महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सारी प्रजा काम-क्रोध आदिके प्रवाहमें पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधरसे उदासीन-जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम-सम्बन्धी कार्योंके प्रति भी निश्चेष्ट-से दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥
नानुतिष्ठसि धर्मार्थौ न कामे चापि वर्तसे । इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ॥ ७ ॥
धर्म और अर्थ-सम्बन्धी कार्योंका आप अनुष्ठान नहीं करते हैं, काममें भी आपकी प्रवृत्ति नहीं है। आप इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंकी उपेक्षा करके साक्षीके समान मुक्तरूपसे विचरते हैं ॥ ७ ॥
का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने । क्षिप्रमाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रेयो यदिह मन्यसे ॥ ८ ॥
मुने! आपके पास कौन-सी ऐसी बुद्धि, कैसा शास्त्रज्ञान अथवा कौन-सी वृत्ति है, जिससे आपका जीवन ऐसा बन गया है? ब्रह्मन्! आपके मतसे इस जगत्में मेरे लिये जो श्रेयका साधन हो, उसे शीघ्र बतावें ॥ ८ ॥
भीष्म उवाच
अनुयुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रह्रादमनपार्थया ॥ ९ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! प्रह्लादके इस प्रकार पूछनेपर लोक-धर्मके विधानको जाननेवाले उन मेधावी मुनिने उनसे मधुर एवं सार्थक वाणीमें इस प्रकार कहा ॥ ९ ॥
पश्य प्रह्राद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः । ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥ १० ॥
'प्रह्लाद! देखो, इस जगत्के प्राणियोंकी उत्पत्ति, वृद्धि, ह्रास और विनाश कारणरहित सत्स्वरूप परमात्मासे ही हुए हैं; इस कारण मैं उनके लिये न तो हर्ष प्रकट करता हूँ और न व्यथित ही होता हूँ ॥ १० ॥
स्वभावादेव संदृश्या वर्तमानाः प्रवृत्तयः । स्वभावनिरताः सर्वाः परितुष्येन्न केनचित् ॥ ११ ॥
'ऐसा समझना चाहिये, पूर्वकृत कर्मानुसार बने हुए स्वभावसे ही प्राणियोंकी वर्तमान प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई हैं; अतः समस्त प्रजा स्वभावमें ही तत्पर है, उनका दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको किसी भी परिस्थितिमें संतुष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ११ ॥
पश्य प्रह्राद संयोगान् विप्रयोगपरायणान् । संचयांश्च विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः ॥ १२ ॥
‘प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोगमें ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाशमें ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता हूँ ।। १२ ।। अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः। उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ।। १३ ।। ‘जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतोंको नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको जानता है, उसके लिये यहाँ कौन-सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है? ।। १३ ।। जलजानामपि ह्यन्तं पर्यायेणोपलक्षये। महतामपि कायानां सूक्ष्माणां च महोदधौ ।। १४ ।। ‘महासागरके जलमें पैदा होनेवाले विशाल शरीरवाले तिमि आदि मत्स्यों तथा छोटे-छोटे कीड़ोंका भी बारी-बारीसे विनाश होता देखता हूँ ।। १४ ।। जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप। पार्थिवानांमपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ।। १५ ।। ‘असुरराज! पृथ्वीपर भी जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखायी दे रही है ।। १५ ।। अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि ।। १६ ।। ‘दानवश्रेष्ठ! आकाशमें विचरनेवाले बलवान् पक्षियोंके समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है ।। १६ ।। दिवि संचरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये ।। १७ ।। ‘आकाशमें जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय नीचे गिरते देखता हूँ ।। १७ ।। इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना। सर्वसामान्यगो विद्वान् कृतकृत्यः सुखं स्वपे ।। १८ ।। ‘इस प्रकार सारे प्राणियोंको मैं मृत्युके पाशमें बद्ध देखता हूँ; इसलिये तत्त्वको जानकर कृतकृत्य हो सबके प्रति समान भाव रखता हुआ सुखसे सोता हूँ ।। १८ ।। सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लब्धं यदृच्छया। शये पुनरभुञ्जानो दिवसानि बहून्यपि ।। १९ ।। ‘यदि दैवेच्छासे अकस्मात् अधिक भोजन प्राप्त हो जाय तो मैं बहुत खा लेता हूँ, ग्रासमात्र मिले तो उसीमें संतुष्ट रहता हूँ और न मिला तो बहुत दिनोंतक बिना खाये-पीये भी सो रहता हूँ ।। १९ ।। आशयन्त्यपि मामन्नं पुनर्बहुगुणं बहु।
पुनरल्पं पुनःस्तोकं पुनर्नैवोपपद्यते ॥ २० ॥ ‘फिर कितने ही लोग आकर मुझे अनेक गुणोंसे सम्पन्न बहुत-सा अन्न खिला देते हैं। पुनः कभी बहुत थोड़ा, कभी थोड़े-से भी थोड़ा भोजन मिलता है और कभी वह भी नहीं मिलता ॥ २० ॥
कणं कदाचित् खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे । भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान् पुनः ॥ २१ ॥ ‘कभी चावलकी कनी खाता हूँ, कभी तिलकी खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनीके चावलका भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया-घटिया सभी तरहके भोजन बारंबार प्राप्त होते रहते हैं ॥ २१ ॥
शये कदाचित् पर्यङ्के भूमावपि पुनः शये । प्रासादे चापि मे शय्या कदाचिदुपपद्यते ॥ २२ ॥ ‘कभी पलंगपर सोता हूँ, कभी पृथ्वीपर ही पड़ा रहता हूँ और कभी-कभी मुझे महलके भीतर बिछी हुई बहुमूल्य शय्या भी उपलब्ध हो जाती है ॥ २२ ॥
धारयामि च चीराणि शाणक्षौमाजिनानि च । महार्हाणि च वासांसि धारयाम्यहमेकदा ॥ २३ ॥ ‘मैं कभी तो चिथड़े अथवा वल्कल पहनकर रहता हूँ, कभी सनके, कभी रेशमके और कभी मृगचर्मके वस्त्र धारण करता हूँ तथा किसी एक कालमें बहुत-से बहुमूल्य वस्त्रोंको भी पहन लेता हूँ ॥ २३ ॥
न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया । प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुन्ध्ये सुदुर्लभम् ॥ २४ ॥ ‘यदि दैववश मुझे कोई धर्मानुकूल भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाय तो मैं उससे द्वेष नहीं करता हूँ और प्राप्त न होनेपर किसी दुर्लभ भोगकी भी कभी इच्छा नहीं करता ॥ २४ ॥
अचलमनिधनं शिवं विशोकं शुचिमतुलं विदुषां मते प्रविष्टम् । अनभिमतमसेवितं विमूढै- र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २५ ॥ मैं सदा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरवृत्तिका अनुसरण करता हूँ। यह अत्यन्त सुदृढ़, मृत्युसे दूर रखनेवाली, कल्याणमय, शोकहीन, शुद्ध, अनुपम और विद्वानोंके मतके अनुकूल है। मूर्ख मनुष्य न तो इसे मानते हैं और न इसका सेवन ही करते हैं ॥ २५ ॥
अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मात् परिमितसंसरणः परावरज्ञः । विगतभयकषायलोभमोहो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २६ ॥
'मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्मसे च्युत नहीं हुआ हूँ, मेरा सांसारिक व्यवहार परिमित हो गया है, मुझे उत्तम और अधमका ज्ञान है, मेरे हृदयसे भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह दूर हो गये हैं तथा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरोचित व्रतका आचरण करता हूँ॥ २६॥ अनियतफलभक्ष्यभोज्यपेयं विधिपरिणामविभक्तदेशकालम्। हृदयसुखमसेवितं कदर्यै- व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २७ ॥ 'यह अजगर-सम्बन्धी व्रत मेरे हृदयको सुख देनेवाला है। इसमें भक्ष्य, भोज्य, पेय और फल आदिके मिलनेकी कोई नियत व्यवस्था नहीं रहती—अनियतरूपसे जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करना होता है। इस व्रतमें प्रारब्धके परिणामके अनुसार देश और कालका विभाग नियत है। विषयलोलुप नीच पुरुष इसका सेवन नहीं करते, मैं पवित्रभावसे इसी व्रतका आचरण करता हूँ॥ २७॥ इदमिदमिति तृष्णयाभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम्। निपुणमनुनिशम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २८ ॥ 'जो यह मिले, वह मिले, इस प्रकार तृष्णासे दबे रहते हैं और धन न मिलनेके कारण निरन्तर विषाद करते हैं; ऐसे लोगोंकी दशा अच्छी तरह देखकर तात्त्विक बुद्धिसे सम्पन्न हुआ मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ २८॥ बहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः कृपणमहार्यमनार्यमाश्रयन्तम्। उपशमरुचिरात्मवान् प्रशान्तो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २९ ॥ 'मैं बारंबार देखता हूँ कि श्रेष्ठ मनुष्य भी धनके लिये दीनभावसे नीच पुरुषका आश्रय लेते हैं। यह देखकर मेरी रुचि प्रशान्त हो गयी है। अतः मैं अपने स्वरूपको प्राप्त और सर्वथा शान्त हो गया हूँ और पवित्रभावसे इस आजगर-व्रतका आचरण करता हूँ॥ २९॥ सुखमसुखमलाभमर्थलाभं रतिमरतिं मरणं च जीवितं च। विधिनियतमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ ३० ॥ 'सुख-दुःख, लाभ-हानि, अनुकूल और प्रतिकूल तथा जीवन और मरण—ये सब दैवके अधीन हैं। इस प्रकार यथार्थरूपसे जानकर मैं शुद्धभावसे इस आजगरव्रतका आचरण
करता हूँ॥ ३०॥ अपगतभयरागमोहदर्पो धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः। उपगतफलभोगिनो निशम्य व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३१ ॥ ‘मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गये हैं। मैं धृति, मति और बुद्धिसे सम्पन्न एवं पूर्णतया शान्त हूँ। और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आयी हुई वस्तुका ही उपभोग करनेवालोंको देखकर मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३१॥ अनियतशयनासनः प्रकृत्या दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः। अपगतफलसंचयः प्रहृष्टो व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३२ ॥ ‘मेरे सोने-बैठनेका कोई नियत स्थान नहीं है। मैं स्व भावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचारसे सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचयका नाश हो चुका है। मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३२॥ अपगतमसुखार्थमीहनार्थे- रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम्। तृषितमनियतं मनो नियन्तुं व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३३ ॥ ‘जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छाके विषयभूत समस्त पदार्थोंसे जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुषको देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। अतः मैं तृष्णासे व्याकुल असंयत मनको वशमें करनेके लिये पवित्रभावसे इस आजगर-व्रतका आचरण करता हूँ॥ ३३॥ न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च। तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३४ ॥ ‘मन, वाणी और बुद्धिकी उपेक्षा करके इनको प्रिय लगनेवाले विषय-सुखोंकी दुर्लभता तथा अनित्यता—इन दोनोंको देखनेवालेकी भाँति मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३४॥ बहुकथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः कविभिरपि प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम्। इदमिदमिति तत्र तत्र हन्त
स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कयद्भिः ॥ ३५ ॥
‘अपनी कीर्तिका विस्तार करनेवाले विद्वानों और बुद्धिमानोंने अपने और दूसरोंके मतसे गहन तर्क और वितर्क करके ‘ऐसे करना चाहिये' ‘ऐसे करना चाहिये' इत्यादि कहकर इस व्रतकी अनेक प्रकारसे व्याख्या की है ॥ ३५ ॥
तदिदमनुनिशम्य विप्रपातं
पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः ।
अनवसितमनन्तदोषपारं
नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्णः ॥ ३६ ॥
‘मूर्खलोग इस अजगरवृत्तिको सुनकर इसे पहाड़ की चोटीसे गिरनेकी भाँति भयंकर समझते हैं। परंतु उनकी वह मान्यता भिन्न है। मैं इस अजगरवृत्तिको अज्ञानका नाशक और समस्त दोषोंसे रहित मानता हूँ। अतः दोष और तृष्णाका त्याग करके मनुष्योंमें विचरता हूँ’ ॥ ३६ ॥
भीष्म उवाच
अजगरचरितं व्रतं महात्मा
य इह नरोऽनुचरेद् विनीतरागः ।
अपगतभयलोभमोहमन्युः
स खलु सुखी विचरेदिमं विहारम् ॥ ३७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! जो महापुरुष राग, भय, लोभ, मोह और क्रोधको त्यागकर इस आजगर व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें सानन्द विचरण करता है ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि आजगरप्रह्लादसंवादे
एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अजगरवृत्तिसे रहनेवाले मुनि और प्रह्लादका संवादविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥
सद्बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
सद्बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
बान्धवाः कर्म वित्तं वा प्रज्ञा वेह पितामह ।
नरस्य का प्रतिष्ठा स्यादेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! अब मेरे प्रश्नके अनुसार मुझे यह बताइये कि मनुष्यको बन्धुजन, कर्म, धन अथवा बुद्धि—इनमेंसे किसका आश्रय लेना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानां प्रज्ञा लाभः परो मतः ।
प्रज्ञा निःश्रेयसी लोके प्रज्ञा स्वर्गो मतः सताम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! प्राणियोंका प्रधान आश्रय बुद्धि है। बुद्धि ही उनका सबसे बड़ा लाभ है। संसारमें बुद्धि ही उनका कल्याण करनेवाली है। सत्पुरुषोंके मतमें बुद्धि ही स्वर्ग है ॥ २ ॥
प्रज्ञया प्रापितार्थो हि बलि रैश्वर्यसंक्षये ।
प्रह्लादो नमुचिर्मङ्किस्तस्याः किं विद्यते परम् ॥ ३ ॥
राजा बलिने अपना ऐश्वर्य क्षीण हो जानेपर पुनः उसे बुद्धिबलसे ही पाया था। प्रह्लाद, नमुचि और मंकिने भी बुद्धिबलसे ही अपना-अपना अर्थ सिद्ध किया था। संसारमें बुद्धिसे बढ़कर और क्या है? ॥ ३ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इन्द्रकाश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और काश्यपके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो ॥ ४ ॥
वैश्यः कश्चिदृषिसुतं काश्यपं संशितव्रतम् ।
रथेन पातयामास श्रीमान् दृप्तस्तपस्विनम् ॥ ५ ॥
कहते हैं, पूर्वकालमें धनके अभिमानसे मतवाले हुए किसी धनी वैश्यने कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी ऋषिकुमार काश्यपको अपने रथसे धक्के देकर गिरा दिया ॥ ५ ॥
आर्तः स पतितः क्रुद्धस्त्यक्त्वाऽऽत्मानमथाब्रवीत् ।
मरिष्याम्यधनस्येह जीवितार्थो न विद्यते ॥ ६ ॥
वे पीड़ासे कराहकर गिर पड़े और कुपित होकर आत्महत्याके लिये उद्यत हो इस प्रकार बोले—‘अब मैं प्राण दे दूँगा; क्योंकि इस संसारमें निर्धन मनुष्यका जीवन व्यर्थ है’ ॥ ६ ॥ तथा मुमूर्षमासीनमकूजन्तमचेतसम् । इन्द्रः शृगालरूपेण बभाषे लुब्धमानसम् ॥ ७ ॥ उन्हें इस प्रकार मरनेकी इच्छा लेकर बैठे मूर्च्छासे अचेत हो कुछ न बोलते और मन-ही-मन धनके लिये ललचाते देखकर इन्द्रदेव सियारका रूप धारण करके आये और उनसे इस प्रकार कहने लगे— ॥ ७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1169)
अध्याय (पृष्ठ 1170)
इन्द्रको पहचाननेपर काश्यपद्वारा उनकी पूजा
मनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः । मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति ॥ ८ ॥ ‘मुने! सभी प्राणी सब प्रकारसे मनुष्ययोनि पानेकी इच्छा रखते हैं। उसमें भी ब्राह्मणत्वकी प्रशंसा तो सभी लोग करते हैं॥ ८॥
मनुष्यो ब्राह्मणश्चासि श्रोत्रियश्चासि काश्यप । सुदुर्लभमवाप्यैतन्न दोषान्मर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥ ‘काश्यप! आप तो मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं और श्रोत्रिय भी हैं। ऐसा परम दुर्लभ शरीर पाकर आपको उसमें दोषदृष्टि करके स्वयं ही मरनेके लिये उद्यत होना उचित नहीं है॥ ९॥
सर्वे लाभाः साभिमाना इति सत्यवती श्रुतिः । संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद् यदभिमन्यसे ॥ १० ॥ ‘संसारमें जितने लाभ हैं, वे सभी अभिमानपूर्ण हैं, ऐसा सत्य अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका कथन है (अर्थात् मैंने यह लाभ अपने पुरुषार्थसे किया है, ऐसा अहंकार प्रायः सभी मनुष्य कर लेते हैं)। आपका स्वरूप तो संतोष रखनेके योग्य है। आप लोभवश ही उसकी अवहेलना करते हैं॥ १०॥
अहो सिद्धार्थता तेषां येषां सन्तीह पाणयः । अतीव स्पृहये तेषां येषां सन्तीह पाणयः ॥ ११ ॥ ‘अहो! जिनके पास भगवान्के दिये हुए हाथ हैं, उनको तो मैं कृतार्थ मानता हूँ। इस जगत्में जिनके पास एकसे अधिक हाथ हैं, उनके-जैसा सौभाग्य पानेकी इच्छा मुझे बारंबार होती है॥ ११॥
पाणिमद्भ्यः स्पृहास्माकं यथा तव धनस्य वै । न पाणिलाभादधिको लाभः कश्चन विद्यते ॥ १२ ॥ ‘जैसे आपके मनमें धनकी लालसा है, उसी प्रकार हम पशुओंको हाथवाले मनुष्योंसे हाथ पानेकी अभिलाषा रहती है। हमारी दृष्टिमें हाथ मिलनेसे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं ॥ १२॥
अपाणित्वाद् वय ब्रह्मन् कण्टकं नोद्धरामहे । जन्तूनुच्चावचानङ्गे दशतो न कषाम वा ॥ १३ ॥ ‘ब्रह्मन्! हमारे शरीरमें काँटे गड़ जाते हैं; परंतु हाथ न होनेसे हम उन्हें निकाल नहीं पाते हैं। जो छोटे-बड़े जीव-जन्तु हमारे शरीरमें डँसते हैं, उनको भी हम हटा नहीं सकते ॥ १३॥
अथ येषां पुनः पाणी देवदत्तौ दशाङ्गुली । उद्धरन्ति कृमीनङ्गाद् दशतो निकषन्ति च ॥ १४ ॥
'परंतु जिनके पास भगवान्के दिये हुए दस अंगुलियोंसे युक्त दो हाथ हैं, वे अपने अंगोंसे उन कीड़ोंको हटाते या नष्ट कर देते हैं, जो उन्हें डँसते हैं ।। १४ ।।
वर्षाहिमातपानां च परित्राणानि कुर्वते । चैलमन्नं सुखं शय्यां निवातं चोपभुञ्जते ॥ १५ ॥ 'वे वर्षा, सर्दी और धूपसे अपनी रक्षा कर लेते हैं, कपड़ा पहनते हैं, सुखपूर्वक अन्न खाते हैं, शय्या बिछाकर सोते हैं तथा एकान्त स्थानका उपभोग करते हैं ।। १५ ।।
अधिष्ठाय च गां लोके भुञ्जते वाहयन्ति च । उपायैर्बहुभिश्चैव वश्यानात्मनि कुर्वते ॥ १६ ॥ 'हाथवाले मनुष्य बैलोंसे जुती हुई गाड़ीपर चढ़कर उन्हें हाँकते हैं और जगत्में उनका यथेष्ट उपभोग करते हैं तथा हाथसे ही अनेक प्रकारके उपाय करके लोगोंको अपने वशमें कर लेते हैं ।। १६ ।।
ये खल्वजिह्वाः कृपणा अल्पप्राणा अपाणयः । सहन्ते तानि दुःखानि दिष्ट्या त्वं न तथा मुने ॥ १७ ॥ 'मुने! जो दुःख बिना हाथके दीन, दुर्बल और बेजबान प्राणी सहते हैं, सौभाग्यवश वे तो आपको नहीं सहने पड़ते हैं ।। १७ ।।
दिष्ट्या त्वं न शृगालो वै न कृमिर्न च मूषकः । न सर्पो न च मण्डूको न चान्यः पापयोनिजः ॥ १८ ॥ 'आपका बड़ा भाग्य है कि आप गीदड़, कीड़ा, चूहा, साँप, मेढ़क या किसी दूसरी पापयोनिमें नहीं उत्पन्न हुए ।। १८ ।।
एतावतापि लाभेन तोष्टुमर्हसि काश्यप । किं पुनर्योऽसि सत्त्वानां सर्वेषां ब्राह्मणोत्तमः ॥ १९ ॥ 'काश्यप! आपको इतने ही लाभसे संतुष्ट रहना चाहिये। इससे अधिक लाभ क्या होगा कि आप सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं ।। १९ ।।
इमे मां कृमयोऽदन्ति येषामुद्धरणाय वै । नास्ति शक्तिरपाणित्वात् पश्यावस्थामिमां मम ॥ २० ॥ 'मुझे ये कीड़े खा रहे हैं, जिन्हें निकाल फेंकनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। हाथ न होनेके कारण होनेवाली मेरी इस दुर्दशाको आप प्रत्यक्ष देख लें ।। २० ।।
अकार्यमिति चैवेमं नात्मानं संत्यजाम्यहम् । नातः पापीयसीं योनिं पतेयमपरामिति ॥ २१ ॥ 'आत्महत्या करना पाप है; यह सोचकर ही मैं अपने इस शरीरका परित्याग नहीं करता हूँ। मुझे भय है कि मैं इससे भी बढ़कर किसी दूसरी पापयोनिमें न गिर जाऊँ ।। २१ ।।
मध्ये वै पापयोनीनां शार्गालीं यामहं गतः । पापीयस्यो बहुतरा इतोऽन्याः पापयोनयः ॥ २२ ॥
'यद्यपि मैं इस समय जिस शृगालयोनिमें हूँ, इसकी गणना भी पापयोनियोंमें ही है, तथापि दूसरी बहुत-सी पापयोनियाँ इससे भी नीची श्रेणीकी हैं ॥ २२ ॥ जात्यैवैके सुखितराः सन्त्यन्ये भृशदुःखिताः । नैकान्तं सुखमेवेह क्वचित्पश्यामि कस्यचित् ॥ २३ ॥ 'कुछ देवता आदि जातिसे ही सुखी हैं, दूसरे पशु आदि जातिसे ही अत्यन्त दुखी हैं; परंतु मैं कहीं किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सर्वथा सुख ही सुख हो ॥ २३ ॥ मनुष्या ह्याढ्यतां प्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् । राज्याद् देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ॥ २४ ॥ 'मनुष्य धनी हो जानेपर राज्य पाना चाहते हैं, राज्यसे देवत्वकी इच्छा करते हैं और देवत्वसे फिर इन्द्रपद प्राप्त करना चाहते हैं ॥ २४ ॥ भवेस्त्वं यद्यपि त्वाढ्यो न राजा न च दैवतम् । देवत्वं प्राप्य चेन्द्रत्वं नैव तुष्येस्तथा सति ॥ २५ ॥ 'यदि आप धनी हो जायँ तो भी ब्राह्मण होनेके कारण राजा नहीं हो सकते। यदि कदाचित् राजा हो जायँ तो देवता नहीं हो सकते। देवता और इन्द्रका पद भी पा जायँ तो भी आप उतनेसे संतुष्ट नहीं रह सकेंगे ॥ २५ ॥ न तृप्तिः प्रियलाभेऽस्ति तृष्णा नाद्भिः प्रशाम्यति । सम्प्रज्वलति सा भूयः समिद्भिरिव पावकः ॥ २६ ॥ 'प्रिय वस्तुओंका लाभ होनेसे कभी तृप्ति नहीं होती। बढ़ती हुई तृष्णा जलसे नहीं बुझती। ईंधन पाकर जलनेवाली आगके समान वह और भी प्रज्वलित होती जाती है ॥ २६ ॥ अस्त्येव त्वयि शोकोऽपि हर्षश्चापि तथा त्वयि । सुखदुःखे तथा चोभे तत्र का परिदेवना ॥ २७ ॥ 'तुम्हारे भीतर शोक भी है और हर्ष भी। साथ ही सुख और दुःख दोनों हैं; फिर शोक करना किस कामका? ॥ २७ ॥ परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् । मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥ २८ ॥ 'बुद्धि और इन्द्रियाँ ही समस्त कामनाओं और कर्मोंकी मूल हैं। उन्हें पिंजड़ेमें बंद पक्षियोंकी तरह अपने काबूमें रखा जाय तो कोई भय नहीं है ॥ २८ ॥ न द्वितीयस्य शिरसच्छेदं विद्यते क्वचित् । न च पाणेस्तृतीयस्य यन्नास्ति न ततो भयम् ॥ २९ ॥ 'मनुष्यको दूसरे सिर और तीसरे हाथके कटनेका कभी भय नहीं होता है। जो वास्तवमें है ही नहीं, उसके कारण भय भी नहीं होता है ॥ २९ ॥ न खल्वप्यरसज्ञस्य कामः क्वचन जायते ।
संस्पर्शाद् दर्शनाद् वापि श्रवणाद् वापि जायते ॥ ३० ॥ ‘जो किसी विषयका रस नहीं जानता, उसके मनमें कभी उसकी कामना भी नहीं होती। स्पर्शसे, दर्शनसे अथवा श्रवणसे भी कामनाका उदय होता है ॥ ३० ॥ न त्वं स्मरसि वारुण्या लट्वाकानां च पक्षिणाम् । ताभ्यां चाभ्यधिको भक्ष्यो न कश्चिद् विद्यते क्वचित् ॥ ३१ ॥ ‘वारुणी मदिरा तथा चिड़िया—इन दोनोंका आप कभी स्मरण नहीं करते होंगे; क्योंकि इनको आपने नहीं खाया है; परंतु (जो तामसी मनुष्य इनको खाते हैं उनके लिये) कहीं और कोई भी भक्ष्य पदार्थ उन दोनोंसे बढ़कर नहीं है ॥ ३१ ॥ यानि चान्यानि भूतेषु भक्ष्यजातानि कस्यचित् । येषामभुक्तपूर्वाणि तेषामस्मृतिरेव ते ॥ ३२ ॥ ‘प्राणियोंमें किसीके भी जो अन्यान्य भक्ष्य पदार्थ हैं, जिनका तुमने पहले उपभोग नहीं किया है, उन भोजनोंकी स्मृति तुमको कभी नहीं होगी ॥ ३२ ॥ अप्राशनमसंस्पर्शमसंदर्शनमेव च । पुरुषस्यैष नियमो मन्ये श्रेयो न संशयः ॥ ३३ ॥ ‘मैं ऐसा मानता हूँ कि किसी वस्तुको न खाने, न छूने और न देखनेका नियम लेना ही पुरुषके लिये कल्याणकारी है, इसमें संशय नहीं ॥ ३३ ॥ पाणिमन्तो बलवन्तो धनवन्तो न संशयः । मनुष्या मानुषैरेव दासत्वमुपपादिताः ॥ ३४ ॥ ‘जिनके दोनों हाथ बने हुए हैं, निस्संदेह वे ही बलवान् और धनवान् हैं। मनुष्योंको तो मनुष्योंने ही दास बना रखा है ॥ ३४ ॥ वधबन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्ते च पुनः पुनः । ते खल्वपि रमन्ते च मोदन्ते च हसन्ति च ॥ ३५ ॥ ‘कितने ही मनुष्य बारंबार वध और बन्धनके क्लेश भोगते रहते हैं, परंतु वे भी (आत्महत्या करके प्राण नहीं देते, बल्कि) आपसमें क्रीड़ा करते, आनन्दित होते और हँसते हैं ॥ ३५ ॥ अपरे बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । जुगुप्सितां च कृपणां पापवृत्तिमुपासते ॥ ३६ ॥ ‘दूसरे बहुत-से बाहुबलसे सम्पन्न विद्वान् और मनस्वी मनुष्य दीन, निन्दित एवं पापपूर्ण वृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ ३६ ॥ उत्साहन्ते च ते वृत्तिमन्यामप्युपसेवितुम् । स्वकर्मणा तु नियतं भवितव्यं तु तत् तथा ॥ ३७ ॥ ‘वे दूसरी वृत्तिका सेवन करनेके लिये भी उत्साह रखते हैं; परंतु अपने कर्मके अनुसार जो नियत है, वैसा ही भविष्यमें होता है ॥ ३७ ॥
न पुल्कसो न चाण्डाल आत्मानं त्यक्तुमिच्छति । तया तुष्टः स्वया योन्या मायां पश्यस्व यादृशीम् ॥ ३८ ॥ 'भंगी अथवा चाण्डाल भी अपने शरीरको त्यागना नहीं चाहता है, वह अपनी उसी योनिसे संतुष्ट रहता है। देखिये, भगवान्की कैसी माया है? ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा कुणीन् पक्षहतान् मनुष्यानामयाविनः । सुसम्पूर्णः स्वया योन्या लब्धलाभोऽसि काश्यप ॥ ३९ ॥ 'काश्यप! कुछ मनुष्य लूले और लँगड़े हैं, कुछ लोगोंको लकवा मार गया है, बहुत-से मनुष्य निरन्तर रोगी ही रहते हैं। उन सबकी ओर देखकर यह कहना पड़ता है कि आप अपनी योनिके अनुसार नीरोग और परिपूर्ण अंगवाले हैं। आपको मानवशरीरका लाभ मिल चुका है ॥ ३९ ॥
यदि ब्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामयः । अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ॥ ४० ॥ 'ब्राह्मणदेव! यदि आपका शरीर निर्भय और नीरोग है, आपके सारे अंग ठीक हैं, किसीमें कोई विकार नहीं आया है तो लोकमें कोई भी आपको धिक्कार नहीं सकता—आप धिक्कारके पात्र नहीं हो सकते ॥ ४० ॥
न केनचित् प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा । धर्मायोत्तिष्ठ विप्रर्षे नात्मानं त्यक्तुमर्हसि ॥ ४१ ॥ 'यदि आपपर जातिच्युत करनेवाला कोई सच्चा कलंक लगा हो तो भी आपको प्राणत्यागका विचार नहीं करना चाहिये। ब्रह्मर्षे! आप धर्मपालनके लिये उठ खड़े होइये ॥ ४१ ॥
यदि ब्रह्मन् शृणोष्येतच्छ्रद्दधासि च मे वचः । वेदोक्तस्यैव धर्मस्य फलं मुख्यमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥ 'ब्रह्मन्! यदि आप मेरी बात सुनेंगे और उसपर श्रद्धा करेंगे तो आपको वेदोक्त धर्मके पालनका ही मुख्य फल प्राप्त होगा ॥ ४२ ॥
स्वाध्यायमग्निसंस्कारमप्रमत्तोऽनुपालय । सत्यं दमं च दानं च स्पर्धिष्ठा मा च केनचित् ॥ ४३ ॥ 'आप सावधान होकर स्वाध्याय, अग्निहोत्र, सत्य, इन्द्रियसंयम तथा दानधर्मका पालन कीजिये। किसीके साथ स्पर्धा न कीजिये ॥ ४३ ॥
ये केचन स्वध्ययनाः प्राप्ता यजनयाजनम् । कथं ते चानुशोचेयुर्धायेयुर्वाप्यशोभनम् । इच्छन्तस्ते विहाराय सुखं महदवाप्नुयुः ॥ ४४ ॥ 'जो ब्राह्मण स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा यज्ञ करते और कराते हैं, वे किसी प्रकारकी चिन्ता क्यों करेंगे और कोई आत्महत्या आदि बुरी बात भी क्यों सोचेंगे? वे यदि चाहें तो
यज्ञादिके द्वारा विहार करते हुए महान् सुख पा सकते हैं ॥ ४४ ॥
उत जाताः सुनक्षत्रे सुतिथौ सुमुहूर्तजाः ।
यज्ञदानप्रजेहायां यतन्ते शक्तिपूर्वकम् ॥ ४५ ॥
‘जो उत्तम नक्षत्र, उत्तम तिथि और उत्तम मुहूर्तमें पैदा हुए हैं, वे अपनी शक्तिके अनुसार यज्ञ एवं दान करते और न्यायाानुकूल संतानोत्पादनकी चेष्टा भी करते हैं ॥ ४५ ॥
नक्षत्रेष्वासुरेष्वन्ये दुस्तिथौ दुर्मुहूर्तजाः ।
सम्पतन्त्यासुरीं योनिं यज्ञप्रसववर्जिताः ॥ ४६ ॥
‘दूसरे जो लोग आसुर नक्षत्र, दूषित तिथि तथा अशुभ मुहूर्तमें उत्पन्न होते हैं, वे यज्ञ तथा संतानसे रहित होकर आसुरी योनिमें पड़ते हैं ॥ ४६ ॥
अहमासं पण्डितको हेतुको वेदनिन्दकः ।
आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ ४७ ॥
‘पूर्वजन्ममें मैं एक पण्डित था और कुतर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता था। प्रत्यक्षके आधारपर अनुमानको प्रधानता देनेवाली थोथी तर्कविद्यापर ही उस समय मेरा अधिक अनुराग था ॥ ४७ ॥
हेतुवादान् प्रवदिता वक्ता संसत्सु हेतुमत् ।
आक्रोष्टा चाभिवक्ता च ब्रह्मवाक्येषु च द्विजान् ॥ ४८ ॥
‘मैं सभाओंमें जाकर तर्क और युक्तिकी बातें ही अधिक बोलता। जहाँ दूसरे ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक वेद-वाक्योंपर विचार करते, वहाँ मैं बलपूर्वक आक्रमण करके उन्हें खरी-खोटी सुना देता और स्वयं ही अपना तर्कवाद बका करता था ॥ ४८ ॥
नास्तिकः सर्वशङ्की च मूर्खः पण्डितमानिकः ।
तस्येयं फलनिर्वृत्तिः शृगालत्वं मम द्विज ॥ ४९ ॥
‘मैं नास्तिक, सबपर संदेह करनेवाला तथा मूर्ख होकर भी अपनेको पण्डित माननेवाला था। विप्रवर! यह शृगालयोनि मेरे उसी कुकर्मका फल है ॥ ४९ ॥
अपि जातु तथा तस्मादहोरात्रशतैरपि ।
यदहं मानुषीं योनिं शृगालः प्राप्नुयां पुनः ॥ ५० ॥
अब मैं सैकड़ों दिन-रातोंतक साधन करके भी क्या कभी वह उपाय कर सकता हूँ, जिससे आज सियारकी योनिमें पड़ा हुआ मैं पुनः वह मनुष्ययोनि पा सकूँ ॥
संतुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतिः ।
ज्ञेयज्ञाता भवेयं वै वर्ज्यवर्जयिता तथा ॥ ५१ ॥
‘जिस मनुष्ययोनिमें मैं संतुष्ट और सावधान रहकर यज्ञ, दान और तपस्यामें लगा रह सकूँ, जिसमें मैं जाननेयोग्य वस्तुको जान लूँ और त्यागनेयोग्य वस्तुका त्याग कर दूँ’ ॥ ५१ ॥
ततः स मुनिरुत्थाय काश्यपस्तमुवाच ह ।
अहो बतासि कुशलो बुद्धिमांश्चेति विस्मितः ॥ ५२ ॥
यह सुनकर काश्यप मुनि आश्चर्यसे चकित होकर खड़े हो गये और बोले—'अहो! तुम तो बड़े कुशल और बुद्धिमान् हो' ॥ ५२ ॥
समवैक्षत तं विप्रो ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा ।
ददर्श चैनं देवानां देवमिन्द्रं शचीपतिम् ॥ ५३ ॥
ऐसा कहकर ब्रह्मर्षिने उसकी ओर ज्ञानदृष्टिसे देखा। तब उसके रूपमें इन्हें देवदेव शचीपति इन्द्र दिखायी दिये ॥ ५३ ॥
ततः सम्पूजयामास काश्यपो हरिवाहनम् ।
अनुज्ञातस्तु तेनाथ प्रविवेश स्वमालयम् ॥ ५४ ॥
तदनन्तर काश्यपने इन्द्रदेवका पूजन किया और उनकी आज्ञा लेकर वे पुनः अपने घरको लौट गये ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शृगालकाश्यपसंवादे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गीदड़ और काश्यपका संवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥
१८१-
एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन
युधिष्ठिर उवाच
यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च ।
गुरूणां वापि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि दान, यज्ञ, तप अथवा गुरुशुश्रूषा पुण्यकर्म है और उसका कुछ फल होता है तो वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
आत्मनानर्थयुक्तेन पापे निविशते मनः ।
स्वकर्मकलुषं कृत्वा कृच्छ्रे लोके विधीयते ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! काम, क्रोध आदि दोषोंसे युक्त बुद्धिकी प्रेरणासे मन पापकर्ममें प्रवृत्त होता है। इस प्रकार मनुष्य अपने ही कार्योंद्वारा पाप करके दुःखमय लोक (नरक) में गिराया जाता है ॥ २ ॥
दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात् क्लेशं भयाद् भयम् ।
मृतेभ्यः प्रमृतं यान्ति दरिद्राः पापकारिणः ॥ ३ ॥
पापाचारी दरिद्र मनुष्य दुर्भिक्षसे दुर्भिक्ष, क्लेशसे क्लेश और भयसे भय पाते हुए मरे हुओंसे भी अधिक मृतकतुल्य हो जाते हैं ॥ ३ ॥
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात् स्वर्गं सुखात् सुखम् ।
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनाढ्याः शुभकारिणः ॥ ४ ॥
जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, धनसम्पन्न तथा शुभकर्म-परायण होते हैं, वे उत्सवसे अधिक उत्सवको, स्वर्गसे अधिक स्वर्गको तथा सुखसे अधिक सुखको प्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥
व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचोरभयेषु च ।
हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ॥ ५ ॥
नास्तिक मनुष्योंके हाथमें हथकड़ी डालकर राजा उन्हें राज्यसे दूर निकाल देता है और वे उन जंगलोंमें चले जाते हैं, जो मतवाले हाथियोंके कारण दुर्गम तथा सर्प और चोर आदिके भयसे भरे हुए होते हैं। इससे बढ़कर उन्हें और क्या दण्ड मिल सकता है? ॥ ५ ॥
प्रियदेवातिथेयाश्च वदान्याः प्रियसाधवः ।
क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ॥ ६ ॥
जिन्हें देवपूजा और अतिथिसत्कार प्रिय है, जो उदार हैं तथा श्रेष्ठ पुरुष जिन्हें अच्छे लगते हैं, वे पुण्यात्मा मनुष्य अपने दाहिने हाथके समान मंगलकारी एवं मनको वशमें रखनेवाले योगियोंको ही प्राप्त होनेयोग्य मार्गपर आरूढ़ होते हैं॥ ६॥
पुलाका इव धान्येषु पुत्तिका इव पक्षिषु।
तद्विधास्ते मनुष्याणां येषां धर्मो न कारणम्॥ ७॥
जिनका उद्देश्य धर्म नहीं है, ऐसे मनुष्य मानव-समाजके भीतर वैसे ही समझे जाते हैं, जैसे धानमें थोथा पौधा और पंखवाले जीवोंमें मच्छर॥ ७॥
सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति।
शेते सह शयानेन येन येन यथा कृतम्॥ ८॥
उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति।
करोति कुर्वतः कर्म छायेवानुविधीयते॥ ९॥
जिस-जिस मनुष्यने जैसा कर्म किया है, वह उसके पीछे लगा रहता है। यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजीके साथ उसके पीछे जाता है। जब वह सोता है तो उसका कर्मफल भी उसके साथ ही सो जाता है। जब वह खड़ा होता है तो वह भी पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है तो उसके पीछे-पीछे वह भी चलने लगता है। इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म-संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता। सदा छायाके समान पीछे लगा रहता है॥ ८-९॥
येन येन यथा यद् यत् पुरा कर्म समीहितम्।
तत्तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना॥ १०॥
जिस-जिस मनुष्यने अपने-अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे-जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है॥ १०॥
स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम्।
भूतग्राममिमं कालः समन्तात् परिकर्षति॥ ११॥
अपने-अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, जो कर्मजनित अदृष्टके द्वारा सुरक्षित रहता है। उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस कर्मफलको प्राणिसमुदायके पास खींच लाता है॥ ११॥
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम्॥ १२॥
जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते॥ १२॥
सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ।
प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पुनः पुनः॥ १३॥
सम्मान-अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति-अवनति—ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार बार-बार प्राप्त होते हैं और प्रारब्धभोगके पश्चात् निवृत्त हो जाते हैं ।।
आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् ।
गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ।। १४ ।।
दुःख अपने ही किये हुए कर्मोंका फल है और सुख भी अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है। जीव माताकी गर्भशय्यामें आते ही पूर्वशरीरद्वारा उपार्जित सुख-दुःखका उपभोग करने लगता है ।। १४ ।।
बालो युवा च वृद्धश्च यत् करोति शुभाशुभम् ।
तस्यां तस्यामवस्थायां तत् फलं प्रतिपद्यते ।। १५ ।।
कोई बालक हो, तरुण हो या बूढ़ा हो, वह जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, दूसरे जन्ममें उसी-उसी अवस्थामें उस-उस कर्मका फल उसे प्राप्त होता है ।।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ।। १६ ।।
जैसे बछड़ा हजारों गौओंमेंसे अपनी माँको पहचानकर उसे पा लेता है, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी अपने कर्ताके पास पहुँच जाता है ।। १६ ।।
समुन्नमग्रतो वस्त्रं पश्चाच्छुध्यति कर्मणा ।
उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ।। १७ ।।
जैसे पहलेसे क्षार आदिमें भिगोया हुआ कपड़ा पीछे धोनेसे साफ हो जाता है, उसी प्रकार जो उपवासपूर्वक तपस्या करते हैं, उन्हें कभी समाप्त न होनेवाला महान् सुख मिलता है ।। १७ ।।
दीर्घकालेन तपसा सेवितेन तपोवने ।
धर्मनिर्धूतपापानां सम्पद्यन्ते मनोरथाः ।। १८ ।।
तपोवनमें रहकर की हुई दीर्घकालतककी तपस्यासे तथा धर्मसे जिनके सारे पाप धुल गये हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सफल हो जाते हैं ।। १८ ।।
शकुनानामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके ।
पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः ।। १९ ।।
जैसे आकाशमें पक्षियोंके और जलमें मछलियोंके चरण-चिह्न दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार ज्ञानियोंकी गतिका पता नहीं चलता ।। १९ ।।
अलमन्यैरूपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः ।
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ।। २० ।।
दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। जो काम सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ।। २० ।।