मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
बारहवां अध्याय। ४४६
बारहवां अध्याय। ४४६ वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, शौच, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म- कर्म और आत्मचिन्तन ये सब सत्त्वगुण के काम हैं। आरम्भ में रुचि होना, फिर अधैर्य, बुरे कामों में फँसना और विषय- भोग ये रजोगुण के काम हैं। लोभ, नींद, अधीरता, क्रूरता, नास्तिकता, अनाचार, मांगने की आदत और प्रमाद ये तमो- गुण के काम हैं। इन तीनों गुणों का संक्षेप से लक्षण यों हैः- जिस कर्म को करके करते हुए या आगे करने में लज्जा आती है वह तमोगुण का लक्षण है। जिस कर्म से लोक में प्रसिद्धि चाहे, पर फल न होने पर शोक न पैदा हो, वह रजोगुण का लक्षण है। जिससे ज्ञान प्राप्त करना चाहे, जिसको करने में लज्जा न आवे और जिस कर्म से मन प्रसन्न सन्तुष्ट रहे, उसको सत्त्वगुण का लक्षण जानना चाहिए। तम का काम, रज का अर्थ और सत्त्व का धर्म ये मुख्य लक्षण हैं। इनमें क्रम से अगला अगला श्रेष्ठ माना जाता है॥ ३१-३८॥ येन यस्तु गुणेनैषां संसारान् प्रतिपद्यते । तान् समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम् ॥३६॥ देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः । तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषां त्रिविधा गतिः ॥ ४० ॥ त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः । अधमा मध्यमाग्र्या च कर्मविद्याविशेषतः ॥ ४१ ॥ स्थावराः क्रमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः । पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ ४२ ॥ हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः । सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥४३॥ चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः । ५७
४५० मनुस्मृति । रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥ झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः । द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५ ॥ राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः । वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥ इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता है, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं-सात्त्विक गुणवाले देव- भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते हैं- यह तीन प्रकार की गति है। सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार, उत्तम-मध्यम-अ- धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क- छुवा, पशु और मृग, ये तमोगुणी अधम गति है। हाथी, घोड़ा, शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शूकर ये तमोगुणी मध्यमगति है। चारण-भाँट, गरुड़ादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि- शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए। झल्ल, मल्ल, नट, शस्त्र से जीनेवाले, जुआ-मद्यपान में आसक्त पुरुष ये रजो- गुण की अधमगति हैं । राजा, क्षत्रिय, राजपुरोहित, विवाद करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥ गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये । तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥ तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः । नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥ ४८ ॥ यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः । पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥
बारहवां अध्याय। ४५१
बारहवां अध्याय। ४५१ ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥ एष सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिप्रकारस्य कर्मणः । त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५१ ॥ इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च । पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥ यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा । क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥ बहून् वर्षगणान् घोरान् नरकान् प्राप्य तत्क्षयात् । संसारान् प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥
गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष, विद्याधर और अप्सरा ये रजोगुणी उत्तमगति है। वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानचारी देवता; नक्षत्र और दैत्य ये सत्त्वगुण की अधमगति है। यजमान, ऋषि, देवता, वेद, ज्योति, वर्ष, पितर और साध्यदेव यह सत्त्वगुण की मध्यमगति है। ब्रह्मा, प्रजापति, धर्म, महत्तत्त्व और प्रधान इसको सत्त्वगुण की उत्तमगति विद्वान् लोग कहते हैं। इस प्रकार मन, वाणी और शरीर के तीन प्रकार के कर्मों से होने वाली, त्रिगुणमयी, उत्तम-मध्यम-अधम तीन प्रकार की सब प्रा- णियों की गति कही गई है। इन्द्रियों में आसक्ति और धर्माचरण न करने से मूर्ख-अधम मनुष्य पापयोनि को प्राप्त होते हैं। इस लोक में यह जीव जिस जिस कर्म से जिस जिस योनि में जन्म लेता है, उन सब को क्रम से सुनो—महापातकी पुरुष बहुत वर्षों तक भयानक नरकों में पड़कर, पाप कट जाने पर बांकी भोग भोगने के लिए इन नीच योनियों में जन्मता है ॥ ४७-५४ ॥
श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।
४५२ मनुस्मृति । चाण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ५५ ॥ कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम् । हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ ५६ ॥ लूताऽहि सरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम् । हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ॥ ५७ ॥ तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि । क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ॥ ५८ ॥ हिंस्रा भवन्ति क्रव्यादः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः । परस्परादिनः स्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः ॥ ५९ ॥ संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् । अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ ६० ॥ मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः । विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥ ६१ ॥ धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं प्लवः । मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम् ॥ ६२ ॥ ब्रह्महत्या करनेवाला, कुत्ता, सुअर, गधा, ऊँट, बैल, बकरा, मेंढ़ा, मृग, पक्षी, चाण्डाल और पुक्कस की जाति में जन्मता है। मद्यपान करनेवाला ब्राह्मण कृमि, कीड़ा, पतंग, मैला खानेवाले पक्षी और हिंसक प्राणियों की जाति में जन्मता है । सोना चुरानेवाला ब्राह्मण मकड़ी, सांप, गिरगट, जलचर पक्षी, हिंसक जीव और पिशाच की योनि में जन्मता है । गुरुपत्नी-गामी पुरुष सैकड़ों बार घास, गुल्म, लता, कच्चा मांस खानेवाले, दाढ़वाले और क्रूर कर्मियों की योनि में जन्म लेता है । हिंसक मनुष्य कच्चा मांस खानेवाले, कृमि और अभक्ष्य-भक्षी होते हैं । चोर
बारहवां अध्याय। ४५३
बारहवां अध्याय। ४५३ एक दूसरे को खानेवाले प्राणी होते हैं। चाण्डाली से संयोग करनेवाले प्रेत होते हैं। पतितों से संसर्गी, परस्त्री और ब्राह्मण धन हरनेवाला, ब्रह्मराक्षस होता है। मणि, मोती, मूँगा और विचित्र रत्नों को चुराकर, हेमकार पक्षियों में जन्मता है। अन्न चुराकर चूहा कांस की चोरी से हंस, जल चुराने से मेंढ़क, मधु चुराने से मक्खी, दूध की चोरी से कौआ, रस चुराने से कुत्ता और घी चुराने से नौला होता है ॥ ५५-६२ ॥ मांसं गृध्रो वसां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः । चीरीवाकस्तु लवणं बलाका शकुनिर्दधि ॥ ६३ ॥ कौशेयं तित्तिरिर्हित्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः । कार्पासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुडम् ॥ ६४॥ छुच्छन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकं तु बर्हिणः । श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ ६५ ॥ वको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्युपस्करम् । रक्तानि हृत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ ६६ ॥ वृको मृगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः । स्त्रीमृक्षः स्तोकको वारि यानान्युष्ट्रः पशूनजः ॥ ६७ ॥ यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः । अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ॥ ६८॥ स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः । एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥ ६६ ॥ स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णा ह्यनापदि। पापान् संसृत्य संसारान् प्रेष्यतां यान्ति शत्रुषु ॥ ७०॥
४५४ मनुस्मृति । : मांस चुराने से गीध, चरबी चुराने से जलकाक, तेल की चोरी से तैलपक पक्षी, लोन चुराने से झींगुर और दही की चोरी से बलाका पक्षी होता है। रेशम चुराने से तीतर, अलसी के कपड़ों की चोरी से मेंढक, कपास वस्त्र चुराने से सारस, गौ चुराने से गोधा और गुड़ चुराने से वाग्गुद पक्षी होता है। उत्तम सुगन्ध की चीज़ चुराने से छुछुन्दरि, पत्ते-शाक चुराने से मोर, पक्वान्न चुराने पर भेड़िया और कच्चा अन्न चुराने से शल्यक होता है। आग चुराने से बक, सूप-मूसल चुराने पर मकड़ी और लाल वस्त्र चुराने से चकोर पक्षी होता है। मृगया, हाथा चुराने से नाहर, घोड़ा चुराने से व्याघ्र, फल-मूल की चोरी से वानर, स्त्री चुराने से रीछ, पीनेका जल चुराने से चातक, सवारी की चोरी से ऊँट और पशु की चोरी से बकरा होता है। मनुष्य दूसरे की कोई भी वस्तु चुराकर और बिना होम हवि भोजन से अवश्य पक्षी होता है। स्त्रियां भी चोरी करने पर इन्हीं दोषों को पाती हैं और उन्हीं जन्तुओं की स्त्री बनती हैं। बिना आपत्ति के अपने अपने नित्य कर्मों से पतित पुरुष पाप-योनियों में पैदा होकर, शत्रुओं के यहां दासपना को पाते हैं ॥ ६३-७० ॥ वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः । अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ॥ ७१ ॥ मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् । चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥ ७२ ॥ यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयीत्मकाः । तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥ ७३ ॥ तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः । संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥
बारहवां अध्याय। ४५५
बारहवां अध्याय। ४५५ तामिस्रादिषु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् । असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च ॥ ७५ ॥ विविधाश्चैव संपीड़ाः काकोलूकैश्च भक्षणम् । करम्भवालुकातापान् कुम्भीपाकांश्च दारुणान् ॥७६॥ संभवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः । शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥ ७७ ॥ असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् । बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥ ७८ ॥ अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण उल्कामुख प्रेत होकर वमन खाता है। क्षत्रिय, कटपूत प्रेत होकर विष्ठा और मुरदा खाता है। अपने धर्म से भ्रष्ट वैश्य मैत्राक्षज्योतिक प्रेत होकर, पीब खाता है और शूद्र चैलाशक प्रेत होकर, कपड़े की जूँ खाता है । वि- षयासक्त पुरुष जैसे जैसे विषयों का सेवन करते हैं, वैसे वैसे उनमें उनकी कुशलता हो जाती है। वे निर्बुद्धि उन पाप कर्मों के बार बार करने से यहां अनेक योनियों में जन्म लेकर दुःख पाते हैं। तामिस्र आदि भयानक नरकों में बार बार जन्म होता है। असिपत्र आदि वनों में चलना पड़ता है। यमलोक के बन्धन और छेदन के दुःख भोगने पड़ते हैं । अनेक पीड़ायें होती हैं, कौआ, उल्लू नोच नोच कर खाते हैं, जलती रेती का ताप और कुम्भीपाक आदि दारुण नरक भोगने पड़ते हैं। दुःख से पूर्ण पशु आदि की योनि में वारंवार जन्म होते हैं। सर्दी-गर्मी की पीड़ा और भांति भांति के भय होते हैं। फिर फिर गर्भ में वास होता है। दुःखद जन्म होता है। विविध बंधन शृङ्खला वगैरह का और दासपना प्राप्त होता है ॥ ७१-७८ ॥ बन्धुप्रियवियोगांश्च संत्रासं चैव दुर्जनैः । द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ॥ ७६॥
४५६ मनुस्मृति। जरां चैवाप्रतीकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम् । क्लेशांश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ॥ ८० ॥ यादृशेन तु भावेन यद्यत्कर्म निषेवते । तादृशेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥ ८१ ॥ एष सर्वः समुद्दिष्टः कर्मणां वः फलोदयः । नैःश्रेयसकरं कर्म विप्रस्येदं निबोधत ॥ ८२ ॥ वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः । अहिंसा गुरुसेवा च नैःश्रेयसकरं परम् ॥ ८३ ॥ सर्वेषामेव चैतेषां शुभानामिहकर्मणाम् । किञ्चिच्छ्रेयस्करतरं कर्मोक्तं पुरुषं प्रति ॥ ८४ ॥ सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् । तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ८५ ॥ षण्णामेषां तु सर्वेषां कर्मणां प्रेत्य चेह च । श्रेयस्करतरं ज्ञेयं सर्वदा कर्म वैदिकम् ॥ ८६ ॥ बान्धवों का वियोग, दुर्जनों का सहवास, दुःख से धन पाना, धन का नाश, कठिनता से मित्र पाना और शत्रुओं से वैर भाव होता है । जिसका उपाय न हो सके ऐसा बुढ़ापा आता है, व्याधियों से कष्ट, नानाप्रकार के दुःख और दुर्जय मरण होता है । मनुष्य जिस भाव से जो कर्म करता है, उसीके अनुकूल शरीर धारण करके फलों को भोगता है। यह सब कर्म फलों का वृत्त कहा गया है । अब ब्राह्मणों का कल्याण करनेवाला कर्म सुनो:— नैःश्रेयस-कर्म । वेदाभ्यास, तप, आत्मज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा, गुरुसेवा,
बारहवां अध्याय। ४५७
बारहवां अध्याय। ४५७ ये कर्म ब्राह्मणों को परम-हितकारी हैं। इन सब शुभकर्मों में भी पुरुष का, अधिक कल्याण करनेवाला कर्म-आत्मज्ञान है। वह सब विद्याओं में श्रेष्ठ है और उससे मोक्ष मिलता है। इन ऊपर कहे छः कर्मों में लोक-परलोक दोनों में अधिक कल्याणकारी वैदिक कर्म है ॥ ७६-८६ ॥ वैदिके कर्मयोगे तु सर्वाण्येतान्यशेषतः । अन्तर्भवन्ति क्रमशस्तस्मिंस्तस्मिन् क्रियाविधौ ॥८७॥ सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च । प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ ८८ ॥ इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते । निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ ८६ ॥ प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् । निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ ६० ॥ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति ॥ ६१ ॥ यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः । आत्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ६२॥ एतद्धि जन्मसाफल्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः। प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा ॥ ६३ ॥ पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् । अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ ६४॥ वैदिक कर्मों में ऊपर कही सब क्रियाओं का अन्तर्भाव होता है। स्वर्गादि सुख और अभ्युदय करनेवाला प्रवृत्ति कर्म और ५८
४५८ मनुस्मृति । मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै- दिक कर्म होते हैं। इसलोक के और परलोक के सुख की कामना से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम आत्मज्ञानार्थ किया कर्म निवृत्त कहलाता है। प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता को और निवृत्त कर्म करने से पञ्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष पाता है। सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को समान देखनेवाला आत्मयाजी मोक्ष को पाता है। द्विज शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और वेदाभ्यास ही करे। इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म की सफलता है। द्विज आत्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है, अन्यथा नहीं। पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग दिखाने वाला वेद ही नेत्र है। वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना जानने में अशक्य है और अनन्तहै। यही मर्यादा है ॥८७-९४॥ या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाःप्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥ उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् । तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ९६ ॥ चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्ध्यति ॥ ९७ ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥ बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥ सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥
बारहवां अध्याय। ४५६
बारहवां अध्याय। ४५६ यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान्। तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः॥ १०१॥ वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्। इहैव लोके तिष्ठन् स ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १०२॥ जो स्मृति वेदमूलक नहीं हैं, जो वैदिक देव-यज्ञादि को झूठा बतलानेवाले ग्रन्थ हैं, उन सबको निष्फल और नरकगति देनेवाले जानना चाहिए। वेद से भिन्न-मूलक जो ग्रन्थ हैं वे सब उत्पन्न होते हैं और थोड़े समय में नष्ट होजाते हैं। वे आधुनिक होनेसे निष्फल और असत्य हैं। चारों वर्ण, चारों आश्रम, तीनों लोक और भूत, भविष्य, वर्तमान काल सब वेदहीसे प्रसिद्ध होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांच भी वेद से उत्पन्न हैं और सत्त्वादि गुणों के कर्म से हैं। सनातन वेद यज्ञादि से चराचर विश्व का धारण और पा- लन करता है। इसलिये वेद अधिकारी के परम कल्याण का साधन है। सेनापति, राज्य, न्यायाधीश और सबका स्वामी वेदशास्त्रज्ञही होता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले वृक्षों को भी भस्म करडालता है वैसेही वेदज्ञ अपने कर्मदोषों को भस्म करडालता है। वेद के तत्त्व को जाननेवाला चाहे जिस आश्रम में रहकर इसीलोक में मोक्ष पाता है॥ ६५-१०२॥ अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः। धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥१०३॥ तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्। तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ १०४॥ प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्। त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता॥ १०५॥ आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।
४६० मनुस्मृति । यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ १०६ ॥ नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः । मानवस्यास्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ॥ १०७ ॥ अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् । यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥ १०८ ॥ धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः । ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ १०६ ॥ दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् । त्र्यवरा वाऽपि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ ११० ॥ अज्ञों से ग्रन्थ पढ़े हुए श्रेष्ठ हैं, उनसे धारण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। उनसे भी अर्थ समझनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी शास्त्रानुसार आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। तप और विद्या ब्राह्मण का परम हित- कारी है। ब्राह्मण तप से पाप नाश करता है और ब्रह्मविद्या से मोक्ष पाता है। धर्म के तत्त्व को जानने की इच्छावाले प्रत्यक्ष (श्रुति) अनुमान (स्मृति) और विविध शास्त्रों को भली भाँति जानें। जो वेद और धर्मशास्त्र का वेद के अनुकूल तर्क से विचार करता है वह धर्म को जानता है, दूसरा नहीं जा- नता। इस प्रकार मोक्ष देनेवाले सब कर्म कहे गये हैं। अब इस मानव धर्मशास्त्र के रहस्य का उपदेश करते हैं:— रहस्य-उपदेश । जो धर्म इस शास्त्रमें नहीं कहे गये उनका निर्णय शिष्ट ब्राह्मणों की आज्ञा से जो हो वही माननीय होता है। जिन्होंने साङ्ग वेद धर्मभाव से अध्ययन किया हो उन वेद के प्रत्यक्ष प्रमाण भूत ब्रा- ह्मणों को शिष्ट जानना चाहिए। कमसे कम दश सदाचारी ब्राह्मणों की सभा या तीनही ब्राह्मणों की सभा जो धर्म बतलावें वही धर्म जानना चाहिए ॥ १०३-११० ॥
बारहवां अध्याय । ४६१
बारहवां अध्याय । ४६१ त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ॥ १११ ॥ ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥ ११२ ॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥ ११३ ॥ अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥ ११४ ॥ यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्ममतद्विदः । तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति ॥ ११५ ॥ एतद्वोऽभिहितं सर्वं निःश्रेयसकरं परम् । तस्मादप्रच्युतो विप्रः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ११६ ॥ एवं स भगवान् देवो लोकानां हितकाम्यया । धर्मस्य परमं गुह्यं ममेदं सर्वमुक्तवान् ॥ ११७ ॥ सर्वमात्मनि संपश्येत्सच्चासच्च समाहितः । सर्वं ह्यात्मनि संपश्यन्ना धर्मे कुरुते मनः ॥ ११८ ॥ तीनों वेद का ज्ञाता वेदानुकूल शास्त्रज्ञ, मीमांसादि तर्कों का ज्ञाता, निरुक्त और धर्म के विचारों में परायण ऐसे ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ दश ब्राह्मणों की सभा कहलाती है । धर्म में सन्देह पड़ने पर निर्णय करने के लिए तीनों वेद के ज्ञाता, कम से कम तीन ब्राह्मणों को अधिष्ठाता करना चाहिए । एक भी वेदज्ञ ब्राह्मण जिसको धर्म कहे उसको धर्म जाने । पर दश हज़ार मूर्खों का भी कहा धर्म मान्य नहीं होता । ब्रह्मचर्य हीन, वेद न जानने
४६२ : मनुस्मृति । वाले नाममात्र से ब्राह्मण जाति के हज़ारों इकट्ठे होजायँ तो भी वह सभा नहीं कही जाती। तमोगुणी धर्म न जाननेवाले, जिसको प्रायश्चित्त बतावैं उसका पाप, सैकड़ों भाग होकर बतलानेवाले को प्राप्त होता है। यह परम कल्याणकारी संपूर्ण साधन कहा गया है। जो द्विज अपने धर्म से विचलित नहीं होता वह परम गति को पाता है। इस प्रकार भगवान् मनुने, मनुष्यों की हितकामना से यह धर्म का सारा तत्त्व कहा था, वही मैंने तुम लोगों से कह सुनाया। मनुष्य संपूर्ण कार्य कारणों को आत्मा में सावधान होकर भावना करे। जो सबको आत्मरूप जानता है उसका मन अधर्म में नहीं जाता ॥१११-११८॥ आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् । आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ ११९ ॥ खं संनिवेशयेत्खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् । पक्तिदृष्टयोः परं तेजः स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु ॥ १२० ॥ मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् । वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ॥ १२१ ॥ प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ १२२ ॥ एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १२३ ॥ एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः । जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥ १२४ ॥ एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना । स सर्व समतामेत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम् ॥ १२५ ॥
बारहवां अध्याय । ४६३
बारहवां अध्याय । ४६३ इत्येतन्मानवं शास्त्रं भृगुप्रोक्तं पठन् द्विजः। भवत्याचारवान्नित्यं यथेष्टां प्राप्नुयाद्गतिम् ॥ १२६॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १२ ॥ इन्द्रादि सब देव आत्मस्वरूप हैं, यह सारा जगत् परमात्मा में ही स्थित है। क्योंकि परमात्मा ही प्राणियों को उन के शुभा- शुभ कर्मों का फल देनेवाला है। ज्ञानी पुरुष बाहरी आकाश को आत्माकाश में, वायु को चेष्टा और स्पर्श में, तेज को जठराग्नि में, सूर्य को नेत्र में, जल को शरीर के चिकने पदार्थों में, पृथिवी को शरीर में, चन्द्रमा को मन में, दिशाओं को श्रोत्र में, विष्णु भगवान् को गति में, शिव को बल में, अग्नि को वाणी में, मित्र को गुदा में और प्रजापति को जननेन्द्रिय में भावना करे। संपूर्ण विश्व का शासनकर्ता अणु से भी अणु शुद्ध सुवर्ण समान-कान्तिमय और निर्विकल्प-बुद्धिगम्य परमात्मा को जा- नना चाहिए। इस परमात्मा को कोई अग्नि, कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म कहते हैं। यह परमात्मा सब प्राणियों को पञ्चभूतों के साथ मिलाकर चक्र के गति की भांति उत्पत्ति, पालन और प्रलयद्वारा घुमाया करता है। इस प्रकार जो पुरुष सब प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता है वह सब की समता को पाकर परमपद-ब्रह्म को पाता है। जो द्विज भृगु के कहे इस मानव धर्मशास्त्र को पढ़ता है वह सदाचारी होता है और अभीष्ट उत्तम गति को पाता है ॥ ११९-१२६ ॥ बारहवां अध्याय समाप्त।
प्रथम आचारकाण्ड ... ...) पु०
विक्रयार्थ पुस्तकों का सूचीपत्र ॥ नाम पुस्तक. मूल्य. निर्णयसिन्धु मूल ... ... ... १॥) पु० भगवन्तभास्कर ... ... ... ॥) पु० मिताक्षरा सटीक ... ... ... १०) पु० प्रथम आचारकाण्ड ... ... ... ३) पु० द्वितीय व्यवहारकाण्ड... ... ... २॥) पु० तृतीय प्रायश्चित्तकाण्ड ... ... ... ५) पु० शुक्रनीति ... ... ... ... ।-॥ राजनीति ... ... ... ... =॥ याज्ञवल्क्यस्मृति सटीक ... ... ... ।)॥ चाणक्यनीतिदर्पण ... ... ... -)॥ मानवधर्मसार का सार ... ... ... )॥ पु० मानवधर्मसार सटीक ... ... ... -)॥ निर्णयसिन्धु भाषाटीका सहित ... ... ... ४) पु० मनुस्मृति सटीक ... ... ... ५) पु० अष्टादशस्मृति सटीक ... ... ... २॥) पु० याज्ञवल्क्य मयत्री संवाद ... ... ... -)॥ मनुस्मृति उर्दू अनुवाद सहित ... ... २॥) पु० श्रीमद्भागवत बारहवाँस्कंध सटीक पत्रेनुमा ... ५) पु० मार्कण्डेयपुराण मूल ... ... ... |=)॥ मार्कण्डेयपुराण तीन जिल्दों में ... ... २॥) स्कन्दपुराण काशीखंड सटीक पूर्वार्द्ध व उत्तरार्द्ध ७)
अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका ।
अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका ।
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अ | अग्नीनात्मनि वैतानान् ... | १६३ | |
| अकन्येति तु यः कन्याम् ... | २८४ | अग्नीन्धनं भैक्षचर्याम् ... | ४२ |
| अकामतः कृतं पापम् ... | ४०५ | अग्नेः सोमयमाग्यां च ... | १०० |
| अकामतः कृते पापे ... | ४०५ | अग्नेः सोमस्य चैवादौ ... | ७८ |
| अकामतस्तु राजन्यम् ... | ४१६ | अग्नौ प्रास्ताहुतिः ... | ७८ |
| अकामस्य क्रिया काचित् ... | २३ | अग्न्यभावे तु विप्रस्य ... | १०० |
| अकारणं परित्यक्ता ... | ४१ | अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ... | १२४ |
| अकारं चाप्युकारं च ... | ३६ | अग्न्याधेयं पाकयज्ञान् ... | ४८ |
| अकुर्वन् विहितं कर्म ... | ४०५ | अग्रयाः सर्वेषु वेदेषु ... | ६६ |
| अकृतं च कृतात्क्षेत्रात् ... | ३६४ | अघं स केवलं भुंक्ते ... | ८५ |
| अकृता वा कृता वापि ... | ३४१ | अङ्गावपीडनायां च ... | २१५ |
| अकृत्वा भैक्षचरणम् ... | ५५ | अङ्गुलीग्रन्थिभेदस्य ... | ३६४ |
| अक्रोधनान्सुप्रसादान् ... | १०१ | अङ्गुष्ठमूलस्य तले ... | ३३ |
| अक्रोधनाः शौचपराः ... | ६७ | अचक्षुर्विषयं दुर्गम् ... | १२७ |
| अक्षमाला वशिष्ठेन ... | ३२१ | अच्छेलेनैव चान्विच्छेत् ... | २७८ |
| अक्षारलवणाश्नाः ... | १७२ | अजडश्चेदपोगण्डः ... | २७१ |
| अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टम् ... | ३८७ | अजाविकं सैकशफम् ... | ३३८ |
| अगारदाही गरदः ... | ६१ | अजाविके तु संरुद्धे ... | २८६ |
| अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये ... | ३११ | अजीगर्तः सुतं हन्तुम् ... | ३६३ |
| अग्निदग्धानग्निदग्धान् ... | ६८ | अजीवंस्तु यथोक्तेन ... | ३८६ |
| अग्निदान्भक्तदांश्चैव ... | ३६४ | अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रम् ... | ४२३ |
| अग्निपकाशानो वा ... | १६२ | अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद् ... | ४१६ |
| अग्निमायुर्विम्व्यस्तु ... | ५ | अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा ... | ४२२ |
| अग्निं वाहारयेदेनम् ... | २६५ | अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः ... | ४५६ |
| अग्निहोत्रं च जुहुयात् ... | ११८ | अज्ञो भवति वै बालः ... | ४१ |
| अग्निहोत्रं समादाय ... | १६० | अण्डजाः पक्षिणः सर्पाः ... | १० |
| अग्निहोत्र्यपविद्ध्याग्नीन् ... | ४०४ | अतन्द्रो मात्राविनाशिष्यः ... | ६ |
श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम्
( २ )
श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि | १३० | अधर्मदण्डनं लोके | २६८ अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते | ३० | अधर्मप्रभवं चैव | २०० अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये | ३६६ | अधर्मेण च यः प्राह | ४२ अतपास्त्वनधीयानः | १४६ | अधर्मेणैधते तावत् | १४४ अतस्तु विपरीतस्य | २१२ | अधस्ताल्लोपद्व्याञ्च | १२३ अतिक्रान्ते दशाहे तु | १७३ | अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैः | २६८ अतिक्रामेत्प्रमत्तं या | ३३१ | अधार्मिको नरो यो हि | १४३ अतिथिं चाननुज्ञाप्य | १३५ | अधितिष्ठेच्च केशांस्तु | १३७ अतिवादांस्तितिक्षेत | १६७ | अधियज्ञं ब्रह्म जपेत् | २०४ अतैजसानि पात्राणि | १६८ | अधिविन्ना तु या नारी | ३३२ अतोऽन्यतममाश्रित्य | ४१२ | अधीत्य विधिवद्वेदान् | १६५ अतोऽन्यतमयावृत्त्या | ११६ | अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः | ३७५ अत्युष्णं सर्वमन्नं स्यात् | १०४ | अधोदृष्टिर्नैकृतिकः | १४८ अथ गाथा वायुगीताः | ३२४ | अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात् | २२० अथ मूलमनाहार्यम् | २८० | अध्यग्न्यध्यावाहनिकम् | ३५१ अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा | ३६८ | अध्यात्मरतिरासीनः | १८८ अदत्तानामुपादानम् | ४४३ | अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः | ७७ अदत्त्वा तु य एतेभ्यः | ८४ | अध्यापनमध्ययनम् | १७ अदर्शयित्वा तत्तैव | २७२ | अध्यापनमध्ययनम् | ३८८ अदातरि पुनर्दाता | २७३ | अध्यापयामास पितॄन् | ४६ अदीयमाना भर्तारम् | ३३३ | अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तः | ३५ अदूषितानां द्रव्याणाम् | ३६६ | अध्येष्यमाणं तु गुरुः | ३६ अदेश्यं यश्च दिशति | २५५ | अनंशौ क्लीवपतितौ | ३५२ अद्भिरेव द्विजाग्र्याणाम् | ७१ | अनग्निरनिकेतः स्यात् | १६६ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति | १७६ | अनधीत्य द्विजो वेदान् | १६५ आद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचम् | १८० | अनन्तरः सपिण्डाद्यः | ३४६ अद्वयोगिनर्नहतः क्षत्रम् | ३७१ | अन्तरगतशवेग्रामे | १३२ अद्यात्काकः पुरोडाशम् | २१० | अनन्तरमरिं विद्यात् | २३३ अद्रोहेणैव भूतानाम् | ११४ | अनन्तरासु जातानाम् | ३७६ अद्रोहेण च नार्तीयात् | १२६ | अनपत्यस्य पुत्रस्य | ३५४ अधर्मार्थैर्यैसिद्ध्यर्थे | २५४ | अनपेक्षितमर्यादम् | २६८
| श्लोकः | पृष्ठम् |
( ३ )
स्तम्भ १
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| अनभ्यासेन वेदानाम् | ... १६० |
| अनर्चितं वृथामांसम् | ... १५१ |
| अनातुराः खानितानि | ... १३१ |
| अनादेयं नाददीत | ... २७५ |
| अनादेशस्य चादानात् | ... २७५ |
| अनाम्नातेषु धर्मेषु | ... ४६० |
| अनारोग्यमनायुष्यम् | ... ३३ |
| अनार्यता निष्ठुरता | ... ३८५ |
| अनार्यमार्यकर्माणं | ... ३८७ |
| अनार्यायां समुत्पन्नः | ... ३८६ |
| अनाहिताग्निता स्तेयम् | ... ४०८ |
| अनित्यो विजयो यस्मात् | ... २४१ |
| अनिन्दितैः संविवाहैः | ... ७२ |
| अनिपुणस्त्वनवेक्षेत | ... ३४२ |
| अनिर्दशाया गोःक्षीरम् | ... १६१ |
| अनिर्दशाहां गां सूताम् | ... २८७ |
| अनुक्ते निष्कृतीनां तु | ... ४३३ |
| अनुगच्छेच्चया प्रेतम् | ... १७७ |
| अनुपघ्नन्पितृद्रव्यम् | ... ३५३ |
| अनुबन्धं परिज्ञाय | ... २६७ |
| अनुभावी तु यः कश्चित् | ... २५७ |
| अनुमन्ता विशसिता | ... १६६ |
| अनुरागःशुचिर्दक्षः | ... २१७ |
| अनुष्णाभिरफेनाभिः | ... ३३ |
| अनृतं च समुत्कर्षे | ... ४०७ |
| अनृतं तु वदन्दण्ड्यः | ... २५१ |
| अनृतावृतुकाले च | ... १८६ |
| अनेकानि सहस्राणि | ... १८७ |
| अनेन क्रमयोगेन | ... ५१ |
| अनेन क्रमयोगेन | ... २०४ |
| अनेन तु विधानेन् | ... ३४० |
स्तम्भ २
| श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|
| अनेन नारीवृत्तेन | ... १८८ |
| अनेन विधिना नित्यम् | ... १८६ |
| अनेन विधिना यस्तु | ... ४१७ |
| अनेन विधिना राजा | ... २७६ |
| अनेन विधिना राजा | ... ३०४ |
| अनेन विधिना श्राद्धम् | ... ११२ |
| अनेन विधिना सर्वान् | ... २०३ |
| अनेन विप्रो वृत्तेन | ... १५६ |
| अन्तर्गतशवे ग्रामे | ... १३२ |
| अन्तर्दशाहे स्यातां चेत् | ... १७३ |
| अन्धो जडः पीठसर्पी | ... ३११ |
| अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति | ... २६२ |
| अन्नमेषां पराधीनम् | ... ३८४ |
| अन्नहर्तामयावित्वम् | ... ४०६ |
| अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि | ... ३०० |
| अन्नाद्यजोनां सत्त्वानाम् | ... ४२१ |
| अन्यदुक्तं जातमम्यत् | ... ३२४ |
| अन्यां चेद्दर्शयित्वान्या | ... २८१ |
| अन्यानपि प्रकुर्वीत | ... २१६ |
| अन्ये कृतयुगे धर्माः | ... १६ |
| अन्येषां चैवमादीनाम् | ... ३०२ |
| अन्येष्वपि तु कालेषु | ... २३८ |
| अन्योन्यस्याव्यभिचारः | ... ३३५ |
| अन्वाधेयं च यद्दत्तम् | ... ३५१ |
| अपः शस्तं विषं मांसम् | ... ३६० |
| अपःसुराभाजनस्थाः | ... ४२२ |
| अपत्यं धर्मकार्याणि | ... ३२२ |
| अपत्यलोभाद्या तु स्त्री | ... १८७ |
| अपदिश्यापदेश्यं च | ... २५५ |
| अपराजितां वास्थाय | ... १५४ |
| अपराह्ने तथा दर्भाः | ... १०८ |
( ४ ) श्लोकः पृष्ठम् | श्लोकः पृष्ठम् अपसव्यमग्नौ कृत्वा ... १०१ | अभोज्यानां तु भुक्त्वाऽन्नम् ... ४२३ अपहृतेऽथधर्मज्ञस्य ... २५५ | अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोः ... ५३ अपां नर्पापे निगतः ... ४१ | अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादन- अपांक्तयो यावतः पांक्त्यान् ... ६५ | मेवच ... ५६. अपांक्त्त्यान् यो दातुः ... ६३ | अमुं कार्षापणं दद्यात् ... ४२० अपांक्तीपहता पंक्तिः ... ६६ | अमर्त्यैतानि षड् जप्त्वा ... १६३ अपामग्नेश्च संयोगात् ... १७६ | अनन्त्विका तु कार्येयम् ... ३४ अपि नः स कुले जायातू ... १११ | अनात्यः प्राड्विवाको वा ... ३५७ अपि यत्सुकरं कर्म ... २१६ | अमात्यमुख्यं धर्मज्ञम् ... २२० अपुत्रायां मृतायां तु ... ३४१ | अमात्यराष्ट्रदुर्गार्थ ... २३२ अपुत्रेणेन विधिना ... ३४० | अमात्ये दण्ड आयत्तः ... २१७ अदृप्याः फलवन्तो ये ... १० | अमानुषीषु पुरुषः ... ४२७ अप्रयोधोऽतिथिःसायम् ... ८३ | अमाययैव वर्तेत ... २२४ अप्रयतः सुखार्थेषु ... १६४ | अमावास्या गुरुं हन्ति ... १३३ अप्राप्तिभिर्यत्क्रियते ... ३५५ | अमावास्यामष्टमीं च ... १३६ अप्सु प्रवेश्य तं दण्डम् ... ३५६ | अमेध्ये वा पतेन्मर्त्तः ... ४१४ अप्सु भूमिवदित्याहुः ... २६३ | अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः ... ३२६ अबीजविक्रयी चैव ... ३६६ | अयमुक्तो विभागो वः ... ३५४ अब्दार्धमिन्द्राभित्येतत् ... ४४० | अयाज्ययाजनैश्चैव ... ७६ अब्राह्मणः संग्रहणे ... ३०६ | अयुध्यमानंस्त्वोपाद्य ... १४३ अब्राह्मणादध्ययनम् ... ६४ | अरक्षिता गृहे रुद्धाः ... ३२० अभयस्य हि यो दाता ... २६७ | अरक्षितारं राजानम् ... २६८ अभिचारेषु सर्वेषु ... ३६६ | अरण्ये वा त्रिरम्यत्य ... ४४० अभिपूजिताम्भांस्तु ... १६६ | अराजके हि लोकेऽस्मिन् ... २०७ अभिद्योतिका न चेद् ब्रूयाद् ... २५५ | अरोगाःसर्वसिद्धार्थाः ... १६ अभिवादनशीलस्य ... ४४ | अर्थकामेष्वसक्तानाम् ... २५ अभिवादयेद्वृद्धांश्च ... १४० | अर्थसन्नादनार्थं च ... २३५ अभिवादात्परं विप्रः ... ४४ | अर्थस्य संग्रहे चैनान् ... २१६ अभिशस्तस्य धरदस्य ... १५१ | अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा ... २५० अभिशद्य तु यः कन्याम् ... ३०८ | अर्थेऽपव्ययमानं तु ... २५४ अभ्यान्त्यधर्म नासक्त्यम् ... ७४ | अयुक्तकारं नाऽऽददीत ... २३३