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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने सब अनर्थोंके आधारभूत लोभका वर्णन तो किया, अब अज्ञानका भी यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; मैं उसके परिणामको भी सुनना चाहता हूँ

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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना

युधिष्ठिर उवाच

अनर्थानामधिष्ठानमुक्तो लोभः पितामह ।
अज्ञानमपि वै तात श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने सब अनर्थोंके आधारभूत लोभका वर्णन तो किया, अब अज्ञानका भी यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; मैं उसके परिणामको भी सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

करोति पापं योऽज्ञानान्नात्मनो वेत्ति च क्षयम् ।
प्रद्वेष्टि साधुवृत्तांश्च स लोकस्यैति वाच्यताम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो मनुष्य अज्ञानवश पाप करता है और उससे होनेवाली अपनी ही हानिको नहीं समझता तथा श्रेष्ठ पुरुषोंसे द्वेष करता है, उसकी संसारमें बड़ी निन्दा होती है ॥ २ ॥
अज्ञानान्निरयं याति तथाज्ञानेन दुर्गतिम् ।
अज्ञानात् क्लेशमाप्नोति तथापत्सु निमज्जति ॥ ३ ॥
अज्ञानसे ही जीव नरकमें पड़ता है। अज्ञानसे ही उसकी दुर्गति होती है, अज्ञानसे वह कष्ट उठाता तथा विपत्तियोंके समुद्रमें डूब जाता है ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अज्ञानस्य प्रवृत्तिं च स्थानं वृद्धिक्षयोदयौ ।
मूलं योगं गतिं कालं कारणं हेतुमेव च ॥ ४ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भूपाल! अज्ञानकी उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, क्षय, उद्गम, मूल, योग, गति, काल, कारण और हेतु क्या हैं? ॥ ४ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यथावदिह पार्थिव ।
अज्ञानप्रसवं हीदं यद् दुःखमुपलभ्यते ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैं इस विषयको यथावत्रूपसे तत्त्वके विवेचनपूर्वक सुनना चाहता हूँ; क्योंकि यह जो दुःख उपलब्ध होता है, उसकी उत्पत्तिका कारण अज्ञान ही है ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

रागो द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता । कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्री चालस्यमेव च ॥ ६ ॥ इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता । अज्ञानमेतन्निर्दिष्टं पापानां चैव याः क्रियाः ॥ ७ ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! राग, द्वेष, मोह, हर्ष, शोक, अभिमान, काम, क्रोध, दर्प, तन्द्रा, आलस्य, इच्छा, वैर, ताप, दूसरोंकी उन्नति देखकर जलना और पापाचार करना— इन सबको (अज्ञानका कार्य होनेसे) अज्ञान बताया गया है ॥ ६-७ ॥

एतस्य वा प्रवृत्तेश्च वृद्ध्यादीन्यांश्च पृच्छसि । विस्तरेण महाराज शृणु तच्च विशेषतः ॥ ८ ॥ महाराज! इस अज्ञानकी उत्पत्ति और वृद्धि आदिके विषयमें जो प्रश्न कर रहे हो, उसके विषयमें विशेष विस्तारके साथ किया हुआ मेरा वर्णन सुनो ॥ ८ ॥

उभावेतौ समफलौ समदोषौ च भारत । अज्ञानं चातिलोभश्चाप्येकं जानीहि पार्थिव ॥ ९ ॥ भारत! पृथ्वीनाथ! अज्ञान और अत्यन्त लोभ—इन दोनोंको एक समझो, क्योंकि इनके परिणाम और दोष समान ही हैं ॥ ९ ॥

लोभप्रभवमज्ञानं वृद्धं भूयः प्रवर्धते । स्थाने स्थानं क्षये क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ॥ १० ॥ लोभसे ही अज्ञान प्रकट होता है और लोभके बढ़नेपर वह अज्ञान और भी बढ़ता है। जबतक लोभ रहता है, तबतक अज्ञान भी बना रहता है और जब लोभका क्षय होता है, तब अज्ञान भी क्षीण हो जाता है। अज्ञान और लोभके कारण ही जीव नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ॥ १० ॥

मूलं लोभस्य मोहो वै कालात्मगतिरेव च । छिन्ने भिन्ने तथा लोभे कारणं काल एव च ॥ ११ ॥ मोह ही निःसंदेह लोभका मूलकारण है। यह कालस्वरूप मोहात्मक अज्ञान ही मनुष्यकी बुरी गतिका कारण है। लोभके छिन्न-भिन्न होनेमें भी काल ही कारण है ॥ ११ ॥

तस्याज्ञानाद्धि लोभो हि लोभादज्ञानमेव च । सर्वदोषास्तथा लोभात् तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १२ ॥ मूढ़ मनुष्यको अज्ञानसे लोभ और लोभसे अज्ञान होता है। लोभसे ही सारे दोष पैदा होते हैं; इसलिये लोभको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥

जनको युवनाश्वश्च वृषादर्भिः प्रसेनजित् । लोभक्षयाद् दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये नराधिपाः ॥ १३ ॥

जनक, युवनाश्व, वृषादर्भि, प्रसेनजित् तथा अन्य नरेश लोभका नाश करके ही दिव्यलोकमें गये हैं ।। १३ ।।

प्रत्यक्षं तु कुरुश्रेष्ठ त्यज लोभमिहात्मना ।
त्यक्त्वा लोभं सुखं लोके प्रेत्य चानुचरिष्यसि ।। १४ ।।
कुरुश्रेष्ठ! तुम स्वयं प्रयत्न करके इस प्रत्यक्ष दीखने वाले लोभका परित्याग करो। लोभका त्याग कर इस लोकमें सुख तथा मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी आनन्द प्राप्त करके सुखपूर्वक विचरोगे ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि अज्ञानमाहात्म्ये
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें अज्ञानका माहात्म्यविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५९ ।।

मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य

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षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य

युधिष्ठिर उवाच

स्वाध्याये कृतयत्नस्य नरस्य च पितामह ।
धर्मकामस्य धर्मात्मन् किं नु श्रेय इहोच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— धर्मात्मा पितामह! जो स्वाध्यायके लिये यत्नशील है और धर्मपालनकी इच्छा रखता है, उस मनुष्यके लिये इस संसारमें श्रेय क्या बताया जाता है? ॥ १ ॥

बहुधा दर्शने लोके श्रेयो यदिह मन्यसे ।
अस्मिल्लोके परे चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! जगत्में श्रेयका प्रतिपादन करनेवाले अनेक प्रकारके दर्शन (मत) हैं; परंतु आप जिसे श्रेय मानते हों, जो इस लोक और परलोकमें भी कल्याण करनेवाला हो, उसे मुझे बताइये ॥ २ ॥

महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।
किंस्विदेवेह धर्मानामनुष्ठेयतमं मतम् ॥ ३ ॥
भारत! धर्मका यह मार्ग बहुत बड़ा है। इससे बहुत सी शाखाएँ निकली हुई हैं। इन धर्मोंमेंसे कौनसा धर्म सर्वोत्तम, अवश्य पालन करनेयोग्य माना गया है? ॥

धर्मस्य महतो राजन् बहुशाखस्य तत्त्वतः ।
यन्मूलं परमं तात तत् सर्वं ब्रूह्यशेषतः ॥ ४ ॥
राजन्! बहुत-सी शाखाओंसे युक्त इस महान् धर्मका वास्तवमें परम मूल क्या है? तात! ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे बताइये ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि येन श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ।
पीत्वामृतमिव प्राज्ञो ज्ञानतृप्तो भविष्यसि ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! मैं बड़े हर्षके साथ तुम्हें वह उपाय बताता हूँ, जिससे तुम कल्याण प्राप्त कर लोगे। जैसे अमृतको पीकर पूर्ण तृप्ति हो जाती है, उसी प्रकार तुम ज्ञानी होकर इस ज्ञान-सुधासे पूर्णतः तृप्त हो जाओगे ॥ ५ ॥

धर्मस्य विधयो नैके ये वै प्रोक्ता महर्षिभिः ।
स्वं स्वं विज्ञानमाश्रित्य दमस्तेषां परायणम् ॥ ६ ॥

महर्षियोंने अपने-अपने ज्ञानके अनुसार धर्मकी एक नहीं, अनेक विधियाँ बतायी हैं, परंतु उन सबका आधार दम (मन और इन्द्रियोंका संयम) ही है ॥ ६ ॥ दमं निःश्रेयसं प्राहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ॥ ७ ॥ धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाले वृद्ध पुरुष दमको निःश्रेयस (परम कल्याण) का साधन बताते हैं। विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो दम ही सनातन धर्म है ॥ ७ ॥ दमात् तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते । दमो दानं तथा यज्ञानधीतं चातिवर्तते ॥ ८ ॥ दमसे ही उसे अपने शुभ कर्मोंकी यथावत् सिद्धि प्राप्त होती है। दम उसके लिये दान, यज्ञ और स्वाध्यायसे भी बढ़कर है ॥ ८ ॥ दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं च दमः परम् । विपाप्मा तेजसा युक्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ९ ॥ दम तेजकी वृद्धि करता है, दम परम पवित्र साधन है, दमसे पापरहित हुआ तेजस्वी पुरुष परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम ॥ दमो हि परमो लोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम् ॥ १० ॥ हमने संसारमें दमके समान दूसरा कोई धर्म नहीं सुना। जगत्में सभी धर्मवालोंके यहाँ दमको उत्कृष्ट बताया गया है। सबने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है ॥ १० ॥ प्रेत्य चात्र मनुष्येन्द्र परमं विन्दते सुखम् । दमेन हि समायुक्तो महान्तं धर्ममश्नुते ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! दमसे अर्थात् इन्द्रिय और मनके संयमसे युक्त पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति होती है। वह इहलोक और परलोकमें भी परम सुख पाता है ॥ ११ ॥ सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुध्यते । सुखं पर्येति लोकांश्च मनश्चास्य प्रसीदति ॥ १२ ॥ जिसने अपने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, वह सुखसे सोता, सुखसे ही जागता और सुखपूर्वक ही लोकोंमें विचरता है। उसका मन सदा प्रसन्न रहता है ॥ १२ ॥ अदान्तः पुरुषः क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते । अनर्थांश्च बहूनन्यान् प्रसृजत्यात्मदोषजान् ॥ १३ ॥ जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं है, वह पुरुष निरन्तर क्लेश उठाता है। साथ ही वह अपने ही दोषोंसे बहुत-से दूसरे-दूसरे अनर्थोंकी भी सृष्टि कर लेता है ॥ १३ ॥ आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम् । तस्य लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदायो दमः ॥ १४ ॥

चारों आश्रमोंमें दमको ही उत्तम व्रत बताया गया है। अब मैं इन्द्रिय-दमन एवं मनोनिरग्रहके उन लक्षणोंको बताऊँगा, जिनका उदय होना ही दम कहा गया है ।। १४ ।। क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । इन्द्रियाभिजयो दाक्ष्यं मार्दवं हीरचापलम् ।। १५ ।। अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः प्रियवादिता । अविहिंसानसूया चाप्येषां समुदयो दमः ।। १६ ।। क्षमा, धीरता, अहिंसा, समता, सत्यवादिता, सरलता, इन्द्रिय-विजय, दक्षता, कोमलता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, क्रोधहीनता, संतोष, प्रिय वचन बोलनेका स्वभाव, किसी भी प्राणीको कष्ट न देना और दूसरोंके दोष न देखना—इन सद्गुणोंका उदय होना ही दम कहलाता है ।। १५-१६ ।। गुरुपूजा च कौरव्य दया भूतेष्वपैशुनम् । जनवादं मृषावादं स्तुतिनिन्दाविसर्जनम् ।। १७ ।। कामं क्रोधं च लोभं च दर्पं स्तम्भं विकत्थनम् । रोषमीर्ष्यामवमानं च नैव दान्तो निषेवते ।। १८ ।। कुरुनन्दन! जिसने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, उसमें गुरुजनोंके प्रति आदरका भाव, समस्त प्राणियोंके प्रति दया और किसीकी भी चुगली न करनेकी प्रवृत्ति होती है। वह जनापवाद, असत्य भाषण, निन्दा-स्तुतिकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध, लोभ, दर्प, जड़ता, डींग हाँकना, रोष, ईर्ष्या और दूसरोंका अपमान—इन दुर्गुणोंका कभी सेवन नहीं करता ।। १७-१८ ।। अनिन्दितो ह्यकामात्मा नाल्पेष्वर्थ्यनसूयकः । समुद्रकल्पः स नरो न कथंचन पूर्यते ।। १९ ।। इन्द्रिय और मनको वशमें रखनेवाले पुरुषकी कभी निन्दा नहीं होती। उसके मनमें कोई कामना नहीं होती। वह छोटी-छोटी वस्तुओंके लिये किसीके सामने हाथ नहीं फैलाता अथवा तुच्छ विषय-सुखोंकी अभिलाषा नहीं रखता, दूसरोंके दोष नहीं देखता। वह मनुष्य समुद्रके समान अगाध गाम्भीर्य धारण करता है। जैसे समुद्र अनन्त जलराशि पाकर भी भरता नहीं है, उसी प्रकार वह भी निरन्तर धर्मसंचयसे कभी तृप्त नहीं होता ।। १९ ।। अहं त्वयि मयि त्वं च मयि ते तेषु चाप्यहम् । पूर्वसम्बन्धिसंयोगं नैतद् दान्तो निषेवते ।। २० ।। ‘मैं तुमपर स्नेह रखता हूँ और तुम मुझपर। वे मुझमें अनुराग रखते हैं और मैं उनमें’ इस प्रकार पहलेके सम्बन्धियोंके सम्बन्धका जितेन्द्रिय पुरुष चिन्तन नहीं करता ।। २० ।। सर्वाग्राम्यास्तथाऽऽरण्या याश्च लोके प्रवृत्तयः । निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रयति मुच्यते ।। २१ ।।

जगत्में ग्रामीणों और वनवासियोंकी जो-जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, उन सबका जो सेवन नहीं करता तथा दूसरोंकी निन्दा और प्रशंसासे भी दूर रहता है, उसकी मुक्ति हो जाती है ॥ २१ ॥

मैत्रोऽथ शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्च यः ।
मुक्तस्य विविधैः सङ्गैस्तस्य प्रेत्य फलं महत् ॥ २२ ॥
जो सबके प्रति मित्रताका भाव रखनेवाला और सुशील है, जिसका मन प्रसन्न है, जो नाना प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त तथा आत्मज्ञानी है, उसे मृत्युके पश्चात् मोक्षरूप महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥

सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मविद् बुधः ।
प्राप्येह लोके सत्कारं सुगतिं प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
जो सदाचारी, शीलसम्पन्न, प्रसन्नचित्त और आत्मतत्त्वको जाननेवाला है, वह विद्वान् पुरुष इस लोकमें सत्कार पाकर परलोकमें परम गति पाता है ॥ २३ ॥

कर्म यच्छुभमेवेह सद्भिborder... सद्गिराचरितं च यत् ।
तदेव ज्ञानयुक्तस्य मुनेर्वर्त्म न हीयते ॥ २४ ॥
इस जगत्में जो केवल शुभ (कल्याणकारी) कर्म है तथा सत्पुरुषोंने जिसका आचरण किया है, वही ज्ञानवान् मुनिका मार्ग है। वह स्वभावतः उसका आचरण करता है। उससे कभी च्युत नहीं होता ॥ २४ ॥

निष्क्रम्य वनमास्थाय ज्ञानयुक्तो जितेन्द्रियः ।
कालाकांक्षी चरत्येवं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २५ ॥
ज्ञानसम्पन्न जितेन्द्रिय पुरुष घरसे निकलकर वनका आश्रय ले वहाँ मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ निर्द्वन्द्व विचरता रहता है। इस प्रकार वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ हो जाता है ॥ २५ ॥

अभयं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभयं यतः ।
तस्य देहाद् विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ २६ ॥
जिसको दूसरे प्राणियोंसे भय नहीं है तथा जिससे दूसरे प्राणी भी भय नहीं मानते, उस देहाभिमानसे रहित महात्मा पुरुषको कहींसे भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २६ ॥

अवाचिनोति कर्माणि न च सम्प्रचिनोति ह ।
समः सर्वेषु भूतेषु मैत्रायणगतिश्चरेत् ॥ २७ ॥
वह उपभोगद्वारा प्रारब्ध-कर्मोंको क्षीण करता है और कर्तृत्वाभिमान तथा फलासक्तिसे शून्य होनेके कारण नूतन कर्मोंका संचय नहीं करता है। सभी प्राणियोंमें समानभाव रखकर सबको मित्रकी भाँति अभयदान देता हुआ विचरता है ॥ २७ ॥

शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च ।
यथा गतिर्न दृश्येत तथा तस्य न संशयः ॥ २८ ॥

जैसे आकाशमें पक्षियोंका और जलमें जलचर जन्तुओंका पदचिह्न नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार ज्ञानीकी गति भी जाननेमें नहीं आती है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ २८॥ गृहानुत्सृज्य यो राजन् मोक्षमेवाभिपद्यते । लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वतीः समाः ॥ २९ ॥ राजन्! जो घर-बार को छोड़कर मोक्षमार्गका ही आश्रय लेता है, उसे अनन्त वर्षोंके लिये दिव्य तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत् तपः । संन्यस्य विविधा विद्याः सर्वं संन्यस्य चैव ह ॥ ३० ॥ कामे शुचिरनावृत्तः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्छुचिः । प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ॥ ३१ ॥ जिसका आचार-विचार शुद्ध और अन्तःकरण निर्मल है, जिसकी कामनाएँ शुद्ध हैं तथा जो भोगोंसे पराङ्मुख हो चुका है, वह आत्मज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका, तपस्याका तथा नाना प्रकारकी विद्याओंका विधिवत् संन्यास (त्याग) करके सर्वत्यागी संन्यासी होकर इहलोकमें सम्मानित हो परलोकमें अक्षय स्वर्ग (ब्रह्मधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥ यच्च पैतामहं स्थानं ब्रह्मराशिसमुद्भवम् । गुहायां निहितं नित्यं तद् दमेनाभिगम्यते ॥ ३२ ॥ ब्रह्मराशिसे उत्पन्न हुआ जो पितामह ब्रह्माजीका उत्तम धाम है, वह हृदयगुहामें छिपा हुआ है। उसकी प्राप्ति सदा दम (इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह) से ही होती है ॥ ३२ ॥ ज्ञानारामस्य बुद्धस्य सर्वभूताविरोधिनः । नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥ ३३ ॥ जिसका किसी भी प्राणीके साथ विरोध नहीं है, जो ज्ञानस्वरूप आत्मामें रमता रहता है, ऐसे ज्ञानीको इस लोकमें पुनः जन्म लेनेका भय ही नहीं रहता, फिर उसे परलोकका भय कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥ एक एव दमे दोषो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ ३४ ॥ दम अर्थात् संयममें एक ही दोष है, दूसरा नहीं। वह यह कि क्षमाशील होनेके कारण उसे लोग असमर्थ समझने लगते हैं ॥ ३४ ॥ एकोऽस्य सुमहाप्राज्ञ दोषः स्यात् सुमहान् गुणः । क्षमया विपुला लोकाः सुलभा हि सहिष्णुता ॥ ३५ ॥ महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! उसका यह एक दोष ही महान् गुण हो सकता है। क्षमा धारण करनेसे उसको बहुत से पुण्यलोक सुलभ होते हैं। साथ ही क्षमासे सहिष्णुता भी आ जाती है ॥ ३५ ॥

दान्तस्य किमरण्येन तथाऽदान्तस्य भारत ।
यत्रैव निवसेद् दान्तस्तदरण्यं स चाश्रमः ॥ ३६ ॥
भारत! संयमी पुरुषको वनमें जानेकी क्या आवश्यकता है? और जो असंयमी है, उसको वनमें रहनेसे भी क्या लाभ है? संयमी पुरुष जहाँ रहे, वहीं उसके लिये वन और आश्रम है ॥ ३६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतद् भीष्मस्य वचनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।
अमृतेनेव संतृप्तः प्रहृष्टः समपद्यत ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए, मानो अमृत पीकर तृप्त हो गये हों ॥ ३७ ॥
पुनश्च परिपप्रच्छ भीष्मं धर्मभृतां वरम् ।
तपः प्रति स चोवाच तस्मै सर्वं कुरूद्वह ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उन्होंने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्मजी से पुनः तपस्याके विषयमें प्रश्न किया। तब भीष्मजीने उन्हें उसके विषयमें सब कुछ बताना आरम्भ किया ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि दमकथने
षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें दमका वर्णनविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥

१६१-

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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

तपकी महिमा

भीष्म उवाच

सर्वमेतत् तपोमूलं कवयः परिचक्षते ।
न ह्यतप्ततपा मूढः क्रियाफलमवाप्नुते ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा—राजन्! इस सर्व्य जगत्‌का मूल कारण तप ही है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। जिस मूढ़ने तपस्या नहीं की है, उसे अपने शुभ कर्मोंका फल नहीं मिलता है ॥ १ ॥

प्रजापतिरिदं सर्वं तपसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २ ॥
भगवान् प्रजापतिने तपसे ही इस समस्त संसारकी सृष्टि की है तथा ऋषियोंने तपसे ही वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ २ ॥

तपसैव ससर्जान्नं फलमूलानि यानि च ।
त्रीँल्लोकांस्तपसा सिद्धाः पश्यन्ति सुसमाहिताः ॥ ३ ॥
जो-जो फल, मूल और अन्न हैं, उनको विधाताने तपसे ही उत्पन्न किया है। तपस्यासे सिद्ध हुए एकाग्रचित्त महात्मा पुरुष तीनों लोकोंको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ ३ ॥

औषधान्यगदादीनि क्रियाश्च विविधास्तथा ।
तपसैव हि सिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥ ४ ॥
औषध, आरोग्य आदिकी प्राप्ति तथा नाना प्रकारकी क्रियाएँ तपस्यासे ही सिद्ध होती हैं; क्योंकि प्रत्येक साधनकी जड़ तपस्या ही है ॥ ४ ॥

यद् दुरापं भवेत् किंचित् तत् सर्वं तपसो भवेत् ।
ऐश्वर्यमृषयः प्राप्तास्तपसैव न संशयः ॥ ५ ॥
संसारमें जो कुछ भी दुर्लभ वस्तु हो, वह सब तपस्यासे सुलभ हो सकती है। ऋषियोंने तपस्यासे ही अणिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यको प्राप्त किया है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥

सुरापोऽसम्मतादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।
तपसैव सुतप्तेन नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ ६ ॥
शराबी, किसीकी सम्मतिके बिना ही उसकी वस्तु उठा लेनेवाला (चोर), गर्भहत्यारा और गुरुपत्नीगामी मनुष्य भी अच्छी तरह की हुई तपस्याद्वारा ही पापसे छुटकारा पाता है ॥ ६ ॥

तपसो बहुरूपस्य तैस्तैर्द्वारैः प्रवर्ततः ।
निवृत्त्या वर्तमानस्य तपो नानशनात् परम् ॥ ७ ॥

तपस्याके अनेक रूप हैं और भिन्न-भिन्न साधनों एवं उपायोंद्वारा मनुष्य उसमें प्रवृत्त होता है; परंतु जो निवृत्तिमार्गसे चल रहा है, उसके लिये उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ७ ॥

अहिंसा सत्यवचनं दानमिन्द्रियनिग्रहः । एतेभ्यो हि महाराज तपो नानशनात् परम् ॥ ८ ॥ महाराज! अहिंसा, सत्यभाषण, दान और इन्द्रिय-संयम—इन सबसे बढ़कर तप है और उपवाससे बड़ी कोई तपस्या नहीं है ॥ ८ ॥

न दुष्करतं दानान्नातिमातरमाश्रयः । त्रैविद्येभ्यः परं नास्ति संन्यासः परमं तपः ॥ ९ ॥ दानसे बढ़कर कोई दुष्कर धर्म नहीं है, माताकी सेवासे बड़ा कोई दूसरा आश्रय नहीं है, तीनों वेदोंके विद्वानोंसे श्रेष्ठ कोई विद्वान् नहीं है और संन्यास सबसे बड़ा तप है ॥ ९ ॥

इन्द्रियाणीह रक्षन्ति स्वर्गधर्माभिगुप्तये । तस्मादर्थे च धर्मे च तपो नानशनात् परम् ॥ १० ॥ इस संसारमें धार्मिक पुरुष स्वर्गके साधनभूत धर्मकी रक्षाके लिये इन्द्रियोंको सुरक्षित (संयमशील बनाये) रखते हैं। परंतु धर्म और अर्थ दोनोंकी सिद्धिके लिये तप ही श्रेष्ठ साधन है और उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ॥ १० ॥

ऋषयः पितरो देवा मनुष्या मृगपक्षिणः । यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ११ ॥ तपः परायणाः सर्वे सिध्यन्ति तपसा च ते । इत्येवं तपसा देवा महत्त्वं प्रतिपेदिरे ॥ १२ ॥ ऋषि, पितर, देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी तथा दूसरे जो चराचर प्राणी हैं, वे सब तपस्यामें ही तत्पर रहते हैं। तपस्यासे ही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है। इसी प्रकार देवताओंने भी तपस्यासे ही महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त किया है ॥ ११-१२ ॥

इमानीष्टविभागानि फलानि तपसः सदा । तपसा शक्यते प्राप्तुं देवत्वमपि निश्चयात् ॥ १३ ॥ ये जो भिन्न-भिन्न अभीष्ट फल कहे गये हैं, वे सब सदा तपस्यासे ही सुलभ होते हैं। तपस्यासे निश्चय ही देवत्व भी प्राप्त किया जा सकता है ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि तपःप्रशंसायामेकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें तपस्याकी प्रशंसाविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥

सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन

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द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

सत्यं धर्मं प्रशंसन्ति विप्रर्षिपितृदेवताः ।
सत्यमिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! ब्राह्मण, ऋषि, पितर और देवता—ये सब सत्यभाषणरूप धर्मकी प्रशंसा करते हैं; अतः अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि सत्य क्या है? उसे मुझे बताइये ॥ १ ॥

सत्यं किं लक्षणं राजन् कथं वा तदवाप्यते ।
सत्यं प्राप्य भवेत् किं च कथं चैव तदुच्यताम् ॥ २ ॥
राजन्! सत्यका लक्षण क्या है? उसकी प्राप्ति कैसे होती है? सत्यका पालन करनेसे क्या लाभ होता है? और कैसे होता है? यह बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य धर्माणां संकरो न प्रशस्यते ।
अविकारितमं सत्यं सर्ववर्णेषु भारत ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके जो धर्म हैं, उनका परस्पर सम्मिश्रण अच्छा नहीं माना जाता है। निर्विकार सत्य सभी वर्णोंमें प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥

सत्यं सत्सु सदा धर्मः सत्यं धर्मः सनातनः ।
सत्यमेव नमस्येत सत्यं हि परमा गतिः ॥ ४ ॥
सत्पुरुषोंमें सदा सत्यरूप धर्मका ही पालन हुआ है। सत्य ही सनातन धर्म है। सत्यको ही सदा सिर झुकाना चाहिये; क्योंकि सत्य ही जीवकी परम गति है ॥ ४ ॥

सत्यं धर्मस्तपो योगः सत्यं ब्रह्म सनातनम् ।
सत्यं यज्ञः परः प्रोक्तः सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
सत्य ही धर्म, तप और योग है, सत्य ही सनातन ब्रह्म है, सत्यको ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ॥ ५ ॥

आचारानिह सत्यस्य यथावदनुपूर्वशः ।
लक्षणं च प्रवक्ष्यामि सत्यस्येह यथाक्रमम् ॥ ६ ॥
अब मैं तुम्हें क्रमशः सत्यके आचार और लक्षण ठीक-ठीक बताऊँगा ॥ ६ ॥

प्राप्यते च यथा सत्यं तच्च श्रोतुमिहार्हसि ।
सत्यं त्रयोदशविधं सर्वलोकेषु भारत ॥ ७ ॥

साथ ही यह भी बता देना चाहता हूँ कि उस सत्यकी प्राप्ति कैसे होती है? तुम ध्यान देकर सुनो। भारत! सम्पूर्ण लोकोंमें सत्यके तेरह भेद माने गये हैं ।। ७ ।। सत्यं च समता चैव दमश्चैव न संशयः । अमात्सर्यं क्षमा चैव ह्रीस्तितिक्षानसूयता ।। ८ ।। त्यागो ध्यानमथार्यत्वं धृतिश्च सततं स्थिरा । अहिंसा चैव राजेन्द्र सत्याकारास्त्रयोदश ।। ९ ।। राजेन्द्र! सत्य, समता, दम, मत्सरताका अभाव, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा (सहनशीलता), अनसूया, त्याग, परमात्माका ध्यान, आर्यता (श्रेष्ठ आचरण), निरन्तर स्थिर रहनेवाली धृति (धैर्य) तथा अहिंसा—ये तेरह सत्यके ही स्वरूप हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ८-९ ।। सत्यं नामाव्ययं नित्यमविकारि तथैव च । सर्वधर्माविरुद्धेन योगेनैतदवाप्यते ।। १० ।। नित्य एकरस, अविनाशी और अविकारी होना ही सत्यका लक्षण है। समस्त धर्मोंके अनुकूल कर्तव्य-पालनस्वरूप योगके द्वारा इस सत्यकी प्राप्ति होती है ।। १० ।। आत्मनीष्टे तथानिष्टे रिपौ च समता तथा । इच्छाद्वेषक्षयं प्राप्य कामक्रोधक्षयं तथा ।। ११ ।। अपने प्रिय मित्रमें तथा अप्रिय शत्रुमें भी समानभाव रखना 'समता' है। इच्छा (राग), द्वेष, काम और क्रोधको मिटा देना ही समताकी प्राप्तिका उपाय है ।। ११ ।। दमो नान्यस्पृहा नित्यं गाम्भीर्यं धैर्यमेव च । अभयं रोगशमनं ज्ञानेनैतदवाप्यते ।। १२ ।। किसी दूसरेकी वस्तुको लेनेकी इच्छा न करना, सदा गम्भीरता और धीरता रखना, भयको त्याग देना तथा मनके रोगोंको शान्त कर देना-यह 'दम' (मन और इन्द्रियोंके संयम) का लक्षण है। इसकी प्राप्ति ज्ञानसे होती है ।। १२ ।। अमात्सर्यं बुधाः प्राहुर्दाने धर्मे च संयमः । अवस्थितेन नित्यं च सत्येनामत्सरी भवेत् ।। १३ ।। दान और धर्म करते समय मनपर संयम रखना अर्थात् इस विषयमें दूसरोंसे ईर्ष्या न करना इसे विद्वान् लोग 'मत्सरताका अभाव' कहते हैं। सदा सत्यका पालन करनेसे ही मनुष्य मत्सरतासे रहित हो सकता है ।। १३ ।। अक्षमायाः क्षमायाश्च प्रियाणीहाप्रियाणि च । क्षमते सम्मतः साधुः साध्वाप्नोति च सत्यवाक् ।। १४ ।। जो सहने और न सहनेयोग्य व्यवहारों तथा प्रिय एवं अप्रिय वचनोंको भी समानरूपसे सहन कर लेता है, वही सर्वसम्मत क्षमाशील श्रेष्ठ पुरुष है। सत्यवादी पुरुषको ही उत्तम रीतिसे क्षमाभावकी प्राप्ति होती है ।। १४ ।।

कल्याणं कुरुते बाढं धीमान् न ग्लायते क्वचित् । प्रशान्तवाङ्‌मना नित्यं ह्रीस्तु धर्मादवाप्यते ॥ १५ ॥ जो बुद्धिमान् पुरुष भलीभाँति दूसरोंका कल्याण करता है और मनमें कभी खेद नहीं मानता, जिसकी मन-वाणी सदा शान्त रहती है, वह लज्जाशील माना जाता है। यह लज्जा नामक गुण धर्मके आचरणसे प्राप्त होता है॥ १५॥

धर्मार्थहेतोः क्षमते तितिक्षा क्षान्तिरुच्यते । लोकसंग्रहणार्थं वै सा तु धैर्येण लभ्यते ॥ १६ ॥ धर्म और अर्थके लिये मनुष्य जो कष्ट सहन करता है, उसकी वह सहनशीलता 'तितिक्षा' कहलाती है। लोगोंके सामने आदर्श उपस्थित करनेके लिये उसका अवश्य पालन करना चाहिये। तितिक्षाकी प्राप्ति धैर्यसे होती है। (दूसरोंके दोष न देखना 'अनसूया' है)॥ १६॥

त्यागः स्नेहस्य यत् त्यागो विषयाणां तथैव च । रागद्वेषप्रहीणस्य त्यागो भवति नान्यथा ॥ १७ ॥ विषयोंकी आसक्तिका जो त्याग है, वही वास्तविक त्याग है। राग-द्वेषसे रहित होनेपर ही त्यागकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं (परमात्मचिन्तनका नाम ही 'ध्यान' है)॥ १७॥

आर्यता नाम भूतानां यः करोति प्रयत्नतः । शुभं कर्म निराकारो वीतरागस्तथैव च ॥ १८ ॥ जो मनुष्य अपनेको प्रकट न करके प्रयत्नपूर्वक प्राणियोंकी भलाईका काम करता रहता है, उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरणका नाम ही 'आर्यता' है। यह आसक्तिके त्यागसे प्राप्त होता है॥ १८॥

धृतिर्नाम सुखे दुःखे यथा नाप्नोति विक्रियाम् । ता भजेत सदा प्राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १९ ॥ सुख या दुःख प्राप्त होनेपर मनमें विकार न होना 'धृति' है। जो अपनी उन्नति चाहता हो, उस बुद्धिमान् पुरुषको सदा ही 'धृति' का सेवन करना चाहिये॥ १९॥

सर्वथा क्षमिणा भाव्यं तथा सत्यपरेण च । वीतहर्षभयक्रोधो धृतिमाप्नोति पण्डितः ॥ २० ॥ मनुष्यको सदा क्षमाशील होना तथा सत्यमें तत्पर रहना चाहिये। जिसने हर्ष, भय और क्रोध तीनोंको त्याग दिया है, उस विद्वान् पुरुषको ही 'धैर्य' की प्राप्ति होती है॥ २०॥

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥ २१ ॥ मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी प्राणियोंके साथ कभी द्रोह न करना तथा दया और दान—यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है॥ २१॥

एते त्रयोदशाकाराः पृथक् सत्यैकलक्षणाः ।

भजन्ते सत्यमेवेह बृंहयन्ते च भारत ।। २२ ।।
ये पृथक्-पृथक् तेरह रूपोंमें बताये हुए धर्म एकमात्र सत्यको ही लक्षित करानेवाले हैं। ये सत्यका ही आश्रय लेते और उसीकी वृद्धि एवं पुष्टि करते हैं ।। २२ ।।
नान्तः शक्यो गुणानां च वक्तुं सत्यस्य पार्थिव ।
अतः सत्यं प्रशंसन्ति विप्राः सपितृदेवताः ।। २३ ।।
पृथ्वीनाथ! सत्यके गुणोंकी सीमा नहीं बतायी जा सकती। इसीलिये पितर और देवताओंके सहित ब्राह्मण सत्यकी प्रशंसा करते हैं ।। २३ ।।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।
स्थितिर्हि सत्यं धर्मस्य तस्मात् सत्यं न लोपयेत् ।। २४ ।।
सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और झूठसे बढ़कर कोई पातक नहीं है। सत्य ही धर्मकी आधारशिला है; अतः सत्यका लोप न करे ।। २४ ।।
उपैति सत्याद् दानं हि तथा यज्ञाः सदक्षिणाः ।
त्रेताग्निहोत्रं वेदाश्च ये चान्ये धर्मनिश्चयाः ।। २५ ।।
दानका, दक्षिणाओंसहित यज्ञका, त्रिविध अग्नियोंमें हवनका, वेदोंके स्वाध्यायका तथा अन्य जो धर्मका निर्णय करनेवाले शास्त्र हैं, उनके भी अध्ययनका फल मनुष्य सत्यसे प्राप्त कर लेता है ।। २५ ।।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ।। २६ ।।
यदि एक ओर एक हजार अश्वमेध यज्ञोंको और दूसरी ओर एकमात्र सत्यको तराजूपर रखा जाय तो एक हजार अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि सत्यप्रशंसायां
द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें सत्यकी प्रशंसाविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६२ ।।

१६३-

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त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय

युधिष्ठिर उवाच

यतः प्रभवति क्रोधः कामो वा भरतर्षभ ।
शोकमोहौ विधित्सा च परासुत्वं तथा मदः ॥ १ ॥
लोभो मात्सर्यमीर्ष्या च कुत्सासूया कृपा तथा ।
एतत् सर्वं महाप्राज्ञ याथातथ्येन मे वद ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! परम बुद्धिमान् पितामह! क्रोध, काम, शोक, मोह, विधित्सा (शास्त्र-विरुद्ध काम करनेकी इच्छा), परासुता (दूसरोंके मारनेकी इच्छा), मद, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, निन्दा, दोषदृष्टि और कंजूसी (दैन्यभाव)—ये सब दोष किससे उत्पन्न होते हैं?, यह ठीक-ठीक बताइये ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

त्रयोदशैतेऽतिबलाः शत्रवः प्राणिनां स्मृताः ।
उपासन्ते महाराज समन्तात् पुरुषानिह ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! तुम्हारे कहे हुए ये तेरह दोष प्राणियोंके अत्यन्त प्रबल शत्रु माने गये हैं, जो यहाँ मनुष्योंको सब ओरसे घेरे रहते हैं ॥ ३ ॥
एते प्रमत्तं पुरुषमप्रमत्तास्तुदन्ति च ।
वृका इव विलुम्पन्ति दृष्ट्वैव पुरुषं बलात् ॥ ४ ॥
ये सदा सावधान रहकर प्रमादमें पड़े हुए पुरुषको अत्यन्त पीड़ा देते हैं। मनुष्यको देखते ही भेड़ियोंकी तरह बलपूर्वक उसपर टूट पड़ते हैं ॥ ४ ॥
एभ्यः प्रवर्तते दुःखमेभ्यः पापं प्रवर्तते ।
इति मर्त्यो विजानीयात् सततं पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥
नरश्रेष्ठ! इन्हींसे सबको दुःख प्राप्त होता है, इन्हींकी प्रेरणासे मनुष्यकी पापकर्मोंमें प्रवृत्ति होती है। प्रत्येक पुरुषको सदा इस बातकी जानकारी रखनी चाहिये ॥ ५ ॥
एतेषामुदयं स्थानं क्षयं च पृथिवीपते ।
हन्त ते कथयिष्यामि क्रोधस्योत्पत्तिमादितः ॥ ६ ॥
यथातत्त्वं क्षितिपते तदिहैकमनाः शृणु ।

पृथ्वीनाथ! अब मैं यह बता रहा हूँ कि इनकी उत्पत्ति किससे होती है? ये किस तरह स्थिर रहते हैं? और कैसे इनका विनाश होता है? राजन्! सबसे पहले क्रोधकी उत्पत्तिका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर इस विषयको सुनो ॥ ६½ ॥

लोभात् क्रोधः प्रभवति परदोषैरुदीर्यते ॥ ७ ॥
क्षमया तिष्ठते राजन् क्षमया विनिवर्तते ।
राजन्! क्रोध लोभसे उत्पन्न होता है, दूसरोंके दोष देखनेसे बढ़ता, क्षमा करनेसे थम जाता और क्षमासे ही निवृत्त हो जाता है ॥ ७½ ॥

संकल्पाज्जायते कामः सेव्यमानो विवर्धते ॥ ८ ॥
यदा प्राज्ञो विरमते तदा सद्यः प्रणश्यति ।
काम संकल्पसे उत्पन्न होता है। उसका सेवन किया जाय तो बढ़ता है और जब बुद्धिमान् पुरुष उससे विरक्त हो जाता है, तब वह (काम) तत्काल नष्ट हो जाता है ॥ ८½ ॥

परासुता क्रोधलोभादभ्यासाच्च प्रवर्तते ॥ ९ ॥
दयया सर्वभूतानां निर्वेदात् सा निवर्तते ।
अवद्यदर्शनादेति तत्त्वज्ञानाच्च धीमताम् ॥ १० ॥
क्रोध और लोभसे तथा अभ्याससे परासुता प्रकट होती है। संपूर्ण प्राणियोंके प्रति दयासे और वैराग्यसे वह निवृत्त होती है। परदोष-दर्शनसे इसकी उत्पत्ति होती और बुद्धिमानोंके तत्त्वज्ञानसे वह नष्ट हो जाती है ॥ ९-१० ॥

अज्ञानप्रभवो मोहः पापाभ्यासात् प्रवर्तते ।
यदा प्राज्ञेषु रमते तदा सद्यः प्रणश्यति ॥ ११ ॥
मोह अज्ञानसे उत्पन्न होता है और पापकी आवृत्ति करनेसे बढ़ता है। जब मनुष्य विद्वानोंमें अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥

विरुद्धानीह शास्त्राणि ये पश्यन्ति कुरुद्वह ।
विधित्सा जायते तेषां तत्त्वज्ञानान्निवर्तते ॥ १२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! जो लोग धर्मके विरोधी शास्त्रोंका अवलोकन करते हैं, उनके मनमें अनुचित कर्म करनेकी इच्छारूप विधित्सा उत्पन्न होती है। यह तत्त्वज्ञानसे निवृत्त होती है ॥ १२ ॥

प्रीत्या शोकः प्रभवति वियोगात् तस्य देहिनः ।
यदा निरर्थकं वेत्ति तदा सद्यः प्रणश्यति ॥ १३ ॥
जिसपर प्रेम हो, उस प्राणीके वियोगसे शोक प्रकट होता है। परंतु जब मनुष्य यह समझ ले कि शोक व्यर्थ है—उससे कोई लाभ नहीं है तो तुरंत ही उस शोककी शान्ति हो जाती है ॥ १३ ॥

परासुता क्रोधलोभादभ्यासाच्च प्रवर्तते ।
दयया सर्वभूतानां निर्वेदात् सा निवर्तते ॥ १४ ॥

क्रोध, लोभ और अभ्यासके कारण परासुता अर्थात् दूसरोंको मारनेकी इच्छा होती है। समस्त प्राणियोंके प्रति दया और वैराग्य होनेसे उसकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १४ ॥ सत्यत्यागात् तु मात्सर्यमहितानां च सेवया । एतत् तु क्षीयते तात साधुनामुपसेवनात् ॥ १५ ॥ सत्यका त्याग और दुष्टोंका साथ करनेसे मात्सर्य-दोषकी उत्पत्ति होती है। तात! श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवा और संगति करनेसे उसका नाश हो जाता है ॥ १५ ॥ कुलाज्ज्ञानात् तथैश्वर्यान्मदो भवति देहिनाम् । एभिरेव तु विज्ञातैः स च सद्यः प्रणश्यति ॥ १६ ॥ अपने उत्तम कुल, उत्कृष्ट ज्ञान तथा ऐश्वर्यका अभिमान होनेसे देहाभिमानी मनुष्योंपर मद सवार हो जाता है; परंतु इनके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर वह मद तत्काल उतर जाता है ॥ १६ ॥ ईर्ष्या कामात् प्रभवति संहर्षाच्चैव जायते । इतरेषां तु सत्त्वानां प्रज्ञया सा प्रणश्यति ॥ १७ ॥ मनमें कामना होनेसे तथा दूसरे प्राणियोंकी हँसी-खुशी देखनेसे ईर्ष्याकी उत्पत्ति होती है तथा विवेकशील बुद्धिके द्वारा उसका नाश होता है ॥ १७ ॥ विभ्रमाल्लोकबाह्यानां द्वेष्यैर्वाक्यैरसम्मतैः । कुत्सा संजायते राजँल्लोकान् प्रेक्ष्याभिशाम्यति ॥ १८ ॥ राजन्! समाजसे बहिष्कृत हुए नीच मनुष्योंके द्वेषपूर्ण तथा अप्रामाणिक वचनोंको सुनकर भ्रममें पड़ जानेसे निन्दा करनेकी आदत होती है; परंतु श्रेष्ठ पुरुषोंको देखनेसे वह शान्त हो जाती है ॥ १८ ॥ प्रतिकर्तुं न शक्ता ये बलस्थायापकारिणे । असूया जायते तीव्रा कारुण्याद् विनिवर्तते ॥ १९ ॥ जो लोग अपनी बुराई करनेवाले बलवान् मनुष्यसे बदला लेनेमें असमर्थ होते हैं, उनके हृदयमें तीव्र असूया (दोषदर्शनकी प्रवृत्ति) पैदा होती है, परंतु दयाका भाव जाग्रत् होनेसे उसकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १९ ॥ कृपणान् सततं दृष्ट्वा ततः संजायते कृपा । धर्मनिष्ठां यदा वेत्ति तदा शाम्यति सा कृपा ॥ २० ॥ सदा कृपण मनुष्योंको देखनेसे अपनेमें भी दैन्यभाव—कंजूसीका भाव पैदा होता है; धर्मनिष्ठ पुरुषोंके उदार भावको जान लेनेपर वह कंजूसीका भाव नष्ट हो जाता है ॥ २० ॥ अज्ञानप्रभवो लोभो भूतानां दृश्यते सदा । अस्थिरत्वं च भोगानां दृष्ट्वा ज्ञात्वा निवर्तते ॥ २१ ॥ प्राणियोंका भोगोंके प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञानके ही कारण है। भोगोंकी क्षणभङ्गुरताको देखने और जाननेसे उसकी निवृत्ति हो जाती है ॥ २१ ॥

एतान्येव जितान्याहुः प्रशमाच्च त्रयोदश ।
एते हि धार्तराष्ट्राणां सर्वे दोषास्त्रयोदश ।। २२ ।।
त्वया सत्यार्थिना नित्यं विजिता ज्येष्ठसेवनात् ।। २३ ।।
कहते हैं, ये तेरहों दोष शान्ति धारण करनेसे जीत लिये जाते हैं। धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें ये सभी दोष मौजूद थे और तुम सत्यको ग्रहण करना चाहते हो; इसलिये तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके सेवनसे इन सबपर विजय प्राप्त कर ली ।। २२-२३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि लोभनिरूपणे
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें लोभनिरूपणविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६३ ।।

१६४-

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण

युधिष्ठिर उवाच

आनृशंस्यं विजानामि दर्शनेन सतां सदा ।
नृशंसान्न विजानामि तेषां कर्म च भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके सेवन और दर्शनसे मैं इस बातको तो जानता हूँ कि कोमलतापूर्ण बर्ताव कैसे किया जाता है? परंतु नृशंस मनुष्यों और उनके कर्मोंका मुझे विशेष ज्ञान नहीं है ॥ १ ॥

कण्टकान् कूपमग्निं च वर्जयन्ति यथा नराः ।
तथा नृशंसकर्माणं वर्जयन्ति नरा नरम् ॥ २ ॥
जैसे मनुष्य रास्तेमें मिले हुए काँटों, कुओं और आगको बचाकर चलते हैं, उसी प्रकार मनुष्य नृशंस कर्म करनेवाले पुरुषको भी दूरसे ही त्याग देते हैं ॥ २ ॥

नृशंसो दह्यते नित्यं प्रेत्य चेह च भारत ।
तस्मात् त्वं ब्रूहि कौरव्य तस्य धर्मविनिश्चयम् ॥ ३ ॥
भारत! कुरुनन्दन! नृशंस मनुष्य इसलोक और परलोकमें भी सदा ही शोककी आगसे जलता रहता है; अतः आप मुझे नृशंस मनुष्य और उसके धर्म-कर्मका यथार्थ परिचय दीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

स्पृहा स्याद् गर्हिता चैव विधित्सा चैव कर्मणाम् ।
आक्रोष्टा कृश्यते चैव वञ्चितो बुद्धयते स च ॥ ४ ॥

दत्तानुकीर्तिर्विषमः क्षुद्रो नैकृतिकः शठः ।
असंविभागी मानी च तथा सङ्गी विकत्थनः ॥ ५ ॥

सर्वातिशङ्की पुरुषो बलीशः कृपणोऽथवा ।
वर्गप्रशंसी सततमश्रमद्वेषसंकरी ॥ ६ ॥

हिंसाविहारः सततमविशेषगुणागुणः ।
बह्वलीकोऽमनस्वी च लुब्धोऽत्यर्थं नृशंसकृत् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जिसके मनमें बड़ी घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसाप्रधान कुत्सित कर्मोंको आरम्भ करना चाहता है, स्वयं दूसरोंकी निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन्दा करते हैं, जो अपनेको दैवसे वञ्चित समझता और पापमें प्रवृत्त होता है, दिये हुए दानका बारंबार बखान करता है, जिसके मनमें विषमता भरी रहती है, जो नीच कर्म