महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ससांख्यधारणं चैव विदितात्मा नरर्षभ । जयेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना ॥ २० ॥ नरश्रेष्ठ! सांख्य और योगके अनुसार धारणा-पूर्वक आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके ध्यानयोगके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लगा देनेसे योगी मृत्युको जीत लेता है ॥ २० ॥
गच्छेत् प्राप्याक्षयं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम् । शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ २१ ॥ ऐसा करनेसे वह उस सनातन पदको प्राप्त करता है, जो अशुद्ध चित्तवाले पुरुषोंको दुर्लभ है तथा जो अक्षय, अजन्मा, अचल, अविकारी, पूर्ण एवं कल्याणमय है ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ सतरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१७ ॥
* धारणाद्वारा पंचभूतोंपर विजय या अधिकार प्राप्त करके योगी जन्म, जरा, मृत्यु आदिको जीत लेता है; इस विषयमें यह सूत्र भी प्रमाण है—
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पंचात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥
'ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्निमय शरीरको प्राप्त कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३।४६, ४७)।
३१८-
अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फल मुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप ।
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—नरेश्वर! तुमने जो मुझसे अव्यक्तमें स्थित परब्रह्मके विषयमें प्रश्न किया है, वह अत्यन्त गूढ़ है। उसके विषयमें ध्यान देकर सुनो ॥ १ ॥
यथाऽऽर्षेणेह विधिना चरताऽवनतेन ह ।
मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ॥ २ ॥
मिथिलापते! पूर्वकालमें मैंने शास्त्रोक्त विधिसे व्रतका आचरण करते हुए नतमस्तक होकर भगवान् सूर्यसे जिस प्रकार शुक्लयजुर्वेदके मन्त्र उपलब्ध किये थे, वह सब प्रसंग सुनो ॥ २ ॥
महता तपसा देवस्तपिष्णुः सेवितो मया ।
प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदानघ ॥ ३ ॥
निष्पाप नरेश! पहलेकी बात है, मैंने बड़ी भारी तपस्या करके तपनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा— ॥ ३ ॥
वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् ।
तत् ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो। वह अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें दे दूँगा; क्योंकि मेरा मन तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट है। मेरा कृपा-प्रसाद प्रायः दुर्लभ है’ ॥ ४ ॥
ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतां वरः ।
यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५ ॥
तब मैंने मस्तक झुकाकर तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और उनसे कहा—‘प्रभो! मैं शीघ्र ही ऐसे यजुर्मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ' जो आजसे पहले
दूसरे किसीके उपयोगमें नहीं आये हैं' ।। ५ ।। ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज । सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ।। ६ ।। ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु । विवृतं च ततो मेऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ।। ७ ।। तब भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं तुम्हें यजुर्वेद प्रदान करता हूँ। तुम अपना मुँह खोलो। वाङ्मयी सरस्वती देवी तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करेंगी।' यह सुनकर मैंने मुँह खोल दिया और सरस्वती देवी उसमें प्रविष्ट हो गयीं ।। ६-७ ।। ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ । अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! सरस्वतीके प्रवेश करते ही मैं तापसे जलने लगा और जलमें घुस गया। महात्मा भास्करकी महिमाको न जानने तथा अपनेमें सहनशीलता न होनेके कारण मुझे उस समय विशेष कष्ट हुआ था ।। ८ ।। ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान् रविः । मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ।। ९ ।। तदनन्तर मुझे तापसे दग्ध होता देख भगवान् सूर्यने कहा—'तात! तुम दो घड़ीतक इस तापको सहन करो। फिर यह स्वयं ही शीतल एवं शान्त हो जायगा' ।। शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः । प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ।। १० ।। जब मैं पूर्ण शीतल हो गया, तब मुझे देखकर भगवान् भास्करने कहा—'विप्रवर! खिल और उपनिषदों-सहित सम्पूर्ण वेद तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित होंगे ।। १० ।। कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ । तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ।। ११ ।। 'द्विजश्रेष्ठ! तुम सम्पूर्ण शतपथका भी प्रणयन (सम्पादन) करोगे। इसके बाद तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें स्थिर होगी ।। ११ ।। प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत् सांख्ययोगेप्सितं पदम् । एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ।। १२ ।। 'तुम उस अभीष्ट पदको प्राप्त करोगे, जिसे सांख्यवेत्ता तथा योगी भी पाना चाहते हैं।' इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अदृश्य हो गये ।। १२ ।। ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ । गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ।। १३ ।। मैंने सूर्यदेवका वह कथन सुना। फिर जब वे चले गये, तब मैंने घर आकर प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका चिन्तन किया ।। १३ ।।
ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता । ओङ्कारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥ मेरे स्मरण करते ही स्वर और व्यंजन-वर्णोंसे विभूषित अत्यन्त मंगलमयी सरस्वतीदेवी ॐकारको आगे करके मेरे सम्मुख प्रकट हुई ॥ १४ ॥ ततोऽहमर्घ्यं विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयम् । तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥ तब मैंने सरस्वतीदेवी तथा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् भास्करको अर्घ्य निवेदन किया और उन्हींका चिन्तन करता हुआ बैठ गया ॥ १५ ॥ ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥ उस समय बड़े हर्षके साथ मैंने रहस्य, संग्रह और परिशिष्टभागसहित समस्त शतपथका संकलन किया ॥ १६ ॥ कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् । विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः । व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥ १८ ॥ महाराज! तदनन्तर मैंने अपने सौ उत्तम शिष्योंको शतपथका अध्ययन कराया। इसके बाद शिष्यसहित अपने महामनस्वी मामाका (जो पहले मुझे तिरस्कृत कर चुके थे) अप्रिय करनेके लिये किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति शिष्योंसे सुशोभित हो मैंने तुम्हारे पिता महात्मा राजा जनकके यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ १७-१८ ॥ मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम् । स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥ १९ ॥ उस समय अपने वेदकी दक्षिणाके लिये मामाके द्वारा विशेष आग्रह होनेपर महर्षि देवलके सामने ही मैंने आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ग्रहण की ॥ १९ ॥ सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै । पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥ २० ॥ तदनन्तर सुमन्तु, पैल, जैमिनि, तुम्हारे पिता तथा अन्य ऋषि-मुनियोंने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥ दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ । तथैव रोमहर्षण पुराणमवधारितम् ॥ २१ ॥ निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने सूर्यदेवसे शुक्लयजुर्वेदकी पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी तरह रोमहर्षण सूतसे मैंने पुराणोंका अध्ययन किया ॥ २१ ॥ बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ।
सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥ २२ ॥
कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया ।
यथाभिलषितं मार्गं तथा तच्चोपपादितम् ॥ २३ ॥
नरेश्वर! तदन्तर मैंने बीजरूप प्रणव और सरस्वती देवीको सामने करके भगवान् सूर्यकी कृपासे शतपथकी रचना आरम्भ की और इस अपूर्व ग्रन्थको पूर्ण कर लिया और जो मोक्षका मार्ग मुझे अभीष्ट था, उसका भी भलीभाँति सम्पादन किया ॥ २२-२३ ॥
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससंग्रहम् ।
सर्वे च शिष्याः शुचयो गताः परमहर्षिताः ॥ २४ ॥
फिर मैंने शिष्योंको वह सारा ग्रन्थ रहस्य और संग्रह-सहित पढ़ाया और उन्हें घर जानेकी अनुमति दे दी। फिर वे सभी शुद्ध आचार-विचारवाले शिष्य अत्यन्त हर्षित हो अपने-अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदेशिताः ।
प्रतिष्ठाप्य यथाकामं वेद्यं तदनुचिन्तयम् ॥ २५ ॥
इस प्रकार सूर्यदेवके द्वारा उपदेश की हुई शुक्लयजुर्वेद विद्याकी इन पंद्रह शाखाओंका ज्ञान प्राप्त करके मैंने इच्छानुसार वेद्यतत्त्वका चिन्तन किया है ॥ २५ ॥
किमत्र ब्रह्मण्यमृतं किं च वेद्यमनुत्तमम् ।
चिन्तयंस्तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ॥ २६ ॥
विश्वावसुस्ततो राजन् वेदान्तज्ञानकोविदः ।
राजन्! एक समय वेदान्तज्ञानमें कुशल विश्वावसु नामक गन्धर्व मेरे पास आया एवं इस बातका विचार करते हुए कि यहाँ ब्राह्मण-जातिके लिये हितकर क्या है? सत्य और सर्वोत्तम ज्ञातव्य वस्तु क्या है? मुझसे पूछने लगा ॥ २६ १/२ ॥
चतुर्विंशांस्ततोऽपृच्छत् प्रश्नान् वेदस्य पार्थिव ॥ २७ ॥
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तदा ।
विश्वाविश्वं तथाश्वाश्वं मित्रं वरुणमेव च ॥ २८ ॥
पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने वेदके सम्बन्धमें चौबीस प्रश्न पूछे। फिर आन्वीक्षिकी विद्याके सम्बन्धमें पचीसवाँ प्रश्न उपस्थित किया। वे चौबीस प्रश्न इस प्रकार हैं—१. विश्वा क्या है? २. अविश्व क्या है? ३. अश्वा क्या है? ४. अश्व क्या है? ५. मित्र क्या है? ६. वरुण क्या है? ॥ २७-२८ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञोऽज्ञः कस्तपा अतपास्तथा ।
सूर्याति सूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ॥ २९ ॥
७. ज्ञान क्या है? ८. ज्ञेय क्या है? ९. ज्ञाता क्या है? १०. अज्ञ क्या है? ११. क कौन है? १२. कौन तपस्वी है? १३. और कौन अतपस्वी है? १४. कौन सूर्य है? १५. तथा कौन अतिसूर्य? १६. और विद्या क्या है? १७. तथा अविद्या क्या है? ॥ २९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2089)
महर्षि याज्ञवल्क्यके स्मरणसे देवी सरस्वतीका प्राकट्य
वेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च । अपूर्वमक्षयं क्षय्यमेतत् प्रश्नमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ १८. राजन्! वेद्य क्या है? १९. अवेद्य क्या है? २०. चल क्या है? २१. अचल क्या है? २२. अपूर्व क्या है? २३. अक्षय क्या है? २४. और विनाशशील क्या है? ये ही उनके परम उत्तम प्रश्न हैं ॥ ३० ॥
अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः । पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम् ॥ ३१ ॥ मुहूर्तमुष्यतां तावद्यावदेवं विचिन्तये । बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥ ३२ ॥ महाराज! इन प्रश्नोंको सुनकर मैंने गन्धर्वशिरोमणि राजा विश्वावसुसे कहा—'राजन्! आपने क्रमशः बड़े उत्तम प्रश्न उपस्थित किये हैं। आप अर्थके ज्ञाता हैं। थोड़ी देर ठहर जाइये, तबतक मैं आपके इन प्रश्नोंपर विचार कर लेता हूँ।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वराज चुपचाप बैठे रहे ॥ ३१-३२ ॥
ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् । मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥ ३३ ॥ तदनन्तर मैंने पुनः सरस्वतीदेवीका मन-ही-मन चिन्तन किया। फिर तो जैसे दहीसे घी निकल आता है, उसी प्रकार उन प्रश्नोंका उत्तर निकल आया ॥ ३३ ॥
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव । मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥ ३४ ॥ राजन्! तात! उस समय मैं वहाँ उपनिषद्, उसके परिशिष्ट भाग और परम उत्तम आन्वीक्षिकी विद्यापर दृष्टिपात करके मनके द्वारा उन सबका मन्थन करने लगा ॥ ३४ ॥
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी । उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशादधिष्ठिता ॥ ३५ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह आन्वीक्षिकी विद्या (त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—इन तीन विद्याओंकी अपेक्षासे) चौथी बतायी गयी है। यह मोक्षमें सहायक है। पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे अधिष्ठित उस विद्याका मैंने तुमसे प्रतिपादन किया था (वही विश्वावसुके निकट भी कही गयी) ॥
अथोक्तस्तु मया राजन् राजा विश्वावसुस्तदा । श्रूयतां यद् भवानस्मान् प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ॥ ३६ ॥ राजन्! उस समय मैंने राजा विश्वावसुसे कहा—'गन्धर्वराज! आपने यहाँ मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर सुनिये ॥ ३६ ॥
विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि । विश्वाव्यक्तं परं विद्याद् भूतभव्यभयंकरम् ॥ ३७ ॥
गन्धर्वपते! आपने जो विश्वा और अविश्व इत्यादि कहकर यह प्रश्नावली उपस्थित की है, उसमें विश्वा अव्यक्त प्रकृतिका नाम है। यह संसार-बन्धनमें डालनेवाली होनेके कारण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें भयंकर है—इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें।।
त्रिगुणं गुणकर्तृत्वादविश्वो निष्कलस्तथा ।
अश्वश्चाश्वा च मिथुनमेवमेवानुदृश्यते ।। ३८ ।।
इस प्रकार विश्वा नामसे प्रसिद्ध जो अव्यक्त प्रकृति है, वह त्रिगुणमयी है; क्योंकि वही त्रिगुणात्मक जगत्को उत्पन्न करनेवाली है। उससे भिन्न जो निष्कल (कलाओंसे रहित) आत्मा है, वही अविश्व कहलाता है। इसी तरह अश्व और अश्वाकी जोड़ी भी देखी जाती है (अर्थात् अश्वा अव्यक्त प्रकृति है और अश्व पुरुष) ।।
अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् ।
तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ।। ३९ ।।
अव्यक्त प्रकृतिको सगुण बताया गया है और पुरुषको निर्गुण। इसी प्रकार वरुणको प्रकृति समझना चाहिये और मित्रको पुरुष ।। ३९ ।।
ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेयं निष्कलमेव च ।
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ।। ४० ।।
(भौतिक) ज्ञान शब्दसे प्रकृतिका प्रतिपादन किया गया है और निष्कल आत्माको ज्ञेय बताया गया है। इसी तरह अज्ञ प्रकृति है और उससे भिन्न निष्कल पुरुषको ‘ज्ञाता’ बताया गया है ।। ४० ।।
कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोऽसौ पुरुष उच्यते ।
तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कलः स्मृतः ।। ४१ ।।
क, तपा और अतपाके विषयमें जो प्रश्न उपस्थित किया गया है, उसके विषयमें बताया जाता है। पुरुषको ही ‘क’ कहते हैं। प्रकृतिका ही नाम तपा है और निष्कल पुरुषको अतपा नाम दिया गया है ।। ४१ ।।
(सूर्यमव्यक्तमित्युक्तमतिसूर्यस्तु निष्कलः ।
अविद्या प्रकृतिर्ज्ञेया विद्या पुरुष उच्यते ।।)
अव्यक्त प्रकृतिको ही सूर्य और निष्कल पुरुषको अतिसूर्य कहा गया है। प्रकृतिको अविद्या जानना चाहिये और पुरुष विद्या कहलाता है ।।
तथैवावेद्यमव्यक्तं वेद्यः पुरुष उच्यते ।
चलाचलमिति प्रोक्तं त्वया तदपि मे शृणु ।। ४२ ।।
इसी तरह अवेद्य नामसे अव्यक्त प्रकृतिका और वेद्य नामसे पुरुषका प्रतिपादन किया जाता है। आपने जो चल और अचलके विषयमें प्रश्न किया है, उसका भी उत्तर सुनिये ।। ४२ ।।
चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षयसर्गयोः । आक्षेपसर्गयोः कर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ॥ ४३ ॥ सृष्टि और संहारकी कारणभूता प्रकृतिको 'चला' कहा गया है और सृष्टि तथा प्रलयका कर्ता पुरुष ही निश्चल पुरुष माना गया है ॥ ४३ ॥
तथैव वेद्यमव्यक्तमवेद्यः पुरुषस्तथा । अज्ञावुभौ ध्रुवौ चैव अक्षयौ चाप्युभावपि ॥ ४४ ॥ अजौ नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चयाः ॥ ४५ ॥ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति वेद्य (जाननेमें आनेवाली) है और पुरुष अवेद्य (जाननेमें न आनेवाला)। अध्यात्मतत्त्वका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अज्ञ हैं, दोनों ही निश्चल हैं और दोनों ही अक्षय, अजन्मा तथा नित्य हैं ॥ ४४-४५ ॥
अक्षयत्वात् प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् । अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४६ ॥ ज्ञानी पुरुषोंका कथन है कि जन्म ग्रहण करनेपर भी क्षयरहित होनेके कारण यहाँ पुरुषको अजन्मा, अविनाशी और अक्षय कहा गया है; क्योंकि उसका कभी क्षय नहीं होता है ॥ ४६ ॥
गुणक्षयत्वात् प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षयं बुधाः । एषा तेऽऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी साम्परायिकी ॥ ४७ ॥ गुणोंका क्षय होनेके कारण प्रकृति क्षयशील मानी गयी है और उसका प्रेरक होनेके कारण पुरुषको विद्वानोंने अक्षय कहा है। गन्धर्वराज! यह मैंने आपको चौथी आन्वीक्षिकी विद्या, जो मोक्षमें सहायक है, बतायी है ॥ ४७ ॥
विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि । एकान्तदर्शना वेदाः सर्वे विश्वावसो स्मृताः ॥ ४८ ॥ विश्वावसो! आन्वीक्षिकी विद्यासहित वेद-विद्यारूपी धनका उपार्जन करके प्रयत्नपूर्वक नित्यकर्ममें संलग्न रहना चाहिये। सभी वेद एकान्ततः स्वाध्याय और मनन करनेके योग्य माने गये हैं ॥ ४८ ॥
जायन्ते च म्रियन्ते च यस्मिन्नेते यतश्च्युताः । वेदार्थं ये न जानन्ति वेद्यं गन्धर्वसत्तम ॥ ४९ ॥ गन्धर्वराज! समस्त भूत जिसमें स्थित हैं, जिससे उत्पन्न होते और जिसमें लीन हो जाते हैं, उस वेदप्रतिपाद्य ज्ञेय परमात्माको जो नहीं जानते हैं, वे परमार्थसे भ्रष्ट होकर जन्मते और मरते रहते हैं ॥ ४९ ॥
साङ्गोपाङ्गानपि यदि यश्च वेदानधीयते । वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः ॥ ५० ॥
सांगोपांग वेद पढ़कर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेके योग्य परमेश्वरको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ ढोनेवाला है ।। ५० ।।
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद् गन्धर्वसत्तम ।
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम् ।। ५१ ।।
गन्धर्वशिरोमणे! जो घी पानेकी इच्छा रखकर गधीके दूधको मथता है, उसे वहाँ विष्ठा ही दिखायी देती है। उसे न तो वहाँ मक्खन ही मिलता है और न घी ही ।। ५१ ।।
तथा वेद्यमवेद्यं च वेदविद्यो न विन्दति ।
स केवलं मूढमतिर्ज्ञानभारवहः स्मृतः ।। ५२ ।।
इसी प्रकार जो वेदोंका अध्ययन करके भी वेद्य और अवेद्यका तत्त्व नहीं जानता, वह मूढ़बुद्धि मानव केवल ज्ञानका बोझ ढोनेवाला माना गया है ।। ५२ ।।
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना ।
तथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ।। ५३ ।।
मनुष्यको सदा ही तत्पर होकर अन्तरात्माके द्वारा इन दोनों प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जिससे बारंबार उसे जन्म-मृत्युके चक्करमें न पड़ना पड़े ।। ५३ ।।
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम् ।
परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थितः ।। ५४ ।।
संसारमें जन्म और मरणकी परम्परा निरन्तर चलती रहती है—ऐसा सोचकर वैदिक कर्मकाण्डमें बताये हुए सभी कर्मों और उनके फलोंको विनाशशील जानकर उनका परित्याग करके मनुष्यको यहाँ अक्षय धर्मका आश्रय लेना चाहिये ।। ५४ ।।
यदानुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।। ५५ ।।
कश्यपनन्दन! जब साधक प्रतिदिन परमात्माके स्वरूपका विचार एवं चिन्तन करने लगता है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित होकर छब्बीसवें तत्त्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।
अन्यश्च शाश्वतोऽव्यक्तस्तथान्यः पञ्चविंशकः ।
तस्य द्वावनुपश्येतां तमेकमिति साधवः ।। ५६ ।।
मूढ़बुद्धि मानव उस आत्माके सम्बन्धमें द्वैतभावसे युक्त धारणा रखते हुए कहते हैं—‘सनातन अव्यक्त परमात्मा दूसरा है और पचीसवाँ तत्त्वरूप जीवात्मा दूसरा, परंतु साधु पुरुष उन दोनोंको एक मानते हैं ।।
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् ।
जन्ममृत्युभयाद् योगाः सांख्याश्च परमैषिणः ।। ५७ ।।
वे जन्म और मृत्युके भयसे रहित होकर परमपद पानेकी इच्छा रखनेवाले सांख्यवेत्ता और योगी जीवात्मा और परमात्माको एक-दूसरेसे भिन्न नहीं मानते हैं। जीव और ईश्वरका
अभेद बतानेवाला जो यह पूर्वोक्त दर्शन अथवा साधुमत है, उसका वे भी अभिनन्दन करते ही हैं ।। ५७ ।।
विश्वावसुरुवाच
पञ्चविंशं यदेतत् ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम ।
तथा तन्न तथा चेति तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। ५८ ।।
**विश्वावसुने कहा—**ब्राह्मणशिरोमणे! आपने जो यह पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न बताया है, उसमें यह संदेह उठता है कि जीवात्मा वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न है या नहीं? अतः आप इस बातका स्पष्टरूपसे वर्णन करें ।। ५८ ।।
जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य मया श्रुतम् ।
पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ।। ५९ ।।
भृगोः पञ्चशिखस्यास्य कपिलस्य शुकस्य च ।
गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ।। ६० ।।
नारदस्यासुरेश्चैव पुलस्त्यस्य च धीमतः ।
सनत्कुमारस्य ततः शुक्रस्य च महात्मनः ।। ६१ ।।
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मया श्रुतम् ।
मैंने मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान् वार्षगण्य, भृगु, पञ्चशिख, कपिल, शुक, गौतम, आर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान् पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र तथा अपने पिता कश्यपजीके मुखसे भी पहले इस विषयका प्रतिपादन सुना था ।। ५९—६१ ½ ।।
तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ।। ६२ ।।
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैतेयेभ्यस्ततस्ततः ।
प्राप्तमेतन्मया कृत्स्नं वेद्यं नित्यं वदन्त्युत ।। ६३ ।।
तदनन्तर रुद्र, बुद्धिमान् विश्वरूप, अन्यान्य देवता, पितर तथा दैत्योंसे भी जहाँ-तहाँसे यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। वे सब लोग ज्ञेय तत्त्वको पूर्ण और नित्य बतलाते हैं ।। ६२-६३ ।।
तस्मात् तद् वै भवद्बुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि ब्राह्मण ।
भवान् प्रबर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिबुद्धिमान् ।। ६४ ।।
ब्राह्मणदेव! अब मैं इस विषयमें आपकी बुद्धिसे किये गये निर्णयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप विद्वानोंमें श्रेष्ठ, शास्त्रोंके प्रगल्भ पण्डित और अत्यन्त बुद्धिमान् हैं ।। ६४ ।।
न तवाविदितं किंचिद् भवान् श्रुतिनिधिः स्मृतः ।
कथ्यते देवलोके च पितृलोके च ब्राह्मण ।। ६५ ।।
ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हों। वैदिक ज्ञानके तो आप भण्डार ही माने जाते हैं। ब्रह्मन्! देवलोक और पितृलोकमें भी आपकी ख्याति है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः । पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥ ६६ ॥ ब्रह्मलोकमें गये हुए महर्षि भी आपकी महिमाका वर्णन करते हैं। तपनेवाले तेजस्वी ग्रहोंके पति अदितिनन्दन सनातन भगवान् सूर्यने आपको वेदका उपदेश किया है ॥ सांख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च । तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥ ६७ ॥ ब्रह्मन्! याज्ञवल्क्य! आपने सम्पूर्ण सांख्य तथा योगशास्त्रका भी विशेष ज्ञान प्राप्त किया है ॥ ६७ ॥ निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् । श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥ ६८ ॥ इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आप पूर्ण ज्ञानी हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत्को जानते हैं; अतः मैं माखनमय घीके समान स्वादिष्ट एवं सारभूत वह तत्त्वज्ञान आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम । जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ६९ ॥ याज्ञवल्क्यजीने कहा—अर्थात् मैंने उत्तर दिया—गन्धर्वशिरोमणे! आपको मैं निःसंदेह सम्पूर्ण ज्ञानोंको धारण करनेवाली मेधाशक्तिसे सम्पन्न मानता हूँ। राजन्! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे प्रश्न करते और मेरे विचारको जानना चाहते हैं; इसलिये मैंने जैसा सुना है, वह बताता हूँ सुनिये ॥ ६९ ॥ अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः । न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥ ७० ॥ गन्धर्व! प्रकृति जड है, इसलिये उसे पचीसवाँ तत्त्व—जीवात्मा तो जानता है; किंतु प्रकृति जीवात्माको नहीं जानती ॥ ७० ॥ अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् । सांख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥ सांख्य और योगके तत्त्वज्ञानी विद्वान् श्रुतिमें किये हुए निरूपणके अनुसार जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाके समान प्रकृतिमें ज्ञानस्वरूप जीवात्माके बोधका प्रतिबिम्ब पड़नेसे उस प्रकृतिको प्रधान कहते हैं ॥ ७१ ॥ पश्यंस्तथैव चापश्यन् पश्यत्यन्यः सदानघ ।
षड्विंशं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च पश्यति ।। ७२ ।।
निष्पाप गन्धर्व! जीवात्मा जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें सब कुछ देखता है। सुषुप्ति और समाधि अवस्थामें कुछ भी नहीं देखता है तथा परमात्मा सदा ही छब्बीसवें तत्त्वरूप अपने-आपको, पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको और चौबीसवें तत्त्वरूप प्रकृतिको भी देखता रहता है ।।
न तु पश्यति पश्यंस्तु यश्चैनमनुपश्यति ।
पञ्चविंशोऽभिमन्येत नान्योऽस्ति परतो मम ।। ७३ ।।
किंतु यदि जीवात्मा यह अभिमान करता है कि मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है तो जो परमात्मा उसे निरन्तर देखता है, उसे वह समझता हुआ भी नहीं समझता ।। ७३ ।।
न चतुर्विंशको ग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभिः ।
मत्स्यश्चोदकमन्वेति प्रवर्तेत प्रवर्त्तनात् ।। ७४ ।।
तत्त्वज्ञानी मनुष्योंको चाहिये कि वे प्रकृतिको आत्मभावसे ग्रहण न करें। जैसे मत्स्य जलका अनुसरण करता है, परंतु अपनेको उससे भिन्न ही मानता है, उसी प्रकार मनुष्य उसकी प्रवृत्तिके अनुसार स्वयं भी प्रवृत्त होवे; परंतु प्रकृतिको अपना स्वरूप न माने ।। ७४ ।।
यथैव बुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुबुध्यते ।
स स्नेहात् सहवासाच्च साभिमानाच्च नित्यशः ।। ७५ ।।
स निमज्जति कालस्य यदैकत्वं न बुध्यते ।
उन्मज्जति हि कालस्य समत्वेनाभिसंवृतः ।। ७६ ।।
जैसे मछली जलमें रहती हुई भी उस जलको अपनेसे भिन्न समझती है, उसी प्रकार यह जीवात्मा प्राकृत शरीरमें रहकर भी प्रकृतिसे अपनेको भिन्न समझता है तथापि वह शरीरके प्रति स्नेह, सहवास और अभिमानके कारण जब परमात्माके साथ अपनी एकताका अनुभव नहीं करता है, तब कालके समुद्रमें डूब जाता है। परंतु जब वह समत्वबुद्धिसे युक्त हो अपनी और परमात्माकी एकताको समझ लेता है, तब उस काल-समुद्रसे उसका उद्धार हो जाता है ।। ७५-७६ ।।
यदा तु मन्यतेऽन्योऽहमन्य एष इति द्विजः ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।। ७७ ।।
जब द्विज इस बातको समझ लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्राकृत शरीर अथवा अनात्म-जगत् मुझसे सर्वथा भिन्न है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ।।
अन्यश्च राजन्नवरस्थान्यः पञ्चविंशकः ।
तत्स्थानाच्चानुपश्यन्ति एक एवेति साधवः ।। ७८ ।।
राजन्! परमात्मा भिन्न है और जीवात्मा भिन्न; क्योंकि परमात्मा जीवात्माका आश्रय है; परंतु ज्ञानी संत-महात्मा उन दोनोंको एक ही देखते और समझते हैं।।
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् । जन्ममृत्युभयाद् भीता योगाःसांख्याश्च काश्यप । षड्विंशमनुपश्यन्तः शुचयस्तत्परायणाः ॥ ७९ ॥
कश्यपनन्दन! जन्म और मृत्युके भयसे डरे हुए योग और सांख्यके साधक भगवत्परायण हो शुद्ध भावसे छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका दर्शन करते हुए जीवात्मा और परमात्माको एक समझते हैं और इस अभेद-दर्शनका सदा अभिनन्दन ही करते हैं ॥ ७९ ॥
यदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति । तदा स सर्वविद् विद्वान् न पुनर्जन्म विन्दति ॥ ८० ॥
जब जीवात्मा प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह सर्वज्ञ विद्वान् होकर इस संसारमें पुनर्जन्म नहीं पाता है ॥ ८० ॥
एवमप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ । बुद्धश्चोक्तो यथातत्त्वं मया श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ८१ ॥
निष्पाप गन्धर्वराज! इस प्रकार मैंने तुमसे जड प्रकृति, चेतन जीवात्मा और बोधस्वरूप परमात्माका श्रुतिके अनुसार यथावत्रूपसे निरूपण किया है ॥ ८१ ॥
पश्यापश्यं यो न पश्येत् क्षेम्यं तत्त्वं च काश्यप । केवलाकेवलं चाद्यं पञ्चविंशं परं च यत् ॥ ८२ ॥
कश्यपनन्दन! जो मनुष्य जीवात्माको और प्रकृति आदि जडवर्गको पृथक्-पृथक् नहीं जानता, मंगलकारी तत्त्वपर दृष्टि नहीं रखता, केवल (प्रकृति-संसर्गसे रहित), अकेवल (प्रकृति-संसर्गसे युक्त), सबके आदिकारण जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माको भी यथार्थरूपसे नहीं जानता (वह आवागमनके चक्करमें पड़ा रहता है) ॥ ८२ ॥
विश्वावसुरुवाच
तथ्यं शुभं चैतदुक्तं त्वया विभो सम्यक् क्षेम्यं दैवताद्यं यथावत् । स्वस्त्यक्षयं भवतश्चास्तु नित्यं बुद्ध्या सदा बुद्धियुक्तं मनस्ते ॥ ८३ ॥
विश्वावसुने कहा—प्रभो! आपने सब देवताओंके आदिकारण ब्रह्मके विषयमें जो यथावत् वर्णन किया है, वह सत्य, शुभ, सुन्दर तथा परम मंगलकारी है। आपका मन सदा ही इसी प्रकार ज्ञानमें स्थित रहे तथा आपको नित्य अक्षय कल्याणकी प्राप्ति हो (अच्छा, अब मैं जाता हूँ) ॥ ८३ ॥
याज्ञवल्क्य उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रयातो दिवं स विभ्राजन् वै श्रीमता दर्शनेन । दृष्टश्च तुष्ट्या परयाभिनन्द्य प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ॥ ८४ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर महामना गन्धर्वराज विश्वावसु अपने कान्तिमान् दर्शनसे प्रकाशित होते हुए मेरी परिक्रमा और अभिनन्दन करके स्वर्गलोकको चले गये। उस समय मैंने भी बड़े संतोषसे उनकी ओर देखा था ॥ ८४ ॥
ब्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च ये चाधस्तात् संवसन्ते नरेन्द्र । तत्रैव तद्दर्शनं दर्शयन् वै सम्यक् क्षेम्यं ये पथं संश्रिता वै ॥ ८५ ॥
राजा जनक! आकाशमें विचरनेवाले जो ब्रह्मा आदि देवता हैं, पृथ्वीपर निवास करनेवाले जो मनुष्य हैं तथा जो पृथ्वीसे नीचेके लोकोंमें रहते हैं, उनमेंसे जो लोग कल्याणमय मोक्षमार्गका आश्रय लिये हुए थे, उन सबको उन्हीं स्थानोंमें जाकर विश्वावसुने मेरे बताये हुए इस सम्यक्-दर्शनका उपदेश दिया था ॥ ८५ ॥
सांख्याः सर्वे सांख्यधर्मे रताश्च तद्वद् योगा योगधर्मे रताश्च । ये चाप्यन्ये मोक्षकामा मनुष्या- स्तेषामेतद् दर्शनं ज्ञानदृष्टम् ॥ ८६ ॥
सांख्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले सम्पूर्ण सांख्यवेत्ता, योग-धर्मपरायण योगी तथा दूसरे जो मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको यह उपदेश ज्ञानका प्रत्यक्ष फल देनेवाला है ॥ ८६ ॥
ज्ञानान्मोक्षो जायते राजसिंह नास्त्यज्ञानादेवमाहुर्नरिन्द्र । तस्माज्ज्ञानं तत्त्वतोऽन्वेषितव्यं येनात्मानं मोक्षयेज्जन्ममृत्योः ॥ ८७ ॥
राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी नरेन्द्र! ज्ञानसे ही मोक्ष होता है, अज्ञानसे नहीं— ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। इसलिये यथार्थ ज्ञानका अनुसंधान करना चाहिये, जिससे अपने-आपको जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुड़ाया जा सके ॥ ८७ ॥
प्राप्य ज्ञानं ब्राह्मणात् क्षत्रियाद् वा वैश्याच्छूद्रादपि नीचादभीक्ष्णम् । श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं
न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम् ॥ ८८ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा नीच वर्णमें उत्पन्न हुए पुरुषसे भी यदि ज्ञान मिलता हो तो उसे प्राप्त करके श्रद्धालु मनुष्यको सदा उसपर श्रद्धा रखनी चाहिये। जिसके भीतर श्रद्धा है, उस मनुष्यमें जन्म-मृत्युका प्रवेश नहीं हो सकता ॥ ८८ ॥
सर्वे वर्णा ब्राह्मणा ब्रह्मजाश्च सर्वे नित्यं व्याहरन्ते च ब्रह्म । तत्त्वं शास्त्रं ब्रह्मबुद्ध्या ब्रवीमि सर्वं विश्वं ब्रह्म चैतत् समस्तम् ॥ ८९ ॥ ब्रह्मसे उत्पन्न होनेके कारण सभी वर्ण ब्राह्मण हैं। सभी सदा ब्रह्मका उच्चारण करते हैं। मैं ब्रह्मबुद्धिसे यथार्थ शास्त्रका सिद्धान्त बता रहा हूँ। यह सम्पूर्ण जगत्, यह सारा दृश्यप्रपंच ब्रह्म ही है ॥ ८९ ॥
ब्रह्मास्यतो ब्राह्मणाः सम्प्रसूता बाहुभ्यां वै क्षत्रियाः सम्प्रसूताः । नाभ्यां वैश्याः पादतश्चापि शूद्राः सर्वे वर्णा नान्यथा वेदितव्याः ॥ ९० ॥ ब्रह्मके मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए हैं, ब्रह्मकी ही भुजाओंसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, ब्रह्मकी ही नाभिसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं, अतः सभी वर्णके लोग ब्रह्मरूप ही हैं। किसी भी वर्णको ब्रह्मसे भिन्न नहीं समझना चाहिये ॥ ९० ॥
अज्ञानतः कर्मयोनिं भजन्ते तां तां राजंस्ते तथा यान्त्यभावम् । तथा वर्णा ज्ञानहीनाः पतन्ते घोरदज्ञानात् प्राकृतं योनिजालम् ॥ ९१ ॥ राजन्! मनुष्य अज्ञानके कारण ही कर्मानुष्ठानसे भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं। ज्ञानहीन मनुष्य ही अपने भयंकर अज्ञानके कारण नाना प्रकारकी प्राकृत योनियोंमें गिरते हैं ॥ ९१ ॥
तस्माज्ज्ञानं सर्वतो मार्गितव्यं सर्वत्रस्थं चैतदुक्तं मया ते । तत्स्थो ब्रह्मा तस्थिवांश्चापरो य- स्तस्मै नित्यं मोक्षमाहुर्नरेन्द्र ॥ ९२ ॥ नरेन्द्र! अतः सब ओरसे ज्ञान प्राप्त करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। यह तो मैं तुमसे बता ही चुका हूँ कि सभी वर्णोंके लोग अपने-अपने आश्रममें रहते हुए ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं; अतः जो ब्राह्मण ज्ञानमें स्थित है अथवा जो दूसरे वर्णका मनुष्य भी ज्ञाननिष्ठ है, उसके लिये नित्य मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥
यत् ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व। राजन् गच्छस्वैतदर्थस्य पारं सम्यक् प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम्॥ ९३॥ राजन्! तुमने जो पूछा था उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानका उपदेश किया है; अतः अब तुम शोकरहित हो जाओ और इस तत्त्वज्ञानमें पारंगत बनो। मैंने तुम्हें ज्ञानका भलीभाँति उपदेश कर दिया है। जाओ, तुम्हारा सदा कल्याण हो॥ ९३॥
भीष्म उवाच
स एवमनुशास्तस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता। प्रीतिमानभवद् राजा मिथिलाधिपतिस्तदा॥ ९४॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बुद्धिमान् याज्ञ-वल्क्यजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर मिथिलापति राजा जनक उस समय बहुत प्रसन्न हुए॥ ९४॥ गते मुनिवरे तस्मिन् कृते चापि प्रदक्षिणम्। दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित्॥ ९५॥ गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यं तु तथैव च। रत्नाञ्जलिमथैकं च ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा॥ ९६॥ उन्होंने सत्कारपूर्वक मुनिकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा किया। जब वे मुनिवर याज्ञवल्क्य चले गये, तब मोक्षके ज्ञाता देवरातनन्दन राजा जनकने वहीं बैठे-बैठे एक करोड़ गौएँ छूकर ब्राह्मणोंको दान कर दीं तथा प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक अंजलि रत्न और सुवर्ण प्रदान किये॥ ९५-९६॥ विदेहराज्यं च तदा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै। यतिधर्ममुपासंश्राप्यवसन्मिथिलाधिपः॥ ९७॥ इसके बाद मिथिलानरेशने विदेहदेशका राज्य अपने पुत्रको सौंप दिया और स्वयं वे यति-धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ९७॥ सांख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः। धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन्॥ ९८॥ अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च। धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च॥ ९९॥ जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत्। व्यक्ताव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप॥ १००॥ राजेन्द्र! नरेश्वर! उन्होंने सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्रका स्वाध्याय करके प्राकृत धर्म और अधर्मको त्याज्य मानते हुए यह निश्चय किया कि 'मैं अनन्त हूँ।' ऐसा निश्चय
करके वे धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सत्य-असत्य तथा जन्म और मृत्युको व्यक्त (बुद्धि आदि) और अव्यक्त (प्रकृति) का कार्य मानकर सबको प्राकृत (प्रकृतिजन्य एवं मिथ्या) समझते हुए प्रकृतिसंसर्गसे रहित अपने शुद्ध एवं नित्य स्वरूपका ही चिन्तन करने लगे ।। ९८—१०० ।।
पश्यन्ति योगाः सांख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः ।
इष्टानिष्टविमुक्तं हि तस्थौ ब्रह्म परात्परम् ।। १०१ ।।
युधिष्ठिर! सांख्य और योगके विद्वान् अपने-अपने शास्त्रोंमें वर्णित लक्षणोंके अनुसार ऐसा देखते और समझते हैं कि वह ब्रह्म इष्ट और अनिष्टसे मुक्त, अचल-भावसे स्थित एवं परात्पर है ।। १०१ ।।
नित्यं तदाहुर्विद्वांसः शुचि तस्माच्छुचिर्भव ।
दीयते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते ।। १०२ ।।
ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह ।
ददात्यव्यक्त इत्येतत् प्रतिगृह्णाति तच्च वै ।। १०३ ।।
विद्वान् पुरुष उस ब्रह्मको नित्य एवं पवित्र बताते हैं; अतः तुम भी उसे जानकर पवित्र हो जाओ। नरश्रेष्ठ! जो कुछ दिया जाता है, जो दी हुई वस्तु किसीको प्राप्त होती है, जो दानका अनुमोदन करता है, जो देता है तथा जो उस दानको ग्रहण करता है, वह सब अव्यक्त परमात्मा ही है। परमात्मा ही यह सब कुछ देता और लेता है ।। १०२-१०३ ।।
आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत् ।
एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय ।। १०४ ।।
युधिष्ठिर! एकमात्र परमात्मा ही अपना है। उससे बढ़कर आत्मीय दूसरा कौन हो सकता है। तुम सदा ऐसा ही मानो और इसके विपरीत दूसरी किसी बातका चिन्तन न करो ।। १०४ ।।
यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः ।
तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्या विपश्चिता ।। १०५ ।।
जिसे अव्यक्त प्रकृतिका ज्ञान न हुआ हो, सगुण-निर्गुण परमात्माकी पहचान न हुई हो, उस विद्वान्को तीर्थोंका सेवन और यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ।। १०५ ।।
न स्वाध्यायैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन ।
लभतेऽव्यक्तिकं स्थानं ज्ञात्वा व्यक्तं महीयते ।। १०६ ।।
कुरुनन्दन! स्वाध्याय, तप अथवा यज्ञोंद्वारा मोक्ष या परमात्मपदकी प्राप्ति नहीं होती (ये तो उनके तत्त्वको जाननेमें सहायक होते हैं)। इनके द्वारा परमात्माका स्पष्ट (अपरोक्ष) ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य महिमान्वित होता है ।। १०६ ।।
तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च ।
अहङ्कारात् परं चापि स्थानानि समवाप्नुयात् ।। १०७ ।।
महत्तत्त्वकी उपासना करनेवाले महत्तत्त्वको और अहंकारके उपासक अहंकारको प्राप्त होते हैं; परंतु महत्तत्त्व और अहंकारसे भी श्रेष्ठ जो स्थान हैं, उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ १०७ ॥
ये त्वव्यक्तात् परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः ।
जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं सदसच्च यत् ॥ १०८ ॥
जो शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होते हैं, वे ही प्रकृतिसे पर, नित्य, जन्म-मृत्युसे रहित, मुक्त एवं सदसत्स्वरूप परमात्माका ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १०८ ॥
एतन्मयाऽऽप्तं जनकात् पुरस्तात्
तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् ।
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा
ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ॥ १०९ ॥
युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकालमें राजा जनकसे मिला था और जनकको याज्ञवल्क्यजीसे प्राप्त हुआ था। ज्ञान सबसे उत्तम साधन है। यज्ञ इसकी समानता नहीं कर सकते। ज्ञानसे ही मनुष्य इस दुर्गम संसार-सागरसे पार हो सकता है; यज्ञोंद्वारा नहीं ॥ १०९ ॥
दुर्गं जन्म निधनं चापि राजन्
न भौतिकं ज्ञानविदो वदन्ति ।
यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्व्रतैश्च
दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ॥ ११० ॥
राजन्! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भौतिक जन्म और मृत्युको पार करना अत्यन्त कठिन है। यज्ञ आदिके द्वारा भी मनुष्य उस दुर्गम संकटसे पार नहीं हो सकता। यज्ञ, तप, नियम और व्रतोंद्वारा तो लोग स्वर्गलोकमें जाते और पुण्य क्षीण होनेपर फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं ॥ ११० ॥
तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि
शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् ।
क्षेत्रं ज्ञात्वा पार्थिव ज्ञानयज्ञ-
मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ॥ १११ ॥
इसलिये तुम प्रकृतिसे पर, महत्, पवित्र, कल्याणमय, निर्मल, शुद्ध तथा मोक्षस्वरूप ब्रह्मकी उपासना करो। पृथ्वीनाथ! क्षेत्रको जानकर और ज्ञानयज्ञका आश्रय लेकर तुम निश्चय ही तत्त्वज्ञानी ऋषि बन जाओगे ॥ १११ ॥
यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ
जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः ।
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त-
च्छुभममृतत्वमशोकमर्च्छति ॥ ११२ ॥
पूर्वकालमें याज्ञवल्क्य मुनिने राजा जनकको जिस उपनिषद् (ज्ञान) का उपदेश दिया था, उसका मनन करनेसे मनुष्य पूर्वकथित सनातन अविनाशी, शुभ, अमृतमय तथा शोकरहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ११२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादसमाप्तौ
अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य-जनक-संवादकी समाप्तिविषयक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं)