मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
बारहवां अध्याय। ४५७
बारहवां अध्याय। ४५७ ये कर्म ब्राह्मणों को परम-हितकारी हैं। इन सब शुभकर्मों में भी पुरुष का, अधिक कल्याण करनेवाला कर्म-आत्मज्ञान है। वह सब विद्याओं में श्रेष्ठ है और उससे मोक्ष मिलता है। इन ऊपर कहे छः कर्मों में लोक-परलोक दोनों में अधिक कल्याणकारी वैदिक कर्म है ॥ ७६-८६ ॥ वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः । अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन् क्रियाविधौ ॥८७॥ सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च । प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ ८८ ॥ इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते । निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ ८६ ॥ प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् । निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ ६० ॥ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ६१ ॥ यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः । आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ६२॥ एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः। प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ६३ ॥ पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् । अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ६४॥ वैदिक कर्मों में ऊपर कही सब क्रियाओं का अन्तर्भाव होता है। स्वर्गादि सुख और अभ्युदय करनेवाला प्रवृत्ति कर्म और ५८
४५८ मनुस्मृति । मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै- दिक कर्म होते हैं। इसलोक के और परलोक के सुख की कामना से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम आत्मज्ञानार्थ किया कर्म निवृत्त कहलाता है। प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता को और निवृत्त कर्म करने से पञ्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष पाता है। सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को समान देखनेवाला आत्मयाजी मोक्ष को पाता है। द्विज शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और वेदाभ्यास ही करे। इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म की सफलता है। द्विज आत्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है, अन्यथा नहीं। पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग दिखाने वाला वेद ही नेत्र है। वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना जानने में अशक्य है और अनन्तहै। यही मर्यादा है ॥८७-९४॥ या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाःप्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥ उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् । तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ९६ ॥ चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्ध्यति ॥ ९७ ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥ बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥ सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥
बारहवां अध्याय। ४५६
बारहवां अध्याय। ४५६ यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान्। तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः॥ १०१॥ वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्। इहैव लोके तिष्ठन् स ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १०२॥ जो स्मृति वेदमूलक नहीं हैं, जो वैदिक देव-यज्ञादि को झूठा बतलानेवाले ग्रन्थ हैं, उन सबको निष्फल और नरकगति देनेवाले जानना चाहिए। वेद से भिन्न-मूलक जो ग्रन्थ हैं वे सब उत्पन्न होते हैं और थोड़े समय में नष्ट होजाते हैं। वे आधुनिक होनेसे निष्फल और असत्य हैं। चारों वर्ण, चारों आश्रम, तीनों लोक और भूत, भविष्य, वर्तमान काल सब वेदहीसे प्रसिद्ध होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांच भी वेद से उत्पन्न हैं और सत्त्वादि गुणों के कर्म से हैं। सनातन वेद यज्ञादि से चराचर विश्व का धारण और पा- लन करता है। इसलिये वेद अधिकारी के परम कल्याण का साधन है। सेनापति, राज्य, न्यायाधीश और सबका स्वामी वेदशास्त्रज्ञही होता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले वृक्षों को भी भस्म करडालता है वैसेही वेदज्ञ अपने कर्मदोषों को भस्म करडालता है। वेद के तत्त्व को जाननेवाला चाहे जिस आश्रम में रहकर इसीलोक में मोक्ष पाता है॥ ६५-१०२॥ अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः। धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥१०३॥ तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्। तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ १०४॥ प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्। त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता॥ १०५॥ आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।
४६० मनुस्मृति । यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ १०६ ॥ नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः । मानवस्यास्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ॥ १०७ ॥ अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् । यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥ १०८ ॥ धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः । ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ १०६ ॥ दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् । त्र्यवरा वाऽपि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ ११० ॥ अज्ञों से ग्रन्थ पढ़े हुए श्रेष्ठ हैं, उनसे धारण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। उनसे भी अर्थ समझनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी शास्त्रानुसार आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। तप और विद्या ब्राह्मण का परम हित- कारी है। ब्राह्मण तप से पाप नाश करता है और ब्रह्मविद्या से मोक्ष पाता है। धर्म के तत्त्व को जानने की इच्छावाले प्रत्यक्ष (श्रुति) अनुमान (स्मृति) और विविध शास्त्रों को भली भाँति जानें। जो वेद और धर्मशास्त्र का वेद के अनुकूल तर्क से विचार करता है वह धर्म को जानता है, दूसरा नहीं जा- नता। इस प्रकार मोक्ष देनेवाले सब कर्म कहे गये हैं। अब इस मानव धर्मशास्त्र के रहस्य का उपदेश करते हैं:— रहस्य-उपदेश । जो धर्म इस शास्त्रमें नहीं कहे गये उनका निर्णय शिष्ट ब्राह्मणों की आज्ञा से जो हो वही माननीय होता है। जिन्होंने साङ्ग वेद धर्मभाव से अध्ययन किया हो उन वेद के प्रत्यक्ष प्रमाण भूत ब्रा- ह्मणों को शिष्ट जानना चाहिए। कमसे कम दश सदाचारी ब्राह्मणों की सभा या तीनही ब्राह्मणों की सभा जो धर्म बतलावें वही धर्म जानना चाहिए ॥ १०३-११० ॥
बारहवां अध्याय । ४६१
बारहवां अध्याय । ४६१ त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ॥ १११ ॥ ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥ ११२ ॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥ ११३ ॥ अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥ ११४ ॥ यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्ममतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति ॥ ११५ ॥ एतद्वोऽभिहितं सर्वं निःश्रेयसकरं परम् । तस्मादप्रच्युतो विप्रः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ११६ ॥ एवं स भगवान् देवो लोकानां हितकाम्यया । धर्मस्य परमं गुह्यं ममेदं सर्वमुक्तवान् ॥ ११७ ॥ सर्वमात्मनि संपश्येत्सच्चासच्च समाहितः । सर्वं ह्यात्मनि संपश्यन्ना धर्मे कुरुते मनः ॥ ११८ ॥ तीनों वेद का ज्ञाता वेदानुकूल शास्त्रज्ञ, मीमांसादि तर्कों का ज्ञाता, निरुक्त और धर्म के विचारों में परायण ऐसे ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ दश ब्राह्मणों की सभा कहलाती है । धर्म में सन्देह पड़ने पर निर्णय करने के लिए तीनों वेद के ज्ञाता, कम से कम तीन ब्राह्मणों को अधिष्ठाता करना चाहिए । एक भी वेदज्ञ ब्राह्मण जिसको धर्म कहे उसको धर्म जाने । पर दश हज़ार मूर्खों का भी कहा धर्म मान्य नहीं होता । ब्रह्मचर्य हीन, वेद न जानने
४६२ : मनुस्मृति । वाले नाममात्र से ब्राह्मण जाति के हज़ारों इकट्ठे होजायँ तो भी वह सभा नहीं कही जाती। तमोगुणी धर्म न जाननेवाले, जिसको प्रायश्चित्त बतावैं उसका पाप, सैकड़ों भाग होकर बतलानेवाले को प्राप्त होता है। यह परम कल्याणकारी संपूर्ण साधन कहा गया है। जो द्विज अपने धर्म से विचलित नहीं होता वह परम गति को पाता है। इस प्रकार भगवान् मनुने, मनुष्यों की हितकामना से यह धर्म का सारा तत्त्व कहा था, वही मैंने तुम लोगों से कह सुनाया। मनुष्य संपूर्ण कार्य कारणों को आत्मा में सावधान होकर भावना करे। जो सबको आत्मरूप जानता है उसका मन अधर्म में नहीं जाता ॥१११-११८॥ आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् । आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ ११९ ॥ खं संनिवेशयेत्खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् । पक्तिदृष्टयोः परं तेजः स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु ॥ १२० ॥ मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् । वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ॥ १२१ ॥ प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ १२२ ॥ एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १२३ ॥ एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः । जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥ १२४ ॥ एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना । स सर्व समतामेत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम् ॥ १२५ ॥
बारहवां अध्याय । ४६३
बारहवां अध्याय । ४६३ इत्येतन्मानवं शास्त्रं भृगुप्रोक्तं पठन् द्विजः। भवत्याचारवान्नित्यं यथेष्टां प्राप्नुयाद्गतिम् ॥ १२६॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १२ ॥ इन्द्रादि सब देव आत्मस्वरूप हैं, यह सारा जगत् परमात्मा में ही स्थित है। क्योंकि परमात्मा ही प्राणियों को उन के शुभा- शुभ कर्मों का फल देनेवाला है। ज्ञानी पुरुष बाहरी आकाश को आत्माकाश में, वायु को चेष्टा और स्पर्श में, तेज को जठराग्नि में, सूर्य को नेत्र में, जल को शरीर के चिकने पदार्थों में, पृथिवी को शरीर में, चन्द्रमा को मन में, दिशाओं को श्रोत्र में, विष्णु भगवान् को गति में, शिव को बल में, अग्नि को वाणी में, मित्र को गुदा में और प्रजापति को जननेन्द्रिय में भावना करे। संपूर्ण विश्व का शासनकर्ता अणु से भी अणु शुद्ध सुवर्ण समान-कान्तिमय और निर्विकल्प-बुद्धिगम्य परमात्मा को जा- नना चाहिए। इस परमात्मा को कोई अग्नि, कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म कहते हैं। यह परमात्मा सब प्राणियों को पञ्चभूतों के साथ मिलाकर चक्र के गति की भांति उत्पत्ति, पालन और प्रलयद्वारा घुमाया करता है। इस प्रकार जो पुरुष सब प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता है वह सब की समता को पाकर परमपद-ब्रह्म को पाता है। जो द्विज भृगु के कहे इस मानव धर्मशास्त्र को पढ़ता है वह सदाचारी होता है और अभीष्ट उत्तम गति को पाता है ॥ ११९-१२६ ॥ बारहवां अध्याय समाप्त।
प्रथम आचारकाण्ड ... ...) पु०
विक्रयार्थ पुस्तकों का सूचीपत्र ॥ नाम पुस्तक. मूल्य. निर्णयसिन्धु मूल ... ... ... १॥) पु० भगवन्तभास्कर ... ... ... ॥) पु० मिताक्षरा सटीक ... ... ... १०) पु० प्रथम आचारकाण्ड ... ... ... ३) पु० द्वितीय व्यवहारकाण्ड... ... ... २॥) पु० तृतीय प्रायश्चित्तकाण्ड ... ... ... ५) पु० शुक्रनीति ... ... ... ... ।-॥ राजनीति ... ... ... ... =॥ याज्ञवल्क्यस्मृति सटीक ... ... ... ।)॥ चाणक्यनीतिदर्पण ... ... ... -)॥ मानवधर्मसार का सार ... ... ... )॥ पु० मानवधर्मसार सटीक ... ... ... -)॥ निर्णयसिन्धु भाषाटीका सहित ... ... ... ४) पु० मनुस्मृति सटीक ... ... ... ५) पु० अष्टादशस्मृति सटीक ... ... ... २॥) पु० याज्ञवल्क्य मयत्री संवाद ... ... ... -)॥ मनुस्मृति उर्दू अनुवाद सहित ... ... २॥) पु० श्रीमद्भागवत बारहवाँस्कंध सटीक पत्रेनुमा ... ५) पु० मार्कण्डेयपुराण मूल ... ... ... |=)॥ मार्कण्डेयपुराण तीन जिल्दों में ... ... २॥) स्कन्दपुराण काशीखंड सटीक पूर्वार्द्ध व उत्तरार्द्ध ७)
अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका ।
अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका ।
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अ | अग्नीनात्मनि वैतानान् ... | १६३ | |
| अकन्येति तु यः कन्याम् ... | २८४ | अग्नीन्धनं भैक्षचर्याम् ... | ४२ |
| अकामतः कृतं पापम् ... | ४०५ | अग्नेः सोमयमाग्यां च ... | १०० |
| अकामतः कृते पापे ... | ४०५ | अग्नेः सोमस्य चैवादौ ... | ७८ |
| अकामतस्तु राजन्यम् ... | ४१६ | अग्नौ प्रास्ताहुतिः ... | ७८ |
| अकामस्य क्रिया काचित् ... | २३ | अग्न्यभावे तु विप्रस्य ... | १०० |
| अकारणं परित्यक्ता ... | ४१ | अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ... | १२४ |
| अकारं चाप्युकारं च ... | ३६ | अग्न्याधेयं पाकयज्ञान् ... | ४८ |
| अकुर्वन् विहितं कर्म ... | ४०५ | अग्रयाः सर्वेषु वेदेषु ... | ६६ |
| अकृतं च कृतात्क्षेत्रात् ... | ३६४ | अघं स केवलं भुंक्ते ... | ८५ |
| अकृता वा कृता वापि ... | ३४१ | अङ्गावपीडनायां च ... | २१५ |
| अकृत्वा भैक्षचरणम् ... | ५५ | अङ्गुलीग्रन्थिभेदस्य ... | ३६४ |
| अक्रोधनान्सुप्रसादान् ... | १०१ | अङ्गुष्ठमूलस्य तले ... | ३३ |
| अक्रोधनाः शौचपराः ... | ६७ | अचक्षुर्विषयं दुर्गम् ... | १२७ |
| अक्षमाला वशिष्ठेन ... | ३२१ | अच्छेलेनैव चान्विच्छेत् ... | २७८ |
| अक्षारलवणाश्नाः ... | १७२ | अजडश्चेदपोगण्डः ... | २७१ |
| अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टम् ... | ३८७ | अजाविकं सैकशफम् ... | ३३८ |
| अगारदाही गरदः ... | ६१ | अजाविके तु संरुद्धे ... | २८६ |
| अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये ... | ३११ | अजीगर्तः सुतं हन्तुम् ... | ३६३ |
| अग्निदग्धानग्निदग्धान् ... | ६८ | अजीवंस्तु यथोक्तेन ... | ३८६ |
| अग्निदान्भक्तदांश्चैव ... | ३६४ | अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रम् ... | ४२३ |
| अग्निपकाशानो वा ... | १६२ | अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद् ... | ४१६ |
| अग्निमायुर्विम्व्यस्तु ... | ५ | अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा ... | ४२२ |
| अग्निं वाहारयेदेनम् ... | २६५ | अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः ... | ४५६ |
| अग्निहोत्रं च जुहुयात् ... | ११८ | अज्ञो भवति वै बालः ... | ४१ |
| अग्निहोत्रं समादाय ... | १६० | अण्डजाः पक्षिणः सर्पाः ... | १० |
| अग्निहोत्र्यपविद्ध्याग्नीन् ... | ४०४ | अतन्द्रो मात्राविनाशिष्यः ... | ६ |
श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम्
( २ )
श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि | १३० | अधर्मदण्डनं लोके | २६८ अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते | ३० | अधर्मप्रभवं चैव | २०० अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये | ३६६ | अधर्मेण च यः प्राह | ४२ अतपास्त्वनधीयानः | १४६ | अधर्मेणैधते तावत् | १४४ अतस्तु विपरीतस्य | २१२ | अधस्ताल्लोपद्व्याञ्च | १२३ अतिक्रान्ते दशाहे तु | १७३ | अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैः | २६८ अतिक्रामेत्प्रमत्तं या | ३३१ | अधार्मिको नरो यो हि | १४३ अतिथिं चाननुज्ञाप्य | १३५ | अधितिष्ठेच्च केशांस्तु | १३७ अतिवादांस्तितिक्षेत | १६७ | अधियज्ञं ब्रह्म जपेत् | २०४ अतैजसानि पात्राणि | १६८ | अधिविन्ना तु या नारी | ३३२ अतोऽन्यतममाश्रित्य | ४१२ | अधीत्य विधिवद्वेदान् | १६५ अतोऽन्यतमयावृत्त्या | ११६ | अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः | ३७५ अत्युष्णं सर्वमन्नं स्यात् | १०४ | अधोदृष्टिर्नैकृतिकः | १४८ अथ गाथा वायुगीताः | ३२४ | अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात् | २२० अथ मूलमनाहार्यम् | २८० | अध्यग्न्यध्यावाहनिकम् | ३५१ अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा | ३६८ | अध्यात्मरतिरासीनः | १८८ अदत्तानामुपादानम् | ४४३ | अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः | ७७ अदत्त्वा तु य एतेभ्यः | ८४ | अध्यापनमध्ययनम् | १७ अदर्शयित्वा तत्तैव | २७२ | अध्यापनमध्ययनम् | ३८८ अदातरि पुनर्दाता | २७३ | अध्यापयामास पितॄन् | ४६ अदीयमाना भर्तारम् | ३३३ | अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तः | ३५ अदूषितानां द्रव्याणाम् | ३६६ | अध्येष्यमाणं तु गुरुः | ३६ अदेश्यं यश्च दिशति | २५५ | अनंशौ क्लीवपतितौ | ३५२ अद्भिरेव द्विजाग्र्याणाम् | ७१ | अनग्निरनिकेतः स्यात् | १६६ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति | १७६ | अनधीत्य द्विजो वेदान् | १६५ आद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचम् | १८० | अनन्तरः सपिण्डाद्यः | ३४६ अद्वयोगिनर्नहतः क्षत्रम् | ३७१ | अन्तरगतशवेग्रामे | १३२ अद्यात्काकः पुरोडाशम् | २१० | अनन्तरमरिं विद्यात् | २३३ अद्रोहेणैव भूतानाम् | ११४ | अनन्तरासु जातानाम् | ३७६ अद्रोहेण च नार्तीयात् | १२६ | अनपत्यस्य पुत्रस्य | ३५४ अधर्मार्थैर्यैसिद्ध्यर्थे | २५४ | अनपेक्षितमर्यादम् | २६८
| श्लोकः | पृष्ठम् |
( ३ )
स्तम्भ १
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| अनभ्यासेन वेदानाम् | ... १६० |
| अनर्चितं वृथामांसम् | ... १५१ |
| अनातुराः खानितानि | ... १३१ |
| अनादेयं नाददीत | ... २७५ |
| अनादेशस्य चादानात् | ... २७५ |
| अनाम्नातेषु धर्मेषु | ... ४६० |
| अनारोग्यमनायुष्यम् | ... ३३ |
| अनार्यता निष्ठुरता | ... ३८५ |
| अनार्यमार्यकर्माणं | ... ३८७ |
| अनार्यायां समुत्पन्नः | ... ३८६ |
| अनाहिताग्निता स्तेयम् | ... ४०८ |
| अनित्यो विजयो यस्मात् | ... २४१ |
| अनिन्दितैः संविवाहैः | ... ७२ |
| अनिपुणस्त्वनवेक्षेत | ... ३४२ |
| अनिर्दशाया गोःक्षीरम् | ... १६१ |
| अनिर्दशाहां गां सूताम् | ... २८७ |
| अनुक्ते निष्कृतीनां तु | ... ४३३ |
| अनुगच्छेच्चया प्रेतम् | ... १७७ |
| अनुपघ्नन्पितृद्रव्यम् | ... ३५३ |
| अनुबन्धं परिज्ञाय | ... २६७ |
| अनुभावी तु यः कश्चित् | ... २५७ |
| अनुमन्ता विशसिता | ... १६६ |
| अनुरागःशुचिर्दक्षः | ... २१७ |
| अनुष्णाभिरफेनाभिः | ... ३३ |
| अनृतं च समुत्कर्षे | ... ४०७ |
| अनृतं तु वदन्दण्ड्यः | ... २५१ |
| अनृतावृतुकाले च | ... १८६ |
| अनेकानि सहस्राणि | ... १८७ |
| अनेन क्रमयोगेन | ... ५१ |
| अनेन क्रमयोगेन | ... २०४ |
| अनेन तु विधानेन् | ... ३४० |
स्तम्भ २
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| अनेन नारीवृत्तेन | ... १८८ |
| अनेन विधिना नित्यम् | ... १८६ |
| अनेन विधिना यस्तु | ... ४१७ |
| अनेन विधिना राजा | ... २७६ |
| अनेन विधिना राजा | ... ३०४ |
| अनेन विधिना श्राद्धम् | ... ११२ |
| अनेन विधिना सर्वान् | ... २०३ |
| अनेन विप्रो वृत्तेन | ... १५६ |
| अन्तर्गतशवे ग्रामे | ... १३२ |
| अन्तर्दशाहे स्यातां चेत् | ... १७३ |
| अन्धो जडः पीठसर्पी | ... ३११ |
| अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति | ... २६२ |
| अन्नमेषां पराधीनम् | ... ३८४ |
| अन्नहर्तामयावित्वम् | ... ४०६ |
| अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि | ... ३०० |
| अन्नाद्यजोनां सत्त्वानाम् | ... ४२१ |
| अन्यदुक्तं जातमम्यत् | ... ३२४ |
| अन्यां चेद्दर्शयित्वान्या | ... २८१ |
| अन्यानपि प्रकुर्वीत | ... २१६ |
| अन्ये कृतयुगे धर्माः | ... १६ |
| अन्येषां चैवमादीनाम् | ... ३०२ |
| अन्येष्वपि तु कालेषु | ... २३८ |
| अन्योन्यस्याव्यभिचारः | ... ३३५ |
| अन्वाधेयं च यद्दत्तम् | ... ३५१ |
| अपः शस्तं विषं मांसम् | ... ३६० |
| अपःसुराभाजनस्थाः | ... ४२२ |
| अपत्यं धर्मकार्याणि | ... ३२२ |
| अपत्यलोभाद्या तु स्त्री | ... १८७ |
| अपदिश्यापदेश्यं च | ... २५५ |
| अपराजितां वास्थाय | ... १५४ |
| अपराह्ने तथा दर्भाः | ... १०८ |
( ४ ) श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् अपसव्यमग्नौ कृत्वा ... १०१ | अभोज्यानां तु भुक्त्वाऽन्नम् ... ४२३ अपहृतेऽथधर्मज्ञस्य ... २५५ | अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोः ... ५३ अपां नर्पापे निगतः ... ४१ | अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादन- अपांक्तयो यावतः पांक्त्यान् ... ६५ | मेवच ... ५६. अपांक्त्त्यान् यो दातुः ... ६३ | अमुं कार्षापणं दद्यात् ... ४२० अपांक्तीपहता पंक्तिः ... ६६ | अमर्त्यैतानि षड् जप्त्वा ... १६३ अपामग्नेश्च संयोगात् ... १७६ | अनन्त्विका तु कार्येयम् ... ३४ अपि नः स कुले जायातू ... १११ | अनात्यः प्राड्विवाको वा ... ३५७ अपि यत्सुकरं कर्म ... २१६ | अमात्यमुख्यं धर्मज्ञम् ... २२० अपुत्रायां मृतायां तु ... ३४१ | अमात्यराष्ट्रदुर्गार्थ ... २३२ अपुत्रेणेन विधिना ... ३४० | अमात्ये दण्ड आयत्तः ... २१७ अदृप्याः फलवन्तो ये ... १० | अमानुषीषु पुरुषः ... ४२७ अप्रयोधोऽतिथिःसायम् ... ८३ | अमाययैव वर्तेत ... २२४ अप्रयतः सुखार्थेषु ... १६४ | अमावास्या गुरुं हन्ति ... १३३ अप्राप्तिभिर्यत्क्रियते ... ३५५ | अमावास्यामष्टमीं च ... १३६ अप्सु प्रवेश्य तं दण्डम् ... ३५६ | अमेध्ये वा पतेन्मर्त्तः ... ४१४ अप्सु भूमिवदित्याहुः ... २६३ | अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः ... ३२६ अबीजविक्रयी चैव ... ३६६ | अयमुक्तो विभागो वः ... ३५४ अब्दार्धमिन्द्राभित्येतत् ... ४४० | अयाज्ययाजनैश्चैव ... ७६ अब्राह्मणः संग्रहणे ... ३०६ | अयुध्यमानंस्त्वोपाद्य ... १४३ अब्राह्मणादध्ययनम् ... ६४ | अरक्षिता गृहे रुद्धाः ... ३२० अभयस्य हि यो दाता ... २६७ | अरक्षितारं राजानम् ... २६८ अभिचारेषु सर्वेषु ... ३६६ | अरण्ये वा त्रिरम्यत्य ... ४४० अभिपूजिताम्भांस्तु ... १६६ | अराजके हि लोकेऽस्मिन् ... २०७ अभिद्योतिका न चेद् ब्रूयाद् ... २५५ | अरोगाःसर्वसिद्धार्थाः ... १६ अभिवादनशीलस्य ... ४४ | अर्थकामेष्वसक्तानाम् ... २५ अभिवादयेद्वृद्धांश्च ... १४० | अर्थसन्नादनार्थं च ... २३५ अभिवादात्परं विप्रः ... ४४ | अर्थस्य संग्रहे चैनान् ... २१६ अभिशस्तस्य धरदस्य ... १५१ | अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा ... २५० अभिशद्य तु यः कन्याम् ... ३०८ | अर्थेऽपव्ययमानं तु ... २५४ अभ्यान्त्यधर्म नासक्त्यम् ... ७४ | अयुक्तकारं नाऽऽददीत ... २३३
( ५ )
श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् अलंकृतश्च सं पश्येत् ... २४५ | अष्टौ मासान्यथादित्यः ... ३६६ अलब्धं चैव लिप्सेत ... २२३ | असंस्कृतप्रमीतानाम् ... १०६ अलब्धमिच्छेदण्डेन ... २२३ | असंस्कृतानपश्वन्मन्त्रैः ... १६६ अलायुं दारुपात्रं च ... १६८ | असकृद्दर्भघासेषु ... ४५५ अलाभेन विषादी स्यात् ... १६६ | असंख्यामूर्तयस्तस्य ... ४४५ अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण ... १४८ | असंधितानां संधाता ... ३०४ अल्पं वा बहु वा यस्य ... ४८ | असपिण्डं द्विजं प्रेतम् ... १७७ अल्पाक्षाभ्यवहारेण ... १६६ | असपिण्डा च या मातुः ... ६६ अवकाशेषु चोदेषु ... १०० | असंभाव्ये साक्षिभिश्च ... २५५ अवकीर्णी तु काणेन ... ४१७ | असंभोज्या ह्यसंयाज्याः ... ३५८ अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रम् ... ४३२ | असम्यक्कारिणश्चैव ... ३६१ अवगूर्य त्वब्दशतम् ... ४३२ | असाक्षिकेषु त्वर्थेषु ... २६४ अवनिष्ठीवतो दर्पात् ... २६४ | अस्थिमतां तु सत्त्वानाम् ... ४२१ अवहायौ भवेच्चैव ... २८० | अस्थिस्थूणं स्नायुयुतम् ... २०२ अवाक्शिरास्तमस्यन्धे ... २६१ | अस्मिन्धर्मोऽखिलेनोक्तः ... २० अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना ... ४५ | अस्रं गमयति प्रेतान् ... १०४ अविद्वानां तु सर्वेषाम् ... ३५२ | अस्रवतन्त्राः स्त्रियः कार्याः ... ३१८ अविद्वांश्र्चैव विद्वांश्र्च ... ३७१ | अस्वामिनाकृतो यस्तु ... २८० अविद्वांसमलं लोके ... ५६ | अहन्यहन्यवेक्षेत ... २१७ अवेक्षेत गतीर्नृणाम् ... २०० | अहं प्रजाः सिसृक्षंस्तु ... ७ अभेदयानो नष्टस्य ... २५१ | अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यम् ... ३५० अन्यदाशीं सौम्यनाम्नीम् ... ६७ | अहिंसयेन्द्रियासङ्गैः ... २०२ अव्रतानाममन्त्राणाम् ... ४६१ | अहिंसयैव भूतानाम् ... ५० अव्रतैैर्यदद्विजैर्भुक्तम् ... ६३ | अहिंसा सत्यमस्तेयम् ... ३८६ अशक्नुवंस्तु शुश्रूषाम् ... ३६१ | अहुतं च हुतं चैव ... ७८ अशासंस्तरकरान्येस्तु ... ३६१ | अहोरात्रे विभजते ... १३ अश्मरीऽस्थीनि गोवालान् ... २८६ | अह्ना चैकेन राज्या च ... १७१ अश्रोत्रियः पिता यस्य ... ८८ | अह्ना राज्या च याञ्जन्तून् ... २०१ अश्रीकमेतत्साधूनाम् ... १५० | आ अष्टपाद्यं तु शूद्रस्य ... ३०३ | आकारैरितिैर्गत्या ... २५० अष्टावृत्तौ समश्नीयात् ... ४३४ | आकाशात्तु विकुर्वाणात् ... १५
श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम्
( ६ ) श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् आकाशाेन्तास्तु विज्ञेयाः ... १४६ | आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म ... ४४१ आगमं निर्गमं स्थानम् ... ३१३ | आद्याद्यस्य गुणं त्वेषाम् ... ४ अगत्सुब्राह्मणस्यैव ... ३५८ | आधिःसीमाबालधनम् ... २७१ अगारादभिनिष्क्रान्तः ... १६६ | आधिश्चोपनिधिश्चोभौ ... २७० आचम्य प्रयतो नित्यम् ... ६१ | आपः शुद्धा भूमिगताः ... १८२ आचम्य प्रयतो नित्यम् ... १७५ | आपत्कल्पेन यो धर्मम् ... ४०२ आचम्योदक्परावृत्य ... १०१ | आपदर्थं धनं रक्षेत् ... २४३ आचारः परमो धर्मः ... २० | आपद्गतोऽथवा वृद्धः ... ३६५ आचारहीनःक्लीवश्च ... ६३ | आपोन्नारा इति प्रोक्ताः ... ३ आचाराद्विच्युतो विप्रः ... २० | आसाः सर्वेषु वर्णेषु ... २५७ आचाराल्लभते ह्यायुः ... १४१ | आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे ... ६७ आचार्यं स्वमुपाध्यायम् ... १७५ | आयतिं सर्वकार्याणाम् ... २३७ आचार्यं च प्रवक्तारम् ... १४३ | आयत्यां गुणदोषज्ञः ... ३३७ आचार्यपुत्रःशुश्रूषुः ... ४२ | आयुष्मन्तं सुतं सूते ... १०६ आचार्यश्च पिता चैव ... ६१ | आयुष्मान्भव सौम्येति ... ४४ आचार्यस्त्वस्य यां जातिम् ... ४८ | आयुष्यं प्राङ्मुखो भुंक्ते ... ३२ आचार्ये तु खलु प्रेते ... ६५ | आयोगवश्च क्षत्ता च ... ३७८ आचार्यो ब्रह्मलोकेशः ... १४५ | आरण्यांश्च पशून्सर्वान् ... ३६० आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः ... ६१ | आरण्यानां च सर्वेषाम् ... १६१ आच्छाद्य चार्चयित्वा च ... ७० | आरभेतैव कर्माणि ... ३६८ आतुरामभिशस्तां वा ... ४१७ | आरम्भश्चित्ताऽधैर्यम् ... ४४८ आत्मनश्च परित्राणे ... ३०५ | आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः ... २८३ आत्मनो यदि वान्येषाम् ... ४१७ | आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत ... १२७ आत्मैव देवताः सर्वाः ... ४६२ | आर्थिकः कुलमित्रं च ... १५८ आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी ... २६० | आर्यता पुरुषज्ञानम् ... २४३ आददीत न शूद्रोऽपि ... ३३५ | आर्षं धर्मोपदेशं च ... ४५६ आददीताथ षड्भागम् ... २२८ | आर्षे गोमिथुनं शुल्कम् ... ७४ आददीतार्थषड्भागम् ... २५१ | आवृत्तानां गुरुकुलात् ... २२० आदानमप्रियकरम् ... २४१ | आश्रमादाश्रमं गत्वा ... १३५ आदाननित्याच्चादातुः ... ४०० | आश्रमेषु द्विजातीनाम् ... ३११ आदिष्टांगोदकं कुर्यात् ... १७५ | आषोडशाद्ब्राह्मणस्य ... ३०
( ७ ) श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् आसनं चैव यानं च ... २३४ | इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठम् ... २० आसनावसथौ शय्याम् ... ८३ | इदं तु वृत्तिवैकल्यात् ... ३८६ आसनाशनशय्याभिः ... ११६ | इन्द्रकार्यस्य वायोश्च ... ३६८ आसनेषूपक्लृप्तेषु ... १०० | इन्द्रानिलयमार्काणाम् ... २०७ आसपिण्डक्रियाकर्म ... १०६ | इन्द्रियाणां च सर्वेषाम् ... ४० आसप्तमात्तः शरीरस्य ... ६४ | इन्द्रियाणां जये योगम् ... २१४ आसमुद्रात्तु वै पूर्वात् ... २६ | इन्द्रियाणां निरोधेन ... २०२ आसां महर्षिचर्याणाम् ... १६५ | इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन ... ३६ आसीतामरणात्क्षान्ता ... १८७ | इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन ... ४५१ आसीदिदं तमोभूतम ... २ | इन्द्रियाणां विचरताम् ... ३८ आसीनस्य स्थितः कुर्यात् ... ५७ | इन्द्रियाणि यशः स्वर्ग्यम् ... ४०४ आहरेत्तीणषि वा द्वे वा ... ३६६ | इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु ... ११६ आहवेषु मिथोऽन्योन्यम् ... २२१ | इन्धनार्थमशुष्काणाम् ... ४०८ आहृतामभ्युतां भिक्षाम् ... १५७ | इमं लोकं मातृभक्त्या ... ६२ ओहैव स नखामेभ्यः ... ५२ | इमं हि सर्ववर्णानाम् ... ३१८ इ | इमान्नित्यमनध्यायान् ... १३१ इच्छ्यान्योन्यसंयोगः ... ७१ | इयं भूमर्हि भूतानाम् ... १२३ इतरानपि सख्यादीन् ... ८४ | इयं विशुद्धिरुदिता ... ४१२ इतरे कृतवन्तरतु ... ३५८ | इष्टिं वैश्वानरीं नित्यम् ... ४०२ इतरेषां तु पशूनानाम् ... ३६० | इह दुष्चरितैः केचित् ... ४०५ इतरेषु त्वपांक्तेयेषु ... ६५ | इह चामुत्र वा काम्यम् ... ४५७ इतरेषु ससन्ध्वेषु ... १४ | ई इतरेषु तु शिष्टेषु ... ७२ | ईशो दण्डस्य वरणः ... ३५६ इतरेष्वागमाद्धर्मः ... १६ | उ इत्येतत्तपसो देवाः ... ४३८ | उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये ... ४१२ इत्येतदेनसायुक्तम् ... ४३६ | उच्चावचेषु भूतेषु ... २०२ इत्येतन्मानवं शास्त्रम् ... ४६३ | उच्छिष्टमन्नं दातव्यम् ... ३६६ इदं शरणमज्ञानात् ... २०४ | उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टः ... १८४ इदं शास्त्रं तु कृत्वासौ ... १२ | उच्छीर्षके प्रिये कुर्यात् ... ७२ इदं शास्त्रमधीयानः ... १६ | उच्छेषणं भूमिगतम् ... १० उच्छेषणं तु निनयेत् ... १०३
श्लोकः ..पृष्ठम् | श्लोकः . पृष्ठम्
( ८ ) श्लोकः ..पृष्ठम् | श्लोकः . पृष्ठम् उत्कृष्टायाभिरूपाय ... ३३३ | उपनीय तु यः शिष्यम् ... ४७ उत्कोचकाश्चोपधिकाः ... ३६१ | उपनीय तु तत्सर्वम् ... १०३ उत्तमां सेवमानस्तु ... ३०७ | उपपन्नौ गुणैः सर्वैः ... ३४२ उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्यात् ... १८ | उपपातकसंयुक्तः ... ४१६ उत्तमानुत्तमानाच्छन् ... १५६ | उपरुध्यारिमासीत ... २४० उत्तमैरुत्तमैनित्यम् ... १५६ | उपवासकृशं तं तु ... ४३० उत्थाय पश्चिमे यामे ... २३१ | उपवेश्य तु तान्विप्रान् ... १०० उत्थायावश्यकं कृत्वा ... १२६ | उपसर्जनं प्रधानस्य ... ३३६ उत्पत्तिरेव विप्रस्य ... १८ | उपस्थमुदरं जिह्वा ... २६७ उत्पद्यते गृहे यस्य ... ३४६ | उपस्पृशंशिषवणाम् ... १६३ उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च ... ४५८ | उपस्पृश्य द्विजो नित्यम् ... ३२ उत्पादकब्रह्मदात्रोः ... ४८ | उपाकर्मणि चोत्सर्गे ... १३४ उत्सादनं च गात्राणाम् ... ५६ | उपाध्यायान्दशाचार्यः ... ४८ उत्पादनमपत्यस्य ... ३२२ | उपानहौ च वासश्च ... १२५ उदकं निनयेच्छेषम् ... १०१ | उपासते ये गृहस्थाः ... ८३ उदकुम्भं सुमनसः ... ५४ | उपेतारमुपेयं च ... २४३ उदके मध्यरात्रे च ... १३२ | उभयोर्हस्तयोर्मुक्तम् ... १०२ उदितेऽनुदिते चैव ... २५ | उभाभ्यामप्यजीवेत्तु ... ३८६ उदितोऽयं विस्तरशः ... ३६० | उभावपि तु तावेव ... ३०६ उद्धारो न दशस्वस्ति ... ३३८ | उद्यान समाना समारुह्य ... ४३१ उद्धृते दक्षिणे पाणौ ... ३४ | उष्णे वर्षति शीते वा ... ४१७ उद्वहंहीनशंचैव ... ४ | ऊ उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे ... १० | ऊनद्विवार्षिकं प्रेतम् ... १७१ उद्यतैराहवे शस्त्रैः ... १७७ | ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु ... ३५४ उद्धर्तनमपस्नानम् ... १३७ | ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः ... १८ उन्मत्तं पतितं क्लीबम् ... ३३१ | ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि ... १८३ उपचारक्रियाकेलि ... ३०६ | ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च ... ३३६ उपगच्छानि चान्यानि ... २८८ | ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति ... ४४ उपजप्यानुपजपेत् ... २४० | ऋ उपदाभिश्च यः कश्चित् ... २७६ | ऋक्षेष्ट्याग्रयणं चैव ... १६१ उपनीय गुरुः शिष्यम् ... ३५ | ऋक्संहितां त्रिर्मभ्यस्य ... ४४१
( ६ )
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | : पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| ऋग्वेदन्नित्यशस्त्रिंश | ... २४१ | एक जातिर्द्विजातींस्तु | ... २४२ |
| ऋग्वेदो देवदैवत्यः | ... १३५ | एकदेशं तु वेदस्य | ... ४७ |
| ऋचो यजूंषि सामानि | ... ४४१ | एकमप्याशयेद्विप्रम् | ... ७६ |
| ऋणपस्ते तु सर्वं स्युः | ... ३१ | एकमेव तु शूद्रस्य | ... १७ |
| ऋणं दातुमशक्तो यः | ... २७२ | एकमेव दहत्यग्निः | ... ३०८ |
| ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य | ... १६५ | एकरात्रं तु निवसन् | ... ८२ |
| ऋणे देये प्रतिज्ञाते | ... २६६ | एकाकिनश्चात्यागिके | ... २३४ |
| ऋणे धने च सर्वस्मिन् | ... ३५४ | एकाकी चिंतयेन्नित्यम् | ... १५८ |
| ऋतमूञ्छशिलं ज्ञेयम् | ... ११४ | एकाक्षरं परं ब्रह्म | ... ३८ |
| ऋतानाञ्चाभ्यां जीवेत्तु | ... ११४ | एकादशं मनो ज्ञेयम् | ... ३६ |
| ऋतुःस्वाभाविकःस्त्रीणाम् | ... ७३ | एकादशेन्द्रियाण्याहुः | ... ३६ |
| ऋतुकालाभिगामी स्यात् | ... ७३ | एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः | ... ३३८ |
| ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैः | ... १४५ | एकान्तरे त्वानुलोम्यात् | ... ३७७ |
| ऋत्विग्यदि वृतो यज्ञे | ... २८१ | एकासिङ्गे गुदे तिस्रः | ... १८३ |
| ऋत्विजं वरणजैश्चान्यैः | ... ३११ | एकैकं ह्रासयेत्पिण्डम् | ... ४३४ |
| ऋषयः पितरो देवाः | ... ७६ | एकैकं ग्रासमश्रीयात् | ... ४३३ |
| ऋषयः संयतात्मानः | ... ४३७ | एकैकमपि विद्वांसम् | ... ८७ |
| ऋषयो दीर्घसंध्यात्वात् | ... १३० | एकोऽपि वेदविद्धर्मम् | ... ४२१ |
| ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव | ... १६४ | एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्यान् | ... २५८ |
| ऋषिभ्यः पितरो जाताः | ... ६६ | एषोऽहमस्मीत्यात्मानम् | ... २६१ |
| ऋषियज्ञं देवयज्ञम् | ... ११७ | एतच्च द्विविधं विद्यान् | ... २२३ |
| ए | एतच्छौचं गृहस्थानाम् | ... १८३ | |
| एक एव चरेन्नित्यम् | ... १६६ | एतन्न परे चक्षुः | ... ३३५ |
| एक एव सुहृद्धर्मः | ... २४८ | एतत्सर्वं हि पुरुषम् | ... १३७ |
| एक एवौरसः पुत्रः | ... ३४५ | एतद्दण्डविधिं कुर्यात् , | ... २८४ |
| एकः प्रजायते जन्तुः | ... १५५ | एतदक्षरमेतां च | ... ३७ |
| एकः शतं योधयति | ... २१६ | एतदन्तास्तु गतयः | ... ११ |
| एकः शयीत सर्वत्र | ... ५४ | एतदुक्तं द्विजातीनाम् | ... १६४ |
| एकं वृषभमुद्धारम् | ... ३३६ | एतदेव चरेत्कृच्छ्र | ... ४१६ |
| एकं कालं चरेद्भैक्षम् | ... १६६ | एतदेव व्रतं कुर्युः | ... ४१० |
| एकं गोमिथुनं द्वे वा | ... ७० | एतदेव ब्रा कृत्स्नम् | ... ४१६ |
( १० ) श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् एतद्देवविधिं कुर्यात् ... ४२६ | एते चतुर्णां वर्णानाम् ... ३६६ एतद्देशप्रसूतस्य ... २६ | एतेभ्योऽपि द्विजाग्र्येभ्यः ... ३६८ एतद्दिजन्मसाफल्यम् ... ४५७ | एते मनूस्तु सप्तान्यान् ... ८ एतद्द्वास्तथादित्याः ... ४३४ | एत राष्ट्रेवर्तमानः ... २५६ एतद्दुः सारफलगुरुत्वम् ... ३२७ | एतेषट् सदृशान्वयान् २७६ एतद्विदन्तो विद्वांसः ... १३५ | एतेषां निग्रहो राज्ञः ३११ एतद्विदन्तो विद्वांसः ... १२६ | एतेष्वविद्यमानेषु ... ६५ एतद्विधानमातिष्ठेत् ... २४५ | एतैरुपायै रन्यैश्च ... ३७० एतद्विधानमातिष्ठेन् ... २८७ | एतैर्द्विजातयः शोध्याः ... ४३५ एतद्विधानं विज्ञेयम् ... ३४३ | एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमाम ... २८१ एतद्वोऽभिहितं शौचम् ... १७७ | एतैर्विवादान्सन्नयय्य ... १४५ एतद्वोऽभिहितं सर्वम् ... ११३ | एतैर्व्रतैरपोहेत ... ४२६ एतद्वोऽभिहितं सर्वम् ... ४६१ | एतैर्व्रतैरपोहेत ... ४१५ एतद्वोऽयं भृगुः शास्त्रम् ... १२ | एतैर्व्रतैरपोहेयुः ... ४१५ एतमेके वदन्त्यग्निन् ... ४६२ | एतैर्व्रतैरपोक्षं स्यात् ... ४२२ . एतमेव विधिं कृत्स्नम् ... ४३४ | एधोदकं मूलफलम् ... १५६ एत यर्चादिसंयुक्तः ... ३७ | एनसां स्थूलसूक्ष्माणाम् ... ४३६ एतस्मिन्नेनासि प्राप्ते ... ४१८ | एनस्विभिरनिक्षिप्तैः ... ४२६ एताः प्रकृतयो मूलम् ... २३२ | एवं कर्मविशेषेण ... ४०६ एतांस्त्वभ्युदितान्विद्यात् ... १३१ | एवं गृहाश्रमे स्थित्वा ... १६० एता दृष्ट्वाऽस्य जीवस्य ... ४५६ | एवं चरति यो विप्रः ... ६५ एतानाहुः कौटसाक्ष्ये ... २६६ | एवं चरन् सदा युक्तः ... ३७२ एतानेके महायज्ञान् ... ११७ | एवं दृढव्रतो नित्यम् ... ४११ एतान्दोषानवेक्ष्यत्वम् ... २६३ | एवं धर्म्याणि कार्याणि ... ३६० एतान्द्दिजात्यां देशान् ... २७ | एवं निर्वपणं कृत्वा ... १०८ एतान्येनांसि सर्वाणि ... ४०६ | एवं प्रयत्नं कुर्वीत ... २४४ एतान्विगर्हिताचारान् ... ६३ | एवं यः सर्वभूतानि ... ८१ एतावानेव पुरुषः ... ३२५ | एवं यः सर्वभूतेषु ... ४६२ एताश्चान्याश्च सेवेत ... १६४ | एवं यथोक्तं विप्राणाम् ... १६० एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन् ... ३२३ | एवं यद्यप्यनिद्दिष्टेषु ... ३७१ एतास्विवस्तु भार्यार्थे ... ४२६ | एवं विजयमानस्य ... २२५
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
( ११ )
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| एवं विधान्नृपो देशान् | ३६२ | एष सर्वः समुद्दिष्टः | ४५६ |
| एवं वृत्तस्य नृपतेः | २१२ | एष सर्वाणि भूतानि | ४६२ |
| एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीम् | १८६ | एष स्त्रीपुंसयोरोक्तः | ३३६ |
| एवं वृषभमुद्धारम् | ३३६ | एषा धर्मस्य वो योनिः | २७ |
| एवं सजात्यस्त्वप्राप्त्याम् | १२ | एषा पापकृतामुक्ता | ४२७ |
| एवं संचिन्त्य मनसा | ४३६ | एषामन्यतमो यस्य | ८६ |
| एवं संन्यस्य कर्माणि | २०६ | एषामन्यतमे स्थाने | २६६ |
| एवं स भगवान्देवः | ४६१ | एषा विचित्राभिहिता | ४२४ |
| एवं समुद्धृतोद्धारे | ३३८ | एषु स्थानेषु भूयिष्ठम् | २४७ |
| एवं सम्यग्विधुर्हत्वा | ८० | एषोऽखिलःकर्मविधिः | ३७२ |
| एवं सर्वं समुद्दिष्टम् | ११ | एषोऽखिलेनाभिहितः | २६१ |
| एवं सर्वं विधायेदम् | २३० | एषोऽखिलेनाभिहितः | २६७ |
| एवं सर्वमिदं राजा | २४३ | एषोदिता गृहस्थस्य | १५८ |
| एवं सर्वानिमान्रूजा | ३१७ | एषोदिता लोकयात्रा | ३२२ |
| एवं सह वसेयुर्वा | ३३७ | एषोऽनाद्यादनत्योक्तः | ४२४ |
| एवं स्वभावं ज्ञात्वासां | ३२० | एषोऽनापदि वर्णानाम् | ३७५ |
| एवमाचारतो दृष्ट्वा | २१ | एषोऽनुपरकृतः प्रोक्तः | २७३ |
| एवमादीन्विजानीयात् | ३६२ | एष्वर्थेषु पशून्हिंसन् | १६७ |
| एवमेतैरिदं सर्वम् | ६ | ऐ | |
| एष दण्डविधिः प्रोक्तः | २६३ | ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुः | ३०४ |
| एष धर्मविधिः कृत्स्नः | ३६७ | ओ | |
| 'एष धर्मोऽनुशिष्टो वः | २०४ | ओघवाताहतं बीजम् | ३६७ |
| एष धर्मोऽखिलेनोक्तः | २८३ | ओंकारपूर्विकास्तिस्रः | ३७ |
| एष धर्मो गवाश्वस्य | ३२७ | ओषध्यः पशवो वृक्षाः | १६७ |
| एष नौयायिनामुक्तः | ३१५ | औ | |
| एष प्रासो द्विजातीनाम् | ३५ | औरभ्रिको माहिषिकः | ६२ |
| एष वै प्रथमः कल्पः | ८६ | औरसः क्षेत्रजश्चैव | ३४३ |
| एष वोऽभिहितो धर्मः | २०६ | औरसक्षेत्रजौ पुत्रौ | ३४४ |
| एष शौचविधिः कृत्स्नः | १८४ | औषध्यापन्गदां पिष्टा | ४३७ |
| एष शौचस्य वः प्रोक्तः | १७६ | क | |
| एष सर्वः समुद्दिष्टः | ४५१ | कक्षान्ता भक्षयेद्दण्डम् | ४१३ |
( १२ ) श्लोकः पृष्ठम् श्लोकः पृष्ठम् . कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टम् ... १०७ कार्यासमधुवीतं स्यात् ... ३१ कन्याया दूषकं चैव ... ४०७ कार्पासकीटजोर्णानाम् ... ४२६ कन्यायां दत्तशुल्कायाम् ... ३३४ कार्यं सोऽवेक्ष्य शक्तिं च ... २०८ कन्यैव कन्यां या कुर्यात् ... ३०८ कार्षापणं भवेद्दण्ड्यः ... ३०३ कपालं वृक्षमूलानि ... १८७ कार्बोरौरव वार्त्तीनि ... ३० कर्णवेधोऽनिले रात्रौ ... १३१ कालं कालविभक्तिंश्च ... ५ कर्णौ चर्म च वासांसि ... २८६ कालशाकं महाशल्कः ... ११० कर्तव्यां न विवेक्तारम् ... ८ कालेऽदानात्पिता वाच्यः ... ३१८ कर्मणाऽपि समं कुर्यात् ... २७६ किंचिदेव तु दातव्यः स्यात् ... ३०७ कर्मान्तानां च देवानाम् ... ५ किंचिदेव तु विप्राय ... ४२१ कर्पारस्य निषादस्य ... १७१ कितवान्कुशीलवान् ... ३५२ कलविङ्कं हवं हंसम् ... १६१ किरातन् वानरान् ... ८ कलिः प्रसुप्तो भवति ... ३६८ कीटाश् चाहेतताहाश्च ... ४३७ कल्यांयन्तस्य वृद्धिं च ... ४०१ कीनाशो गोवृषो यानम् ... ३४३ काचं वल्ल्यथवा लङ्कम् ... २६२ कुट्टन्पार्थेऽध्यर्धतोऽपि ... २७४ कानीनश्च सहोढश्च ... ३४५ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च ... २३ कामं आडेऽर्चयेन्मित्रम् ... ८३ कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च ... २३६ कामक्रोधौ तु संयम्य ... २७३ कुशांहस्तपशुं संज्ञे ... १८६ कामजेषु प्रसक्तो हि ... २१४ कुर्यादहरहः श्राद्धम् ... ७६ कामतो रेतसः सेकम् ... ४१= कुलजे वृत्तसंपन्ने ... २७७ कामं तु प्राययेद्देव्यम् ... १७७ कुले मुख्येऽभिजानस्य ... ३८२ कामं तु गुरुपत्नीनाम् ... २६ कुविवाहैः क्रियालोपैः ... ७६ कामतश्चाप्यनादिष्टम् ... ३३३ कुशॉस्रोऽवर्त्तणां च ... ६६ कामतश्चांशं कृत्वा तु ... ३६० कुसूलधान्यको वा स्यात् ... ११५ कामतस्ता न प्रशस्ता ... २३ कुसारैः कुण्डिमैःपुण्यम् ... २७२ कामादष्टागुणं पूर्वम् ... २६३ कुहूँ चैवासुमन्थे च ... ८० कामान्माता पिता चैनम् ... ४८ कूटाशासनकर्तॄंश्च ... ३५७ कामिनीषु विवाहेषु ... २६५ कृत्वाऽऽह्रवैर्भागे जुहुयात् ... २६४ काम्बोजो निषादानां ... ३८१ कृतदारोऽपरान्दारान् ... ३६८ कामुकाद्धितिनागेश्चैव ... २३० कृतं चेत्कथयेच्चैव ... ३१८ कारुकश्च नर्त्तो हस्ति ... २२१ कृतवास्तव्यनिवसेत् ... ४१०