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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

ये माता-पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नयाँ हैं ॥ ६ ॥

पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्निस्त्रेता गरीयसी ॥ ७ ॥
पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी है और गुरु आहवनीय अग्निका स्वरूप है। लौकिक अग्नियोंसे माता-पिता आदि त्रिविध अग्नियोंका गौरव अधिक है ॥ ७ ॥

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकांश्च विजेष्यसि ।
पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथा परम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मलोकं गुरोर्वृत्त्या नियमेन तरिष्यसि ।
यदि तुम इन तीनोंकी सेवामें कोई भूल नहीं करोगे तो तीनों लोकोंको जीत लोगे। पिताकी सेवासे इस लोकको, माताकी सेवासे परलोकको तथा नियमपूर्वक गुरुकी सेवासे ब्रह्मलोकको भी लाँघ जाओगे ॥ ८ १/२ ॥

सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत ॥ ९ ॥
यशः प्राप्स्यसि भद्रं ते धर्मं च सुमहत्फलम् ।
भरतनन्दन! इसलिये तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनोंके प्रति उत्तम बर्ताव करो। तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा करनेसे तुम्हें यश और महान् फल देनेवाले धर्म की प्राप्ति होगी ॥ ९ १/२ ॥

नैतानतिशयेज्जातु नात्यश्रीयान्न दूषयेत् ॥ १० ॥
नित्यं परिचरेच्चैव तद् वै सुकृतमुत्तमम् ।
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम ॥ ११ ॥
इन तीनोंकी आज्ञाका कभी उल्लङ्घन न करे, इनको भोजन करानेके पहले स्वयं भोजन न करे, इनपर कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवामें संलग्न रहे। यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है। नृपश्रेष्ठ! इनकी सेवासे तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तमलोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे ॥ १०-११ ॥

सर्वे तस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥ १२ ॥
जिसने इन तीनोंका आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥ १२ ॥

न चायं न परो लोकस्तस्य चैव परंतप ।
अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरुवस्त्रयः ॥ १३ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जिसने इन तीनों गुरुजनोंका सदा अपमान ही किया है, उसके लिये न तो यह लोक सुखद है और न परलोक ॥ १३ ॥

न चास्मिन्नपरे लोके यशस्तस्य प्रकाशते ।
न चान्यदपि कल्याणं परत्र समुदाहृतम् ॥ १४ ॥
न इस लोकमें और न परलोकमें ही उसका यश प्रकाशित होता है। परलोकमें जो अन्य कल्याणमय सुखकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है ॥ १४ ॥
तेभ्य एव हि यत् सर्वं कृत्वा च विसृजाम्यहम् ।
तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च ॥ १५ ॥
तस्मान्मे सम्प्रकाशन्ते त्रयो लोका युधिष्ठिर ।
मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरुजनोंको ही समर्पित कर देता था। इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मोंका पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया है। युधिष्ठिर! इसीसे तीनों लोक मेरी दृष्टिके सामने प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १५ १/२ ॥
दशैव तु सदाऽऽचार्यः श्रोत्रियानतिरिच्यते ॥ १६ ॥
दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ।
पितॄन् दश तु मातैका सर्वां वा पृथिवीमपि ॥ १७ ॥
गुरुत्वेनाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ।
आचार्य सदा दस श्रोत्रियोंसे बढ़कर है। उपाध्याय (विद्यागुरु) दस आचार्योंसे अधिक महत्त्व रखता है, पिता दस उपाध्यायोंसे बढ़कर है और माताका महत्त्व दस पिताओंसे भी अधिक है। वह अकेली ही अपने गौरवके द्वारा सारी पृथ्‍वीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥
गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ॥ १८ ॥
उभौ हि मातापितरौ जन्मन्येवोपयुज्यतः ।
परंतु मेरा विश्वास यह है कि गुरुका पद पिता और मातासे भी बढ़कर है; क्योंकि माता-पिता तो केवल इस शरीरको जन्म देनेके ही उपयोगमें आते हैं ॥
शरीरमेव सृजतः पिता माता च भारत ॥ १९ ॥
आचार्यशिष्टा या जातिः सा दिव्या साजरामरा ।
भारत! पिता और माता केवल शरीरको ही जन्म देते हैं; परंतु आचार्यका उपदेश प्राप्त करके जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर-अमर है ॥ १९ १/२ ॥
अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ॥ २० ॥
न संदुष्यति तत् कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् ।
धर्माय यतमानानां विदुर्देवा महर्षिभिः ॥ २१ ॥
पिता-माता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं; क्योंकि पुत्र या शिष्य पिता-माता और गुरुका अपराध करके भी उनकी दृष्टिमें दूषित नहीं होते हैं। वे गुरुजन पुत्र या शिष्यपर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते; बल्कि सदा उसे धर्मके मार्गपर ही ले जानेका

प्रयत्न करते हैं। ऐसे पिता-माता आदि गुरुजनोंका महत्त्व महर्षियोंसहित देवता ही जानते हैं॥ २०-२१॥

यश्चावृणोत्यवितथेन कर्मणा ऋतं ब्रुवन्ननृतं सम्प्रयच्छन्। तं वै मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन्॥ २२॥ जो सत्य कर्म (के द्वारा यथार्थ उपदेश) के द्वारा पुत्र या शिष्यको कवचकी भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेदका उपदेश देता और असत्यकी रोक-थाम करता है, उस गुरुको ही पिता और माता समझे और उसके उपकारको जानकर कभी उससे द्रोह न करे॥ २२॥

विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते प्रत्यासन्ना मनसा कर्मणा वा। तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं नान्यस्तेभ्यः पापकृदस्ति लोके। यथैव ते गुरुभिर्भावनीया- स्तथा तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः॥ २३॥ जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है। संसारमें उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है। जैसे गुरुओंका कर्तव्य है, शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना, उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना॥ २३॥

तस्मात् पूजयितव्याश्च संविभज्याश्च यत्नतः। गुरवोऽर्चयितव्याश्च पुराणं धर्ममिच्छता॥ २४॥ अतः जो पुरातन धर्मका फल पाना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि वे गुरुओंकी पूजा-अर्चा करें और प्रयत्नपूर्वक उन्हें आवश्यक वस्तुएँ लाकर दें॥ २४॥

येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीतः प्रजापतिः। प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता॥ २५॥ मनुष्य जिस कर्मसे पिताको प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा प्रजापति ब्रह्माजीभी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्तावसे वह माताको प्रसन्न कर लेता है, उसीके द्वारा समूची पृथिवीकी भी पूजा हो जाती है॥ २५॥

येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम्। मातुतः पितृतश्चैव तस्मात् पूज्यतमो गुरुः॥ २६॥ जिस कर्मसे शिष्य उपाध्याय (विद्यागुरु) को प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है; अतः गुरु माता-पितासे भी अधिक पूजनीय

है ।। २६ ।।
ऋषयश्च हि देवाश्च प्रीयन्ते पितृभिः सह ।
पूज्यमानेषु गुरुषु तस्मात् पूज्यतमो गुरुः ।। २७ ।।
गुरुओंके पूजित होनेपर पितरोंसहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं; इसलिये गुरु परम पूजनीय है ।।
केनचिन्न च वृत्तेन ह्यवज्ञेयो गुरुर्भवेत् ।
न च माता न च पिता मन्यते यादृशो गुरुः ।। २८ ।।
किसी भी बर्तावके कारण गुरु अपमानके योग्य नहीं होता। इसी तरह माता और पिता भी अनादरके योग्य नहीं हैं। जैसे गुरु माननीय हैं, वैसे ही माता-पिता भी हैं ।।
न तेऽवमानमर्हन्ति न तेषां दूषयेत् कृतम् ।
गुरूणामेव सत्कारं विदुर्देवा महर्षिभिः ।। २९ ।।
वे तीनों कदापि अपमानके योग्य नहीं हैं। उनके किये हुए किसी भी कार्यकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। गुरुजनोंके इस सत्कारको देवता और महर्षि भी अपना सत्कार मानते हैं ।। २९ ।।
उपाध्यायं पितरं मातरं च
येऽभिद्रुह्यन्ते मनसा कर्मणा वा ।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ।। ३० ।।
अध्यापक, पिता और माताके प्रति जो मन-वाणी और क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी महान् पाप लगता है। संसारमें उससे बढ़कर दूसरा कोई पापाचारी नहीं है ।। ३० ।।
भृतो वृद्धो यो न बिभर्ति पुत्रः
स्वयोनिजः पितरं मातरं च ।
तद् वै पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ।। ३१ ।।
जो पिता-माताका औरस पुत्र है और पाल-पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता-पिताका भरण-पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है और जगत्में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है ।। ३१ ।।
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य स्त्रीघ्नस्य गुरुघातिनः ।
चतुर्णां वयमेतेषां निष्कृतिं नानुशुश्रुम ।। ३२ ।।
मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरुघाती—इन चारोंके पापका प्रायश्चित्त हमारे सुननेमें नहीं आया है ।।
एतत्सर्वमनिर्देशनैवमुक्तं

यत् कर्तव्यं पुरुषेणेह लोके । एतच्छ्रेयो नान्यदस्माद् विशिष्टं सर्वान् धर्माननुसृत्यैतदुक्तम् ॥ ३३ ॥

ये सारी बातें जो इस जगत्‌में पुरुषके द्वारा पालनीय हैं, यहाँ विस्तारके साथ बतायी गयी हैं। यही कल्याणकारी मार्ग है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। सम्पूर्ण धर्मोंका अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि मातृपितृगुरुमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें माता-पिता और गुरुका माहात्म्यविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् नरो वर्तेत भारत ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन! धर्ममें स्थित रहनेकी इच्छावाला मनुष्य कैसा बर्ताव करे? विद्वन्! मैं इस बातको जानना चाहता हूँ। भरतश्रेष्ठ! आप मुझसे इसका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

सत्यं चैवानृतं चोभे लोकानावृत्य तिष्ठतः ।
तयोः किमाचरेद् राजन् पुरुषो धर्मनिश्चितः ॥ २ ॥
राजन्! सत्य और असत्य—ये दोनों सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं; किंतु धर्मपर विश्वास करनेवाला मनुष्य इन दोनोंमेंसे किसका आचरण करे? ॥ २ ॥

किंस्वित् सत्यं किमनृतं किंस्विद् धर्म्यं सनातनम् ।
कस्मिन् काले वदेत् सत्यं कस्मिन् कालेऽनृतं वदेत् ॥ ३ ॥
क्या सत्य है और क्या झूठ? तथा कौन-सा कार्य सनातन धर्मके अनुकूल है? किस समय सत्य बोलना चाहिये और किस समय झूठ? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
यत्तू लोकेषु दुर्ज्ञानं तत् प्रवक्ष्यामि भारत ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! सत्य बोलना अच्छा है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है; परंतु लोकमें जिसे जानना अत्यन्त कठिन है, उसीको मैं बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ ५ ॥
जहाँ झूठ ही सत्यका काम करे (किसी प्राणीको संकटसे बचाये) अथवा सत्य ही झूठ बन जाय (किसीके जीवनको संकटमें डाल दे); ऐसे अवसरोंपर सत्य नहीं बोलना चाहिये। वहाँ झूठ बोलना ही उचित है ॥ ५ ॥

तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिष्ठितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥ ६ ॥

जिसमें सत्य स्थिर न हो, ऐसा मूर्ख मनुष्य ही मारा जाता है। सत्य और असत्यका निर्णय करके सत्यका पालन करनेवाला पुरुष ही धर्मज्ञ माना जाता है ॥ ६ ॥

अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः ।
सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥ ७ ॥
जो नीच है, जिसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है तथा जो अत्यन्त कठोर स्वभावका है, वह मनुष्य भी कभी अंधे पशुको मारनेवाले बलाक नामक व्याधकी भाँति महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है* ॥ ७ ॥

किमाश्चर्यं च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् ।
सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ॥ ८ ॥
कैसा आश्चर्य है कि धर्मकी इच्छा रखनेवाला मूर्ख (तपस्वी) (सत्य बोलकर भी) अधर्मके फलको प्राप्त हो जाता है। (कर्णपर्व अध्याय ६९) और गंगाके तटपर रहनेवाले एक उल्लूकी भाँति कोई (हिंसा करके भी) महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है³. ॥ ८ ॥

तादृशोऽयमनुप्रश्नो यत्र धर्मः सुदुर्लभः ।
दुष्करः प्रतिसंख्यातुं तत् केनात्र व्यवस्यति ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारा यह पिछला प्रश्न भी ऐसा ही है। इसके अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन करना या समझना बहुत कठिन है; इसीलिये उसका प्रतिपादन करना भी दुष्कर ही है; अतः धर्मके विषयमें कोई किस प्रकार निश्चय करे? ॥ ९ ॥

प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यात् प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १० ॥
प्राणियोंके अभ्युदय और कल्याणके लिये ही धर्मका प्रवचन किया गया है; अतः जो इस उद्देश्यसे युक्त हो अर्थात् जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस सिद्ध होते हों, वही धर्म है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओंका निश्चय है ॥ १० ॥

धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ ११ ॥
धर्मका नाम ‘धर्म’ इसलिये पड़ा है कि वह सबको धारण करता है—अधोगतिमें जानेसे बचाता है और जीवनकी रक्षा करता है। धर्मने ही सारी प्रजाको धारण कर रखा है; अतः जिससे धारण और पोषण सिद्ध होता हो, वही धर्म है; ऐसा धर्मवेत्ताओंका निश्चय है ॥ ११ ॥

अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यादहिंसासम्पृक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १२ ॥
प्राणियोंकी हिंसा न हो, इसके लिये धर्मका उपदेश किया गया है; अतः जो अहिंसासे युक्त हो, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ १२ ॥

(अहिंसा सत्यमक्रोधस्तपो दानं दमो मतिः । अनसूयाप्यमात्सर्यमनीर्ष्या शीलमेव च ।। एष धर्मः कुरुश्रेष्ठ कथितः परमेष्ठिना । ब्रह्मणा देवदेवेन अयं चैव सनातनः ।। अस्मिन् धर्मे स्थितो राजन् नरो भद्राणि पश्यति ।)

राजन्! कुरुश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, तपस्या दान, मन, और इन्द्रियोंका संयम, विशुद्ध बुद्धि, किसीके दोष न देखना, किसीसे डाह और जलन न रखना तथा उत्तम शीलस्वभावका परिचय देना—ये धर्म हैं, देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने इन्हींको सनातन धर्म बताया है। जो मनुष्य इस सनातन धर्ममें स्थित है, उसे ही कल्याणका दर्शन होता है ।।

श्रुतिधर्म इति ह्येके नेत्याहुरपरे जनाः । न च तत्प्रत्यसूयामो न हि सर्वं विधीयते ।। १३ ।।

वेदमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वही धर्म है, यह एक श्रेणीके विद्वानोंका मत है; किंतु दूसरे लोग धर्मका यह लक्षण नहीं स्वीकार करते हैं। हम किसी भी मतपर दोषारोपण नहीं करते। इतना अवश्य है कि वेदमें सभी बातोंका विधान नहीं है ।। १३ ।।

येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ।। १४ ।।

जो अन्यायसे अपहरण करनेकी इच्छा रखकर किसी धनीके धनका पता लगाना चाहते हों, उन लुटेरोंसे उसका पता न बतावे और यही धर्म है, ऐसा निश्चय रखे ।। १४ ।।

अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरेन् वाप्यकूजनात् ।। १५ ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।

यदि न बतानेसे उस धनीका बचाव हो जाता हो तो किसी तरह वहाँ कुछ बोले ही नहीं; परंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय और न बोलनेसे लुटेरोंके मनमें संदेह पैदा होने लगे तो वहाँ सत्य बोलनेकी अपेक्षा झूठ बोलनेमें ही कल्याण है; यही इस विषयमें विचारपूर्वक निर्णय किया गया है ।। १५ १/२ ।।

यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथदपि ।। १६ ।। न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथंचन । पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।। १७ ।।

यदि शपथ खा लेनेसे भी पापियोंके हाथसे छुटकारा मिल जाय तो वैसा ही करे। जहाँतक वश चले, किसी तरह भी पापियोंके हाथमें धन न जाने दे; क्योंकि पापाचारियोंको दिया हुआ धन दाताको भी पीड़ित कर देता है ।। १६-१७ ।।

स्वशरीरोपरोधेन धनमादातुमिच्छतः । सत्यसम्प्रतिपत्त्यर्थं यद् ब्रूयुः साक्षिणः क्वचित् ।। १८ ।।

अनुक्त्वा तत्र तद्वाच्यं सर्वे तेऽनृतवादिनः ।
जो कर्जदारको अपने अधीन करके उससे शारीरिक सेवा कराकर धन वसूल करना चाहता है, उसके दावेको सही साबित करनेके लिये यदि कुछ लोगोंको गवाही देनी पड़े और वे गवाह अपनी गवाहीमें कहने योग्य सत्य बातको न कहें तो वे सब-के-सब मिथ्यावादी होते हैं ।। १८ १/२ ।।

प्राणात्यये विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् ।। १९ ।।
अर्थस्य रक्षणार्थाय परेषां धर्मकारणात् ।
परंतु प्राण-संकटके समय, विवाहके अवसरपर, दूसरेके धनकी रक्षाके लिये तथा धर्मकी रक्षाके लिये असत्य बोला जा सकता है ।। १९ १/२ ।।

परेषां सिद्धिमाकांक्षन् नीचः स्याद् धर्मभिक्षुकः ।। २० ।।
प्रतिश्रुत्य प्रदातव्यः स्वकार्यस्तु बलात्कृतः ।
कोई नीच मनुष्य भी यदि दूसरोंकी कार्यसिद्धिकी इच्छासे धर्मके लिये भीख माँगने आवे तो उसे देनेकी प्रतिज्ञा कर लेनेपर अवश्य ही धनका दान देना चाहिये। इस प्रकार धनोपार्जन करनेवाला यदि कपटपूर्ण व्यवहार करता है तो वह दण्डका पात्र होता है ।। २० १/२ ।।

यः कश्चिद् धर्मसमयात् प्रच्युतो धर्मसाधनः ।। २१ ।।
दण्डेनैव स हन्तव्यस्तं पन्थानं समाश्रितः ।
जो कोई धर्मसाधक मनुष्य धार्मिक आचारसे भ्रष्ट हो पापमार्गका आश्रय ले, उसे अवश्य दण्डके द्वारा मारना चाहिये ।। २१ १/२ ।।

च्युतः सदैव धर्मेभ्योऽमानवं धर्ममास्थितः ।। २२ ।।
शठः स्वधर्ममुत्सृज्य तमिच्छेदुपजीवितुम् ।
सर्वोपायैर्निहन्तव्यः पापो निकृतिजीवनः ।। २३ ।।
धनमित्येव पापानां सर्वेषामिह निश्चयः ।
जो दुष्ट धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर आसुरी प्रवृत्तिमें लगा रहता है और स्वधर्मका परित्याग करके पापसे जीविका चलाना चाहता है, कपटसे जीवन-निर्वाह करनेवाले उस पापात्माको सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये; क्योंकि सभी पापात्माओंका यही विचार रहता है कि जैसे बने, वैसे धनको लूट-खसोट कर रख लिया जाय ।। २२-२३ १/२ ।।

अविषह्या ह्यसम्भोज्या निकृत्या पतनं गताः ।। २४ ।।
च्युता देवमनुष्येभ्यो यथा प्रेतास्तथैव ते ।
निर्याज्ञास्तपसा हीना मा स्म तैः सह सङ्गमः ।। २५ ।।
ऐसे लोग दूसरोंके लिये असह्य हो उठते हैं। इनका अन्न न तो स्वयं भोजन करे और न इन्हें ही अपना अन्न दे; क्योंकि ये छल-कपटके द्वारा पतनके गर्तमें गिर चुके हैं और

देवलोक तथा मनुष्यलोक दोनोंसे वंचित हो प्रेतोंके समान अवस्थाको पहुँच गये हैं। इतना ही नहीं, वे यज्ञ और तपस्यासे भी हीन हैं; अतः तुम कभी उनका संग न करो ।। २४-२५ ।।

धननाशाद् दुःखतरं जीविताद् विप्रयोजनम् । अयं ते रोचतां धर्म इति वाच्यः प्रयत्नतः ।। २६ ।। 'किसीके धनका नाश करनेसे भी अधिक दुःखदायक कर्म है जीवनका नाश; अतः तुम्हें धर्मकी ही रुचि रखनी चाहिये' यह बात तुम्हें दुष्टोंको यत्नपूर्वक बतानी और समझानी चाहिये ।। २६ ।।

न कश्चिदस्ति पापानां धर्म इत्येष निश्चयः । तथागतं च यो हन्यान्नासौ पापेन लिप्यते ।। २७ ।। पापियोंका तो यही निश्चय होता है कि धर्म कोई वस्तु नहीं है; ऐसे लोगोंको जो मार डाले, उसे पाप नहीं लगता ।। २७ ।।

स्वकर्मणा हतं हन्ति हत एव स हन्यते । तेषु यः समयं कश्चिद् कुर्वीत हतबुद्धिषु ।। २८ ।। पापी मनुष्य अपने कर्मसे ही मरा हुआ है; अतः उसको जो मारता है, वह मरे हुएको ही मारता है। उसके मारनेका पाप नहीं लगता; अतः जो कोई भी मनुष्य इन हतबुद्धि पापियोंके वधका नियम ले सकता है ।।

यथा काकाश्च गृध्राश्च तथैवोपधिजीविनः । ऊर्ध्वं देहविमोक्षात् ते भवन्त्येतासु योनिषु ।। २९ ।। जैसे कौए और गीध होते हैं, वैसे ही कपटसे जीविका चलानेवाले लोग भी होते हैं। वे मरनेके बाद इन्हीं योनियोंमें जन्म लेते हैं ।। २९ ।।

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्य- स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ।। ३० ।। जो मनुष्य जिसके साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ भी उसे वैसा ही बर्ताव करना चाहिये; यह धर्म (न्याय) है। कपटपूर्ण आचरण करनेवालेको वैसे ही आचरणके द्वारा दबाना उचित है और सदाचारीको सद्व्यवहारके द्वारा ही अपनाना चाहिये ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सत्यानृतकविभागे नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्यासत्यविभागविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/३ श्लोक हैं)


* देखिये कर्णपर्व अध्याय ६९ श्लोक ३८ से ४५ तक।
१. गंगाके तटपर किसी सर्पिणीने सहस्रों अण्डे देकर रख दिये थे। उन अण्डोंको एक उल्लूने रातमें फोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया। इससे वह महान् पुण्यका भागी हुआ; अन्यथा उन अण्डोंसे हजारों विषैले सर्प पैदा होकर कितने ही लोगोंका विनाश कर डालते।

११०-

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दशाधिकशततमोऽध्यायः

सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दुःखोंसे छूटनेका उपाय बताना

युधिष्ठिर उवाच

क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैर्भावैस्ततस्ततः ।
दुर्गाण्यतितरेद् येन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जगत्‌के जीव भिन्न-भिन्न भावोंके द्वारा जहाँ-तहाँ नाना प्रकारके कष्ट उठा रहे हैं; अतः जिस उपायसे मनुष्य इन दुःखोंसे छुटकारा पा सके, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

आश्रमेषु यथोक्तेषु यथोक्तं ये द्विजातयः ।
वर्तन्ते संयतात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—'राजन्, जो द्विज अपने मनको वशमें करके शास्त्रोक्त चारों आश्रमोंमें रहते हुए उनके अनुसार ठीक-ठीक बर्ताव करते हैं, वे दुःखोंके पार हो जाते हैं ॥ २ ॥

ये दम्भान्नाचरन्ति स्म येषां वृत्तिश्च संयता ।
विषयांश्च निगृह्णन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३ ॥
जो दम्भयुक्त आचरण नहीं करते, जिनकी जीविका नियमानुकूल चलती है और जो विषयोंके लिये बढ़ती हुई इच्छाको रोकते हैं, वे दुःखोंको लाँघ जाते हैं ॥ ३ ॥

प्रत्याहुर्नोच्यमाना ये न हिंसन्ति च हिंसिताः ।
प्रयच्छन्ति न याचन्ते दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ४ ॥
जो दूसरोंके कटु वचन सुनाने या निन्दा करनेपर भी स्वयं उन्हें उत्तर नहीं देते, मार खाकर भी किसीको मारते नहीं तथा स्वयं देते हैं, परंतु दूसरोंसे माँगते नहीं; वे भी दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ॥ ४ ॥

वासयन्त्यतिथीन् नित्यं नित्यं ये चानसूयकाः ।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ५ ॥
जो प्रतिदिन अतिथियोंको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहराते हैं, कभी किसीके दोष नहीं देखते हैं तथा नित्य नियमपूर्वक वेदादि सद्ग्रन्थोंका स्वाध्याय करते रहते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ ५ ॥

मातापित्रोश्च ये वृत्तिं वर्तन्ते धर्मकोविदाः ।

वर्जयन्ति दिवा स्वप्नं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ६ ॥ जो धर्मज्ञ पुरुष सदा माता-पिताकी सेवामें लगे रहते हैं और दिनमें कभी सोते नहीं हैं, वे सभी दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ६ ॥ ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा । निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ७ ॥ जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी पाप नहीं करते हैं और किसी भी प्राणीको कष्ट नहीं पहुँचाते हैं, वे भी संकट से पार हो जाते हैं ॥ ७ ॥ ये न लोभान्नयन्त्यर्थान् राजानो रजसान्विताः । विषयान् परिरक्षन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ८ ॥ जो रजोगुणसम्पन्न राजा लोभवश प्रजाके धनका अपहरण नहीं करते हैं और अपने राज्यकी सब ओरसे रक्षा करते हैं, वे भी दुर्गम दुःखोंको लाँघ जाते हैं ॥ ८ ॥ स्वेषु दारेषु वर्तन्ते न्यायवृत्तिमृतावृतौ । अग्निहोत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ९ ॥ जो गृहस्थ प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीके साथ धर्मानुकूल समागम करते हैं, वे दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ९ ॥ आहवेषु च ये शूरास्त्यक्त्वा मरणजं भयम् । धर्मेण जयमिच्छन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १० ॥ जो शूरवीर युद्धस्थलमें मृत्युका भय छोड़कर धर्मपूर्वक विजय पाना चाहते हैं, वे सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ॥ १० ॥ ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते । प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ११ ॥ जो लोग प्राण जानेका अवसर उपस्थित होनेपर भी सत्य बोलना नहीं छोड़ते, वे सम्पूर्ण प्राणियोंके विश्वासपात्र बने रहकर सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ।। कर्माण्यकुहकार्थानि येषां वाचश्च सूनृताः । येषामर्थाश्च सम्बद्धा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १२ ॥ जिनके शुभ कर्म दिखावेके लिये नहीं होते, जो सदा मीठे वचन बोलते और जिनका धन सत्कर्मोंके लिये बँधा हुआ है, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।। अनध्यायेषु ये विप्राः स्वाध्यायं नेह कुर्वते । तपोनिष्ठाः सुतपसो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १३ ॥ जो अनध्यायके अवसरोंपर वेदोंका स्वाध्याय नहीं करते और तपस्यामें ही लगे रहते हैं, वे उत्तम तपस्वी ब्राह्मण दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं ॥ १३ ॥ ये तपश्च तपस्यन्ति कौमारब्रह्मचारिणः । विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १४ ॥

जो तपस्या करते, कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर रहते और विद्या एवं वेदोंके अध्ययन-सम्बन्धी व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके हैं, वे दुस्तर दुःखोंको तर जाते हैं॥ १४ ॥

ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये । सत्त्वे स्थिता महात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १५ ॥ जिनके रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गये हों तथा जो विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे महात्मा दुर्लंघ्य संकटोंको भी लाँघ जाते हैं॥ १५ ॥

येषां न कश्चित् त्रसति न त्रसन्ति हि कस्यचित् । येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १६ ॥ जिनसे कोई भयभीत नहीं होता, जो स्वयं भी किसीसे भय नहीं मानते तथा जिनकी दृष्टिमें यह सारा जगत् अपने आत्माके ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं॥ १६ ॥

परश्रिया न तप्यन्ति ये सन्तः पुरुषर्षभाः । ग्राम्यादर्थान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १७ ॥ जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे ईर्ष्यावश जलते नहीं हैं और ग्राम्य विषय-भोगसे निवृत्त हो गये हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ साधु पुरुष दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥

सर्वान् देवान् नमस्यन्ति सर्वधर्मांश्च शृण्वते । ये श्रद्दधानाः शान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १८ ॥ जो सब देवताओंको प्रणाम करते और सभी धर्मोंको सुनते हैं, जिनमें श्रद्धा और शान्ति विद्यमान है, वे सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाते हैं॥ १८ ॥

ये न मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति च ये परान् । मान्यमानान् नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १९ ॥ जो दूसरोंसे सम्मान नहीं चाहते, जो स्वयं ही दूसरोंको सम्मान देते हैं और सम्माननीय पुरुषोंको नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥

ये च श्राद्धानि कुर्वन्ति तिथ्यां तिथ्यां प्रजार्थिनः । सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २० ॥ जो संतानकी इच्छा रखकर प्रत्येक तिथिपर विशुद्ध हृदयसे पितरोंका श्राद्ध करते हैं, वे दुर्गम विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥ २० ॥

ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान्संशमयन्ति च । न च कुप्यन्ति भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २१ ॥ जो क्रोधको काबूमें रखते हैं, क्रोधी मनुष्योंको शान्त करते और स्वयं किसी भी प्राणीपर कुपित नहीं होते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥ २१ ॥

मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह मानवाः । जन्मप्रभृति मद्यं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २२ ॥

जो मानव जन्मसे ही सदाके लिये मधु, मांस और मदिराका त्याग कर देते हैं, वे भी दुस्तर दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ २२ ॥ यात्रार्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २३ ॥ जिनका भोजन स्वादके लिये नहीं, जीवनयात्राका निर्वाह करनेके लिये होता है, जो विषयवासनाकी तृप्तिके लिये नहीं, संतानकी इच्छासे मैथुनमें प्रवृत्त होते हैं तथा जिनकी वाणी केवल सत्य बोलनेके लिये है, वे समस्त संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २३ ॥ ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् । भक्ता नारायणं देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २४ ॥ जो समस्त प्राणियोंके स्वामी तथा जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके हेतुभूत भगवान् नारायणमें भक्तिभाव रखते हैं, वे दुस्तर दुःखोंसे तर जाते हैं ॥ २४ ॥ य एष पद्मरक्ताक्षः पीतवासा महाभुजः । सुहृद् भ्राता च मित्रं च सम्बन्धी च तथाच्युतः ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर! ये जो कमल पुष्पके समान कुछ-कुछ लाल रंगके नेत्रोंसे सुशोभित पीताम्बरधारी महाबाहु श्रीकृष्ण हैं, जो तुम्हारे सुहृद् भाई, मित्र और सम्बन्धी भी हैं, यही साक्षात् नारायण हैं ॥ २५ ॥ य इमान् सकलाँल्लोकाँश्चर्मवत् परिवेष्टयेत् । इच्छन् प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥ इनका स्वरूप अचिन्त्य है। ये पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द इन सम्पूर्ण लोकोंको इच्छापूर्वक चमड़ेकी भाँति आच्छादित किये हुए हैं ॥ २६ ॥ स्थितः प्रियहिते जिष्णोः स एष पुरुषोत्तमः । राजंस्तव च दुर्धर्षो वैकुण्ठः पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! वे ही ये दुर्धर्ष वीर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण साक्षात् वैकुण्ठधामके निवासी श्रीविष्णु हैं। राजन्! ये इस समय तुम्हारे और अर्जुनके प्रिय तथा हितसाधनमें संलग्न हैं ॥ २७ ॥ य एनं संश्रयन्तीह भक्ता नारायणं हरिम् । ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥ २८ ॥ जो भक्त पुरुष यहाँ इन भगवान् श्रीहरि—नारायण देवकी शरण लेते हैं, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं। इस विषयमें कोई संशय नहीं है ॥ २८ ॥ (अस्मिन्नर्पितकर्माणः सर्वभावेन भारत । कृष्णे कमलपत्राक्षे दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ भारत! जो इन कमलनयन श्रीकृष्णको सम्पूर्ण भक्तिभावसे अपने सारे कर्म समर्पित कर देते हैं, वे दुर्गम संकटोंको लाँघ जाते हैं ।।

ब्रह्माणं लोककर्तारं ये नमस्यन्ति सत्पतिम् ।
यष्टव्यं क्रतुभिर्देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
जो यज्ञोंद्वारा आराधनाके योग्य हैं, उन साधुप्रतिपालक विश्वविधाता भगवान् ब्रह्माको जो नमस्कार करते हैं, वे समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ।।
यं विष्णुरिन्द्रः शम्भुश्च ब्रह्मा लोकपितामहः ।
स्तुवन्ति विविधैः स्तोत्रैर्देवदेवं महेश्वरम् ।।
तमर्चयन्ति ये शश्वद् दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥)
विष्णु, इन्द्र, शिव तथा लोकपितामह ब्रह्मा नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, उन देवाधिदेव परमेश्वरकी जो सदा आराधना करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।।
दुर्गातितरणं ये च पठन्ति श्रावयन्ति च ।
कथयन्ति च विप्रेभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २९ ॥
जो लोग इस दुर्गातितरण नामक अध्यायको पढ़ते और सुनते हैं तथा ब्राह्मणोंके सामने इसकी चर्चा करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ।। २९ ।।
इति कृत्यसमुद्देशः कीर्तितस्ते मयानघ ।
तरन्ते येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवाः ॥ ३० ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने यहाँ संक्षेपसे उस कर्तव्यका प्रतिपादन किया है, जिसका पालन करनेसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गातितरणं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गातितरण नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं)

मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा

युधिष्ठिर उवाच

असौम्याः सौम्यरूपेण सौम्याश्चासौम्यदर्शनाः ।
ईदृशान् पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वयम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! बहुत-से कठोर स्वभाववाले मनुष्य ऊपरसे कोमल और शान्त बने रहते हैं तथा कोमल स्वभावके लोग कठोर दिखायी देते हैं, ऐसे मनुष्योंकी मुझे ठीक-ठीक पहचान कैसे हो? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
व्याघ्रगोमायुसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक बाघ और सियारके संवादरूप प्राचीन आख्यानका उदाहरण दिया करते हैं, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥

पुरिकायां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः ।
परहिंसारतिः क्रूरो बभूव पुरुषाधमः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न पुरिका नामकी नगरीमें पौरिक नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही क्रूर और नराधम था, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें ही उसका मन लगता था ॥ ३ ॥

स त्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् ।
गोमायुत्वं च सम्प्राप्तो दूषितः पूर्वकर्मणा ॥ ४ ॥
धीरे-धीरे उसकी आयु समाप्त हो गयी और वह ऐसी गतिको प्राप्त हुआ, जो किसी भी प्राणीको अभीष्ट नहीं है। वह अपने पूर्वकर्मसे दूषित होकर दूसरे जन्ममें गीदड़ हो गया ॥ ४ ॥

संस्मृत्य पूर्वभूतिं च निर्वेदं परमं गतः ।
न भक्षयति मांसानि परैरुपहृतान्यपि ॥ ५ ॥
उस समय अपने पूर्व जन्मके वैभवका स्मरण करके उस सियारको बड़ा खेद और वैराग्य हुआ। अतः वह दूसरोंके द्वारा दिये हुए मांसको भी नहीं खाता था ॥ ५ ॥

अहिंस्रः सर्वभूतेषु सत्यवाक् सुदृढव्रतः ।
स चकार यथाकालमाहारं पतितैः फलैः ॥ ६ ॥

अब उसने जीवोंकी हिंसा करनी छोड़ दी, सत्य बोलनेका नियम ले लिया और दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करने लगा। वह नियत समयपर वृक्षोंसे अपने आप गिरे हुए फलोंका आहार करता था ।। ६ ।।

(पर्णाहारः कदाचिच्च नियमव्रतवानपि । कदाचिदुदकेनापि वर्तयन्ननुयन्त्रितः ।।) व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो कभी पत्ता चबा लेता और कभी पानी पीकर ही रह जाता था। उसका जीवन संयममें बँध गया था ।।

श्मशाने तस्य चावासो गोमायोः सम्मतोऽभवत् । जन्मभूम्यनुरोधाच्च नान्यवासमरोचयत् ।। ७ ।। वह श्मशानभूमिमें ही रहता था। वहीं उसका जन्म हुआ था, इसलिये वही स्थान उसे पंसद था। उसे और कहीं जाकर रहनेकी रुचि नहीं होती थी ।। ७ ।।

तस्य शौचममृष्यन्तस्ते सर्वे सहजातयः । चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनैः प्रश्रयोत्तरैः ।। ८ ।। सियारका इस तरह पवित्र आचार-विचारसे रहना उसके सभी जाति-भाइयोंको अच्छा न लगा। यह सब उनके लिये असह्य हो उठा; इसलिये वे प्रेम और विनयभरी बातें कहकर उसकी बुद्धिको विचलित करने लगे ।। ८ ।।

वसन् पितृवने रौद्रे शौचे वर्तितुमिच्छसि । इयं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ।। ९ ।। उन्होंने कहा ‘भाई सियार! तू तो मांसाहारी जीव है और भयंकर श्मशानभूमिमें निवास करता है, फिर भी पवित्र आचार-विचारसे रहना चाहता है—यह विपरीत निश्चय है ।। ९ ।।

तत्समानो भवास्माभिर्भोज्यं दास्यामहे वयम् । भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं सदास्तु ते ।। १० ।। ‘भैया! अतः तू हमारे ही समान होकर रह। तेरे लिये भोजन तो हमलोग ला दिया करेंगे। तू इस शौचाचारका नियम छोड़कर चुपचाप खा लिया करना। तेरी जातिका जो सदासे भोजन रहा है, वही तेरा भी होना चाहिये’ ।। १० ।।

इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच समाहितः । मधुरैः प्रसृतैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिर्अनिष्ठुरैः ।। ११ ।। उनकी ऐसी बात सुनकर सियार एकाग्रचित्त हो मधुर, विस्तृत, युक्तियुक्त तथा कोमल वचनोंद्वारा इस प्रकार बोला— ।। ११ ।।

अप्रमाणा प्रसूतिर्मे शीलतः क्रियते कुलम् । प्रार्थयामि च तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ।। १२ ।। ‘बन्धुओ! अपने बुरे आचरणोंसे ही हमारी जातिका कोई विश्वास नहीं करता। अच्छे स्वभाव और आचरणसे ही कुलकी प्रतिष्ठा होती है; अतः मैं भी वही कर्म करना चाहता हूँ,

जिससे अपने वंशका यश बढ़े ॥ १२ ॥
श्मशाने यदि मे वासः समाधिर्मे निशम्यताम् ।
आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मकारणम् ॥ १३ ॥
'यदि मेरा निवास श्मशानभूमिमें है तो इसके लिये मैं जो समाधान देता हूँ, उसको सुनो। आत्मा ही शुभ कर्मोंके लिये प्रेरणा करता है। कोई आश्रम ही धर्मका कारण नहीं हुआ करता ॥ १३ ॥
आश्रमे यो द्विजं हन्याद् गां वा दद्यादनाश्रमे ।
किं तु तत्पातकं न स्यात् तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ॥ १४ ॥
'क्या यदि कोई आश्रममें रहकर ब्राह्मणकी हत्या करे तो उसे उसका पातक नहीं लगेगा और यदि कोई बिना आश्रमके स्थानमें गोदान करे तो क्या वह व्यर्थ हो जायेगा? ॥ १४ ॥
भवन्तः स्वार्थलोभेन केवलं भक्षणे रताः ।
अनुबन्धे त्रयो दोषास्तान् न पश्यन्ति मोहिताः ॥ १५ ॥
'तुमलोग केवल स्वार्थके लोभसे मांसभक्षणमें रचे-पचे रहते हो। उसके परिणामस्वरूप जो तीन दोष प्राप्त होते हैं, उनकी ओर मोहवश तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती ॥ १५ ॥
अप्रत्ययकृतां गर्ह्यामर्थापनयदूषिताम् ।
इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद् वृत्तिं न रोचये ॥ १६ ॥
'तुमलोगोंकी जीविका असंतोषसे पूर्ण, निन्दनीय, धर्मकी हानिके कारण दूषित तथा इहलोक और परलोकमें भी अनिष्ट फल देनेवाली है; इसलिये मैं उसे पसंद नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥
तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः ।
कृत्वाऽऽत्मसदृशीं पूजां साचिव्येऽवरयत् स्वयम् ॥ १७ ॥
सियारके इस पवित्र आचार-विचारकी चर्चा चारों ओर फैल जानेके कारण एक प्रख्यातपराक्रमी व्याघ्रने उसे विद्वान् और विशुद्ध स्वभावका मानकर उसके निकट पदार्पण किया और उसकी अपने अनुरूप पूजा करके स्वयं ही मन्त्री बनानेके लिये उसका वरण किया ॥ १७ ॥

शार्दूल उवाच
सौम्य विज्ञातरूपस्त्वं गच्छ यात्रां मया सह ।
ध्रियन्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ॥ १८ ॥
व्याघ्र बोला— सौम्य! मैं तुम्हारे स्वरूपसे परिचित हूँ। तुम मेरे साथ चलो और अपनी रुचिके अनुसार अधिक-से-अधिक भोगोंका उपभोग करो। जो वस्तुएँ प्रिय न हों, उन्हें त्याग देना ॥ १८ ॥

तीक्ष्णा इति वयं ख्याता भवन्तं ज्ञापयामहे । मृदुपूर्वं हितं चैव श्रेयश्चाधिगमिष्यसि ॥ १९ ॥ परंतु एक बात मैं तुम्हें सूचित कर देता हूँ। सारे संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि हमारी जातिका स्वभाव कठोर होता है; अतः यदि तुम कोमलतापूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित-साधनमें लगे रहोगे तो अवश्य ही कल्याणके भागी होओगे ॥ १९ ॥

अथ सम्पूज्य तद् वाक्यं मृगेन्द्रस्य महात्मनः । गोमायुः संश्रितं वाक्यं बभाषे किंचिदानतः ॥ २० ॥ महामनस्वी मृगराजके उस कथनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके सियारने कुछ नतमस्तक होकर विनययुक्त वाणीमें कहा ॥ २० ॥

गोमायुरुवाच

सदृशं मृगराजैतत् तव वाक्यं मदन्तरे । यत् सहायान् मृगयसे धर्मार्थकुशलान् शुचीन् ॥ २१ ॥ सियार बोला—मृगराज! आपने मेरे लिये जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य ही है तथा आप जो धर्म और अर्थसाधनमें कुशल एवं शुद्ध स्वभाववाले सहायकों (मन्त्रियों) की खोज कर रहे हैं, यह भी उचित ही है ॥ २१ ॥

न शक्यं ह्यनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् । दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ॥ २२ ॥ वीर! मन्त्रीके बिना एकाकी राजा विशाल राज्यका शासन नहीं कर सकता। यदि शरीरको सुखा देनेवाला कोई दुष्ट मन्त्री मिल गया तो उसके द्वारा भी शासन नहीं चलाया जा सकता ॥ २२ ॥

सहायाननुरक्तांश्च नयज्ञानुपसंहितान् । परस्परमसंसृष्टान् विजिगीषूनलोलुपान् ॥ २३ ॥ अनतीतोपधान् प्राज्ञान् हिते युक्तान् मनस्विनः । पूजयेथा महाभाग यथाऽऽचार्यान् यथा पितॄन् ॥ २४ ॥ महाभाग! इसके लिये आपको चाहिये कि जिनका आपके प्रति अनुराग हो, जो नीतिके जानकार, सद्भाव-सम्पन्न, परस्पर गुटबंदीसे रहित, विजयकी अभिलाषासे युक्त, लोभरहित, कपटनीतिमें कुशल, बुद्धिमान्, स्वामीके हितसाधनमें तत्पर और मनस्वी हों, ऐसे व्यक्तियोंको सहायक या सचिव बनाकर आप पिता और गुरुके समान उनका सम्मान करें ॥ २३-२४ ॥

न त्वेव मम संतोषाद् रोचतेऽन्यन्मृगाधिप । न कामये सुखान् भोगानैश्वर्यं च तदाश्रयम् ॥ २५ ॥