महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२. समतल जमीनके अंदर बना हुआ किला या तहखाना महीदुर्ग कहलाता है। ३. पर्वतशिखरपर बना हुआ वह किला जो चारों ओरसे उत्तुंग पर्वतमालाओंद्धारा घिरा हुआ हो, गिरिदुर्ग कहलाता है। ४. फौजी किलेका ही नाम मनुष्यदुर्ग है। ५. जिसके चारों ओर जलका घेरा हो, वह जलदुर्ग कहलाता है। ६. जो स्थान कटवाँसी आदिके घने जंगलसे घिरा हुआ हो, उसे वनदुर्ग कहा गया है।
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! अब मैं यह अच्छी तरह जानना चाहता हूँ कि राष्ट्रकी रक्षा तथा उसकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है, अतः आप इसी विषयका व
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय
युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम् ।
सम्यग्जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! अब मैं यह अच्छी तरह जानना चाहता हूँ कि राष्ट्रकी रक्षा तथा उसकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है, अतः आप इसी विषयका वर्णन करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च ते सम्यग् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम् ।
हन्त सर्वं प्रवक्ष्यामि तत्त्वमेकमनाः शृणु ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! अब मैं बड़े हर्षके साथ तुम्हें राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिका सारा रहस्य बता रहा हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥
ग्रामस्याधिपतिः कार्यो दशग्राम्यास्तथा परः ।
द्विगुणायाः शतस्यैवं सहस्रस्य च कारयेत् ॥ ३ ॥
एक गाँवका, दस गाँवोंका, बीस गाँवोंका, सौ गाँवोंका तथा हजार गाँवोंका अलग-अलग एक-एक अधिपति बनाना चाहिये ॥ ३ ॥
ग्रामीयान् ग्रामदोषांश्च ग्रामिकः प्रतिभावयेत् ।
तान् ब्रूयाद् दशपायासौ स तु विंशतिपाय वै ॥ ४ ॥
सोऽपि विंशत्यधिपतिर्वृत्तं जानपदे जने ।
ग्रामाणां शतपालाय सर्वमेव निवेदयेत् ॥ ५ ॥
गाँवके स्वामीका यह कर्त्तव्य है कि वह गाँववालोंके मामलोंका तथा गाँवमें जो-जो अपराध होते हों, उन सबका वहीं रहकर पता लगावे और उनका पूरा विवरण दस गाँवके अधिपतिके पास भेजे। इसी तरह दस गाँवोंवाला बीस गाँववालेके पास और बीस गाँवोंवाला अपने अधीनस्थ जनपदके लोगोंका सारा वृत्तान्त सौ गाँवोंवाले अधिकारीको सूचित करे। (फिर सौ गाँवोंका अधिकारी हजार गाँवोंके अधिपतिको अपने अधिकृत क्षेत्रोंकी सूचना भेजे। इसके बाद हजार गाँवोंका अधिपति स्वयं राजाके पास जाकर अपने यहाँ आये हुए सभी विवरणोंको उसके सामने प्रस्तुत करे) ॥ ४-५ ॥
यानि ग्राम्याणि भोज्यानि ग्रामिकस्तान्युपाश्रियात् ।
दशपस्तेन भर्तव्यस्तेनापि द्विगुणाधिपः ॥ ६ ॥
गाँवोंमें जो आय अथवा उपज हो, वह सब गाँवका अधिपति अपने ही पास रखे (तथा उसमेंसे नियत अंशका वेतनके रूपमें उपभोग करे)। उसीमेंसे नियत वेतन देकर उसे दस गाँवोंके अधिपतिका भी भरण-पोषण करना चाहिये, इसी तरह दस गाँवके अधिपतिको भी बीस गाँवोंके पालकका भरण-पोषण करना उचित है ॥ ६ ॥
ग्रामं ग्रामशताध्यक्षो भोक्तुमर्हति सत्कृतः । महान्तं भरतश्रेष्ठ सुस्फीतं जनसंकुलम् ॥ ७ ॥ तत्र ह्यनेकपायतं राज्ञो भवति भारत । जो सत्कारप्राप्त व्यक्ति सौ गाँवोंका अध्यक्ष हो, वह एक गाँवकी आमदनीको उपभोगमें ला सकता है। भरतश्रेष्ठ! वह गाँव बहुत बड़ी बस्तीवाला, मनुष्योंसे भरपूर और धन-धान्यसे सम्पन्न हो। भरतनन्दन! उसका प्रबन्ध राजाके अधीनस्थ अनेक अधिपतियोंके अधिकारमें रहना चाहिये ॥ ७ १/२ ॥
शाखानगरमर्हस्तु सहस्रपतिरुत्तमः ॥ ८ ॥ धान्यहैरन्यभोगेन भोक्तुं राष्ट्रियसङ्गतः । सहस्र गाँवका श्रेष्ठ अधिपति एक शाखानगर (कस्बे)-की आय पानेका अधिकारी है। उस कस्बेमें जो अन्न और सुवर्णकी आय हो, उसके द्वारा वह इच्छानुसार उपभोग कर सकता है। उसे राष्ट्रवासियोंके साथ मिलकर रहना चाहिये ॥ ८ १/२ ॥
तेषां संग्रामकृत्यं स्याद् ग्रामकृत्यं च तेषु यत् ॥ ९ ॥ धर्मज्ञः सचिवः कश्चित् तत् तत्पश्येदतन्द्रितः । इन अधिपतियोंके अधिकारमें जो युद्धसम्बन्धी तथा गाँवोंके प्रबन्धसम्बन्धी कार्य सौंपे गये हों, उनकी देखभाल कोई आलस्यरहित धर्मज्ञ मन्त्री किया करे ॥ ९ १/२ ॥
नगरे नगरे वा स्यादेकः सर्वार्थचिन्तकः ॥ १० ॥ उच्चैः स्थाने घोररूपो नक्षत्राणामिव ग्रहः । भवेत् स तान् परिक्रामेत् सर्वानैव सभासदः ॥ ११ ॥ अथवा प्रत्येक नगरमें एक ऐसा अधिकारी होना चाहिये, जो सभी कार्योंका चिन्तन और निरीक्षण कर सके। जैसे कोई भयंकर ग्रह आकाशमें नक्षत्रोंके ऊपर स्थित हो परिभ्रमण करता है, उसी प्रकार वह अधिकारी उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित होकर उन सभी सभासद् आदिके निकट परिभ्रमण करे और उनके कार्योंकी जाँच-पड़ताल करता रहे ॥ १०-११ ॥
तेषां वृत्तिं परिणयेत् कश्चिद् राष्ट्रेषु तच्चरः । जिघांसवः पापकामाः परस्वादायिनः शठाः ॥ १२ ॥ रक्षाभ्यधिकृता नाम तेभ्यो रक्षेदिमाः प्रजाः ।
उस निरीक्षकका कोई गुप्तचर राष्ट्रमें घूमता रहे और सभासद् आदिके कार्य एवं मनोभावको जानकर उसके पास सारा समाचार पहुँचाता रहे। रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए अधिकारी लोग प्रायः हिंसक स्वभावके हो जाते हैं। वे दूसरोंकी बुराई चाहने लगते हैं और शठतापूर्वक पराये धनका अपहरण कर लेते हैं। ऐसे लोगोंसे वह सर्वार्थचिन्तक अधिकारी इस सारी प्रजाकी रक्षा करे ।। १२ १/२ ।।
विक्रयं क्रयमध्वानं भक्तं च सपरिच्छदम् ।। १३ ।।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य वणिजां कारयेत् करान् ।
राजाको मालकी खरीद—बिक्री, उसके मँगानेका खर्च, उसमें काम करनेवाले नौकरोंके वेतन, बचत और योग-क्षेमके निर्वाहकी ओर दृष्टि रखकर ही व्यापारियोंपर कर लगाना चाहिये ।। १३ १/२ ।।
उत्पत्तिं दानवृत्तिं च शिल्पं सम्प्रेक्ष्य चासकृत् ।। १४ ।।
शिल्पं प्रति करानेवं शिल्पिनः प्रति कारयेत् ।
इसी तरह मालकी तैयारी, उसकी खपत तथा शिल्पकी उत्तम-मध्यम आदि श्रेणियोंका बार-बार निरीक्षण करके शिल्प एवं शिल्पकारोंपर कर लगावे ।। १४ १/२ ।।
उच्चावचकरा दाप्या महाराज्ञा युधिष्ठिर ।। १५ ।।
यथा यथा न सीदेरंस्तथा कुर्यान्महीपतिः ।
फलं कर्म च सम्प्रेक्ष्य ततः सर्वं प्रकल्पयेत् ।। १६ ।।
युधिष्ठिर! महाराजको चाहिये कि वह लोगोंकी हैसियतके अनुसार भारी और हलका कर लगावे। भूपालको उतना ही कर लेना चाहिये, जितनेसे प्रजा संकटमें न पड़ जाय। उनका कार्य और लाभ देखकर ही सब कुछ करना चाहिये ।। १५-१६ ।।
फलं कर्म च निर्हेतु न कश्चित् सम्प्रवर्तते ।
यथा राजा च कर्ता च स्यातां कर्मणि भागिनौ ।। १७ ।।
संवेक्ष्य तु तथा राज्ञा प्रणेयाः सततं कराः ।
लाभ और कर्म दोनों ही यदि निष्प्रयोजन हुए तो कोई भी काम करनेमें प्रवृत्त नहीं होगा। अतः जिस उपायसे राजा और कार्यकर्ता दोनोंको कृषि, वाणिज्य आदि कर्मके लाभका भाग प्राप्त हो, उसपर विचार करके राजाको सदैव करोंका निर्णय करना चाहिये ।। १७ १/२ ।।
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चापि तृष्णया ।। १८ ।।
ईहाद्वाराणि संरुध्य राजा सम्प्रीतदर्शनः ।
प्रद्विषन्ति परिख्यातं राजानमतिखादिनम् ।। १९ ।।
अधिक तृष्णाके कारण अपने जीवनके मूल आधार प्रजाओंके जीवनभूत खेती-बारी आदिका उच्छेद न कर डाले। राजा लोभके दरवाजोंको बंद करके ऐसा बने कि उसका
दर्शन प्रजामात्रको प्रिय लगे। यदि राजा अधिक शोषण करनेवाला विख्यात हो जाय तो सारी प्रजा उससे द्वेष करने लगती है ॥ १८-१९ ॥
प्रद्विष्टस्य कुतः श्रेयो नाप्रियो लभते फलम् ।
वत्सौपम्येन दोग्धव्यं राष्ट्रमक्षीणबुद्धिना ॥ २० ॥
जिससे सब लोग द्वेष करते हों, उसका कल्याण कैसे हो सकता है? जो प्रजावर्गका प्रिय नहीं होता, उसे कोई लाभ नहीं मिलता। जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं हुई है, उस राजाको चाहिये कि वह गायसे बछड़ेकी तरह राष्ट्रसे धीरे-धीरे अपने उदरकी पूर्ति करे ॥ २० ॥
भृतो वत्सो जातबलः पीडां सहति भारत ।
न कर्म कुरुते वत्सो भृशं दुग्धो युधिष्ठिर ॥ २१ ॥
भरतनन्दन युधिष्ठिर! जिस गायका दूध अधिक नहीं दुहा जाता, उसका बछड़ा अधिक कालतक उसके दूधसे पुष्ट एवं बलवान् हो भारी भार ढोनेका कष्ट सहन कर लेता है; परंतु जिसका दूध अधिक दुह लिया गया हो, उसका बछड़ा कमजोर होनेके कारण वैसा काम नहीं कर पाता ॥ २१ ॥
राष्ट्रमप्यतिदुग्धं हि न कर्म कुरुते महत् ।
यो राष्ट्रमनुगृह्णाति परिरक्षन् स्वयं नृपः ॥ २२ ॥
संजातमुपजीवन् स लभते सुमहत् फलम् ।
इसी प्रकार राष्ट्रका भी अधिक दोहन करनेसे वह दरिद्र हो जाता है; इस कारण वह कोई महान् कर्म नहीं कर पाता। जो राजा स्वयं रक्षामें तत्पर होकर समूचे राष्ट्रपर अनुग्रह करता है और उसकी प्राप्त हुई आयसे अपनी जीविका चलाता है, वह महान् फलका भागी होता है ॥
आपदर्थं च निर्यातं धनं त्विह विवर्धयेत् ॥ २३ ॥
राष्ट्रं च कोशभूतं स्यात् कोशो वेश्मगतस्तथा ।
राजाको चाहिये कि वह अपने देशमें लोगोंके पास इकट्ठे हुए धनको आपत्तिके समय काम आनेके लिये बढ़ावे और अपने राष्ट्रको घरमें रखा हुआ खजाना समझे ॥ २३ १/२ ॥
पौरजानपदान् सर्वान् संश्रितोपश्रितांस्तथा ।
यथाशक्त्यनुकम्पेत सर्वान् स्वल्पधनानपि ॥ २४ ॥
नगर और ग्रामके लोग यदि साक्षात् शरणमें आये हों या किसीको मध्यस्थ बनाकर उसके द्वारा शरणागत हुए हों, राजा उन सब स्वल्प धनवालोंपर भी अपनी शक्तिके अनुसार कृपा करे ॥ २४ ॥
बाह्यं जनं भेदयित्वा भोक्तव्यो मध्यमः सुखम् ।
एवं नास्य प्रकुप्यन्ति जनाः सुखितदुःखिताः ॥ २५ ॥
जंगली लुटेरोंको बाह्यजन कहते हैं, उनमें भेद डालकर राजा मध्यमवर्गके ग्रामीण मनुष्योंका सुखपूर्वक उपभोग करे—उनसे राष्ट्रके हितके लिये धन ले, ऐसा करनेसे सुखी
और दुःखी दोनों प्रकारके मनुष्य उसपर क्रोध नहीं करते ॥ २५ ॥
प्रागेव तु धनादानमनुभाष्य ततः पुनः ।
संनिपत्य स्वविषये भयं राष्ट्रे प्रदर्शयेत् ॥ २६ ॥
राजा पहले ही धन लेनेकी आवश्यकता बताकर फिर अपने राज्यमें सर्वत्र दौरा करे और राष्ट्रपर आनेवाले भयकी ओर सबका ध्यान आकर्षित करे ॥ २६ ॥
इयमापत्समुत्पन्ना परचक्रभयं महत् ।
अपि चान्ताय कल्पन्ते वेणोरिव फलागमाः ॥ २७ ॥
अरयो मे समुत्थाय बहुभिर्दस्युभिः सह ।
इदमात्मवधायैव राष्ट्रमिच्छन्ति बाधितुम् ॥ २८ ॥
वह लोगोंसे कहे—'सज्जनो! अपने देशपर यह बहुत बड़ी आपत्ति आ पहुँची है। शत्रुदलके आक्रमणका महान् भय उपस्थित है। जैसे बाँसमें फलका लगना बाँसके विनाशका ही कारण होता है, उसी प्रकार मेरे शत्रु बहुत-से लुटेरोंको साथ लेकर अपने ही विनाशके लिये उठकर मेरे इस राष्ट्रको सताना चाहते हैं ॥
अस्यामापदि घोरायां सम्प्राप्ते दारुणे भये ।
परित्राणाय भवतः प्रार्थयिष्ये धनानि वः ॥ २९ ॥
'इस घोर आपत्ति और दारुण भयके समय मैं आप लोगोंकी रक्षाके लिये (ऋणके रूपमें) धन माँग रहा हूँ ॥ २९ ॥
प्रतिदास्ये च भवतां सर्वं चाहं भयक्षये ।
नारयः प्रतिदास्यन्ति यद्धरेयुर्बलादितः ॥ ३० ॥
'जब यह भय दूर हो जायगा, उस समय सारा धन मैं आपलोगोंको लौटा दूँगा। शत्रु आकर यहाँसे बलपूर्वक जो धन लूट ले जायँगे, उसे वे कभी वापस नहीं करेंगे ॥ ३० ॥
कलत्रमादितः कृत्वा सर्वं वो विनशेदिति ।
अपि चेत् पुत्रदारार्थमर्थसंचय इष्यते ॥ ३१ ॥
'शत्रुओंका आक्रमण होनेपर आपकी स्त्रियोंपर पहले संकट आयगा। उनके साथ ही आपका सारा धन नष्ट हो जायगा। स्त्री और पुत्रोंकी रक्षाके लिये ही धनसंग्रहकी आवश्यकता होती है ॥ ३१ ॥
नन्दामि वः प्रभावेण पुत्राणामिव चोदये ।
यथाशक्त्युपगृह्णामि राष्ट्रस्यापीडया च वः ॥ ३२ ॥
'जैसे पुत्रोंके अभ्युदयसे पिताको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मैं आपके प्रभावसे—आप लोगोंकी बढ़ती हुई समृद्धिशक्तिसे आनन्दित होता हूँ। इस समय राष्ट्रपर आये हुए संकटको टालनेके लिये मैं आप लोगोंसे आपकी शक्तिके अनुसार ही धन ग्रहण करूँगा, जिससे राष्ट्रवासियोंको किसी प्रकारका कष्ट न हो ॥ ३२ ॥
आपत्स्वेव च वोढव्यं भवद्भिः पुङ्गवैरिव ।
न च प्रियतरं कार्यं धनं कस्याञ्चिदापदि ॥ ३३ ॥
‘जैसे बलवान् बैल दुर्गम स्थानोंमें भी बोझ ढोकर पहुँचाते हैं, उसी प्रकार आप लोगोंको भी देशपर आयी हुई इस आपत्तिके समय कुछ भार उठाना ही चाहिये। किसी विपत्तिके समय धनको अधिक प्रिय मानकर छिपाये रखना आपके लिये उचित न होगा' ॥ ३३ ॥
इति वाचा मधुरया श्लक्ष्णया सोपचारया ।
स्वरश्मीनभ्यवसृजेद् योगमाधाय कालवित् ॥ ३४ ॥
समयकी गतिविधिको पहचाननेवाले राजाको चाहिये कि वह इसी प्रकार स्नेहयुक्त और अनुनयपूर्ण मधुर वचनोंद्वारा समझा-बुझाकर उपयुक्त उपायका आश्रय ले अपने पैदल सैनिकों या सेवकोंको प्रजाजनोंके घरपर धनसंग्रहके लिये भेजे ॥ ३४ ॥
प्राकारं भृत्यभरणं व्ययं संग्रामतो भयम् ।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य गोमिनः कारयेत् करम् ॥ ३५ ॥
नगरकी रक्षाके लिये चहारदिवारी बनवानी है, सेवकों और सैनिकोंका भरण-पोषण करना है, अन्य आवश्यक व्यय करने हैं, युद्धके भयको टालना है तथा सबके योग-क्षेमकी चिन्ता करनी है, इन सब बातोंकी आवश्यकता दिखाकर राजा धनवान् वैश्योंसे कर वसूल करे ॥ ३५ ॥
उपेक्षिता हि नश्येयुर्गोमिनोऽरण्यवासिनः ।
तस्मात् तेषु विशेषेण मृदुपूर्वं समाचरेत् ॥ ३६ ॥
यदि राजा वैश्योंके हानि-लाभकी परवा न करके उन्हें करभारसे विशेष कष्ट पहुँचाता है तो वे राज्य छोड़कर भाग जाते और वनमें जाकर रहने लगते हैं; अतः उनके प्रति विशेष कोमलताका बर्ताव करना चाहिये ॥ ३६ ॥
सान्त्वनं रक्षणं दानमवस्था चाप्यभीक्ष्णशः ।
गोमिनां पार्थ कर्तव्यः संविभागः प्रियाणि च ॥ ३७ ॥
कुन्तीनन्दन! वैश्योंको सान्त्वना दे, उनकी रक्षा करे, उन्हें धनकी सहायता दे, उनकी स्थितिको सुदृढ़ रखनेका बारंबार प्रयत्न करे, उन्हें आवश्यक वस्तुएँ अर्पित करे और सदा उनके प्रिय कार्य करता रहे ॥ ३७ ॥
अजस्रमुपयोक्तव्यं फलं गोमिषु भारत ।
प्रभावयन्ति राष्ट्रं च व्यवहारं कृषिं तथा ॥ ३८ ॥
भारत! व्यापारियोंको उनके परिश्रमका फल सदा देते रहना चाहिये; क्योंकि वे ही राष्ट्रके वाणिज्य, व्यवसाय तथा खेतीकी उन्नति करते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् गोमिषु यत्नेन प्रीतिं कुर्याद् विचक्षणः ।
दयावानप्रमत्तश्च करान् सम्प्रणयन् मृदून् ॥ ३९ ॥
अतः बुद्धिमान् राजा सदा उन वैश्योंपर यत्नपूर्वक प्रेमभाव बनाये रखे। सावधानी रखकर उनके साथ दयालुताका बर्ताव करे और उनपर हलके कर लगावे ।।
सर्वत्र क्षेमचरणं सुलभं नाम गोमिषु ।
न ह्यतः सदृशं किंचिद् वरमस्ति युधिष्ठिर ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर! राजाको वैश्योंके लिये ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये, जिससे वे देशमें सब ओर कुशलपूर्वक विचरण कर सकें। राजाके लिये इससे बढ़कर हितकर काम दूसरा नहीं है ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्त्यादिकथने सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रकी रक्षा आदिका वर्णनविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 598)
अष्टाशीतितमोऽध्यायः
प्रजासे कर लेने तथा कोश-संग्रह करनेका प्रकार
युधिष्ठिर उवाच
यदा राजा समर्थोऽपि कोषार्थी स्यान्महामते ।
कथं प्रवर्तेत तदा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**परम बुद्धिमान् पितामह! जब राजा पूर्णतः समर्थ हो—उसपर कोई संकट न आया हो, तो भी यदि वह अपना कोश बढ़ाना चाहे तो उसे किस तरहका उपाय काममें लाना चाहिये, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
यथादेशं यथाकालं यथाबुद्धि यथाबलम् ।
अनुशिष्यात् प्रजा राजा धर्मार्थी तद्धिते रतः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालकी परिस्थितिका ध्यान रखते हुए अपनी बुद्धि और बलके अनुसार प्रजाके हितसाधनमें संलग्न रहकर उसे अपने अनुशासनमें रखना चाहिये ॥ २ ॥
यथा तासां च मन्येत श्रेय आत्मन एव च ।
तथा कर्माणि सर्वाणि राजा राष्ट्रेषु वर्तयेत् ॥ ३ ॥
जिस प्रकारसे काम करनेपर प्रजाओंकी तथा अपनी भी भलाई समझमें आवे, वैसे ही समस्त कार्योंका राजा अपने राष्ट्रमें प्रचार करे ॥ ३ ॥
मधुदोहं दुहेद् राष्ट्रं भ्रमरा इव पादपम् ।
वत्सापेक्षी दुहेच्चैव स्तनांश्च न विकुट्टयेत् ॥ ४ ॥
जैसे भौंरा धीरे-धीरे फूल एवं वृक्षका रस लेता है, वृक्षको काटता नहीं है, जैसे मनुष्य बछड़ेको कष्ट न देकर धीरे-धीरे गायको दुहता है, उसके थनोंको कुचल नहीं डालता है, उसी प्रकार राजा कोमलताके साथ ही राष्ट्ररूपी गौका दोहन करे, उसे कुचले नहीं ॥ ४ ॥
जलौकावत् पिबेद् राष्ट्रं मृदुनैव नराधिपः ।
व्याघ्रीव च हरेत् पुत्रान् संदशेन्न च पीडयेत् ॥ ५ ॥
जैसे जोंक धीरे-धीरे शरीरका रक्त चूसती है, उसी प्रकार राजा भी कोमलताके साथ ही राष्ट्रसे कर वसूल करे। जैसे बाघिन अपने बच्चेको दाँतसे पकड़कर इधर-उधर ले जाती है; परंतु न तो उसे काटती है और न उसके शरीरमें पीड़ा ही पहुँचने देती है, उसी तरह राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रका दोहन करे ॥ ५ ॥
यथा शल्यकवानाखुः पदं धूनयते सदा ।
अतीक्ष्णेनाभ्युपायेन तथा राष्ट्रं समापिबेत् ।। ६ ।।
जैसे तीखे दाँतोंवाला चूहा सोये हुए मनुष्यके पैरके मांसको ऐसी कोमलतासे काटता है कि वह मनुष्य केवल पैरको कम्पित करता है, उसे पीड़ाका ज्ञान नहीं हो पाता। उसी प्रकार राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रसे कर ले, जिससे प्रजा दुखी न हो ।। ६ ।।
अल्पेनाल्पेन देयेन वर्धमानं प्रदापयेत् ।
ततो भूयस्ततो भूयः क्रमवृद्धिं समाचरेत् ।। ७ ।।
वह पहले थोड़ा-थोड़ा कर लेकर फिर धीरे-धीरे उसे बढ़ावे और उस बढ़े हुए करको वसूल करे। उसके बाद समयानुसार फिर उसमें थोड़ी-थोड़ी वृद्धि करते हुए क्रमशः बढ़ाता रहे (ताकि किसीको विशेष भार न जान पड़े) ।। ७ ।।
दमयन्निव दम्यानि शश्वद् भारं विवर्धयेत् ।
मृदुपूर्वं प्रयत्नेन पाशानभ्यवहारयेत् ।। ८ ।।
जैसे बछड़ोंको पहले-पहल बोझ ढोनेका अभ्यास करानेवाला पुरुष उन्हें प्रयत्नपूर्वक नाथता है और धीरे-धीरे उनपर अधिक भार लादता ही रहता है, उसी प्रकार प्रजापर भी करका भार पहले कम रखे; फिर उसे धीरे-धीरे बढ़ावे ।। ८ ।।
सकृत्पाशावकीर्णास्ते न भविष्यन्ति दुर्द्दमाः ।
उचितेनैव भोक्तव्यास्ते भविष्यन्ति यत्नतः ।। ९ ।।
यदि उनको एक साथ नाथकर उनपर भारी भार लादना चाहे तो उन्हें काबूमें लाना कठिन हो जायगा; अतः उचित ढंगसे प्रयत्नपूर्वक एक-एकको नाथकर उन्हें भार ढोनेके उपयोगमें लाना चाहिये। ऐसा करनेसे वे पूरा भार वहन करनेके योग्य हो जायेंगे ।। ९ ।।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दुर्लभः पुरुषं प्रति ।
यथामुख्यान् सान्त्वयित्वा भोक्तव्य इतरो जनः ।। १० ।।
अतः राजाके लिये भी सभी पुरुषोंको एक साथ वशमें करनेका प्रयत्न दुष्कर है, इसलिये उसे चाहिये कि प्रधान-प्रधान मनुष्योंको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर वशमें कर ले; फिर अन्य साधारण मनुष्योंको यथेष्ट उपयोगमें लाता रहे ।। १० ।।
ततस्तान् भेदयित्वा तु परस्परविवक्षितान् ।
भुञ्जीत सान्त्वयंश्चैव यथासुखमयतन्तः ।। ११ ।।
तदनन्तर उन परस्पर विचार करनेवाले मनुष्योंमें भेद डलवाकर राजा सबको सान्त्वना प्रदान करता हुआ बिना किसी प्रयत्नके सुखपूर्वक सबका उपभोग करे ।। ११ ।।
न चास्थाने न चाकाले करांस्तेभ्यो निपातयेत् ।
आनुपूर्व्येण सान्त्वेन यथाकालं यथाविधि ।। १२ ।।
राजाको चाहिये कि परिस्थिति और समयके प्रतिकूल प्रजापर करका बोझ न डाले। समयके अनुसार प्रजाको समझा-बुझाकर उचित रीतिसे क्रमशः कर वसूल करे ।। १२ ।।
उपायान् प्रब्रवीम्येतान् न मे माया विवक्षिता ।
अनुपायेन दमयन् प्रकोपयति वाजिनः ।। १३ ।। राजन्! मैं ये उत्तम उपाय बतला रहा हूँ। मुझे छल-कपट या कूटनीतिकी बात बताना यहाँ अभीष्ट नहीं है। जो लोग उचित उपायका आश्रय न लेकर मनमाने तौरपर घोड़ोंका दमन करना चाहते हैं, वे उन्हें कुपित कर देते हैं (इसी तरह जो अयोग्य उपायसे प्रजाको दबाते हैं, वे उनके मनमें रोष उत्पन्न कर देते हैं) ।। १३ ।। पानागारनिवेशाश्च वेश्याः प्रापणिकास्तथा । कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ।। १४ ।। नियम्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः । एते राष्ट्रेऽभितिष्ठन्तो बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ।। १५ ।। शराबखाना खोलनेवाले, वेश्याएँ, कुट्टनियाँ, वेश्याओंके दलाल, जुआरी तथा ऐसे ही बुरे पेशे करनेवाले और भी जितने लोग हों, वे समूचे राष्ट्रको हानि पहुँचानेवाले हैं; अतः इन सबको दण्ड देकर दबाये रखना चाहिये। यदि ये राज्यमें टिके रहते हैं तो कल्याणमार्गपर चलनेवाली प्रजाको बड़ी बाधाएँ पहुँचाते हैं ।। १४-१५ ।। न केनचिद् याचितव्यः कश्चित्किञ्चिदनापदि । इति व्यवस्था भूतानां पुरस्तान्मनुना कृता ।। १६ ।। मनुजीने बहुत पहलेसे समस्त प्राणियोंके लिये यह नियम बना दिया है कि आपत्तिकालको छोड़कर अन्य समयमें कोई किसीसे कुछ न माँगे ।। १६ ।। सर्वे तथानुजीवेयुर्न कुर्युः कर्म चेदिह । सर्व एव इमे लोका न भवेयुरसंशयम् ।। १७ ।। यदि ऐसी व्यवस्था न होती तो सब लोग भीख माँगकर ही गुजारा करते, कोई भी यहाँ कर्म नहीं करता। ऐसी दशामें ये सम्पूर्ण जगत्के लोग निःसंदेह नष्ट हो जाते ।। १७ ।। प्रभुर्नियमने राजा य एतान् न नियच्छति । भुङ्क्ते स तस्य पापस्य चतुर्भागमिति श्रुतिः ।। १८ ।। जो राजा इन सबको नियमके अंदर रखनेमें समर्थ होकर भी इन्हें काबूमें नहीं रखता, वह इनके किये हुए पापका चौथाई भाग स्वयं भोगता है, ऐसा श्रुतिका कथन है ।। १८ ।। भोक्ता तस्य तु पापस्य सुकृतस्य यथा तथा । नियन्तव्याः सदा राज्ञा पापा ये स्युर्नराधिप ।। १९ ।। नरेश्वर! राजा जैसे प्रजाके पापका चतुर्थांश भोगता है उसी प्रकार पुण्यका भी चतुर्थांश उसे प्राप्त होता है; अतः राजाको चाहिये कि वह सदा पापियोंको दण्ड देकर उन्हें दबाये रखे ।। १९ ।। कृतपापस्त्वसौ राजा य एतान् न नियच्छति । तथा कृतस्य धर्मस्य चतुर्भागमुपाश्नुते ।। २० ।।
जो राजा इन पापियोंको नियन्त्रणमें नहीं रखता, वह स्वयं भी पापाचारी माना जाता है तथा जो पापियोंका दमन करता है, वह प्रजाके किये हुए धर्मका चौथाई भाग स्वयं प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ स्थानान्येतानि संयम्य प्रसंगो भूतिनाशनः । कामे प्रसक्तः पुरुषः किमकार्यं विवर्जयेत् ॥ २१ ॥ ऊपर जो मदिरालय तथा वेश्यालय आदि स्थान बताये गये हैं, उनपर रोक लगा देनी चाहिये; क्योंकि इससे कामविषयक आसक्ति बढ़ती है। जो धन-वैभव तथा कल्याणका नाश करनेवाली है। काममें आसक्त हुआ पुरुष कौन-सा ऐसा न करनेयोग्य काम है, जिसे छोड़ दे? ॥ २१ ॥ मद्यमांसपरस्वानि तथा दारा धनानि च । आहरेद् रागवशगस्तथा शास्त्रं प्रदर्शयेत् ॥ २२ ॥ आसक्तिके वशीभूत हुआ मानव मांस खाता, मदिरा पीता और परधन तथा परस्त्रीका अपहरण करता है। साथ ही दूसरोंको भी यही सब करनेका उपदेश देता है ॥ २२ ॥ आपद्येव तु याचन्ते येषां नास्ति परिग्रहः । दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद् भयान्न तु ॥ २३ ॥ जिन लोगोंके पास कुछ भी संग्रह नहीं है, वे यदि आपत्तिके समय ही याचना करें तो उन्हें धर्म समझकर और दया करके ही देना चाहिये, किसी भय या दबावमें पड़कर नहीं ॥ २३ ॥ मा ते राष्ट्रे याचनका भूवन्मा चापि दस्यवः । एषां दातार एवैते नैते भूतस्य भावकाः ॥ २४ ॥ तुम्हारे राज्यमें भिखमंगे और लुटेरे न हों; क्योंकि ये प्रजाके धनको केवल छीननेवाले हैं, उनके ऐश्वर्यको बढ़ानेवाले नहीं हैं ॥ २४ ॥ ये भूतान्यनुगृह्णन्ति वर्धयन्ति च ये प्रजाः । ते ते राष्ट्रेषु वर्तन्तां मा भूतानामभावकाः ॥ २५ ॥ जो सब प्राणियोंपर दया करते और प्रजाकी उन्नतिमें योग देते हैं, वे तुम्हारे राष्ट्रमें निवास करें। जो लोग प्राणियोंका विनाश करनेवाले हैं, वे न रहें ॥ दण्ड्यास्ते च महाराज धनादानप्रयोजकाः । प्रयोगं कारयेयुस्तान् यथाबलिकरांस्तथा ॥ २६ ॥ महाराज! जो राजकर्मचारी उचितसे अधिक कर वसूल करते या कराते हों, वे तुम्हारे हाथसे दण्ड पानेके योग्य हैं। दूसरे अधिकारी आकर उन्हें ठीक-ठीक भेंट या कर लेनेका अभ्यास करावें ॥ २६ ॥ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यच्चान्यत् किंचिदीदृशम् । पुरुषैः कारयेत् कर्म बहुभिः कर्मभेदतः ॥ २७ ॥
खेती, गोरक्षा, वाणिज्य तथा इस तरहके अन्य व्यवसायोंको जो जिस कर्मको करनेमें कुशल हो, तदनुसार अधिक आदमियोंके द्वारा सम्पन्न कराना चाहिये ॥ २७ ॥ नरश्चेत्कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं चाप्यनुष्ठितः । संशयं लभते किंचित् तेन राजा विगर्ह्यते ॥ २८ ॥ मनुष्य यदि कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आरम्भ कर दे तथा चारों ओर लुटेरोंके आक्रमणसे कुछ-कुछ प्राण-संशयकी-सी स्थितिमें पहुँच जाय तो इससे राजाकी बड़ी निन्दा होती है ॥ २८ ॥ धनिनः पूजयेन्नित्यं पानाच्छादनभोजनैः । वक्तव्याश्चानुगृह्णीध्वं प्रजाः सह मयेति वै ॥ २९ ॥ राजाको चाहिये कि वह देशके धनी व्यक्तियोंका सदा भोजन-वस्त्र और अन्नपान आदिके द्वारा आदर-सत्कार करे और उनसे विनयपूर्वक कहे, ‘आपलोग मेरे सहित मेरी इन प्रजाओंपर कृपादृष्टि रखें’ ॥ २९ ॥ अङ्गमेतन्महद् राज्ये धनिनो नाम भारत । ककुदं सर्वभूतानां धनस्थो नात्र संशयः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! धनीलोग राष्ट्रके मुख्य अंग हैं। धनवान् पुरुष समस्त प्राणियोंमें प्रधान होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥ प्राज्ञः शूरो धनस्थश्च स्वामी धार्मिक एव च । तपस्वी सत्यवादी च बुद्धिमांश्चापि रक्षति ॥ ३१ ॥ विद्वान्, शूरवीर, धनी, धर्मनिष्ठ, स्वामी, तपस्वी, सत्यवादी तथा बुद्धिमान् मनुष्य ही प्रजाकी रक्षा करते हैं ॥ तस्मात् सर्वेषु भूतेषु प्रीतिमान् भव पार्थिव । सत्यमार्जवमक्रोधमानृशंस्यं च पालय ॥ ३२ ॥ अतः भूपाल! तुम समस्त प्राणियोंसे प्रेम रखो तथा सत्य, सरलता, क्रोधहीनता और दयालुता आदि सद्धर्मोंका पालन करो ॥ ३२ ॥ एवं दण्डं च कोशं च मित्रं भूमिं च लप्स्यसि । सत्यार्जवपरो राजन् मित्रकोशबलान्वितः ॥ ३३ ॥ नरेश्वर! ऐसा करनेसे तुम्हें दण्डधारणकी शक्ति, खजाना, मित्र तथा राज्यकी भी प्राप्ति होगी। तुम सत्य और सरलतामें तत्पर रहकर मित्र, कोश और बलसे सम्पन्न हो जाओगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कोशसंचयप्रकारकथने अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कोशसंग्रहके प्रकारका वर्णनविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
राजाके कर्तव्यका वर्णन
एकोननवतितमोऽध्यायः
राजाके कर्तव्यका वर्णन
भीष्म उवाच
वनस्पतीन् भक्ष्यफलान् न च्छिन्द्युर्विषये तव ।
ब्राह्मणानां मूलफलं धर्म्यमाहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जिन वृक्षोंके फल खानेके काम आते हैं, उनको तुम्हारे राज्यमें कोई काटने न पावे, इसका ध्यान रखना चाहिये। मनीषी पुरुष मूल और फलको धर्मतः ब्राह्मणोंका धन बताते हैं। इसलिये भी उनको काटना ठीक नहीं है ॥ १ ॥
ब्राह्मणेभ्योऽतिरिक्तं च भुञ्जीरन्नितरे जनाः ।
न ब्राह्मणापराधेन हरेदन्यः कथंचन ॥ २ ॥
ब्राह्मणोंसे जो बच जाये, उसीको दूसरे लोग अपने उपभोगमें लावें। ब्राह्मणका अपराध करके अर्थात् उसे भोग वस्तु न देकर दूसरा कोई किसी प्रकार भी उसका अपहरण न करे ॥ २ ॥
विप्रश्चेत् त्यागमातिष्ठेदात्मार्थे वृत्तिकर्शितः ।
परिकल्प्यास्य वृत्तिः स्यात् सदारस्य नराधिप ॥ ३ ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण अपने लिये जीविकाका प्रबन्ध न होनेसे दुर्बल हो जाय और उस राज्यको छोड़कर अन्यत्र जाने लगे तो राजाका कर्तव्य है कि परिवारसहित उस ब्राह्मणके लिये जीविकाकी व्यवस्था करे ॥ ३ ॥
स चेन्नोपनिवर्तेत वाच्यो ब्राह्मणसंसदि ।
कस्मिन्निदानीं मर्यादामयं लोकः करिष्यति ॥ ४ ॥
इतनेपर भी यदि वह ब्राह्मण न लौटे तो ब्राह्मणोंके समाजमें जाकर राजा उससे यों कहे—‘ब्रह्मन्! यदि आप यहाँसे चले जायँगे तो ये प्रजावर्गके लोग किसके आश्रयमें रहकर धर्ममर्यादाका पालन करेंगे?’ ॥ ४ ॥
असंशयं निवर्तेत न चेद् वक्ष्यत्यतः परम् ।
पूर्वं परोक्षं कर्तव्यमेतत् कौन्तेय शाश्वतम् ॥ ५ ॥
इतना सुनकर वह निश्चय ही लौट आयेगा। यदि इतनेपर भी वह कुछ न बोले तो राजाको इस प्रकार कहना चाहिये—‘भगवन्! मेरे द्वारा जो पहले अपराध बन गये हों, उन्हें आप भूल जायँ, कुन्तीनन्दन! इस प्रकार विनयपूर्वक ब्राह्मणको प्रसन्न करना राजाका सनातन कर्तव्य है ॥ ५ ॥
आहरेतज्जना नित्यं न चैतच्छ्रद्दधाम्यहम् ।
निमन्त्र्यश्च भवेद् भोगैर्वृत्त्या च तदाचरेत् ॥ ६ ॥
लोग कहते हैं कि ब्राह्मणको भोग-सामग्रीका अभाव हो तो उसे भोग अर्पित करनेके लिये निमन्त्रित करे और यदि उसके पास जीविकाका अभाव हो तो उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करे, परंतु मैं इस बातपर विश्वास नहीं करता; (क्योंकि ब्राह्मणमें भोगेच्छाका होना सम्भव नहीं है) ।। ६ ।।
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं लोकानामिह जीवनम् ।
ऊर्ध्वं चैव त्रयी विद्या सा भूतान् भावयत्युत ।। ७ ।।
खेती, पशुपालन और वाणिज्य—ये तो इसी लोकमें लोगोंकी जीविकाके साधन हैं; परंतु तीनों वेद ऊपरके लोकोंमें भी रक्षा करते हैं। वे ही यज्ञोंद्वारा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धिमें हेतु हैं ।। ७ ।।
तस्यां प्रवर्त्तमानायां ये स्युस्तत्परिपन्थिनः ।
दस्यवस्तद्वधायेह ब्रह्मा क्षत्रमथासृजत् ।। ८ ।।
जो लोग उस वेदविद्याके अध्ययनाध्यापनमें अथवा वेदोक्त यज्ञ-यागादि कर्मोंमें बाधा पहुँचाते हैं, वे डकैत हैं। उन डाकुओंका वध करनेके लिये ही ब्रह्माजीने क्षत्रिय जातिकी सृष्टि की है ।। ८ ।।
शत्रून् जय प्रजा रक्ष यजस्व क्रतुभिर्नृप ।
युध्यस्व समरे वीरो भूत्वा कौरवनन्दन ।। ९ ।।
नरेश्वर! कौरवनन्दन! तुम शत्रुओंको जीतो, प्रजाकी रक्षा करो, नाना प्रकारके यज्ञ करते रहो और समरभूमिमें वीरतापूर्वक लड़ो ।। ९ ।।
संरक्ष्यान् पालयेद् राजा स राजा राजसत्तमः ।
ये केचित् तान् न रक्षन्ति तैरर्थो नास्ति कश्चन ।। १० ।।
जो रक्षा करनेके योग्य पुरुषोंकी रक्षा करता है, वही राजा समस्त राजाओंमें शिरोमणि है। जो रक्षाके पात्र मनुष्योंकी रक्षा नहीं करते, उन राजाओंकी जगत्को कोई आवश्यकता नहीं है ।। १० ।।
सदैव राज्ञा योद्धव्यं सर्वलोकाद् युधिष्ठिर ।
तस्माद्धेतोर्हि युञ्जीत मनुष्यानेव मानवः ।। ११ ।।
युधिष्ठिर! राजाको सब लोगोंकी भलाईके लिये सदा ही युद्ध करना अथवा उसके लिये उद्यत रहना चाहिये। अतः वह मानवशिरोमणि नरेश शत्रुओंकी गतिविधिका जाननेके लिये मनुष्योंको ही गुप्तचर नियत कर दे ।। ११ ।।
आन्तरेभ्यः परान् रक्षन् परेभ्यः पुनरान्तरान् ।
परान् परेभ्यः स्वान् स्वेभ्यः सर्वान् पालय नित्यदा ।। १२ ।।
युधिष्ठिर! जो लोग अपने अन्तरंग हों, उनसे बाहरी लोगोंकी रक्षा करो और बाहरी लोगोंसे सदा अन्तरंग व्यक्तियोंको बचाओ। इसी प्रकार बाहरी व्यक्तियोंकी बाहरके लोगोंसे और समस्त आत्मीयजनोंकी आत्मीयोंसे सदा रक्षा करते रहो ।। १२ ।।
आत्मानं सर्वतो रक्षन् राजन् रक्षस्व मेदिनीम् । आत्ममूलमिदं सर्वमाहुर्वै विदुषो जनाः ॥ १३ ॥ राजन्! तुम सब ओरसे अपनी रक्षा करते हुए ही इस सारी पृथिवीकी रक्षा करो; क्योंकि विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि इन सबका मूल अपना सुरक्षित शरीर ही है ॥ १३ ॥ किं छिद्रं को नु सङ्गो मे किं वास्त्यविनिपातितम् । कुतो मामाश्रयेद् दोष इति नित्यं विचिन्तयेत् ॥ १४ ॥ मुझमें कौन-सी दुर्बलता है, किस तरहकी आसक्ति है और कौन-सी ऐसी बुराई है, जो अबतक दूर नहीं हुई है और किस कारणसे मुझपर दोष आता है? इन सब बातोंका राजाको सदा विचार करते रहना चाहिये ॥ १४ ॥ अतीतदिवसे वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । गुप्तैश्चारैरनुमतैः पृथिवीमनुसारयेत् ॥ १५ ॥ कलतक मेरा जैसा बर्ताव रहा है, उसकी लोग प्रशंसा करते हैं या नहीं? इस बातका पता लगानेके लिये अपने विश्वासपात्र गुप्तचरोंको पृथिवीपर सब ओर घुमाते रहना चाहिये ॥ १५ ॥ जानीयुर्यदि ते वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । कच्चिद् रोचेज्जनपदे कच्चिद् राष्ट्रे च मे यशः ॥ १६ ॥ उनके द्वारा यह भी पता लगाना चाहिये कि यदि अबसे लोग मेरे बर्तावको जान लें तो उसकी प्रशंसा करेंगे या नहीं। क्या बाहरके गाँवोंमें और समूचे राष्ट्रमें मेरा यश लोगोंको अच्छा लगता है? ॥ १६ ॥ धर्मज्ञानां धृतिम तां संग्रामेष्वपलायिनाम् । राष्ट्रे तु येऽनुजीवन्ति ये तु राज्ञोऽनुजीविनः ॥ १७ ॥ अमात्यानां च सर्वेषां मध्यस्थानां च सर्वशः । ये च त्वाभिप्रशंसेयुर्निन्देयुरथवा पुनः ॥ १८ ॥ सर्वान् सुपरिणीतांस्तान् कारयेथा युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! जो धर्मज्ञ, धैर्यवान् और संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीर हैं, जो राज्यमें रहकर जीविका चलाते हैं अथवा राजाके आश्रित रहकर जीते हैं तथा जो मन्त्रिगण और तटस्थवर्गके लोग हैं, वे सब तुम्हारी प्रशंसा करें या निन्दा, तुम्हें सबका सत्कार ही करना चाहिये ॥ १७-१८ १/२ ॥ एकान्तेन हि सर्वेषां न शक्यं तात रोचितुम् । मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ॥ १९ ॥ तात! किसीका कोई भी काम सबको सर्वथा अच्छा ही लगे, ऐसा सम्भव नहीं है, भरतनन्दन! सभी प्राणियोंके शत्रु, मित्र और मध्यस्थ होते हैं ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
तुल्यबाहुबलानां च तुल्यानां च गुणैरपि। कथं स्यादधिकः कश्चित् स च भुञ्जीत मानवान्॥ २०॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो बाहुबलमें एक समान हैं और गुणोंमें भी एक समान हैं, उनमेंसे कोई एक मनुष्य सबसे अधिक कैसे हो जाता है, जो अन्य सब मनुष्योंपर शासन करने लगता है?॥ २०॥
भीष्म उवाच
यच्चरा ह्यचरानद्युर्दंष्ट्रान् दंष्ट्रिणस्तथा। आशीविषा इव क्रुद्धा भुजङ्गान् भुजगा इव॥ २१॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! जैसे क्रोधमें भरे हुए बड़े-बड़े विषधर सर्प दूसरे छोटे सर्पोंको खा जाते हैं, जिस प्रकार पैरोंसे चलनेवाले प्राणी न चलनेवाले प्राणियोंको अपने उपभोगमें लाते हैं और दाढ़वाले जन्तु बिना दाढ़वाले जीवोंको अपना आहार बना लेते हैं (उसी प्राकृतिक नियमके अनुसार बहुसंख्यक दुर्बल मनुष्योंपर एक सबल मनुष्य शासन करने लगता है)॥ २१॥
एतेभ्यश्चाप्रमत्तः स्यात् सदा शत्रोर्युधिष्ठिर। भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमादतः॥ २२॥ युधिष्ठिर! इन सभी हिंसक जन्तुओं तथा शत्रु की ओरसे राजाको सदा सावधान रहना चाहिये; क्योंकि असावधान होनेपर ये गिद्ध पक्षियोंके समान सहसा टूट पड़ते हैं॥ २२॥
कच्चित् ते वणिजो राष्ट्रे नोद्विजन्ति करार्दिताः। क्रीणन्तो बहुनाल्पेन कान्तारकृतविश्रमाः॥ २३॥ ऊँचे या नीचे भावसे माल खरीदनेवाले और व्यापारके लिये दुर्गम प्रदेशोंमें विचरनेवाले वैश्य तुम्हारे राज्यमें करके भारी भारसे पीड़ित हो उद्विग्न तो नहीं होते हैं?॥ २३॥
कच्चित् कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यतिपीडिताः। ये वहन्ति धुरं राज्ञां ते भरन्तीतरानपि॥ २४॥ किसानलोग अधिक लगान लिये जानेके कारण अत्यन्त कष्ट पाकर तुम्हारा राज्य छोड़कर तो नहीं जा रहे हैं। क्योंकि किसान ही राजाओंका भार ढोते हैं और वे ही दूसरे लोगोंका भी भरण-पोषण करते हैं॥ २४॥
इतो दत्तेन जीवन्ति देवाः पितृगणास्तथा। मानुषोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा॥ २५॥ इन्हींके दिये हुए अन्नसे देवता, पितर, मनुष्य, सर्प, राक्षस और पशु-पक्षी—सबकी जीविका चलती है॥ २५॥
एषा ते राष्ट्रवृत्तिश्च राज्ञां गुप्तिश्च भारत।
एतमेवार्थमाश्रित्य भूयो वक्ष्यामि पाण्डव ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! यह मैंने राजाके राष्ट्रके साथ किये जानेवाले बर्तावका वर्णन किया। इसीसे राजाओंकी रक्षा होती है। पाण्डुकुमार! इसी विषयको लेकर मैं आगेकी भी बात कहूँगा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रकी रक्षाविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता
नवतितमोऽध्यायः
उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता
भीष्म उवाच
यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
मान्धात्रे यौवनाश्वाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अंगिरापुत्र उतथ्यने युवनाश्वके पुत्र मान्धातासे प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय-धर्मोंका वर्णन किया था, उन्हें सुनो ॥ १ ॥
स यथानुशशासैनमुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्मज्ञानियोंमें शिरोमणि उतथ्यने जिस प्रकार उन्हें उपदेश दिया था, वह सब प्रसंग पूरा-पूरा तुम्हें बता रहा हूँ, श्रवण करो ॥ २ ॥
उतथ्य उवाच
धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु ।
मान्धातरिति जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥ ३ ॥
**उतथ्य बोले—**मान्धाता! राजा धर्मका पालन और प्रचार करनेके लिये ही होता है, विषय-सुखोंका उपभोग करनेके लिये नहीं। तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत्का रक्षक है ॥ ३ ॥
राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वायैव कल्पते ।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥ ४ ॥
यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरकमें ही गिरता है ॥ ४ ॥
धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति ।
तं राजा साधु यः शास्ति स राजा पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण प्राणी धर्मके ही आधारपर स्थित हैं और धर्म राजाके ऊपर प्रतिष्ठित है। जो राजा अच्छी तरह धर्मका पालन और उसके अनुकूल शासन करता है वही दीर्घकालतक इस पृथ्वीका स्वामी बना रहता है ॥
राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान् धर्म उच्यते ।
देवाश्च गर्हा गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते ॥ ६ ॥