महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
स्वं स्वं धिष्ण्यं चैव जुषन्तु देवा हुतं सोमं प्रतिगृह्णन्तु चैव ॥ १८ ॥ मरुत्तने कहा— ब्रह्मर्षे! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे साक्षात् इन्द्र मेरे यज्ञमें शीघ्रतापूर्वक पधारें और अपना हविष्य-भाग ग्रहण करें। साथ ही अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानपर आकर बैठ जायँ और सब लोग एक साथ आहुतिरूपमें प्राप्त हुए सोमरसका पान करें ॥ १८ ॥
संवर्त उवाच
अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन् देवैः सर्वैस्त्वरितैः स्तूयमानः । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम् ॥ १९ ॥ (तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा— राजन्! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं। मैंने मन्त्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है। देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है ॥ १९ ॥
ततो देवैः सहितो देवराजो रथे युङ्क्त्वा तान् हरीन् वाजिमुख्यान् । आयाद् यज्ञमथ राज्ञः पिपासु- रावेक्षितस्याप्रमेयस्य सोमम् ॥ २० ॥ तत्पश्चात् देवराज इन्द्र अपने रथमें उन सफेद रंगके अच्छे घोड़ोंको जोतकर देवताओंको साथ ले सोमपानकी इच्छासे अनुपम पराक्रमी राजा मरुत्तकी यज्ञशालामें आ पहुँचे ॥ २० ॥
तमायान्तं सहितं देवसंघैः प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः । चक्रे पूजां देवराजाय चाग्र्यां यथाशास्त्रं विधिवत् प्रीयमाणः ॥ २१ ॥ देववृन्दके साथ इन्द्रको आते देख राजा मरुत्तने अपने पुरोहित संवर्त मुनिके साथ आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और बड़ी प्रसन्नताके साथ शास्त्रीय विधिसे उनका अग्रपूजन किया ॥ २१ ॥
संवर्त उवाच
स्वागतं ते पुरुहूतेह विद्वन् यज्ञोऽप्ययं संनिहिते त्वयीन्द्र ।
शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूयः पिबस्व सोमं सुतमुद्यतं मया ॥ २२ ॥
संवर्तने कहा—पुरुहूत इन्द्र! आपका स्वागत है। विद्वन्! आपके यहाँ पधारनेसे इस यज्ञकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मेरेद्वारा तैयार किया हुआ यह सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान कीजिये ॥ २२ ॥
मरुत्त उवाच
शिवेन मां पश्य नमश्च तेऽस्तु प्राप्तो यज्ञः सफलं जीवितं मे । अयं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र बृहस्पतेरवरजो विप्रमुख्यः ॥ २३ ॥
मरुत्तने कहा—सुरेन्द्र! आपको नमस्कार है। आप मुझे कल्याणमयी दृष्टिसे देखिये। आपके पदार्पणसे मेरा यज्ञ और जीवन सफल हो गया। बृहस्पतिजीके छोटे भाई ये विप्रवर संवर्तजी मेरा यज्ञ करा रहे हैं ॥ २३ ॥
इन्द्र उवाच
जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् । यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र प्रीतिर्मेऽद्य त्वयि मन्युः प्रणष्टः ॥ २४ ॥
इन्द्रने कहा—नरेन्द्र! आपके इन गुरुदेवको मैं जानता हूँ। ये बृहस्पतिजीके छोटे भाई और तपस्याके धनी हैं। इनका तेज दुःसह है। इन्हींके आवाहनसे मुझे आना पड़ा है। अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ और मेरा सारा क्रोध दूर हो गया है ॥ २४ ॥
संवर्त उवाच
यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम् । स्वयं सर्वान् कुरु भागान् सुरेन्द्र जानात्वयं सर्वलोकश्च देव ॥ २५ ॥
संवर्तने कहा—देवराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञमें जो-जो कार्य आवश्यक है, उसका स्वयं ही उपदेश दीजिये तथा सुरेन्द्र! स्वयं ही सब देवताओंके भाग निश्चित कीजिये। देव! यहाँ आये हुए सब लोग आपकी प्रसन्नताका प्रत्यक्ष अनुभव करें ॥ २५ ॥
व्यास उवाच
एवमुक्तस्त्वाङ्गिरसेन शक्रः
समादिदेश स्वयमेव देवान् । सभाः क्रियन्तामावसथाश्च मुख्याः सहस्रशश्चित्रभूताः समृद्धाः ॥ २६ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! संवर्तके यों कहनेपर इन्द्रने स्वयं ही सब देवताओंको आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग अत्यन्त समृद्ध एवं चित्र-विचित्र ढंगके हजारों अच्छे सभा-भवन बनाओ ॥ २६ ॥
क्लृप्ताः स्थूणाः कुरुतारोहणानि गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम् । यत्र नृत्येन्नप्सरसः समस्ताः स्वर्गोपमः क्रियतां यज्ञवाटः ॥ २७ ॥ 'गन्धर्वों और अप्सराओंके लिये ऐसे रंगमण्डपका निर्माण करो, जिसमें बहुत-से सुन्दर स्तम्भ लगे हों। उनके रंगमंचपर चढ़नेके लिये बहुत-सी सीढ़ियाँ बना दो। यह सब कार्य शीघ्र हो जाना चाहिये। यह यज्ञशाला स्वर्गके समान सुन्दर एवं मनोहर बना दो। जिसमें सारी अप्सराएँ नृत्य कर सकें' ॥ २७ ॥
इत्युक्तास्ते चक्रुराशु प्रतीता दिवौकसः शक्रवाक्यान्ररेन्द्र । ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः प्रीतो राजन् पूज्यमानो मरुत्तम् ॥ २८ ॥ नरेन्द्र! देवराजके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवताओंने संतुष्ट होकर उनकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही सबका निर्माण किया। राजन्! तत्पश्चात् पूजित एवं संतुष्ट हुए इन्द्रने राजा मरुत्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २८ ॥
एष त्वयाहमिह राजन् समेत्य ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वांश्चान्या देवताः प्रीयमाणा हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ॥ २९ ॥ 'राजन्! यह मैं यहाँ आकर तुमसे मिला हूँ। नरेन्द्र! तुम्हारे जो अन्यान्य पूर्वज हैं, वे तथा अन्य सब देवता भी यहाँ प्रसन्नतापूर्वक पधारे हैं। राजन्! ये सब लोग तुम्हारा दिया हुआ हविष्य ग्रहण करेंगे ॥ २९ ॥
आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन् । नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्यालभन्तां चलच्छिश्नं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्रयाः ॥ ३० ॥
'राजेन्द्र! अग्निके लिये लाल रंगकी वस्तुएँ प्रस्तुत की जायें, विश्वेदेवोंके लिये अनेक रूप-रंगवाले पदार्थ दिये जायें, श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ छूकर दिये गये चंचल शिश्नवाले नील रंगके वृषभका दान ग्रहण करें'। । ३० ।। ततो यज्ञो ववृधे तस्य राजन् यत्र देवाः स्वयमन्नानि जह्रुः । यस्मिन् शक्रो ब्राह्मणैः पूज्यमानः सदस्योऽभूद्धरिमान् देवराजः ।। ३१ ।। नरेश्वर! तदनन्तर राजा मरुत्तके यज्ञका कार्य आगे बढ़ा, जिसमें देवतालोग स्वयं ही अन्न परोसने लगे। ब्राह्मणोंद्वारा पूजित, उत्तम अश्वोंसे युक्त देवराज इन्द्र उस यज्ञमण्डपमें सदस्य बनकर बैठे थे ।। ३१ ।। ततः संवर्तश्चैत्यगतो महात्मा यथा वह्निः प्रज्वलितो द्वितीयः । हवींष्युच्चैराह्वयन् देवसंघान् जुहावाग्नौ मन्त्रवत् सुप्रीतः ।। ३२ ।। इसके बाद द्वितीय अग्निके समान तेजस्वी एवं यज्ञमण्डपमें बैठे हुए महात्मा संवर्तने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देववृन्दका उच्चस्वरसे आह्वान करते हुए मन्त्रपाठपूर्वक अग्निमें हविष्यका हवन किया ।। ३२ ।। ततः पीत्वा बलभित् सोममग्र्यं ये चाप्यन्ये सोमपा देवसंघाः । सर्वेऽनुज्ञाताः प्रययुः पार्थिवेन यथाजोषं तर्पिताः प्रीतिमन्तः ।। ३३ ।। तत्पश्चात् इन्द्र तथा सोमपानके अधिकारी अन्य देवताओंने उत्तम सोमरसका पान किया। इससे सबको तृप्ति एवं प्रसन्नता हुई। फिर सब देवता राजा मरुत्तकी अनुमति लेकर अपने-अपने स्थानको चले गये ।। ३३ ।। ततो राजा जातरूपस्य राशीन् पदे पदे कारयामास हृष्टः । द्विजातिभ्यो विसृजन् भूरि वित्तं रराज वित्तेश इवारिहन्ता ।। ३४ ।। तदनन्तर शत्रुहन्ता राजा मरुत्तने बड़े हर्षके साथ वहाँ ब्राह्मणोंको बहुत-से धनका दान करते हुए उनके लिये पग-पगपर सुवर्णके ढेर लगवा दिये। उस समय धनाध्यक्ष कुबेरके समान उनकी शोभा हो रही थी ।। ३४ ।। ततो वित्तं विविधं संनिधाय यथोत्साहं कारयित्वा च कोषम् ।
अनुज्ञातो गुरुणा संनिवृत्य शशास गामखिलां सागरान्ताम् ॥ ३५ ॥ इसके बाद ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो नाना प्रकारका धन बच गया, उसको मरुत्तने उत्साहपूर्वक कोष-स्थान बनवाकर उसीमें जमा कर दिया। फिर अपने गुरु संवर्तकी आज्ञा लेकर वे राजधानीको लौट आये और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य करने लगे ॥ ३५ ॥ एवंगुणः सम्बभूवेह राजा यस्य क्रतौ तत् सुवर्णं प्रभूतम् । तत् त्वं समादाय नरेन्द्र वित्तं यजस्व देवांस्तर्पयानो निवापैः ॥ ३६ ॥ नरेन्द्र! राजा मरुत्त ऐसे प्रभावशाली हुए थे। उनके यज्ञमें बहुत-सा सुवर्ण एकत्र किया गया था। तुम उसी धनको मँगवाकर यज्ञभागसे देवताओंको तृप्त करते हुए यजन करो ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो राजा पाण्डवो हृष्टरूपः श्रुत्वा वाक्यं सत्यवत्याः सुतस्य । मनश्चक्रे तेन वित्तेन यष्टुं ततोऽमात्यैर्मन्त्रयामास भूयः ॥ ३७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीके ये वचन सुनकर पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस धनके द्वारा यज्ञ करनेका विचार किया तथा इस विषयमें मन्त्रियोंके साथ बारंबार मन्त्रणा की ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्त्तमरुत्तीये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 1627)
एकादशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्ते नृपतौ तस्मिन् व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।
वासुदेवो महातेजास्ततो वचनमाददे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अद्भुत-कर्मा वेदव्यासजीने युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण कुछ कहनेको उद्यत हुए ॥ १ ॥
तं नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिबान्धवम् ।
उपप्लुतमिवादित्यं सधूममिव पावकम् ॥ २ ॥
निर्विण्णमनसं पार्थं ज्ञात्वा वृष्णिकुलोद्वहः ।
आश्वासयन् धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ३ ॥
जाति-भाइयोंके मारे जानेसे युधिष्ठिरका मन शोकसे दीन एवं व्याकुल हो रहा था। वे राहुग्रस्त सूर्य और धूमयुक्त अग्निके समान निस्तेज हो गये थे। विशेषतः उनका मन राज्यकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो गया था। यह सब जानकर वृष्णिवंशभूषण श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार धर्मपुत्र युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २-३ ॥
वासुदेव उवाच
सर्वं जिह्मं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मणः पदम् ।
एतावान् ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति ॥ ४ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**धर्मराज! कुटिलता मृत्युका स्थान है और सरलता ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन है। इस बातको ठीक-ठीक समझ लेना ही ज्ञानका विषय है। इसके विपरीत जो कुछ कहा जाता है, वह प्रलाप है। भला वह किसीका क्या उपकार करेगा? ॥ ४ ॥
नैव ते निष्ठितं कर्म नैव ते शत्रवो जिताः ।
कथं शत्रुं शरीरस्थमात्मनो नावबुध्यसे ॥ ५ ॥
आपने अपने कर्तव्यकर्मको पूरा नहीं किया। आपने अभीतक शत्रुओंपर विजय भी नहीं पायी। आपका शत्रु तो आपके शरीरके भीतर ही बैठा हुआ है। आप अपने उस शत्रुको क्यों नहीं पहचानते हैं? ॥ ५ ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथाधर्मं यथाश्रुतम् ।
इन्द्रस्य सह वृत्रेण यथा युद्धमवर्तत ॥ ६ ॥
यहाँ मैं आपके समक्ष धर्मके अनुसार एक वृत्तान्त जैसा सुन रखा है, वैसा ही बता रहा हूँ। पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ इन्द्रका जैसा युद्ध हुआ था, वही प्रसंग सुना रहा हूँ ॥ ६ ॥
वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप ।
दृष्ट्वा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषये हृते ॥ ७ ॥
धराहरणदुर्गन्धो विषयः समपद्यत ।
शतक्रतुश्चुकोपाथ गन्धस्य विषये हृते ॥ ८ ॥
नरेश्वर! कहते हैं, प्राचीन कालमें वृत्रासुरने समूची पृथ्वीपर अधिकार जमा लिया था। इन्द्रने देखा, वृत्रासुरने पृथ्वीपर अधिकार कर लिया और गन्धके विषयका भी अपहरण कर लिया और इस प्रकार पृथ्वीका अपहरण करनेसे सब ओर दुर्गन्धका प्रसार हो गया है। तब गन्धके विषयका अपहरण होनेसे शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ७-८ ॥
वृत्रस्य स ततः क्रुद्धो घोरं वज्रमवासृजत् ।
स वध्यमानो वज्रेण सुभृशं भूरितेजसा ॥ ९ ॥
विवेश सहसा तोयं जग्राह विषयं ततः ।
तत्पश्चात् उन्होंने कुपित हो वृत्रासुरके ऊपर घोर वज्रका प्रहार किया। महातेजस्वी वज्रसे अत्यन्त आहत हो वह असुर सहसा जलमें जा घुसा और उसके विषयभूत रसको ग्रहण करने लगा ॥ ९ १/२ ॥
अप्सु वृत्रगृहीतासु रसे च विषये हृते ॥ १० ॥
शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ।
जब जलपर भी वृत्रासुरका अधिकार तथा रसरूपी विषयका अपहरण हो गया, तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन्द्रने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया ॥ १० १/२ ॥
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ ११ ॥
विवेश सहसा ज्योतिर्जग्राह विषयं ततः ।
जलमें अमिततेजस्वी वज्रकी मार खाकर वृत्रासुर सहसा तेजस्तत्त्वमें घुस गया और उसके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ ११ १/२ ॥
व्याप्ते ज्योतिषि वृत्रेण रूपेऽथ विषये हृते ॥ १२ ॥
शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ।
वृत्रासुरके द्वारा तेजपर भी अधिकार कर लिया गया और उसके रूप नामक विषयका अपहरण हो गया, यह जानकर शतक्रतुके क्रोधकी सीमा न रह गयी। उन्होंने वहाँ भी वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार किया ॥ १२ १/२ ॥
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १३ ॥
विवेश सहसा वायुं जग्राह विषयं ततः ।
उस तेजमें स्थित हुआ वृत्रासुर अमिततेजस्वी वज्रके प्रहारसे पीड़ित हो सहसा वायुमें समा गया और उसके स्पर्श नामक विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १३ १/२ ॥
व्याप्ते वायौ तु वृत्रेण स्पर्शेऽथ विषये हृते ॥ १४ ॥
शतक्रतुरतिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ।
जब वृत्रासुरने वायुको भी व्याप्त करके उसके स्पर्श नामक विषयका अपहरण कर लिया, तब शतक्रतुने अत्यन्त कुपित होकर वहाँ उसके ऊपर अपना वज्र छोड़ दिया ॥ १४ १/२ ॥
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १५ ॥
आकाशमभिदुद्राव जग्राह विषयं ततः ।
वायुके भीतर अमित तेजस्वी वज्रसे पीड़ित हो वृत्रासुर भागकर आकाशमें जा छिपा और उसके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १५ १/२ ॥
आकाशे वृत्रभूतेऽथ शब्दे च विषये हृते ॥ १६ ॥
शतक्रतुरभिक्रुद्धस्तत्र वज्रमवासृजत् ।
जब आकाश वृत्रासुरमय हो गया और उसके शब्दरूपी विषयका अपहरण होने लगा, तब शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने वहाँ भी उसपर वज्रका प्रहार किया ॥ १६ १/२ ॥
स वध्यमानो वज्रेण तस्मिन्नमिततेजसा ॥ १७ ॥
विवेश सहसा शक्रं जग्राह विषयं ततः ।
आकाशके भीतर अमित तेजस्वी वज्रसे पीड़ित हो वृत्रासुर सहसा इन्द्रमें समा गया और उनके विषयको ग्रहण करने लगा ॥ १७ १/२ ॥
तस्य वृत्रगृहीतस्य मोहः समभवन्महान् ॥ १८ ॥
रथन्तरेण तं तात वसिष्ठः प्रत्यबोधयत् ।
तात! वृत्रासुरसे गृहीत होनेपर इन्द्रके मनपर महान् मोह छा गया। तब महर्षि वसिष्ठने रथन्तर सामके द्वारा उन्हें सचेत किया ॥ १८ १/२ ॥
ततो वृत्रं शरीरस्थं जघान भरतर्षभ ।
शतक्रतुरदृश्येन वज्रेणेतीह नः श्रुतम् ॥ १९ ॥
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् शतक्रतुने अपने शरीरके भीतर स्थित हुए वृत्रासुरको अदृश्य वज्रके द्वारा मार डाला ऐसा हमने सुना है ॥ १९ ॥
इदं धर्म्यं रहस्यं वै शक्रेणोक्तं महर्षिषु ।
ऋषिभिश्च मम प्रोक्तं तन्निबोध जनाधिप ॥ २० ॥
जनेश्वर! यह धर्मसम्मत रहस्य इन्द्रने महर्षियोंको बताया और महर्षियोंने मुझसे कहा। वही रहस्य मैंने आपको सुनाया है। आप इसे अच्छी तरह समझें ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1631)
द्वादशोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश
वासुदेव उवाच
द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा ।
परस्परं तयोर्जन्म निर्द्वन्द्वं नोपपद्यते ॥ १ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**कुन्तीनन्दन! दो प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं—एक शारीरिक दूसरा मानसिक। इन दोनोंका जन्म एक-दूसरेके सहयोगसे होता है। दोनोंके पारस्परिक सहयोगके बिना इनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है ॥ १ ॥
शरीरे जायते व्याधिः शारीरः स निगद्यते ।
मानसे जायते व्याधिर्मानसस्तु निगद्यते ॥ २ ॥
शरीरमें जो रोग उत्पन्न होता है, उसे शारीरिक रोग कहते हैं और मनमें जो व्याधि होती है, वह मानसिक रोग कहलाती है ॥ २ ॥
शीतोष्णे चैव वायुश्च गुणा राजन् शरीरजाः ।
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ॥ ३ ॥
राजन्! शीत, उष्ण और वायु—ये तीन शरीरके गुण हैं। यदि शरीरमें इन तीनों गुणोंकी समानता हो तो यह स्वस्थ पुरुषका लक्षण है ॥ ३ ॥
उष्णेन बाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च बाध्यते ।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति त्रय आत्मगुणाः स्मृताः ॥ ४ ॥
उष्ण शीतका निवारण करता और शीत उष्णका निवारण करता है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन अन्तःकरणके गुण माने गये हैं ॥ ४ ॥
तेषां गुणानां साम्यं चेत् तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ।
तेषामन्यतमोत्सेके विधानमुपदिश्यते ॥ ५ ॥
इन गुणोंकी समानता हो तो यह मानसिक स्वास्थ्यका लक्षण है। इनमेंसे किसी एककी वृद्धि होनेपर उसके निवारणका उपाय बताया जाता है ॥ ५ ॥
हर्षेण बाध्यते शोको हर्षः शोकेन बाध्यते ।
कश्चिद् दुःखे वर्तमानः सुखस्य स्मर्तुमिच्छति ।
कश्चित् सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति ॥ ६ ॥
हर्षसे शोक बाधित होता है और शोकसे हर्ष। कोई दुःखमें पड़कर सुखकी याद करना चाहता है और कोई सुखी होकर दुःखकी याद करना चाहता है ॥ ६ ॥
स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य च । स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय किमन्यद् दुःखविभ्रमात् ॥ ७ ॥ कुन्तीनन्दन ! आप न तो दुखी होकर दुःखकी और न सुखी होकर उत्तम सुखकी याद करना चाहते हैं। यह दुःखविभ्रमके सिवा और क्या है ॥ ७ ॥
अथवा ते स्वभावोऽयं येन पार्थावकृष्यसे । दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् । मिषतां पाण्डवेयानां न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ८ ॥ अथवा पार्थ! आपका यह स्वभाव ही है, जिससे आप आकृष्ट होते हैं। पाण्डवोंके देखते-देखते एकवस्त्रधारिणी रजस्वला कृष्णा सभामें घसीट लायी गयी। आप उसे उस अवस्थामें देखकर भी अब उसकी याद करना नहीं चाहते ॥ ८ ॥
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च विवासनम् । महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥ आपलोगोंको नगरसे निकाला गया, मृगछाला पहनाकर वनवास दिया गया और बड़े-बड़े घोर जंगलोंमें रहना पड़ा। इन सब बातोंको आप कभी याद करना नहीं चाहते हैं ॥ ९ ॥
जटासुरात् परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः । सैन्धवाच्च परिक्लेशो न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ १० ॥ जटासुरसे जो क्लेश उठाना पड़ा, चित्रसेनके साथ जूझना पड़ा और सिन्धुराज जयद्रथसे जो अपमान और कष्ट प्राप्त हुआ, उसका स्मरण करनेकी इच्छा आपको नहीं होती है ॥ १० ॥
पुनरज्ञातचर्यायां कीचकेन पदा वधः । याज्ञसेन्यास्तथा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥ पार्थ! अज्ञातवासके दिनों कीचकने जो द्रौपदीको लात मारी थी, उसे भी आप नहीं याद करना चाहते हैं ॥
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १२ ॥ शत्रुदमन! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो युद्ध हुआ था, वही युद्ध आपके सामने उपस्थित है। इस समय आपको अकेले अपने मनके साथ युद्ध करना होगा ॥
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय भरतर्षभ । परमव्यक्तरूपस्य पारं युक्त्या स्वकर्मभिः ॥ १३ ॥ भरतभूषण! अतः उस युद्धके लिये आपको तैयार हो जाना चाहिये। अपने कर्तव्यका पालन करते हुए योगके द्वारा मनको वशीभूत करके आप मायासे परे परब्रह्मको प्राप्त कीजिये ॥ १३ ॥
यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च बन्धुभिः । आत्मनैकेन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम् ॥ १४ ॥ मनके साथ होनेवाले इस युद्धमें न तो बाणोंका काम है और न सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंका ही। इस समय इसमें आपको अकेले ही युद्ध करना है और वह युद्ध सामने उपस्थित है ॥ १४ ॥
तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि । एतज्ज्ञात्वा तु कौन्तेय कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ १५ ॥ यदि इस युद्धमें आप मनको न जीत सके तो पता नहीं आपकी क्या दशा होगी। कुन्तीनन्दन! इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायेंगे ॥ १५ ॥
एतां बुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् । पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ॥ १६ ॥ समस्त प्राणियोंका यों ही आवागमन होता रहता है। बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके आप अपने बाप-दादोंके बर्तावका पालन करते हुए उचित रीतिसे राज्यका शासन कीजिये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना
त्रयोदशोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना
वासुदेव उवाच न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत । शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—भारत! केवल राज्य आदि बाह्य पदार्थोंका त्याग करनेसे ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शारीरिक द्रव्यका त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है ॥ १ ॥
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृद्ध्यतः । यो धर्मो यत् सुखं चैव द्विषतामस्तु तत् तथा ॥ २ ॥ बाह्य पदार्थोंसे अलग होकर भी जो शारीरिक सुख-विलासमें आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुखकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करनेवालोंको ही प्राप्त हो ॥ २ ॥
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ॥ ३ ॥ ‘मम’ (मेरा) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और ‘न मम’ (मेरा नहीं है) यह तीन अक्षरोंका पद सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है ॥ ३ ॥
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम् ॥ ४ ॥ राजन्! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं। ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियोंको लड़ाते हैं अर्थात् किसीको अपना मानना और किसीको अपना न मानना यह भाव ही युद्धका कारण है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
अविनाशोऽस्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत । भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते ॥ ५ ॥ भरतनन्दन! यदि इस जगत्की सत्ताका विनाश न होना ही निश्चित हो, तब तो प्राणियोंके शरीरका भेदन करके भी मनुष्य अहिंसाका ही फल प्राप्त करेगा ॥ ५ ॥
लब्ध्वा हि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम् । ममत्वं यस्य नैव स्यात् किं तया स करिष्यति ॥ ६ ॥
चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्तिसे उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता ॥ ६ ॥
अथवा वसतः पार्थ वने वन्येन जीवतः ।
ममता यस्य द्रव्येषु मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ ७ ॥
किंतु कुन्तीनन्दन! जो वनमें रहकर जंगली फल-मूलोंसे ही जीवन-निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्योंमें ममता है तो वह मौतके मुखमें ही विद्यमान है ॥ ७ ॥
बाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत ।
यन्न पश्यति तद् भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥ ८ ॥
भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओंके स्वभावको देखिये-समझिये (ये मायामय होनेके कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये)। जो मायिक पदार्थोंको ममत्वकी दृष्टिसे नहीं देखता, वह महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ॥ ८ ॥
कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके
नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्तिः ।
सर्वे कामा मनसोऽङ्गप्रभूता
यान् पण्डितः संहरते विचिन्त्य ॥ ९ ॥
जिसका मन कामनाओंमें आसक्त है, उसकी संसारके लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामनाके नहीं होती और समस्त कामनाएँ मनसे ही प्रकट होती हैं। विद्वान् पुरुष कामनाओंको दुःखका कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं ॥ ९ ॥
भूयो भूयोजनमनोऽभ्यासयोगाद्
योगी योगं सारमार्गं विचिन्त्य ।
दानं च वेदाध्ययनं तपश्च
काम्यानि कर्माणि च वैदिकानि ॥ १० ॥
व्रतं यज्ञान् नियमान् ध्यानयोगान्
कामेन यो नारभते विदित्वा ।
यद् यच्चायं कामयते स धर्मो
न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम् ॥ ११ ॥
योगी पुरुष अनेक जन्मोंके अभ्याससे योगको ही मोक्षका मार्ग निश्चित करके कामनाओंका नाश कर डालता है। जो इस बातको जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादिका कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्मसे वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तवमें कामनाओंका निग्रह ही धर्म है और वही मोक्षका मूल है ॥ १०-११ ॥
अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
शृणु संकीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्ठिर ।
नाहं शक्योऽनुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंके जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है। उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये। कामका कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय (निर्ममता और योगाभ्यास)-का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है ॥ १२ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् । तस्य तस्मिन् प्रहरणे पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १३ ॥ जो मनुष्य अपनेमें अस्त्रबलकी अधिकताका अनुभव करके मुझे नष्ट करनेका प्रयत्न करता है, उसके उस अस्त्रबलमें मैं अभिमानरूपसे पुनः प्रकट हो जाता हूँ ॥ १३ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः । जङ्गमेष्विव धर्मात्मा पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १४ ॥ जो नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मुझे मारनेका यत्न करता है, उसके चित्तमें मैं उसी प्रकार उत्पन्न होता हूँ, जैसे उत्तम जंगम योनियोंमें धर्मात्मा ॥ १४ ॥
यो मां प्रयतते नित्यं वेदैर्वेदान्तसाधनैः । स्थावरेष्विव भूतात्मा तस्य प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १५ ॥ जो वेद और वेदान्तके स्वाध्यायरूप साधनोंके द्वारा मुझे मिटा देनेका सदा प्रयास करता है, उसके मनमें मैं स्थावर प्राणियोंमें जीवात्माकी भाँति प्रकट होता हूँ ॥ १५ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रमः । भावो भवामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते ॥ १६ ॥ जो सत्यपराक्रमी पुरुष धैर्यके बलसे मुझे नष्ट करनेकी चेष्टा करता है, उसके मानसिक भावोंके साथ मैं इतना घुल-मिल जाता हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता ॥ १६ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रतः । ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ॥ १७ ॥ जो कठोर व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य तपस्याके द्वारा मेरे अस्तित्वको मिटा डालनेका प्रयास करता है, उसकी तपस्यामें ही मैं प्रकट हो जाता हूँ ॥ १७ ॥
यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डितः । तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च । अवध्यः सर्वभूतानामहमेकः सनातनः ॥ १८ ॥ जो विद्वान् पुरुष मोक्षका सहारा लेकर मेरे विनाशका प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसीसे वह बँधा हुआ है। यह विचारकर मुझे उसपर हँसी आती है और मैं खुशीके मारे नाचने लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ ॥ १८ ॥
तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति ॥ १९ ॥ अतः महाराज! आप भी नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा अपनी उस कामनाको धर्ममें लगा दीजिये। वहाँ आपकी वह कामना सफल होगी ॥ १९ ॥ यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता । अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः ॥ २० ॥ मा ते व्यथास्तु निहतान् बन्धून् वीक्ष्य पुनः पुनः । न शक्यास्ते पुनर्द्रष्टुं ये हताऽस्मिन् रणाजिरे ॥ २१ ॥ विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अश्वमेधका तथा पर्याप्त दक्षिणावाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये। अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको बारंबार याद करके आपके मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये। इस समरांगणमें जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते ॥ स त्वमिष्ट्वा महायज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । कीर्तिं लोके परां प्राप्य गतिमग्रयां गमिष्यसि ॥ २२ ॥ इसलिये आप पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली महायज्ञोंका अनुष्ठान करके इस लोकमें उत्तम कीर्ति और परलोकमें श्रेष्ठ गति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन
चतुर्दशोऽध्यायः
ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्मराज्यका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्मुनिभिस्तैस्तपोधनैः ।
समाश्र्वस्यत राजर्षिर्हतबन्धुर्युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
सोऽनुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वयं ।
द्वैपायनेन कृष्णेन देवस्थानेन वा विभुः ॥ २ ॥
नारदेनाथ भीमेन नकुलेन च पार्थिव ।
कृष्णया सहदेवेन विजयेन च धीमता ॥ ३ ॥
अन्यैश्च पुरुषव्याघ्रैर्ब्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः ।
व्यजहाच्छोकजं दुःखं संतापं चैव मानसम् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार साक्षात् विष्टरश्रवा (विस्तृत यशवाले) भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवस्थान, नारद, भीमसेन, नकुल, द्रौपदी, सहदेव, बुद्धिमान् अर्जुन तथा अन्यान्य श्रेष्ठ पुरुषों और शास्त्रदर्शी ब्राह्मणों एवं तपोधन मुनियोंके बहुविध वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेपर जिनके भाई-बन्धु मारे गये थे, उन राजर्षि युधिष्ठिरका मन शान्त हुआ और उन्होंने शोकजनित दुःख तथा मानसिक संतापको त्याग दिया ॥ १—४ ॥
अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः ।
कृत्वाथ प्रेतकार्याणि बन्धूनां स पुनर्नृपः ॥ ५ ॥
अन्वशासच्च धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्बराम् ।
तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया और मरे हुए बन्धु-बान्धवोंका श्राद्ध करके वे धर्मात्मा नरेश समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
प्रशान्तचेताः कौरव्यः स्वराज्यं प्राप्य केवलम् ।
व्यासं च नारदं चैव तांश्चान्यानब्रवीन्नृपः ॥ ६ ॥
चित्त शान्त होनेपर केवल अपना राज्य ग्रहण करके कुरुवंशी नरेश युधिष्ठिरने व्यास, नारद तथा अन्यान्य मुनिवरोंसे कहा— ॥ ६ ॥
आश्वासितोऽहं प्राग्वृद्धैर्भवद्भिर्मुनिपुङ्गवैः ।
न सूक्ष्ममपि मे किंचिद् व्यलीकमिह विद्यते ॥ ७ ॥
'महानुभावो! आप सब लोग वृद्ध और मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी बातोंसे मुझे बड़ी सान्त्वना मिली है। अब मेरे मनमें तनिक भी दुःख नहीं है ॥ ७ ॥ अर्थश्च सुमहान् प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवताः । पुरस्कृत्याद्य भवतः समानेष्यामहे मखम् ॥ ८ ॥ 'इधर पर्याप्त धन भी मिल गया, जिससे मैं भलीभाँति देवताओंका यजन भी कर सकूँगा। अब आपलोगोंको आगे करके हमलोग उस धनको अपनी यज्ञशालामें ले आवेंगे ॥ ८ ॥ हिमवन्तं त्वया गुप्ता गमिष्यामः पितामह । बह्वाश्चर्यो हि देशः स श्रूयते द्विजसत्तम ॥ ९ ॥ 'द्विजश्रेष्ठ पितामह! हमलोग आपसे ही सुरक्षित होकर हिमालय पर्वतकी यात्रा करेंगे। सुना जाता है, वह प्रदेश अनेक आश्चर्यजनक दृश्योंसे भरा हुआ है ॥ ९ ॥ तथा भगवता चित्रं कल्याणं बहुभाषितम् । देवर्षिणा नारदेन देवस्थानेन चैव ह ॥ १० ॥ 'आपने, देवर्षि नारदने तथा मुनिवर देवस्थानने बहुत-सी अद्भुत बातें बतायी हैं, जो मेरा कल्याण करनेवाली हैं ॥ १० ॥ नाभागधेयः पुरुषः कश्चिदेवंविधान् गुरून् । लभते व्यसनं प्राप्य सुहृदः साधुसम्मतान् ॥ ११ ॥ 'जो सौभाग्यशाली नहीं है, ऐसा कोई भी पुरुष संकटमें पड़नेपर आप-जैसे साधुसम्मानित हितैषी गुरुजनोंको नहीं पा सकता' ॥ ११ ॥ एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सर्व एव महर्षयः । अभ्यनुज्ञाप्य राजानं तथोभौ कृष्णफाल्गुनौ ॥ १२ ॥ पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवादर्शनं ययुः । ततो धर्मसुतो राजा तत्रैवोपाविशत् प्रभुः ॥ १३ ॥ राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करनेपर सभी महर्षि राजा युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी अनुमति ले सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर उन्हें विदा करके वहीं बैठ गये ॥ १२-१३ ॥ एवं नातिमहान् कालः स तेषां संन्यवर्तत । कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा ॥ १४ ॥ भीष्मकी मृत्युके पश्चात् शौचकार्य सम्पन्न करते हुए पाण्डवोंका कुछ काल वहीं व्यतीत हुआ ॥ १४ ॥ महादानानि विप्रेभ्यो ददतामौर्ध्वदेहिकम् । भीष्मकर्णपुरोगाणां कुरूणां कुरुसत्तम ॥ १५ ॥ सहितो धृतराष्ट्रेण स ददावौर्ध्वदेहिकम् ।
कुरुश्रेष्ठ! धृतराष्ट्रसहित उन्होंने भीष्म और कर्ण आदि कुरुवंशियोंके निमित्त और्ध्वदैहिक क्रिया (श्राद्ध)-में ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिये ।। १५ १/२ ।। ततो दत्त्वा बहुधनं विप्रेभ्यः पाण्डवर्षभः ।। १६ ।। धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विवेश गजसाह्वयम् । तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन देकर पाण्डवशिरोमणि युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रको आगे करके हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ।। १६ १/२ ।। स समाश्वास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । अन्वशाद् वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ।। १७ ।। धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्रज्ञाचक्षु पितृव्य महाराज धृतराष्ट्रको सान्त्वना देकर भाइयोंके साथ पृथिवीका राज्य करने लगे ।। १७ ।। (यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा । तथा भरतसिंहोऽपि पालयामास मेदिनीम् ।। जैसे महाराज मनु तथा दशरथनन्दन श्रीरामने इस पृथिवीका पालन किया था, उसी प्रकार भरतसिंह युधिष्ठिर भी भूमण्डलकी रक्षा करने लगे ।। नाधर्म्यमभवत् तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ।। उनके राज्यमें कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुषसिंह! जैसे सत्ययुगमें समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापरमें भी हो गयी थी ।। कलिमासन्नमाविशं निवास्य नृपनन्दनः । भ्रातृभिः सहितो धीमान् बभौ धर्मबलोद्धतः ।। कलियुगको समीप आया देख बुद्धिमान् नृपनन्दन युधिष्ठिरने उसको भी निवास दिया और भाइयोंके साथ वे धर्मबलसे अजेय होकर शोभा पाने लगे ।। ववर्ष भगवान् देवः काले देशे यथेप्सितम् । निरामयं जगदभूत् क्षुत्पिपासे न किंचन ।। भगवान् पर्जन्यदेव उनके राज्यके प्रत्येक देशमें यथेष्ट वर्षा करते थे। सारा जगत् रोग-शोकसे रहित हो गया था, किसीको भी भूख-प्यासका थोड़ा-सा भी कष्ट नहीं रह गया था ।। आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मतिः । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तराः शिवाः ।। धर्मः सत्यप्रधानश्च सत्यं सद्भिषयान्वितम् । मनुष्योंको मानसिक व्यथा नहीं सताती थी। किसीका मन दुर्व्यसनमें नहीं लगता था। ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग स्वधर्मको ही उत्कृष्ट मानकर उसमें लगे रहते थे। सभी
मंगलयुक्त थे। धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ॥ धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान् ॥ वर्णाश्रमान् पूर्वकृतान् सकलान् रक्षणोद्यतः । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्ठिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े-बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्मोंकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ॥ अवृत्तिवृत्तिदानाद्यैर्यज्ञार्थैर्दीपितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु । स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन् प्रशासति ॥ बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम् ॥ वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे। अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था। उनके शासनकालमें सारा जगत् स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था। यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ॥ नार्यः पतिव्रताः सर्वा रूपवत्यः स्वलंकृताः । यथोक्तवृत्ताः स्वगुणैर्बभूवुः प्रीतिहेतवः ॥ उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं। वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ॥ पुमांसः पुण्यशीलाढ्याः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः । सुखिनः सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ॥ पुरुष पुण्यशील, अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे। वे कभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ॥ सर्वे नराश्च नार्यश्च सततं प्रियवादिनः । अजिह्यमनसः शुक्लाः बभूवुः श्रमवर्जिताः ॥ सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ॥ भूषिताः कुण्डलैर्हारैः कटकैः कटिसूत्रकैः । सुवाससः सुगन्धाढ्याः प्रायशः पृथिवीतले ॥ उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे। सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ॥ सर्वे ब्रह्मविदो विप्राः सर्वत्र परिनिष्ठिताः । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविनः ॥