहस्रशः । प्रकृतिः सूयते तद्वदानन्त्यान् नापचीयते ॥ २६ ॥ जैसे एक दीपकसे दूसरे सहस्रों दीप जला लिये जाते हैं और पहले दीपकको कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक प्रकृति ही असंख्य पदार्थोंको उत्पन्न करती है और अनन्त होनेके कारण उसका क्षय नहीं होता ॥ अव्यक्तकर्मजा बुद्धिरहंकारं प्रसूयते । आकाशं चाप्यहंकाराद् वायुराकाशसम्भवः ॥ २७ ॥ अव्यक्त प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर जिस बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, वह बुद्धि अहंकारको जन्म देती है। अहंकारसे आकाश और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती

है ॥ २७ ॥ वायोस्तेजस्ततश्चाप अद्‍भ्योऽथ वसुधोद्गता । मूलप्रकृतयो ह्यष्टौ जगदेतास्ववस्थितम् ॥ २८ ॥ वायुसे अग्निकी, अग्निसे जलकी और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये आठ मूल-प्रकृतियाँ बतायी गयी हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २८ ॥ ज्ञानेन्द्रियाण्यतः पञ्च पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि । विषयाः पञ्च चैकं च विकारे षोडशं मनः ॥ २९ ॥ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और एक मन—ये सोलह विकार कहे गये हैं। (इनमें मन तो अहंकारका विकार है और अन्य पन्द्रह अपने-अपने कारणरूप सूक्ष्म महाभूतोंके विकार हैं) ॥ २९ ॥ श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं ज्ञानेन्द्रियाण्यथ । पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाक्कर्मणी अपि ॥ ३० ॥ श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ (लिंग) और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं ॥ ३० ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । विज्ञेयं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मनः ॥ ३१ ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं तथा इनमें व्यापक जो चित्त है, उसीको मन समझना चाहिये। मन सर्वगत कहा गया है ॥ ३१ ॥ रसज्ञाने तु जिह्वेयं व्याहृते वाक् तथोच्यते । इन्द्रियैर्विविधैर्युक्तं सर्वं व्यक्तं मनस्तथा ॥ ३२ ॥ रस-ज्ञानके समय मन ही यह रसना (जिह्वा)-रूप हो जाता है तथा बोलनेके समय वह मन ही वागिन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंके साथ मिलकर उन सबके रूपमें मन ही व्यक्त होता है ।। विद्यात् तु षोडशैतानि दैवतानि विभागशः । देहेषु ज्ञानकर्तारमुपासीनमुपासते ॥ ३३ ॥ दस इन्द्रिय, पञ्च महाभूत और एक मन—ये सोलह तत्त्व इस शरीरमें विभागपूर्वक रहते हैं। इनको देवतारूप जानना चाहिये। शरीरके भीतर जो ज्ञान प्रकट करनेवाला परमात्माके निकटस्थ जीवात्मा है, उसकी ये सोलहों देवता उपासना करते हैं ॥ ३३ ॥ तद्वत् सोमगुणा जिह्वा गन्धस्तु पृथिवीगुणः । श्रोत्रं नभोगुणं चैव चक्षुरग्नेर्गुणस्तथा । स्पर्शं वायुगुणं विद्यात् सर्वभूतेषु सर्वदा ॥ ३४ ॥ जिह्वा जलका कार्य है, घ्राणेन्द्रिय पृथिवीका कार्य है, श्रवणेन्द्रिय आकाशका और नेत्रेन्द्रिय अग्निका कार्य है तथा सम्पूर्ण भूतोंमें त्वचा नामकी इन्द्रियको सदा वायुका कार्य

समझना चाहिये ॥ ३४ ॥
मनः सत्त्वगुणं प्राहुः सत्त्वमव्यक्तजं तथा ।
सर्वभूतात्मभूतस्थं तस्माद् बुद्ध्येत बुद्धिमान् ॥ ३५ ॥
मनको महत्तत्त्वका कार्य कहा है और महत्तत्त्वको अव्यक्त प्रकृतिका कार्य कहा है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह समस्त भूतोंके आत्मारूप परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित जाने ॥ ३५ ॥
एते भावा जगत् सर्वं वहन्ति सचराचरम् ।
श्रिता विरजसं देवं यमाहुः प्रकृतेः परम् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार ये सम्पूर्ण पदार्थ समस्त चराचर जगत्का भार वहन करते हैं। ये सब जो प्रकृतिसे अतीत रजोगुणरहित हैं, उस परमदेव परमात्माके आश्रित हैं ॥
नवद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः समन्वितम् ।
व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात् पुरुष उच्यते ॥ ३७ ॥
इन्हीं चौबीस पदार्थोंसे सम्पन्न इस नौ द्वारोंवाले पवित्र पुर (शरीर)-को व्याप्त करके इसमें इन सबसे जो महान् है वह आत्मा शयन करता है; इसलिये उसे ‘पुरुष’ कहते हैं ॥ ३७ ॥
अजरः सोऽमरश्चैव व्यक्ताव्यक्तोपदेशवान् ।
व्यापकः सगुणः सूक्ष्मः सर्वभूतगुणाश्रयः ॥ ३८ ॥
वह पुरुष जरा-मरणसे रहित, व्यापक, समस्त स्थूल-सूक्ष्म तत्त्वोंका प्रेरक, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त, सूक्ष्म तथा सम्पूर्ण भूतों और उनके गुणोंका आश्रय है ॥ ३८ ॥
यथा दीपः प्रकाशात्मा ह्रस्वो वा यदि वा महान् ।
ज्ञानात्मानं तथा विद्यात् पुरुषं सर्वजन्तुषु ॥ ३९ ॥
जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा, प्रकाशस्वरूप ही है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें स्थित जीवात्मा ज्ञानस्वरूप है, ऐसा समझे ॥ ३९ ॥
श्रोत्रं वेदयते वेद्यं स शृणोति स पश्यति ।
कारणं तस्य देहोऽयं स कर्ता सर्वकर्मणाम् ॥ ४० ॥
वही श्रवणेन्द्रियको उसके ज्ञेयभूत शब्दका बोध कराता है। तात्पर्य यह कि श्रवण और नेत्रोंद्वारा वही सुनता और देखता है। यह शरीर उसके शब्द आदि विषयोंके अनुभवमें निमित्त है। वह जीवात्मा ही समस्त कर्मोंका कर्ता है ॥ ४० ॥
अग्निर्दारुगतो यद्वद् भिन्ने दारौ न दृश्यते ।
तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवानुदृश्यते ॥ ४१ ॥
अग्निर्यथा ह्युपायेन मथित्वा दारु दृश्यते ।
तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवात्र दृश्यते ॥ ४२ ॥

जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता—योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है॥ ४१-४२॥

नदीष्वापो यथा युक्ता यथा सूर्ये मरीचयः ।
संततत्वाद् यथा यान्ति तथा देहाः शरीरिणाम् ॥ ४३ ॥
जैसे नदियोंमें जल रहता ही है और सूर्यमें किरणें भी रहती ही हैं तथा वे जल और किरणें नदी और सूर्यसे नित्य सम्बद्ध होनेके कारण उनके साथ-साथ जाती हैं, उसी प्रकार देहधारियोंके सूक्ष्म शरीर भी जीवात्माके साथ ही रहते हैं और उसे साथ लेकर ही आते-जाते हैं॥ ४३॥

स्वप्नयोगे यथैवात्मा पञ्चेन्द्रियसमायुतः ।
देहमुत्सृज्य वै याति तथैवात्मोपलभ्यते ॥ ४४ ॥
जैसे स्वप्नमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित जीवात्मा इस शरीरको छोड़कर अन्यत्र चला जाता है, वैसे ही मृत्युके बाद भी वह इस शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण कर लेता है॥ ४४॥

कर्मणा बाध्यते रूपं कर्मणा चोपलभ्यते ।
कर्मणा नीयतेऽन्यत्र स्वकृतेन बलीयसा ॥ ४५ ॥
कर्मके द्वारा ही इस देहका बाध होता है; कर्मसे ही अन्य देहकी उपलब्धि होती है तथा अपने किये हुए प्रबल कर्मके द्वारा ही वह अन्य शरीरमें ले जाया जाता है॥ ४५॥

स तु देहाद् यथा देहं त्यक्त्वान्यं प्रतिपद्यते ।
तथान्यं सम्प्रवक्ष्यामि भूतग्रामं स्वकर्मजम् ॥ ४६ ॥
वह जीवात्मा जिस प्रकार एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करता है तथा अपने कर्मोंसे उत्पन्न हुआ प्राणिसमुदाय जिस प्रकार अन्य देह धारण करता है, वह सब मैं तुम्हें बतलाता हूँ॥ ४६॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका निरूपणविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१०॥