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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल

ब्रह्मोवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् ।
सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम् ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षियो! अब मैं तीसरे उत्तम गुण (सत्त्वगुण)-का वर्णन करूँगा, जो जगत्में सम्पूर्ण प्राणियोंका हितकारी और श्रेष्ठ पुरुषोंका प्रशंसनीय धर्म है ॥ १ ॥

आनन्दः प्रीतिरुद्रेकः प्राकाश्यं सुखमेव च ।
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः श्रद्दधानता ॥ २ ॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
अक्रोधश्चानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रमः ॥ ३ ॥
आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना, पवित्रता, चतुरता और पराक्रम—ये सत्त्वगुणके कार्य हैं ॥ २-३ ॥

मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रमः ।
एवं यो युक्तधर्मः स्यात् सोऽमुत्रात्यन्तमश्नुते ॥ ४ ॥
नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है—ऐसा समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ४ ॥

निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः ।
अकामभूत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥ ५ ॥
ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ५ ॥

विश्रम्भो ह्रीस्तितिक्षा च त्याग शौचमतन्द्रिता ।
आनृशंस्यमसंमोहो दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ ६ ॥
हर्षस्तुष्टिर्विस्मयश्च विनयः साधुवृत्तिता ।
शान्तिकर्मणि शुद्धिश्च शुभा बुद्धिर्विमोचनम् ॥ ७ ॥
उपेक्षा ब्रह्मचर्यं च परित्यागश्च सर्वशः ।
निर्ममत्वमनाशीष्ट्वमपरिक्षतधर्मता ॥ ८ ॥
विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्वर्ताव,

शान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्‌के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना—ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं॥ ६–८ ॥

मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधाऽधीतं मुधा व्रतम् । मुधा प्रतिग्रहश्चैव मुधा धर्मो मुधा तपः ॥ ९ ॥ एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन् सत्त्वसंश्रयाः । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ १० ॥ सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप—ये सब व्यर्थ हैं—ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्‌में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं ॥ ९-१० ॥

हित्वा सर्वाणि पापानि निःशोका ह्यथ मानवाः । दिवं प्राप्य तु ते धीराः कुर्वते वै ततस्तनूः ॥ ११ ॥ वे धीर मनुष्य सब पापोंका त्याग करके शोकसे रहित हो जाते हैं और स्वर्गलोकमें जाकर वहाँके भोग भोगनेके लिये अनेक शरीर धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥

ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्वं मनसश्च ते । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिकाः स्मृताः । सत्त्वगुणसम्पन्न महात्मा स्वर्गवासी देवताओंकी भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियोंको प्राप्त करते हैं। वे ऊर्ध्वस्रोता और वैकारिक देवता माने गये हैं ॥ १२ ½ ॥

विकुर्वन्तः प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्ततः ॥ १३ ॥ यद् यदिच्छन्ति तत् सर्वं भजन्ते विभजन्ति च । (योगबलसे) स्वर्गको प्राप्त होनेपर उनका चित्त उन-उन भोगजनित संस्कारोंसे विकृत होता है। उस समय वे जो-जो चाहते हैं, उस-उस वस्तुको पाते और बाँटते हैं ॥ १३ ½ ॥

इत्येतत् सात्त्विकं वृत्तं कथितं वो द्विजर्षभाः । एतद् विज्ञाय लभते विधिवद् यद् यदिच्छति ॥ १४ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे सत्त्वगुणके कार्योंका वर्णन किया। जो इस विषयको अच्छी तरह जानता है, वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीको पा लेता है ॥ १४ ॥

प्रकीर्तिताः सत्त्वगुणा विशेषतो यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान् सदा

गुणान् स भुङ्क्ते न गुणैः स युज्यते ॥ १५ ॥

यह सत्त्वगुणका विशेषरूपसे वर्णन किया गया तथा सत्त्वगुणका कार्य भी बताया गया। जो मनुष्य इन गुणोंको जानता है, वह सदा गुणोंको भोगता है, किंतु उनसे बँधता नहीं ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि
गुरुशिष्यसंवादेऽष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन

ब्रह्मोवाच

नैव शक्या गुणा वक्तुं पृथक्त्वेनैव सर्वशः ।
अविच्छिन्नानि दृश्यन्ते रजः सत्त्वं तमस्तथा ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षियो! सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंका सर्वथा पृथक्रूपसे वर्णन करना असम्भव है; क्योंकि ये तीनों गुण अविच्छिन्न (मिले हुए) देखे जाते हैं ॥ १ ॥

अन्योन्यमथ रज्यन्ते ह्यन्योन्यं चार्थजीविनः ।
अन्योन्याश्रयाः सर्वे तथान्योन्यानुवर्तिनः ॥ २ ॥
ये सभी परस्पर रँगे हुए, एक-दूसरेसे अनुप्राणित, अन्योन्याश्रित तथा एक-दूसरेका अनुसरण करनेवाले हैं ॥ २ ॥

यावत्सत्त्वं रजस्तावद् वर्तते नात्र संशयः ।
यावत्तमश्च सत्त्वं च रजस्तावदिहोच्यते ॥ ३ ॥
इसमें संदेह नहीं कि इस जगत्में जबतक सत्त्वगुण रहता है, तबतक रजोगुण भी रहता है एवं जबतक तमोगुण रहता है, तबतक सत्त्वगुण और रजोगुणकी भी सत्ता रहती है, ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥

संहत्य कुर्वते यात्रां सहिताः संघचारिणः ।
संघातवृत्तयो ह्येते वर्तन्ते हेत्वहेतुभिः ॥ ४ ॥
ये गुण किसी निमित्तसे अथवा बिना निमित्तके भी सदा साथ रहते हैं, साथ-ही-साथ विचरते हैं, समूह बनाकर यात्रा करते हैं और संघात (शरीर)-में मौजूद रहते हैं ॥ ४ ॥

उद्रेकव्यतिरिक्तानां तेषामन्योन्यवर्तिनाम् ।
वक्ष्यते तद् यथा न्यूनं व्यतिरिक्तं च सर्वशः ॥ ५ ॥
ऐसा होनेपर भी कहीं तो इन उन्नति और अवनतिके स्वभाववाले तथा एक-दूसरेका अनुसरण करनेवाले गुणोंमेंसे किसीकी न्यूनता देखी जाती है और कहीं अधिकता। सो किस प्रकार? यह बताया जाता है ॥ ५ ॥

व्यतिरिक्तं तमो यत्र तिर्यग् भावगतं भवेत् ।
अल्पं तत्र रजो ज्ञेयं सत्त्वमल्पतरं तथा ॥ ६ ॥
तिर्यग् योनियोंमें जहाँ तमोगुणकी अधिकता होती है, वहाँ थोड़ा रजोगुण और बहुत थोड़ा सत्त्वगुण समझना चाहिये ॥ ६ ॥

उद्रिक्तं च रजो यत्र मध्यस्रोतोगतं भवेत् ।
अल्पं तत्र तमो ज्ञेयं सत्त्वमल्पतरं तथा ॥ ७ ॥

मध्यस्रोता अर्थात् मनुष्ययोनिमें, जहाँ रजोगुणकी मात्रा अधिक होती है, वहाँ थोड़ा तमोगुण और बहुत थोड़ा सत्त्वगुण समझना चाहिये ॥ ७ ॥ उद्रिक्तं च यदा सत्त्वमूर्ध्वस्रोतोगतं भवेत् । अल्पं तत्र तमो ज्ञेयं रजश्चाल्पतरं तथा ॥ ८ ॥ इसी प्रकार ऊर्ध्वस्रोता यानी देवयोनियोंमें जहाँ सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, वहाँ तमोगुण अल्प और रजोगुण अल्पतर जानना चाहिये ॥ ८ ॥ सत्त्वं वैकारिकी योनिरिन्द्रियाणां प्रकाशिका । न हि सत्त्वात् परो धर्मः कश्चिदन्यो विधीयते ॥ ९ ॥ सत्त्वगुण इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका कारण है, उसे वैकारिक हेतु मानते हैं। वह इन्द्रियों और उनके विषयोंको प्रकाशित करनेवाला है। सत्त्वगुणसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं बताया गया है ॥ ९ ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणसंयुक्ता यान्त्यधस्तामसा जनाः ॥ १० ॥ सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकोंको जाते हैं, रजोगुणमें स्थित पुरुष मध्यमें अर्थात् मनुष्यलोकमें ही रहते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद एवं आलस्य आदिमें स्थित हुए तामस मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होते—नीच योनियों अथवा नरकोंमें पड़ते हैं ॥ १० ॥ तमः शूद्रे रजः क्षत्रे ब्राह्मणे सत्त्वमुत्तमम् । इत्येवं त्रिषु वर्णेषु विवर्तन्ते गुणास्त्रयः ॥ ११ ॥ शूद्रमें तमोगुणकी, क्षत्रियमें रजोगुणकी और ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है। इस प्रकार इन तीन वर्णोंमें मुख्यतासे ये तीन गुण रहते हैं ॥ ११ ॥ दूरादपि हि दृश्यन्ते सहिताः संघचारिणः । तमः सत्त्वं रजश्चैव पृथक्त्वे नानुशुश्रुम ॥ १२ ॥ एक साथ चलनेवाले ये गुण दूरसे भी मिले हुए ही दिखायी पड़ते हैं। तमोगुण, सत्त्वगुण और रजोगुण—ये सर्वथा पृथक्-पृथक् हों, ऐसा कभी नहीं सुना ॥ १२ ॥ दृष्ट्वा त्वादित्यमुद्यन्तं कुचराणां भयं भवेत् । अध्वगाः परितप्येयुरुष्णतो दुःखभागिनः ॥ १३ ॥ सूर्यको उदित हुआ देखकर दुराचारी मनुष्योंको भय होता है और धूपसे दुःखित राहगीर संतप्त होते हैं ॥ १३ ॥ आदित्यः सत्त्वमुद्रिक्तं कुचरास्तु तथा तमः । परितापोऽध्वगानां च रजसो गुण उच्यते ॥ १४ ॥ क्योंकि सूर्य सत्त्वगुण प्रधान हैं, दुराचारी मनुष्य तमोगुण प्रधान हैं एवं राहगीरोंको होनेवाला संताप रजोगुण प्रधान कहा गया है ॥ १४ ॥

प्राकाश्यं सत्त्वमादित्यः संतापो रजसो गुणः । उपप्लवस्तु विज्ञेयस्तामसस्तस्य पर्वसु ॥ १५ ॥ सूर्यका प्रकाश सत्त्वगुण है, उनका ताप रजोगुण है और अमावास्याके दिन जो उनपर ग्रहण लगता है, वह तमोगुणका कार्य है ॥ १५ ॥ एवं ज्योतिष्षु सर्वेषु निवर्तन्ते गुणास्त्रयः । पर्यायेण च वर्तन्ते तत्र तत्र तथा तथा ॥ १६ ॥ इस प्रकार सभी ज्योतियोंमें तीनों गुण क्रमशः वहाँ-वहाँ उस-उस प्रकारसे प्रकट होते और विलीन होते रहते हैं ॥ १६ ॥ स्थावरेषु तु भावेषु तिर्यग्भावगतं तमः । राजसास्तु विवर्तन्ते स्नेहभावस्तु सात्त्विकः ॥ १७ ॥ स्थावर प्राणियोंमें तमोगुण अधिक होता है, उनमें जो बढ़नेकी क्रिया है वह राजस है और जो चिकनापन है, वह सात्त्विक है ॥ १७ ॥ अहस्त्रिधा तु विज्ञेयं त्रिधा रात्रिर्विधीयते । मासार्धमासवर्षाणि ऋतवः संध्यस्तथा ॥ १८ ॥ गुणोंके भेदसे दिनको भी तीन प्रकारका समझना चाहिये। रात भी तीन प्रकारकी होती है तथा मास, पक्ष, वर्ष, ऋतु और संध्याके भी तीन-तीन भेद होते हैं ॥ १८ ॥ त्रिधा दानानि दीयन्ते त्रिधा यज्ञः प्रवर्तते । त्रिधा लोकास्त्रिधा देवास्त्रिधा विद्यास्त्रिधा गतिः ॥ १९ ॥ गुणोंके भेदसे तीन प्रकारसे दान दिये जाते हैं। तीन प्रकारका यज्ञानुष्ठान होता है। लोक, देव, विद्या और गति भी तीन-तीन प्रकारकी होती है ॥ १९ ॥ भूतं भव्यं भविष्यं च धर्मोऽर्थः काम एव च । प्राणापानावुदानश्चाप्येत एव त्रयो गुणाः ॥ २० ॥ भूत, वर्तमान, भविष्य, धर्म, अर्थ, काम, प्राण, अपान और उदान—ये सब त्रिगुणात्मक ही हैं ॥ २० ॥ पर्यायेण प्रवर्तन्ते तत्र तत्र तथा तथा । यत्किंचिदिह लोकेऽस्मिन् सर्वमेते त्रयो गुणाः ॥ २१ ॥ इस जगत्में जो कोई भी वस्तु भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे उपलब्ध होती है, वह सब त्रिगुणमय है ॥ २१ ॥ त्रयो गुणाः प्रवर्तन्ते ह्यव्यक्ता नित्यमेव तु । सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणसर्गः सनातनः ॥ २२ ॥ सर्वत्र तीनों गुणोंकी ही सत्ता है। ये तीनों अव्यक्त और प्रवाहरूपसे नित्य भी हैं। सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंकी सृष्टि सनातन है ॥ २२ ॥ तमो व्यक्तं शिवं धाम रजो योनिः सनातनः ।

प्रकृतिर्विकारः प्रलयः प्रधानं प्रभवाप्ययौ ॥ २३ ॥
अनुद्रिक्तमनूनं वाप्यकम्पमचलं ध्रुवम् ।
सदसच्चैव तत् सर्वमव्यक्तं त्रिगुणा स्मृतम् ।
ज्ञेयानि नामधेयानि नरैरध्यात्मचिन्तकैः ॥ २४ ॥
प्रकृतिको तम, व्यक्त, शिव, धाम, रज, योनि, सनातन, प्रकृति, विकार, प्रलय, प्रधान प्रभव, अप्यय, अनुद्रिक्त, अनून, अकम्प, अचल, ध्रुव, सत्, असत्, अव्यक्त और त्रिगुणात्मक कहते हैं। अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले लोगोंको इन नामोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो
यो वेद सर्वाणि गतीश्च केवलाः ।
विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववित्
स मुच्यते सर्वगुणैर्निरामयः ॥ २५ ॥
जो मनुष्य प्रकृतिके इन नामों, सत्त्वादि गुणों और सम्पूर्ण विशुद्ध गतियोंको ठीक-ठीक जानता है, वह गुण-विभागके तत्त्वका ज्ञाता है। उसके ऊपर सांसारिक दुःखोंका प्रभाव नहीं पड़ता। वह देह-त्यागके पश्चात् सम्पूर्ण गुणोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1769)

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चत्वारिंशोऽध्यायः

महत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा

ब्रह्मोवाच

अव्यक्तात् पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः ।
आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथमः सर्ग उच्यते ॥ १ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**महर्षिगण! पहले अव्यक्त प्रकृतिसे महान् आत्मस्वरूप महाबुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ। यही सब गुणोंका आदि तत्त्व और प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १ ॥

महानात्मा मतिर्विष्णुर्जिष्णुः शम्भुश्च वीर्यवान् ।
बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च तथा ख्यातिर्धृतिः स्मृतिः ॥ २ ॥
पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते ।
तं जानन् ब्राह्मणो विद्वान् प्रमोहं नाधिगच्छति ॥ ३ ॥
महान् आत्मा, मति, विष्णु, जिष्णु, शम्भु, वीर्यवान्, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, ख्याति, धृति, स्मृति—इन पर्यायवाची नामोंसे महान् आत्माकी पहचान होती है। उसके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् ब्राह्मण कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ २-३ ॥

सर्वतःपाणिपादश्च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ।
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वं व्याप्य स तिष्ठति ॥ ४ ॥
परमात्मा सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ४ ॥

महाप्रभावः पुरुषः सर्वस्य हृदि निश्चतः ।
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ५ ॥
सबके हृदयमें विराजमान परम पुरुष परमात्माका प्रभाव बहुत बड़ा है। अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ उसीके स्वरूप हैं। वह सबका शासन करनेवाला, ज्योतिर्मय और अविनाशी है ॥ ५ ॥

तत्र बुद्धिविदो लोकाः सद्भावनिरताश्च ये ।
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ॥ ६ ॥
ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः ।
प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंकृताः ॥ ७ ॥
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत ।
आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् ॥ ८ ॥

संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान्, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान्, लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं। जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है ॥ ६—८ ॥

अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ ९ ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज—ये पाँचों महाभूत अहंकारसे उत्पन्न होते हैं ॥ ९ ॥

तेषु भूतानि युज्यन्ते महाभूतेषु पञ्चसु ।
ते शब्दस्पर्शरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥ १० ॥
उन पाँचों महाभूतों तथा उनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे सम्पूर्ण प्राणी युक्त हैं ॥ १० ॥

महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते ।
सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भयम् ॥ ११ ॥
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति ।
धैर्यशाली महर्षियो! जब पञ्चमहाभूतोंके विनाशके समय प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भयका सामना करना पड़ता है। किंतु सम्पूर्ण लोगोंमें जो आत्मज्ञानी धीर पुरुष है, वह उस समय भी मोहित नहीं होता ॥ १११/२ ॥

विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वयम्भूर्भवति प्रभुः ॥ १२ ॥
एवं हि यो वेद गुहाशयं प्रभुं
परं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् ।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
आदिसर्गमें सर्वसमर्थ स्वयम्भू विष्णु ही स्वयं अपनी इच्छासे प्रकट होते हैं। जो इस प्रकार बुद्धिरूपी गुहामें स्थित, विश्वरूप, पुराणपुरुष, हिरण्मय देव और ज्ञानियोंकी परम गतिरूप परम प्रभुको जानता है, वह बुद्धिमान् बुद्धिकी सीमाके पार पहुँच जाता है ॥ १२-१३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥

अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः

अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन

ब्रह्मोवाच

य उत्पन्नो महान् पूर्वमहंकारः स उच्यते ।
अहमित्येव सम्भूतो द्वितीयः सर्ग उच्यते ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा—महर्षियो! जो पहले महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ था, वही अहंकार कहा जाता है। जब वह अहंरूपमें प्रादुर्भूत होता है, तब वह दूसरा सर्ग कहलाता है ॥ १ ॥
अहंकारश्च भूतादिर्वैकारिक इति स्मृतः ।
तेजसश्चेतना धातुः प्रजासर्गः प्रजापतिः ॥ २ ॥
यह अहंकार भूतादि विकारोंका कारण है, इसलिये वैकारिक माना गया है। यह रजोगुणका स्वरूप है, इसलिये तैजस् है। इसका आधार चेतन आत्मा है। सारी प्रजाकी सृष्टि इसीसे होती है, इसलिये इसको प्रजापति कहते हैं ॥
देवानां प्रभवो देवो मनसश्च त्रिलोककृत् ।
अहमित्येव तत्सर्वमभिमन्ता स उच्यते ॥ ३ ॥
यह श्रोत्रादि इन्द्रियरूप देवोंका और मनका उत्पत्ति-स्थान एवं स्वयं भी देवस्वरूप है, इसलिये इसे त्रिलोकीका कर्त्ता माना गया है। यह सम्पूर्ण जगत् अहंकारस्वरूप है, इसलिये यह अभिमन्ता कहा जाता है ॥
अध्यात्मज्ञानतृप्तानां मुनीनां भावितात्मनाम् ।
स्वाध्यायक्रतुसिद्धानामेष लोकः सनातनः ॥ ४ ॥
जो अध्यात्मज्ञानमें तृप्त, आत्माका चिन्तन करनेवाले और स्वाध्यायरूपी यज्ञमें सिद्ध हैं, उन मुनिजनोंको यह सनातन लोक प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अहंकारेणाहरतो गुणानिमान्
भूतादिरेवं सृजते स भूतकृत् ।
वैकारिकः सर्वमिदं विचेष्टते
स्वतेजसा रञ्जयते जगत् तथा ॥ ५ ॥
समस्त भूतोंका आदि और सबको उत्पन्न करनेवाला वह अहंकारका आधारभूत जीवात्मा अहंकारके द्वारा सम्पूर्ण गुणोंकी रचना करता है और उनका उपभोग करता है। यह जो कुछ भी चेष्टाशील जगत् है, वह विकारोंके कारणरूप अहंकारका ही स्वरूप है। वह अहंकार ही अपने तेजसे सारे जगत्‌को रजोमय (भोगोंका इच्छुक) बनाता है ॥ ५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्र्वणि गुरुशिष्यसंवादे
एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश

ब्रह्मोवाच

अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षिगण! अहंकारसे पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज—ये पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए हैं ॥ १ ॥

तेषु भूतानि मुह्यन्ति महाभूतेषु पञ्चसु ।
शब्दस्पर्शनरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥ २ ॥
इन्हीं पञ्च महाभूतोंमें अर्थात् इनके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषयोंमें समस्त प्राणी मोहित रहते हैं ॥ २ ॥

महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते ।
सर्वप्राणभृतां धीरा महदभ्युद्यते भयम् ॥ ३ ॥
धैर्यशाली महर्षियो! महाभूतोंका नाश होते समय जब प्रलयका अवसर आता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भय प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

यद् यस्माज्जायते भूतं तत्र तत् प्रविलीयते ।
लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम् ॥ ४ ॥
जो भूत जिससे उत्पन्न होता है, उसका उसीमें लय हो जाता है। ये भूत अनुलोमक्रमसे एकके बाद एक प्रकट होते हैं और विलोमक्रमसे इनका अपने-अपने कारणमें लय होता है ॥ ४ ॥

ततः प्रलीने सर्वस्मिन् भूते स्थावरजङ्गमे ।
स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन ॥ ५ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर भूतोंका लय हो जानेपर भी स्मरणशक्तिसे सम्पन्न धीर-हृदय योगी पुरुष कभी नहीं लीन होते ॥ ५ ॥

शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
क्रियाः करणनित्याः स्युरनित्या मोहसंज्ञिताः ॥ ६ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा इनको ग्रहण करनेकी क्रियाएँ—ये कारणरूपसे (अर्थात् सूक्ष्म मनःस्वरूप होनेके कारण) नित्य हैं; अतः इनका भी

प्रलयकालमें लय नहीं होता। जो (स्थूल पदार्थ) अनित्य हैं उनको मोहके नामसे पुकारा जाता है ॥ ६ ॥

लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिंचनाः । मांसशोणितसंघाता अन्योन्योपजीविनः ॥ ७ ॥ बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः । लोभ, लोभपूर्वक किये जानेवाले कर्म और उन कर्मोंसे उत्पन्न समस्त फल समानभावसे वास्तवमें कुछ भी नहीं है। शरीरके बाह्य अंग रक्त-मांसके संघात आदि एक-दूसरेके सहारे रखनेवाले हैं। इसीलिये ये दीन और कृपण माने गये हैं ॥ ७ ½ ॥

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ॥ ८ ॥ अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः । वाङ्मनोबुद्धिभिः सार्द्धमिदमष्टात्मकं जगत् ॥ ९ ॥ प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—ये पाँच वायु नियतरूपसे शरीरके भीतर निवास करते हैं; अतः ये सूक्ष्म हैं। मन, वाणी और बुद्धिके साथ गिननेसे इनकी संख्या आठ होती है। ये आठ इस जगत्के उपादान कारण हैं ॥ ८-९ ॥

त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयताः । विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ॥ १० ॥ अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहने मनः सदा । स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ११ ॥ जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक्—ये इन्द्रियाँ वशमें हों, मन शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चयपर स्थिर रहनेवाली हो तथा जिसके मनको उपर्युक्त इन्द्रियादिरूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ १०-११ ॥

एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः । अहंकारात् प्रसूतानि तानि वक्ष्याम्यहं द्विजाः ॥ १२ ॥ द्विजवरो! अहंकारसे उत्पन्न हुई जो मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतलायी जाती हैं, उनका अब विशेषरूपसे वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १२ ॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी । पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग् दशमी भवेत् ॥ १३ ॥ इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत् । एतं ग्रामं जयेत् पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥ १४ ॥ कान, त्वचा, आँख, रसना, पाँचवीं नासिका तथा हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक्—यह दस इन्द्रियोंका समूह है। मन ग्यारहवाँ है। मनुष्यको पहले इस समुदायपर विजय प्राप्त करना चाहिये। तत्पश्चात् उसे ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ॥ १३-१४ ॥

बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चाहुः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः ॥ १५ ॥ अविशेषाणि चान्यानि कर्मयुक्तानि यानि तु । उभयत्र मनो ज्ञेयं बुद्धिरस्तु द्वादशी भवेत् ॥ १६ ॥ इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं और पाँच कर्मेन्द्रिय। वस्तुतः कान आदि पाँच इन्द्रियोंको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं और उनसे भिन्न शेष जो पाँच इन्द्रियाँ हैं, वे कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं। मनका सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय—दोनोंसे है और बुद्धि बारहवीं है ॥ १५-१६ ॥

इत्युक्तानीन्द्रियाण्येतान्येकादश यथाक्रमम् । मन्यन्ते कृतमित्येवं विदित्वा तानि पण्डिताः ॥ १७ ॥ इस प्रकार क्रमशः ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन किया गया। इनके तत्त्वको अच्छी तरह जाननेवाले विद्वान् अपनेको कृतार्थ मानते हैं ॥ १७ ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् । आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते ॥ १८ ॥ अधिभूतं तथा शब्दो दिशस्तत्राधिदैवतम् । अब समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके भूत, अधिभूत आदि विविध विषयोंका वर्णन किया जाता है। आकाश पहला भूत है। कान उसका अध्यात्म (इन्द्रिय), शब्द उसका अधिभूत (विषय) और दिशाएँ उसकी अधिदैवत (अधिष्ठातृ देवता) हैं ॥ १८ १/२ ॥

द्वितीयं मारुतो भूत त्वगध्यात्मं च विश्रुता ॥ १९ ॥ स्प्रष्टव्यमधिभूतं च विद्युत् तत्राधिदैवतम् । वायु दूसरा भूत है। त्वचा उसका अध्यात्म तथा स्पर्श उसका अधिभूत सुना गया है और विद्युत् उसका अधिदैवत है ॥ १९ १/२ ॥

तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममुच्यते ॥ २० ॥ अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम् । तीसरे भूतका नाम है तेज। नेत्र उसका अध्यात्म, रूप उसका अधिभूत और सूर्य उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २० १/२ ॥

चतुर्थमापो विज्ञेयं जिह्वा चाध्यात्ममुच्यते ॥ २१ ॥ अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम् । जलको चौथा भूत समझना चाहिये। रसना उसका अध्यात्म, रस उसका अधिभूत और चन्द्रमा उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २१ १/२ ॥

पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममुच्यते ॥ २२ ॥ अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदैवतम् ।

पृथ्वी पाँचवाँ भूत है। नासिका उसका अध्यात्म, गन्ध उसका अधिभूत और वायु उसका अधिदैवत कहा जाता है ।। २२ १/२ ।। एषु पञ्चसु भूतेषु त्रिषु यश्च विधिः स्मृतः ।। २३ ।। इन पाँच भूतोंमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूप तीन भेद माने गये हैं ।। २३ ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् । पादावध्यात्ममित्याहुर्ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ।। २४ ।। अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम् । अब कर्मेन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विषयोंका निरूपण किया जाता है। तत्त्वदर्शी ब्राह्मण दोनों पैरोंको अध्यात्म कहते हैं और गन्तव्य स्थानको उनके अधिभूत तथा विष्णुको उनके अधिदैवत बतलाते हैं ।। २४ १/२ ।। अवाग्गतिरपानश्च पायुरध्यात्ममुच्यते ।। २५ ।। अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम् । निम्न गतिवाला अपान एवं गुदा अध्यात्म कहा गया है और मलत्याग उसका अधिभूत तथा मित्र उसके अधिदेवता हैं ।। २५ १/२ ।। प्रजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते ।। २६ ।। अधिभूतं तथा शुक्रं दैवतं च प्रजापतिः । सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला उपस्थ अध्यात्म है और वीर्य उसका अधिभूत तथा प्रजापति उसके अधिष्ठाता देवता कहे गये हैं ।। २६ १/२ ।। हस्तावध्यात्ममित्याहुरध्यात्मविदुषो जनाः ।। २७ ।। अधिभूतं च कर्माणि शक्रस्तत्राधिदैवतम् । अध्यात्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुष दोनों हाथोंको अध्यात्म बतलाते हैं। कर्म उनके अधिभूत और इन्द्र उनके अधिदेवता हैं ।। २७ १/२ ।। वैश्वदेवी ततः पूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते ।। २८ ।। वक्तव्यमधिभूतं च वह्निस्तत्राधिदैवतम् । विश्वकी देवी पहली वाणी यहाँ अध्यात्म कही गयी है। वक्तव्य उसका अधिभूत तथा अग्नि उसका अधिदैवत है ।। २८ १/२ ।। अध्यात्मं मन इत्याहुः पञ्चभूतात्मचारकम् ।। २९ ।। अधिभूतं च संकल्पश्चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् । पञ्चभूतोंका संचालन करनेवाला मन अध्यात्म कहा गया है। संकल्प उसका अधिभूत है और चन्द्रमा उसके अधिष्ठाता देवता माने गये हैं ।। २९ १/२ ।। अहंकारस्तथाध्यात्मं सर्वसंसारकारकम् ।। ३० ।। अभिमानोऽधिभूतं च रुद्रस्तत्राधिदैवतम् ।

सम्पूर्ण संसारको जन्म देनेवाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रुद्र उसके अधिष्ठाता देवता हैं ॥ ३० ½ ॥
अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी ॥ ३१ ॥
अधिभूतं तु मन्तव्यं ब्रह्मा तत्राधिदैवतम् ।
पाँच इन्द्रियों और छठे मनको जाननेवाली बुद्धिको अध्यात्म कहते हैं। मन्तव्य उसका अधिभूत और ब्रह्मा उसके अधिदेवता हैं ॥ ३१ ½ ॥
त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते ॥ ३२ ॥
स्थलमापस्तथाऽऽकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् ।
अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च ॥ ३३ ॥
चतुर्धा जन्म इत्येतद् भूतग्रामस्य लक्ष्यते ।
प्राणियोंके रहनेके तीन ही स्थान हैं—जल, थल और आकाश। चौथा स्थान सम्भव नहीं है। देहधारियोंका जन्म चार प्रकारका होता है—अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज। समस्त भूत-समुदायका यह चार प्रकारका ही जन्म देखा जाता है ॥ ३२-३३ ½ ॥
अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च ॥ ३४ ॥
अण्डजानि विजानीयात् सर्वांश्चैव सरीसृपान् ।
इनके अतिरिक्त जो दूसरे आकाशचारी प्राणी हैं तथा जो पेटसे चलनेवाले सर्प आदि हैं, उन सबको भी अण्डज जानना चाहिये ॥ ३४ ½ ॥
स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम् ॥ ३५ ॥
जन्म द्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते ।
पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जू आदि कीट और जन्तु स्वेदज कहे जाते हैं। यह क्रमशः दूसरा जन्म पहलेकी अपेक्षा निम्न स्तरका कहा जाता है ॥ ३५ ½ ॥
भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात् ॥ ३६ ॥
उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः ।
द्विजवरो! जो पृथिवीको फोड़कर समयपर उत्पन्न होते हैं, उन प्राणियोंको उद्भिज्ज कहते हैं ॥ ३६ ½ ॥
द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च ॥ ३७ ॥
जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः ।
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दो पैरवाले, बहुत पैरवाले एवं टेढ़े-मेढ़े चलनेवाले तथा विकृत रूपवाले प्राणी जरायुज हैं ॥ ३७ ½ ॥
द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातनी ॥ ३८ ॥
तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः ।

ब्राह्मणत्वका सनातन हेतु दो प्रकारका जानना चाहिये—तपस्या और पुण्यकर्मका अनुष्ठान; यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ ३८ १/२ ॥
विविधं कर्म विज्ञेयमिज्या दानं च तन्मखे ॥ ३९ ॥
जातस्याध्ययनं पुण्यमिति वृद्धानुशासनम् ।
कर्मके अनेक भेद हैं, उनमें पूजा, दान और यज्ञमें हवन करना—ये प्रधान हैं। वृद्ध पुरुषोंका कथन है कि द्विजोंके कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषके लिये वेदोंका अध्ययन करना भी पुण्यका कार्य है ॥ ३९ १/२ ॥
एतद् यो वेत्ति विधिवद् युक्तः स स्याद् द्विजर्षभाः ॥ ४० ॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्य इति चैव निबोधत ।
द्विजवरो! जो मनुष्य इस विषयको विधिपूर्वक जानता है, वह योगी होता है तथा उसे सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। इसे भलीभाँति समझो ॥ ४० १/२ ॥
यथावदध्यात्मविधिरेष वः कीर्तितो मया ॥ ४१ ॥
ज्ञानमस्य हि धर्मज्ञाः प्राप्तं ज्ञानवतामिह ।
इस प्रकार मैंने तुम लोगोंसे अध्यात्मविधिका यथावत् वर्णन किया। धर्मज्ञजन! ज्ञानी पुरुषोंको इस विषयका सम्यक् ज्ञान होता है ॥ ४१ १/२ ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च महाभूतानि पञ्च च ।
सर्वाण्येतानि संधाय मनसा सम्प्रधारयेत् ॥ ४२ ॥
इन्द्रियों, उनके विषयों और पञ्च महाभूतोंकी एकताका विचार करके उसे मनमें अच्छी तरह धारण कर लेना चाहिये ॥ ४२ ॥
क्षीणे मनसि सर्वस्मिन् न जन्मसुखमिष्यते ।
ज्ञानसम्पन्नसत्त्वानां तत् सुखं विदुषां मतम् ॥ ४३ ॥
मनके क्षीण होनेके साथ ही सब वस्तुओंका क्षय हो जानेपर मनुष्यको जन्मके सुख (लौकिक सुख-भोग आदि) की इच्छा नहीं होती। जिनका अन्तःकरण ज्ञानसे सम्पन्न होता है, उन विद्वानोंको उसीमें सुखका अनुभव होता है ॥ ४३ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम् ।
निवृत्तिं सर्वभूतेषु मृदुना दारुणेन च ॥ ४४ ॥
महर्षियो! अब मैं मनकी सूक्ष्म भावनाको जाग्रत् करनेवाली कल्याणमयी निवृत्तिके विषयमें उपदेश देता हूँ, जो कोमल और कठोर भावसे समस्त प्राणियोंमें रहती है ॥ ४४ ॥
गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम् ।
एतद् ब्रह्ममयं वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥ ४५ ॥
जहाँ गुण होते हुए भी नहींके बराबर हैं, जो अभिमानसे रहित और एकानाचार्यसे युक्त है तथा जिसमें भेद-दृष्टिका सर्वथा अभाव है, वही ब्रह्ममय बर्ताव बतलाया गया है, वही समस्त सुखोंका एकमात्र आधार है ॥ ४५ ॥

विद्वान् कूर्म इवाङ्गानि कामान् संहृत्य सर्वशः । विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा ॥ ४६ ॥ जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको सब ओरसे संकुचित करके रजोगुणसे रहित हो जाता है, वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं सदाके लिये सुखी हो जाता है ॥ ४६ ॥

कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः । सर्वभूतसुहृन्मित्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४७ ॥ जो कामनाओंको अपने भीतर लीन करके तृष्णासे रहित, एकाग्रचित्त तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् और मित्र होता है, वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ॥ ४७ ॥

इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम् । मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्माग्निः समिध्यते ॥ ४८ ॥ विषयोंकी अभिलाषा रखनेवाली समस्त इन्द्रियोंको रोककर जनसमुदायके स्थानका परित्याग करनेसे मुनिका अध्यात्मज्ञानरूपी तेज अधिक प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥

यथाग्निरिन्धनैरिद्धो महाज्योतिः प्रकाशते । तथेन्द्रियनिरोधेन महानात्मा प्रकाशते ॥ ४९ ॥ जैसे ईंधन डालनेसे आग प्रज्वलित होकर अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देती है, उसी प्रकार इन्द्रियोंका निरोध करनेसे परमात्माके प्रकाशका विशेष अनुभव होने लगता है ॥ ४९ ॥

यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽऽत्मनो हृदि । स्वयंज्योतिस्तदा सूक्ष्मात् सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५० ॥ जिस समय योगी प्रसन्नचित्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थित देखने लगता है, उस समय वह स्वयंज्योतिःस्वरूप होकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म सर्वोत्तम परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ५० ॥

अग्नी रूपं पयः स्रोतो वायुः स्पर्शनमेव च । मही पङ्कधरं घोरमाकाशश्रवणं तथा ॥ ५१ ॥ रोगशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम् पञ्चभूतसमायुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम् ॥ ५२ ॥ रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं च त्रिधातुकम् । संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा ॥ ५३ ॥ अग्नि जिसका रूप है, रुधिर जिसका प्रवाह है, पवन जिसका स्पर्श है, पृथिवी जिसमें हाड़-मांस आदि कठोर रूपमें प्रकट है, आकाश जिसका कान है, जो रोग और शोकसे चारों ओरसे घिरा हुआ है, जो पाँच प्रवाहोंसे आवृत है, जो पाँच भूतोंसे भलीभाँति युक्त है, जिसके नौ द्वार हैं, जिसके दो (जीव और ईश्वर) देवता हैं, जो रजोगुणमय, अदृश्य (नाशवान्), (सुख, दुःख और मोहरूप) तीन गुणोंसे तथा वात, पित्त और कफ—इन तीन

धातुओंसे युक्त है, जो संसर्गमें रत और जड है, उसको शरीर समझना चाहिये ॥ ५१—५३ ॥

दुश्चरं सर्वलोकेऽस्मिन् सत्त्वं प्रति समाश्रितम् ।
एतदेव हि लोकेऽस्मिन् कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ५४ ॥
जिसका सम्पूर्ण लोकमें विचरण करना दुःखद है, जो बुद्धिके आश्रित है, वही इस लोकमें कालचक्र है ॥ ५४ ॥

एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंज्ञितम् ।
विक्षिपेत् संक्षिपेच्चैव बोधयेत् सामरं जगत् ॥ ५५ ॥
यह कालचक्र घोर अगाध और मोह नामसे कहा जानेवाला बड़ा भारी समुद्ररूप है। यह देवताओंके सहित समस्त जगत्‌का संक्षेप और विस्तार करता है तथा सबको जगाता है ॥ ५५ ॥

कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमतथानृतम् ।
इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान् ॥ ५६ ॥
सदा इन्द्रियोंके निरोधसे मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य—इन सब दुस्त्यज अवगुणोंको त्याग देता है ॥ ५६ ॥

यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्चधातवः ।
व्योम्नि तस्य परं स्थानमानन्त्यमथ लभ्यते ॥ ५७ ॥
जिसने इस लोकमें तीन गुणोंवाले पाञ्चभौतिक देहका अभिमान त्याग दिया है, उसे अपने हृदयाकाशमें परब्रह्मरूप उत्तम पदकी उपलब्धि होती है—वह मोक्षको प्राप्त हो जाता है ॥ ५७ ॥

पञ्चेन्द्रियमहाकूलां मनोवेगमहोदकाम् ।
नदीं मोहह्रदां तीर्त्वा कामक्रोधावुभौ जयेत् ॥ ५८ ॥
स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति तत्परम् ।
जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी बड़े कगारे हैं, जो मनोवेग-रूपी महान् जलराशिसे भरी हुई है और जिसके भीतर मोहमय कुण्ड है, उस देहरूपी नदीको लाँघकर जो काम और क्रोध—दोनोंको जीत लेता है, वही सब दोषोंसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करता है ॥ ५८ १/२ ॥

मनो मनसि संधाय पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ ५९ ॥
सर्ववित् सर्वभूतेषु विन्दत्यात्मानमात्मनि ।
जो मनको हृदयकमलमें स्थापित करके अपने भीतर ही ध्यानके द्वारा आत्मदर्शनका प्रयत्न करता है, वह सम्पूर्ण भूतोंमें सर्वज्ञ होता है और उसे अन्तःकरणमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है ॥ ५९ १/२ ॥

एकधा बहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः ॥ ६० ॥

ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद दीपशतं यथा । जैसे एक दीपसे सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र-तत्र अनेक रूपोंमें उपलब्ध होता है। ऐसा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष निःसन्देह सब रूपोंको एकसे ही उत्पन्न देखता है ॥ ६० १/२ ॥

स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ॥ ६१ ॥ स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः । हृदयं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते ॥ ६२ ॥ वास्तवमें वही परमात्मा विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति, धाता, विधाता, प्रभु, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण प्राणियोंका हृदय तथा महान् आत्माके रूपमें प्रकाशित है ॥ ६१-६२ ॥

तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च यक्षाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति ॥ ६३ ॥ ब्राह्मणसमुदाय, देवता, असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और सम्पूर्ण महर्षि भी सदा उस परमात्माकी स्तुति करते हैं ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥