महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२३५-
पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणके कर्तव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना
व्यास उवाच
त्रयीं विद्यामवेक्षेत वेदेषूक्तामथाङ्गतः ।
ऋक्सामवर्णाक्षरतो यजुषोऽथर्वणस्तथा ॥ १ ॥
तिष्ठत्ये तेषु भगवान् षट्सु कर्मसु संस्थितः ।
व्यासजी कहते हैं— बेटा! ब्राह्मणको चाहिये कि वेदोंमें बतायी गयी त्रयी विद्या—‘अ उ म्’ इन तीन अक्षरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली प्रणवविद्याका चिन्तन एवं विचार करे। वेदके छहों अंगोंसहित ऋक्, साम, यजुष् एवं अथर्वके मन्त्रोंका स्वर-व्यंजनके सहित अध्ययन करे; क्योंकि यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें विराजमान भगवान् धर्म ही इन वेदोंमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १ ½ ॥
वेदवादेषु कुशला ह्यध्यात्मकुशलाश्च ये ॥ २ ॥
सत्त्ववन्तो महाभागाः पश्यन्ति प्रभवाप्ययौ ।
एवं धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ॥ ३ ॥
जो लोग वेदोंके प्रवचनमें निपुण, अध्यात्मज्ञानमें कुशल, सत्त्वगुणसम्पन्न और महान् भाग्यशाली हैं, वे जगत्की सृष्टि और प्रलयको ठीक-ठीक जानते हैं; अतः ब्राह्मणको इस प्रकार धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए शिष्ट पुरुषोंकी भाँति सदाचारका पालन करना चाहिये ॥ २-३ ॥
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत वै द्विजः ।
सद्भ्य आगतविज्ञानः शिष्टः शास्त्रविचक्षणः ॥ ४ ॥
ब्राह्मण किसी भी जीवको कष्ट न देकर—उसकी जीविकाका हनन न करके अपनी जीविका चलानेकी इच्छा करे। संतोंकी सेवामें रहकर तत्त्वज्ञान प्राप्त करे, सत्पुरुष बने और शास्त्रकी व्याख्या करनेमें कुशल हो ॥ ४ ॥
स्वधर्मेण क्रिया लोके कुर्वाणः सत्यसंगरः ।
तिष्ठते तेषु गृहवान् षट्सु कर्मसु स द्विजः ॥ ५ ॥
जगत्में अपने धर्मके अनुकूल कर्म करे, सत्यप्रतिज्ञ बने। गृहस्थ ब्राह्मणको पूर्वोक्त छः कर्मोंमें ही स्थित रहना चाहिये ॥ ५ ॥
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च ।
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ॥ ६ ॥
सदा श्रद्धापूर्वक पञ्च-महायज्ञोंद्वारा परमात्माका पूजन करे, सर्वदा धैर्य धारण करे। प्रमाद (अकर्तव्य कर्मको करने और कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करने) से बचे, इन्द्रियोंको संयममें रखे, धर्मका ज्ञाता बने और मनको भी अपने अधीन रखे ॥ ६ ॥
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ।
दानमध्ययनं यज्ञस्तपो ह्रीरार्जवं दमः ॥ ७ ॥
एतैर्वर्धयते तेजः पाप्मानं चापकर्षति ।
जो ब्राह्मण हर्ष, मद और क्रोधसे रहित है, उसे कभी दुःख नहीं उठाना पड़ता है। दान, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, लज्जा, सरलता और इन्द्रियसंयम—इन सद्गुणोंसे ब्राह्मण अपने तेजकी वृद्धि और पापका नाश करता है ॥ ७ १/२ ॥
धूतपाप्मा च मेधावी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ।
इस प्रकार पाप धुल जानेपर बुद्धिमान् ब्राह्मण स्वल्पाहार करते हुए इन्द्रियोंको जीते और काम तथा क्रोधको अधीन करके ब्रह्मपदको प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ ८ १/२ ॥
अग्नींश्च ब्राह्मणांश्चार्चेद् देवताः प्रणमेत च ॥ ९ ॥
वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसां चाधर्मसंहिताम् ।
एषा पूर्वगता वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ॥ १० ॥
अग्नि, ब्राह्मण और देवताओंको प्रणाम एवं उनका पूजन करे। कड़वी बात मुँहसे न निकाले और हिंसा न करे; क्योंकि वह अधर्मसे युक्त है। यह ब्राह्मणके लिये परम्परागत वृत्ति (कर्तव्य) का विधान किया गया है ॥ ९-१० ॥
ज्ञानागमेन कर्माणि कुर्वन् कर्मसु सिध्यति ।
पञ्चेन्द्रियजलां घोरां लोभकूलां सुदुस्तराम् ॥ ११ ॥
मन्युपङ्कामनाधृष्यां नदीं तरति बुद्धिमान् ।
कालमभ्युद्यतं पश्येन्नित्यमत्यन्तमोहनम् ॥ १२ ॥
कर्मोंके तत्त्वको जानकर उनका अनुष्ठान करनेसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। संसारका जीवन एक भयंकर नदीके समान है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इस नदीका जल हैं। लोभ किनारा है। क्रोध इसके भीतर कीचड़ है। इसे पार करना अत्यन्त कठिन है और इसके वेगको दबाना अत्यन्त असम्भव है, तथापि बुद्धिमान् पुरुष इसे पार कर जाता है। प्राणियोंको अत्यन्त मोहमें डालनेवाला काल सदा आक्रमण करनेके लिये उद्यत है, इस बातकी ओर सदा ही दृष्टि रखे ॥ ११-१२ ॥
महता विधिदृष्टेन बलेनाप्रतिघातिना ।
स्वभावस्रोतसा वृत्तमुह्यते सततं जगत् ॥ १३ ॥
जो महान् है, जो विधाताकी ही दृष्टिमें आ सकता है तथा जिसका बल कहीं प्रतिहत नहीं होता, उस स्वाभावरूप धारा-प्रवाहमें यह सारा जगत् निरन्तर बहता जा रहा
है ॥ १३ ॥
कालोदकेन महता वर्षावर्तेन संततम्।
मासोर्मिणर्तुवेगेन पक्षोलपत्तृणेन च ॥ १४ ॥
निमेषोन्मेषफेनेन अहोरात्रजलेन च।
कामग्राहेण घोरेण वेदयज्ञप्लवेन च ॥ १५ ॥
धर्मद्वीपेन भूतानां चार्थकामजलेन च।
ऋतवाङ्मोक्षतीरेण विहिंसातरुवाहिना ॥ १६ ॥
युगह्रदौघमध्येन ब्रह्मप्राप्यभवेन च।
धात्रा सृष्टानि भूतानि कृष्यन्ते यमसादनम् ॥ १७ ॥
कालरूपी महान् नद बह रहा है। इसमें वर्षरूपी भँवरें सदा उठ रही हैं। महीने इसकी उत्ताल तरंगें हैं। ऋतु वेग हैं। पक्ष लता और तृण हैं। निमेष और उन्मेष फेन हैं। दिन और रात जल-प्रवाह हैं। कामदेव भयंकर ग्राह है। वेद और यज्ञ नौका हैं। धर्म प्राणियोंका आश्रयभूत द्वीप है। अर्थ और काम जल हैं। सत्यभाषण और मोक्ष दोनों किनारे हैं। हिंसारूपी वृक्ष उस कालरूपी प्रवाहमें बह रहे हैं। युग ह्रद है तथा ब्रह्म ही उस कालनदको उत्पन्न करनेवाला पर्वत है। उसी प्रवाहमें पड़कर विधाताके रचे हुए समस्त प्राणी यमलोककी ओर खिंचे चले जा रहे हैं ॥ १४—१७ ॥
एतत् प्रज्ञामयैर्धीरा निस्तरन्ति मनीषिणः।
प्लवैरप्लववन्तो हि किं करिष्यन्त्यचेतसः ॥ १८ ॥
बुद्धिमान् और धीर मनुष्य प्रज्ञारूप नौकाओंद्वारा उस कालनदके पार हो जाते हैं। जो वैसी नौकाओंसे रहित हैं, वे अविवेकी मनुष्य क्या करेंगे? ॥ १८ ॥
उपपन्नं हि यत् प्राज्ञो निस्तरेन्नेतरो जनः।
दूरतो गुणदोषौ हि प्राज्ञः सर्वत्र पश्यति ॥ १९ ॥
विद्वान् पुरुष जो कालनदसे पार हो जाता है और अज्ञानी मनुष्य नहीं पार होता है, यह युक्तिसंगत ही है; क्योंकि ज्ञानवान् पुरुष सर्वत्र गुण और दोषोंको दूरसे ही देख लेता है ॥ १९ ॥
संशयं स तु कामात्मा चलचित्तोऽल्पचेतनः।
अप्राज्ञो न तरत्येनं यो ह्यास्ते न स गच्छति ॥ २० ॥
कामनाओंमें आसक्त, चंचलचित्त, मन्दबुद्धि एवं अज्ञानी पुरुष संदेहमें पड़ जानेके कारण कालनदको पार नहीं कर पाता तथा जो निश्चेष्ट होकर बैठ जाता है, वह भी उसके पार नहीं जा सकता ॥ २० ॥
अप्लवो हि महादोषं मुह्यमानो नियच्छति।
कामग्राहगृहीतस्य ज्ञानमप्यस्य न प्लवः ॥ २१ ॥
जिसके पास ज्ञानमयी नौका नहीं है, वह मोहितचित्त मूढ़ मानव महान् दोषको प्राप्त
होता है। कामरूपी ग्राहसे पीड़ित होनेके कारण ज्ञान भी उसके लिये नौका नहीं बन
पाता ।। २१ ।।
तस्मादुन्मज्जनस्यार्थे प्रयतेत विचक्षणः ।
एतदुन्मज्जनं तस्य यदयं ब्राह्मणो भवेत् ।। २२ ।।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको कालनद या भवसागरसे पार होनेका अवश्य प्रयत्न करना
चाहिये। उसका पार होना यही है कि वह वास्तवमें ब्राह्मण बन जाय अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त
करे ।। २२ ।।
अवदातेषु संजातस्त्रिसंदेहस्त्रिकर्मकृत् ।
तस्मादुन्मज्जने तिष्ठेत् प्रज्ञया निस्तरेद् यथा ।। २३ ।।
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अध्यापन, याजन और प्रतिग्रह—इन तीन कर्मोंको
संदेहकी दृष्टिसे देखे (कि कहीं इनमें आसक्त न हो जाऊँ) और अध्ययन, यजन तथा दान
—इन तीन कर्मोंका अवश्य पालन करे। वह जैसे भी हो प्रज्ञाद्वारा अपने उद्धारका प्रयत्न
करे, उस कालनदसे पार हो जाय ।। २३ ।।
संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः ।
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत्र च ।। २४ ।।
जिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन और
इन्द्रियोंपर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुषको इहलोक और परलोकमें कहीं भी सिद्धि
प्राप्त होते देर नहीं लगती ।। २४ ।।
वर्तेत तेषु गृहवानक्रुद्ध्यन्ननसूयकः ।
पञ्चभिः सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च ।। २५ ।।
गृहस्थ ब्राह्मण क्रोध और दोष-दृष्टिका त्याग करके पूर्वोक्त नियमोंके पालनमें संलग्न
रहे। नित्य पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान करे और यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करे ।। २५ ।।
सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् ।
असंरोधेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेदगर्हिताम् ।। २६ ।।
श्रेष्ठ पुरुषोंके धर्मके अनुसार चले और शिष्टाचारका पालन करे तथा ऐसी आजीविका
प्राप्त करनेकी इच्छा करे, जिससे दूसरे लोगोंकी जीविकाका हनन न हो और जिसकी
लोकमें निन्दा न होती हो ।। २६ ।।
श्रुतिविज्ञानतत्त्वज्ञः शिष्टाचारो विचक्षणः ।
स्वधर्मेण क्रियावांश्च कर्मणा सोऽप्यसंकरः ।। २७ ।।
ब्राह्मणको वेदका विद्वान्, तत्त्वज्ञानी, सदाचारी और चतुर होना चाहिये। वह अपने
धर्मके अनुसार कार्य करे, परंतु कर्मद्वारा संकरता न फैलावै अर्थात् स्वधर्म और परधर्मका
सम्मिश्रण न करे ।। २७ ।।
क्रियावान् श्रद्दधानो हि दान्तः प्राज्ञोऽनसूयकः ।
धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ॥ २८ ॥
जो अपने धर्मके अनुसार कार्य करनेवाला, श्रद्धालु, मन और इन्द्रियोंको संयममें
रखनेवाला, विद्वान्, किसीके दोष न देखनेवाला तथा धर्म और अधर्मका विशेषज्ञ है, वह
सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ २८ ॥
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् ।
वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ॥ २९ ॥
जो धैर्यवान्, प्रमादशून्य, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, मनस्वी तथा हर्ष, मद और क्रोधसे रहित है,
वह ब्राह्मण कभी विषादको नहीं प्राप्त होता है ॥ २९ ॥
एषा पुरातनी वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
ज्ञानवत्त्वेन कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ ३० ॥
यह ब्राह्मणकी प्राचीनकालसे चली आनेवाली वृत्तिका विधान किया गया है। ज्ञानपूर्वक
कर्म करनेवाले ब्राह्मणको सर्वत्र सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ३० ॥
अधर्मं धर्मकामो हि करोति ह्यविचक्षणः ।
धर्मं वाधर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः ॥ ३१ ॥
धर्मं करोमीति करोत्यधर्म-
मधर्मकामश्च करोति धर्मम् ।
उभे बालः कर्मणी न प्रजानन्
स जायते म्रियते चापि देही ॥ ३२ ॥
जो मूढ़ है, वह धर्मकी इच्छा रखकर भी अधर्म करता है अथवा शोकमग्न-सा होकर
अधर्मतुल्य धर्मका सम्पादन करता है। मूर्ख या अविवेकी मनुष्य न जाननेके कारण 'मैं धर्म
कर रहा हूँ' ऐसा समझकर अधर्म करता है और अधर्मकी इच्छा रखकर धर्म करता है, इस
प्रकार अज्ञानपूर्वक दोनों तरहके कर्म करनेवाला देहधारी मनुष्य बारंबार जन्म लेता और
मरता है ॥ ३१-३२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो
सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३५ ॥
ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति
षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति
व्यास उवाच
अथ चेद् रोचयेदेतदुह्येत स्रोतसा यथा ।
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानवान् प्लववान् भवेत् ॥ १ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**वत्स! मनुष्य जिस प्रकार डूबता-उतराता हुआ जलके प्रवाहमें बहता रहता है और यदि संयोगवश कोई नौका मिल गयी तो उसकी सहायतासे पार लग जाता है, उसी प्रकार संसार-सागरमें डूबता-उतराता हुआ मानव यदि इस संकटसे मुक्त होना चाहे तो उसे ज्ञानरूपी नौकाका आश्रय लेना चाहिये ॥ १ ॥
प्रज्ञया निश्चिता धीरास्तारयन्त्यबुधान् प्लवैः ।
नाबुधास्तारयन्त्यन्यानात्मानं वा कथंचन ॥ २ ॥
जिन्हें बुद्धिद्वारा तत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया है, वे धीर पुरुष अपनी ज्ञाननौकाद्वारा दूसरे अज्ञानियोंको भी भवसागरसे पार कर देते हैं, परंतु जो अज्ञानी हैं वे न तो दूसरोंको तार सकते हैं और न अपना ही किसी प्रकार उद्धार कर पाते हैं ॥ २ ॥
छिन्नदोषो मुनिर्योगाञ् युक्तो युञ्जीत द्वादश ।
देशकर्मानुरागार्थानुपायापायनिश्चयैः ॥ ३ ॥
चक्षुराहारसंहारैर्मनसा दर्शनेन च ।
समाहितचित्त मुनिको चाहिये कि वह हृदयके राग आदि दोषोंको नष्ट करके योगमें सहायता पहुँचानेवाले देश, कर्म, अनुराग, अर्थ, उपाय, अपाय, निश्चय, चक्षुष्, आहार, संहार, मन और दर्शन—इन बारह योगोंका आश्रय ले ध्यानयोगका अभ्यास करे* ॥ ३ ½ ॥
यच्छेद वाङ्मनसी बुद्धया य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४ ॥
ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः ।
जो उत्तम ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे बुद्धिके द्वारा मन और वाणीको जीतना चाहिये तथा जो अपने लिये शान्ति चाहे, उसे ज्ञानद्वारा बुद्धिको परमात्मामें नियन्त्रित करना चाहिये ॥ ४ ½ ॥
एतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥ ५ ॥ यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनृचो द्विजः । यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तमः ॥ ६ ॥ यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वा क्लेशधारितः । तरत्येवं महादुर्गं जरामरणसागरम् ॥ ७ ॥ मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा-मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है ॥ ५—७ ॥
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानो ह्येवमन्ततः । अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ८ ॥ इस प्रकार सिद्धिपर्यन्त इस योगका अभ्यास करनेवाला पुरुष यदि ब्रह्मका जिज्ञासु हो तो वेदोक्त सकाम कर्मोंकी सीमाको लाँघ जाता है ॥ ८ ॥
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूबरः । अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥ ९ ॥ चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् । दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥ १० ॥ प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ॥ ११ ॥ त्यागसूक्ष्मानुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः । जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥ १२ ॥ यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त उपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रियदमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ९—१२ ॥
अथ संत्वरमाणस्य रथमेवं युयुक्षतः ।
अक्षरं गन्तुमनसो विधिं वक्ष्यामि शीघ्रगम् ॥ १३ ॥ इस प्रकार योगरथपर आरूढ़ हो साधनकी इच्छा रखनेवाले तथा अविनाशी परब्रह्म परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी कामनावाले साधकको जिस उपायसे शीघ्र सफलता मिलती है, वह उपाय मैं बता रहा हूँ ॥
सप्त या धारणाः कृत्स्ना वाग्यतः प्रतिपद्यते । पृष्ठतः पार्श्वतश्चान्यास्तावत्यस्ताः प्रधारणाः ॥ १४ ॥ साधक वाणीका संयम करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, बुद्धि और अहंकार-सम्बन्धी सात धारणाओंको सिद्ध करता है। इनके विषयों (गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, अहंवृत्ति और निश्चय) से सम्बन्धित सात प्रधारणाएँ इनकी पार्श्ववर्तिनी एवं पृष्ठवर्तिनी हैं ॥
क्रमशः पार्थिवं यच्च वायव्यं खं तथा पयः । ज्योतिषो यत् तदैश्वर्यमहङ्कारस्य बुद्धितः । अव्यक्तस्य तथैश्वर्यं क्रमशः प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥ साधक क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और बुद्धिके ऐश्वर्यपर अधिकार कर लेता है। इसके बाद वह क्रमपूर्वक अव्यक्त ब्रह्मका ऐश्वर्य भी प्राप्त कर लेता है* ॥ १५ ॥
विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युक्तेषु योगतः । तथा योगस्य युक्तस्य सिद्धिमात्मनि पश्यतः ॥ १६ ॥ अब योगाभ्यासमें प्रवृत्त हुए योगियोंमेंसे जिस योगीको ये आगे बताये जानेवाले पृथ्वीजय आदि ऐश्वर्य जिस प्रकार प्राप्त होते हैं; वह बताता हूँ तथा धारणापूर्वक ध्यान करते समय ब्रह्म-प्राप्तिका अनुभव करनेवाले योगीको जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसका भी वर्णन करता हूँ ॥ १६ ॥
निर्मुच्यमानः सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यतः । शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रयते नभः ॥ १७ ॥ साधक जब स्थूल देहके अभिमानसे मुक्त होकर ध्यानमें स्थित होता है, उस समय सूक्ष्मदृष्टिसे युक्त होनेके कारण उसे कुछ इस तरहके रूप (चिह्न) दिखायी पड़ते हैं। प्रारम्भमें पृथ्वीकी धारणा करते समय मालूम होता है कि शिशिरकालीन कुहरेके समान कोई सूक्ष्म वस्तु सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित कर रही है ॥ १७ ॥
तथा देहाद् विमुक्तस्य पूर्वं रूपं भवत्युत । अथ धूमस्य विरमे द्वितीयं रूपदर्शनम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार देहाभिमानसे मुक्त हुए योगीके अनुभवका यह पहला रूप है। जब कुहरा निवृत्त हो जाता है, तब दूसरे रूपका दर्शन होता है ॥ १८ ॥
जलरूपमिवाकाशे तथैवात्मनि पश्यति ।
अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्निरूपं प्रकाशते ॥ १९ ॥
वह सम्पूर्ण आकाशमें जल-ही-जल-सा देखता है तथा आत्माको भी जलरूप अनुभव करता है (यह अनुभव जलतत्त्वकी धारणा करते समय होता है)। फिर जलका लय हो जानेपर अग्नितत्त्वकी धारणा करते समय उसे सर्वत्र अग्नि प्रकाशित दिखायी देती है ॥ १९ ॥
तस्मिन्नुपरतेऽजोऽस्य पीतशस्त्रः प्रकाशते ।
ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूपं प्रकाशते ॥ २० ॥
उसके भी लय हो जानेपर योगीको आकाशमें सर्वत्र फैले हुए वायुका ही अनुभव होता है। उस समय वृक्ष और पर्वत आदि अपने समस्त शस्त्रोंको पी जानेके कारण वायुकी ‘पीतशस्त्र’ संज्ञा हो जाती है अर्थात् पृथ्वी, जल और तेजरूप समस्त पदार्थोंको निगलकर वायु केवल आकाशमें ही आन्दोलित होता रहता है और साधक स्वयं भी ऊनके धागेके समान अत्यन्त छोटा और हलका होकर अपनेको निराधार आकाशमें वायुके साथ ही स्थित मानता है ॥ २० ॥
अथ श्वेतां गतिं गत्वा वायव्यं सूक्ष्ममप्युत ।
अशुक्लं चेतसः सौक्ष्म्यमप्युक्तं ब्राह्मणस्य वै ॥ २१ ॥
तदनन्तर तेजका संहार और वायु-तत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके पश्चात् वायुका सूक्ष्म रूप स्वच्छ आकाशमें लीन हो जाता है और केवल नीलाकाशमात्र शेष रह जाता है। उस अवस्थामें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेकी इच्छा रखनेवाले योगीका चित्त अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, ऐसा बताया गया है। (उसे अपने स्थूल रूपका तनिक भी भान नहीं रहता। यही वायुका लय और आकाशतत्त्वपर विजय कहलाता है) ॥ २१ ॥
एतेष्वपि हि जातेषु फलजातानि मे शृणु ।
जातस्य पार्थिवैश्वर्यैः सृष्टिरत्र विधीयते ॥ २२ ॥
इन सब लक्षणोंके प्रकट हो जानेपर योगीको जो-जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो। पार्थिव ऐश्वर्यकी सिद्धि हो जानेपर योगीमें सृष्टि करनेकी शक्ति आ जाती है ॥ २२ ॥
प्रजापतिरिवाक्षोभ्यः शरीरात् सृजते प्रजाः ।
अङ्गुल्यङ्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा ॥ २३ ॥
पृथिवीं कम्पयत्येको गुणो वायोरिति श्रुतिः ।
वह प्रजापतिके समान क्षोभरहित होकर अपने शरीरसे प्रजाकी सृष्टि कर सकता है। जिसको वायुतत्त्व सिद्ध हो जाता है, वह बिना किसीकी सहायताके हाथ-पैर, अँगूठे अथवा अंगुलिमात्रसे दबाकर पृथ्वीको कम्पित कर सकता है—ऐसा सुननेमें आया है ।। २३ १/२ ।।
आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात् प्रकाशते ।। २४ ।।
वर्णतो गृह्यते चापि कामात् पिबति चाशयान् ।
आकाशको सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाशमें आकाशके ही समान सर्वव्यापी हो जाता है। वह अपने शरीरको अन्तर्धान करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। जिसका जलतत्त्वपर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े-बड़े जलाशयोंको पी जाता है ।। २४ १/२ ।।
न चास्य तेजसा रूपं दृश्यते शाम्यते तथा ।
अहङ्कारेऽस्य विजिते पञ्चैते स्युर्वशानुगाः ।। २५ ।।
अग्नितत्त्वको सिद्ध कर लेनेपर वह अपने शरीरको इतना तेजस्वी बना लेता है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता और न उसके तेजको बुझा ही सकता है। अहंकारको जीत लेनेपर पाँचों भूत योगीके वशमें हो जाते हैं ।। २५ ।।
षण्णामात्मनि बुद्धौ च जितायां प्रभवत्यथ ।
निर्दोषप्रतिभा ह्येनं कृत्स्ना समभिवर्तते ।। २६ ।।
पञ्चभूत और अहंकार—इन छः तत्त्वोंका आत्मा है बुद्धि। उसको जीत लेनेपर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है तथा उस योगीको निर्दोष प्रतिभा (विशुद्ध तत्त्वज्ञान) पूर्ण रूपसे प्राप्त हो जाती है ।। २६ ।।
तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते ।
यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञकः ।। २७ ।।
उपर्युक्त सप्त पदार्थोंका कार्यभूत व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मामें ही विलीन हो जाता है, क्योंकि उन्हीं परमात्मासे यह जगत् उत्पन्न होता है और व्यक्त नाम धारण करता है ।। २७ ।।
तत्राव्यक्तमयीं विद्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे ।
तथा व्यक्तमयं चैव सांख्ये पूर्वं निबोध मे ।। २८ ।।
वत्स! तुम सांख्यदर्शनमें वर्णित अव्यक्तविद्याका विस्तारपूर्वक मुझसे श्रवण करो। सर्वप्रथम सांख्यशास्त्रमें कथित व्यक्तविद्याको मुझसे समझो ।। २८ ।।
पञ्चविंशति तत्त्वानि तुल्यान्युभयतः समम् ।
योगे सांख्येऽपि च तथा विशेषं तत्र मे शृणु ।। २९ ।।
सांख्य और पातञ्जलयोग—इन दोनों दर्शनोंमें समानभावसे पचीस तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है*। इस विषयमें जो विशेष बात है, वह मुझसे सुनो ॥ २९ ॥ प्रोक्तं तद् व्यक्तमित्येव जायते वर्धते च यत् । जीर्यते म्रियते चैव चतुर्भिर्लक्षणैर्युतम् ॥ ३० ॥ जन्म, वृद्धि, जरा और मरण—इन चार लक्षणोंसे युक्त जो तत्त्व है, उसीको व्यक्त कहते हैं ॥ ३० ॥ विपरीतमतो यत् तु तदव्यक्तमुदाहृतम् । द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतौ ॥ ३१ ॥ जो तत्त्व इसके विपरीत हैं अर्थात् जिसमें जन्म आदि चारों विकार नहीं हैं, उसे अव्यक्त कहा गया है। वेदों और सिद्धान्तप्रतिपादक शास्त्रोंमें उस अव्यक्तके दो भेद बताये गये हैं—जीवात्मा और परमात्मा ॥ ३१ ॥ चतुर्लक्षणजं त्वाद्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते । व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धमथेतरत् । सत्त्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद् द्वयमप्यनुदर्शितम् ॥ ३२ ॥ द्वावात्मानौ च वेदेषु विषयेष्वनुरज्यतः । विषयात् प्रतिसंहारः सांख्यानां सिद्धि लक्षणम् ॥ ३३ ॥ अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु—इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। व्यक्त (जडवर्ग) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त (परमात्मा) से होती है। व्यक्तको सत्त्व (जडवर्ग—क्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है। वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं। विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है। सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है ॥ ३२-३३ ॥ निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । नैव क्रुद्ध्यति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ॥ ३४ ॥ आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् । वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तकः ॥ ३५ ॥ समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते ।
जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। ३४-३५½ ।।
नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थितः ॥ ३६ ॥
अलोलुपोऽव्यथो दान्तो न कृती न निराकृतिः ।
नास्येन्द्रियमनेकाग्रं न विक्षिप्तमनोरथः ॥ ३७ ॥
सर्वभूतसुहृन्मैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ ३८ ॥
अस्पृहः सर्वकामेभ्यो ब्रह्मचर्यदृढव्रतः ।
अहिंस्रः सर्वभूतानामीदृक् सांख्यो विमुच्यते ॥ ३९ ॥
जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन-निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। ३६—३९ ।।
यथा योगाद् विमुच्यन्ते कारणैर्यैर्निबोध तत् ।
योगैश्वर्यमतिक्रान्तो यो निष्क्रामति मुच्यते ॥ ४० ॥
योगी जिस प्रकार और जिन कारणोंसे योगके फल-स्वरूप मोक्ष लाभ करते हैं, अब उन्हें बताता हूँ सुनो। जो परवैराग्यके बलसे योगजनित ऐश्वर्यको लाँघकर उसकी सीमासे बाहर निकल जाता है, वही मुक्त होता है ।। ४० ।।
इत्येषा भावजा बुद्धिः कथिता ते न संशयः ।
एवं भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्माणं चाधिगच्छति ॥ ४१ ॥
बेटा! यह तुम्हारे निकट मैंने भावशुद्धिसे प्राप्त होनेवाली बुद्धिका वर्णन किया है। जो उपर्युक्तरूपसे साधना करके द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वही ब्रह्मभावको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३६ ॥
* ध्यानयोगके साधकको ऐसे स्थानपर आसन लगाना चाहिये, जो समतल और पवित्र हो। निर्जन वन, गुफा या ऐसा ही कोई एकान्त स्थान ही ध्यानके लिये उपयोगी होता है। ऐसे स्थानपर आसन लगानेको देशयोग कहते हैं। आहार-विहार, चेष्टा, सोना और जागना—ये सब परिमित और नियमानुकूल होने चाहिये। यही कर्मनामक योग है। परमात्मा एवं उसकी प्राप्तिके साधनोंमें तीव्र अनुराग रखना अनुरागयोग कहलाता है। केवल आवश्यक सामग्रीको ही रखना अर्थयोग है। ध्यानोपयोगी आसनसे बैठना उपाययोग है। संसारके विषयों और सगे-सम्बन्धियोंसे आसक्ति तथा ममता हटा लेनेको अपाययोग कहते हैं। गुरु और वेदशास्त्रके वचनोंपर विश्वास रखनेका नाम निश्चययोग है। चक्षुको नासिकाके अग्रभागपर स्थिर करना चक्षुर्योग है। शुद्ध और सात्त्विक भोजनका नाम है आहारयोग। विषयोंकी ओर होनेवाली मन-इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोकना संहारयोग कहलाता है। मनको संकल्प-विकल्पसे रहित करके एकाग्र करना मनोयोग है। जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि होनेके समय महान् दुःख और दोषोंका वैराग्यपूर्वक दर्शन करना दर्शनयोग है। जिसे योगके द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी हो, उसे इन बारह योगोंका अवश्य अवलम्बन करना चाहिये।
* पातञ्जलयोगदर्शनमें ‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा’ अर्थात् एकदेशमें चित्तको एकाग्र करना धारणा बतलाया गया है। साधक सर्वप्रथम पृथ्वीतत्त्वमें चित्तको लगावे। इस धारणासे उसका पृथ्वीतत्त्वपर अधिकार हो जाता है। फिर पृथ्वीतत्त्वको जलतत्त्वमें विलीन करके जलतत्त्वकी धारणा करे। इससे साधक जलतत्त्वका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता है। फिर जलतत्त्वको अग्नितत्त्वमें विलीन करके अग्नितत्त्वकी धारणा करे। इससे अग्नितत्त्वपर अधिकार हो जाता है। तदनन्तर अग्निको वायुमें विलीन करके चित्तको वायुतत्त्वमें एकाग्र करे। इससे साधक वायुतत्त्वपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार क्रमशः वायुको आकाशमें और आकाशको मनमें तथा मनको बुद्धिमें लय करके उस-उस तत्त्वकी धारणा करे। इस प्रकार धारणाके ये सात स्तर हैं। अन्तमें बुद्धिको अव्यक्त ब्रह्ममें विलीन कर देना चाहिये।
* सांख्य-कारिकामें बतलाया है—
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ।। (सां० का० ३)
मूल प्रकृति—अव्याकृत माया, महत्तत्त्व आदि प्रकृतिके सात विकार—महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), सोलह विकार—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, हाथ, पैर, गुदा और शिश्न) तथा मन और पञ्चमहाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) एवं पुरुष, जो न प्रकृति है और न प्रकृतिका विकार ही—इस प्रकार सांख्यके अनुसार ये पचीस तत्त्व हैं।
पातञ्जलयोगदर्शनमें इनका इस प्रकार उल्लेख मिलता है—
विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि । (योग० साधनपाद १९)
‘विशेष—पञ्चमहाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन, अविशेष—पञ्चतन्मात्रा और अहंकार, लिंगमात्र—महत्तत्त्व, अलिंग—मूलप्रकृति; इस प्रकार ये चौबीस तत्त्व एवं पचीसवाँ द्रष्टा (पुरुष) है।
सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन
सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन
व्यास उवाच
अथ ज्ञानप्लवं धीरो गृहीत्वा शान्तिमात्मनः ।
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानमेवाभिसंश्रयेत् ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं— वत्स! धीर पुरुषको चाहिये कि वह विवेकरूप नौकाका अवलम्बन लेकर भव-सागरमें डूबता-उतराता हुआ अर्थात् प्रत्येक परिस्थितिमें अपनी परम शान्तिके लिये वास्तविक ज्ञानके आश्रित हो जाय ॥ १ ॥
शुक उवाच
किं तज्ज्ञानमथो विद्या यथा निस्तरते द्वयम् ।
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिरिति वा वद ॥ २ ॥
शुकदेवजीने पूछा— पिताजी! जिसके द्वारा मनुष्य जन्म और मृत्यु दोनोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, वह ज्ञान अथवा विद्या क्या है? वह प्रवृत्तिरूप धर्म है या निवृत्तिरूप? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥
व्यास उवाच
यस्तु पश्यन् स्वभावेन विनाभावमचेतनः ।
पुष्यते च पुनः सर्वान् प्रज्ञया मुक्तहेतुकान् ॥ ३ ॥
व्यासजीने कहा— जो यह समझता है कि यह जगत् स्वभावसे ही उत्पन्न है, इसका कोई चेतन मूल कारण नहीं है, वह अज्ञानी मनुष्य व्यर्थ तर्कयुक्त बुद्धिद्वारा हेतुरहित वचनोंका बारंबार पोषण करता रहता है ॥ ३ ॥
येषां चैकान्तभावेन स्वभावात् कारणं मतम् ।
पूत्वा तृणमिषीकां वा ते लभन्ते न किंचन ॥ ४ ॥
जिनकी यह मान्यता है कि निश्चित रूपसे वस्तुगत स्वभाव ही जगत्का कारण है—स्वभावसे भिन्न अन्य कोई कारण नहीं है, (किंतु इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेमात्र हेतुसे उनका यह मानना कि ईश्वर-जैसा कोई जगत्का कारण है ही नहीं, युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि) मूँजके भीतर स्थित दिखायी न देनेवाली सींक क्या मूँजको चीर डालनेपर उन्हें उपलब्ध नहीं होती? अपितु अवश्य होती है (उसी प्रकार समस्त जगत्में व्याप्त परमात्मा
यद्यपि इन्द्रियोंद्वारा दिखायी नहीं देता तो भी उसकी उपलब्धि दिव्य-ज्ञानके द्वारा अवश्य होती है) ।। ४ ।। ये चैनं पक्षमाश्रित्य निवर्तन्त्यल्पमेधसः । स्वभावं कारणं ज्ञात्वा न श्रेयः प्राप्नुवन्ति ते ।। ५ ।। जो मन्दबुद्धि मानव इस नास्तिक मतका अवलम्बन करके स्वभावहीको कारण जानकर परमेश्वरकी उपासनासे निवृत्त हो जाते हैं, वे कल्याणके भागी नहीं होते ।। ५ ।। स्वभावो हि विनाशाय मोहकर्म मनोभवः । निरुक्तमेतयोरेतत् स्वभावपरिभावयोः ।। ६ ।। नास्तिक लोग जो स्वभाववादका आश्रय लेकर ईश्वर और अदृष्टकी सत्ताको स्वीकार नहीं करते हैं, यह उनका मोहजनित कार्य है, स्वभाववाद मूढ़ोंकी कल्पना-मात्र है। यह मानवोंको परमार्थसे वंचित करके उनका विनाश करनेके लिये ही उपस्थित किया गया है। स्वभाव और परिभावके तत्त्वका यह आगे बताया जानेवाला विवेचन सुनो ।। ६ ।। कृष्यादीनीह कर्माणि सस्यसंहरणानि च । प्रज्ञावद्भिः प्रक्लृप्तानि यानासनगृहाणि च ।। ७ ।। देखा जाता है कि जगत्में बुद्धिसम्पन्न चेतन प्राणियोंद्वारा ही भूमिको जोतने आदिके कार्य, अनाजके बीजोंका संग्रह तथा सवारी, आसन और गृहनिर्माण—ये सब कार्य सदासे किये जाते हैं। यदि स्वभावसे ये कार्य हो जाते तो कोई इनमें प्रवृत्त ही न होता ।। ७ ।। आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च । प्रज्ञावन्तः प्रयोक्तारो ज्ञानवद्भिरनुष्ठिताः ।। ८ ।। बेटा! चेतन प्राणी क्रीडाके लिये स्थान और रहनेके लिये घर बनाते हैं। वे ही रोगोंको पहचानकर उनपर ठीक-ठीक दवाका प्रयोग करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषोंद्वारा ही इन सब कार्योंका यथावत् अनुष्ठान होता है (स्वभावसे—अपने-आप नहीं) ।। ८ ।। प्रज्ञा संयोजयत्यर्थैः प्रज्ञा श्रेयोऽधिगच्छति । राजानो भुञ्जते राज्यं प्रज्ञया तुल्यलक्षणाः ।। ९ ।। बुद्धि ही धनकी प्राप्ति कराती है। बुद्धिसे ही मनुष्य कल्याणको प्राप्त होता है। एक-से लक्षणोंवाले राजाओंमें भी जो बुद्धिमें बढ़े-चढ़े होते हैं, वे ही राज्यका उपभोग और दूसरोंपर शासन करते हैं ।। ९ ।। परावरं तु भूतानां ज्ञानेनैवोपलभ्यते । विद्यया तात सृष्टानां विद्यैवेह परा गतिः ।। १० ।। तात! प्राणियोंके स्थूल-सूक्ष्म या छोटे-बड़ेका भेद बुद्धिसे ही जाना जाता है। इस जगत्में सब प्राणियोंकी सृष्टि विद्यासे हुई है और उनकी परम गति विद्या ही है ।। १० ।। भूतानां जन्म सर्वेषां विविधानां चतुर्विधम् । जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजं चोपलक्षयेत् ।। ११ ।।
संसारमें जो नाना प्रकारके जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चतुर्विध प्राणी हैं, उन सबके जन्मकी ओर भी लक्ष्य करना चाहिये ॥ ११ ॥
स्थावरेभ्यो विशिष्टानि जङ्गमान्युपधारयेत् ।
उपपन्नं हि यच्चेष्टा विशिष्येत विशेषया ॥ १२ ॥
स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणियोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये। यह बात युक्तिसंगत भी है, क्योंकि उनमें विशेषरूपसे चेष्टा देखी जाती है, इस विशेषताके कारण जंगम प्राणियोंकी विशिष्टता स्वतः सिद्ध है ॥ १२ ॥
आहुर्वे बहुपादानि जङ्गमानि द्वयानि तु ।
बहुपाद्भ्यो विशिष्टानि द्विपदानि बहून्यपि ॥ १३ ॥
जंगम जीवोंमें भी बहुत पैरवाले और दो पैरवाले—ये दो तरहके प्राणी होते हैं। इनमें बहुत पैरवालोंकी अपेक्षा दो पैरवाले अनेक प्राणी श्रेष्ठ बताये गये हैं ॥
द्विपदानि द्वयान्याहुः पार्थिवानीतराणि च ।
पार्थिवानि विशिष्टानि तानि ह्यन्नानि भुञ्जते ॥ १४ ॥
दो पैरवाले जंगम प्राणी भी दो प्रकारके कहे गये हैं—पार्थिव (मुनष्य) और अपार्थिव (पक्षी)। अपार्थिवोंसे पार्थिव श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे अन्न भोजन करते हैं ॥ १४ ॥
पार्थिवानि द्वयान्याहुर्मध्यमान्यधमानि तु ।
मध्यमानि विशिष्टानि जातिधर्मोपधारणात् ॥ १५ ॥
पार्थिव (मनुष्य) भी दो प्रकारके बताये गये हैं—मध्यम और अधम। उनमें मध्यम मनुष्य अधमकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जाति-धर्मको धारण करते हैं ॥ १५ ॥
मध्यमानि द्वयान्याहुर्धर्मज्ञानीतराणि च ।
धर्मज्ञानि विशिष्टानि कार्याकार्योपधारणात् ॥ १६ ॥
मध्यम मनुष्य दो प्रकारके कहे गये हैं—धर्मज्ञ और धर्मसे अनभिज्ञ। इनमें धर्मज्ञ ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे कर्तव्य और अकर्त्तव्यका विवेक रखते और कर्त्तव्यका पालन करते हैं ॥ १६ ॥
धर्मज्ञानि द्वयान्याहुर्वेदज्ञानीतराणि च ।
वेदज्ञानि विशिष्टानि वेदो ह्येषु प्रतिष्ठितः ॥ १७ ॥
धर्मज्ञोंके भी दो भेद कहे गये हैं—वेदज्ञ और अवेदज्ञ। इनमें वेदज्ञ श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें वेद प्रतिष्ठित है ॥ १७ ॥
वेदज्ञानि द्वयान्याहुः प्रवक्तृणीतराणि च ।
प्रवक्तॄणि विशिष्टानि सर्वधर्मोपधारणात् ॥ १८ ॥
वेदज्ञ भी दो प्रकारके बताये गये हैं—प्रवक्ता और अप्रवक्ता। इनमें प्रवक्ता (प्रवचन करनेवाले) श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे वेदमें बताये हुए सम्पूर्ण धर्मोंको धारण करनेवाले होते हैं ॥ १८ ॥
विज्ञायन्ते हि यैर्वेदाः सधर्माः सक्रियाफलाः ।
सधर्मा निखिला वेदाः प्रवक्तृभ्यो विनिःसृताः ॥ १९ ॥
एवं उन्हींके द्वारा धर्म, कर्म और फलोंसहित वेदोंका ज्ञान दूसरोंको होता है। धर्मसहित सम्पूर्ण वेद प्रवक्ताओंके ही मुखसे प्रकट होते हैं ॥ १९ ॥
प्रवक्तॄणि द्वयान्याहुरात्मज्ञानीतराणि च ।
आत्मज्ञानि विशिष्टानि जन्माजन्मपधारणात् ॥ २० ॥
प्रवक्ता भी दो प्रकारके कहे गये हैं—आत्मज्ञ और अनात्मज्ञ। इनमें आत्मज्ञ पुरुष ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि वे जन्म और मृत्युके तत्त्वको समझते हैं ॥ २० ॥
धर्मद्वयं हि यो वेद स सर्वज्ञः स सर्ववित् ।
स त्यागी सत्यसंकल्पः सत्यः शुचिरथेश्वरः ॥ २१ ॥
जो प्रवृत्ति और निवॄत्तिरूप दो प्रकारके धर्मको जानता है, वही सर्वज्ञ, सर्ववेत्ता, त्यागी, सत्यसंकल्प, सत्यवादी, पवित्र और समर्थ होता है ॥ २१ ॥
ब्रह्मज्ञानप्रतिष्ठं हि तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातं परे च कृतनिश्चयम् ॥ २२ ॥
जो शब्दब्रह्म (वेद) में पारंगत होकर परब्रह्मके तत्त्वका निश्चय कर चुका है और सदा ब्रह्मज्ञानमें ही स्थित रहता है, उसे ही देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ २२ ॥
अन्तःस्थं च बहिष्ठं च साधियज्ञाधिदैवतम् ।
ज्ञानान्विता हि पश्यन्ति ते देवास्तात ते द्विजाः ॥ २३ ॥
बेटा! जो लोग ज्ञानवान् होकर बाहर और भीतर व्याप्त अधियज्ञ (परमात्मा) और अधिदेव (पुरुष) का साक्षात्कार कर लेते हैं, वे ही देवता और वे ही द्विज हैं ॥ २३ ॥
तेषु विश्वमिदं भूतं सर्वं च जगदाहितम् ।
तेषां माहात्म्यभावस्य सदृशं नास्ति किंचन ॥ २४ ॥
उन्हींमें यह सारा विश्व, सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है। उनके माहात्म्यकी कहीं कोई तुलना नहीं है ॥ २४ ॥
आद्यन्ते निधनं चैव कर्म चातीत्य सर्वशः ।
चतुर्विधस्य भूतस्य सर्वस्येशाः स्वयम्भुवः ॥ २५ ॥
वे जन्म, मृत्यु और कर्मकी सीमाको भलीभाँति लाँघकर समस्त चतुर्विध प्राणियोंके अधीश्वर एवं स्वयम्भू होते हैं ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने
सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३७ ॥
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नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व
अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व
व्यास उवाच
एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं— बेटा! यह ब्राह्मणकी अत्यन्त प्राचीनकालसे चली आयी हुई वृत्ति है, जो शास्त्रविहित है। ज्ञानवान् मनुष्य ही सर्वत्र कर्म करता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है ॥ १ ॥
तत्र चेन्न भवेदेवं संशयः कर्मसिद्धये ।
किं तु कर्म स्वभावोऽयं ज्ञानं कर्मेति वा पुनः ॥ २ ॥
यदि कर्ममें संशय न हो तो वह सिद्धि देनेवाला होता है। यहाँ संदेह यह होता है कि क्या यह कर्म स्वभावसिद्ध है अथवा ज्ञानजनित? ॥ २ ॥
तत्र वेदविधिः स स्याज्ज्ञानं चेत् पुरुषं प्रति ।
उपपत्त्युपलब्धिभ्यां वर्णयिष्यामि तच्छृणु ॥ ३ ॥
उपर्युक्त संशय होनेपर यह कहा जाता है कि यदि वह पुरुषके लिये वैदिक विधानके अनुसार कर्त्तव्य हो तो ज्ञानजन्य है, अन्यथा स्वाभाविक है। मैं युक्ति और फल-प्राप्तिके सहित इस विषयका वर्णन करूँगा, तुम उसे सुनो ॥ ३ ॥
पौरुषं कारणं केचिदाहुः कर्मसु मानवाः ।
दैवमेके प्रशंसन्ति स्वभावमपरे जनाः ॥ ४ ॥
कुछ मनुष्य कर्मोंमें पुरुषार्थको कारण बताते हैं। कोई-कोई दैव (प्रारब्ध अथवा भावी) की प्रशंसा करते हैं और दूसरे लोग स्वभावके गुण गाते हैं ॥ ४ ॥
पौरुषं कर्म दैवं च कालवृत्तिस्वभावतः ।
त्रयमेतत् पृथग्भूतमविवेकं तु केचन ॥ ५ ॥
कितने ही मनुष्य पुरुषार्थद्वारा की हुई क्रिया, दैव और कालगत स्वभाव-इन तीनोंको कारण मानते हैं। कुछ लोग इन्हें पृथक्-पृथक् प्रधानता देते हैं अर्थात् इनमेंसे एक प्रधान है और दूसरे दो अप्रधान कारण हैं—ऐसा कहते हैं और कुछ लोग इन तीनोंको पृथक् न करके इनके समुच्चयको ही कारण बताते हैं ॥ ५ ॥
एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा ।
कर्मस्था विषयं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥ ६ ॥
कुछ कर्मनिष्ठ विचारक घट-पट आदि विषयोंके सम्बन्धमें कहते हैं कि 'यह ऐसा ही है।' दूसरे कहते हैं कि 'यह ऐसा नहीं है।' तीसरोंका कहना है कि 'ये दोनों ही सम्भव हैं अर्थात् यह ऐसा है और नहीं भी है।' अन्य लोग कहते हैं कि 'ये दोनों ही मत सम्भव नहीं हैं' परंतु सत्त्वगुणमें स्थित हुए योगी पुरुष सर्वत्र समस्वरूप ब्रह्मको ही कारणरूपमें देखते हैं।। ६ ।।
त्रेतायां द्वापरे चैव कलिजाश्च ससंशयाः ।
तपस्विनः प्रशान्ताश्च सत्त्वस्थाश्च कृते युगे ॥ ७ ॥
त्रेता, द्वापर तथा कलियुगके मनुष्य परमार्थके विषयमें संशयशील होते हैं; परंतु सत्ययुगके लोग तपस्वी और सत्त्वगुणी होनेके-कारण-प्रशान्त (संशयरहित) होते हैं ॥ ७ ॥
अपृथग्दर्शनाः सर्वे ऋक्सामसु यजुःषु च ।
कामद्वेषौ पृथक् कृत्वा तपः कृत उपासत ॥ ८ ॥
सत्ययुगमें सभी द्विज ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनोंमें भेददृष्टि न रखते हुए राग-द्वेषको मनसे हटाकर तपस्याका आश्रय लेते हैं ॥ ८ ॥
तपोधर्मेण संयुक्तस्तपोनित्यः सुसंशितः ।
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति ॥ ९ ॥
जो मनुष्य तपस्यारूप धर्मसे संयुक्त हो पूर्णतया संयमका पालन करते हुए सदा तपमें ही तत्पर रहता है, वह उसीके द्वारा अपने मनसे जिन-जिन कामनाओंको चाहता है, उन सबको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
तपसा तदवाप्नोति यद् भूत्वा सृजते जगत् ।
तद् भूतश्च ततः सर्वभूतानां भवति प्रभुः ॥ १० ॥
तपस्यासे मनुष्य उस ब्रह्मभावको प्राप्त कर लेता है, जिसमें स्थित होकर वह सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करता है, अतः ब्रह्मभावको प्राप्त व्यक्ति समस्त प्राणियोंका प्रभु हो जाता है ॥ १० ॥
तदुक्तं वेदवादेषु गहनं वेददर्शिभिः ।
वेदान्तेषु पुनर्व्यक्तं कर्मयोगेन लक्ष्यते ॥ ११ ॥
वह ब्रह्म वेदके कर्मकाण्डोंमें गूप्तरूपसे प्रतिपादित हुआ है; अतः वेदज्ञ विद्वानोंद्वारा भी वह अज्ञात ही रहता है। किंतु वेदान्तमें उसी ब्रह्मका स्पष्टरूपसे प्रतिपादन किया गया है और निष्काम कर्मयोगके द्वारा उस ब्रह्मका साक्षात्कार किया जा सकता है ॥ ११ ॥
आलम्भयज्ञाः क्षत्राश्च हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।
परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञा द्विजातयः ॥ १२ ॥
क्षत्रिय आलम्भ* यज्ञ करनेवाले होते हैं, वैश्य हविष्यप्रधान यज्ञ करनेवाले माने गये हैं, शूद्र सेवारूप यज्ञ करनेवाले और ब्राह्मण जपयज्ञ करनेवाले होते हैं ।।
परिनिश्चितकार्यो हि स्वाध्यायेन द्विजो भवेत् ।