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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

दुष्यन्त्याददतो भृत्या नित्यं दस्युभयादिव । दुर्लभं च धनं प्राप्य भृशं दत्त्वानुतप्यते ॥ २२ ॥ ‘अपना वेतन यथासमय पाते हुए भी जब भृत्योंको संतोष नहीं होता, तब वे स्वामीसे अप्रसन्न रहते हैं और वह धनी दुर्लभ धनको पाकर यदि सेवकोंको अधिक देता है तो उसे उतना ही अधिक संताप होता है, जितना चोर-डाकुओंसे भयके कारण हुआ करता है ॥ २२ ॥

अधनः कस्य किं वाच्यो विमुक्तः सर्वशः सुखी । देवस्वमुपगृह्यैव धनेन न सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ ‘निर्धनको कौन क्या कह सकता है? वह सब प्रकारके भयसे मुक्त हो सुखी रहता है। देवताओंकी सम्पत्ति लेकर भी कोई धनसे सुखी नहीं हो सकता ॥ २३ ॥

अत्र गाथां यज्ञगीतां कीर्तयन्ति पुराविदः । त्रयीमुपाश्रितां लोके यज्ञसंस्तरकारिकाम् ॥ २४ ॥ ‘इस विषयमें यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा गायी हुई एक गाथा है जो तीनों वेदोंके आश्रित है, वह गाथा लोकमें यज्ञकी प्रतिष्ठा करनेवाली है। पुरानी बातोंको जाननेवाले लोग उसे ऐसे अवसरोंपर दुहराया करते हैं ॥ २४ ॥

यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा यज्ञाय सृष्टः पुरुषो रक्षिता च । तस्मात् सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं धनं न कामाय हितं प्रशस्तम् ॥ २५ ॥ ‘विधाताने यज्ञके लिये ही धनकी सृष्टि की है और यज्ञके लिये उसकी रक्षा करनेके निमित्त पुरुषको उत्पन्न किया है; इसलिये सारे धनका यज्ञ-कार्यमें ही उपयोग करना चाहिये। भोगके लिये धनका उपयोग न तो हितकर है और न उत्तम ही ॥ २५ ॥

एतत् स्वार्थे च कौन्तेय धनं धनवतां वर । धाता ददाति मर्त्येभ्यो यज्ञार्थमिति विद्धि तत् ॥ २६ ॥ ‘धनवानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजय! विधाता मनुष्योंको स्वार्थके लिये भी जो धन देते हैं उसे यज्ञार्थ ही समझो ॥ २६ ॥

तस्माद् बुद्ध्यन्ति पुरुषा न हि तत् कस्यचिद् ध्रुवम् । श्रद्दधानस्ततो लोको दद्याच्चैव यजेत च ॥ २७ ॥ ‘इसीलिये बुद्धिमान् पुरुष यह समझते हैं कि धन कभी किसी एकके पास स्थिर होकर नहीं रहता; अतः श्रद्धालु मनुष्यको चाहिये कि वह उस धनका दान करे और उसे यज्ञमें लगावे ॥ २७ ॥

लब्धस्य त्यागमित्याहुर्न भोगं न च संचयम् । तस्य किं संचयेनार्थः कार्ये ज्यायसि तिष्ठति ॥ २८ ॥

'प्राप्त किये हुए धनका दान करना ही उचित बताया गया है। उसे भोगमें लगाना या संग्रह करके रखना ठीक नहीं है। जिसके सामने बहुत बड़ा कार्य यज्ञ आदि मौजूद है, उसे धनको संग्रह करके रखनेकी क्या आवश्यकता है? ।। २८ ।।

ये स्वधर्मादपेतेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
शतं वर्षाणि ते प्रेत्य पुरीषं भुञ्जते जनाः ।। २९ ।।
'जो मन्दबुद्धि मानव अपने धर्मसे गिरे हुए मनुष्योंको धन देते हैं, वे मरनेके बाद सौ वर्षोंतक विष्ठा भोजन करते हैं ।। २९ ।।

अनर्हते यद् ददाति न ददाति यदर्हते ।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद् दानधर्मोऽपि दुष्करः ।। ३० ।।
'लोग अधिकारीको धन नहीं देते और अनधिकारीको दे डालते हैं, योग्य-अयोग्य पात्रका ज्ञान न होनेसे दानधर्मका सम्पादन भी बहुत कठिन है ।। ३० ।।

लब्धानामपि वित्तानां बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पाये चाप्रतिपादनम् ।। ३१ ।।
'प्राप्त हुए धनका उपयोग करनेमें दो प्रकारकी भूलें हुआ करती हैं, जिन्हें ध्यानमें रखना चाहिये। पहली भूल है अपात्रको धन देना और दूसरी है सुपात्रको धन न देना' ।। ३१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये
षड्विंशोऽध्यायः ।। २६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका वाक्यविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६ ।।

वृषसेने च धर्मज्ञे धृष्टकेतौ तु पार्थिवे ।

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सप्तविंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना

युधिष्ठिर उवाच

अभिमन्यौ हते बाले द्रौपद्यास्तनयेषु च ।
धृष्टद्युम्ने विराटे च द्रुपदे च महीपतौ ॥ १ ॥
वृषसेने च धर्मज्ञे धृष्टकेतौ तु पार्थिवे ।
तथान्येषु नरेन्द्रेषु नानादेश्येषु संयुगे ॥ २ ॥
न च मुञ्चति मां शोको ज्ञातिघातिनमातुरम् ।
राज्यकामुकमत्युग्रं स्ववंशोच्छेदकारिणम् ॥ ३ ॥

**युधिष्ठिरने व्यासजीसे कहा—**मुनिश्रेष्ठ! इस युद्धमें बालक अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, राजा द्रुपद, धर्मज्ञ वृषसेन, चेदिराज धृष्टकेतु तथा नाना देशोंके निवासी अन्यान्य नरेश भी वीरगतिको प्राप्त हुए हैं। मैं जाति-भाइयोंका घातक, राज्यका लोभी, अत्यन्त क्रूर और अपने वंशका विनाश करनेवाला निकला, यही सब सोचकर मुझे शोक नहीं छोड़ रहा है और मैं अत्यन्त आतुर हो रहा हूँ ॥ १—३ ॥

यस्यांके क्रीडमानेन मया वै परिवर्तितम् ।
स मया राज्यलुब्धेन गांगेयो युधि पातितः ॥ ४ ॥

जिनकी गोदमें खेलता हुआ मैं लोटपोट हो जाता था, उन्हीं पितामह गंगानन्दन भीष्मजीको मैंने राज्यके लोभसे मरवा डाला ॥ ४ ॥

यदा ह्येनं विघूर्णन्तमपश्यं पार्थसायकैः ।
कम्पमानं यथा वज्रैः प्रेक्ष्यमाणं शिखण्डिना ॥ ५ ॥
जीर्णसिंहमिव प्रांशुं नरसिंहं पितामहम् ।
कीर्यमाणं शरैर्दृष्ट्वा भृशं मे व्यथितं मनः ॥ ६ ॥

जब मैंने देखा कि अर्जुनके वज्रोपम बाणोंसे आहत हो बूढ़े सिंहके समान मेरे उन्नतकाय पुरुषसिंह पितामह कम्पित हो रहे हैं और उन्हें चक्कर-सा आने लगा है, शिखण्डी उनकी ओर देख रहा है और उनका सारा शरीर बाणोंसे खचाखच भर गया है तो यह सब देखकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ५-६ ॥

प्राङ्मुखं सीदमानं च रथे पररथारुजम् ।
घूर्णमानं यथा शैलं तदा मे कश्मलोऽभवत् ॥ ७ ॥

जो शत्रुदलके रथियोंको पीड़ा देनेमें समर्थ थे, वे पूर्वकी ओर मुँह करके चुपचाप बैठे हुए बाणोंका आघात सह रहे थे और जैसे पर्वत हिल रहा हो, उसी प्रकार झूम रहे थे। उस समय उनकी यह अवस्था देखकर मुझे मूर्च्छा-सी आ गयी थी ॥ ७ ॥

यः स बाणधनुष्पाणिर्योधयामास भार्गवम् ।
बहून्यहानि कौरव्यः कुरुक्षेत्रे महामृधे ॥ ८ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं वाराणस्यां नदीसुतः ।
कन्यार्थमाह्वयद् वीरो रथेनैकेन संयुगे ॥ ९ ॥
येन चोग्रायुधो राजा चक्रवर्ती दुरासदः ।
दग्धश्चास्त्रप्रतापेन स मया युधि घातितः ॥ १० ॥

जिन कुरुकुलशिरोमणि वीरने कुरुक्षेत्रमें महायुद्ध ठानकर हाथमें धनुष-बाण लिये बहुत दिनोंतक परशुरामजीके साथ युद्ध किया था, जिन वीर गंगा-नन्दन भीष्मने वाराणसीपुरीमें काशिराजकी कन्याओंके लिये युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर एकमात्र रथके द्वारा वहाँ एकत्र हुए समस्त क्षत्रिय नरेशोंको ललकारा था तथा जिन्होंने दुर्जय चक्रवर्ती राजा उग्रायुधको अपने अस्त्रोंके प्रतापसे दग्ध कर दिया था, उन्हींको मैंने युद्धमें मरवा डाला ॥ ८—१० ॥

स्वयं मृत्युं रक्षमाणः पाञ्चाल्यं यः शिखण्डिनम् ।
न बाणैः पातयामास सोऽर्जुनेन निपातितः ॥ ११ ॥

जिन्होंने अपने लिये मृत्यु बनकर आये हुए पाञ्चाल राजकुमार शिखण्डीकी स्वयं ही रक्षा की और उसे बाणोंसे धराशायी नहीं किया, उन्हीं पितामहको अर्जुनने मार गिराया ॥ ११ ॥

यदैनं पतितं भूमावपश्यं रुधिरोक्षितम् ।
तदैवाविशदत्युग्रो ज्वरो मां मुनिसत्तम ॥ १२ ॥

मुनिश्रेष्ठ! जब मैंने पितामहको खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देखा, उसी समय मुझपर अत्यन्त भयंकर शोक-ज्वरका आवेश हो गया ॥ १२ ॥

येन संवर्धिता बाला येन स्म परिरक्षिताः ।
स मया राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना ॥ १३ ॥
अल्पकालस्य राज्यस्य कृते मूढेन घातितः ।

जिन्होंने हमें बचपनसे पाल-पोसकर बड़ा किया और सब प्रकारसे हमारी रक्षा की, उन्हींको मुझ पापी, राज्य-लोभी, गुरुघाती एवं मूर्खने थोड़े समयतक रहनेवाले राज्यके लिये मरवा डाला ॥ १३ १/२ ॥

आचार्यश्च महेष्वासः सर्वपार्थिवपूजितः ॥ १४ ॥
अभिगम्य रणे मिथ्या पापेनोक्तः सुतं प्रति ।

सम्पूर्ण राजाओंसे पूजित, महाधनुर्धर आचार्यके पास जाकर मुझ पापीने उनके पुत्रके सम्बन्धमें झूठी बात कही ॥ १४१/२ ॥

तन्मे दहति गात्राणि यन्मां गुरुरभाषत ॥ १५ ॥
सत्यमाख्याहि राजंस्त्वं यदि जीवति मे सुतः ।
सत्यमामर्शयन् विप्रो मयि तत् परिपृष्टवान् ॥ १६ ॥
उस समय गुरुने मुझसे पूछा था—'राजन्! सच बताओ, क्या मेरा पुत्र जीवित है?' उन ब्राह्मणने सत्यका निर्णय करनेके लिये ही मुझसे यह बात पूछी थी। उनकी वह बात जब याद आती है तो मेरा सारा शरीर शोकाग्निसे दग्ध होने लगता है ॥ १५-१६ ॥

कुञ्जरं चान्तरं कृत्वा मिथ्योपचरितं मया ।
सुभृशं राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना ॥ १७ ॥
परंतु राज्यके लोभमें अत्यन्त फँसे हुए मुझ पापी गुरु-हत्यारेने मरे हुए हाथीकी आड़ लेकर उनसे झूठ बोल दिया और उनके साथ धोखा किया ॥ १७ ॥

सत्यकञ्चुकमुन्मुच्य मया स गुरुरहवे ।
अश्वत्थामा हत इति निरुक्तः कुञ्जरे हते ॥ १८ ॥
मैंने सत्यका चोला उतार फेंका और युद्धमें अश्वत्थामा नामक हाथीके मारे जानेपर गुरुदेवसे कह दिया कि 'अश्वत्थामा मारा गया।' (इससे उन्हें अपने पुत्रके मारे जानेका विश्वास हो गया) ॥ १८ ॥

काँल्लोकांस्तु गमिष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
अघातयं च यत् कर्णं समरेष्वपलायिनम् ॥ १९ ॥
ज्येष्ठभ्रातरमत्युग्रं को मत्तः पापकृत्तमः ।
यह अत्यन्त दुष्कर पापकर्म करके मैं किन लोकोंमें जाऊँगा? युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले अत्यन्त उग्र पराक्रमी अपने बड़े भाई कर्णको भी मैंने मरवा दिया—मुझसे बढ़कर महान् पापाचारी दूसरा कौन होगा? ॥ १९१/२ ॥

अभिमन्युं च यद् बालं जातं सिंहमिवाद्रिषु ॥ २० ॥
प्रावेशयमहं लुब्धो वाहिनीं द्रोणपालिताम् ।
तदाप्रभृति बीभत्सुं न शक्नोमि निरीक्षितुम् ॥ २१ ॥
कृष्णं च पुण्डरीकाक्षं किल्बिषी भ्रूणहा यथा ।
मैंने राज्यके लोभमें पड़कर जब पर्वतोंपर उत्पन्न हुए सिंहके समान पराक्रमी अभिमन्युको द्रोणाचार्यद्वारा सुरक्षित कौरवसेनामें झोंक दिया, तभीसे भ्रूण-हत्या करनेवाले पापीके समान मैं अर्जुन तथा कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पाता हूँ ॥

द्रौपदीं चापि दुःखार्तां पञ्चपुत्रैर्विनाकृताम् ॥ २२ ॥
शोचामि पृथिवीं हीनां पञ्चभिः पर्वतैरिव ।

जैसे पृथ्वी पाँच पर्वतोंसे हीन हो जाय, उसी प्रकार अपने पाँचों पुत्रोंसे हीन होकर दुःखसे आतुर हुई द्रौपदीके लिये भी मुझे निरन्तर शोक बना रहता है ॥

सोऽहमागस्करः पापः पृथिवीनाशकारकः ॥ २३ ॥
आसीन एवमेवेदं शोषयिष्ये कलेवरम् ।
अतः मैं पापी, अपराधी तथा सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश करनेवाला हूँ; इसलिये यहीं इसी रूपमें बैठा हुआ अपने इस शरीरको सुखा डालूँगा ॥ २३ १/२ ॥

प्रायोपविष्टं जानीध्वमथ मां गुरुघातिनम् ॥ २४ ॥
जातिष्वन्यासपि यथा न भवेयं कुलान्तकृत् ।
आपलोग मुझ गुरुघातीको आमरण अनशनके लिये बैठा हुआ समझें, जिससे दूसरे जन्मोंमें मैं फिर अपने कुलका विनाश करनेवाला न होऊँ ॥ २४ १/२ ॥

न भोक्ष्ये न च पानीयमुपभोक्ष्ये कथञ्चन ॥ २५ ॥
शोषयिष्ये प्रियान् प्राणानिहस्थोऽहं तपोधनाः ।
तपोधनो! अब मैं किसी तरह न तो अन्न खाऊँगा और न पानी ही पीऊँगा। यहीं रहकर अपने प्यारे प्राणोंको सुखा दूँगा ॥ २५ १/२ ॥

यथेष्टं गम्यतां काममनुजाने प्रसाद्य वः ॥ २६ ॥
सर्वे मामनुजानीत त्यक्ष्यामीदं कलेवरम् ।
मैं आपलोगोंको प्रसन्न करके अपनी ओरसे चले जानेकी अनुमति देता हूँ। जिसकी जहाँ इच्छा हो वहाँ अपनी रुचिके अनुसार चला जाय। आप सब लोग मुझे आज्ञा दें कि मैं इस शरीरको अनशन करके त्याग दूँ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमेवंवादिनं पार्थं बन्धुशोकेन विह्वलम् ॥ २७ ॥
मैवमित्यब्रवीद् व्यासो निगृह्य मुनिसत्तमः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपने बन्धु-जनोंके शोकसे विह्वल होकर युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मुनिवर व्यासजीने उन्हें रोककर कहा—'नहीं, ऐसा नहीं हो सकता' ॥ २७ १/२ ॥

व्यास उवाच

अतिवेलं महाराज न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥
पुनरुक्तं तु वक्ष्यामि दिष्टमेतदिति प्रभो ।
**व्यासजी बोले—**महाराज! तुम बहुत शोक न करो। प्रभो! मैं पहलेकी कही हुई बात ही फिर दोहरा रहा हूँ। यह सब प्रारब्धका ही खेल है ॥ २८ १/२ ॥

संयोगा विप्रयोगान्ता जातानां प्राणिनां ध्रुवम् ॥ २९ ॥
बुद्बुदा इव तोयेषु भवन्ति न भवन्ति च ।

जैसे पानीमें बुलबुले होते और मिट जाते हैं, उसी प्रकार संसारमें उत्पन्न हुए प्राणियोंके जो आपसमें संयोग होते हैं, उनका अन्त निश्चय ही वियोगमें होता है ॥
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ॥ ३० ॥
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ।
सम्पूर्ण संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगोंका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है ॥ ३० १/२ ॥
सुखं दुःखान्तमालस्यं दाक्ष्यं दुःखं सुखोदयम् ।
भूतिः श्रीर्ह्रीर्धृतिः कीर्तिर्दक्षे वसति नालसे ॥ ३१ ॥
आलस्य सुखरूप प्रतीत होता है, परंतु उसका अन्त दुःख है तथा कार्यदक्षता दुःखरूप प्रतीत होती है, परंतु उससे सुखका उदय होता है। इसके सिवा ऐश्वर्य, लक्ष्मी, लज्जा, धृति और कीर्ति—ये कार्यदक्ष पुरुषमें ही निवास करती हैं, आलसीमें नहीं ॥ ३१ ॥
नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय शत्रवः ।
न च प्रजालमर्थेभ्यो न सुखेभ्योऽप्यलं धनम् ॥ ३२ ॥
न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं न शत्रु दुख देनेमें। इसी प्रकार न तो प्रजा धन दे सकती है और न धन सुख दे सकता है ॥ ३२ ॥
यथा सृष्टोऽसि कौन्तेय धात्रा कर्मसु तत् कुरु ।
अत एव हि सिद्धिस्ते नेशस्त्वं कर्मणां नृप ॥ ३३ ॥
कुन्तीनन्दन! नरेश्वर! विधाताने जैसे कर्मोंके लिये तुम्हारी सृष्टि की है, तुम उन्हींका अनुष्ठान करो। उन्हींसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। तुम कर्मोंके (फलके) स्वामी या नियन्ता नहीं हो ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये
सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशोऽध्यायः

अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना

वैशम्पायन उवाच

ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानभ्युत्सिसृक्षतः ।
ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य व्यासः शोकमपानुदत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भाई-बन्धुओं के शोकसे संतप्त हो अपने प्राणोंको त्याग देनेकी इच्छावाले ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके शोकको महर्षि व्यासने इस प्रकार दूर किया ॥ १ ॥

व्यास उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अश्मगीतं नरव्याघ्र तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**व्यासजी बोले—**पुरुषसिंह युधिष्ठिर! इस प्रसंगमें जानकार लोग अश्मा ब्राह्मणके गीतसम्बन्धी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, इसे सुनो ॥ २ ॥

अश्मानं ब्राह्मणं प्राज्ञं वैदेहो जनको नृपः ।
संशयं परिपप्रच्छ दुःखशोकसमन्वितः ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, दुःख-शोकमें डूबे हुए विदेहराज जनकने ज्ञानी ब्राह्मण अश्मासे अपने मनका संदेह इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥

जनक उवाच

आगमे यदि वापाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च ।
नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता ॥ ४ ॥
**जनक बोले—**ब्रह्मन्! कुटुम्बीजन और धनकी उत्पत्ति या विनाश होनेपर कल्याण चाहनेवाले पुरुषको कैसा निश्चय करना चाहिये? ॥ ४ ॥

अश्मोवाच

उत्पन्नमिममात्मानं नरस्यानन्तरं ततः ।
तानि तान्यनुवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ ५ ॥
**अश्माने कहा—**राजन्! मनुष्यका यह शरीर जब जन्म ग्रहण करता है, तब उसके साथ ही सुख और दुःख भी उसके पीछे लग जाते हैं ॥ ५ ॥
तेषामन्यतरापत्तौ यद् यदेवोपपद्यते ।

तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिलः ॥ ६ ॥ इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी प्राप्ति तो होती ही है; अतः जो भी सुख या दुःख उपस्थित होता है, वही मनुष्यके ज्ञानको उसी प्रकार हर लेता है, जैसे हवा बादलको उड़ा ले जाती है ॥ ६ ॥

अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः । इत्येभिर्हेतुभिस्तस्य त्रिभिश्चिक्तं प्रसिच्यते ॥ ७ ॥ इसीसे 'मैं कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ और कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ' ये अहंकारकी तीन धाराएँ मनुष्यके चित्तको सींचने लगती हैं ॥ ७ ॥

सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् । परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥ ८ ॥ फिर वह मनुष्य भोगोंमें आसक्तचित्त होकर क्रमशः बाप-दादोंकी रखी हुई कमाईको उड़ाकर कंगाल हो जाता है और दूसरोंके धनको हड़प लेना अच्छा मानने लगता है ॥ ८ ॥

तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् । प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥ ९ ॥ जैसे व्याधे अपने बाणोंद्वारा मृगोंको आगे बढ़नेसे रोकते हैं, उसी प्रकार मर्यादा लाँघकर अनुचितरूपसे दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाले उस मनुष्यको राजालोग दण्डद्वारा वैसे कुमार्गपर चलनेसे रोकते हैं ॥ ९ ॥

ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः । परेण ते वर्षशतान्न भविष्यन्ति पार्थिव ॥ १० ॥ राजन्! जो बीस या तीस वर्षकी उम्रवाले मनुष्य चोरी आदि कुकर्मोंमें लग जाते हैं, वे सौ वर्षतक जीवित नहीं रह पाते ॥ १० ॥

तेषां परमदुःखानां बुद्ध्या भेषज्यमाचरेत् । सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्ततः ॥ ११ ॥ जहाँ-तहाँ समस्त प्राणियोंके दुःखद बर्तावसे उनपर जो कुछ बीतता है उसे देखता हुआ मनुष्य दरिद्रतासे प्राप्त होनेवाले उन महान् दुःखोंका निवारण करनेके लिये बुद्धिके द्वारा औषध करे (अर्थात् विचारद्वारा अपने-आपको कुमार्गपर जानेसे रोके) ॥ ११ ॥

मानसानां पुनर्योनिर्दुःखानां चित्तविभ्रमः । अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपपद्यते ॥ १२ ॥ मनुष्योंको बार-बार मानसिक दुःखोंकी प्राप्तिके कारण दो ही हैं—चित्तका भ्रम और अनिष्टकी प्राप्ति। तीसरा कोई कारण सम्भव नहीं है ॥ १२ ॥

एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् । विविधान्युपवर्तन्ते तथा संस्पर्शजान्यपि ॥ १३ ॥

इस प्रकार मनुष्यको इन्हीं दो कारणोंसे ये भिन्न-भिन्न प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं। विषयोंकी आसक्तिसे भी ये दुःख प्राप्त होते हैं ।। १३ ।। जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १४ ।। बुढ़ापा और मृत्यु—ये दोनों दो भेड़ियोंके समान हैं, जो बलवान् दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियोंको खा जाते हैं ।। १४ ।। न कश्चिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानवः । अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ।। १५ ।। कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मौतको लाँघ नहीं सकता। भले ही वह समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीपर विजय पा चुका हो ।। १५ ।। सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् । प्राप्तव्यमवशैः सर्वं परिहारो न विद्यते ।। १६ ।। प्राणियोंके निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है, क्योंकि उसके टालनेका कोई उपाय नहीं है ।। १६ ।। पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्तेऽर्था वै कांक्षिता ये ततोऽन्यथा ।। १७ ।। नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न-कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है (अर्थात् सुख-ही-सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं) ।। १७ ।। अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्च सुप्रियैः । अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ।। १८ ।। अप्रिय वस्तुओंके साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओंका वियोग, अर्थ, अनर्थ, सुख और दुःख—इन सबकी प्राप्ति प्रारब्धके विधानके अनुसार होती है ।। १८ ।। प्रादुर्भावश्च भूतानां देहत्यागस्तथैव च । प्राप्तिर्व्यायामयोगश्च सर्वमेतत् प्रतिष्ठितम् ।। १९ ।। प्राणियोंकी उत्पत्ति, देहावसान, लाभ* और हानि—ये सब प्रारब्धके ही आधारपर स्थित हैं ।। १९ ।। गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः । तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते ।। २० ।। जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध स्वभावतः आते-जाते रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य सुख और दुःखोंको प्रारब्धानुसार पाता रहता है ।। २० ।। आसनं शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् । नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत ।। २१ ।।

सभी प्राणियोंके लिये बैठना, सोना, चलना-फिरना, उठना और खाना-पीना—ये सभी कार्य समयके अनुसार ही नियत रूपसे होते रहते हैं ।। २१ ।।
वैद्याश्चाप्यातुराः सन्ति बलवन्तश्च दुर्बलाः ।
श्रीमन्तश्चापरे षण्ढा विचित्रः कालपर्ययः ।। २२ ।।
कभी-कभी वैद्य भी रोगी, बलवान् भी दुर्बल और श्रीमान् भी असमर्थ हो जाते हैं, यह समयका उलट-फेर बड़ा अद्भुत है ।। २२ ।।
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं रूपमेव च ।
सौभाग्यमुपभोगश्च भवितव्येन लभ्यते ।। २३ ।।
उत्तम कुलमें जन्म, बल-पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और उपभोग-सामग्री—ये सब होनहारके अनुसार ही प्राप्त होते हैं ।। २३ ।।
सन्ति पुत्राः सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् ।
नास्ति पुत्रः समृद्धानां विचित्रं विधिचेष्टितम् ।। २४ ।।
जो दरिद्र हैं और संतानकी इच्छा नहीं रखते हैं, उनके तो बहुत-से पुत्र हो जाते हैं और जो धनवान् हैं, उनमेंसे किसी-किसीको एक पुत्र भी नहीं प्राप्त होता। विधाताकी चेष्टा बड़ी विचित्र है ।। २४ ।।
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्रं बुभुक्षाश्वापदो विषम् ।
ज्वरश्च मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा ।। २५ ।।
निर्माणे यस्य यद् दिष्टं तेन गच्छति सेतुना ।
रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, प्यास, विपत्ति, विष, ज्वर और ऊँचे स्थानसे गिरना—ये सब जीवकी मृत्युके निमित्त हैं। जन्मके समय जिसके लिये प्रारब्धवश जो निमित्त नियत कर दिया गया है, वही उसका सेतु है, अतः उसीके द्वारा वह जाता है अर्थात् परलोकमें गमन करता है ।। २५ ½ ।।
दृश्यते नाप्यतिक्रामन् निष्क्रान्तोऽथवा पुनः ।। २६ ।।
दृश्यते चाप्यतिक्रामन्निग्राह्योऽथवा पुनः ।
कोई इस सेतुका उल्लंघन करता दिखायी नहीं देता अथवा पहले भी किसीने इसका उल्लंघन किया हो, ऐसा देखनेमें नहीं आया। कोई-कोई पुरुष जो (तपस्या आदि प्रबल पुरुषार्थके द्वारा) दैवके नियन्त्रणमें रहनेयोग्य नहीं है, वह पूर्वोक्त सेतुका उल्लंघन करता भी दिखायी देता है ।। २६ ½ ।।
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन् वसुमान् नरः ।
दरिद्रश्च परिक्लिष्टः शतवर्षो जरान्वितः ।। २७ ।।
इस जगत्में धनवान् मनुष्य भी जवानीमें ही नष्ट होता दिखायी देता है और क्लेशमें पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ वर्षोंतक जीवित रहकर अत्यन्त वृद्धावस्थामें मरता देखा जाता है ।। २७ ।।

अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः ।
समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतंगवत् ॥ २८ ॥
जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं और धनवान् कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी कीट-पतंगोंके समान नष्ट होते रहते हैं ॥

प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ २९ ॥
जगत्में प्रायः धनवानोंको खाने और पचानेकी शक्ति ही नहीं रहती है और दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं ॥ २९ ॥

अहमेतत् करोमीति मन्यते कालनोदितः ।
यद् यदिष्टमसंतोषाद् दुरात्मा पापमाचरेत् ॥ ३० ॥
दुरात्मा मनुष्य कालसे प्रेरित होकर यह अभिमान करने लगता है कि मैं यह करूँगा। तत्पश्चात् असंतोषवश उसे जो-जो अभीष्ट होता है, उस पापपूर्ण कृत्यको भी वह करने लगता है ॥ ३० ॥

मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं प्रसंगा निन्दिता बुधैः ।
दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र सम्प्रयुक्ता बहुश्रुताः ॥ ३१ ॥
विद्वान् पुरुष शिकार करने, जूआ खेलने, स्त्रियोंके संसर्गमें रहने और मदिरा पीनेके प्रसंगोंकी बड़ी निन्दा करते हैं, परंतु इन पापकर्मोंमें अनेक शास्त्रोंके श्रवण और अध्ययनसे सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ॥

इति कालेन सर्वार्थानीप्सितानीप्सितानिह ।
स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कालके प्रभावसे समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंको प्राप्त करते रहते हैं, इस इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिका अदृष्टके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३२ ॥

वायुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहःक्षपे ।
ज्योतींषि सरितः शैलान् कः करोति बिभर्ति च ॥ ३३ ॥
वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतोंको कालके सिवा कौन बनाता और धारण करता है? ॥ ३३ ॥

शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते ।
एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ॥ ३४ ॥
सर्दी, गर्मी और वर्षाका चक्र भी कालसे ही चलता है। नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्योंके सुख-दुःख भी कालसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥

नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः ।
त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥ ३५ ॥

वृद्धावस्था और मृत्युके वशमें पड़े हुए मनुष्यको औषध, मन्त्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं।।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागमः ।। ३६ ।।
जैसे महासागरमें एक काठ एक ओरसे और दूसरा दूसरी ओरसे आकर दोनों थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ भी जाते हैं, इसी प्रकार यहाँ प्राणियोंके संयोग-वियोग होते रहते हैं ।। ३६ ।।

ये चैव पुरुषाः स्त्रीभिर्गीतवाद्यैरुपस्थिताः ।
ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः ।। ३७ ।।
जगत्में जिन धनवान् पुरुषोंकी सेवामें बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत और वाद्योंके साथ उपस्थित हुआ करती हैं और जो अनाथ मनुष्य दूसरोंके अन्नपर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सबके प्रति कालकी समान चेष्टा होती है ।। ३७ ।।

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ।। ३८ ।।
हमने संसारमें अनेक बार जन्म लेकर सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु अब वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं? ।। ३८ ।।

नैवास्य कश्चिद् भविता नायं भवति कस्यचित् ।
पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुहृज्जनैः ।। ३९ ।।
इस जीवका न तो कोई सम्बन्धी होगा और न यह किसीका सम्बन्धी है। जैसे मार्गमें चलनेवालोंको दूसरे राहगीरोंका साथ मिल जाता है, उसी प्रकार यहाँ भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और सुहृदोंका समागम होता है ।। ३९ ।।

क्वासे क्व च गमिष्यामि को न्वहं किमिहास्थितः ।
कस्मात् किमनुशोचेयमित्येवं स्थापयेन्मनः ।। ४० ।।
अतः विवेकी पुरुषको अपने मनमें यह विचार करना चाहिये कि 'मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा, कौन हूँ, यहाँ किसलिये आया हूँ और किसलिये किसका शोक करूँ?' ।।

अनित्ये प्रियसंवासे संसारे चक्रवद्गतौ ।
पथि संगतमेवैतद् भ्राता माता पिता सखा ।। ४१ ।।
यह संसार चक्रके समान घूमता रहता है। इसमें प्रियजनोंका सहवास अनित्य है। यहाँ भ्राता, मित्र, पिता और माता आदिका साथ रास्तेमें मिले हुए बटोहियोंके समान ही है ।। ४१ ।।

न दृष्टपूर्वं प्रत्यक्षं परलोकं विदुर्बुधाः ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य श्रद्धातव्यं बुभूषता ।। ४२ ।।

यद्यपि विद्वान् पुरुष कहते हैं कि परलोक न तो आँखोंके सामने है और न पहलेका ही देखा हुआ है, तथापि अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके उसकी बातोंपर विश्वास करना चाहिये ।। ४२ ।।

कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् ।
यजेच्च विद्वान् विधिवत् त्रिवर्गं चाप्युपाचरेत् ।। ४३ ।।
विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे। धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे ।। ४३ ।।

संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे ।
जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ।। ४४ ।।
जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े-बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है ।। ४४ ।।

आयुर्वेदमधीयानाः केवलं सपरिग्रहाः ।
दृश्यन्ते बहवो वैद्या व्याधिभिः समभिप्लुताः ।। ४५ ।।
केवल आयुर्वेदका अध्ययन करनेवाले बहुत-से वैद्य भी परिवारसहित रोगोंके शिकार हुए देखे जाते हैं ।।

ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च ।
न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ।। ४६ ।।
वे कड़वे-कड़वे काढ़े और नाना प्रकारके घृत पीते रहते हैं तो भी जैसे महासागर अपनी तट-भूमिसे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे मौतको लाँघ नहीं पाते हैं ।।

रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायनाः ।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः ।। ४७ ।।
रसायन जाननेवाले वैद्य अपने लिये रसायनोंका अच्छी तरह प्रयोग करके भी वृद्धावस्थाद्वारा वैसे ही जर्जर हुए दिखायी देते हैं, जैसे श्रेष्ठ हाथियोंके आघातसे टूटे हुए वृक्ष दृष्टिगोचर होते हैं ।। ४७ ।।

तथैव तपसोपेताः स्वाध्यायाभ्यसने रताः ।
दातारो यज्ञशीलाश्च न तरन्ति जरान्तकौ ।। ४८ ।।
इसी प्रकार शास्त्रोंके स्वाध्याय और अभ्यासमें लगे हुए विद्वान्, तपस्वी, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और मृत्युको पार नहीं कर पाते हैं ।। ४८ ।।

न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः समाः ।
जातानां सर्वभूतानां न पक्षा न पुनः क्षपाः ।। ४९ ।।
संसारमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणियोंके दिन-रात, वर्ष, मास और पक्ष एक बार बीतकर फिर वापस नहीं लौटते हैं ।। ४९ ।।

सोऽयं विपुलमध्वानं कालेन ध्रुवमध्रुवः ।

नरोऽवशः समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम् ॥ ५० ॥ मृत्युके इस विशाल मार्गका सेवन सभी प्राणियोंको करना पड़ता है। इस अनित्य मानवको भी कालसे विवश होकर कभी न टलनेवाले मृत्युके मार्गपर आना ही पड़ता है ॥ ५० ॥

देहो वा जीवतोऽभ्येति जीवो वाभ्येति देहतः । पथि संगममभ्येति दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ॥ ५१ ॥ (आस्तिक मतके अनुसार) जीव (चेतन) से शरीरकी उत्पत्ति हो या (नास्तिकोंकी मान्यताके अनुसार) शरीरसे जीवकी। सर्वथा स्त्री-पुत्र आदि या अन्य बन्धुओंके साथ जो समागम होता है, वह रास्तेमें मिलनेवाले राहगीरोंके समान ही है ॥ ५१ ॥

नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ५२ ॥ किसी भी पुरुषको कभी किसीके साथ भी सदा एक स्थानमें रहनेका सुयोग नहीं मिलता। जब अपने शरीरके साथ भी बहुत दिनोंतक सम्बन्ध नहीं रहता, तब दूसरे किसीके साथ कैसे रह सकता है? ॥ ५२ ॥

क्व नु तेऽद्य पिता राजन् क्व नु तेऽद्य पितामहाः । न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽनघ ॥ ५३ ॥ राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? आज तुम्हारे पितामह कहाँ गये? निष्पाप नरेश! आज न तो तुम उन्हें देख रहे हो और न वे तुम्हें देखते हैं ॥ ५३ ॥

न चैव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य च । आगमस्तु सतां चक्षुर्नृपते तमिहाचर ॥ ५४ ॥ कोई भी मनुष्य यहींसे इन स्थूल नेत्रोंद्वारा स्वर्ग और नरकको नहीं देख सकता। उन्हें देखनेके लिये सत्पुरुषोंके पास शास्त्र ही एकमात्र नेत्र हैं, अतः नरेश्वर! तुम यहाँ उस शास्त्रके अनुसार ही आचरण करो ॥ ५४ ॥

चरितब्रह्मचयर्यो हि प्रजायेत यजेत च । पितृदेवमनुष्याणामृण्यादनसूयकः ॥ ५५ ॥ मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पूर्णरूपसे पालन करके गृहस्थ-आश्रम स्वीकार करे और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों (अतिथियों) के ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पादन तथा यज्ञ करे, किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखे ॥ ५५ ॥

स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः प्राग् ब्रह्मचारी प्रविविक्तचक्षुः । आराधयेत् स्वर्गमिमं च लोकं परं च मुक्त्वा हृदयव्यलीकम् ॥ ५६ ॥

मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पालन करके संतानोत्पादनके लिये विवाह करे, नेत्र आदि इन्द्रियोंको पवित्र रखे और स्वर्गलोक तथा इहलोकके सुखकी आशा छोड़कर हृदयके शोक-संतापको दूर करके यज्ञपरायण हो परमात्माकी आराधना करता रहे ॥ ५६ ॥

समं हि धर्मं चरतो नृपस्य
द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत् ।
प्रवृत्तधर्मस्य यशोऽभिवर्धते
सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु ॥ ५७ ॥

राजा यदि नियमपूर्वक प्रजाके निकटसे करके रूपमें द्रव्य ग्रहण करे और राग-द्वेषसे रहित हो राजधर्मका पालन करता रहे तो उस धर्मपरायण नरेशका सुयश सम्पूर्ण चराचर लोकोंमें फैल जाता है ॥ ५७ ॥

इत्येवमाज्ञाय विदेहराजो
वाक्यं समग्रं परिपूर्णहेतुः ।
अश्मानमामन्त्र्य विशुद्धबुद्धि-
र्ययौ गृहं स्वं प्रति शान्तशोकः ॥ ५८ ॥

निर्मल बुद्धिवाले विदेहराज जनक अश्माका यह युक्तिपूर्ण सम्पूर्ण उपदेश सुनकर शोकरहित हो गये और उनकी आज्ञा ले अपने घरको लौट गये ॥ ५८ ॥

तथा त्वमप्यच्युत मुञ्च शोक-
मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि ।
क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते
तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मावमंस्थाः ॥ ५९ ॥

अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! तुम भी शोक छोड़कर उठो और हृदयमें हर्ष धारण करो। तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर विजय पायी है; अतः इसे भोगो। इसकी अवहेलना न करो ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥


* नीलकण्ठने 'प्राप्ति' का अर्थ 'लाभ' और 'व्यायाम' का अर्थ उसके विपरीत 'अलाभ' किया है।

श्रीकृष्णके द्वारा नारद-संजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा नारद-संजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न

वैशम्पायन उवाच

अव्याहरति राजेन्द्रे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ।
गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सबके समझाने-बुझानेपर भी जब धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर मौन ही रह गये, तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ १ ॥

अर्जुन उवाच

ज्ञातिशोकाभिसंतप्तो धर्मपुत्रः परंतपः ।
एष शोकार्णवे मग्नस्तमाश्वासय माधव ॥ २ ॥
**अर्जुन बोले—**माधव! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये धर्मपुत्र युधिष्ठिर स्वयं भाई-बन्धुओंके शोकसे संतप्त हो शोकके समुद्रमें डूब गये हैं, आप इन्हें धीरज बँधाइये ॥

सर्वे स्म ते संशयिताः पुनरेव जनार्दन ।
अस्य शोकं महाबाहो प्रणाशयितुमर्हसि ॥ ३ ॥
महाबाहु जनार्दन! हम सब लोग पुनः महान् संशयमें पड़ गये हैं। आप इनके शोकका नाश कीजिये ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गोविन्दो विजयेन महात्मना ।
पर्यवर्तत राजानं पुण्डरीकेक्षणोऽच्युतः ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! महामना अर्जुनके ऐसा कहनेपर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले कमलनयन भगवान् गोविन्द राजा युधिष्ठिरकी ओर घूमे—उनके सम्मुख हुए ॥ ४ ॥

अनतिक्रमणीयो हि धर्मराजस्य केशवः ।
बाल्यात् प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ॥ ५ ॥
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे; क्योंकि श्रीकृष्ण बाल्यावस्थासे ही उन्हें अर्जुनसे भी अधिक प्रिय थे ॥ ५ ॥

सम्प्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् ।
शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥ ६ ॥
महाबाहु गोविन्दने युधिष्ठिरकी पत्थरके बने हुए खम्भे-जैसी चन्दनचर्चित भुजाको हाथमें लेकर उनका मनोरंजन करते हुए इस प्रकार बोलना आरम्भ किया ॥ ६ ॥

शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् ।
व्याकोशमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्य इवोदिते ॥ ७ ॥
उस समय सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रोंसे युक्त उनका मुखारविन्द सूर्योदयके समय पूर्णतः विकसित हुए कमलके समान शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥

वासुदेव उवाच

मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् ।
न हि ते सुलभा भूयो ये हतास्मिन् रणाजिरे ॥ ८ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**पुरुषसिंह! तुम शोक न करो। शोक तो शरीरको सुखा देनेवाला होता है। इस समरांगणमें जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है ॥ ८ ॥

स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने ।
एवं ते क्षत्रिया राजन् ये व्यतीता महारणे ॥ ९ ॥
राजन्! जैसे सपनेमें मिले हुए धन जगनेपर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमरमें नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है ॥ ९ ॥

सर्वेऽप्यभिमुखाः शूरा विजिता रणशोभिनः ।
नैषां कश्चित् पृष्ठतो वा पलायन् वापि पतितः ॥ १० ॥
संग्राममें शोभा पानेवाले वे सभी शूरवीर शत्रु का सामना करते हुए पराजित हुए हैं। उनमेंसे कोई भी पीठपर चोट खाकर या भागता हुआ नहीं मारा गया है ॥

सर्वे त्यक्त्वाऽऽत्मनः प्राणान् युद्ध्य्वा वीरा महामृधे ।
शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न तान् शोचितुमर्हसि ॥ ११ ॥
सभी वीर महायुद्धमें जूझते हुए अपने प्राणोंका परित्याग करके अस्त्र-शस्त्रोंसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये हैं, अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥

क्षत्रधर्मरताः शूरा वेदवेदाङ्गपारगाः ।
प्राप्ता वीरगतिं पुण्यां तान् न शोचितुमर्हसि ॥ १२ ॥
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।
क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले, वेद-वेदांगोंके पारंगत वे शूरवीर नरेश पुण्यमयी वीर-गतिको प्राप्त हुए हैं। पहलेके मरे हुए महानुभाव भूपतियोंका चरित्र सुनकर तुम्हें अपने उन बन्धुओंके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १२ १/२ ॥

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।। १३ ।।
सृञ्जयं पुत्रशोकार्तं यथायं नारदोऽब्रवीत् ।
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जैसा कि इन देवर्षि नारदजीने पुत्र-शोकसे पीड़ित हुए राजा सृञ्जयसे कहा था ।। १३१/२ ।।
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय ।। १४ ।।
अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना ।
‘सृञ्जय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्गके लोग कोई भी सुख और दुःखोंके बन्धनसे मुक्त नहीं हुए हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी। फिर इसके लिय शोक क्या करना है? ।। १४१/२ ।।
महाभाग्यं पुरा राज्ञां कीर्त्यमानं मया शृणु ।। १५ ।।
गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि ।
‘नरेश्वर! मैं पूर्ववर्ती राजाओंके महान् सौभाग्यका वर्णन करता हूँ। सुनो और सावधान हो जाओ। इससे तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा ।। १५१/२ ।।
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।। १६ ।।
शममानय संतापं शृणु विस्तरशश्च मे ।
‘मरे हुए महानुभाव भूपतियोंके नाम सुनकर ही तुम अपने मानसिक संतापको शान्त कर लो और मुझसे विस्तारपूर्वक उन सबका परिचय सुनो ।। १६१/२ ।।
क्रूरग्रहाभिशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ।। १७ ।।
अग्रियाणां क्षितिभुजामुपादानं मनोहरम् ।
‘उन पूर्ववर्ती राजाओंका श्रवण करनेयोग्य मनोहर वृत्तान्त बहुत ही उत्तम, क्रूर ग्रहोंको शान्त करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है ।। १७१/२ ।।
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।। १८ ।।
यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ।। १९ ।।
‘सृञ्जय! हमने सुना है कि अविक्षित्के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेशके यज्ञमें इन्द्र तथा वरुणसहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे ।। १८-१९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 190)

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महाभारत

स्वयं श्रीकृष्ण शोकमग्न युधिष्ठिरको समझा रहे हैं