भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

और किस जातिकी कन्याके साथ उसका विवाह करना चाहिये? यह मुझे बताइये ।। २२ ।।

भीष्म उवाच

आत्मवत् तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत् तथा ।
त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्णं प्रतिपद्यते ।। २३ ।।
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! जिसको माता-पिताने त्याग दिया है, वह अपने स्वामी (पालक) पिताके वर्णको प्राप्त होता है। इसलिये उसके पालन करनेवालेको चाहिये कि वह अपने ही वर्णके अनुसार उसका संस्कार करे ।। २३ ।।
तद्गोत्रबन्धुजं तस्य कुर्यात् संस्कारमच्युत ।
अथ देया तु कन्या स्यात् तद्वर्णस्य युधिष्ठिर ।। २४ ।।
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! पालक पिताके सगोत्र बन्धुओंका जैसा संस्कार होता हो वैसा ही उसका भी करना चाहिये, तथा उसी वर्णकी कन्याके साथ उसका विवाह भी कर देना चाहिये ।। २४ ।।
संस्कर्तुं वर्णगोत्रं च मातृवर्णविनिश्चये ।
कानीनाड्यूढजौ वापि विज्ञेयौ पुत्र किल्बिषौ ।। २५ ।।
बेटा! यदि उसकी माताके वर्ण और गोत्रका निश्चय हो जाय तो उस बालकका संस्कार करनेके लिये माताके ही वर्ण और गोत्रको ग्रहण करना चाहिये। कानीन और अध्यूढज—ये दोनों प्रकारके पुत्र निकृष्ट श्रेणीके ही समझे जाने योग्य हैं ।। २५ ।।
तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चयः ।
क्षेत्रजो वाप्यपसदो येऽड्यूढास्तेषु चाप्युत ।। २६ ।।
आत्मवद् वै प्रयुञ्जीरन् संस्कारान् ब्राह्मणादयः ।
धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चयोऽयं प्रदृश्यते ।। २७ ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। २८ ।।
इन दोनों प्रकारके पुत्रोंका भी अपने ही समान संस्कार करे—ऐसा शास्त्रका निश्चय है। ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वे क्षेत्रज, अपसद तथा अध्यूढ—इन सभी प्रकारके पुत्रोंका अपने ही समान संस्कार करें। वर्णोंके संस्कारके सम्बन्धमें धर्मशास्त्रोंका ऐसा ही निश्चय देखा जाता है। इस प्रकार मैंने ये सारी बातें तुम्हे बतायीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। २६—२८ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे पुत्रप्रतिनिधिकथने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें पुत्रप्रतिनिधिकथनविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४९ ।।

गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना

युधिष्ठिर उवाच

दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह ।
महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किसीको देखने और उसके साथ रहनेपर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओंका माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते ।
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**महातेजस्वी नरेश! इस विषयमें मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुषके संवादरूप प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा ॥ २ ॥

पुरा महर्षिश्च्यवनो भार्गवो भरतर्षभ ।
उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रतः ॥ ३ ॥

भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनने महान् व्रतका आश्रय ले जलके भीतर रहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

निहत्य मानं क्रोधं च प्रहर्षं शोकमेव च ।
वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रतः ॥ ४ ॥

वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोकका परित्याग करके दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए बारह वर्षों-तक जलके भीतर रहे ॥ ४ ॥

आदधत् सर्वभूतेषु विश्रम्भं परमं शुभम् ।
जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ॥ ५ ॥

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके समान उन शक्तिशाली मुनिने सम्पूर्ण प्राणियों, विशेषतः सारे जलचर जीवोंपर अपना परम मंगलकारी पूर्ण विश्वास जमा लिया था ॥ ५ ॥

स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च ।
गंगायमुनोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ॥ ६ ॥

एक समय वे देवताओंको प्रणामकर अत्यन्त पवित्र होकर गंगा-यमुनाके संगममें जलके भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ काष्ठकी भाँति स्थिर भावसे बैठ गये ।। ६ ।।
गंगायमुनयोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् ।
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ।। ७ ।।
गंगा-यमुनाका वेग बड़ा भयंकर था। उससे भीषण गर्जना हो रही थी। वह वेग वायुवेगकी भाँति दुःसह था तो भी वे मुनि अपने मस्तकपर उसका आघात सहने लगे ।। ७ ।।
गंगा च यमुना चैव सरितश्च सरांसि च ।
प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन् ।। ८ ।।
परंतु गंगा-यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिकी केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाते थे ।। ८ ।।
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः ।
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद् भरतर्षभ ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! वे बुद्धिमान् महामुनि कभी पानीमें काठकी भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे ।। ९ ।।
जलौकसां स सत्त्वानां बभूव प्रियदर्शनः ।
उपाजिघ्रन्त च तदा तस्योष्ठं हृष्टमानसाः ।। १० ।।
वे जलचर जीवोंके बड़े प्रिय हो गये थे। जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे ।।
तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ।
ततः कदाचित् समये कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः ।। ११ ।।
तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ।
निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चयाः ।। १२ ।।
महातेजस्वी नरेश! इस तरह उन्हें पानीमें रहते बहुत दिन बीत गये। तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले बहुत-से मल्लाह मछली पकड़नेका निश्चय करके जाल हाथमें लिये हुए उस स्थानपर आये ।।
व्यायता बलिनः शूराः सलिलेष्वनिवर्तिनः ।
अभ्याययुश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ।। १३ ।।
वे मल्लाह बड़े परिश्रमी, बलवान्, शौर्यसम्पन्न और पानीसे कभी पीछे न हटनेवाले थे। वे जाल बिछानेका दृढ़ निश्चय करके उस स्थानपर आये थे ।। १३ ।।
जालं ते योजयामासुर्निःशेषेण जनाधिप ।
मत्स्योदकं समासाद्य तदा भरतसत्तम ।। १४ ।।

भरतवंशशिरोमणि नरेश! उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जलमें जाकर उन्होंने अपने जालको पूर्णरूपसे फैला दिया ॥ १४ ॥ ततस्ते बहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः। गङ्गायमुनयोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ॥ १५ ॥ मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत-से उपाय करके गंगा-यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥ जालं सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा। विस्तारायाम सम्पन्नं यत् तत्र सलिलेऽक्षिपन् ॥ १६ ॥ ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम्। अवतीर्य ततः सर्वे जालं चक्रुषिरे तदा ॥ १७ ॥ अभीतरूपाः संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिनः। बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्च तथान्यान् जलचारिणः ॥ १८ ॥ उनका वह जाल नये सूतका बना हुआ और विशाल था तथा उसकी लंबाई-चौड़ाई भी बहुत थी एवं वह अच्छी तरहसे बनाया हुआ और मजबूत था। उसीको उन्होंने वहाँ जलपर बिछाया था। थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानीमें उतर गये। वे सभी प्रसन्न और एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले थे। उन सबने मिलकर जालको खींचना आरम्भ किया। उस जालमें उन्होंने मछलियोंके साथ ही दूसरे जल-जन्तुओंको भी बाँध लिया था ॥ १६—१८ ॥ तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम्। आकर्षन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया ॥ १९ ॥ महाराज! जाल खींचते समय मल्लाहोंने दैवेच्छासे उस जालके द्वारा मत्स्योंसे घिरे हुए भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनको भी खींच लिया ॥ १९ ॥ नदीशैवलदिग्धाङ्गं हरिमश्मश्रुजटाधरम्। लग्नैः शङ्खनखैर्गात्रे क्रोडैश्चित्रैरिवार्पितम् ॥ २० ॥ उनका सारा शरीर नदीके सेवारसे लिपटा हुआ था। उनकी मूँछ-दाढ़ी और जटाएँ हरे रंगकी हो गयी थीं और उनके अंगोंमें शंख आदि जलचरोंके नख लगनेसे चित्र बन गया था। ऐसा जान पड़ता था मानो उनके अंगोंमें शूकरके विचित्र रोम लग गये हों ॥ २० ॥ तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम्। सर्वे प्राञ्जलयो दाशाः शिरोभिः प्रापतन् भुवि ॥ २१ ॥ वेदोंके पारंगत उन विद्वान् महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये ॥ २१ ॥ परिखेदपरित्रासाज्जालस्याकर्षणेन च। मत्स्या बभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसंस्पर्शनेन च ॥ २२ ॥

स मुनिस्तत् तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् ।
बभूव कृपयाविष्टो निःश्वसंश्च पुनः पुनः ॥ २३ ॥
उधर जालके आकर्षणसे अत्यन्त खेद, त्रास और स्थलका संस्पर्श होनेके कारण बहुत-से मत्स्य मर गये। मुनिने जब मत्स्योंका यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे ॥ २२-२३ ॥

निषादा ऊचुः

अज्ञानाद् यत् कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु ।
करवाम प्रियं किं ते तन्नो ब्रूहि महामुने ॥ २४ ॥
**यह देख निषाद बोले—**महामुने! हमने अनजानमें जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हमपर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हमलोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें? ॥ २४ ॥

इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्च्यवनोवाक्यमब्रवीत् ।
यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ॥ २५ ॥
मल्लाहोंके ऐसा कहनेपर मछलियोंके बीचमें बैठे हुए महर्षि च्यवनने कहा—‘मल्लाहो! इस समय जो मेरी सबसे बड़ी इच्छा है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २५ ॥

प्राणोत्सर्गं विसर्गं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह ।
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेऽध्युषितानहम् ॥ २६ ॥
‘मैं इन मछलियोंके साथ ही अपने प्राणोंका त्याग या रक्षण करूँगा। ये मेरे सहवासी रहे हैं। मैं बहुत दिनोंतक इनके साथ जलमें रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता’ ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने

⬅ विषय-सूची (TOC)

जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन

इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभृशं भयकम्पिताः ।
सर्वे विवर्णवदना नहुषाय न्यवेदयन् ।। २७ ।।
मुनिकी यह बात सुनकर निषादोंको बड़ा भय हुआ। वे थर-थर काँपने लगे। उन सबके मुखका रंग फीका पड़ गया और उसी अवस्थामें राजा नहुषके पास जाकर उन्होंने यह सारा समाचार निवेदन किया ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनमुनिका उपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५० ।।

राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्गति

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्गति

भीष्म उवाच

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा च्यवनं तं तथागतम् ।
त्वरितः प्रययौ तत्र सहामात्यपुरोहितः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! च्यवनमुनिको ऐसी अवस्थामें अपने नगरके निकट आया जान राजा नहुष अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको साथ ले शीघ्र वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः ।
आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने ॥ २ ॥
उन्होंने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर मनको एकाग्र रखते हुए न्यायोचित रीतिसे महात्मा च्यवनको अपना परिचय दिया ॥ २ ॥
अर्चयामास तं चापि तस्य राज्ञः पुरोहितः ।
सत्यव्रतं महात्मानं देवकल्पं विशाम्पते ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! राजाके पुरोहितने देवताओंके समान तेजस्वी सत्यव्रती महात्मा च्यवनमुनिका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ३ ॥

नहुष उवाच

करवाणि प्रियं किं ते तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ।
सर्वं कर्तास्मि भगवन् यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
**तत्पश्चात् राजा नहुष बोले—**द्विजश्रेष्ठ! बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? भगवन्! आपकी आज्ञासे कितना ही कठिन कार्य क्यों न हो, मैं सब पूरा करूँगा ॥ ४ ॥

च्यवन उवाच

श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः ।
मम मूल्यं प्रयच्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रयैः सह ॥ ५ ॥
**च्यवनने कहा—**राजन्! मछलियोंसे जीविका चलानेवाले इन मल्लाहोंने आज बड़े परिश्रमसे मुझे अपने जालमें फँसाकर निकाला है; अतः आप इन्हें इन मछलियोंके साथ-साथ मेरा भी मूल्य चुका दीजिये ॥ ५ ॥

नहुष उवाच

सहस्रं दीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित ।
निष्क्रयार्थे भगवतो यथाऽऽह भृगुनन्दनः ॥ ६ ॥
तब नहुषने अपने पुरोहितसे कहा— पुरोहितजी! भृगुनन्दन च्यवनजी जैसी आज्ञा दे रहे हैं, उसके अनुसार इन पूज्यपाद महर्षिके मूल्यके रूपमें मल्लाहोंको एक हजार अशर्फियाँ दे दीजिये ॥ ६ ॥

च्यवन उवाच

सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप ।
सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु ॥ ७ ॥
**च्यवनने कहा—**नरेश्वर! मैं एक हजार मुद्राओंपर बेचने योग्य नहीं हूँ। क्या आप मेरा इतना ही मूल्य समझते हैं, मेरे योग्य मूल्य दीजिये और वह मूल्य कितना होना चाहिये—यह अपनी ही बुद्धिसे विचार करके निश्चित कीजिये ॥ ७ ॥

नहुष उवाच

सहस्राणां शतं विप्र निषादेभ्यः प्रदीयताम् ।
स्यादिदं भगवन् मूल्यं किं वान्यन्मन्यते भवान् ॥ ८ ॥
**नहुष बोले—**विप्रवर! इन निषादोंको एक लाख मुद्रा दीजिये। (यों पुरोहितको आज्ञा देकर वे मुनिसे बोले—) भगवन्! क्या यह आपका उचित मूल्य हो सकता है या अभी आप कुछ और देना चाहते हैं? ॥

च्यवन उवाच

नाहं शतसहस्रेण निमेयः पार्थिवर्षभ ।
दीयतां सदृशं मूल्यममात्यैः सह चिन्तय ॥ ९ ॥
**च्यवनने कहा—**नृपश्रेष्ठ! मुझे एक लाख रुपयेके मूल्यमें ही सीमित न कीजिये। उचित मूल्य चुकाइये। इस विषयमें अपने मन्त्रियोंके साथ विचार कीजिये ॥ ९ ॥

नहुष उवाच

कोटिः प्रदीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित ।
यदेतदपि नो मूल्यमतो भूयः प्रदीयताम् ॥ १० ॥
**नहुषने कहा—**पुरोहितजी! आप इन निषादोंको एक करोड़ मुद्रा मूल्यके रूपमें दीजिये और यदि यह भी ठीक मूल्य न हो तो और अधिक दीजिये ॥ १० ॥

च्यवन उवाच

राजन् नार्हाम्यहं कोटिं भूयो वापि महाद्युते ।
सदृशं दीयतां मूल्यं ब्राह्मणैः सह चिन्तय ॥ ११ ॥

**च्यवनने कहा—**महातेजस्वी नरेश। मैं एक करोड़ या उससे भी अधिक मुद्राओंमें बेचने योग्य नहीं हूँ। जो मेरे लिये उचित हो वही मूल्य दीजिये और इस विषयमें ब्राह्मणोंके साथ विचार कीजिये ॥ ११ ॥

नहुष उवाच

अर्धं राज्यं समग्रं वा निषादेभ्यः प्रदीयताम् ।
एतन्मूल्यमहं मन्ये किं वान्यन्मन्यसे द्विज ॥ १२ ॥
**नहुष बोले—**ब्रह्मन्! यदि ऐसी बात है तो इन मल्लाहोंको मेरा आधा या सारा राज्य दे दिया जाय। इसे ही मैं आपके लिये उचित मूल्य मानता हूँ। आप इसके अतिरिक्त और क्या चाहते हैं? ॥ १२ ॥

च्यवन उवाच

अर्धं राज्यं समग्रं च मूल्यं नार्हामि पार्थिव ।
सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभिः सह चिन्त्यताम् ॥ १३ ॥
**च्यवनने कहा—**पृथ्वीनाथ! आपका आधा या सारा राज्य भी मेरा उचित मूल्य नहीं है। आप उचित मूल्य दीजिये और वह मूल्य आपके ध्यानमें न आता हो तो ऋषियोंके साथ विचार कीजिये ॥ १३ ॥

भीष्म उवाच

महर्षेर्वचनं श्रुत्वा नहुषो दुःखकर्शितः ।
स चिन्तयामास तदा सहामात्यपुरोहितः ॥ १४ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! महर्षिका यह वचन सुनकर राजा नहुष दुःखसे कातर हो उठे और मन्त्री तथा पुरोहितके साथ इस विषयमें विचार करने लगे ॥ १४ ॥
तत्र त्वन्यो वनचरः कश्चिन्मूलफलाशनः ।
नहुषस्य समीपस्थो गविजातोऽभवन्मुनिः ॥ १५ ॥
स तमाभाष्य राजानमब्रवीद् द्विजसत्तमः ।
इतनेहीमें फल-मूलका भोजन करनेवाले एक दूसरे वनवासी मुनि, जिनका जन्म गायके पेटसे हुआ था, राजा नहुषके समीप आये और वे द्विजश्रेष्ठ उन्हें सम्बोधित करके कहने लगे— ॥ १५ १/२ ॥
तोषयिष्याम्यहं क्षिप्रं यथा तुष्टो भविष्यति ॥ १६ ॥
नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यमविशंकया ॥ १७ ॥
‘राजन्! ये मुनि कैसे संतुष्ट होंगे—इस बातको मैं जानता हूँ। मैं इन्हें शीघ्र संतुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी-परिहासमें भी झूठ नहीं कहा है; फिर ऐसे समयमें असत्य कैसे बोल

सकता हूँ? मैं आपसे जो कहूँ, वह आपको निःशंक होकर करना चाहिये' ।। १६-१७ ।।

नहुष उवाच

ब्रवीतु भगवान् मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः ।
परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे ।। १८ ।।

नहुषने कहा— भगवन्! आप मुझे भृगुपुत्र महर्षि च्यवनका मूल्य, जो इनके योग्य हो बता दीजिये और ऐसा करके मेरा, मेरे कुलका तथा समस्त राज्यका संकटसे उद्धार कीजिये ।। १८ ।।

हन्याद्धि भगवान् क्रुद्धस्त्रैलोक्यमपि केवलम् ।
किं पुनर्मां तपोहीनं बाहुवीर्यपरायणम् ।। १९ ।।

ये भगवान् च्यवन मुनि यदि कुपित हो जायँ तो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं; फिर मुझ-जैसे तपोबलशून्य केवल बाहुबलका भरोसा रखनेवाले नरेशको नष्ट करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ।।

अगाधाम्भसि मग्नस्य सामात्यस्य सऋत्विजः ।
प्लवो भव महर्षे त्वं कुरु मूल्यविनिश्चयम् ।। २० ।।

महर्षे! मैं अपने मन्त्री और पुरोहितके साथ संकटके अगाध महासागरमें डूब रहा हूँ। आप नौका बनकर मुझे पार लगाइये। इनके योग्य मूल्यका निर्णय कर दीजिये ।। २० ।।

भीष्म उवाच

नहुषस्य वचः श्रुत्वा गविजातः प्रतापवान् ।
उवाच हर्षयन् सर्वानमात्यान् पार्थिवं च तम् ।। २१ ।।

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! नहुषकी बात सुनकर गायके पेटसे उत्पन्न हुए वे प्रतापी महर्षि राजा तथा उनके समस्त मन्त्रियोंको आनन्दित करते हुए बोले— ।। २१ ।।

(ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा कृतम् ।
एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्यत्र तिष्ठति ।।)
अनर्घेया महाराज द्विजा वर्णेषु चोत्तमाः ।
गावश्च पुरुषव्याघ्र गौर्मूल्यं परिकल्प्यताम् ।। २२ ।।

'महाराज! ब्राह्मणों और गौओंका कुल एक है, पर ये दो रूपोंमें विभक्त हो गये हैं। एक जगह मन्त्र स्थित होते हैं और दूसरी जगह हविष्य। पुरुषसिंह! ब्राह्मण सब वर्णोंमें उत्तम हैं। उनका और गौओंका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता; इसलिये आप इनकी कीमतमें एक गौ प्रदान कीजिये' ।। २२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 516)

⬅ विषय-सूची (TOC)

महर्षि च्यवनका मूल्याङ्कन

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेर्वचनं नृप ।
हर्षेण महता युक्तः सहामात्यपुरोहितः ॥ २३ ॥
'नरेश्वर! महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्री और पुरोहितसहित राजा नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २३ ॥

अभिगम्य भृगोः पुत्रं च्यवनं संशितव्रतम् ।
इदं प्रोवाच नृपते वाचा संतर्पयन्निव ॥ २४ ॥
राजन्! वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले भृगुपुत्र महर्षि च्यवनके पास जाकर उन्हें अपनी वाणीद्वारा तृप्त करते हुए-से बोले ॥ २४ ॥

नहुष उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोऽसि भार्गव ।
एतन्मूल्यमहं मन्ये तव धर्मभृतां वर ॥ २५ ॥
नहुषने कहा— धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! भृगुनन्दन! मैंने एक गौ देकर आपको खरीद लिया; अतः उठिये, उठिये, मैं यही आपका उचित मूल्य मानता हूँ ॥ २५ ॥

च्यवन उवाच

उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक् क्रीतोऽस्मि तेऽनघ।
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचिदिहाच्युत॥ २६॥
च्यवनने कहा— निष्पाप राजेन्द्र! अब मैं उठता हूँ। आपने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! मैं इस संसारमें गौओंके समान दूसरा कोई धन नहीं देखता हूँ॥ २६॥

कीर्तनं श्रवणं दानं दर्शनं चापि पार्थिव।
गवां प्रशस्यते वीर सर्वपापहरं शिवम्॥ २७॥
वीर भूपाल! गौओंके नाम और गुणोंका कीर्तन तथा श्रवण करना, गौओंका दान देना और उनका दर्शन करना—इनकी शास्त्रोंमें बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य सम्पूर्ण पापोंको दूर करके परम कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले हैं॥ २७॥

गावो लक्ष्म्याः सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते।
अन्नमेव सदा गावो देवानां परमं हविः॥ २८॥
गौएँ सदा लक्ष्मीकी जड़ हैं। उनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। गौएँ ही मनुष्योंको सर्वदा अन्न और देवताओंको हविष्य देनेवाली हैं॥ २८॥

स्वाहाकारवषट्कारौ गोषु नित्यं प्रतिष्ठितौ।
गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम्॥ २९॥
स्वाहा और वषट्कार सदा गौओंमें ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएँ ही यज्ञका संचालन करनेवाली तथा उसका मुख हैं॥ २९॥

अमृतं ह्यव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च।
अमृतायतनं चैताः सर्वलोकनमस्र्कृताः॥ ३०॥
वे विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती और दुहनेपर अमृत ही देती हैं। वे अमृतकी आधारभूत हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है॥ ३०॥

तेजसा वपुषा चैव गावो वह्निसमा भुवि।
गावो हि सुमहत् तेजः प्राणिनां च सुखप्रदाः॥ ३१॥
इस पृथ्वीपर गौएँ अपनी काया और कान्तिसे अग्निके समान हैं। वे महान् तेजकी राशि और समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाली हैं॥ ३१॥

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम्।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति॥ ३२॥
गौओंका समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थानकी शोभा बढ़ा देता है और वहाँके सारे पापोंको खींच लेता है॥ ३२॥

गावः स्वर्गस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः।
गावः कामदुहो देव्यो नान्यत् किंचित् परं स्मृतम्॥ ३३॥

गौएँ स्वर्गकी सीढ़ी हैं। गौएँ स्वर्गमें भी पूजी जाती हैं। गौएँ समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवियाँ हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है॥ ३३॥

इत्येतद् गोषु मे प्रोक्तं माहात्म्यं भरतर्षभ।
गुणैकदेशवचनं शक्यं पारायणं न तु॥ ३४॥
भरतश्रेष्ठ! यह मैंने गौओंका माहात्म्य बताया है। इसमें उनके गुणोंका दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। गौओंके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता॥

निषादा ऊचुः

दर्शनं कथनं चैव सहास्माभिः कृतं मुने।
सतां साप्तपदं मैत्रं प्रसादं नः कुरु प्रभो॥ ३५॥
इसके बाद निषादोंने कहा— मुने! सज्जनोंके साथ सात पग चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। हमने तो आपका दर्शन किया और हमारे साथ आपकी इतनी देरतक बातचीत भी हुई; अतः प्रभो! आप हमलोगोंपर कृपा कीजिये॥ ३५॥
हवींषि सर्वाणि यथा ह्युपभुङ्क्ते हुताशनः।
एवं त्वमपि धर्मात्मन् पुरुषाग्निः प्रतापवान्॥ ३६॥
धर्मात्मन्! जैसे अग्निदेव सम्पूर्ण हविष्योंको आत्मसात् कर लेते हैं, उसी प्रकार आप भी हमारे दोष-दुर्गुणोंको दग्ध करनेवाले प्रतापी अग्निरूप हैं॥ ३६॥
प्रसादयामहे विद्वन् भवन्तं प्रणता वयम्।
अनुग्रहार्थमस्माकमियं गौः प्रतिगृह्यताम्॥ ३७॥
विद्वन्! हम आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। आप हमलोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये हमारी दी हुई यह गौ स्वीकार कीजिये॥ ३७॥
(अत्यन्तापदि मग्नानां परित्राणं हि कुर्वताम्।
या गतिर्विदिता त्वद्य नरके शरणं भवान्॥)
अत्यन्त आपत्तिमें डूबे हुए जीवोंका उद्धार करनेवाले पुरुषोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आपको विदित है। हमलोग नरकमें डूबे हुए हैं। आज आप ही हमें शरण देनेवाले हैं॥

च्यवन उवाच

कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च।
नरं समूलं दहति कक्षमग्निरिव ज्वलन्॥ ३८॥
च्यवन बोले— निषादगण! किसी दीन-दुखियाकी, ऋषिकी तथा विषधर सर्पकी रोषपूर्ण दृष्टि मनुष्यको उसी प्रकार जड़मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखे घास-फूसके ढेरको॥ ३८॥
प्रतिगृह्णामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्बिषाः।

दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैः सह जलोद्भवैः ॥ ३९ ॥ मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदानके प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुमलोग जलमें पैदा हुई इन मछलियोंके साथ ही शीघ्र स्वर्गको जाओ ॥ ३९ ॥

भीष्म उवाच

ततस्तस्य प्रभावात् ते महर्षेर्भावितात्मनः । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययुः ॥ ४० ॥ भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि च्यवनके पूर्वोक्त बात कहते ही उनके प्रभावसे वे मल्लाह उन मछलियोंके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४० ॥

ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांश्च भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥

ततस्तौ गविजश्चैव च्यवनश्च भृगूद्वहः । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्नृपम् ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥

ततो राजा महावीर्यो नहुषः पृथिवीपतिः । परमित्यब्रवीत् प्रीतस्तदा भरतसत्तम ॥ ४३ ॥ भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले—'बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ॥

ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदितः प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत् ॥ ४४ ॥ फिर दोनोंके आग्रहसे उन इन्द्रके समान तेजस्वी नरेशने धर्ममें स्थित रहनेका वरदान माँगा और उनके तथास्तु कहनेपर राजाने उन दोनों ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया ॥ ४४ ॥

समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत् स्वमाश्रमम् । गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं ययौ ॥ ४५ ॥ उसी दिन महर्षि च्यवनकी दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रमपर चले गये। इसके बाद महातेजस्वी गोजात मुनि भी अपने आश्रमको पधारे ॥ ४५ ॥

निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप ।

नहुषोऽपि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ ४६ ॥ नरेश्वर! वे मल्लाह और मत्स्य तो स्वर्गलोकमें चले गये और राजा नहुष भी वर पाकर अपनी राजधानीको लौट आये ॥ ४६ ॥ एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृशः स्नेहः संवासे वा युधिष्ठिर ॥ ४७ ॥ महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम् । किं भूयः कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम् ॥ ४८ ॥ तात युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह सारा प्रसंग सुनाया है। दर्शन और सहवाससे कैसा स्नेह होता है? गौओंका माहात्म्य क्या है? तथा इस विषयमें धर्मका निश्चय क्या है? ये सारी बातें इस प्रसंगसे स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुम्हें कौन-सी बात बताऊँ? वीर! तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है? ॥ ४७-४८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनका उपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 521)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा

युधिष्ठिर उवाच

संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपमः ।
तं मे शृणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—महाबाहो! मेरे मनमें एक महासागरके समान महान् संदेह हो गया है। महाप्राज्ञ! उसे सुनिये और सुनकर उसकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥

कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो ।
रामं धर्मभृतां श्रेष्ठं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजीके विषयमें मेरा कौतूहल बढ़ा हुआ है; अतः आप मेरे प्रश्नका विशद विवेचन कीजिये ॥ २ ॥

कथमेष समुत्पन्नो रामः सत्यपराक्रमः ।
कथं ब्रह्मर्षिवंशोऽयं क्षत्रधर्मा व्यजायत ॥ ३ ॥
ये सत्यपराक्रमी परशुरामजी कैसे उत्पन्न हुए? ब्रह्मर्षियोंका यह वंश क्षत्रियधर्मसे सम्पन्न कैसे हो गया? ॥ ३ ॥

तदस्य सम्भवं राजन् निखिलेनानुकीर्तय ।
कौशिकाच्च कथं वंशात् क्षत्राद् वै ब्राह्मणो भवेत् ॥ ४ ॥
अतः राजन्! आप परशुरामजीकी उत्पत्तिका प्रसंग पूर्णरूपसे बताइये। राजा कुशिकका वंश तो क्षत्रिय था, उससे ब्राह्मण जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ॥ ४ ॥

अहो प्रभावः सुमहानासीद् वै सुमहात्मनः ।
रामस्य च नरव्याघ्र विश्वामित्रस्य चैव हि ॥ ५ ॥
पुरुषसिंह! महात्मा परशुराम और विश्वामित्रका महान् प्रभाव अद्भुत था ॥ ५ ॥

कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्वथाभवत् ।
एष दोषः सुतान् हित्वा तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥
राजा कुशिक और महर्षि ऋचीक—ये ही अपने-अपने वंशके प्रवर्तक थे। उनके पुत्र गाधि और जमदग्निको लाँघकर उनके पौत्र विश्वामित्र और परशुराममें ही यह विजातीयताका दोष क्यों आया? इसमें जो यथार्थ कारण हो, उसकी व्याख्या कीजिये ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ॥ ७ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भारत! इस विषयमें महर्षि च्यवन और राजा कुशिकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥

एतं दोषं पुरा दृष्ट्वा भार्गवश्च्यवनस्तदा । आगामिनं महाबुद्धिः स्ववंशे मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥ निश्चित्य मनसा सर्वं गुणदोषबलाबलम् । दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ॥ ९ ॥ च्यवनः समनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् । वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ ॥ १० ॥ पूर्वकालमें भृगुपुत्र च्यवनको यह बात मालूम हुई कि हमारे वंशमें कुशिक-वंशकी कन्याके सम्बन्धसे क्षत्रियत्वका महान् दोष आनेवाला है। यह जानकर उन परम बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठने मन-ही-मन सारे गुण-दोष और बलाबलका विचार किया। तत्पश्चात् कुशिकोंके समस्त कुलको भस्म कर डालनेकी इच्छासे तपोधन च्यवन राजा कुशिकके पास गये और इस प्रकार बोले—‘निष्पाप नरेश! मेरे मनमें कुछ कालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा हुई है’ ॥ ८—१० ॥

कुशिक उवाच भगवन् सहधर्मोऽयं पण्डितैरिह धार्यते । प्रदानकाले कन्यानामुच्यते च सदा बुधैः ॥ ११ ॥ **कुशिकने कहा—**भगवन्! यह अतिथिसेवारूप सहधर्म विद्वान् पुरुष यहाँ सदा धारण करते हैं और कन्याओंके प्रदानकाल अर्थात् कन्याके विवाहके समयमें सदा पण्डितजन इसका उपदेश देते हैं ॥ ११ ॥

यत्त तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन । तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १२ ॥ तपोधन! अबतक तो इस धर्मके मार्गका पालन नहीं हुआ और समय निकल गया, परंतु अब आपके सहयोग और कृपासे इसका पालन करूँगा। अतः आप मुझे आज्ञा प्रदान करें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥

भीष्म उवाच अथासनमुपादाय च्यवनस्य महामुनेः । कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ॥ १३ ॥ इतना कहकर राजा कुशिकने महामुनि च्यवनको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे मुनि विराजमान थे ॥

प्रगृह्य राजा भृंगारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् । कारयामास सर्वांश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥ राजाने स्वयं गडुआ हाथमें लेकर मुनिको पैर धोनेके लिये जल निवेदन किया। इसके बाद उन महात्माको अर्घ्य आदि देनेकी सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करायीं ॥ १४ ॥

ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥ १५ ॥ इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया ॥ १५ ॥

सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन् परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥ १६ ॥ इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिका यथावत् सत्कार करके वे फिर उनसे बोले—‘भगवन्! हम दोनों पति-पत्नी आपके अधीन हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ॥ १६ ॥

यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥ १७ ॥ इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि ॥ १८ ॥ ‘कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! यदि आप राज्य, धन, गौ एवं यज्ञके निमित्त दान लेना चाहते हों तो बतावें। वह सब मैं आपको दे सकता हूँ। यह राजभवन, यह राज्य और यह धर्मानुकूल राज्यसिंहासन—सब आपका है। आप ही राजा हैं, इस पृथ्वीका पालन कीजिये। मैं तो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ' ॥ १७-१८ ॥

एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥ १९ ॥ उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले— ॥

न राज्यं कामये राजन् न धनं न च योषितः । न च गा न च वै देशान् न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥ २० ॥ ‘राजन्! न मैं राज्य चाहता हूँ न धन। न युवतियोंकी इच्छा रखता हूँ न गौओं, देशों और यज्ञकी ही। आप मेरी यह बात सुनिये ॥ २० ॥

नियमं किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥ २१ ॥ ‘यदि आपलोगोंको जँचे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा। उसमें आप दोनों पति-पत्नीको सर्वथा सावधान रहकर बिना किसी हिचकके मेरी सेवा करनी होगी' ॥ २१ ॥

एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः ।

प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥ २२ ॥ मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे' ॥ २२ ॥ अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥ २३ ॥ तदनन्तर राजा कुशिक महर्षि च्यवनको बड़े आनन्दके साथ अपने सुन्दर महलके भीतर ले गये। वहाँ उन्होंने मुनिको एक सजा-सजाया कमरा दिखाया, जो देखने योग्य था ॥ २३ ॥ इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥ २४ ॥ उस घरको दिखाकर वे बोले—'तपोधन! यह आपके लिये शय्या बिछी हुई है। आप इच्छानुसार यहाँ आराम कीजिये। हमलोग आपको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २४ ॥ अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनमें बातें होते-होते सूर्यास्त हो गया। तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी ॥ २५ ॥ तमपृच्छत् ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥ २६ ॥ उस समय राजा कुशिकने उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'महर्षे! आपको कौन-सा भोजन अभीष्ट है? आपकी सेवामें क्या-क्या सामान लाऊँ?' ॥ २६ ॥ ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥ २७ ॥ भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले—'तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो' ॥ २७ ॥ तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥ २८ ॥ नरेश्वर! राजा मुनिके उस कथनका आदर करते हुए 'जो आज्ञा' कहकर गये और जो भोजन तैयार था, उसे लाकर उन्होंने मुनिके सामने प्रस्तुत कर दिया ॥ २८ ॥ ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥ २९ ॥ प्रभो! तदनन्तर भोजन करके धर्मज्ञ भगवान् च्यवनने राजदम्पत्तिसे कहा—'अब मैं सोना चाहता हूँ, मुझे नींद सता रही है' ॥ २९ ॥ ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः ।