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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

हीनाः कृष्णेन पुत्रैश्च नाशकत् सोऽभिवीक्षितुम् ॥ ७ ॥ वहाँ पधारे हुए अर्जुनको देखते ही उन स्त्रियोंका आर्तनाद बहुत बढ़ गया। उन सबपर दृष्टि पड़ते ही अर्जुनकी आँखोंमें आँसू भर आये। पुत्रों और श्रीकृष्णसे हीन हुई उन अनाथ अबलाओंकी ओर उनसे देखा नहीं गया ॥ ६-७ ॥

स तां वृष्ण्यन्धकजलां हयमीनां रथोडुपाम् । वादित्ररथघोषौघां वेश्मतीर्थमहाह्रदाम् ॥ ८ ॥ रत्नशैवलसंघातां वज्रप्राकारमालिनीम् । रथ्यास्त्रोतोजलावर्तां चत्वरस्तिमितह्रदाम् ॥ ९ ॥ रामकृष्णमहाग्राहां द्वारकां सरितं तदा । कालपाशग्रहां भीमां नदीं वैतरणीमिव ॥ १० ॥ ददर्श वासविर्धीमान् विहीनां वृष्णिपुङ्गवैः । गतश्रियं निरानन्दां पद्मिनीं शिशिरे यथा ॥ ११ ॥ द्वारकापुरी एक नदीके समान थी। वृष्णि और अन्धकवंशके लोग उसके भीतर जलके समान थे। घोड़े मछलीके समान थे। रथ नावका काम करते थे। वाद्योंकी ध्वनि और रथकी घरघराहट मानो उस नदीके बहते हुए जलका कलकल नाद थी। लोगोंके घर ही तीर्थ एवं बड़े-बड़े जलाशय थे। रत्नोंकी राशि ही वहाँ सेवारसमूहके समान शोभा पाती थी। वज्र नामक मणिकी बनी हुई चहारदीवारी ही उसकी तटपंक्ति थी। सड़कें और गलियाँ उसमें जलके सोते और भँवरें थीं, चौराहे मानो उसके स्थिर जलवाले तालाब थे। बलराम और श्रीकृष्ण उसके भीतर दो बड़े-बड़े ग्राह थे। कालपाश ही उसमें मगर और घड़ियालके समान था। ऐसी द्वारकारूपी नदीको बुद्धिमान् अर्जुनने वृष्णिवीरोंसे रहित हो जानेके कारण वैतरणीके समान भयानक देखा। वह शिशिर कालकी कमलिनीके समान श्रीहीन तथा आनन्दशून्य जान पड़ती थी ॥ ८—११ ॥

तां दृष्ट्वा द्वारकां पार्थस्ताश्च कृष्णस्य योषितः । सस्वनं बाष्पमुत्सृज्य निपपात महीतले ॥ १२ ॥ वैसी द्वारकाको और उन श्रीकृष्णकी पत्नियोंको देखकर अर्जुन आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे और मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥

सात्राजिती ततः सत्या रुक्मिणी च विशाम्पते । अभिपत्य प्ररुरुदुः परिवार्य धनंजयम् ॥ १३ ॥ प्रजानाथ! तब सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा तथा रुक्मिणी आदि रानियाँ वहाँ दौड़ी आयीं और अर्जुनको घेरकर उच्च स्वरसे विलाप करने लगीं ॥ १३ ॥

ततस्तं काञ्चने पीठे समुत्थाप्योपवेश्य च । अब्रुवन्त्यो महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ॥ १४ ॥

तदनन्तर अर्जुनको उठाकर उन्होंने सोनेकी चौकीपर बिठाया और उन महात्माको घेरकर बिना कुछ बोले उनके पास बैठ गयीं ।। १४ ।।

ततः संस्तूय गोविन्दं कथयित्वा च पाण्डवः ।
आश्वास्य ताः स्त्रियश्चापि मातुलं द्रष्टुमभ्यगात् ।। १५ ।।

उस समय अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उनकी कथा कही और उन रानियोंको आश्वासन देकर वे अपने मामासे मिलनेके लिये गये ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि अर्जुनागमने पञ्चमोऽध्यायः ।। ५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें अर्जुनका आगमनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2463)

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षष्ठोऽध्यायः

द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

तं शयानं महात्मानं वीरमानकदुन्दुभिम् ।
पुत्रशोकेन संतप्तं ददर्श कुरुपुङ्गवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मामाके महलमें पहुँचकर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने देखा कि वीर महात्मा वसुदेवजी पुत्रशोकसे दुखी होकर पृथ्वीपर पड़े हुए हैं॥ १ ॥

तस्याश्रुपरिपूर्णाक्षो व्यूढोरस्को महाभुजः ।
आर्तस्यार्ततरः पार्थः पादौ जग्राह भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले कुन्तीकुमार अर्जुन अपने शोकाकुल मामाकी वह दशा देखकर अत्यन्त संतप्त हो उठे। उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और उन्होंने मामाके दोनों पैर पकड़ लिये ॥ २ ॥

तस्य मूर्धानमाघ्रातुमिषेषानकदुन्दुभिः ।
स्वस्रीयस्य महाबाहुर्न शशाक च शत्रुहन् ॥ ३ ॥
शत्रुघाती नरेश! महाबाहु आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-ने चाहा कि मैं अपने भानजे अर्जुनका मस्तक सूँघ लूँ; परंतु असमर्थतावश वे ऐसा न कर सके ॥ ३ ॥

समालिङ्ग्यार्जुनं वृद्धः स भुजाभ्यां महाभुजः ।
रुदन् पुत्रान् स्मरन् सर्वान् विललाप सुविह्वलः ॥ ४ ॥
भ्रातॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च दौहित्रान् ससखीनपि ।
महाबाहु बूढ़े वसुदेवजीने अपनी दोनों भुजाओंसे अर्जुनको खींचकर छातीसे लगा लिया और अपने समस्त पुत्रोंका स्मरण करके रोने लगे। फिर भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, दौहित्रों और मित्रोंका भी याद करके अत्यन्त व्याकुल हो वे विलाप करने लगे ॥ ४ ½ ॥

वसुदेव उवाच

यैर्जिता भूमिपालाश्च दैत्याश्च शतशोऽर्जुन ॥ ५ ॥
तान् दृष्ट्वा नेह पश्यामि जीवाम्यर्जुन दुर्मरः ।
**वसुदेव बोले—**अर्जुन! जिन वीरोंने सैकड़ों दैत्यों तथा राजाओंपर विजय पायी थी उन्हें आज यहाँ मैं नहीं देख पा रहा हूँ तो भी मेरे प्राण नहीं निकलते। जान पड़ता है, मेरे लिये मृत्यु दुर्लभ है ॥ ५ ½ ॥

यौ तावार्जुन शिष्यौ ते प्रियौ बहुमतौ सदा ॥ ६ ॥
तयोरपनयात् पार्थ वृष्णयो निधनं गताः ।

अर्जुन! जो तुम्हारे प्रिय शिष्य थे और जिनका तुम बहुत सम्मान किया करते थे उन्हीं दोनों (सात्यकि और प्रद्युम्न)-के अन्यायसे समस्त वृष्णिवंशी मृत्युको प्राप्त हो गये हैं ॥ ६ १/२ ॥

यौ तौ वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ मतौ ॥ ७ ॥
प्रद्युम्नो युयुधानश्च कथयन् कत्थसे च यौ ।
तौ सदा कुरुशार्दूल कृष्णस्य प्रियभाजनौ ॥ ८ ॥
तावुभौ वृष्णिनाशस्य मुखमास्तां धनंजय ।
कुरुश्रेष्ठ धनंजय! वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंमें जिन दोको ही अतिरथी माना जाता था तथा तुम भी चर्चा चलाकर जिनकी प्रशंसाके गीत गाते थे वे श्रीकृष्णके प्रीतिभाजन प्रद्युम्न और सात्यकि ही इस समय वृष्णिवंशियोंके विनाशके प्रमुख कारण बने हैं ॥

न तु गर्हामि शैनेयं हार्दिक्यं चाहमर्जुन ॥ ९ ॥
अक्रूरं रौक्मिणेयं च शापो ह्येवात्र कारणम् ।
अथवा अर्जुन! इस विषयमें मैं सात्यकि, कृतवर्मा, अक्रूर और प्रद्युम्नकी निन्दा नहीं करूँगा। वास्तवमें ऋषियोंका शाप ही यादवोंके इस सर्वनाशका प्रधान कारण है ॥

केशिनं यस्तु कंसं च विक्रम्य जगतः प्रभुः ॥ १० ॥

विदेहावकरोत् पार्थ चैद्यं च बलगर्वितम् । नैषादिमेकलव्यं च चक्रे कालिङ्गममागधान् ॥ ११ ॥ गान्धारान् काशिराजं च मरुभूमौ च पार्थिवान् । प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च पार्वतियांस्तथा नृपान् ॥ १२ ॥ सोऽभ्युपेक्षितवानेतमनयान्मधुसूदनः । कुन्तीनन्दन! जिन जगदीश्वरने पराक्रम प्रकट करके केशी और कंसको देह-बन्धनसे मुक्त कर दिया। बलका घमंड रखनेवाले चेदिराज शिशुपाल, निषादपुत्र एकलव्य, कलिंगराज, मगधनिवासी क्षत्रिय, गान्धार, काशिराज तथा मरुभूमिके राजाओंको भी यमलोक भेज दिया था, जिन्होंने पूर्व, दक्षिण तथा पर्वतीय प्रान्तके नरेशोंका भी संहार कर डाला था, उन्हीं मधुसूदनने बालकोंकी अनीतिके कारण प्राप्त हुए इस संकटकी उपेक्षा कर दी ॥ १०—१२ १/२ ॥

त्वं हि तं नारदश्चैव मुनयश्च सनातनम् ॥ १३ ॥ गोविन्दमनघं देवमभिजानीध्वमच्युतम् । प्रत्यपश्यच्च स विभुर्ज्ञातीक्षयमधोक्षजः ॥ १४ ॥ तुम, देवर्षि नारद तथा अन्य महर्षि भी श्रीकृष्णको पापके सम्पर्कसे रहित, सनातन, अच्युत परमेश्वररूपसे जानते हैं। वे ही सर्वव्यापी अधोक्षज अपने कुटुम्बीजनोंके इस विनाशको चुपचाप देखते रहे ॥ १३-१४ ॥

समुपेक्षितवान् नित्यं स्वयं स मम पुत्रकः । गान्धार्या वचनं यत् तदृषीणां च परंतप ॥ १५ ॥ तन्नूनमन्यथा कर्तुं नैच्छत् स जगतः प्रभुः । परंतप अर्जुन! मेरे पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए वे जगदीश्वर गान्धारी तथा महर्षियोंके शापको पलटना नहीं चाहते थे, इसीलिये उन्होंने सदा ही इस संकटकी उपेक्षा की ॥ १५ १/२ ॥

प्रत्यक्षं भवतश्चापि तव पौत्रः परंतप ॥ १६ ॥ अश्वत्थाम्ना हतश्चापि जीवितस्तस्य तेजसा । परंतप! तुम्हारा पौत्र परीक्षित् अश्वत्थामाद्वारा मार डाला गया था तो भी श्रीकृष्णके तेजसे वह जीवित हो गया। यह तो तुमलोगोंकी आँखों-देखी घटना है ॥

इमांस्तु नैच्छत् स्वान् ज्ञातीन् रक्षितुं च सखा तव ॥ १७ ॥ ततः पुत्रांश्च पौत्रांश्च भ्रातॄनथ सखींस्तथा । शयानान् निहतान् दृष्ट्वा ततो मामब्रवीदिदम् ॥ १८ ॥ इतने शक्तिशाली होते हुए भी तुम्हारे सखाने अपने इन भाई-बन्धुओंको प्राणसंकटसे बचानेकी इच्छा नहीं की। जब पुत्र, पौत्र, भाई और मित्र सभी एक-दूसरेके हाथसे मरकर

धराशायी हो गये तब उन्हें उस अवस्थामें देखकर श्रीकृष्ण मेरे पास आये और इस प्रकार बोले— ।। १७-१८ ।।

सम्प्राप्तोऽद्यायमस्यान्तः कुलस्य पुरुषर्षभ ।
आगमिष्यति बीभत्सुरिमां द्वारवतीं पुरीम् ।। १९ ।।
आख्येयं तस्य यद् वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् ।
‘पुरुषप्रवर पिताजी! आज इस कुलका संहार हो गया। अर्जुन द्वारकापुरीमें आनेवाले हैं। आनेपर उनसे वृष्णिवंशियोंके इस महान् विनाशका वृत्तान्त कहियेगा ।।

स तु श्रुत्वा महातेजा यदूनां निधनं प्रभो ।। २० ।।
आगन्ता क्षिप्रमेवेह न मेऽत्रास्ति विचारणा ।
‘प्रभो! अर्जुनके पास संदेश भी पहुँचा होगा। वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार यदुवंशियोंके विनाशका यह समाचार सुनकर शीघ्र ही यहाँ आ पहुँचेंगे। इस विषयमें मेरा कोई अन्यथा विचार नहीं है ।। २० १/२ ।।

योऽहं तमर्जुनं विद्धि योऽर्जुनः सोऽहमेव तु ।। २१ ।।
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति बुद्ध्यस्व माधव ।
‘जो मैं हूँ उसे अर्जुन समझिये, जो अर्जुन हैं वह मैं ही हूँ। माधव! अर्जुन जो कुछ भी कहें वैसा ही आपलोगोंको करना चाहिये। इस बातको अच्छी तरह समझ लें ।। २१ १/२ ।।

स स्त्रीषु प्राप्तकालासु पाण्डवो बालकेषु च ।। २२ ।।
प्रतिपत्स्यति बीभत्सुर्भवतश्चौर्ध्वदेहिकम् ।
‘जिन स्त्रियोंका प्रसवकाल समीप हो, उनपर और छोटे बालकोंपर अर्जुन विशेषरूपसे ध्यान देंगे और वे ही आपका और्ध्वदेहिक संस्कार भी करेंगे ।। २२ १/२ ।।

इमां च नगरीं सद्यः प्रतियाते धनंजये ।। २३ ।।
प्राकाराट्टालकोपेतां समुद्रः प्लावयिष्यति ।
‘अर्जुनके चले जानेपर चहारदीवारी और अट्टालिकाओं सहित इस नगरीको समुद्र तत्काल डुबो देगा ।। २३ १/२ ।।

अहं देशे तु कस्मिंश्चित् पुण्ये नियममास्थितः ।। २४ ।।
कालं काङ्क्षे सद्य एव रामेण सह धीमता ।
‘मैं किसी पवित्र स्थानमें रहकर शौच-संतोषादि नियमोंका आश्रय ले बुद्धिमान् बलरामजीके साथ शीघ्र ही कालकी प्रतीक्षा करूँगा’ ।। २४ १/२ ।।

एवमुक्त्वा हृषीकेशो मामचिन्त्यपराक्रमः ।। २५ ।।
हित्वा मां बालकैः सार्धं दिशं कामप्यगात् प्रभुः ।
ऐसा कहकर अचित्य पराक्रमी प्रभावशाली श्रीकृष्ण बालकोंके साथ मुझे छोड़कर किसी अज्ञात दिशाको चले गये है ।। २५ १/२ ।।

सोऽहं तौ च महात्मानौ चिन्तयन् भ्रातरौ तव ॥ २६ ॥
घोरं ज्ञातिवधं चैव न भुञ्जे शोककर्शितः ।
न भोक्ष्ये न च जीविष्ये दिष्ट्या प्राप्तोऽसि पाण्डव ॥ २७ ॥

तबसे मैं तुम्हारे दोनों भाई महात्मा बलराम और श्रीकृष्णका तथा कुटुम्बीजनोंके इस घोर संहारका चिन्तन करके शोकसे गलता जा रहा हूँ। मुझसे भोजन नहीं किया जाता। अब मैं न तो भोजन करूँगा और न इस जीवनको ही रखूँगा। पाण्डुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम यहाँ आ गये ॥ २६-२७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2468)

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वसुदेवजी अर्जुनको यादव-विनाशका वृत्तान्त और श्रीकृष्णका संदेश सुना रहे हैं

यदुक्तं पार्थ कृष्णेन तत् सर्वमखिलं कुरु ।
एतत् ते पार्थ राज्यं च स्त्रियो रत्नानि चैव हि ।
इष्टान् प्राणानहं हीमांस्त्यक्ष्यामि रिपुसूदन ।। २८ ।।

पार्थ! श्रीकृष्णने जो कुछ कहा है, वह सब करो। यह राज्य, ये स्त्रियाँ और ये रत्न— सब तुम्हारे अधीन हैं। शत्रुसूदन! अब मैं निश्चिन्त होकर अपने इन प्यारे प्राणोंका परित्याग करूँगा ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि अर्जुनवसुदेवसंवादे षष्ठोऽध्यायः ।। ६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें अर्जुन और वसुदेवका संवादविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ।। ६ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2470)

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सप्तमोऽध्यायः

वसुदेवजी तथा मौसलयुद्धमें मरे हुए यादवोंका अन्त्येष्टि संस्कार करके अर्जुनका द्वारकावासी स्त्री-पुरुषोंको अपने साथ ले जाना, समुद्रका द्वारकाको डुबो देना और मार्गमें अर्जुनपर डाकुओंका आक्रमण, अवशिष्ट यादवोंको अपनी राजधानीमें बसा देना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स बीभत्सुर्मातुलेन परंतप ।
दुर्मना दीनवदनो वसुदेवमुवाच ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—परंतप! अपने मामा वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर अर्जुन मन-ही-मन बहुत दुखी हुए। उनका मुख मलिन हो गया। वे वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

नाहं वृष्णिप्रवीरेण बन्धुभिश्चैव मातुल ।
विहीनां पृथिवीं द्रष्टुं शक्ष्यामीह कथंचन ॥ २ ॥
‘मामाजी! वृष्णिवंशके प्रमुख वीर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अपने भाइयोंसे हीन हुई यह पृथ्वी मुझसे अब किसी तरह देखी नहीं जा सकेगी ॥ २ ॥

राजा च भीमसेनश्च सहदेवश्च पाण्डवः ।
नकुलो याज्ञसेनी च षडेकमनसो वयम् ॥ ३ ॥
‘राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, पाण्डव सहदेव, नकुल, द्रौपदी तथा मैं—ये छः व्यक्ति एक ही हृदय रखते हैं (इनमेंसे कोई भी अब यहाँ रहना नहीं चाहेगा) ॥ ३ ॥

राज्ञः संक्रमणे चापि कालोऽयं वर्तते ध्रुवम् ।
तमिमं विद्धि सम्प्राप्तं कालं कालविदां वर ॥ ४ ॥
‘राजा युधिष्ठिरके भी परलोक-गमनका समय निश्चय ही आ गया है। कालज्ञोंमें श्रेष्ठ मामाजी! यह वही काल प्राप्त हुआ है—ऐसा समझें ॥ ४ ॥

सर्वथा वृष्णिदारांस्तु बालं वृद्धं तथैव च ।
नयिष्ये परिगृह्याहमिन्द्रप्रस्थमरिंदम ॥ ५ ॥
‘शत्रुदमन! अब मैं वृष्णिवंशकी स्त्रियों, बालकों और बूढ़ोंको अपने साथ ले जाकर इन्द्रप्रस्थ पहुँचाऊँगा’ ॥ ५ ॥

इत्युक्त्वा दारुकमिदं वाक्यमाह धनंजयः ।
अमात्यान् वृष्णिवीराणां द्रष्टुमिच्छामि मा चिरम् ॥ ६ ॥

मामासे यों कहकर अर्जुनने दारुकसे कहा—'अब मैं वृष्णिवंशी वीरोंके मन्त्रियोंसे शीघ्र मिलना चाहता हूँ' ॥ ६ ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं सुधर्मां यादवीं सभाम् । प्रविवेशार्जुनः शूरः शोचमानो महारथान् ॥ ७ ॥

ऐसा कहकर शूरवीर अर्जुन यादव महारथियोंके लिये शोक करते हुए यादवोंकी सुधर्मा नामक सभामें प्रविष्ट हुए ॥ ७ ॥

तमासनगतं तत्र सर्वाः प्रकृतयस्तथा । ब्राह्मणा नैगमास्तत्र परिवार्योपतस्थिरे ॥ ८ ॥

वहाँ एक सिंहासनपर बैठे हुए अर्जुनके पास मन्त्री आदि समस्त प्रकृतिवर्गके लोग तथा वेदवेत्ता ब्राह्मण आये और उन्हें सब ओरसे घेरकर पास ही बैठ गये ॥ ८ ॥

तान् दीनमनसः सर्वान् विमूढान् गतचेतसः । उवाचेदं वचः काले पार्थो दीनतरस्तथा ॥ ९ ॥

उन सबके मनमें दीनता छा गयी थी। सभी किंकर्तव्यविमूढ़ एवं अचेत हो रहे थे। अर्जुनकी दशा तो उनसे भी अधिक दयनीय थी। वे उन सभासदोंसे समयोचित वचन बोले— ॥ ९ ॥

शक्रप्रस्थमहं नेष्ये वृष्ण्यन्धकजनं स्वयम् । इदं तु नगरं सर्वं समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ १० ॥ सज्जीकुरुत यानानि रत्नानि विविधानि च । वज्रोऽयं भवतां राजा शक्रप्रस्थे भविष्यति ॥ ११ ॥

'मन्त्रियो! मैं वृष्णि और अन्धकवंशके लोगोंको अपने साथ इन्द्रप्रस्थ ले जाऊँगा; क्योंकि समुद्र अब इस सारे नगरको डुबो देगा; अतः तुमलोग तरह-तरहके वाहन और रत्न लेकर तैयार हो जाओ। इन्द्रप्रस्थमें चलनेपर ये श्रीकृष्ण-पौत्र वज्र तुमलोगोंके राजा बनाये जायँगे ॥

सप्तमे दिवसे चैव रवौ विमल उद्गते । बहिर्वत्स्यामहे सर्वे सज्जीभवत मा चिरम् ॥ १२ ॥

'आजके सातवें दिन निर्मल सूर्योदय होते ही हम सब लोग इस नगरसे बाहर हो जायँगे। इसलिये सब लोग शीघ्र तैयार हो जाओ, विलम्ब न करो' ॥ १२ ॥

इत्युक्तास्तेन ते सर्वे पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । सज्जमाशु ततश्चक्रुः स्वसिद्धयर्थं समुत्सुकाः ॥ १३ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर समस्त मन्त्रियोंने अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर शीघ्र ही तैयारी आरम्भ कर दी ॥ १३ ॥

तां रात्रिमवसत् पार्थः केशवस्य निवेशने ।

महता शोकमोहेन सहसाभिपरिप्लुतः ॥ १४ ॥ अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके महलमें ही उस रातको निवास किया। वे वहाँ पहुँचते ही सहसा महान् शोक और मोहमें डूब गये ॥ १४ ॥

श्वोभूतेऽथ ततः शौरिर्वसुदेवः प्रतापवान् । युक्त्वाऽऽत्मानं महातेजा जगाम गतिमुत्तमाम् ॥ १५ ॥ सबेरा होते ही महातेजस्वी शूरनन्दन प्रतापी वसुदेवजीने अपने चित्तको परमात्मामें लगाकर योगके द्वारा उत्तम गति प्राप्त की ॥ १५ ॥

ततः शब्दो महानासीद् वसुदेवनिवेशने । दारुणः क्रोशतीनां च रुदतीनां च योषिताम् ॥ १६ ॥ फिर तो वसुदेवजीके महलमें बड़ा भारी कुहराम मचा। रोती-चिल्लाती हुई स्त्रियोंका आर्तनाद बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ १६ ॥

प्रकीर्णमूर्धजाः सर्वा विमुक्ताभरणस्रजः । उरांसि पाणिभिर्घ्नन्त्यो व्यलपन् करुणं स्त्रियः ॥ १७ ॥ उन सबके बाल खुले हुए थे। उन्होंने आभूषण और मालाएँ तोड़कर फेंक दी थीं और वे सारी स्त्रियाँ अपने हाथोंसे छाती पीटती हुई करुणाजनक विलाप कर रही थीं ॥ १७ ॥

तं देवकी च भद्रा च रोहिणी मदिरा तथा । अन्वारोहन्त च तदा भर्तारं योषितां वराः ॥ १८ ॥ युवतियोंमें श्रेष्ठ देवकी, भद्रा, रोहिणी तथा मदिरा—ये सब-की-सब अपने पतिके साथ चितापर आरूढ़ होनेको उद्यत हो गयीं ॥ १८ ॥

ततः शौरिं नृयुक्तेन बहुमूल्येन भारत । यानेन महता पार्थो बहिर्निष्क्रामयत् तदा ॥ १९ ॥ भारत! तदनन्तर अर्जुनने एक बहुमूल्य विमान सजाकर उसपर वसुदेवजीके शवको सुलाया और मनुष्योंके कंधोंपर उठवाकर वे उसे नगरसे बाहर ले गये ॥

तमन्वयुस्तत्र तत्र दुःखशोकसमन्विताः । द्वारकावासिनः सर्वे पौरजानपदा हिताः ॥ २० ॥ उस समय समस्त द्वारकावासी तथा आनर्त जनपदके लोग जो यादवोंके हितैषी थे, वहाँ दुःख-शोकमें मग्न होकर वसुदेवजीके शवके पीछे-पीछे गये ॥ २० ॥

तस्याश्वमेधिकं छत्रं दीप्यमानाश्च पावकाः । पुरस्तात् तस्य यानस्य याजकाश्च ततो ययुः ॥ २१ ॥ उनकी अरथीके आगे-आगे अश्वमेध-यज्ञमें उपयोग किया हुआ छत्र तथा अग्निहोत्रकी प्रज्वलित अग्नि लिये याजक ब्राह्मण चल रहे थे ॥ २१ ॥

अनुजग्मुश्च तं वीरं देव्यस्ता वै स्वलंकृताः । स्त्रीसहस्रैः परिवृता वधूभिश्च सहस्रशः ॥ २२ ॥

वीर वसुदेवजीकी पत्नियाँ वस्त्र और आभूषणोंसे सज-धजकर हजारों पुत्रवधुओं तथा अन्य स्त्रियोंके साथ अपने पतिकी अर्थीके पीछे-पीछे जा रही थीं ।। यस्तु देशः प्रियस्तस्य जीवतोऽभून्महात्मनः । तत्रैनमुपसंकल्प्य पितृमेधं प्रचक्रिरे ।। २३ ।। महात्मा वसुदेवजीको अपने जीवनकालमें जो स्थान विशेष प्रिय था, वहीं ले जाकर अर्जुन आदिने उनका पितृमेधकर्म (दाह-संस्कार) किया ।। २३ ।। तं चिताग्निगतं वीरं शूरपुत्रं वराङ्गनाः । ततोऽन्वारुरुहुः पत्न्यश्चतस्रः पतिलोकगाः ।। २४ ।। चिताकी प्रज्वलित अग्निमें सोये हुए वीर शूरपुत्र वसुदेवजीके साथ उनकी पूर्वोक्त चारों पत्नियाँ भी चितापर जा बैठीं और उन्हींके साथ भस्म हो पतिलोकको प्राप्त हुईं ।। २४ ।। तं वै चतसृभिः स्त्रीभिरन्वितं पाण्डुनन्दनः । अदाहयच्चन्दनैश्च गन्धैरुच्चावचैरपि ।। २५ ।। चारों पत्नियोंसे संयुक्त हुए वसुदेवजीके शवका पाण्डुनन्दन अर्जुनने चन्दनकी लकड़ियों तथा नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंद्वारा दाह किया ।। २५ ।। ततः प्रादुरभूच्छब्दः समिद्धस्य विभावसोः । सामगानां च निर्घोषो नराणां रुदतामपि ।। २६ ।। उस समय प्रज्वलित अग्निका चट-चट शब्द, सामगान करनेवाले ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोच्चारणका गम्भीर घोष तथा रोते हुए मनुष्योंका आर्तनाद एक साथ ही प्रकट हुआ ।। २६ ।। ततो वज्रप्रधानास्ते वृष्ण्यन्धककुमारकाः । सर्वे चैवोदकं चक्रुः स्त्रियश्चैव महात्मनः ।। २७ ।। इसके बाद वज्र आदि वृष्णि और अन्धकवंशके कुमारों तथा स्त्रियोंने महात्मा वसुदेवजीको जलांजलि दी ।। २७ ।। अलुप्तधर्मस्तं धर्मं कारयित्वा स फाल्गुनः । जगाम वृष्णयो यत्र विनष्टा भरतर्षभ ।। २८ ।। भरतश्रेष्ठ! अर्जुनने कभी धर्मका लोप नहीं किया था। वह धर्मकृत्य पूर्ण कराकर अर्जुन उस स्थानपर गये जहाँ वृष्णियोंका संहार हुआ था ।। २८ ।। स तान् दृष्ट्वा निपतितान् कदने भृशदुःखितः । बभूवातीव कौरव्यः प्राप्तकालं चकार ह ।। २९ ।। यथा प्रधानतश्चैव चक्रे सर्वास्तथा क्रियाः । ये हता ब्रह्मशापेन मुसलैरैरकोद्भवैः ।। ३० ।। उस भीषण मारकाटमें मरकर धराशायी हुए यादवोंको देखकर कुरुकुलनन्दन अर्जुनको बड़ा भारी दुःख हुआ। उन्होंने ब्रह्मशापके कारण एरकासे उत्पन्न हुए मूसलोंद्वारा

मारे गये यदुवंशी वीरोंके बड़े-छोटेके क्रमसे सारे समयोचित कार्य (अन्त्येष्टि कर्म) सम्पन्न किये ॥ २९-३० ॥

ततः शरीरे रामस्य वासुदेवस्य चोभयोः ।
अन्विष्य दाहयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ ३१ ॥
तदनन्तर विश्वस्त पुरुषोंद्वारा बलराम तथा वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण दोनोंके शरीरोंकी खोज कराकर अर्जुनने उनका भी दाह-संस्कार किया ॥ ३१ ॥

स तेषां विधिवत् कृत्वा प्रेतकार्याणि पाण्डवः ।
सप्तमे दिवसे प्रायाद् रथमारुह्य सत्वरः ॥ ३२ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन उन सबके प्रेतकर्म विधिपूर्वक सम्पन्न करके तुरन्त रथपर आरूढ़ हो सातवें दिन द्वारकासे चल दिये ॥ ३२ ॥

अश्वयुक्तै रथैश्चापि गोखरोष्ट्रयुतैरपि ।
स्त्रियस्ता वृष्णिवीराणां रुदत्यः शोककर्शिताः ॥ ३३ ॥
अनुजग्मुर्महात्मानं पाण्डुपुत्रं धनंजयम् ।
उनके साथ घोड़े, बैल, गधे और ऊँटोंसे जुते हुए रथोंपर बैठकर शोकसे दुर्बल हुई वृष्णिवंशी वीरोंकी पत्नियाँ रोती हुई चलीं। उन सबने पाण्डुपुत्र महात्मा अर्जुनका अनुगमन किया ॥ ३३ ½ ॥

भृत्याश्चान्धकवृष्णीनां सादिनो रथिनश्च ये ॥ ३४ ॥
वीरहीनं वृद्धबालं पौरजानपदास्तथा ।
ययुस्ते परिवार्याथ कलत्रं पार्थशासनात् ॥ ३५ ॥
अर्जुनकी आज्ञासे अन्धकों और वृष्णियोंके नौकर, घुड़सवार, रथी तथा नगर और प्रान्तके लोग बूढ़े और बालकोंसे युक्त विधवा स्त्रियोंको चारों ओरसे घेरकर चलने लगे ॥ ३४-३५ ॥

कुञ्जरैश्च गजारोहा ययुः शैलनिभैस्तथा ।
सपादरक्षैः संयुक्ताः सान्तरायुधिका ययुः ॥ ३६ ॥
हाथीसवार पर्वताकार हाथियोंद्वारा गुप्तरूपसे अस्त्र-शस्त्र धारण किये यात्रा करने लगे। उनके साथ हाथियोंके पादरक्षक भी थे ॥ ३६ ॥

पुत्रांश्चान्धकवृष्णीनां सर्वे पार्थमनुव्रताः ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महाधनाः ॥ ३७ ॥
दश षट् च सहस्राणि वासुदेवावरोधनम् ।
पुरस्कृत्य ययुर्वज्रं पौत्रं कृष्णस्य धीमतः ॥ ३८ ॥
अन्धक और वृष्णिवंशके समस्त बालक अर्जुनके प्रति श्रद्धा रखनेवाले थे। वे तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, महाधनी शूद्र और भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार स्त्रियाँ—ये सब-की-सब बुद्धिमान् श्रीकृष्णके पौत्र वज्रको आगे करके चल रहे थे ॥ ३७-३८ ॥

बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । भोजवृष्ण्यन्धकस्त्रीणां हतनाथानि निर्ययुः ॥ ३९ ॥ तत्सागरसमप्रख्यं वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत् । उवाह रथिनां श्रेष्ठः पार्थः परपुरंजयः ॥ ४० ॥ भोज, वृष्णि और अन्धक कुलकी अनाथ स्त्रियोंकी संख्या कई हजारों, लाखों और अर्बुदोंतक पहुँच गयी थी। वे सब द्वारकापुरीसे बाहर निकलीं। वृष्णियोंका वह महान् समृद्धिशाली मण्डल महासागरके समान जान पड़ता था। शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन उसे अपने साथ लेकर चले ॥ ३९-४० ॥

निर्याते तु जने तस्मिन् सागरो मकरालयः । द्वारकां रत्नसम्पूर्णां जलेनाप्लावयत् तदा ॥ ४१ ॥ उस जनसमुदायके निकलते ही मगरों और घड़ियालोंके निवासस्थान समुद्रने रत्नोंसे भरी-पूरी द्वारका नगरीको जलसे डुबो दिया ॥ ४१ ॥

यद् यद्धि पुरुषव्याघ्रो भूमेस्तस्या व्यमुञ्चत । तत् तत् सम्प्लावयामास सलिलेन स सागरः ॥ ४२ ॥ पुरुषसिंह अर्जुनने उस नगरका जो-जो भाग छोड़ा, उसे समुद्रने अपने जलसे आप्लावित कर दिया ॥ ४२ ॥

तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य द्वारकावासिनो जनाः । तूर्णात् तूर्णतरं जग्मुरहो दैवमिति ब्रुवन् ॥ ४३ ॥ यह अद्भुत दृश्य देखकर द्वारकावासी मनुष्य बड़ी तेजीसे चलने लगे। उस समय उनके मुखसे बारंबार यही निकलता था कि ‘दैवकी लीला विचित्र है’ ॥ ४३ ॥

काननेषु च रम्येषु पर्वतेषु नदीषु च । निवसन्नानयामास वृष्णिदारान् धनंजयः ॥ ४४ ॥ अर्जुन रमणीय काननों, पर्वतों और नदियोंके तटपर निवास करते हुए वृष्णिवंशकी स्त्रियोंको ले जा रहे थे ॥

स पञ्चनदमासाद्य धीमानतिसमृद्धिमत् । देशे गोपशुधान्याढ्ये निवासमकरोत् प्रभुः ॥ ४५ ॥ चलते-चलते बुद्धिमान् एवं सामर्थ्यशाली अर्जुनने अत्यन्त समृद्धिशाली पंचनद देशमें पहुँचकर जो गौ, पशु तथा धन-धान्यसे सम्पन्न था, ऐसे प्रदेशमें पड़ाव डाला ॥ ४५ ॥

ततो लोभः समभवद् दस्यूनां निहतेश्वराः । दृष्ट्वा स्त्रियो नीयमानाः पार्थेनैकेन भारत ॥ ४६ ॥ भरतनन्दन! एकमात्र अर्जुनके संरक्षणमें ले जायी जाती हुई इतनी अनाथ स्त्रियोंको देखकर वहाँ रहने-वाले लुटेरोंके मनमें लोभ पैदा हुआ ॥ ४६ ॥

ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतसः ।

आभीरा मन्त्रयामासुः समेत्याशुभदर्शनाः ॥ ४७ ॥ लोभसे उनके चित्तकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। उन अशुभदर्शी पापाचारी आभीरोंने परस्पर मिलकर सलाह की ॥ ४७ ॥ अयमेकोऽर्जुनो धन्वी वृद्धबालं हतेश्वरम् । नयत्यस्मानतिक्रम्य योधाश्चेमे हतौजसः ॥ ४८ ॥ ‘भाइयो! देखो, यह अकेला धनुर्धर अर्जुन और ये हतोत्साह सैनिक हमलोगोंको लाँघकर वृद्धों और बालकोंके इस अनाथ समुदायको लिये जा रहे हैं (अतः इनपर आक्रमण करना चाहिये)’ ॥ ४८ ॥ ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः । अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्त्रहारिणः ॥ ४९ ॥ ऐसा निश्चय करके लूटका माल उड़ानेवाले वे लठ्ठधारी लुटेरे वृष्णिवंशियोंके उस समुदायपर हजारोंकी संख्यामें टूट पड़े ॥ ४९ ॥ महता सिंहनादेन त्रासयन्तः पृथग्जनम् । अभिपेतुर्र्वधार्थं ते कालपर्यायचोदिताः ॥ ५० ॥ समयके उलट-फेरसे प्रेरणा पाकर वे लुटेरे उन सबके वधके लिये उतारू हो अपने महान् सिंहनादसे साधारण लोगोंको डराते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ ५० ॥ ततो निवृत्तः कौन्तेयः सहसा सपदानुगः । उवाच तान् महाबाहुरर्जुनः प्रहसन्निव ॥ ५१ ॥ आक्रमणकारियोंको पीछेकी ओरसे धावा करते देख कुन्तीकुमार महाबाहु अर्जुन सेवकोंसहित सहसा लौट पड़े और उनसे हँसते हुए-से-बोले— ॥ ५१ ॥ निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि जीवितुमिच्छथ । इदानीं शरनिर्भिन्नाः शोचध्वं निहता मया ॥ ५२ ॥ ‘धर्मको न जाननेवाले पापियो! यदि जीवित रहना चाहते हो तो लौट जाओ; नहीं तो मेरे द्वारा मारे जाकर या मेरे बाणोंसे विदीर्ण होकर इस समय तुम बड़े शोकमें पड़ जाओगे’ ॥ ५२ ॥ तथोक्तास्तेन वीरेण कदर्थीकृत्य तद्वचः । अभिपेतुरर्जुनं मूढा वार्यमाणाः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥ वीरवर अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनकी बातोंकी अवहेलना करके वे मूर्ख अहीर उनके बारंबार मना करनेपर भी उस जनसमुदायपर टूट पड़े ॥ ५३ ॥ ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत् । आरोपयितुमारेभे यत्नादिव कथंचन ॥ ५४ ॥ तब अर्जुनने अपने दिव्य एवं कभी जीर्ण न होनेवाले विशाल धनुष गाण्डीवको चढ़ाना आरम्भ किया और बड़े प्रयत्नसे किसी तरह उसे चढ़ा दिया ॥

चकार सज्जं कृच्छ्रेण सम्भ्रमे तुमुले सति । चिन्तयामास शस्त्राणि न च सस्मार तान्यपि ॥ ५५ ॥ भयंकर मार-काट छिड़नेपर बड़ी कठिनाईसे उन्होंने धनुषपर प्रत्यञ्चा तो चढ़ा दी; परंतु जब वे अपने अस्त्र-शस्त्रोंका चिन्तन करने लगे तब उन्हें उनकी याद बिलकुल नहीं आयी ॥ ५५ ॥

वैकृतं तन्महद् दृष्ट्वा भुजवीर्ये तथा युधि । दिव्यानां च महास्त्राणां विनाशाद् व्रीडितोऽभवत् ॥ ५६ ॥ युद्धके अवसरपर अपने बाहुबलमें यह महान् विकार आया देख और महान् दिव्यास्त्रोंका विस्मरण हुआ जान वे लज्जित हो गये ॥ ५६ ॥

वृष्णियोधाश्च ते सर्वे गजाश्वरथयोधिनः । न शेकुरावर्तयितुं ह्रियमाणं च तं जनम् ॥ ५७ ॥ हाथी, घोड़े और रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले समस्त वृष्णिसैनिक भी उन डाकुओंके हाथमें पड़े हुए अपने मनुष्योंको लौटा न सके ॥ ५७ ॥

कलत्रस्य बहुत्वार्द्धि सम्पतत्सु ततस्ततः । प्रयत्नमकरोत् पार्थो जनस्य परिरक्षणे ॥ ५८ ॥ उस समुदायमें स्त्रियोंकी संख्या बहुत थी; इसलिये डाकू कई ओरसे उनपर धावा करने लगे तो भी अर्जुन उनकी रक्षाका यथासाध्य प्रयत्न करते रहे ॥ ५८ ॥

मिषतां सर्वयोधानां ततस्ताः प्रमदोत्तमाः । समन्ततोऽवकृष्यन्त कामाच्चान्याः प्रवव्रजुः ॥ ५९ ॥ सब योद्धाओंके देखते-देखते वे डाकू उन सुन्दरी स्त्रियोंको चारों ओरसे खींच-खींचकर ले जाने लगे। दूसरी स्त्रियाँ उनके स्पर्शके भयसे उनकी इच्छाके अनुसार चुपचाप उनके साथ चली गयीं ॥ ५९ ॥

ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैः पार्थो धनंजयः । जघान दस्यून् सोद्वेगो वृष्णिभृत्यैः सहस्रशः ॥ ६० ॥ तब कुन्तीकुमार अर्जुन उद्विग्न होकर सहस्रों वृष्णिसैनिकोंको साथ ले गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उन लुटेरोंके प्राण लेने लगे ॥ ६० ॥

क्षणेन तस्य ते राजन् क्षयं जग्मुरजिह्मगाः । अक्षया हि पुरा भूत्वा क्षीणाः क्षतजभोजनाः ॥ ६१ ॥ राजन्! अर्जुनके सीधे जानेवाले बाण क्षणभरमें क्षीण हो गये। जो रक्तभोगी बाण पहले अक्षय थे वे ही उस समय सर्वथा क्षयको प्राप्त हो गये ॥ ६१ ॥

स शरक्षयमासाद्य दुःखशोकसमाहतः । धनुष्कोट्या तदा दस्यूनवधीत् पाकशासनिः ॥ ६२ ॥

बाणोंके समाप्त हो जानेपर दुःख और शोकके आघात सहते हुए इन्द्रकुमार अर्जुन धनुषकी नोकसे ही उन डाकुओंका वध करने लगे ॥ ६२ ॥

प्रेक्षतस्त्वेव पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवरस्त्रियः । जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समन्ताज्जनमेजय ॥ ६३ ॥

जनमेजय! अर्जुन देखते ही रह गये और वे म्लेच्छ डाकू सब ओरसे वृष्णि और अन्धकवंशकी सुन्दरी स्त्रियोंको लूट ले गये ॥ ६३ ॥

धनंजयस्तु दैवं तन्मनसाऽचिन्तयत् प्रभुः । दुःखशोकसमाविष्टो निःश्वासपरमोऽभवत् ॥ ६४ ॥

प्रभावशाली अर्जुनने मन-ही-मन इसे दैवका विधान समझा और दुःख-शोकमें डूबकर वे लंबी साँस लेने लगे ॥ ६४ ॥

अस्त्राणां च प्रणाशेन बाहुवीर्यस्य संक्षयात् । धनुषश्चाविधेयत्वाच्छराणां संक्षयेण च ॥ ६५ ॥ बभूव विमनाः पार्थो दैवमित्यनुचिन्तयन् ।

अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान लुप्त हो गया। भुजाओंका बल भी घट गया। धनुष भी काबूके बाहर हो गया और अक्षयबाणोंका भी क्षय हो गया। इन सब बातोंसे अर्जुनका मन उदास हो गया। वे इन सब घटनाओंको दैवका विधान मानने लगे ॥ ६५½ ॥

न्यवर्तत ततो राजन् नेदमस्तीति चाब्रवीत् ॥ ६६ ॥

राजन्! तदनन्तर अर्जुन युद्धसे निवृत्त हो गये और बोले—‘यह अस्त्रज्ञान आदि कुछ भी नित्य नहीं है’ ॥ ६६ ॥

ततः शेषं समादाय कलत्रस्य महामतिः । हृतभूयिष्ठरत्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरत् ॥ ६७ ॥

फिर अपहरणसे बची हुई स्त्रियों और जिनका अधिक भाग लूट लिया गया था ऐसे बचे-खुचे रत्नोंको साथ लेकर परम बुद्धिमान् अर्जुन कुरुक्षेत्रमें उतरे ॥ ६७ ॥

एवं कलत्रमानीय वृष्णीनां हतशेषितम् । निवेशयत कौरव्यस्तत्र तत्र धनंजयः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार अपहरणसे बची हुई वृष्णिवंशकी स्त्रियोंको ले आकर कुरुनन्दन अर्जुनने उनको जहाँ-तहाँ बसा दिया ॥ ६८ ॥

हार्दिक्यतनयं पार्थो नगरे मार्तिकावते । भोजराजकलत्रं च हृतशेषं नरोत्तमः ॥ ६९ ॥

कृतवर्माके पुत्रको और भोजराजके परिवारकी अपहरणसे बची हुई स्त्रियोंको नरश्रेष्ठ अर्जुनने मार्तिकावत नगरमें बसा दिया ॥ ६९ ॥

ततो वृद्धांश्च बालांश्च स्त्रियश्चादाय पाण्डवः । वीरैर्विहीनान् सर्वास्तान् शक्रप्रस्थे न्यवेशयत् ॥ ७० ॥

तत्पश्चात् वीरविहीन समस्त वृद्धों, बालकों तथा अन्य स्त्रियोंको साथ लेकर वे इन्द्रप्रस्थ आये और उन सबको वहाँका निवासी बना दिया ॥ ७० ॥

यौयुधानिं सरस्वत्यां पुत्रं सात्यकिनः प्रियम् ।
निवेशयत धर्मात्मा वृद्धबालपुरस्कृतम् ॥ ७१ ॥
धर्मात्मा अर्जुनने सात्यकिके प्रिय पुत्र यौयुधानिको सरस्वतीके तटवर्ती देशका अधिकारी एवं निवासी बना दिया और वृद्धों तथा बालकोंको उसके साथ कर दिया ॥

इन्द्रप्रस्थे ददौ राज्यं वज्राय परवीरहा ।
वज्रेणाक्रूरदारास्तु वार्यमाणाः प्रवव्रजुः ॥ ७२ ॥
इसके बाद शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने व्रजको इन्द्रप्रस्थका राज्य दे दिया। अक्रूरजीकी स्त्रियाँ वज्रके बहुत रोकनेपर भी वनमें तपस्या करनेके लिये चली गयीं ॥

रुक्मिणी त्वथ गान्धारी शैव्या हैमवतीत्यपि ।
देवी जाम्बवती चैव विविशुर्जातवेदसम् ॥ ७३ ॥,
रुक्मिणी, गान्धारी, शैव्या, हैमवती तथा जाम्बवती देवीने पतिलोककी प्राप्तिके लिये अग्निमें प्रवेश किया ॥

सत्यभामा तथैवान्या देव्यः कृष्णस्य सम्मताः ।
वनं प्रविविशू राजंस्तापस्ये कृतनिश्चयाः ॥ ७४ ॥
राजन्! श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा तथा अन्य देवियाँ तपस्याका निश्चय करके वनमें चलीं गयीं ॥ ७४ ॥

द्वारकावासिनो ये तु पुरुषाः पार्थमभ्ययुः ।
यथार्हं संविभज्यैनान् वज्रे पर्यददज्जयः ॥ ७५ ॥
जो-जो द्वारकावासी मनुष्य पार्थके साथ आये थे, उन सबका यथायोग्य विभाग करके अर्जुनने उन्हें वज्रको सौंप दिया ॥ ७५ ॥

स तत् कृत्वा प्राप्तकालं बाष्पेणापिहितोऽर्जुनः ।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं ददर्शासीनमाश्रमे ॥ ७६ ॥
इस प्रकार समयोचित व्यवस्था करके अर्जुन नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए महर्षि व्यासके आश्रमपर गये और वहाँ बैठे हुए महर्षिका उन्होंने दर्शन किया ॥ ७६ ॥

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि वृष्णिकलत्राद्यानयने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें अर्जुनद्वारा वृष्णिवंशकी स्त्रियों और बालकोंका आनयनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2480)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

प्रविशन्नर्जुनो राजन्नाश्रमं सत्यवादिनः ।
ददर्शासीनमेकान्ते मुनिं सत्यवतीसुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! सत्यवादी व्यासजीके आश्रममें प्रवेश करके अर्जुनने देखा कि सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास एकान्तमें बैठे हुए हैं ॥ १ ॥

स तमासाद्य धर्मज्ञमुपतस्थे महाव्रतम् ।
अर्जुनोऽस्मीति नामास्मै निवेद्याभ्यवादत् ततः ॥ २ ॥
महान् व्रतधारी तथा धर्मके ज्ञाता व्यासजीके पास पहुँचकर 'मैं अर्जुन हूँ' ऐसा कहते हुए धनंजयने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वे उनके पास ही खड़े हो गये ॥ २ ॥

स्वागतं तेऽस्त्विति प्राह मुनिः सत्यवतीसुतः ।
आस्यतामिति होवाच प्रसन्नात्मा महामुनिः ॥ ३ ॥
उस समय प्रसन्नचित्त हुए महामुनि सत्यवती-नन्दन व्यासने अर्जुनसे कहा—'बेटा! तुम्हारा स्वागत है; आओ यहाँ बैठो' ॥ ३ ॥

तमप्रतीतमनसं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।
निर्विण्णमनसं दृष्ट्वा पार्थं व्यासोऽब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥
अर्जुनका मन अशान्त था। वे बारंबार लंबी साँस खींच रहे थे। उनका चित्त खिन्न एवं विरक्त हो चुका था। उन्हें इस अवस्थामें देखकर व्यासजीने पूछा— ॥

नखकेशदशाकुम्भवारिणा किं समुक्षितः ।
आवीरजानुगमनं ब्राह्मणो वा हतस्त्वया ॥ ५ ॥
'पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र (धोती)-की कोर पड़ जानेसे अशुद्ध हुए घड़ेके जलसे स्नान कर लिया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्रीसे समागम या किसी ब्राह्मणका वध तो नहीं किया है? ॥

युद्धे पराजितो वासि गतश्रीरिव लक्ष्यसे ।
न त्वां प्रभिन्नं जानामि किमिदं भरतर्षभ ॥ ६ ॥
श्रोतव्यं चेन्मया पार्थ क्षिप्रामाख्यातुमर्हसि ।
'कहीं तुम युद्धमें परास्त तो नहीं हो गये? क्योंकि श्रीहीन-से दिखायी देते हो। भरतश्रेष्ठ! तुम कभी पराजित हुए हो—यह मैं नहीं जानता; फिर तुम्हारी ऐसी दशा क्यों है? पार्थ! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो अपनी इस मलिनताका कारण मुझे शीघ्र बताओ' ॥ ६ १/२ ॥