महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरपरिदेवनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका खेदपूर्ण उद्गार नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
वैशम्पायन उवाच
अथार्जुन उवाचेदमधिक्षिप्त इवाक्षमी ।
अभिनीततरं वाक्यं दृढवादपराक्रमः ॥ १ ॥
दर्शयन्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः ।
स्मयमानो महातेजाः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर अर्जुन इस प्रकार असहिष्णु हो उठे, मानो उनपर कोई आक्षेप किया गया हो। वे बातचीत करने या पराक्रम दिखानेमें किसीसे दबनेवाले नहीं थे। उनका पराक्रम बड़ा भयंकर था। वे महातेजस्वी इन्द्रकुमार अपने उग्ररूपका परिचय देते और दोनों गलफरोंको चाटते हुए मुसकराकर इस तरह गर्वयुक्त वचन बोलने लगे, जैसे नाटकके रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों ॥ १-२ ॥
अर्जुन उवाच
अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो वैक्लव्यमुत्तमम् ।
यत् कृत्वामानुषं कर्म त्यजेथाः श्रियमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
**अर्जुनने कहा—**राजन्! यह तो बड़े भारी दुःख और महान् कष्टकी बात है। आपकी विह्वलता तो पराकाष्ठाको पहुँच गयी। आश्चर्य है कि आप अलौकिक पराक्रम करके प्राप्त की हुई इस उत्तम राजलक्ष्मीका परित्याग कर रहे हैं ॥ ३ ॥
शत्रून् हत्वा महीं लब्ध्वा स्वधर्मेणोपपादिताम् ।
एवंविधं कथं सर्वं त्यजेथा बुद्धिलाघवात् ॥ ४ ॥
आपने शत्रुओंका संहार करके इस पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया है। यह राज्यलक्ष्मी आपको अपने धर्मके अनुसार प्राप्त हुई है। इस प्रकार जो यह सब कुछ आपके हाथमें आया है, इसे आप अपनी अल्पबुद्धिके कारण क्यों छोड़ रहे हैं? ॥ ४ ॥
क्लीबस्य हि कुतो राज्यं दीर्घसूत्रस्य वा पुनः ।
किमर्थं च महीपालानवधीः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५ ॥
किसी कायर या आलसीको कैसे राज्य प्राप्त हो सकता है? यदि आपको यही करना था तो किसलिये क्रोधसे विकल होकर इतने राजाओंका वध किया और कराया? ॥ ५ ॥
यो ह्याजिजीविषेद् भैक्ष्यं कर्मणा नैव कस्यचित् । समारम्भान् बुभूषेत हतस्वस्तिरकिंचनः । सर्वलोकेषु विख्यातो न पुत्रपशुसंहितः ॥ ६ ॥ जिसके कल्याणका साधन नष्ट हो गया है, जो निरा दरिद्र है, जिसकी संसारमें कोई ख्याति नहीं है, जो स्त्री-पुत्र और पशु आदिसे सम्पन्न नहीं है तथा जो असमर्थतावश अपने पराक्रमसे किसीके राज्य या धनको लेनेकी इच्छा नहीं कर सकता, उसी मनुष्यको भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करनेकी अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ६ ॥ कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमासाद्य जीवतः । संत्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽयं किं वदिष्यति ॥ ७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
शोकाकुल युधिष्ठिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्वना
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महाभारतकी समाप्तिपर महाराज युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें प्रवेश
गीताप्रेस, गोरखपुर
कपोतके द्वारा व्याधका आतिथ्य-सत्कार
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कौशिक ब्राह्मणको सावित्रीदेवीका प्रत्यक्ष दर्शन
गीताप्रेस, गोरखपुर
वैश्य तुलाधारके द्वारा मुनि जाजलिका सत्कार
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नारदजीको भगवान्के विश्वरूपका दर्शन
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् हयग्रीव वेदोंको रसातलसे लाकर ब्रह्माजीको लौटा रहे हैं
गीताप्रेस, गोरखपुर
इन्द्रकी ब्राह्मणवेषमें दैत्यराज प्रह्लादसे भेंट
नरेश्वर! जब आप यह समृद्धिशाली राज्य छोड़कर हाथमें खपड़ा लिये घर-घर भीख माँगनेकी नीचातिनीच वृत्तिका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करने लगेंगे, तब लोग आपको क्या कहेंगे? ।। ७ ।।
सर्वारम्भान् समुत्सृज्य हतस्वस्तिरकिंचनः ।
कस्मादाशंससे भैक्ष्यं कर्तुं प्राकृतवत् प्रभो ॥ ८ ॥
प्रभो! आप सारे उद्योग छोड़कर कल्याणके साधनोंसे हीन और अकिंचन हुए साधारण पुरुषोंके समान भीख माँगनेकी इच्छा क्यों करते हैं? ।। ८ ।।
अस्मिन् राजकुले जातो जित्वा कृत्स्नां वसुंधराम् ।
धर्मार्थावखिलौ हित्वा वनं मौढ्यात् प्रतिष्ठसे ॥ ९ ॥
इस राजकुलमें जन्म लेकर सारे भूमण्डलपर विजय प्राप्त करके अब सम्पूर्ण धर्म और अर्थ दोनोंको छोड़कर आप मोहके कारण ही वनमें जानेको उद्यत हुए हैं ।। ९ ।।
यदिमानि हवींषीह विमथिष्यन्त्यसाधवः ।
भवता विप्रहीणानि प्राप्तं त्वामेव किल्बिषम् ॥ १० ॥
यदि आपके त्याग देनेपर यज्ञकी इन संचित सामग्रियोंको दुष्ट लोग नष्ट कर देंगे तो इसका पाप आपको ही लगेगा (अर्थात् आपने यज्ञ-याग छोड़ दिये हैं, अतः आपको आदर्श मानकर दूसरे लोग भी इस कर्मसे उदासीन हो जायँगे, उस दशामें इस धर्मकृत्यका उच्छेद हो जायगा और इसका दोष आपके सिर ही लगेगा) ।। १० ।।
आकिंचन्यं मुनीनां च इति वै नहुषोऽब्रवीत् ।
कृत्वा नृशंसं ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह ॥ ११ ॥
राजा नहुषने निर्धनावस्थामें क्रूरतापूर्ण कर्म करके यह दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट किया था कि 'इस जगत्में निर्धनताको धिक्कार है! सर्वस्व त्यागकर निर्धन या अकिंचन हो जाना यह मुनियोंका ही धर्म है, राजाओंका नहीं' ।।
अश्वस्तनमृषीणां हि विद्यते वेद तद् भवान् ।
यं त्विमं धर्ममित्याहुर्धनादेष प्रवर्तते ॥ १२ ॥
आप भी इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरे दिनके लिये संग्रह न करके प्रतिदिन माँगकर खाना यह ऋषि-मुनियोंका ही धर्म है। जिसे राजाओंका धर्म कहा गया है, वह तो धनसे ही सम्पन्न होता है ।। १२ ।।
धर्मं संहरते तस्य धनं हरति यस्य सः ।
ह्रियमाणे धने राजन् वयं कस्य क्षमेमहि ॥ १३ ॥
राजन्! जो मनुष्य जिसका धन हर लेता है, वह उसके धर्मका भी संहार कर देता है। यदि हमारे धनका अपहरण होने लगे तो हम किसको और कैसे क्षमा कर सकते हैं? ।। १३ ।।
अभिशस्तं प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वतः स्थितम् ।
दरिद्रं पातकं लोके न तच्छंसितुमर्हसि ॥ १४ ॥
दरिद्र मनुष्य पासमें खड़ा हो तो लोग इस तरह उसकी ओर देखते हैं, मानो वह कोई पापी या कलंकित हो; अतः दरिद्रता इस जगत्में एक पातक है। आप मेरे आगे उसकी प्रशंसा न करें ॥ १४ ॥
पतितः शोच्यते राजन् निर्धनश्चापि शोच्यते ।
विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च ॥ १५ ॥
राजन्! जैसे पतित मनुष्य शोचनीय होता है, वैसे ही निर्धन भी होता है; मुझे पतित और निर्धनमें कोई अन्तर नहीं जान पड़ता ॥ १५ ॥
अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः सम्भृतेभ्यस्ततस्ततः ।
क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ १६ ॥
जैसे पर्वतोंसे बहुत-सी नदियाँ बहती रहती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए संचित धनसे सब प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान होता रहता है ॥ १६ ॥
अर्थाद् धर्मश्च कामश्च स्वर्गश्चैव नराधिप ।
प्राणयात्रापि लोकस्य विना ह्यर्थं न सिद्ध्यति ॥ १७ ॥
नरेश्वर! धनसे ही धर्म, काम और स्वर्गकी सिद्धि होती है। लोगोंके जीवनका निर्वाह भी बिना धनके नहीं होता ॥ १७ ॥
अर्थेन हि विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः ।
विच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ १८ ॥
जैसे गर्मीमें छोटी-छोटी नदियाँ सूख जाती हैं, उसी प्रकार धनहीन हुए मन्दबुद्धि मनुष्यकी सारी क्रियाएँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं ॥ १८ ॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ १९ ॥
जिसके पास धन होता है, उसीके बहुत-से मित्र होते हैं; जिसके पास धन है, उसीके भाई-बन्धु हैं; संसारमें जिसके पास धन है, वही पुरुष कहलाता है और जिसके पास धन है, वही पण्डित माना जाता है ॥
अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विधित्सितुम् ।
अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरेव महागजाः ॥ २० ॥
निर्धन मनुष्य यदि धन चाहता है तो उसके लिये धनकी व्यवस्था असम्भव हो जाती है (परंतु धनीका धन बढ़ता रहता है), जैसे जंगलमें एक हाथीके पीछे बहुत-से हाथी चले आते हैं उसी प्रकार धनसे ही धन बँधा चला आता है ॥ २० ॥
धर्मः कामश्च स्वर्गश्च हर्षः क्रोधः श्रुतं दमः ।
अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ॥ २१ ॥
नरेश्वर! धनसे धर्मका पालन, कामनाकी पूर्ति, स्वर्गकी प्राप्ति, हर्षकी वृद्धि, क्रोधकी सफलता, शास्त्रोंका श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओंका दमन—ये सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।। २१ ।।
धनात् कुलं प्रभवति धनाद् धर्मः प्रवर्धते । नाधनस्यास्त्ययं लोको न परः पुरुषोत्तम ।। २२ ।। धनसे कुलकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और धनसे ही धर्मकी वृद्धि होती है। पुरुषप्रवर! निर्धनके लिये तो न यह लोक सुखदायक होता है, न परलोक ।। २२ ।।
नाधनो धर्मकृत्यानि यथावदनुतिष्ठति । धनाद्धि धर्मः स्रवति शैलादभि नदी यथा ।। २३ ।। निर्धन मनुष्य धार्मिक कृत्योंका अच्छी तरह अनुष्ठान नहीं कर सकता। जैसे पर्वतसे नदी झरती रहती है, उसी प्रकार धनसे ही धर्मका स्रोत बहता रहता है ।। २३ ।।
यः कृशार्थः कृशगवः कृशभृत्यः कृशातिथिः । स वै राजन् कृशो नाम न शरीरकृशः कृशः ।। २४ ।। राजन्! जिसके पास धनकी कमी है, गौएँ और सेवक भी कम हैं तथा जिसके यहाँ अतिथियोंका आना-जाना भी बहुत कम हो गया है, वास्तवमें वही कृश (दुर्बल) कहलाने योग्य है। जो केवल शरीरसे कृश है, उसे कृश नहीं कहा जा सकता ।। २४ ।।
अवेक्षस्व यथान्यायं पश्य देवासुरं यथा । राजन् किमन्यज्जातीनां वधाद् गृद्धयन्ति देवताः ।। २५ ।। आप न्यायके अनुसार विचार कीजिये और देवताओं तथा असुरोंके बर्तावपर दृष्टि डालिये। राजन्! देवता अपने जाति-भाइयोंका वध करनेके सिवा और क्या चाहते हैं (एक पिताकी संतान होनेके कारण देवता और असुर परस्पर भाई-भाई ही तो हैं) ।। २५ ।।
न चेद्धर्तव्यमन्यस्य कथं तद्धर्ममारभेत् । एतावानेव वेदेषु निश्चयः कविभिः कृतः ।। २६ ।। अध्येतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता । सर्वथा धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि यत्नतः ।। २७ ।। यदि राजाके लिये दूसरेके धनका अपहरण करना उचित नहीं है, तो वह धर्मका अनुष्ठान कैसे कर सकता है? वेदशास्त्रोंमें भी विद्वानोंने राजाके लिये यही निर्णय दिया है कि 'राजा प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करे, विद्वान् बने, सब प्रकारसे संग्रह करके धन ले आवे और यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करे' ।।
द्रोहाद् देवैरवाप्तानि दिवि स्थानानि सर्वशः । द्रोहात् किमन्यज्ज्ञातीनां गृद्धयन्ते येन देवताः ।। २८ ।। जाति-भाइयोंसे द्रोह करके ही देवताओंने स्वर्ग-लोकके सभी स्थानोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया है। देवता जिससे धन या राज्य पाना चाहते हैं, वह जातिद्रोहके सिवा और क्या
है? ॥ २८ ॥
इति देवा व्यवसिता वेदवादाश्च शाश्वताः ।
अधीयतेऽध्यापयन्ते यजन्ते याजयन्ति च ॥ २९ ॥
कृत्स्नं तदेव तच्छ्रेयो यदप्याददतेऽन्यतः ।
न पश्यामोऽनपकृतं धनं किंचित् क्वचिद् वयम् ॥ ३० ॥
यही देवताओंका निश्चय है और यही वेदोंका सनातन सिद्धान्त है। धनसे ही द्विज वेद-शास्त्रोंको पढ़ते और पढ़ाते हैं, धनके द्वारा ही यज्ञ करते और कराते हैं तथा राजा-लोग दूसरोंको युद्धमें जीतकर जो उनका धन ले आते हैं, उसीसे वे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। किसी भी राजाके पास हम कोई भी ऐसा धन नहीं देखते हैं, जो दूसरोंका अपकार करके न लाया गया हो ॥ २९-३० ॥
एवमेव हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ।
जित्वा ममेयं ब्रुवते पुत्रा इव पितुर्धनम् ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार सभी राजा इस पृथिवीको जीतते हैं और जीतकर कहने लगते हैं कि 'यह मेरी है'। ठीक वैसे ही जैसे पुत्र पिताके धनको अपना बताते हैं ॥ ३१ ॥
राजर्षयोऽपि ते स्वर्ग्या धर्मो ह्येषां निरूच्यते ।
यथैव पूर्णादुदधेः स्यन्दन्त्यापो दिशो दश ॥ ३२ ॥
एवं राजकुलाद् वित्तं पृथिवीं प्रति तिष्ठति ।
प्राचीनकालमें जो राजर्षि हो गये हैं, जो कि इस समय स्वर्गमें निवास करते हैं, उनके मतमें भी राज-धर्मकी ऐसी ही व्याख्या की गयी है जैसे भरे हुए महासागरसे मेघके रूपमें उठा हुआ जल सम्पूर्ण दिशाओंमें बरस जाता है, उसी प्रकार धन राजाओंके यहाँसे निकलकर सम्पूर्ण पृथ्विीमें फैल जाता है ॥ ३२ १/२ ॥
आसीदियं दिलीपस्य नृगस्य नहुषस्य च ॥ ३३ ॥
अम्बरीषस्य मान्धातुः पृथिवी सा त्वयि स्थिता ।
स त्वां द्रव्यमयो यज्ञः सम्प्राप्तः सर्वदक्षिणः ॥ ३४ ॥
पहले यह पृथ्वी बारी-बारीसे राजा दिलीप, नृग, नहुष, अम्बरीष और मान्धाताके अधिकारमें रही है, वही इस समय आपके अधीन हो गयी है। अतः आपके समक्ष सर्वस्वकी दक्षिणा देकर द्रव्यमय यज्ञके अनुष्ठान करनेका अवसर प्राप्त हुआ है ॥ ३३-३४ ॥
तं चेन्न यजसे राजन् प्राप्तस्त्वं राज्यकिल्बिषम् ।
येषां राजाश्वमेधेन यजते दक्षिणावता ॥ ३५ ॥
उपेत्य तस्यावभृथे पूताः सर्वे भवन्ति ते ।
राजन्! यदि आप यज्ञ नहीं करेंगे तो आपको सारे राज्यका पाप लगेगा। जिन देशोंके राजा दक्षिणायुक्त अश्वमेध यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन करते हैं, उनके यज्ञकी समाप्तिपर उन देशोंके सभी लोग वहाँ आकर अवभृथस्नान करके पवित्र होते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
विश्वरूपो महादेवः सर्वमेधे महामखे ।
जुहाव सर्वभूतानि तथैवात्मानमात्मना ॥ ३६ ॥
सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन महादेवजीने सर्वमेध नामक महायज्ञमें सम्पूर्ण भूतोंकी तथा स्वयं अपनी भी आहुति दे दी थी ॥ ३६ ॥
शाश्वतोऽयं भूतिपथो नास्यान्तमनुशुश्रुम ।
महान् दाशरथः पन्था मा राजन् कुपथं गमः ॥ ३७ ॥
यह क्षत्रियोंके लिये कल्याणका सनातन मार्ग है। इसका कभी अन्त नहीं सुना गया है। राजन्! यह वह महान् मार्ग है, जिसपर दस रथ चलते हैं, आप किसी कुत्सित मार्गका आश्रय न लें ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय
युधिष्ठिर उवाच
मुहूर्तं तावदेकाग्रो मनःश्रोत्रेऽन्तरात्मनि ।
धारयन्नपि तच्छ्रुत्वा रोचेत वचनं मम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— अर्जुन! तुम अपने मन और कानोंको अन्तःकरणमें स्थापित करके दो घड़ीतक एकाग्र हो जाओ, तब मेरी बात सुनकर तुम इसे पसंद करोगे ॥ १ ॥
साधुगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुनः ।
गच्छेयं तद् गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत ॥ २ ॥
मैं ग्राम्य सुखोंका परित्याग करके साधु पुरुषोंके चले हुए मार्गपर तो चल सकता हूँ; परंतु तुम्हारे आग्रहके कारण कदापि राज्य नहीं स्वीकार करूँगा ॥ २ ॥
क्षेम्यश्चैकाकिना गम्यः पन्थाः कोऽस्तीति पृच्छ माम् ।
अथवा नेच्छसि प्रष्टुमपृच्छन्नपि मे शृणु ॥ ३ ॥
एकाकी पुरुषके चलनेयोग्य कल्याणकारी मार्ग कौन-सा है? यह मुझसे पूछो अथवा यदि पूछना नहीं चाहते हो तो बिना पूछे भी मुझसे सुनो ॥ ३ ॥
हित्वा ग्राम्यसुखाचारं तप्यमानो महत् तपः ।
अरण्ये फलमूलाशी चरिष्यामि मृगैः सह ॥ ४ ॥
मैं गँवारोंके सुख और आचारपर लात मारकर वनमें रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करूँगा, फल-मूल खाकर मृगोंके साथ विचरूँगा ॥ ४ ॥
जुह्वानोऽग्निं यथाकालमुभौ कालावुपस्पृशन् ।
कृशः परिमिताहारश्चर्मचीरजटाधरः ॥ ५ ॥
दोनों समय स्नान करके यथासमय अग्निहोत्र करूँगा और परिमित आहार करके शरीरको दुर्बल कर दूँगा। मृगचर्म तथा वल्कल वस्त्र धारण करके सिरपर जटा रखूँगा ॥ ५ ॥
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासाश्रमक्षमः ।
तपसा विधिदृष्टेन शरीरमुपशोषयन् ॥ ६ ॥
सर्दी, गर्मी और हवाको सहूँगा, भूख, प्यास और परिश्रमको सहनेका अभ्यास डालूँगा, शास्त्रोक्त तपस्याद्वारा इस शरीरको सुखाता रहूँगा ॥ ६ ॥
मनःकर्णसुखा नित्यं शृण्वन्नुच्चावचा गिरः ।
मुदितानामरण्येषु वसतां मृगपक्षिणाम् ।। ७ ।। वनमें प्रसन्नतापूर्वक निवास करनेवाले पशु-पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोली, जो मन और कानोंको सुख देनेवाली होगी, नित्य सुनता रहूँगा ।। ७ ।।
आजिघ्रन् पेशलान् गन्धान् फुल्लानां वृक्षवीरुधाम् । नानारूपान् वने पश्यन् रमणीयान् वनौकसः ।। ८ ।। वनमें खिले हुए वृक्षों और लताओंकी मनोहर सुगन्ध सूँघता हुआ अनेक रूपवाले सुन्दर वनवासियोंको देखा करूँगा ।। ८ ।।
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किंपुनर्ग्रामवासिनाम् ।। ९ ।। वहाँ वानप्रस्थ महात्माओं तथा ऋषिकुलवासी ब्रह्मचारी ऋषि-मुनियोंका भी दर्शन होगा। मैं किसी वनवासीका भी अप्रिय नहीं करूँगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ।। ९ ।।
एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ।। १० ।। एकान्तमें रहकर आध्यात्मिक तत्त्वका विचार किया करूँगा और कच्चा-पक्का जैसा भी फल मिल जायगा, उसीको खाकर जीवन-निर्वाह करूँगा। जंगली फल-मूल, मधुर वाणी और जलके द्वारा देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करता रहूँगा ।। १० ।।
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । सेवमानः प्रतीक्षिष्ये देहस्यास्य समापनम् ।। ११ ।। इस प्रकार वनवासी मुनियोंके लिये शास्त्रमें बताये हुए कठोर-से-कठोर नियमोंका पालन करता हुआ इस शरीरकी आयु समाप्त होनेकी बाट देखता रहूँगा ।। ११ ।।
अथवैकोऽहमेकाहमेकैकस्मिन् वनस्पतौ । चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ।। १२ ।। अथवा मैं मूँड मुड़ाकर मननशील संन्यासी हो जाऊँगा और एक-एक दिन एक-एक वृक्षसे भिक्षा माँगकर अपने शरीरको सुखाता रहूँगा ।। १२ ।।
पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः । वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ।। १३ ।। शरीरपर धूल पड़ी होगी और सूने घरोंमें मेरा निवास होगा अथवा किसी वृक्षके नीचे उसकी जड़में ही पड़ा रहूँगा। प्रिय और अप्रियका सारा विचार छोड़ दूँगा ।। १३ ।।
न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।। १४ ।। किसीके लिये न शोक करूँगा न हर्ष। निन्दा और स्तुतिको समान समझूँगा। आशा और ममताको त्यागकर निर्द्वन्द्व हो जाऊँगा तथा कभी किसी वस्तुका संग्रह नहीं
करूँगा ।। १४ ।। आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृतिः । अकुर्वाणः परैः काञ्चित् संविदं जातु कैरपि ।। १५ ।। आत्माके चिन्तनमें ही सुखका अनुभव करूँगा, मनको सदा प्रसन्न रखूँगा, कभी किसी दूसरेके साथ कोई बातचीत नहीं करूँगा, गूँगों, अंधों और बहरोंके समान न किसीसे कुछ कहूँगा, न किसीको देखूँगा और न किसीकी सुनूँगा ।। १५ ।। जङ्गमाजङ्गमान् सर्वानविहिंसंश्चतुर्विधान् । प्रजाः सर्वाः स्वधर्मस्थाः समः प्राणभृतः प्रति ।। १६ ।। चार प्रकारके समस्त चराचर प्राणियोंमेंसे किसीकी हिंसा नहीं करूँगा। अपने-अपने धर्ममें स्थित हुई समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समभाव रखूँगा ।। १६ ।। न चाप्यवहसन् कञ्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुटीः क्वचित् । प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रियसुसंयतः ।। १७ ।। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न किसीके प्रति भौंहोंको ही टेढ़ी करूँगा। सदा मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी और मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंको पूर्णतः संयममें रखूँगा ।। १७ ।। अपृच्छन् कस्यचिन्मार्गं प्रव्रजन्नेव केनचित् । न देशं न दिशं काञ्चिद् गन्तुमिच्छन् विशेषतः ।। १८ ।। किसी भी मार्गसे चलता रहूँगा और कभी किसीसे रास्ता नहीं पूछूँगा। किसी खास स्थान या दिशाकी ओर जानेकी इच्छा नहीं रखूँगा ।। १८ ।। गमने निरपेक्षश्च पश्चादनवलोकयन् । ऋजुः प्रणिहितो गच्छंस्त्रसं स्थावरवर्जकः ।। १९ ।। कहीं भी मेरे जानेका कोई विशेष उद्देश्य नहीं होगा। न आगे जानेकी उत्सुकता होगी, न पीछे फिरकर देखूँगा। सरल भावसे रहूँगा। मेरी दृष्टि अन्तर्मुखी होगी। स्थावर-जंगम जीवोंको बचाता हुआ आगे चलता रहूँगा ।। १९ ।। स्वभावस्तु प्रयात्यग्रे प्रभवन्त्यशनान्यपि । द्वन्द्वानि च विरुद्धानि तानि सर्वाण्यचिन्तयन् ।। २० ।। स्वभाव आगे-आगे चलता है, भोजन भी अपने-आप प्रकट हो जाते हैं, सर्दी-गर्मी आदि जो परस्पर विरोधी द्वन्द्व हैं; वे सब आते-जाते रहते हैं, अतः इन सबकी चिन्ता छोड़ दूँगा ।। २० ।। अल्पं वास्वादु वा भोज्यं पूर्वालाभेन जातुचित् । अन्येष्वपि चरँल्लाभमलाभे सप्त पूरयन् ।। २१ ।। भिक्षा थोड़ी मिली या स्वादहीन मिली, इसका विचार न करके उसे पा लूँगा। यदि कभी एक घरसे भिक्षा नहीं मिली तो दूसरे घरोंमें भी जाऊँगा। मिल गया तो ठीक है, न मिलनेकी दशामें क्रमशः सात घरोंमें जाऊँगा, आठवेंमें नहीं जाऊँगा ।। २१ ।।
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीतपात्रसंचारे काले विगतभिक्षुके ॥ २२ ॥ एककालं चरन् भैक्ष्यं त्रीनथ द्वे च पञ्च वा । स्नेहपाशं विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ॥ २३ ॥ जब घरोंमेंसे धुआँ निकलना बंद हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, चूल्हेकी आग बुझ गयी हो, घरके सब लोग खा-पी चुके हों, परोसी हुई थालीको इधर-उधर ले जानेका काम समाप्त हो गया हो और भिखमंगे भिक्षा लेकर लौट गये हों, ऐसे समयमें मैं एक ही वक्त भिक्षाके लिये दो, तीन या पाँच घरोंतक जाया करूँगा। सब ओरसे स्नेहका बन्धन तोड़कर इस पृथ्वीपर विचरता रहूँगा ॥ २२-२३ ॥ अलाभे सति वा लाभे समदर्शी महातपाः । न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् ॥ २४ ॥ कुछ मिले या न मिले, दोनों ही अवस्थाओंमें मेरी दृष्टि समान होगी। मैं महान् तपमें संलग्न रहकर ऐसा कोई आचरण नहीं करूँगा, जिसे जीने या मरनेकी इच्छावाले लोग करते हैं ॥ २४ ॥ जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन्न च द्विषन् । वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः ॥ २५ ॥ नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः । न तो जीवनका अभिनन्दन करूँगा, न मृत्युसे द्वेष। यदि एक मनुष्य मेरी एक बाँहको बसूलेसे काटता हो और दूसरा दूसरी बाँहको चन्दनमिश्रित जलसे सींचता हो तो न पहलेका अमंगल सोचूँगा और न दूसरेकी मंगल-कामना करूँगा। उन दोनोंके प्रति समान भाव रखूँगा ॥ याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । सर्वास्ताः समभित्यज्य निमेषादिव्यवस्थितः ॥ २६ ॥ जीवित पुरुषके द्वारा जो कोई भी अभ्युदयकारी कर्म किये जा सकते हैं, उन सबका परित्याग करके केवल शरीर-निर्वाहके लिये पलकोंके खोलने-मींचने या खाने-पीने आदिके कार्यमें ही प्रवृत्त हो सकूँगा ॥ २६ ॥ तेषु नित्यमसक्तश्च त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । सुपरित्यक्तसंकल्पः सुनिर्रिक्तात्मकल्मषः ॥ २७ ॥ इन सब कार्योंमें भी आसक्त नहीं होऊँगा। सम्पूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारोंसे उपरत होकर मनको संकल्पशून्य करके अन्तःकरणका सारा मल धो डालूँगा ॥ २७ ॥ विमुक्तः सर्वसंगेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ॥ २८ ॥