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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयम्भुवा ।। ५८ ।। कुन्तीनन्दन! ज्येष्ठ पुत्रका भाग भी ज्येष्ठ होता है। उसे प्रधानतः एक अंश अधिक मिलता है। पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने पैतृक धनके बँटवारेकी यह विधि बतायी थी ।। ५८ ।।

समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृतः पूर्वपूर्वो विशिष्यते ।। ५९ ।। नरेश्वर! समान वर्णकी स्त्रियोंमें जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, उनमें यह दूसरी विशेषता ध्यान देने योग्य है। विवाहकी विशिष्टताके कारण उन पुत्रोंमें भी विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् पहले विवाहकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र श्रेष्ठ और दूसरे विवाहकी स्त्रीसे पैदा हुआ पुत्र कनिष्ठ होता है ।। ५९ ।।

हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकं तुल्यासु तेष्वपि । मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम् ।। ६० ।। तुल्य वर्णवाली स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए उन पुत्रोंमें भी जो ज्येष्ठ है, वह एक भाग ज्येष्ठांश ले सकता है। मध्यम पुत्रको मध्यम और कनिष्ठ पुत्रको कनिष्ठ भाग लेना चाहिये ।। ६० ।।

एवं जातिषु सर्वासु सवर्णः श्रेष्ठतां गतः । महर्षिरपि चैतद् वै मारीचः काश्यपोऽब्रवीत् ।। ६१ ।। इस प्रकार सभी जातियोंमें समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुत्र ही श्रेष्ठ होता है। मरीचि-पुत्र महर्षि काश्यपने भी यही बात बतायी है ।। ६१ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे रिक्थविभागो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके अन्तर्गत पैतृक धनका विभागनामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।


* 'दार' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'आद्रियन्ते त्रिवर्गार्थिभिः इति दारा'। धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जिनका आदर किया जाता है, वे दारा हैं। जहाँतक भोगविषयक आदर है, वह तो सभी स्त्रियोंके साथ समान है, परंतु व्यावहारिक जगत्में जो पतिके द्वारा आदर प्राप्त होता है, वह वर्णक्रमसे यथायोग्य न्यूनाधिक मात्रामें ही उपलब्ध होता है। यही बात उनके पुत्रोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है। इसीलिये उनके पुत्रोंको पैतृक धनके विषयमें कम और अधिक भाग ग्रहण करनेका अधिकार है।

वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अर्थाल्लोभाद् वा कामाद् वा वर्णानां चाप्यनिश्चयात् ।
अज्ञानाद् वापि वर्णानां जायते वर्णसंकरः ।। १ ।।
तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसंकरे ।
को धर्मः कानि कर्माणि तन्मे ब्रूहि पितामह ।। २ ।।

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! धन पाकर या धनके लोभमें आकर अथवा कामनाके वशीभूत होकर जब उच्च वर्णकी स्त्री नीच वर्णके पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तब वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है। वर्णोंका निश्चय अथवा ज्ञान न होनेसे भी वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। इस रीतिसे जो वर्णोंके मिश्रणद्वारा उत्पन्न हुए मनुष्य हैं, उनका क्या धर्म है? और कौन-कौन-से कर्म हैं? यह मुझे बताइये ।। १-२ ।।

भीष्म उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्यं च केवलम् ।
असृजत् स हि यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापतिः ।। ३ ।।

भीष्मजीने कहा— बेटा! पूर्वकालमें प्रजापतिने यज्ञके लिये केवल चार वर्णों और उनके पृथक्-पृथक् कर्मोंकी ही रचना की थी ।। ३ ।।

भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते ।
आनुपूर्व्याद् द्वयोर्हीनौ मातृजातौ प्रसूततः ।। ४ ।।

ब्राह्मणकी जो चार भार्याएँ बतायी गयी हैं, उनमेंसे दो स्त्रियों—ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे ब्राह्मण ही उत्पन्न होता है और शेष दो वैश्या और शूद्रा स्त्रियोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे ब्राह्मणत्वसे हीन क्रमशः माताकी जातिके समझे जाते हैं ।। ४ ।।

परं शवाद् ब्राह्मणस्यैव पुत्रः
शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहुः ।
शुश्रूषकः स्वस्य कुलस्य स स्यात्
स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात् ।। ५ ।।

शूद्राके गर्भसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणका ही जो पुत्र है, वह शवसे अर्थात् शूद्रसे पर—उत्कृष्ट बताया गया है; इसीलिये ऋषिगण उसे पारशव कहते हैं। उसे अपने कुलकी सेवा करनी चाहिये और अपने इस सेवारूप आचारका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये ।। ५ ।।

सर्वानुपायानथ सम्प्रधार्य समुद्धरेत् स्वस्य कुलस्य तन्त्रम् । ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य शुश्रूषया दानपरायणः स्यात् ।। ६ ।। शूद्रापुत्र सभी उपायोंका विचार करके अपनी कुल-परम्पराका उद्धार करे। वह अवस्थामें ज्येष्ठ होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी अपेक्षा छोटा ही समझा जाता है, अतः उसे त्रैवर्णिकोंकी सेवा करते हुए दानपरायण होना चाहिये ।। ६ ।।

तिस्रः क्षत्रियसम्बन्धाद् द्वयोरात्मास्य जायते । हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृतिः ।। ७ ।। क्षत्रियकी क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा—ये तीन भार्याएँ होती हैं। इनमेंसे क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे क्षत्रियके सम्पर्कसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह क्षत्रिय ही होता है। तीसरी शूद्राके गर्भसे हीन वर्णवाले शूद्र ही उत्पन्न होते हैं; जिनकी उग्र संज्ञा है। ऐसा धर्मशास्त्रका कथन है ।। ७ ।।

द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वयोरात्मास्य जायते । शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते ।। ८ ।। वैश्यकी दो भार्याएँ होती हैं—वैश्या और शूद्रा। उन दोनोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह वैश्य ही होता है। शूद्रकी एक ही भार्या होती है शूद्रा, जो शूद्रको ही जन्म देती है ।। ८ ।।

अतोऽविशिष्टस्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षकः । बाह्यं वर्णं जनयति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम् ।। ९ ।। अतः वर्णोंमें नीचे दर्जेका शूद्र यदि गुरुजनों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंके साथ समागम करता है तो वह चारों वर्णोंद्वारा निन्दित वर्णबहिष्कृत (चाण्डाल आदि) को जन्म देता है ।। ९ ।।

विप्रायां क्षत्रियो बाह्यं सूतं स्तोमक्रियापरम् । वैश्यो वैदेहकं चापि मौद्गल्यमपवर्जितम् ।। १० ।। क्षत्रिय ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर उसके गर्भसे 'सूत' जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो वर्णबहिष्कृत और स्तुति-कर्म करनेवाला (एवं रथीका काम करनेवाला) होता है। उसी प्रकार वैश्य यदि ब्राह्मणीके साथ समागम करे तो वह संस्कारभ्रष्ट 'वैदेहक' जातिवाले पुत्रको उत्पन्न करता है, जिससे अन्तःपुरकी रक्षा आदिका काम लिया जाता है और इसलिये जिसको 'मौद्गल्य' भी कहते हैं ।। १० ।।

शूद्रश्चाण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं बाह्यवासिनम् । ब्राह्मण्यां सम्प्रजायन्त इत्येते कुलपांसनाः । एते मतिमतां श्रेष्ठ वर्णसंकरजाः प्रभो ।। ११ ।।

इसी तरह शूद्र ब्राह्मणीके साथ समागम करके अत्यन्त भयंकर चाण्डालको जन्म देता है, जो गाँवके बाहर बसता है और वध्यपुरुषोंको प्राणदण्ड आदि देनेका काम करता है। प्रभो! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीके साथ नीच पुरुषोंका संसर्ग होनेपर ये सभी कुलांगार पुत्र उत्पन्न होते हैं और वर्णसंकर कहलाते हैं ॥ ११ ॥

बन्दी तु जायते वैश्यान्मागधो वाक्यजीवनः ।
शूद्रान्निषादो मत्स्यघ्नः क्षत्रियायां व्यतिक्रमात् ॥ १२ ॥

वैश्यके द्वारा क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र वन्दी और मागध कहलाता है। वह लोगोंकी प्रशंसा करके अपनी जीविका चलाता है। इसी प्रकार यदि शूद्र क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके साथ प्रतिलोम समागम करता है तो उससे मछली मारनेवाले निषाद जातिकी उत्पत्ति होती है ॥ १२ ॥

शूद्रादायोगवश्चापि वैश्यायां ग्राम्यधर्मिणः ।
ब्राह्मणैरप्रतिग्राह्यस्तक्षा स्वधनजीवनः ॥ १३ ॥

और शूद्र यदि वैश्य जातिकी स्त्रीके साथ ग्राम्यधर्म (मैथुन) का आश्रय लेता है तो उससे ‘आयोगव’ जातिका पुत्र उत्पन्न होता है जो बढ़ईका काम करके अपने कमाये हुए धनसे जीवन निर्वाह करता है। ब्राह्मणोंको उससे दान नहीं लेना चाहिये ॥ १३ ॥

एतेऽपि सदृशान् वर्णान् जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्याः प्रसूयन्ते ह्यवरा हीनयोनिषु ॥ १४ ॥

ये वर्णसंकर भी जब अपनी ही जातिकी स्त्रीके साथ समागम करते हैं, तब अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंको जन्म देते हैं और जब अपनेसे हीन जातिकी स्त्रीसे संसर्ग करते हैं, तब नीच संतानोंकी उत्पत्ति होती है। ये संतानें अपनी माताकी जातिकी समझी जाती हैं ॥ १४ ॥

यथा चतुर्षु वर्णेषु द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात् प्रजायन्ते तथा बाह्याः प्रधानतः ॥ १५ ॥

जैसे चार वर्णोंमेंसे अपने और अपनेसे एक वर्ण नीचेकी स्त्रियोंसे जो पुत्र उत्पन्न किया जाता है, वह अपने ही वर्णका माना जाता है और एक वर्णका व्यवधान देकर नीचेके वर्णोंकी स्त्रियोंसे उत्पन्न किये जानेवाले पुत्र प्रधान वर्णसे बाह्य—माताकी जातिवाले होते हैं, उसी प्रकार ये नौ—अम्बष्ठ, पारशव, उग्र, सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, निषाद और आयोगव—अपनी जातिमें और अपने-से नीचेवाली जातिमें जब संतान उत्पन्न करते हैं, तब वह संतान पिताकी ही जातिवाली होती है और जब एक जातिका अन्तर देकर नीचेकी जातियोंमें संतान उत्पन्न करते हैं, तब वे संतानें पिताकी जातिसे हीन माताओंकी जातिवाली होती हैं ॥ १५ ॥

ते चापि सदृशं वर्णं जनयन्ति स्वयोनिषु ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ १६ ॥

इस प्रकार वर्णसंकर मनुष्य भी समान जातिकी स्त्रियोंमें अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति करते हैं और यदि परस्पर विभिन्न जातिकी स्त्रियोंसे उनका संसर्ग होता है तो वे अपनी अपेक्षा भी निन्दनीय संतानोंको ही जन्म देते हैं ।। १६ ।।

यथा शूद्रोऽपि ब्राह्मण्यां जन्तुं बाह्यं प्रसूयते । एवं बाह्यतराद् बाह्यश्चातुर्वर्ण्यात् प्रजायते ।। १७ ।।

जैसे शूद्र ब्राह्मणीके गर्भसे चाण्डाल नामक बाह्य (वर्ण-बहिष्कृत) पुत्र उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उस बाह्य जातिका मनुष्य भी ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंकी एवं बाह्यतर जातिकी स्त्रियोंके साथ संसर्ग करके अपनी अपेक्षा भी नीच जातिवाला पुत्र पैदा करता है ।। १७ ।।

प्रतिलोमं तु वर्धन्ते बाह्याद् बाह्यतरात् पुनः । हीनाद्धीनाः प्रसूयन्ते वर्णाः पञ्चदशैव तु ।। १८ ।।

इस तरह बाह्य और बाह्यतर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करनेपर प्रतिलोम वर्णसंकरोंकी सृष्टि बढ़ती जाती है। क्रमशः हीन-से-हीन जातिके बालक जन्म लेने लगते हैं। इन संकर जातियोंकी संख्या सामान्यतः पंद्रह है ।।

अगम्यागमनाच्चैव जायते वर्णसंकरः । बाह्यानामनुजायन्ते सैरन्ध्रयां मागधेषु च । प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।। १९ ।।

अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेपर वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति होती है। मागध जातिकी सैरन्ध्री स्त्रियोंसे यदि बाह्यजातीय पुरुषोंका संसर्ग हो तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है वह राजा आदि पुरुषोंके शृंगार करने तथा उनके शरीरमें अंगराग लगाने आदिकी सेवाओंका जानकार होता है और दास न होकर भी दासवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाला होता है ।। १९ ।।

अतश्चायोगवं सूते वागुराबन्धजीवनम् । मैरेयकं च वैदेहः सम्प्रसूतेऽथ माधुकम् ।। २० ।।

मागधोंके आवान्तर भेद सैरन्ध्र जातिकी स्त्रीसे यदि आयोगव जातिका पुरुष समागम करे तो वह आयोगव जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो जंगलोंमें जाल बिछाकर पशुओंको फँसानेका काम करके जीवन निर्वाह करता है। उसी जातिकी स्त्रीके साथ यदि वैदेह जातिका पुरुष समागम करता है तो वह मदिरा बनानेवाले मैरेयक जातिके पुत्रको जन्म देता है ।। २० ।।

निषादो मद्गुरं सूते दासं नावोपजीविनम् । मृतपं चापि चाण्डालः श्वपाकमिति विश्रुतम् ।। २१ ।।

निषादके वीर्य और मागधसैरन्ध्रीके गर्भसे मद्गुर जातिका पुरुष उत्पन्न होता है, जिसका दूसरा नाम दास भी है। वह नावसे अपनी जीविका चलाता है। चाण्डाल और

मागधी सैरन्ध्रीके संयोगसे श्वपाक नामसे प्रसिद्ध अधम चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। वह मुर्दोंकी रखवालीका काम करता है ।। २१ ।। चतुरो मागधी सूते क्रूरान् मायोपजीविनः । मांसं स्वादुकरं क्षौद्रं सौगन्धमिति विश्रुतम् ।। २२ ।। इस प्रकार मागध जातिकी सैरन्ध्री स्त्री आयोगव आदि चार जातियोंसे समागम करके मायासे जीविका चलानेवाले पूर्वोक्त चार प्रकारके क्रूर पुत्रोंको उत्पन्न करती है। इनके सिवा दूसरे भी चार प्रकारके पुत्र मागधी सैरन्ध्रीसे उत्पन्न होते हैं जो उसके सजातीय अर्थात् मागध-सैरन्ध्रसे ही उत्पन्न होते हैं। उनकी मांस, स्वादुकर, क्षौद्र और सौगन्ध—इन चार नामोंसे प्रसिद्धि होती है ।। वैदेहकाच्च पापिष्ठा क्रूरं मायोपजीविनम् । निषादान्मद्रनाथं च खरयानप्रयायिनम् ।। २३ ।। आयोगव जातिकी पापिष्ठा स्त्री वैदेह जातिके पुरुषसे समागम करके अत्यन्त क्रूर, मायाजीवी पुत्र उत्पन्न करती है। वही निषादके संयोगसे मद्रनाभ नामक जातिको जन्म देती है, जो गदहेकी सवारी करनेवाली होती है ।। २३ ।। चाण्डालात् पुल्कसं चापि खराश्वगजभोजिनम् । मृतचैलप्रतिच्छन्नं भिन्नभाजनभोजनम् ।। २४ ।। वही पापिष्ठा स्त्री जब चाण्डालसे समागम करती है तब पुल्कस जातिको जन्म देती है। पुल्कस गधे, घोड़े और हाथीके मांस खाते हैं। वे मुर्दोंपर चढ़े हुए कफन लेकर पहनते और फूटे बर्तनमें भोजन करते हैं ।। आयोगवीषु जायन्ते हीनवर्णास्तु ते त्रयः । क्षुद्रो वैदेहकादन्ध्रो बहिर्ग्रामप्रतिश्रयः ।। २५ ।। कारावरो निषाद्यां तु चर्मकारः प्रसूयते । इस प्रकार ये तीन नीच जातिके मनुष्य आयोगवीकी संतानें हैं। निषाद जातिकी स्त्रीका यदि वैदेहक जातिके पुरुषसे संसर्ग हो तो क्षुद्र, अन्ध्र और कारावर नामक जातिवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है। इनमेंसे क्षुद्र और अन्ध्र तो गाँवसे बाहर रहते हैं और जंगली पशुओंकी हिंसा करके जीविका चलाते हैं तथा कारावर मृत पशुओंके चमड़ेका कारबार करता है। इसलिये चर्मकार या चमार कहलाता है ।। २५ ½ ।। चाण्डालात् पाण्डुसौपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।। २६ ।। आहिण्डको निषादेन वैदेह्यां सम्प्रसूयते । चण्डालेन तु सौपाकश्चण्डालसमवृत्तिमान् ।। २७ ।। चाण्डाल पुरुष और निषाद जातिकी स्त्रीके संयोगसे पाण्डुसौपाक जातिका जन्म होता है। यह जाति बाँसकी डलिया आदि बनाकर जीविका चलाती है। वैदेह जातिकी स्त्रीके साथ निषादका सम्पर्क होनेपर आहिण्डकका जन्म होता है, किंतु वही स्त्री जब

चाण्डालके साथ सम्पर्क करती है तब उससे सौपाककी उत्पत्ति होती है। सौपाककी जीविका-वृत्ति चाण्डालके ही तुल्य है ।। २६-२७ ।।

निषादी चापि चाण्डालात् पुत्रमन्तेवसायिनम् । श्मशानगोचरं सूते बाह्यैरपि बहिष्कृतम् ।। २८ ।। निषाद जातिकी स्त्रीमें चाण्डालके वीर्यसे अन्तेवसायीका जन्म होता है। इस जातिके लोग सदा श्मशानमें ही रहते हैं। निषाद आदि बाह्यजातिके लोग भी उसे बहिष्कृत या अछूत समझते हैं ।। २८ ।।

इत्येते संकरे जाताः पितृमातृव्यतिक्रमात् । प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ।। २९ ।। इस प्रकार माता-पिताके व्यतिक्रम (वर्णान्तरके संयोग)-से ये वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न होती हैं। इनमेंसे कुछकी जातियाँ तो प्रकट होती हैं और कुछकी गुप्त। इन्हें इनके कर्मोंसे ही पहचानना चाहिये ।। २९ ।।

चतुर्णामेव वर्णानां धर्मो नान्यस्य विद्यते । वर्णानां धर्महीनेषु संख्या नास्तीह कस्यचित् ।। ३० ।। शास्त्रोंमें चारों वर्णोंके धर्मोंका निश्चय किया गया है औरोंके नहीं। धर्महीन वर्णसंकर जातियोंमेंसे किसीके वर्णसम्बन्धी भेद और उपभेदोंकी भी यहाँ कोई नियत संख्या नहीं है ।। ३० ।।

यदृच्छयोपसम्पन्नैर्यज्ञसाधुबहिष्कृतैः । बाह्या बाह्यैश्च जायन्ते यथावृत्ति यथाश्रयम् ।। ३१ ।। जो जातिका विचार न करके स्वेच्छानुसार अन्य वर्णकी स्त्रियोंके साथ समागम करते हैं तथा जो यज्ञोंके अधिकार और साधु पुरुषोंसे बहिष्कृत हैं, ऐसे वर्णबाह्य मनुष्योंसे ही वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होती हैं और वे अपनी रुचिके अनुकूल कार्य करके भिन्न-भिन्न प्रकारकी आजीविका तथा आश्रयको अपनाती हैं ।। ३१ ।।

चतुष्पथश्मशानानि शैलांश्चान्यान् वनस्पतीन् । कार्ष्णायसमलंकारं परिगृह्य च नित्यशः ।। ३२ ।। ऐसे लोग सदा लोहेके आभूषण पहनकर चौराहोंमें, मरघटमें, पहाड़ोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं ।। ३२ ।।

वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः । युञ्जन्तो वाप्यलंकारांस्तथोपकरणानि च ।। ३३ ।। इन्हें चाहिये कि गहने तथा अन्य उपकरणोंको बनायें तथा अपने उद्योग-धंधोंसे जीविका चलाते हुए प्रकटरूपसे निवास करें ।। ३३ ।।

गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः । आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा ।। ३४ ।।

स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम्। भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः॥ ३५॥ पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है—इसमें संशय नहीं है॥ ३४-३५॥

यथोपदेशं परिकीर्तितासु नरः प्रजायेत विचार्य बुद्धिमान्। निहीनयोनिर्हि सुतोऽवसादयेत् तितीर्षमाणं हि यथोपलो जले॥ ३६॥ राजन्! जैसा ऋषि-मुनियोंने उपदेश किया है, उसके अनुसार बतायी हुई वर्ण एवं बाह्यजातिकी स्त्रियोंमें बुद्धिमान् मनुष्यको अपने हिताहितका भलीभाँति विचार करके ही संतान उत्पन्न करनी चाहिये; क्योंकि नीच योनिमें उत्पन्न हुआ पुत्र भवसागरसे पार जानेकी इच्छावाले पिताको उसी प्रकार डुबोता है, जैसे गलेमें बँधा हुआ पत्थर तैरनेवाले मनुष्यको पानीके अतलगर्तमें निमग्न कर देता है॥ ३६॥

अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः। नयन्ति ह्यपथं नार्यः कामक्रोधवशानुगम्॥ ३७॥ संसारमें कोई मूर्ख हो या विद्वान्, काम और क्रोधके वशीभूत हुए मनुष्यको नारियाँ अवश्य ही कुमार्गपर पहुँचा देती हैं॥ ३७॥

स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम्। अत्यर्थं न प्रसज्जन्ते प्रमदासु विपश्चितः॥ ३८॥ इस जगत्में मनुष्योंको कलंकित कर देना नारियोंका स्वभाव है; अतः विवेकी पुरुष युवती स्त्रियोंमें अधिक आसक्त नहीं होते हैं॥ ३८॥

युधिष्ठिर उवाच

वर्णापेतमविज्ञाय नरं कलुषयोनिजम्। आर्यरूपमिवानार्यं कथं विद्यामहे वयम्॥ ३९॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! जो चारों वर्णोंसे बहिष्कृत, वर्णसंकर मनुष्यसे उत्पन्न और अनार्य होकर भी ऊपरसे देखनेमें आर्य-सा प्रतीत हो रहा हो उसे हमलोग कैसे पहचान सकते हैं?॥ ३९॥

भीष्म उवाच

योनिसंकलुषे जातं नानाभावसमन्वितम्। कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेया योनिशुद्धता॥ ४०॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो कलुषित योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह ऐसी नाना प्रकारकी चेष्टाओंसे युक्त होता है, जो सत्पुरुषोंके आचारसे विपरीत हैं; अतः उसके कर्मोंसे ही उसकी पहचान होती है। इसी प्रकार सज्जनोचित आचरणोंसे योनिकी शुद्धताका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। ४० ।।
अनार्यत्वमनाचारः क्रूरत्वं निष्क्रियात्मता ।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ।। ४१ ।।
इस जगत्में अनार्यता, अनाचार, क्रूरता और अकर्मण्यता आदि दोष मनुष्यको कलुषित योनिसे उत्पन्न (वर्णसंकर) सिद्ध करते हैं ।। ४१ ।।
पित्र्यं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभयम् ।
न कथंचन संकीर्णः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ।। ४२ ।।
वर्णसंकर पुरुष अपने पिता या माताके अथवा दोनोंके ही स्वभावका अनुसरण करता है। वह किसी तरह अपनी प्रकृतिको छिपा नहीं सकता ।। ४२ ।।
यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोर्हि जायते ।
व्याघ्रश्चित्रैस्तथा योनिं पुरुषः स्वां नियच्छति ।। ४३ ।।
जैसे बाघ अपनी चित्र-विचित्र खाल और रूपके द्वारा माता-पिताके समान ही होता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी योनिका ही अनुसरण करता है ।। ४३ ।।
कुले स्रोतसि संच्छन्ने यस्य स्याद् योनिसंकरः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमथवा बहु ।। ४४ ।।
यद्यपि कुल और वीर्य गुप्त रहते हैं अर्थात् कौन किस कुलमें और किसके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, यह बात ऊपरसे प्रकट नहीं होती है तो भी जिसका जन्म संकर-योनिसे हुआ है, वह मनुष्य थोड़ा-बहुत अपने पिताके स्वभावका आश्रय लेता ही है ।। ४४ ।।
आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि ।
सुवर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चये ।। ४५ ।।
जो कृत्रिम मार्गका आश्रय लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुरूप आचरण करता है, वह सोना है या काँच—शुद्ध वर्णका है या संकर वर्णका? इसका निश्चय करते समय उसका स्वभाव ही सब कुछ बता देता है ।। ४५ ।।
नानावृत्तेषु भूतेषु नानाकर्मरतेषु च ।
जन्मवृत्तसमं लोके सुश्लिष्टं न विरज्यते ।। ४६ ।।
संसारके प्राणी नाना प्रकारके आचार-व्यवहारमें लगे हुए हैं, भाँति-भाँतिके कर्मोंमें तत्पर हैं; अतः आचरणके सिवा ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो जन्मके रहस्यको साफ तौरपर प्रकट कर सके ।। ४६ ।।
शरीरमिह सत्त्वेन न तस्य परिकृष्यते ।
ज्येष्ठमध्यावरं सत्त्वं तुल्यसत्त्वं प्रमोदते ।। ४७ ।।

वर्णसंकरको शास्त्रीय बुद्धि प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके शरीरको स्वभावसे नहीं हटा सकती। उत्तम, मध्यम या निकृष्ट जिस प्रकारके स्वभावसे उसके शरीरका निर्माण हुआ है, वैसा ही स्वभाव उसे आनन्ददायक जान पड़ता है ॥ ४७ ॥

ज्यायांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजयेत् ।
अपि शूद्रं च धर्मज्ञं सद्वृत्तमभिपूजयेत् ॥ ४८ ॥
ऊँची जातिका मनुष्य भी यदि उत्तम शील अर्थात् आचरणसे हीन हो तो उसका सत्कार न करे और शूद्र भी यदि धर्मज्ञ एवं सदाचारी हो तो उसका विशेष आदर करना चाहिये ॥ ४८ ॥

आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः
सुशीलचारित्रकुलैः शुभाशुभैः ।
प्रणष्टमप्याशु कुलं तथा नरः
पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मतः ॥ ४९ ॥
मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील, आचरण और कुलके द्वारा अपना परिचय देता है। यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मोंद्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाशमें ला देता है ॥ ४९ ॥

योनिष्वेतासु सर्वासु संकीर्णास्वितरासु च ।
यत्रात्मानं न जनयेद् बुधस्तां परिवर्जयेत् ॥ ५० ॥
इन सभी ऊपर बतायी हुई नीच योनियोंमें तथा अन्य नीच जातियोंमें भी विद्वान् पुरुषको सन्तानोत्पत्ति नहीं करनी चाहिये। उनका सर्वथा परित्याग करना ही उचित है ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे वर्णसंकरकथने अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें वर्णसंकरकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

ब्रूहि तात कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पृथक् पृथक् ।
कीदृश्यां कीदृशाश्चापि पुत्राः कस्य च के च ते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! कुरुश्रेष्ठ! आप वर्णोंके सम्बन्धमें पृथक्-पृथक् यह बताइये कि कैसी स्त्रीके गर्भसे कैसे पुत्र उत्पन्न होते हैं? और कौन-से पुत्र किसके होते हैं? ॥ १ ॥

विप्रवादाः सुबहवः श्रूयन्ते पुत्रकारिताः ।
अत्र नो मुह्यतां राजन् संशयं छेत्तुमर्हसि ॥ २ ॥
पुत्रोंके निमित्त बहुत-सी विभिन्न बातें सुनी जाती हैं। राजन्! इस विषयमें हम मोहित होनेके कारण कुछ निश्चय नहीं कर पाते; अतः आप हमारे इस संशयका निवारण करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

आत्मा पुत्रश्च विज्ञेयस्तस्यानन्तरजश्च यः ।
निरुक्तजश्च विज्ञेयः सुतः प्रसृतजस्तथा ॥ ३ ॥
**भीष्मने कहा—**जहाँ पति-पत्नीके संयोगमें किसी तीसरेका व्यवधान नहीं है अर्थात् जो पतिके वीर्यसे ही उत्पन्न हुआ है, उस ‘अनन्तरज’ अर्थात् ‘औरस’ पुत्रको अपना आत्मा ही समझना चाहिये। दूसरा पुत्र ‘निरुक्तज’ होता है। तीसरा ‘प्रसृतज’ होता है (निरुक्तज और प्रसृतज दोनों क्षेत्रजके ही दो भेद हैं) ॥ ३ ॥

पतितस्य तु भार्याया भर्त्रा सुसमवेतया ।
तथा दत्तकृतौ पुत्रावध्यूढश्च तथापरः ॥ ४ ॥
पतित पुरुषका अपनी स्त्रीके गर्भसे स्वयं ही उत्पन्न किया हुआ पुत्र चौथी श्रेणीका पुत्र है। इसके सिवा ‘दत्तक’ और ‘क्रीत’ पुत्र भी होते हैं। ये कुल मिलाकर छः हुए। सातवाँ है ‘अध्यूढ’ पुत्र (जो कुमारी-अवस्थामें ही माताके पेटमें आ गया और विवाह करनेवालेके घरमें आकर जिसका जन्म हुआ) ॥

षडपध्वंसजाश्चापि कानीनापसदास्तथा ।
इत्येते वै समाख्यातास्तान् विजानीहि भारत ॥ ५ ॥
आठवाँ ‘कानीन’ पुत्र होता है। इनके अतिरिक्त छः ‘अपध्वंसज’ (अनुलोम) पुत्र होते हैं तथा छः ‘अपसद’ (प्रतिलोम) पुत्र होते हैं। इस तरह इन सबकी संख्या बीस हो जाती है।

भारत! इस प्रकार ये पुत्रोंके भेद बताये गये। तुम्हें इन सबको पुत्र ही जानना चाहिये॥ ५॥

युधिष्ठिर उवाच

षडपध्वंसजाः के स्युः के वाप्यपसदास्तथा।
एतत् सर्वं यथातत्त्वं व्याख्यातुं मे त्वमर्हसि॥ ६॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दादाजी! छः प्रकारके अपध्वंसज पुत्र कौन-से हैं तथा अपसद किन्हें कहा गया है? यह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये॥ ६॥

भीष्म उवाच

त्रिषु वर्णेषु ये पुत्रा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर।
वर्णयोश्च द्वयोः स्यातां यौ राजन्यस्य भारत॥ ७॥
एको विड्वर्ण एवाथ तथात्रैवोपलक्षितः।
षडपध्वंसजास्ते हि तथैवासपदान् शृणु॥ ८॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! ब्राह्मणके क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन तीन वर्णोंकी स्त्रियोंसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं वे तीन प्रकारके अपध्वंसज कहे गये हैं। भारत! क्षत्रियके वैश्य और शूद्र जातिकी स्त्रियोंसे जो पुत्र होते हैं वे दो प्रकारके अपध्वंसज हैं, तथा वैश्यके शूद्र-जातिकी स्त्रीसे जो पुत्र होता है वह भी एक अपध्वंसज है। इन सबका इसी प्रकरणमें दिग्दर्शन कराया गया है। इस प्रकार ये छः अपध्वंसज अर्थात् अनुलोम पुत्र कहे गये हैं। अब 'अपसद अर्थात् प्रतिलोम' पुत्रोंका वर्णन सुनो॥ ७-८॥

चाण्डालो व्रात्यवैद्यौ च ब्राह्मण्यां क्षत्रियासु च।
वैश्यायां चैव शूद्रस्य लक्ष्यन्तेऽपसदास्त्रयः॥ ९॥
ब्राह्मणी, क्षत्रिया तथा वैश्या—इन वर्णकी स्त्रियोंके गर्भसे शूद्रद्वारा जो पुत्र उत्पन्न किये जाते हैं, वे क्रमशः चाण्डाल, व्रात्य और वैद्य कहलाते हैं। ये अपसदोंके तीन भेद हैं॥ ९॥

मागधो वामकश्चैव द्वौ वैश्यस्योपलक्षितौ।
ब्राह्मण्यां क्षत्रियायां च क्षत्रियस्यैक एव तु॥ १०॥
ब्राह्मण्यां लक्ष्यते सूत इत्येतेऽपसदाः स्मृताः।
पुत्रा ह्येते न शक्यन्ते मिथ्याकर्तुं नराधिप॥ ११॥
ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे वैश्यद्वारा जो पुत्र उत्पन्न किये जाते हैं, वे क्रमशः मागध और वामक नामवाले दो प्रकारके अपसद देखे गये हैं। क्षत्रियके एक ही वैसा पुत्र देखा जाता है, जो ब्राह्मणीसे उत्पन्न होता है। उसकी सूत संज्ञा है। ये छः अपसद अर्थात् प्रतिलोम पुत्र माने गये हैं। नरेश्वर! इन पुत्रोंको मिथ्या नहीं बताया जा सकता॥ १०-११॥

युधिष्ठिर उवाच

क्षेत्रजं केचिदेवाहुः सुतं केचित्तु शुक्रजम् ।
तुल्यावेतौ सुतौ कस्य सन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! कुछ लोग अपनी पत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुए किसी भी प्रकारके पुत्रको अपना ही पुत्र मानते हैं और कुछ लोग अपने वीर्यसे उत्पन्न हुए पुत्रको ही सगा पुत्र समझते हैं क्या ये दोनों समान कोटिके पुत्र हैं? इनपर किसका अधिकार है? इन्हें जन्म देनेवाली स्त्रीके पतिका या गर्भाधान करनेवाले पुरुषका? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

रेतजो वा भवेत् पुत्रस्त्यक्तो वा क्षेत्रजो भवेत् ।
अड्यूढः समयं भित्त्वेत्येतदेव निबोध मे ॥ १३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! अपने वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र तो सगा पुत्र है ही, क्षेत्रज पुत्र भी यदि गर्भस्थापन करनेवाले पिताके द्वारा छोड़ दिया गया हो तो वह अपना ही होता है। यही बात समय-भेदन करके अध्यूढ पुत्रके विषयमें भी समझनी चाहिये। तात्पर्य यह कि वीर्य डालनेवाले पुरुषने यदि अपना स्वत्व हटा लिया हो तब तो वे क्षेत्रज और अध्यूढ पुत्र क्षेत्रपतिके ही माने जाते हैं। अन्यथा उनपर वीर्यदाताका ही स्वत्व है ॥ १३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

रेतजं विद्म वै पुत्रं क्षेत्रजस्यागमः कथम् ।
अड्यूढं विद्म वै पुत्रं भित्त्वा तु समयं कथम् ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! हम तो वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले पुत्रको ही पुत्र समझते हैं। वीर्यके बिना क्षेत्रज पुत्रका आगमन कैसे हो सकता है? तथा अध्यूढको हम किस प्रकार समय-भेदन करके पुत्र समझें? ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच

आत्मजं पुत्रमुत्पाद्य यस्त्यजेत् कारणान्तरे ।
न तत्र कारणं रेतः स क्षेत्रस्वामिनो भवेत् ॥ १५ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! जो लोग अपने वीर्यसे पुत्र उत्पन्न करके अन्यान्य कारणोंसे उसका परित्याग कर देते हैं, उनका उसपर केवल वीर्यस्थापनके कारण अधिकार नहीं रह जाता। वह पुत्र उस क्षेत्रके स्वामीका हो जाता है ॥ १५ ॥

पुत्रकामो हि पुत्रार्थे यां वृणीते विशाम्पते ।
क्षेत्रजं तु प्रमाणं स्यान्न वै तत्रात्मजः सुतः ॥ १६ ॥
प्रजानाथ! पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष पुत्रके लिये ही जिस गर्भवती कन्याको भार्यारूपसे ग्रहण करता है, उसका क्षेत्रज पुत्र उस विवाह करनेवाले पतिका ही माना जाता है। वहाँ गर्भ-स्थापन करनेवालेका अधिकार नहीं रह जाता है ॥ १६ ॥

अन्यत्र क्षेत्रजः पुत्रो लक्ष्यते भरतर्षभ ।
न ह्यात्मा शक्यते हन्तुं दृष्टान्तोपगतो ह्यसौ ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! दूसरेके क्षेत्रमें उत्पन्न हुआ पुत्र विभिन्न लक्षणोंसे लक्षित हो जाता है कि किसका पुत्र है। कोई भी अपनी असलियतको छिपा नहीं सकता, वह स्वतः प्रत्यक्ष हो जाती है ।। १७ ।।
क्वचिच्च कृतकः पुत्रः संग्रहादेव लक्ष्यते ।
न तत्र रेतः क्षेत्रं वा यत्र लक्ष्येत भारत ।। १८ ।।
भरतनन्दन! कहीं-कहीं कृत्रिम पुत्र भी देखा जाता है। वह ग्रहण करने या अपना मान लेने मात्रसे ही अपना हो जाता है। वहाँ वीर्य या क्षेत्र कोई भी उसके पुत्रत्व-निश्चयमें कारण होता दिखायी नहीं देता ।।

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशः कृतकः पुत्रः संग्रहादेव लक्ष्यते ।
शुक्रं क्षेत्रं प्रमाणं वा यत्र लक्ष्यं न भारत ।। १९।
युधिष्ठिरने पूछा—भारत! जहाँ वीर्य या क्षेत्र पुत्रत्वके निश्चयमें प्रमाण नहीं देखा जाता, जो संग्रह करने मात्रसे ही अपने पुत्रके रूपमें दिखायी देने लगता है वह कृत्रिम पुत्र कैसा होता है? ।। १९ ।।

भीष्म उवाच

मातापितृभ्यां यस्त्यक्तः पथि यस्तं प्रकल्पयेत् ।
न चास्य मातापितरौ ज्ञायेतां स हि कृत्रिमः ।। २० ।।
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! माता-पिताने जिसे रास्तेपर त्याग दिया हो और पता लगानेपर भी जिसके माता-पिताका ज्ञान न हो सके, उस बालकका जो पालन करता है, उसीका वह कृत्रिम पुत्र माना जाता है ।। २० ।।
अस्वामिकस्य स्वामित्वं यस्मिन् सम्प्रति लक्ष्यते ।
यो वर्णः पोषयेत् तं च तद्वर्णस्तस्य जायते ।। २१ ।।
वर्तमान समयमें जो उस अनाथ बच्चेका स्वामी दिखायी देता है और उसका पालन-पोषण करता है, उसका जो वर्ण है, वही उस बच्चेका भी वर्ण हो जाता है ।। २१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

कथमस्य प्रयोक्तव्यः संस्कारः कस्य वा कथम् ।
देया कन्या कथं चेति तन्मे ब्रूहि पितामह ।। २२ ।।
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! ऐसे बालकका संस्कार कैसे और किस जातिके अनुसार करना चाहिये? तथा वास्तवमें वह किस वर्णका है, यह कैसे जाना जाय? एवं किस तरह

और किस जातिकी कन्याके साथ उसका विवाह करना चाहिये? यह मुझे बताइये ।। २२ ।।

भीष्म उवाच

आत्मवत् तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत् तथा ।
त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्णं प्रतिपद्यते ।। २३ ।।
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! जिसको माता-पिताने त्याग दिया है, वह अपने स्वामी (पालक) पिताके वर्णको प्राप्त होता है। इसलिये उसके पालन करनेवालेको चाहिये कि वह अपने ही वर्णके अनुसार उसका संस्कार करे ।। २३ ।।
तद्गोत्रबन्धुजं तस्य कुर्यात् संस्कारमच्युत ।
अथ देया तु कन्या स्यात् तद्वर्णस्य युधिष्ठिर ।। २४ ।।
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! पालक पिताके सगोत्र बन्धुओंका जैसा संस्कार होता हो वैसा ही उसका भी करना चाहिये, तथा उसी वर्णकी कन्याके साथ उसका विवाह भी कर देना चाहिये ।। २४ ।।
संस्कर्तुं वर्णगोत्रं च मातृवर्णविनिश्चये ।
कानीनाड्यूढजौ वापि विज्ञेयौ पुत्र किल्बिषौ ।। २५ ।।
बेटा! यदि उसकी माताके वर्ण और गोत्रका निश्चय हो जाय तो उस बालकका संस्कार करनेके लिये माताके ही वर्ण और गोत्रको ग्रहण करना चाहिये। कानीन और अध्यूढज—ये दोनों प्रकारके पुत्र निकृष्ट श्रेणीके ही समझे जाने योग्य हैं ।। २५ ।।
तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चयः ।
क्षेत्रजो वाप्यपसदो येऽड्यूढास्तेषु चाप्युत ।। २६ ।।
आत्मवद् वै प्रयुञ्जीरन् संस्कारान् ब्राह्मणादयः ।
धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चयोऽयं प्रदृश्यते ।। २७ ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। २८ ।।
इन दोनों प्रकारके पुत्रोंका भी अपने ही समान संस्कार करे—ऐसा शास्त्रका निश्चय है। ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वे क्षेत्रज, अपसद तथा अध्यूढ—इन सभी प्रकारके पुत्रोंका अपने ही समान संस्कार करें। वर्णोंके संस्कारके सम्बन्धमें धर्मशास्त्रोंका ऐसा ही निश्चय देखा जाता है। इस प्रकार मैंने ये सारी बातें तुम्हे बतायीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। २६—२८ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे पुत्रप्रतिनिधिकथने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें पुत्रप्रतिनिधिकथनविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४९ ।।

गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना

युधिष्ठिर उवाच

दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह ।
महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किसीको देखने और उसके साथ रहनेपर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओंका माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते ।
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**महातेजस्वी नरेश! इस विषयमें मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुषके संवादरूप प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा ॥ २ ॥

पुरा महर्षिश्च्यवनो भार्गवो भरतर्षभ ।
उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रतः ॥ ३ ॥

भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनने महान् व्रतका आश्रय ले जलके भीतर रहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

निहत्य मानं क्रोधं च प्रहर्षं शोकमेव च ।
वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रतः ॥ ४ ॥

वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोकका परित्याग करके दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए बारह वर्षों-तक जलके भीतर रहे ॥ ४ ॥

आदधत् सर्वभूतेषु विश्रम्भं परमं शुभम् ।
जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ॥ ५ ॥

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके समान उन शक्तिशाली मुनिने सम्पूर्ण प्राणियों, विशेषतः सारे जलचर जीवोंपर अपना परम मंगलकारी पूर्ण विश्वास जमा लिया था ॥ ५ ॥

स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च ।
गंगायमुनोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ॥ ६ ॥

एक समय वे देवताओंको प्रणामकर अत्यन्त पवित्र होकर गंगा-यमुनाके संगममें जलके भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ काष्ठकी भाँति स्थिर भावसे बैठ गये ।। ६ ।।
गंगायमुनयोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् ।
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ।। ७ ।।
गंगा-यमुनाका वेग बड़ा भयंकर था। उससे भीषण गर्जना हो रही थी। वह वेग वायुवेगकी भाँति दुःसह था तो भी वे मुनि अपने मस्तकपर उसका आघात सहने लगे ।। ७ ।।
गंगा च यमुना चैव सरितश्च सरांसि च ।
प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन् ।। ८ ।।
परंतु गंगा-यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिकी केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाते थे ।। ८ ।।
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः ।
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद् भरतर्षभ ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! वे बुद्धिमान् महामुनि कभी पानीमें काठकी भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे ।। ९ ।।
जलौकसां स सत्त्वानां बभूव प्रियदर्शनः ।
उपाजिघ्रन्त च तदा तस्योष्ठं हृष्टमानसाः ।। १० ।।
वे जलचर जीवोंके बड़े प्रिय हो गये थे। जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे ।।
तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ।
ततः कदाचित् समये कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः ।। ११ ।।
तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ।
निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चयाः ।। १२ ।।
महातेजस्वी नरेश! इस तरह उन्हें पानीमें रहते बहुत दिन बीत गये। तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले बहुत-से मल्लाह मछली पकड़नेका निश्चय करके जाल हाथमें लिये हुए उस स्थानपर आये ।।
व्यायता बलिनः शूराः सलिलेष्वनिवर्तिनः ।
अभ्याययुश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ।। १३ ।।
वे मल्लाह बड़े परिश्रमी, बलवान्, शौर्यसम्पन्न और पानीसे कभी पीछे न हटनेवाले थे। वे जाल बिछानेका दृढ़ निश्चय करके उस स्थानपर आये थे ।। १३ ।।
जालं ते योजयामासुर्निःशेषेण जनाधिप ।
मत्स्योदकं समासाद्य तदा भरतसत्तम ।। १४ ।।

भरतवंशशिरोमणि नरेश! उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जलमें जाकर उन्होंने अपने जालको पूर्णरूपसे फैला दिया ॥ १४ ॥ ततस्ते बहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः। गङ्गायमुनयोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ॥ १५ ॥ मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत-से उपाय करके गंगा-यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥ जालं सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा। विस्तारायाम सम्पन्नं यत् तत्र सलिलेऽक्षिपन् ॥ १६ ॥ ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम्। अवतीर्य ततः सर्वे जालं चक्रुषिरे तदा ॥ १७ ॥ अभीतरूपाः संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिनः। बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्च तथान्यान् जलचारिणः ॥ १८ ॥ उनका वह जाल नये सूतका बना हुआ और विशाल था तथा उसकी लंबाई-चौड़ाई भी बहुत थी एवं वह अच्छी तरहसे बनाया हुआ और मजबूत था। उसीको उन्होंने वहाँ जलपर बिछाया था। थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानीमें उतर गये। वे सभी प्रसन्न और एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले थे। उन सबने मिलकर जालको खींचना आरम्भ किया। उस जालमें उन्होंने मछलियोंके साथ ही दूसरे जल-जन्तुओंको भी बाँध लिया था ॥ १६—१८ ॥ तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम्। आकर्षन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया ॥ १९ ॥ महाराज! जाल खींचते समय मल्लाहोंने दैवेच्छासे उस जालके द्वारा मत्स्योंसे घिरे हुए भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनको भी खींच लिया ॥ १९ ॥ नदीशैवलदिग्धाङ्गं हरिमश्मश्रुजटाधरम्। लग्नैः शङ्खनखैर्गात्रे क्रोडैश्चित्रैरिवार्पितम् ॥ २० ॥ उनका सारा शरीर नदीके सेवारसे लिपटा हुआ था। उनकी मूँछ-दाढ़ी और जटाएँ हरे रंगकी हो गयी थीं और उनके अंगोंमें शंख आदि जलचरोंके नख लगनेसे चित्र बन गया था। ऐसा जान पड़ता था मानो उनके अंगोंमें शूकरके विचित्र रोम लग गये हों ॥ २० ॥ तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम्। सर्वे प्राञ्जलयो दाशाः शिरोभिः प्रापतन् भुवि ॥ २१ ॥ वेदोंके पारंगत उन विद्वान् महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये ॥ २१ ॥ परिखेदपरित्रासाज्जालस्याकर्षणेन च। मत्स्या बभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसंस्पर्शनेन च ॥ २२ ॥

स मुनिस्तत् तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् ।
बभूव कृपयाविष्टो निःश्वसंश्च पुनः पुनः ॥ २३ ॥
उधर जालके आकर्षणसे अत्यन्त खेद, त्रास और स्थलका संस्पर्श होनेके कारण बहुत-से मत्स्य मर गये। मुनिने जब मत्स्योंका यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे ॥ २२-२३ ॥

निषादा ऊचुः

अज्ञानाद् यत् कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु ।
करवाम प्रियं किं ते तन्नो ब्रूहि महामुने ॥ २४ ॥
**यह देख निषाद बोले—**महामुने! हमने अनजानमें जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हमपर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हमलोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें? ॥ २४ ॥

इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्च्यवनोवाक्यमब्रवीत् ।
यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ॥ २५ ॥
मल्लाहोंके ऐसा कहनेपर मछलियोंके बीचमें बैठे हुए महर्षि च्यवनने कहा—‘मल्लाहो! इस समय जो मेरी सबसे बड़ी इच्छा है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २५ ॥

प्राणोत्सर्गं विसर्गं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह ।
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेऽध्युषितानहम् ॥ २६ ॥
‘मैं इन मछलियोंके साथ ही अपने प्राणोंका त्याग या रक्षण करूँगा। ये मेरे सहवासी रहे हैं। मैं बहुत दिनोंतक इनके साथ जलमें रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता’ ॥ २६ ॥