महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना
भीष्म उवाच
ततश्चितां बकपतेः कारयामास राक्षसः ।
रत्नैर्गन्धैश्च बहुभिर्वस्त्रैश्च समलंकृताम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर विरूपाक्षने बकराजके लिये एक चिता तैयार करायी। उसे बहुत से रत्नों, सुगन्धित चन्दनों तथा वस्त्रोंसे खूब सजाया गया था ॥ १ ॥
ततः प्रज्वाल्य नृपतिर्बकराजं प्रतापवान् ।
प्रेतकार्याणि विधिवद् राक्षसेन्द्रश्चकार ह ॥ २ ॥
तत्पश्चात् बकराजके शवको उसके ऊपर रखकर प्रतापी राक्षसराजने उसमें आग लगायी और विधिपूर्वक मित्रका दाह-कर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥
तस्मिन् काले च सुरभिर्देवी दाक्षायणी शुभा ।
उपरिष्टात् ततस्तस्य सा बभूव पयस्विनी ॥ ३ ॥
उसी समय दिव्य-धेनु दक्षकन्या सुरभिदेवी वहाँ आकर आकाशमें ठीक चिताके ऊपर खड़ी हो गयीं ॥
तस्या वक्त्राच्च्युतः फेनः क्षीरमिश्रस्तदानघ ।
सोऽपतद् वै ततस्तस्यां चितायां राजधर्मणः ॥ ४ ॥
अनघ! उनके मुखसे जो दूधमिश्रित फेन झरकर गिरा, वह राजधर्माकी उस चितापर पड़ा ॥ ४ ॥
ततः संजीवितस्तेन बकराजस्तदानघ ।
उत्पत्य च समीयाय विरूपाक्षं बकाधिपः ॥ ५ ॥
निष्पाप नरेश! उससे उस समय बकराज जी उठा और वह उड़कर विरूपाक्षसे जा मिला ॥ ५ ॥
ततोऽभ्ययाद् देवराजो विरूपाक्षपुरं तदा ।
प्राह चेदं विरूपाक्षं दिष्ट्या संजीवितस्त्वया ॥ ६ ॥
उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्षके नगरमें आये और विरूपाक्षसे इस प्रकार बोले—‘बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे द्वारा बकराजको जीवन मिला’ ॥ ६ ॥
श्रावयामास चेन्द्रस्तं विरूपाक्षं पुरातनम् ।
यथा शापः पुरा दत्तो ब्रह्मणा राजधर्मणः ॥ ७ ॥
इन्द्रने विरूपाक्षको एक प्राचीन घटना सुनायी, जिसके अनुसार ब्रह्माजीने पहले राजधर्माको शाप दिया था ॥ ७ ॥
यदा बकपती राजन् ब्रह्माणं नोपसर्पति ।
ततो रोषादिदं प्राह खगेन्द्राय पितामहः ॥ ८ ॥
राजन्! एक समय जब बकराज ब्रह्माजीकी सभामें नहीं पहुँच सके, तब पितामहने बड़े रोषमें भरकर इन पक्षिराजको शाप देते हुए कहा— ॥ ८ ॥
यस्मान्मूढो मम सभां नागतोऽसौ बकाधमः ।
तस्माद् वधं स दुष्टात्मा नचिरात् समवाप्स्यति ॥ ९ ॥
‘वह मूर्ख और नीच बगला मेरी सभामें नहीं आया है; इसलिये शीघ्र ही उस दुष्टात्माको वधका कष्ट भोगना पड़ेगा’ ॥ ९ ॥
तदयं तस्य वचनान्निहतो गौतमेन वै ।
तेनैवामृतसिक्तश्च पुनः संजीवितो बकः ॥ १० ॥
ब्रह्माजीके उस वचनसे ही गौतमने इनका वध किया और ब्रह्माजीने ही पुनः अमृत छिड़ककर राजधर्माको जीवन-दान दिया है ॥ १० ॥
राजधर्मा बकः प्राह प्रणिपत्य पुरन्दरम् ।
यदि तेऽनुग्रहकृता मयि बुद्धिः सुरेश्वर ॥ ११ ॥
सखायं मे सुदयितं गौतमं जीवयेत्युत ।
तदनन्तर राजधर्मा बकने इन्द्रको प्रणाम करके कहा—‘सुरेश्वर! यदि आपकी मुझपर कृपा है तो मेरे प्रिय मित्र गौतमको भी जीवित कर दीजिये’ ॥ ११ १/२ ॥
तस्य वाक्यं समादाय वासवः पुरुषर्षभ ॥ १२ ॥
सिक्त्वामृतेन तं विप्रं गौतमं जीवयत् तदा ।
‘पुरुषप्रवर! उसके अनुरोधको स्वीकार करके इन्द्र-देवने गौतम ब्राह्मणको भी अमृत छिड़ककर जिला दिया ॥
सभाण्डोपस्करं राजंस्तमासाद्य बकाधिपः ॥ १३ ॥
सम्परिष्वज्य सुहृदं प्रीत्या परमया युतः ।
राजन्! बर्तन और सुवर्ण आदि सब सामग्रीसहित प्रिय सुहृद् गौतमको पाकर बकराजने बड़े प्रेमसे उसको हृदयसे लगा लिया ॥ १३ १/२ ॥
अथ तं पापकर्माणं राजधर्मा बकाधिपः ॥ १४ ॥
विसर्जयित्वा सधनं प्रविवेश स्वमालयम् ।
फिर बकराज राजधर्माने उस पापाचारीको धनसहित विदा करके अपने घरमें प्रवेश किया ॥ १४ १/२ ॥
यथोचितं च स बको ययौ ब्रह्मसदस्तथा ॥ १५ ॥
ब्रह्मा चैनं महात्मानमातिथ्येनाभ्यपूजयत् ।
तदनन्तर बकराज यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीकी सभामें गया और ब्रह्माजीने उस महात्माका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १५ १/२ ॥
गौतमश्चापि सम्प्राप्य पुनस्तं शबरालयम् ।
शूद्रायां जनयामास पुत्रान् दुष्कृतकारिणः ॥ १६ ॥
गौतम भी पुनः भीलोंके ही गाँवमें जाकर रहने लगा। वहाँ उसने उस शूद्रजातिकी स्त्रीके पेटसे ही अनेक पापाचारी पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ १६ ॥
शापश्च सुमहांस्तस्य दत्तः सुरगणैस्तदा ।
कुक्षौ पुनर्भूवाः पापोऽयं जनयित्वा चिरात् सुतान् ॥ १७ ॥
निरयं प्राप्स्यति महत् कृतघ्नोऽयमिति प्रभो ।
तब देवताओंने गौतमको महान् शाप देते हुए कहा—'यह पापी कृतघ्न है और दूसरा पति स्वीकार करनेवाली शूद्रजातीय स्त्रीके पेटसे बहुत दिनोंसे संतान पैदा करता आ रहा है। इस पापके कारण यह घोर नरकमें पड़ेगा' ॥
एतत् प्राह पुरा सर्वं नारदो मम भारत ॥ १८ ॥
संस्मृत्य चापि सुमहदाख्यानं भरतर्षभ ।
मयापि भवते सर्वं यथावदनुवर्णितम् ॥ १९ ॥
भारत! यह सारा प्रसङ्ग पूर्वकालमें मुझसे महर्षि नारदने कहा था। भरतश्रेष्ठ! इस महान् आख्यानको याद करके मैंने तुम्हारे समक्ष सब यथार्थरूपसे कहा है ॥
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् ।
अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ २० ॥
कृतघ्नको कैसे यश प्राप्त हो सकता है? उसे कैसे स्थान और सुखकी उपलब्धि हो सकती है? कृतघ्न विश्वासके योग्य नहीं होता। कृतघ्नके उद्धारके लिये शास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है ॥
मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः ।
मित्रध्रुङ् नरकं घोरमनन्तं प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥
मनुष्यको विशेष ध्यान देकर मित्रद्रोहके पापसे बचना चाहिये। मित्रद्रोही मनुष्य अनन्तकालके लिये घोर नरकमें पड़ता है ॥ २१ ॥
कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चैव ह ।
मित्राच्च लभते सर्वं मित्रात् पूजां लभेत च ॥ २२ ॥
प्रत्येक मनुष्यको सदा कृतज्ञ होना चाहिये और मित्रकी इच्छा रखनी चाहिये; क्योंकि मित्रसे सब कुछ प्राप्त होता है। मित्रके सहयोगसे सदा सम्मानकी प्राप्ति होती है ॥
मित्राद् भोगांश्च भुञ्जीत मित्रेणापत्सु मुच्यते ।
सत्कारैरुत्तमैर्मित्रं पूजयेत विचक्षणः ॥ २३ ॥
मित्रकी सहायतासे भोगोंकी भी उपलब्धि होती है और मित्रद्वारा मनुष्य आपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है, अतः बुद्धिमान् पुरुष उत्तम सत्कारोंद्वारा मित्रका पूजन करे ॥
परित्याज्यो बुधैः पापः कृतघ्नो निरपत्रपः ।
मित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा नराधमः ॥ २४ ॥
जो पापी, कृतघ्न, निर्लज्ज, मित्रद्रोही, कुलाङ्गार और पापाचारी हो, ऐसे अधम मनुष्यका विद्वान् पुरुष सदा त्याग करे ॥ २४ ॥
एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मया तव ।
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हें पापी, मित्रद्रोही और कृतघ्न पुरुषका परिचय दिया है। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं भीष्मेणोक्तं महात्मना ।
युधिष्ठिरः प्रीतमना बभूव जनमेजय ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा भीष्मका यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥
(मोक्षधर्मपर्व)
(मोक्षधर्मपर्व)
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता राजधर्माश्रिताः शुभाः ।
धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हसि पार्थिव ॥ १ ॥
**राजा युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! यहाँ तक आपने राजधर्मसम्बन्धी श्रेष्ठ धर्मोंका उपदेश दिया। पृथ्वीनाथ! अब आप आश्रमियोंके उत्तम धर्मका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलं तपः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**युधिष्ठिर! वेदोंमें सर्वत्र सभी आश्रमोंके लिये स्वर्गसाधक यथार्थ फलकी प्राप्ति करानेवाली तपस्याका उल्लेख है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं। संसारमें कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिसका कोई फल न हो ॥ २ ॥
यस्मिन् यस्मिंस्तु विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो-जो पुरुष जिस-जिस विषयमें पूर्ण निश्चयको पहुँच जाता है (जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धिका विश्वास हो जाता है), उसीको वह कर्तव्य समझता है। दूसरे विषयको नहीं ॥ ३ ॥
यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् ।
तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ ४ ॥
मनुष्य जैसे-जैसे संसारके पदार्थोंको सारहीन समझता है, वैसे ही वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
एवं व्यवसिते लोके बहुदोषे युधिष्ठिर ।
आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान् नरः ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह जगत् अनेक दोषोंसे परिपूर्ण है, ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष अपने मोक्षके लिये प्रयत्न करे ।। ५ ।।
युधिष्ठिर उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
यया बुद्ध्या नुदेच्छोकं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! धनके नष्ट हो जानेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताके मर जानेपर किस बुद्धिसे मनुष्य अपने शोकका निवारण करे? यह मुझे बताइये ।। ६ ।।
भीष्म उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्यापचितिं चरेत् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— वत्स! जब धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तब ‘ओह! संसार कैसा दुःखमय है’ यह सोचकर मनुष्य शोकको दूर करनेवाले शम-दम आदि साधनोंका अनुष्ठान करे ।। ७ ।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत् सुहृत् ॥ ८ ॥
इस विषयमें किसी हितैषी ब्राह्मणने राजा सेनजित्के पास आकर उन्हें जैसा उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष दृष्टान्तके रूपमें प्रस्तुत किया करते हैं ।। ८ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं राजानं शोकविह्वलम् ।
विषण्णमनसं दृष्ट्वा विप्रो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
राजा सेनजित्के पुत्रकी मृत्यु हो गयी थी। वे उसीके शोककी आगसे जल रहे थे। उनका मन विषादमें डूबा हुआ था। उन शोकविह्वल नरेशको देखकर ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ।। ९ ।।
किं नु मुह्यसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनुशोचसि ।
यदा त्वामपि शोचन्तः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम् ॥ १० ॥
‘राजन्! तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति क्यों मोहित हो रहे हो? शोकके योग्य तो तुम स्वयं ही हो, फिर दूसरोंके लिये क्यों शोक करते हो? अजी! एक दिन ऐसा आयेगा, जब कि दूसरे शोचनीय मनुष्य तुम्हारे लिये भी शोक करते हुए उसी गतिको प्राप्त होंगे ।। १० ।।
त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वामुपासन्ति पार्थिव ।
सर्वे तत्र गमिष्यामो यत एवागता वयम् ॥ ११ ॥
‘पृथ्वीनाथ! तुम, मैं और ये दूसरे लोग जो इस समय तुम्हारे पास बैठे हैं; सब वहीं जायँगे, जहाँसे हम आये हैं’ ।। ११ ।।
सेनजिदुवाच
का बुद्धिः किं तपो विप्र कः समाधिस्तपोधन ।
किं ज्ञानं किं श्रुतं चैव यत् प्राप्य न विषीदसि ॥ १२ ॥
**सेनजित्ने पूछा—**तपस्याके धनी ब्राह्मणदेव! आपके पास ऐसी कौन-सी बुद्धि, कौन तप, कौन समाधि, कैसा ज्ञान और कौन-सा शास्त्र है, जिसे पाकर आपको किसी प्रकारका विषाद नहीं है ॥ १२ ॥
(हृष्यन्तमवसीदन्तं सुखदुःखविपर्यये ।
आत्मानमनुशोचामि ममैष हृदि संस्थितः ॥)
सुख और दुःखका चक्र घूमता रहता है। मैं सुखमें हर्षसे फूल उठता हूँ और दुःखमें खिन्न हो जाता हूँ। ऐसी अवस्थामें पड़े हुए अपने-आपके लिये मुझे निरन्तर शोक होता है। यह शोक मेरे हृदयमें डेरा डाले बैठा है ॥
ब्राह्मण उवाच
पश्य भूतानि दुःखेन व्यतिषिक्तानि सर्वशः ।
उत्तमाधममध्यानि तेषु तेष्विह कर्मसु ॥ १३ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! देखो, इस संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम सभी प्राणी भिन्न-भिन्न कर्मोंमें आसक्त हो दुःखसे ग्रस्त हो रहे हैं ॥ १३ ॥
(अहमेको न मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् ।
न तं पश्यामि यस्याहं तं न पश्यामि यो मम ॥)
मैं तो अकेला हूँ। न तो दूसरा कोई मेरा है और न मैं किसी दूसरेका हूँ। मैं उस पुरुषको नहीं देखता, जिसका मैं होऊँ तथा उसको भी नहीं देखता, जो मेरा हो (न मुझपर किसीकी ममता है, न मेरा ही किसीपर ममत्व) ॥
आत्मापि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ।
यथा मम तथाऽन्येषामिति चिन्त्य न मे व्यथा ।
एतां बुद्धिमहं प्राप्य न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥ १४ ॥
यह शरीर भी मेरा नहीं अथवा सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है। ये सब वस्तुएँ जैसी मेरी हैं, वैसी ही दूसरोंकी भी हैं। ऐसा सोचकर इनके लिये मेरे मनमें कोई व्यथा नहीं होती। इसी बुद्धिको पाकर न मुझे हर्ष होता है, न शोक ॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥ १५ ॥
जिस प्रकार समुद्रमें बहते हुए दो काष्ठ कभी-कभी एक-दूसरेसे मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार इस लोकमें प्राणियोंका समागम होता है ॥ १५ ॥
एवं पुत्राश्च पौत्राश्च ज्ञातयो बान्धवास्तथा ।
तेषां स्नेहो न कर्तव्यो विप्रयोगो ध्रुवो हि तैः ॥ १६ ॥
इसी तरह पुत्र, पौत्र, जाति-बान्धव और सम्बन्धी भी मिल जाते हैं। उनके प्रति कभी आसक्ति नहीं बढ़ानी चाहिये; क्योंकि एक दिन उनसे बिछोह होना निश्चित है ॥ १६ ॥
अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः ।
न त्वासौ वेद न त्वं तं कः सन् किमनुशोचसि ॥ १७ ॥
तुम्हारा पुत्र किसी अज्ञात स्थितिसे आया था और अब अज्ञात स्थितिमें ही चला गया है। न तो वह तुम्हें जानता था और न तुम उसे जानते थे; फिर तुम उसके कौन होकर किसलिये शोक करते हो? ॥ १७ ॥
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ।
सुखात् संजायते दुःखं दुःखमेवं पुनःपुनः ॥ १८ ॥
संसारमें विषयोंकी तृष्णासे जो व्याकुलता होती है, उसीका नाम दुःख है और उस दुःखका विनाश ही सुख है। उस सुखके बाद (पुनः कामनाजनित) दुःख होता है। इस प्रकार बारंबार दुःख ही होता रहता है ॥ १८ ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
सुखदुःखे मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्ततः ॥ १९ ॥
सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है। मनुष्योंके सुख और दुःख चक्रकी भाँति घूमते रहते हैं ॥ १९ ॥
सुखात् त्वं दुःखमापन्नः पुनरापत्स्यसे सुखम् ।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥ २० ॥
इस समय तुम सुखसे दुःखमें आ पड़े हो। अब फिर तुम्हें सुखकी प्राप्ति होगी। यहाँ किसी भी प्राणीको न तो सदा सुख ही प्राप्त होता है और न सदा दुःख ही ॥
शरीरमेवायतनं सुखस्य
दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ।
यद्यच्छरीरेण करोति कर्म
तेनैव देही समुपाश्नुते तत् ॥ २१ ॥
यह शरीर ही सुखका आधार है और यही दुःखका भी आधार है। देहाभिमानी पुरुष शरीरसे जो-जो कर्म करता है, उसीके अनुसार वह सुख एवं दुःखरूप फल भोगता है ॥ २१ ॥
जीवितं च शरीरेण जात्यैव सह जायते ।
उभे सह विवर्तेते उभे सह विनश्यतः ॥ २२ ॥
यह जीवन स्वभावतः शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है। दोनों साथ-साथ विविध रूपोंमें रहते हैं और साथ ही साथ नष्ट हो जाते हैं ॥ २२ ॥
स्नेहपाशैर्बहुविधैराविष्टविषया जनाः । अकृतार्थाश्च सीदन्ते जलैः सैकतसेतवः ॥ २३ ॥ मनुष्य नाना प्रकारके स्नेह-बन्धनोंमें बँधे हुए हैं, अतः वे सदा विषयोंकी आसक्तिसे घिरे रहते हैं; इसीलिये जैसे बालूद्वारा बनाये हुए पुल जलके वेगसे बह जाते हैं, उसी प्रकार उन मनुष्योंकी विषयकामना सफल नहीं होती; जिससे वे दुःख पाते रहते हैं ॥ २३ ॥
स्नेहेन तिलवत् सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते । तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः ॥ २४ ॥ तेलीलोग तेलके लिये जैसे तिलोंको कोल्हूमें पेरते हैं, उसी प्रकार स्नेहके कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशोंद्वारा सृष्टिचक्रमें पिस रहे हैं ॥ २४ ॥
संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः । एकः क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ २५ ॥ मनुष्य स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बके लिये चोरी आदि पाप कर्मोंका संग्रह करता है; किंतु इस लोक और परलोकमें उसे अकेले ही उन समस्त कर्मोंका क्लेशमय फल भोगना पड़ता है ॥ २५ ॥
पुत्रदारकुटुम्बेषु प्रसक्ताः सर्वमानवाः । शोकपङ्कार्णवे मरना जीर्णा वनगजा इव ॥ २६ ॥ स्त्री, पुत्र और कुटुम्बमें आसक्त हुए सभी मनुष्य उसी प्रकार शोकके समुद्रमें डूब जाते हैं जैसे बूढ़े जंगली हाथी दलदलमें फँसकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २६ ॥
पुत्रनाशे वित्तनाशे ज्ञातिसम्बन्धिनामपि । प्राप्यते सुमहद् दुखं दावाग्निप्रतिमं विभो । दैवायत्तमिदं सर्वं सुखदुःखे भवाभवौ ॥ २७ ॥ प्रभो! यहाँ सब लोगोंको पुत्र, धन, कुटुम्बी तथा सम्बन्धियोंका नाश होनेपर दावानलके समान दाह उत्पन्न करनेवाला महान् दुःख प्राप्त होता है; परंतु सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु आदि यह सब कुछ प्रारब्धके ही अधीन है ॥
असुहृत् ससुहृच्चापि सशत्रुर्मित्रवानपि । सप्रज्ञः प्रज्ञया हीनो दैवेन लभते सुखम् ॥ २८ ॥ मनुष्य हितैषी सुहृदोंसे युक्त हो या न हो, वह शत्रुके साथ हो या मित्रके, बुद्धिमान् हो या बुद्धिहीन, दैवकी अनुकूलता होनेपर ही सुख पाता है ॥ २८ ॥
नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय शत्रवः । न च प्रज्ञालमर्थानां न सुखानामलं धनम् ॥ २९ ॥ अन्यथा न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देनेमें समर्थ हैं, न तो बुद्धि धन देनेकी शक्ति रखती है और न धन ही सुख देनेमें समर्थ होता है ॥
न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यबमसमृद्धये ।
लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥ ३० ॥ न तो बुद्धि धनकी प्राप्तिमें कारण है, न मूर्खता निर्धनतामें, वास्तवमें संसारचक्रकी गतिका वृत्तान्त कोई ज्ञानी पुरुष ही जान पाता है, दूसरा नहीं ॥ ३० ॥
बुद्धिमन्तं च शूरं च मूढं भीरुं जडं कविम् । दुर्बलं बलवन्तं च भागिनं भजते सुखम् ॥ ३१ ॥ बुद्धिमान्, शूरवीर, मूढ़, डरपोक, गूँगा, विद्वान्, दुर्बल और बलवान् जो भी भाग्यवान् होगा—दैव जिसके अनुकूल होगा, उसे बिना यत्नके ही सुख प्राप्त होगा ॥
धेनुर्वत्सस्य गोपस्य स्वामिनस्तस्करस्य च । पयः पिबति यस्तस्या धेनुस्तस्येति निश्चयः ॥ ३२ ॥ दूध देनेवाली गौ बछड़ेकी है या उसे दुहने अथवा चरानेवाले ग्वालेकी है; या रखनेवाले मालिककी है। अथवा उसे चुराकर ले जानेवाले चोरकी है? वास्तवमें जो उसका दूध पीता है, उसीकी वह गाय है—ऐसा विद्वानोंका निश्चय है ॥ ३२ ॥
ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः । ते नराः सुखमेधन्ते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ ३३ ॥ इस संसारमें जो अत्यन्त मूढ़ हैं और जो बुद्धिसे परे पहुँच गये हैं, वे ही मनुष्य सुखी हैं। बीचके सभी लोग कष्ट भोगते हैं ॥ ३३ ॥
अन्त्येषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्त्यप्राप्तिं सुखामाहुर्दुःखमन्तरमन्त्ययोः ॥ ३४ ॥ ज्ञानी पुरुष अन्तिम स्थितियोंमें रमण करते हैं, मध्यवर्ती स्थितिमें नहीं। अन्तिम स्थितिकी प्राप्ति सुखस्वरूप बतायी जाती है और उन दोनोंके मध्यकी स्थिति दुःखरूप कही गयी है ॥ ३४ ॥
(सुखं स्वपिति दुर्मेधाः स्वानि कर्माण्यचिन्तयन् । अविज्ञानेन महता कम्बलेनेव संवृतः ॥) खोटी बुद्धिवाला मूर्ख मनुष्य अपने कर्मोंके शुभाशुभ परिणामकी कोई परवा न करके सुखसे सोता है; क्योंकि वह कम्बलसे ढके हुए पुरुषकी भाँति महान् अज्ञानसे आवृत रहता है ॥
ये च बुद्धिसुखं प्राप्ता द्वन्द्वातीता विमत्सराः । तान् नैवार्था न चानर्था व्यथयन्ति कदाचन ॥ ३५ ॥ किंतु जिन्हें ज्ञानजनित सुख प्राप्त है, जो द्वन्द्वोंसे अतीत हैं तथा जिनमें मत्सरताका भी अभाव है, उन्हें अर्थ और अनर्थ कभी पीड़ा नहीं देते हैं ॥ ३५ ॥
अथ ये बुद्धिमप्राप्ता व्यतिक्रान्ताश्च मूढताम् । तेऽतिवेलं प्रहृष्यन्ति संतापमुपयान्ति च ॥ ३६ ॥
जो मूढ़ताको तो लाँघ चुके हैं, परंतु जिनको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, वे सुखकी परिस्थिति आनेपर अत्यन्त हर्षसे फूल उठते हैं और दुःखकी परिस्थितिमें अतिशय संतापका अनुभव करने लगते हैं ॥ ३६ ॥ नित्यं प्रमुदिता मूढा दिवि देवगणा इव । अवलेपेन महता परिभूत्या विचेतसः ॥ ३७ ॥ मूर्ख मनुष्य स्वर्गमें देवताओंकी भाँति सदा विषयसुखमें मग्न रहते हैं; क्योंकि उनका चित्त विषया-सक्तिके कीचड़में लथपथ होकर मोहित हो जाता है ॥ सुखं दुःखान्तमालस्यं दुःखं दाक्ष्यं सुखोदयम् । भूतिस्त्वेवं श्रिया सार्धं दक्षे वसति नालसे ॥ ३८ ॥ आरम्भमें आलस्य सुख-सा जान पड़ता है; परंतु वह अन्तमें दुःखदायी होता है और कार्यकौशल दुःख-सा लगता है; परंतु वह सुखका उत्पादक है। कार्यकुशल पुरुषमें ही लक्ष्मीसहित ऐश्वर्य निवास करता है, आलसीमें नहीं ॥ ३८ ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ ३९ ॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय, जो-जो प्राप्त हो जाय, उसका हृदयसे स्वागत करे, कभी हिम्मत न हारे ॥ ३९ ॥ शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ ४० ॥ शोकके हजारों स्थान हैं और भयके सैकड़ों स्थान हैं; किंतु वे प्रतिदिन मूर्खोंपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वानोंपर नहीं ॥ ४० ॥ बुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषमनसूयकम् । दान्तं जितेन्द्रियं चापि शोको न स्पृशते नरम् ॥ ४१ ॥ जो बुद्धिमान्, ऊहापोहमें कुशल एवं शिक्षित बुद्धिवाला, अध्यात्मशास्त्रके श्रवणकी इच्छा रखनेवाला, किसीके दोष न देखनेवाला, मनको वशमें रखनेवाला और जितेन्द्रिय है, उस मनुष्यको शोक कभी छू भी नहीं सकता ॥ ४१ ॥ एतां बुद्धिं समास्थाय गुप्तचित्तश्चरेद् बुधः । उदयास्तमयज्ञं हि न शोकः स्प्रष्टुमर्हति ॥ ४२ ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इसी विचारका आश्रय लेकर मनको काम, क्रोध आदि शत्रुओंसे सुरक्षित रखते हुए उत्तम बर्ताव करे। जो उत्पत्ति और विनाशके तत्त्वको जानता है, उसे शोक छू नहीं सकता ॥ ४२ ॥ यन्निमित्तं भवेच्छोकस्तापो वा दुःखमेव च । आयासो वा यतो मूलमेकाङ्गमपि तत् त्यजेत् ॥ ४३ ॥
जिसके कारण शोक, ताप अथवा दुःख हो, या जिसके कारण अधिक श्रम उठाना पड़े, वह दुःखका मूल कारण अपने शरीरका एक अङ्ग भी हो तो उसे त्याग देना चाहिये ॥ ४३ ॥
किंचिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् ।
तदेव परितापार्थं सर्वं सम्पद्यते तथा ॥ ४४ ॥
मनुष्य जब किसी भी पदार्थमें ममत्व कर लेता है, तब वे ही सब उसके वैसे दुःखके कारण बन जाते हैं ॥ ४४ ॥
यद् यत् यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूय॑ते ।
कामानुसारी पुरुषः कामाननुविनश्यति ॥ ४५ ॥
वह कामनाओंमेंसे जिस-जिसका परित्याग कर देता है, वही उसके सुखकी पूर्ति करनेवाली हो जाती है। जो पुरुष कामनाओंका अनुसरण करता है, वह उन्हींके पीछे नष्ट हो जाता है ॥ ४५ ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ ४६ ॥
संसारमें जो कुछ इस लोकके भोगोंका सुख है और जो स्वर्गका महान् सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ॥ ४६ ॥
पूर्वदेहकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।
प्राज्ञं मूढं तथा शूरं भजते यादृशं कृतम् ॥ ४७ ॥
मनुष्य बुद्धिमान् हो, मूर्ख हो अथवा शूरवीर हो, उसने पूर्वजन्ममें जैसा शुभ या अशुभ कर्म किया है, उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ॥ ४७ ॥
एवमेव किलैतानि प्रियाण्येवाप्रियाणि च ।
जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ ४८ ॥
इस प्रकार जीवोंको प्रिय-अप्रिय और सुख-दुःखकी प्राप्ति बार-बार क्रमसे होती ही रहती है, इसमें संदेह नहीं है ॥ ४८ ॥
एतां बुद्धिं समास्थाय सुखमास्ते गुणान्वितः ।
सर्वान् कामान् जुगुप्सेत कामान् कुर्वीत पृष्ठतः ॥ ४९ ॥
ऐसी बुद्धिका आश्रय लेकर कामनाओंके त्यागरूपी गुणसे युक्त हुआ मनुष्य सुखसे रहता है; इसलिये सब प्रकारके भोगोंसे विरक्त होकर उन्हें पीठ-पीछे कर दे, अर्थात् उनसे विमुख हो जाय ॥ ४९ ॥
वृत्त एष हृदि प्रौढो मृत्युरेष मनोभवः ।
क्रोधो नाम शरीरस्थो देहिनां प्रोच्यते बुधैः ॥ ५० ॥
हृदयसे उत्पन्न होनेवाला यह काम हृदयमें ही पुष्ट होता है, फिर यही मृत्युका रूप धारण कर लेता है। क्योंकि (जब इसकी सिद्धिमें कोई बाधा आती है, तब) विद्वानोंद्वारा
यही प्राणियोंके शरीरके भीतर क्रोधके नामसे पुकारा जाता है ॥ ५० ॥ यदा संहरते कामान् कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । तदाऽऽत्मज्योतिरात्मायमात्मन्येव प्रपश्यति ॥ ५१ ॥ कछुआ जैसे अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार यह जीव जब अपनी सब कामनाओंका संकोच कर देता है तब यह अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें ही स्वयं प्रकाशस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ ५१ ॥ न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ५२ ॥ जब यह किसीसे भय नहीं मानता और इससे भी किसीको भय नहीं होता; तथा जब यह किसी वस्तुको न तो चाहता है और न उससे द्वेष ही करता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ भयाभये । प्रियाप्रिये परित्यज्य प्रशान्तात्मा भविष्यति ॥ ५३ ॥ जब यह साधक सत्य और असत्य अर्थात् जगत्के व्यक्त और अव्यक्त पदार्थोंका, शोक और हर्षका, भय और अभयका तथा प्रिय और अप्रिय आदि समस्त द्वन्द्वोंका परित्याग कर देता है, तब उसका चित्त शान्त हो जाता है ॥ ५३ ॥ यदा न कुरुते धीरः सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ५४ ॥ जब धैर्यसम्पन्न ज्ञानवान् पुरुष किसी भी प्राणीके प्रति मन, वाणी और क्रियाद्वारा पापपूर्ण बर्ताव नहीं करता, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥ या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ ५५ ॥ खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्यके जीर्ण (वृद्ध) हो जानेपर भी स्वयं कभी जीर्ण नहीं होती, तथा जो प्राणोंके साथ जानेवाला रोग बनकर रहती है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ॥ ५५ ॥ अत्र पिङ्गलया गीता गाथाः श्रूयन्ति पार्थिव । यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे धर्मं सनातनम् ॥ ५६ ॥ राजन्! इस विषयमें पिङ्गलाकी गायी हुई गाथाएँ सुनी जाती हैं, जिसके अनुसार चलकर संकटकालमें भी उसने सनातन धर्मको प्राप्त कर लिया था ॥ ५६ ॥ संकेते पिङ्गला वेश्या कान्तेनासीद् विनाकृता । अथ कृच्छ्रगता शान्ता बुद्धिमास्थापयत् तदा ॥ ५७ ॥ एक बार पिङ्गला वेश्या बहुत देरतक संकेत स्थानपर बैठी रही, तब भी उसका प्रियतम उसके पास नहीं आया; इससे वह बड़े कष्टमें पड़ गयी, तथापि शान्त रहकर इस प्रकार
विचार करने लगी ।। ५७ ।।
पिङ्गलोवाच
उन्मत्ताहमनुन्मत्तं कान्तमन्ववसं चिरम् ।
अन्तिके रमणं सन्तं नैनमध्यगमं पुरा ।। ५८ ।।
**पिङ्गला बोली—**मेरे सच्चे प्रियतम चिरकालसे मेरे निकट ही रहते हैं। मैं सदासे उनके साथ ही रहती आयी हूँ। वे कभी उन्मत्त नहीं होते; परंतु मैं ऐसी मतवाली हो गयी थी कि आजसे पहले उन्हें पहचान ही न सकी ।।
एकस्थूणं नवद्वारमपिधास्याम्यगारकम् ।
का हि कान्तमिहायान्तमयं कान्तेति मंस्यते ।। ५९ ।।
जिसमें एक ही खंभा और नौ दरवाजे हैं, उस शरीर-रूपी घरको आजसे मैं दूसरोंके लिये बंद कर दूँगी। यहाँ आनेवाले उस सच्चे प्रियतमको जानकर भी कौन नारी किसी हाड़-मांसके पुतलेको अपना प्राणवल्लभ मानेगी? ।।
अकामां कामरूपेण धूर्ता नरकरूपिणः ।
न पुनर्वञ्चयिष्यन्ति प्रतिबुद्धास्मि जागृमि ।। ६० ।।
अब मैं मोहनिद्रासे जग गयी हूँ और निरन्तर सजग हूँ—कामनाओंका भी त्याग कर चुकी हूँ। अतः वे नरकरूपी धूर्त मनुष्य कामका रूप धारण करके अब मुझे धोखा नहीं दे सकेंगे ।। ६० ।।
अनर्थो हि भवेदर्थो दैवात् पूर्वकृतेन वा ।
सम्बुद्धाहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिया ।। ६१ ।।
भाग्यसे अथवा पूर्वकृत शुभ कर्मोंके प्रभावसे कभी-कभी अनर्थ भी अर्थरूप हो जाता है, जिससे आज निराश होकर मैं उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रही हूँ ।। ६१ ।।
सुखं निराशः स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम् ।
आशामनाशां कृत्वा हि सुखं स्वपिति पिङ्गला ।। ६२ ।।
वास्तवमें जिसे किसी प्रकारकी आशा नहीं है, वही सुखसे सोता है। आशाका न होना ही परम सुख है। देखो, आशाको निराशाके रूपमें परिणत करके पिङ्गला सुखकी नींद सोने लगी ।। ६२ ।।
भीष्म उवाच
एतैश्चान्यैश्च विप्रस्य हेतुमद्भिः प्रभाषितैः ।
पर्यवस्थापितो राजा सेनजिन्मुमुदे सुखी ।। ६३ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ब्राह्मणके कहे हुए इन पूर्वोक्त तथा अन्य युक्तियुक्त वचनोंसे राजा सेनजित्का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गये और
प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ब्राह्मणसेनजित्संवादकथने चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ब्राह्मण और सेनजित्के संवादका कथनविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं)
१७५-
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
अतिक्रामति कालेऽस्मिन् सर्वभूतक्षयावहे ।
किं श्रेयः प्रतिपद्येत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! समस्त भूतोंका संहार करनेवाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्थामें मनुष्य क्या करनेसे कल्याणका भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पितुः पुत्रेण संवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें ज्ञानी पुरुष पिता और पुत्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवादको ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
द्विजातेः कस्यचित् पार्थ स्वाध्यायनिरतस्य वै ।
बभूव पुत्रो मेधावी मेधावी नाम नामतः ॥ ३ ॥
कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें एक ब्राह्मण थे, जो सदा वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुणसे तो मेधावी था ही नामसे भी मेधावी था ॥ ३ ॥
सोऽब्रवीत् पितरं पुत्रः स्वाध्यायकरणे रतम् ।
मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतत्त्वविचक्षणः ॥ ४ ॥
वह मोक्ष, धर्म और अर्थमें कुशल तथा लोकतत्त्वका अच्छा ज्ञाता था। एक दिन उस पुत्रने अपने स्वाध्याय-परायण पितासे कहा ॥ ४ ॥
पुत्र उवाच
धीरः किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन्
क्षिप्रं ह्यायुर्भ्रश्यते मानवानाम् ।
पितस्तदाचक्ष्व यथार्थयोगं
ममानुपूर्व्या येन धर्मं चरेयम् ॥ ५ ॥
पुत्र बोला— पिताजी! मनुष्योंकी आयु तीव्र गतिसे बीती जा रही है। यह जानते हुए धीर पुरुषको क्या करना चाहिये? तात! आप मुझे उस यथार्थ उपायका उपदेश कीजिये, जिसके अनुसार मैं धर्मका आचरण कर सकूँ ॥ ५ ॥
पितोवाच
वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्र पुत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम् । अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥ ६ ॥ पिताने कहा—बेटा! द्विजको चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे; फिर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके पितरोंकी सद्गतिके लिये पुत्र पैदा करनेकी इच्छा करे। विधिपूर्वक त्रिविध अग्नियोंकी स्थापना करके यज्ञोंका अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे। उसके बाद मौनभावसे रहते हुए संन्यासी होनेकी इच्छा करे ॥ ६ ॥
पुत्र उवाच
एवमभ्याहते लोके समन्तात् परिवारिते । अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे ॥ ७ ॥ पुत्रने कहा—पिताजी! यह लोक जब इस प्रकारसे मृत्युद्वारा मारा जा रहा है, जरा-अवस्थाद्वारा चारों ओरसे घेर लिया गया है, दिन और रात सफलतापूर्वक आयुक्षयरूप काम करके बीत रहे हैं—ऐसी दशामें भी आप धीरकी भाँति कैसी बात कर रहे हैं ॥ ७ ॥
पितोवाच
कथमभ्याहतो लोकः केन वा परिवारितः । अमोघाः काः पतन्तीह किं नु भीषयसीव माम् ॥ ८ ॥ पिताने पूछा—बेटा! तुम मुझे भयभीत-सा क्यों कर रहे हो। बताओ तो सही, यह लोक किससे मारा जा रहा है, किसने इसे घेर रखा है और यहाँ कौन-से ऐसे व्यक्ति हैं जो सफलतापूर्वक अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं ॥ ८ ॥
पुत्र उवाच
मृत्युनाभ्याहतो लोको जरया परिवारितः । अहोरात्राः पतन्त्येते ननु कस्मान्न बुध्यसे ॥ ९ ॥ पुत्रने कहा—पिताजी! देखिये, यह सम्पूर्ण जगत् मृत्युके द्वारा मारा जा रहा है। बुढ़ापेने इसे चारों ओरसे घेर लिया है और ये दिन-रात ही वे व्यक्ति हैं जो सफलतापूर्वक प्राणियोंकी आयुका अपहरणस्वरूप अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं, इस बातको आप समझते क्यों नहीं हैं? ॥ ९ ॥
अमोघा रात्रयश्चापि नित्यमायान्ति यान्ति च । यदाहमेतज्जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह ।
सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये जालेनापिहितश्चरन् ॥ १० ॥
ये अमोघ रात्रियाँ नित्य आती हैं और चली जाती हैं। जब मैं इस बातको जानता हूँ कि मृत्यु क्षणभरके लिये भी रुक नहीं सकती और मैं उसके जालमें फँसकर ही विचर रहा हूँ, तब मैं थोड़ी देर भी प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ? ॥ १० ॥
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा ।
गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा ॥ ११ ॥
जब-जब एक-एक रात बीतनेके साथ ही आयु बहुत कम होती चली जा रही है, तब छिछले जलमें रहनेवाली मछलीके समान कौन सुख पा सकता है? ॥ ११ ॥
(यस्यां रात्र्यां व्यतीतायां न किंचिच्छुभमाचरेत् ।)
तदैव वन्ध्यं दिवसमिति विद्याद् विचक्षणः ।
अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम् ॥ १२ ॥
जिस रातके बीतनेपर मनुष्य कोई शुभ कर्म न करे, उस दिनको विद्वान् पुरुष 'व्यर्थ ही गया' समझे। मनुष्यकी कामनाएँ पूरी भी नहीं होने पातीं कि मौत उसके पास आ पहुँचती है ॥ १२ ॥
शष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्रगतमानसम् ।
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥ १३ ॥
जैसे घास चरते हुए भेंड़ेके पास अचानक व्याघ्री पहुँच जाती है और उसे दबोचकर चल देती है, उसी प्रकार मनुष्यका मन जब दूसरी ओर लगा होता है, उसी समय सहसा मृत्यु आ जाती है और उसे लेकर चल देती है ॥ १३ ॥
अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ॥ १४ ॥
इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये। आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायेंगे और मौत आपको खींच ले जायगी ॥ १४ ॥
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् ।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् ॥ १५ ॥
कल किया जानेवाला काम आज ही पूरा कर लेना चाहिये। जिसे सायंकालमें करना है उसे प्रातःकालमें ही कर लेना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम अभी पूरा हुआ या नहीं ॥ १५ ॥
को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति ।
(न मृत्युरामन्त्रयते हर्तुकामो जगत्प्रभुः ।
अबुद्ध एवाक्रमते मीनान् मीनग्रहो यथा ॥)
कौन जानता है कि किसका मृत्युकाल आज ही उपस्थित होगा? सम्पूर्ण जगत्पर प्रभुत्व रखनेवाली मृत्यु जब किसीको हरकर ले जाना चाहती है तो उसे पहलेसे निमन्त्रण नहीं भेजती है। जैसे मछुवारे चुपकेसे आकर मछलियोंको पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी अज्ञात रहकर ही आक्रमण करती है ।।
युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ।। १६ ।। अतः युवावस्थामें ही सबको धर्मका आचरण करना चाहिये; क्योंकि जीवन निःसंदेह अनित्य है। धर्माचरण करनेसे इस लोकमें मनुष्यकी कीर्तिका विस्तार होता है और परलोकमें भी उसे सुख मिलता है ।।
मोहेन हि समाविष्टः पुत्रदारार्थमुद्यतः । कृत्वा कार्यमकार्यं वा पुष्टिमेषां प्रयच्छति ।। १७ ।। जो मनुष्य मोहमें डूबा हुआ है, वही पुत्र और स्त्रीके लिये उद्योग करने लगता है, और करने तथा न करने योग्य काम करके इन सबका पालन-पोषण करता है ।। १७ ।।
तं पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याघ्रो मृगमिव मृत्युरादाय गच्छति ।। १८ ।। जैसे सोये हुए मृगको बाघ उठा ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओंसे सम्पन्न एवं उन्हींमें मनको फँसाये रखनेवाले मनुष्यको एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती है ।। १८ ।।
संचिन्वानकमेवैनं कामानामतिवृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवादाय मृत्युरादाय गच्छति ।। १९ ।। जबतक मनुष्य भोगोंसे तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभीतक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याघ्र किसी पशुको ले जाता है ।।
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्तः कुरुते वशे ।। २० ।। मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा है—इस प्रकार चेष्टाजनित सुखमें आसक्त हुए मानवको काल अपने वशमें कर लेता है ।। २० ।।
कृतानां फलमप्राप्तं कर्मणां कर्मसंज्ञितम् । क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति ।। २१ ।। मनुष्य अपने खेत, दूकान और घरमें ही फँसा रहता है, उसके किये हुए उन कर्मोंका फल मिलने भी नहीं पाता, उसके पहले ही उस कर्मासक्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है ।। २१ ।।
दुर्बलं बलवन्तं च शूरं भीरुं जडं कविम् । अप्राप्तं सर्वकामार्थान् मृत्युरादाय गच्छति ।। २२ ।।
कोई दुर्बल हो या बलवान्, शूरवीर हो या डरपोक तथा मूर्ख हो या विद्वान्, मृत्यु उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है ॥ २२ ॥
मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् ।
अनुषक्तं यदा देहे किं स्वस्थ इव तिष्ठसि ॥ २३ ॥
पिताजी! जब इस शरीरमें मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणोंसे होनेवाले दुःखोंका आक्रमण होता ही रहता है, तब आप स्वस्थ-से होकर क्यों बैठे हैं? ॥ २३ ॥
जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चान्वेति देहिनम् ।
अनुषक्ता द्वयेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः ॥ २४ ॥
देहधारी जीवके जन्म लेते ही अन्त करनेके लिये मौत और बुढ़ापा उसके पीछे लग जाते हैं। ये समस्त चराचर प्राणी इन दोनोंसे बँधे हुए हैं ॥ २४ ॥
मृत्योर्वा मुखमेतद् वै या ग्रामे वसतो रतिः ।
देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुतिः ॥ २५ ॥
ग्राम या नगरमें रहकर जो स्त्री-पुत्र आदिमें आसक्ति बढ़ायी जाती है, यह मृत्युका मुख ही है और जो वनका आश्रय लेता है, यह इन्द्रियरूपी गौओंको बाँधनेके लिये गोशालाके समान है, यह श्रुतिका कथन है ॥
निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः ।
छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥ २६ ॥
ग्राममें रहनेपर वहाँके स्त्री-पुत्र आदि विषयोंमें जो आसक्ति होती है, यह जीवको बाँधनेवाली रस्सीके समान है। पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं ॥ २६ ॥
न हिंसयति यो जन्तून् मनोवाक्कायहेतुभिः ।
जीवितार्थपनयनैः प्राणिभिर्न स हिंस्यते ॥ २७ ॥
जो मनुष्य मन, वाणी और शरीररूपी साधनोंद्वारा प्राणियोंकी हिंसा नहीं करता, उसकी भी जीवन और अर्थका नाश करनेवाले हिंसक प्राणी हिंसा नहीं करते हैं ॥ २७ ॥
न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्चित् प्रबाधते ।
ऋते सत्यमसत् त्याज्यं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् ॥ २८ ॥
सत्यके बिना कोई भी मनुष्य सामने आते हुए मृत्युकी सेनाका कभी सामना नहीं कर सकता; इसलिये असत्यको त्याग देना चाहिये। क्योंकि अमृतत्व सत्यमें ही स्थित है ॥ २८ ॥
तस्मात् सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः ।
सत्यागमः सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् ॥ २९ ॥
अतः मनुष्यको सत्यव्रतका आचरण करना चाहिये। सत्ययोगमें तत्पर रहना और शास्त्रकी बातोंको सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये।