महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नोपघातस्त्वया कार्यो राजन् मैत्रीमिहेच्छता ॥ ४७ ॥ मन्त्रीपदपर आते समय सियारने यह शर्त करा ली थी कि राजन्! यदि आप मुझसे मैत्री चाहते हैं तो किसीके बहकावेमें आकर मेरा विनाश न कर डालियेगा ॥
भीष्म उवाच
क्षुधितस्य मृगेन्द्रस्य भोक्तुमभ्युत्थितस्य च । भोजनायोपहर्तव्यं तन्मांसं नोपदृश्यते ॥ ४८ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! उधर शेरको जब भूख लगी और वह भोजनके लिये उठा, तब उसके खानेके लिये जो परोसा जानेवाला था, वह मांस उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ४८ ॥
मृगराजेन चाज्ञप्तं दृश्यतां चोर इत्युत । कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्रायोपवर्णितम् ॥ ४९ ॥ सचिवेनापनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना । तब मृगराजने सेवकोंको आज्ञा दी कि चोरका पता लगाओ। तब जिनकी यह करतूत थी, उन्हीं लोगोंने उस मांसके बारेमें शेरको बताया—'महाराज! अपनेको अत्यन्त बुद्धिमान् और पण्डित माननेवाले आपके मन्त्री महोदयने ही इस मांसका अपहरण किया है' ॥ ४९ १/२ ॥
सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमायुचापलम् ॥ ५० ॥ बभूवामर्षितो राजा वधं चास्य व्यरोचयत् । सियारकी यह चपलता सुनकर शेर गुस्सेसे भर गया। उससे यह बात सही नहीं गयी; अतः मृगराजने उसका वध करनेका ही विचार कर लिया ॥ ५० १/२ ॥
छिद्रं तु तस्य तद् दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः ॥ ५१ ॥ सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गे प्रवर्तते । निश्चित्यैव पुनस्तस्य ते कर्माण्यपि वर्णयन् ॥ ५२ ॥ उसका यह छिद्र देखकर पहलेके मन्त्री आपसमें कहने लगे, वह हम सब लोगोंकी जीविका नष्ट करनेपर तुला हुआ है; अतः हम भी उससे बदला लें, ऐसा निश्चय करके वे उसके अपराधोंका वर्णन करने लगे— ॥
इदं तस्येदृशं कर्म किं तेन न कृतं भवेत् । श्रुतश्च स्वामिना पूर्वं यादृशो नैव तादृशः ॥ ५३ ॥ 'महाराज! जब उसके द्वारा ऐसा कर्म किया जा सकता है, तब वह और क्या नहीं कर सकता? स्वामीने पहले उसके बारेमें जैसा सुन रक्खा है, वह वैसा नहीं है ॥
वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः । धर्मच्छद्मा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः ॥ ५४ ॥
'वह बातोंसे ही धर्मात्मा बना हुआ है। स्वभावसे तो बड़ा क्रूर है। भीतरसे यह बड़ा पापी है; परंतु ऊपरसे धर्मात्मापनका ढोंग बनाये हुए है। उसका सारा आचार-विचार व्यर्थ दिखावेके लिये है ।। ५४ ।।
कार्यार्थं भोजनार्थेषु व्रतेषु कृतवान् श्रमम् ।
यदि विप्रत्ययो ह्येष तदिदं दर्शयाम ते ।। ५५ ।।
'उसने तो अपना काम बनाने और पेट भरनेके लिये ही व्रत करनेमें परिश्रम किया है। यदि आपको विश्वास न हो तो यह लीजिये, हम अभी उसके यहाँ से मांस ले आकर दिखाते हैं ।। ५५ ।।
तन्मांसं चैव गोमायोस्तैः क्षणादाशु ढौकितम् ।
मांसापनयनं ज्ञात्वा व्याघ्रः श्रुत्वा च तद्वचः ।। ५६ ।।
आज्ञापयामास तदा गोमायुर्वध्यतामिति ।
ऐसा कहकर वे क्षणभरमें ही सियारके घरसे उस मांसको उठा लाये। मांसके अपहरणकी बात जानकर और उन सेवकोंकी बातें सुनकर शेरने उस समय यह आज्ञा दे दी कि सियारको प्राणदण्ड दे दिया जाय ।। ५६ १/२ ।।
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः ।। ५७ ।।
मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्बोधयितुमागमत् ।
पुत्र नैतत् त्वया ग्राह्यं कपटारम्भसंयुतम् ।। ५८ ।।
शेरकी यह बात सुनकर उसकी माता हितकर वचनोंद्वारा उसे समझानेके लिये वहाँ आयी और बोली—'बेटा! इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यन्त्र हुआ मालूम पड़ता है; अतः तुम्हें इसपर विश्वास नहीं करना चाहिये ।।
कर्मसंघर्षजैर्दोषैर्दुष्येताशुचिभिः शुचिः ।
नोच्छ्रितं सहते कश्चित् प्रक्रिया वैरकारिका ।। ५९ ।।
'काममें लाग-डाँट हो जानेसे जिनके मनमें शुद्धभाव नहीं है, वे लोग निर्दोषपर ही दोषारोपण करते हैं। किसीको अपनेसे ऊँची अवस्थामें देख कर कोई-कोई ईर्ष्यावश सहन नहीं कर पाते। यही वैरभाव उत्पन्न करनेवाली प्रक्रिया है ।। ५९ ।।
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः ।। ६० ।।
उत्पाद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः ।
'कोई कितना ही शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उसपर दोषारोपण कर ही देते हैं। अपने धार्मिक कर्मोंमें लगे हुए वनवासी मुनिके भी शत्रु, मित्र और उदासीन—ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं ।। ६० १/२ ।।
लुब्धानां शुचयो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः ।। ६१ ।।
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः ।
अधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपिणः ॥ ६२ ॥ 'लोभी लोग निर्लोभीसे, कायर बलवानोंसे, मूर्ख विद्वानोंसे, दरिद्र बड़े-बड़े धनियोंसे, पापाचारी धर्मात्माओंसे और कुरूप सुन्दर रूपवालोंसे द्वेष करते हैं ॥ ६१-६२ ॥
बहवः पण्डिता मूर्खा लुब्धा मायोपजीविनः । कुर्युर्दोषमदोषस्य बृहस्पतिमतेरपि ॥ ६३ ॥ 'विद्वानोंमें भी बहुत-से ऐसे अविवेकी, लोभी और कपटी होते हैं, जो बृहस्पतिके समान बुद्धि रखनेवाले निर्दोष व्यक्तिमें भी दोष ढूँढ निकालते हैं ॥ ६३ ॥
शून्यात् तच्च गृहान्मांसं यद्यप्यपहृतं तव । नेच्छते दीयमानं च साधु तावद् विमृश्यताम् ॥ ६४ ॥ 'एक ओर तो तुम्हारे सूने घरसे मांसकी चोरी हुई है और दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है, जो देनेपर भी मांस लेना नहीं चाहता—इन दोनों बातोंपर पहले अच्छी तरह विचार करो ॥ ६४ ॥
असभ्याः सभ्यसंकाशाः सभ्याश्चासभ्यदर्शनाः । दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ॥ ६५ ॥ 'संसारमें बहुतसे असभ्य प्राणी सभ्यकी तरह और सभ्यलोग असभ्यके समान देखे जाते हैं। इस तरह अनेक प्रकारके भाव दृष्टिगोचर होते हैं; अतः उनकी परीक्षा कर लेनी उचित है ॥ ६५ ॥
तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव । न चैवास्ति तलं व्योम्नि खद्योते न हुताशनः ॥ ६६ ॥ 'आकाश औंधी की हुई कड़ाहीके तले (भीतरी भागों) के समान दिखायी देता है और जुगनू अग्निके सदृश दृष्टिगोचर होता है; परंतु न तो आकाशमें तल है और न जुगनूमें अग्नि ही है ॥ ६६ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम् । परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न पश्चात् परितप्यते ॥ ६७ ॥ 'इसलिये प्रत्यक्ष दिखायी देनवाली वस्तुकी भी परीक्षा करनी उचित है। जो परीक्षा लेकर भले-बुरेकी जाँच करके किसी कार्यके लिये आज्ञा देता है, उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता ॥ ६७ ॥
न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् । श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥ ६८ ॥ 'बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ॥ ६८ ॥
स्थापितोऽयं त्वया पुत्र सामन्तेष्वपि विश्रुतः ।
दुःखेनसाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ॥ ६९ ॥ 'बेटा! तुमने ही इस सियारको मन्त्रीके पदपर बिठाया है, और तुम्हारे सामन्तोंमें भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है। कोई सुपात्र व्यक्ति बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है। यह सियार तुम्हारा हितैषी सुहृद् है; इसलिये तुम इसकी रक्षा करो ॥ ६९ ॥ दूषितं परदोषैर्हि गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् । स्वयं संदूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ७० ॥ 'जो दूसरोंके मिथ्या कलंक लगानेपर किसी निर्दोषको भी दण्ड देता है, वह दुष्ट मन्त्रियोंवाला राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है' ॥ ७० ॥ तस्मादप्यरिसंघाताद् गोमायोः कश्चिदागतः । धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत् कपटं कृतम् ॥ ७१ ॥ तदनन्तर उन्हीं शत्रुओंके समूहमेंसे किसी धर्मात्मा सियारने (जो शेरका गुप्तचर बना था,) आकर गीदड़के साथ जो यह छल-कपट किया गया था, वह सब सिंहको कह सुनाया ॥ ७१ ॥ ततो विज्ञातचरितः सत्कृत्य स विमोक्षितः । परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ॥ ७२ ॥ इससे शेरको सियारकी सच्चरित्रताका पता चल गया और उसने उसका सत्कार करके उसे इस अभियोगसे मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, मृगराजने स्नेहपूर्वक बारंबार अपने सचिवको गलेसे लगाया ॥ ७२ ॥ अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमायुर्नीतिशास्त्रवित् । तेनामर्षेण संतप्तः प्रायमासितुमैच्छत ॥ ७३ ॥ तत्पश्चात् नीतिशास्त्रके ज्ञाता सियारने मृगराजकी आज्ञा लेकर अमर्षसे संतप्त हो उपवास करके प्राण त्याग देनेका विचार किया ॥ ७३ ॥ शार्दूलस्तं तु गोमायुं स्नेहात् प्रोत्फुल्ललोचनः । अवारयत् स धर्मिष्ठं पूजया प्रतिपूजयन् ॥ ७४ ॥ शेरने धर्मात्मा गीदड़का भलीभाँति आदर-सत्कार करके उसे उपवाससे रोक दिया। उस समय उसके नेत्र स्नेहसे खिल उठे थे ॥ ७४ ॥ तं स गोमायुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् । उवाच प्रणतो वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ७५ ॥ सियारने देखा, मालिकका हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है, तब उसने उसे प्रणाम करके अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ७५ ॥ पूजितोऽहं त्वया पूर्वं पश्चाच्चैव विमानितः । परेषामास्पदं नीतो वस्तुं नार्हाम्यहं त्वयि ॥ ७६ ॥
'महाराज! पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रुओंकी-सी अवस्थामें डाल दिया; अतः अब मैं आपके पास रहनेके योग्य नहीं हूँ॥ ७६ ॥ असंतोषश्च्युताः स्थानान्मानात् प्रत्यवरोपिताः । स्वयं चोपहता भृत्या ये चाप्युपहताः परैः ॥ ७७ ॥ परिक्षीणाश्च लुब्धाश्च क्रुद्धा भीताः प्रतारिताः । हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तादाना महेप्सवः ॥ ७८ ॥ संतापिताश्च ये केचिद् व्यसनौघप्रतीक्षिणः । अन्तर्हिताः सोपहितास्ते सर्वे परसाधनाः ॥ ७९ ॥ 'जो अपने पदसे गिरा दिये जानेके कारण असंतुष्ट हों, अपमानित किये गये हों, जो स्वयं राजासे पुरस्कृत होकर दूसरोंके द्वारा कलंक लगाये जानेके कारण उस आदरसे वंचित कर दिये गये हों, जो क्षीण, लोभी, क्रोधी, भयभीत और धोखेमें डाले गये हों, जिनका सर्वस्व छीन लिया गया हो, जो मानी हों, जिनकी आय छिन गयी हो, जो महत्त्वपूर्ण पद पाना चाहते हों, जिन्हें सताया गया हो, जो किसी राजापर आनेवाले संकटसमूहकी प्रतीक्षा कर रहे हों, छिपे रहते हों और मनमें कपटभाव रखते हों, वे सभी सेवक शत्रुओंका काम बनानेवाले होते हैं॥ ७७—७९ ॥ अवमानेन युक्तस्य स्थानभ्रष्टस्य वा पुनः । कथं यास्यसि विश्वासमहं तिष्ठामि वा कथम् ॥ ८० ॥ जब मैं एक बार अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित हो गया, तब पुनः आप मुझपर कैसे विश्वास कर सकेंगे? अथवा मैं ही कैसे आपके पास रह सकूँगा? ॥ समर्थ इति संगृह्य स्थापयित्वा परीक्षितः । कृतं च समयं भित्त्वा त्वयाहमवमानितः ॥ ८१ ॥ 'आपने योग्य समझकर मुझे अपनाया और मन्त्रीके पदपर बिठाकर मेरी परीक्षा ली। इसके बाद अपनी की हुई प्रतिज्ञाको तोड़कर मेरा अपमान किया॥ ८१ ॥ प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि । न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ॥ ८२ ॥ 'पहले भरी सभामें शीलवान् कहकर जिसका परिचय दिया गया हो, प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेवाले पुरुषको उसका दोष नहीं बताना चाहिये॥ ८२ ॥ एवं चावमतस्येह विश्वासं मे न यास्यसि । त्वयि चापेतविश्वास ममोद्वेगो भविष्यति ॥ ८३ ॥ 'जब मैं इस प्रकार यहाँ अपमानित हो गया तो अब आपपर मेरा विश्वास न होगा और आप भी मुझपर विश्वास नहीं कर सकेंगे। ऐसी दशामें आपसे मुझे सदा भय बना रहेगा॥ ८३ ॥
शङ्कितस्त्वमहं भीतः परच्छिद्रानुदर्शिनः । अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद् बहुच्छलम् ॥ ८४ ॥ 'आप मुझपर संदेह करेंगे और मैं आपसे डरता रहूँगा, इधर पराये दोष ढूँढनेवाले आपके भृत्यलोग मौजूद ही हैं। इनका मुझपर तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। साथ ही यह मन्त्रीका कर्म भी अनेक प्रकारके छल-कपटसे भरा हुआ है' ।। ८४ ।।
दुःखेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते । भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥ ८५ ॥ 'प्रेमका बन्धन बड़ी कठिनाईसे टूटता है, पर जब वह एक बार टूट जाता है, तब बड़ी कठिनाईसे जुट पाता है। जो प्रेम बारंबार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमें स्नेह नहीं होता' ।। ८५ ।।
कश्चिदेव हिते भर्तुर्दृश्यते न परात्मनोः । कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावस्निग्धाः सुदुर्लभाः ॥ ८६ ॥ 'ऐसा मनुष्य कोई एक ही होता है, जो अपने या दूसरेके हितमें रत न रहकर स्वामीके ही हितमें संलग्न दिखायी देता हो; क्योंकि अपने कार्यकी अपेक्षा रखकर स्वार्थसाधनका उद्देश्य लेकर प्रेम करनेवाले तो बहुत होते हैं, परंतु शुद्धभावसे स्नेह रखनेवाले मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ हैं' ।। ८६ ।।
सुदुःखं पुरुषज्ञानं चित्तं ह्येषां चलाचलम् । समर्थो वाप्यशङ्को वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ॥ ८७ ॥ 'योग्य मनुष्यको पहचानना राजाओंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; क्योंकि उनका चित्त चंचल होता है, सैकड़ोंमेंसे कोई एक ही ऐसा मिलता है, जो सब प्रकारसे सुयोग्य होता हुआ भी संदेहसे परे हो' ।। ८७ ।।
अकस्मात् प्रक्रिया नृणामकस्माच्चापकर्षणम् । शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकार्तुं बुद्धिलाघवम् ॥ ८८ ॥ 'मनुष्यके उत्कर्ष और अपकर्ष (उन्नति और अवनति) अकस्मात् होते हैं, किसीका भला करके बुरा करना और उसे महत्त्व देकर नीचे गिराना, यह सब ओछी बुद्धिका परिणाम है' ।। ८८ ।।
एवंविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मकामार्थहेतुमत् । प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात् ॥ ८९ ॥ इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मुक्तियोंसे युक्त सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर सियारने बाघराजाको प्रसन्न कर लिया और उसकी अनुमति लेकर वह वनमें चला गया ।। ८९ ।।
अगृह्णानुनयं तस्य मृगेन्द्रस्य च बुद्धिमान् । गोमायुः प्रायमास्थाय त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ ॥ ९० ॥
वह बड़ा बुद्धिमान् था; अतः शेरकी अनुनय-विनय न मानकर मृत्युपर्यन्त निराहार रहनेका व्रत ले एक स्थानपर बैठ गया और अन्तमें शरीर त्यागकर स्वर्गधाममें जा पहुँचा ॥ ९० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्याघ्रगोमायुसंवादे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्याघ्र और गीदड़का संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ९१ श्लोक हैं।)
एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य
युधिष्ठिर उवाच
किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् ।
एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! राजाको क्या करना चाहिये? क्या करनेसे वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चयम् ।
यथा राज्ञा कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! राजाका जो कर्तव्य है और जो कुछ करके वह सुखी हो सकता है, उस कार्यका निश्चय करके अब मैं तुम्हें बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २ ॥
न चैवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुम ।
उष्ट्रस्य तु महत् वृत्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर! हमने एक ऊँटका जो महान् वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो। राजाको वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥
जातिस्मरो महानुष्ट्रः प्राजापत्ये युगेऽभवत् ।
तपः सुमहादातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ॥ ४ ॥
प्राजापत्ययुग (सत्ययुग) में एक महान् ऊँट था। उसको पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। उसने कठोर व्रतके पालनका नियम लेकर वनमें बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥
तपसस्तस्य चान्तेऽथ प्रीतिमानभवद् विभुः ।
वरेण च्छन्दयामास ततश्चैनं पितामहः ॥ ५ ॥
उस तपस्याके अन्तमें पितामह भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा ॥ ५ ॥
उष्ट्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदियम् ।
योजनानां शतं साग्रं गच्छामि चरितुं विभो ॥ ६ ॥
ऊँट बोला— भगवन्! आपकी कृपासे मेरी यह गर्दन बहुत बड़ी हो जाय, जिससे जब मैं चरनेके लिये जाऊँ तो सौ योजनसे अधिक दूरतककी खाद्य वस्तुएँ ग्रहण कर सकूँ ।। ६ ।।
एवमस्त्विति चोक्तः स वरदेन महात्मना ।
प्रतिलभ्य वरं श्रेष्ठं ययावुष्ट्रः स्वकं वनम् ॥ ७ ॥
वरदायक महात्मा ब्रह्माजीने ‘एवमस्तु’ कहकर उसे मुँहमाँगा वर दे दिया। वह उत्तम वर पाकर ऊँट अपने वनमें चला गया ।। ७ ।।
स चकार तदाऽऽलस्यं वरदानात् सुदुर्मतिः ।
न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ॥ ८ ॥
उस खोटी बुद्धिवाले ऊँटने वरदान पाकर कहीं आने-जानेमें आलस्य कर लिया। वह दुरात्मा कालसे मोहित होकर चरनेके लिये कहीं जाना ही नहीं चाहता था ।। ८ ।।
स कदाचित् प्रसार्यैव तां ग्रीवां शतयोजनाम् ।
चचार श्रान्तहृदयो वातश्चागात् ततो महान् ॥ ९ ॥
एक समयकी बात है, वह अपनी सौ योजन लंबी गर्दन फैलाकर चर रहा था, उसका मन चरनेसे कभी थकता ही नहीं था। इतनेमें ही बड़े जोरसे हवा चलने लगी ।। ९ ।।
स गुहायां शिरो ग्रीवां निधाय पशुरात्मनः ।
आस्ते तु वर्षमभ्यागात् सुमहत् प्लावयज्जगत् ॥ १० ॥
वह पशु किसी गुफामें अपनी गर्दन डालकर चर रहा था, इसी समय सारे जगत्के जलसे आप्लावित करती हुई बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। १० ।।
अथ शीतपरीताङ्गो जम्बुकः क्षुच्छ्रमान्वितः ।
सदारस्तां गुहामाशु प्रविवेश जलार्दितः ॥ ११ ॥
वर्षा आरम्भ होनेपर भूख और थकावटसे कष्ट पाता हुआ एक गीदड़ अपनी स्त्रीके साथ शीघ्र ही उस गुहामें आ घुसा। वह जलसे पीड़ित था, सर्दीसे उसके सारे अंग अकड़ गये थे ।। ११ ।।
स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वितः ।
अभक्षयत् ततो ग्रीवामुष्ट्रस्य भरतर्षभ ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह मांसजीवी गीदड़ अत्यन्त भूखके कारण कष्ट पा रहा था, अतः उसने ऊँटकी गर्दनका मांस काट-काटकर खाना आरम्भ कर दिया ।। १२ ।।
यदा त्वबुध्यतात्मानं भक्ष्यमाणं स वै पशुः ।
तदा संकोचने यत्नमकरोद् भृशदुःखितः ॥ १३ ॥
जब उस पशुको यह मालूम हुआ कि उसकी गर्दन खायी जा रही है, तब वह अत्यन्त दुखी हो उसे समेटनेका प्रयत्न करने लगा ।। १३ ।।
यावदूर्ध्वमधश्चैव ग्रीवां संक्षिपते पशुः ।
तावत् तेन सदारेण जम्बुकेन स भक्षितः ॥ १४ ॥ वह पशु जबतक अपनी गर्दनको ऊपर-नीचे समेटनेका यत्न करता रहा, तबतक ही स्त्रीसहित सियारने उसे काटकर खा लिया ॥ १४ ॥
स हत्वा भक्षयित्वा च तमुष्ट्रं जम्बुकस्तदा । विगते वातवर्षे तु निश्चक्राम गुहामुखात् ॥ १५ ॥ इस प्रकार ऊँटको मारकर खा जानेके पश्चात् जब आँधी और वर्षा बंद हो गयी, तब वह गीदड़ गुफाके मुहानेसे निकल गया ॥ १५ ॥
एवं दुर्बुद्धिना प्राप्तमुष्ट्रेण निधनं तदा । आलस्यस्य क्रमात् पश्य महान्तं दोषमागतम् ॥ १६ ॥ इस तरह उस मूर्ख ऊँटकी मृत्यु हो गयी। देखो, उसके आलस्यके क्रमसे कितना महान् दोष प्राप्त हो गया ॥
त्वमप्येवंविधं हित्वा योगेन नियतेन्द्रियः । वर्तस्व बुद्धिमूलं तु विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १७ ॥ इसलिये तुम्हें भी ऐसे आलस्यको त्याग करके इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए बुद्धिपूर्वक बर्ताव करना उचित है। मनुजीका कथन है कि 'विजयका मूल बुद्धि ही है' ॥ १७ ॥
बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत । तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ॥ १८ ॥ भारत! बुद्धिबलसे किये गये कार्य श्रेष्ठ हैं। बाहुबलसे किये जानेवाले कार्य मध्यम हैं। जाँघ अर्थात् पैरके बलसे किये गये कार्य जघन्य (अधम कोटिके) हैं तथा मस्तकसे भार ढोनेका कार्य सबसे निम्न श्रेणीका है ॥ १८ ॥
राज्यं तिष्ठति दक्षस्य संगृहीतेन्द्रियस्य च । आर्तस्य बुद्धिमूलं हि विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १९ ॥ जो जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसीका राज्य स्थिर रहता है। मनुजीका कथन है कि संकटमें पड़े हुए राजाकी विजयका मूल बुद्धि-बल ही है ॥ १९ ॥
गुह्यं मन्त्रं श्रुतवतः सुसहायस्य चानघ । परीक्ष्यकारिणो ह्यर्थास्तिष्ठन्तीह युधिष्ठिर । सहाययुक्तेन मही कृत्स्ना शक्या प्रशासितुम् ॥ २० ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! जो गुप्त मन्त्रणा सुनता है, जिसके सहायक अच्छे हैं तथा जो भलीभाँति जान-बूझकर कोई कार्य करता है, उसके पास ही धन स्थिर रहता है। सहायकोंसे सम्पन्न नरेश ही समूची पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ २० ॥
इदं हि सद्भिः कथितं विधिज्ञैः पुरा महेन्द्रप्रतिमप्रभाव । मयापि चोक्तं तव शास्त्रदृष्ट्या
यथैव बुद्ध्वा प्रचरस्व राजन् ॥ २१ ॥
महेन्द्रके समान प्रभावशाली नरेश! पूर्वकालमें राज्य-संचालनकी विधिको जाननेवाले सत्पुरुषोंने यह बात कही थी। मैंने भी शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार तुम्हें यह बात बतायी है। राजन्! इसे अच्छी तरह समझकर इसीके अनुसार चलो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उष्ट्रग्रीवोपाख्याने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऊँटकी गर्दनकी कथाविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
राजा राज्यमनुप्राप्य दुर्लभं भरतर्षभ ।
अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिष्ठेदसाधनः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! राजा एक दुर्लभ राज्यको पाकर भी सेना और खजाना आदि साधनोंसे रहित हो तो सभी दृष्टियोंसे अत्यन्त बढ़े-चढ़े हुए शत्रुके सामने कैसे टिक सकता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सरितां चैव संवादं सागरस्य च भारत ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सरिताओं तथा समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन उपाख्यानका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ २ ॥
सुरारिनिलयः शश्वत्सागरः सरिताम्पतिः ।
पप्रच्छ सरितः सर्वाः संशयं जातमात्मनः ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, दैत्योंके निवासस्थान और सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण नदियोंसे अपने मनका एक संदेह पूछा ॥ ३ ॥
सागर उवाच
समूलशाखान् पश्यामि निहतान् कायिनो द्रुमान् ।
युष्माभिरिह पूर्णाभिर्नद्यस्तत्र न वेतसम् ॥ ४ ॥
**समुद्रने कहा—**नदियो! मैं देखता हूँ कि जब बाढ़ आनेके कारण तुमलोग लबालब भर जाती हो, तब विशालकाय वृक्षोंको जड़-मूल और शाखाओंसहित उखाड़कर अपने प्रवाहमें बहा लाती हो; परंतु उनमें बेंतका कोई पेड़ नहीं दिखायी देता ॥ ४ ॥
अकायश्चाल्पसारश्च वेतसः कूलजश्च वः ।
अवज्ञया वा नानीतः किं च वा तेन वः कृतम् ॥ ५ ॥
बेंतका शरीर तो नहींके बराबर बहुत पतला है। उसमें कुछ दम नहीं होता है और वह तुम्हारे खास किनारेपर जमता है; फिर भी तुम उसे न ला सकी, क्या कारण है? क्या तुम अवहेलनावश उसे कभी नहीं लायीं अथवा उसने तुम्हारा कोई उपकार किया है? ॥ ५ ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासा मेव वो मतम् ।
यथा चेमानि कूलानि हित्वा नायाति वेतसः ॥ ६ ॥
इस विषयमें तुम सब लोगोंका विचार मैं सुनना चाहता हूँ, क्या कारण है कि बेंतका वृक्ष तुम्हारे इन तटोंको छोड़कर नहीं आता ? ॥ ६ ॥
तत्र प्राह नदी गङ्गा वाक्यमुत्तममर्थवत् ।
हेतुमद् ग्राहकं चैव सागरं सरिताम्पतिम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार प्रश्न होनेपर गंगानदीने सरिताओंके स्वामी समुद्रसे यह उत्तम अर्थपूर्ण, युक्तियुक्त तथा मनको ग्रहण करनेवाली बात कही ॥ ७ ॥
गङ्गोवाच
तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा ह्येकनिकेतनाः ।
ते त्यजन्ति ततः स्थानं प्रातिलोम्यान्न वेतसः ॥ ८ ॥
गंगा बोली— नदीश्वर! ये वृक्ष अपने-अपने स्थानपर अकड़कर खड़े रहते हैं, हमारे प्रवाहके सामने मस्तक नहीं झुकाते। इस प्रतिकूल बर्तावके कारण ही उन्हें नष्ट होकर अपना स्थान छोड़ना पड़ता है; परंतु बेंत ऐसा नहीं है ॥ ८ ॥
वेतसो वेगमायातं दृष्ट्वा नमति नापरे ।
सरिद्वेगेऽव्यतिक्रान्ते स्थानमासाद्य तिष्ठति ॥ ९ ॥
बेंत नदीके वेगको आते देख झुक जाता है, पर दूसरे वृक्ष ऐसा नहीं करते; अतः वह सरिताओंका वेग शान्त होनेपर पुनः अपने स्थानमें ही स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
कालज्ञः समयज्ञश्च सदा वश्यश्च नोद्धतः ।
अनुलोमस्तथास्तब्धस्तेन नाभ्येति वेतसः ॥ १० ॥
बेंत समयको पहचानता है, उसके अनुसार बर्ताव करना जानता है, सदा हमारे वशमें रहता है, कभी उद्दण्डता नहीं दिखाता और अनुकूल बना रहता है। उसमें कभी अकड़ नहीं आती; इसीलिये उसे स्थान छोड़कर यहाँ नहीं आना पड़ता है ॥ १० ॥
मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च ।
ओषध्यः पादपा गुल्मा न ते यान्ति पराभवम् ॥ ११ ॥
जो पौधे, वृक्ष या लता-गुल्म हवा और पानीके वेगसे झुक जाते तथा वेग शान्त होनेपर सिर उठाते हैं, उनका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११ ॥
भीष्म उवाच
यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्बन्धविनाशने ।
पूर्वं न सहते वेगं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १२ ॥
समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद
समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इसी प्रकार जो राजा बलमें बढ़े-चढ़े तथा बन्धनमें डालने और विनाश करनेमें समर्थ शत्रुके प्रथम वेगको सिर झुकाकर नहीं सह लेता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥
सारासारं बलं वीर्यमात्मनो द्विषतश्च यः।
जानन् विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम् ॥ १३ ॥
जो बुद्धिमान् राजा अपने तथा शत्रुके सार-असार, बल तथा पराक्रमको जानकर उसके अनुसार बर्ताव करता है, उसकी कभी पराजय नहीं होती है ॥ १३ ॥
एवमेव यदा विद्वान् मन्यतेऽतिबलं रिपुम्।
संश्रयेद् वैतसीं वृत्तिमेतत् प्रज्ञानलक्षणम् ॥ १४ ॥
इस प्रकार विद्वान् राजा जब शत्रुके बलको अपनेसे अधिक समझे, तब बेंतका ही ढंग अपना ले; अर्थात् उसके सामने नतमस्तक हो जाय। यही बुद्धिमानीका लक्षण है ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सरित्सागरसंवादे त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सरिताओं और समुद्रका संवादविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
११४-
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ
युधिष्ठिर उवाच
विद्वान् मूर्खप्रगल्भेन मृदुतीक्ष्णेन भारत ।
आक्रुश्यमानः सदसि कथं कुर्यादरिंदम ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**शत्रुदमन भारत! यदि कोई ढीठ मूर्ख मधुर या तीखे शब्दोंमें भरी सभाके बीच किसी विद्वान् पुरुषकी निन्दा करने लगे, तो वह उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीयते ।
सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पमेधसः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भूपाल! सुनो, इस विषयमें सदासे जैसी बात कही जाती है, उसे बता रहा हूँ। विशुद्ध चित्तवाला पुरुष इस जगत्में सदा ही मूर्ख मनुष्यके कठोर वचनोंको सहन करता है ॥ २ ॥
अरुष्यन् क्रुश्यमानस्य सुकृतं नाम विन्दति ।
दुष्कृतं चात्मनो मर्षी रुष्यत्येवापमार्ष्टि वै ॥ ३ ॥
जो निन्दा करनेवाले पुरुषके ऊपर क्रोध नहीं करता, वह उसके पुण्यको प्राप्त कर लेता है। वह सहनशील मनुष्य अपना सारा पाप उस क्रोधी पुरुषपर ही धो डालता है ॥ ३ ॥
टिट्टिभं तमुपेक्षेत वाशमानमिवातुरम् ।
लोकविद्वेषमापन्नो निष्फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥
अच्छे पुरुषको चाहिये कि वह टिटिहरी या रोगीकी तरह टाँय-टाँय करते हुए उस निन्दाकारी पुरुषकी उपेक्षा कर दे। इससे वह सब लोगोंके द्वेषका पात्र बन जायगा और उसके सारे सत्कर्म निष्फल हो जायँगे ॥ ४ ॥
इति संश्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा ।
इदमुक्तो मया कश्चित् सम्मतो जनसंसदि ॥ ५ ॥
स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठते ।
श्लाघन्नश्लाघनीयेन कर्मणा निरपत्रपः ॥ ६ ॥
वह मूर्ख तो उस पापकर्मके द्वारा सदा अपनी प्रशंसा करते हुए कहता है कि मैंने अमुक सम्मानित पुरुषको भरी सभामें ऐसी-ऐसी बातें सुनायीं कि वह लाजसे गड़ गया,
उसका मुख सूख गया और वह अधमरा-सा हो गया, इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके वह अपनी प्रशंसा करता है और तनिक भी लजाता नहीं है ।।
उपेक्षितव्यो यत्नेन तादृशः पुरुषाधमः । यद् यद् ब्रूयादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेद्बुधः ।। ७ ।। ऐसे नराधमकी यत्नपूर्वक उपेक्षा कर देनी चाहिये। मूर्ख मनुष्य जो कुछ भी कह दे, विद्वान् पुरुषको वह सब सह लेना चाहिये ।। ७ ।।
प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति । वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ।। ८ ।। जैसे वनमें कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव किया करता है, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। वह प्रशंसा करे या निन्दा, किसीका क्या भला या बुरा करेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकेगा ।। ८ ।।
यदि वाग्भिः प्रयोगः स्यात् प्रयोगे पापकर्मणः । वागेवार्थो भवेत् तस्य न ह्येवार्थो जिघांसतः ।। ९ ।। यदि पापाचारी पुरुषके कटुवचन बोलनेपर बदलेमें वैसे ही वचनोंका प्रयोग किया जाय तो उससे केवल वाणीद्वारा कलहमात्र होगा। जो हिंसा करना चाहता है, उसका गाली देनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा ।। ९ ।।
निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टया । मयूर इव कौपीनं नृत्यं संदर्शयन्निव ।। १० ।। मयूर जब नाच दिखाता है, उस समय वह अपने गुप्त अंगोंको भी उघाड़ देता है। इसी प्रकार जो मूर्ख अनुचित आचरण करता है वह उस कुचेष्टाद्वारा अपने छिपे हुए दोषोंको प्रकट करता है ।। १० ।।
यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं चापि किंचन । वाचं तेन न संदध्याच्छुचिः संश्लिष्टकर्मणा ।। ११ ।। संसारमें जिसके लिये कुछ भी कह देना या कर डालना असम्भव नहीं है, ऐसे मनुष्यसे उस भले मनुष्यको बात भी नहीं करनी चाहिये जो अपने सत्कर्मके द्वारा विशुद्ध समझा जाता है ।। ११ ।।
प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षे चापि निन्दकः । स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपरापरः ।। १२ ।। जो सामने आकर गुण गाता है और परोक्षमें निन्दा करता है, वह मनुष्य संसारमें कुत्तेके सामन है। उसके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं ।। १२ ।।
तादृग्जनशतस्यापि यद् ददाति जुहोति च । परोक्षेणापवादी यस्तं नाशयति तत्क्षणात् ।। १३ ।।
परोक्षमें परनिन्दा करनेवाला मनुष्य सैकड़ों मनुष्योंको जो कुछ दान देता है और होम करता है, उन सब अपने कर्मोंको तत्काल नष्ट कर देता है ।। १३ ।। तस्मात् प्राज्ञो नरः सद्यस्तादृशं पापचेतसम् । वर्जयेत् साधुभिर्वर्ज्यं सारमेयामिषं यथा ।। १४ ।। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह वैसे पापपूर्ण विचारवाले पुरुषको तत्काल त्याग दे। वह कुत्तेके मांसके समान साधु पुरुषोंके लिये सदा ही त्याज्य है ।। परिवादं ब्रुवाणो हि दुरात्मा वै महाजने । प्रकाशयति दोषांस्तु सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ।। १५ ।। जैसे साँप अपने फनको ऊँचा उठाकर प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जनसमुदायमें किसी महापुरुषकी निन्दा करनेवाला दुरात्मा अपने ही दोषोंको प्रकट करता है ।। तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकर्तुं य इच्छति । भस्मकूट इवाबुद्धिः खरो रजसि सज्जति ।। १६ ।। जो परनिन्दारूप अपना कार्य करनेवाले दुष्ट पुरुषसे बदला लेना चाहता है, वह राखमें लोटनेवाले मूर्ख गदहेके सामन केवल दुःखमें निमग्न होता है ।। १६ ।। मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं जनापवादे सततं निविष्टम् । मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ।। १७ ।। जो सदा लोगोंकी निन्दामें ही तत्पर रहता है, वह मनुष्यके शरीररूप घरमें रहनेवाला भेड़िया है। वह सदा अशान्त बना रहता है। मतवाले हाथीके समान चीत्कार करता है और अत्यन्त भयंकर कुत्तेके समान काटनेको दौड़ता है। श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि उसे सदाके लिये त्याग दे ।। १७ ।। अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं दमादपेतं विनयाच्च पापम् । अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ।। १८ ।। वह मूर्खोंद्वारा सेवित पथपर चलनेवाला है। इन्द्रिय-संयम और विनयसे कोसों दूर है। उसने शत्रुताका व्रत ले रखा है। वह सदा सबकी अवनति चाहता है। उस पापात्मा एवं पापबुद्धि मनुष्यको धिक्कार है ।। १८ ।। प्रत्युच्यमानस्त्वभिभूय एभि- र्निशाम्य मा भूस्त्वमथार्तरूपः । उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रयोगं विगर्हयन्ति स्थिरबुद्धयो ये ।। १९ ।।
यदि ऐसे दुष्ट मनुष्य किसीपर आक्रमण करके उसकी निन्दा करने लगें और उसे सुनकर भला मनुष्य उसका उत्तर देनेके लिये उद्यत हो तो उसे रोककर कहे कि तुम दुखी न होओ; क्योंकि स्थिर बुद्धिवाले मनुष्य उच्च पुरुषका नीचके साथ होनेवाले संयोगकी अर्थात् बराबरीकी निन्दा करते हैं।। १९ ।।
क्रुद्धो दशार्धेन हि ताडयेद् वा
स पांसुभिर्वा विकिरेत् तुषैर्वा ।
विवृत्य दन्तांश्च विभीषयेद् वा
सिद्धं हि मूढे कुपिते नृशंसे ।। २० ।।
यदि क्रूर स्वभावका मूर्ख मनुष्य कुपित हो जाय तो वह थप्पड़ मार सकता है, मुँहपर धूल अथवा भूसी झोंक सकता है और दाँत निकालकर डरा सकता है। उसके द्वारा सारी कुचेष्टाएँ सम्भव हैं ।। २० ।।
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां
सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः ।
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा
न वाङ्मयं स लभति किंचिदप्रियम् ।। २१ ।।
जो इस दृष्टान्तको सदा पढ़ता या सुनता रहता है और जो मनुष्य सभामें किसी अत्यन्त दुष्टात्माद्वारा की हुई निन्दाको सह लेता है, वह दुर्जन मनुष्यसे कभी वाणीद्वारा होनेवाले निन्दाजनित किंचिन्मात्र दुःखका भी भागी नहीं होता ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि टिट्टिभकं नाम
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ चौदहवाँ
अध्याय पूरा हुआ ।। ११४ ।।
११५-
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ संशयो मे महानयम् ।
संछेत्तव्यस्त्वया राजन् भवान् कुलकरो हि नः ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— 'परमबुद्धिमान् पितामह! मेरे मनमें यह एक महान् संशय बना हुआ है। राजन्! आप मेरे उस संदेहका निवारण करें; क्योंकि आप हमारे वंशके प्रवर्तक हैं ॥ १ ॥
पुरुषाणामयं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् ।
कथितो वाक्यसंचारस्ततो विज्ञापयामि ते ॥ २ ॥
तात! आपने दुरात्मा और दुराचारी पुरुषोंके बोलचालकी चर्चा की है; इसलिये मैं आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ ॥ २ ॥
यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदयम् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षेमवृद्धिकरं च यत् ॥ ३ ॥
पुत्रपौत्राभिरामं च राष्ट्रवृद्धिकरं च यत् ।
अन्नपाने शरीरे च हितं यत्तद् ब्रवीहि मे ॥ ४ ॥
आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जो हमारे इस राज्यतन्त्रके लिये हितकारक, कुलके लिये सुखदायक, वर्तमान और भविष्यमें भी कल्याणकी वृद्धि करनेवाला, पुत्र और पौत्रोंकी परम्पराके लिये हितकर, राष्ट्रकी उन्नति करनेवाला तथा अन्न, जल और शरीरके लिये भी लाभकारी हो ॥ ३-४ ॥
अभिषिक्तो हि यो राजा राष्ट्रस्थो मित्रसंवृतः ।
ससुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जयेत् प्रजाः ॥ ५ ॥
जो राजा अपने राज्यपर अभिषिक्त हो देशमें मित्रोंसे घिरा हुआ रहता है, तथा जो हितैषी सुहृदोंसे भी सम्पन्न है, वह किस प्रकार अपनी प्रजाको प्रसन्न रखे? ॥ ५ ॥
यो ह्यसत्संग्रहरतिः स्नेहरागबलात्कृतः ।
इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषकः ॥ ६ ॥
तस्य भृत्या विगुणतां यान्ति सर्वे कुलोद्गताः ।
न च भृत्यफलैरर्थैः स राजा सम्प्रयुज्यते ॥ ७ ॥
जो असद् वस्तुओंके संग्रहमें अनुरक्त है, स्नेह और रागके वशीभूत हो गया है और इन्द्रियोंपर वश न चलनेके कारण सज्जन बननेकी चेष्टा नहीं करता, उस राजाके उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए समस्त सेवक भी विपरीत गुणवाले हो जाते हैं। ऐसी दशामें सेवकोंके