संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्रका स्मरण करनेवाले पुरुषसे दूर भागते हैं॥ २९-३०॥ ऋषिरुवाच ॥ ३१ ॥ इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥ ३२ ॥ पश्यतामेव' देवानां तत्रैवान्तरधीयत । तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा ॥ ३३ ॥ यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विहततारयः । दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥ ३४ ॥ जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे । निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥ ३५ ॥ एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः। सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥ ३६ ॥ तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते । सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥ ३७॥ व्याप्तं तयैतत्स्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर । महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया ॥ ३८ ॥ सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा । स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥ ३९ ॥ भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥ ४० ॥ स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा । ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ ॐ ॥ ४१ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ ३१ ॥ यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहलेकी ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयङ्कर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥ ३२-३५॥ राजन् ! इस प्रकार भगवती अम्बिका देवी नित्य होती हुई भी पुनः पुनः प्रकट होकर जगत्की रक्षा करती हैं ॥ ३६ ॥ वे ही इस विश्वको मोहित करतीं, वे ही जगत्को जन्म देतीं तथा वे ही प्रार्थना करनेपर सन्तुष्ट हो विज्ञान एवं समृद्धि प्रदान करती हैं ॥ ३७॥ राजन् ! महाप्रलयके समय महामारीका स्वरूप धारण करनेवाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं॥ ३८ ॥ वे ही समय-समयपर महामारी होती और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टिके रूपमें प्रकट होती हैं। वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करती हैं॥ ३९ ॥ मनुष्योंके अभ्युदयके समय वे ही घरमें लक्ष्मीके रूपमें स्थित हो उन्नति प्रदान करती हैं और वे ही अभावके समय दरिद्रता बनकर विनाशका कारण होती हैं ॥ ४० ॥ पुष्प, धूप और गन्ध आदिसे पूजन करके उनकी स्तुति करनेपर वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा उत्तम गति प्रदान करती हैं ॥ ४१ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ उवाच १, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३७, एवम् ४१, एवमादितः ॥ ६७१ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'फलस्तुति' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥ १. ना०- तां सर्वदेवानां० २. ग०- तथा।
- सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान * | २३९
त्रयोदशोऽध्यायः
सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान
| ध्यान | प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्। | | ( ॐबालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। | निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥ ८ ॥ | | पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥ | जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने। | | जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवा देवीका मैं ध्यान करता हूँ।) | संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ॥ ९ ॥<br>स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।<br>तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥ १० ॥<br>अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।<br>निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥ ११ ॥ | | ऋषिरुवाच॥ १ ॥ | ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्। | | 'ॐ' एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। | एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥ १२ ॥ | | एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥ २ ॥ | परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥ १३॥ | | विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। | मार्कण्डेयजी कहते हैं— ॥ ६॥ क्रौष्टुकिजी! | | तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥ ३ ॥ | मेधामुनिके ये वचन सुनकर राजा सुरथने उत्तम | | मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे। | व्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षिको | | तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥ ४ ॥ | प्रणाम किया। वे अत्यन्त ममता और राज्यापहरणसे | | आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥ ५ ॥ | बहुत खिन्न हो चुके थे॥ ७-८॥ महामुने! | | ऋषि कहते हैं— ॥ १॥ राजन्! इस प्रकार | इसलिये विरक्त होकर वे राजा तथा वैश्य | | मैंने तुमसे देवीके अनुपम माहात्म्यका वर्णन | तत्काल तपस्याको चले गये और वे जगदम्बाके | | किया। जो इस जगत्को धारण करती हैं, उन | दर्शनके लिये नदीके तटपर रहकर तपस्या करने | | देवीका ऐसा ही प्रभाव है॥२॥ वे ही | लगे ॥ ९ ॥ वे वैश्य उत्तम देवीसूक्तका जप करते | | विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करती हैं। भगवान् विष्णुकी | हुए तपस्यामें प्रवृत्त हुए। वे दोनों नदीके तटपर | | मायास्वरूपा उन भगवतीके द्वारा ही तुम, ये | देवीकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और | | वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते | हवन आदिके द्वारा उनकी आराधना करने लगे। | | हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। | उन्होंने पहले तो आहारको धीरे-धीरे कम | | महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरीकी शरणमें | किया; फिर बिल्कुल निराहार रहकर देवीमें ही | | जाओ॥ ३-४॥ आराधना करनेपर वे ही | मन लगाये एकाग्रतापूर्वक उनका चिन्तन आरम्भ | | मनुष्योंको भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान | किया ॥ १०-११ ॥ वे दोनों अपने शरीरके रक्तसे | | करती हैं॥ ५॥ | प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्षोंतक | | मार्कण्डेय उवाच॥ ६ ॥ | संयमपूर्वक आराधना करते रहे॥ १२॥ इसपर | | इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥ ७ ॥ | प्रसन्न होकर जगत्को धारण करनेवाली चण्डिका |
२४० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
देवीने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ॥ १३ ॥
देव्युवाच ॥ १४ ॥
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् ॥ १५ ॥
देवी बोलीं— ॥ १४ ॥ राजन्! तथा अपने कुलको आनन्दित करनेवाले वैश्य! तुमलोग जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे माँगो। मैं सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हें वह सब कुछ दूँगी ॥ १५ ॥
मार्कण्डेय उवाच ॥ १६ ॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥ १७ ॥
सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥ १८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— ॥ १६ ॥ तब राजाने दूसरे जन्ममें नष्ट न होनेवाला राज्य माँगा तथा इस जन्ममें भी शत्रुओंकी सेनाको बलपूर्वक नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेनेका वरदान माँगा ॥ १७ ॥ वैश्यका चित्त संसारकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान् थे; अतः उस समय उन्होंने तो ममता और अहंतारूप आसक्तिका नाश करनेवाला ज्ञान माँगा ॥ १८ ॥
देव्युवाच ॥ १९ ॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ॥ २० ॥
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥ २१ ॥
मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ॥ २२ ॥
सावर्णिको नाम^१ मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ॥ २३ ॥
वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः ॥ २४ ॥
तं प्रयच्छामि संसिद्धयै तव ज्ञानं भविष्यति ॥ २५ ॥
देवी बोलीं— ॥ १९ ॥ राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुओंको मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। अब वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ २०-२१ ॥ फिर मृत्युके पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान् (सूर्य)-के अंशसे जन्म लेकर इस पृथ्वीपर सावर्णिक मनुके नामसे विख्यात होओगे ॥ २२-२३ ॥ वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वरको मुझसे प्राप्त करनेकी इच्छा की है, उसे देती हूँ। तुम्हें मोक्षके लिये ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २४-२५ ॥
^१. पा० मनुर्नाम।
नवेंसे लेकर तेरहवें मन्वन्तरतकका संक्षिप्त वर्णन २४१
| मार्कण्डेय उवाच ॥ २६ ॥<br>इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥ २७ ॥<br>बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता ।<br>एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥ २८ ॥<br>सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥ २९ ॥<br>एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ।<br>सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥ क्लीं ॐ ॥ | मार्कण्डेयजी कहते हैं— ॥ २६ ॥ इस प्रकार उन दोनोंको मनोवाञ्छित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। इस तरह देवीसे वरदान पाकर क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ सुरथ सूर्यसे जन्म ले सावर्णि नामक मनु होंगे ॥ २७–२९ ॥ |
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
उवाच ६, अर्धश्लोकाः २१, श्लोकाः १३, एवम् ३०, अध्यायाः ॥ ७०० ॥
समस्ता उवाचमन्त्राः ५७, अर्धश्लोकाः ४२, श्लोकाः ५३५, अध्यायसमाप्तिश्चैव ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'सुरथ और वैश्यको वरदान' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
नवेंसे लेकर तेरहवें मन्वन्तरतकका संक्षिप्त वर्णन
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**क्रौष्टुकिजी! यह तुमसे सावर्णिक मन्वन्तरका भलीभाँति वर्णन किया गया। साथ ही महिषासुर-वध आदिके रूपमें भगवती दुर्गाकी महिमा भी बतलायी गयी। मुनिश्रेष्ठ! अब दूसरे सावर्णिक मन्वन्तरकी कथा सुनो। दक्षके पुत्र सावर्णि नवें मनु होनेवाले हैं। उनके समयमें जो देवता, मुनि और राजा होंगे, उन सबके नाम सुनो। पार, मरीचिगर्भ और सुधर्मा—ये तीन प्रकारके देवता होंगे। इनमेंसे प्रत्येक वर्गमें बारह-बारह देवता होंगे। इस समय जो छः मुखोंवाले अग्निकुमार कार्तिकेय हैं, वे ही उस मन्वन्तरमें 'अद्भुत' नामवाले इन्द्र होंगे। मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, सबल तथा हव्यवाहन—ये सप्तर्षि होंगे। धृष्टकेतु, बर्हिकेतु, पञ्चहस्त, निरामय, पृथुश्रवा, अर्चिष्मान्, भूरिद्युम्न तथा बृहद्भव—ये दक्षपुत्र सावर्णि मनुके राजकुमार होंगे।
अब दसवें मनुके मन्वन्तरका वर्णन सुनो। दसवें मन्वन्तरमें ब्रह्माजीके पुत्र बुद्धिमान् सावणिका अधिकार होगा। ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुखासोन और विरुद्ध—ये दो प्रकारके देवता होंगे। उनकी संख्या सौ होगी। उस समय सौ प्रकारके प्राणी उत्पन्न होंगे, इसलिये उनके देवता भी सौ ही होंगे। उस मन्वन्तरमें इन्द्रके समस्त गुणोंसे युक्त 'शान्ति' नामक इन्द्र होंगे। आपोमूर्ति, हविष्मान्, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिम और वासिष्ठ—ये सप्तर्षि होंगे। सुक्षेत्र, उत्तमीजा, भूमिसेन, वीर्यवान्, शतानीक, वृषभ, अनमित्र, जयद्रथ, भूरिद्युम्न तथा सुवर्मा—ये मनुके पुत्र होंगे।
अब धर्मके पुत्र सावणिका मन्वन्तर सुनो। धर्मसावर्णि मन्वन्तरमें विहङ्गम, कामग तथा निर्माणरति—ये तीन प्रकारके देवता होंगे। इनमेंसे एक-एक तीस-तीस देवताओंका समुदाय है। मास, ऋतु और दिन—ये निर्माणरति कहलायेंगे। रात्रियोंकी संज्ञा विहङ्गम होगी और मुहूर्तसम्बन्धी गण कामग कहलायेंगे। विख्यात पराक्रमी 'धूप' उनके
२४२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
इन्द्र होंगे। हविष्मान्, वरिष्ठ, अरुणनन्दन ऋष्टि, निश्चर, अनघ, महामुनि विष्टि तथा अग्निदेव—ये सात सप्तर्षि होंगे। सर्वत्रग, सुशर्मा, देवान्नीक, पुरुद्वह, हेमधन्वा तथा दृढायु—ये भविष्यमें होनेवाले राजा धर्मसावर्णि मनुके पुत्र होंगे। बारहवाँ मन्वन्तर रुद्रपुत्र सावर्णि मनुका होगा। उसके आनेपर सुधर्मा, सुमना, हरित, रोहित और सुवर्ण—ये पाँच देवगण होंगे। इनमेंसे प्रत्येक गण दस-दस देवताओंका होगा। महाबली ऋतधामा उनका इन्द्र होगा। द्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति तथा तपोधृति—ये सात सप्तर्षि होंगे। देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान् तथा मित्रविन्द—ये भावी मनुके वंशज राजा होंगे।
अब 'रौच्य' नामक तेरहवें मनुके समयमें होनेवाले देवताओं, सप्तर्षियों तथा राजाओंका वर्णन सुनो। सुधर्मा, सुकर्मा और सुशर्मा—ये तीन उस समयके देवता होंगे। महाबली एवं महापराक्रमी 'दिवस्पति' उनके इन्द्र होंगे। धृतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्कम्प—ये सात सप्तर्षि होंगे। चित्रसेन, विचित्र, नयति, निर्भय, दृढ, सुनेत्र, क्षत्रवृद्धि तथा सुव्रत—ये रौच्य मनुके पुत्र राजा होंगे।
रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा
मार्कण्डेयजी कहते हैं— ब्रह्मन्! पूर्वकालकी बात है, प्रजापति रुचि ममता और अहङ्कारसे रहित इस पृथ्वीपर विचरते थे। उन्हें किसीसे भय नहीं था। वे बहुत कम सोते थे। उन्होंने न तो अग्निकी स्थापना की थी और न अपने लिये घर ही बना रखा था। वे एक बार भोजन करते और बिना आश्रमके ही रहते थे। उन्हें सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित एवं मुनिवृत्तिसे रहते देख उनके पितरोंने उनसे कहा।
पितर बोले— बेटा! विवाह स्वर्ग और अपवर्गका हेतु* होनेके कारण एक पुण्यमय कार्य है; उसे तुमने क्यों नहीं किया? गृहस्थ पुरुष समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंकी पूजा करके पुण्यमय लोकोंको प्राप्त करता है। वह 'स्वाहा' के उच्चारणसे देवताओंको, 'स्वधा' शब्दसे पितरोंको तथा अन्नदान (बलिवैश्वदेव) आदिसे भूत आदि प्राणियों एवं अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है। बेटा! हम ऐसा मानते हैं कि गृहस्थ आश्रमको स्वीकार न करनेपर तुम्हें इस जीवनमें क्लेश-पर क्लेश उठाना पड़ेगा तथा मृत्युके बाद और दूसरे जन्ममें भी क्लेश ही भोगने पड़ेंगे।
रुचिने कहा— पितृगण! परिग्रहमात्र ही अत्यन्त दुःख एवं पापका कारण होता है तथा उससे मनुष्यकी अधोगति होती है, यही सोचकर मैंने पहले स्त्री संग्रह नहीं किया। मन और इन्द्रियोंको नियन्त्रणमें रखकर जो यह आत्मसंयम किया जाता है, वह भी परिग्रह करनेपर मोक्षका साधक नहीं होता। ममतारूप कीचड़में सना हुआ होनेपर भी यह आत्मा जो परिग्रहशून्य चित्तरूपी जलसे
* अग्निहोत्र एवं यज्ञ-यागादि कर्ममें जबतक गृहस्थका ही अधिकार है; ये कर्म निष्कामभावसे हों तो मोक्ष देनेवाले होते हैं और सकामभावसे किये जायें तो स्वर्गादि फलोंके साधक होते हैं। जो उक्त कर्म करते हैं, उनका विवाह स्वर्ग अपवर्गका साधक है। जो विवाह करके गृहस्थोचित शुभ-कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, उनके लिये तो विवाह-कर्म घोर बन्धनका ही कारण होता है।
- रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा * २४३
प्रतिदिन धोया जाता है, वह श्रेष्ठ प्रयत्न है। जितेन्द्रिय विद्वानोंको चाहिये कि वे अनेक जन्मोंद्वारा सञ्चित कर्मरूपी पङ्कमें सने हुए आत्माका सद्वासनारूपी जलसे प्रक्षालन करें।
पितर बोले— बेटा! जितेन्द्रिय होकर आत्माका प्रक्षालन करना उचित ही है; किन्तु तुम जिसपर चल रहे हो, वह मोक्षका मार्ग है। किन्तु फलेच्छारहित दान और शुभाशुभके उपभोगसे भी पूर्वकृत अशुभ कर्म दूर होता है। इसी प्रकार दयाभावसे प्रेरित होकर जो कर्म किया जाता है, वह बन्धनकारक नहीं होता। फल-कामनासे रहित कर्म भी बन्धनमें नहीं डालता। पूर्वजन्ममें किया हुआ मानवोंका शुभाशुभ कर्म सुख-दुःखमय भोगोंके रूपमें प्रतिदिन भोगनेपर ही क्षीण होता है।* इस प्रकार विद्वान् पुरुष आत्माका प्रक्षालन करते और उसकी बन्धनोंसे रक्षा करते हैं। ऐसा करनेसे वह अविवेकके कारण पापरूपी कीचड़में नहीं फँसता।
रुचिने पूछा— पितामहो! वेदमें कर्ममार्गको अविद्या कहा गया है, फिर क्यों आपलोग मुझे उस मार्गमें लगाते हैं?
पितर बोले— यह सत्य है कि कर्मको अविद्या ही कहा गया है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है; फिर भी इतना तो निश्चित है कि उस विद्याकी प्राप्तिमें कर्म ही कारण है। विहित कर्मका पालन न करके जो अधम मनुष्य संयम करते हैं, वह संयम अन्तमें मोक्षको प्राप्त नहीं कराता; अपितु अधोगतिमें ले जानेवाला होता है। वत्स! तुम तो समझते हो कि मैं आत्माका प्रक्षालन करता हूँ; किन्तु वास्तवमें तुम शास्त्रविहित कर्मोंके न करनेके कारण पापोंसे दग्ध हो रहे हो! कर्म अविद्या होनेपर भी विधिके पालनद्वारा शोधे हुए विषकी भाँति मनुष्योंका उपकार करनेवाला ही होता है। इसके विपरीत वह विद्या भी विधिकी अवहेलनासे निश्चय ही हमारे बन्धनका कारण बन जाती है।† अतः वत्स! तुम विधिपूर्वक स्त्री-संग्रह करो। ऐसा न हो कि इस लोकका
* परन्तू दानैरशुभं नुह्यतेऽनभिसंहितैः। फलैस्तथोपभोगैश्च पूर्वकर्म शुभाशुभैः॥
एवं न बन्धो भवति कुर्वतः करुणात्मकम्। न च बन्धाय तत्कर्म भवत्यनभिसंहितम्॥
पूर्वकर्म कृतं भोगैः क्षीयतेऽहर्निशं तथा। सुखदुःखात्मकैर्वत्स पुण्यापुण्यात्मकं नृणाम्॥
(९५। १४-१६)
† प्रक्षालयामीति भवान् वत्सात्मानं तु मन्यते। विहिताकरणोद्भूतैः पापैस्त्वं तु विदह्यसे॥
अविद्याप्युपकाराय विषवज्जायते नृणाम्। अनुष्ठिताभ्युपायेन बन्धायान्यपि नो हि सा॥
(९५। २१-२२)
२४४ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
लाभ न मिलनेके कारण तुम्हारा जन्म निष्फल हो जाय।
रुचिने कहा—पितरो! अब तो मैं बूढ़ा हो गया; भला, मुझको कौन स्त्री देगा। इसके सिवा मुझ जैसे दरिद्रके लिये स्त्रीको रखना बहुत कठिन कार्य है।
पितर बोले—वत्स! यदि हमारी बात नहीं मानोगे तो हमलोगोंका पतन हो जायगा और तुम्हारी भी अधोगति होगी।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! यों कहकर पितर उनके देखते-देखते वायुके बुझाये हुए दीपककी भाँति सहसा अदृश्य हो गये। पितरोंकी बातसे रुचिका मन बहुत उद्विग्न हुआ। वे अपने विवाहके लिये कन्या प्राप्त करनेकी इच्छामे पृथ्वीपर विचरने लगे। वे पितरोंके वचनरूप अग्निसे दग्ध हो रहे थे। कोई कन्या न मिलनेसे उन्हें बड़ी भारी चिन्ता हुई। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इसी अवस्थामें उन्हें यह बुद्धि सूझी कि 'मैं तपस्याके द्वारा श्रीब्रह्माजीकी आराधना करूँ।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने कठोर नियमका आश्रय ले श्रीब्रह्माजीकी आराधनाके निमित्त सौ वर्षोतक भारी तपस्या की। तदनन्तर लोकपितामह ब्रह्माजीने उन्हें दर्शन दिया और कहा—'मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो, माँग लो।' तब रुचिने जगत्के आधारभूत ब्रह्माजीको प्रणाम करके पितरोंके कथनानुसार अपना अभीष्ट निवेदन किया। रुचिकी अभिलाषा सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा—'विप्रवर! तुम प्रजापति होओगे। तुमसे प्रजाकी सृष्टि होगी। प्रजाकी सृष्टि तथा पुत्रोंकी उत्पत्ति करनेके साथ ही शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके जब तुम अपने अधिकारका त्याग कर दोगे, तब तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। अब तुम स्त्री-प्राप्तिकी अभिलाषा लेकर पितरोंका पूजन करो। वे ही प्रसन्न होनेपर तुम्हें मनोवाञ्छित पत्नी और पुत्र प्रदान करेंगे। भला, पितर सन्तुष्ट हो जायँ तो वे क्या नहीं दे सकते।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रुचिने नदीके एकान्त तटपर पितरोंका तर्पण किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर एकाग्र एवं संयत-चित्त हो नीचे लिखे स्तोत्रद्वारा आदरपूर्वक उनकी स्तुति की—
**रुचि बोले—**जो श्राद्धमें अधिष्ठाता देवताके रूपमें निवास करते हैं तथा देवता भी श्राद्धमें 'स्वधान्त' वचनोंद्वारा जिनका तर्पण करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। भक्ति और मुक्तिकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षिगण स्वर्गमें भी मानसिक श्राद्धोंके द्वारा भक्तिपूर्वक जिन्हें तृप्त करते हैं, सिद्धगण दिव्य उपहारोंद्वारा श्राद्धमें जिनको सन्तुष्ट करते हैं, आत्यन्तिक समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले गुह्यक भी तन्मय होकर भक्तिभावसे जिनकी पूजा करते हैं, भूलोकमें मनुष्यगण जिनकी सदा आराधना करते हैं, जो श्राद्धोंमें श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर मनोवाञ्छित लोक प्रदान करते हैं, पृथ्वीपर
- रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा * | २४५ ---|---:
ब्राह्मणलोग अभिलषित वस्तुकी प्राप्तिके लिये जिनकी अर्चना करते हैं तथा जो आराधना करनेपर प्राजापत्य लोक प्रदान करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। तपस्या करनेसे जिनके पाप धूल गये हैं तथा जो संयमपूर्वक आहार करनेवाले हैं, ऐसे वनवासी महात्मा जिनके फल-मूलोंद्वारा श्राद्ध करके जिन्हें तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं मस्तक झुकाता हूँ। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले संयतात्मा ब्राह्मण समाधिके द्वारा जिन्हें सदा तृप्त करते हैं, क्षत्रिय सब प्रकारके श्राद्धोपयोगी पदार्थोंके द्वारा विधिवत् श्राद्ध करके जिनको सन्तुष्ट करते हैं, जो तीनों लोकोंको अभीष्ट फल देनेवाले हैं, स्वकर्मपरायण वैश्य पुष्प, धूप, अन्न और जल आदिके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं तथा शूद्र भी श्राद्धोंद्वारा भक्तिपूर्वक जिनकी तृप्ति करते हैं और जो संसारमें सुकालीके नामसे विख्यात हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। पातालमें बड़े-बड़े दैत्य भी दम्भ और मद त्यागकर श्राद्धोंद्वारा जिन स्वधाभोजी पितरोंको सदा तृप्त करते हैं, मनोवाञ्छित भोगोंको पानेकी इच्छा रखनेवाले नागगण रसातलमें सम्पूर्ण भोगों एवं श्राद्धोंसे जिनकी पूजा करते हैं तथा मन्त्र, भोग और सम्पत्तियोंसे युक्त सर्पगण भी रसातलमें ही विधिपूर्वक श्राद्ध करके जिन्हें सर्वदा तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साक्षात् देवलोकमें, अन्तरिक्षमें और भूतलपर निवास करते हैं, देवता आदि समस्त देहधारी जिनकी पूजा करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। वे पितर मेरे द्वारा अर्पित किये हुए इस जलको ग्रहण करें। जो परमात्मस्वरूप पितर मूर्तिमान् होकर विमानोंमें निवास करते हैं, जो समस्त क्लेशोंसे छुटकारा दिलानेमें हेतु हैं तथा योगीश्वरगण निर्मल हृदयसे जिनका यजन करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वधाभोजी पितर दिव्यलोकमें मूर्तिमान् होकर रहते हैं, काम्यफलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। वे समस्त पितर इस जलसे तृप्त हों, जो चाहनेवाले पुरुषोंको इच्छानुसार भोग प्रदान करते हैं, देवत्व, इन्द्रत्व तथा उससे ऊँचे पदकी प्राप्ति कराते हैं; इतना ही नहीं, जो पुत्र, पशु, धन, बल और गृह भी देते हैं। जो पितर चन्द्रमाकी किरणोंमें, सूर्यके मण्डलमें तथा श्वेत विमानोंमें सदा निवास करते हैं, वे मेरे दिये हुए अन्न, जल और गन्ध आदिसे तृप्त एवं पुष्ट हों। अग्निमें हविष्यका हवन करनेसे जिनको तृप्ति होती है, जो ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर भोजन करते हैं तथा पिण्डदान करनेसे जिन्हें प्रसन्नता प्राप्त होती है, वे पितर यहाँ मेरे दिये हुए अन्न और जलसे तृप्त हों। जो देवताओंसे भी पूजित हैं तथा सब प्रकारसे श्राद्धोपयोगी पदार्थ जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, वे पितर यहाँ पधारें। मेरे निवेदन किये हुए पुष्प, गन्ध, अन्न एवं भोज्य पदार्थोंके निकट उनकी उपस्थिति हो। जो प्रतिदिन पूजा ग्रहण करते हैं, प्रत्येक मासके अन्तमें जिनकी पूजा करनी उचित है, जो अष्टकाओंमें, वर्षके अन्तमें तथा अभ्युदयकालमें भी पूजनीय हैं, वे मेरे पितर वहाँ तृप्ति लाभ करें। जो ब्राह्मणोंके यहाँ कुमुद और चन्द्रमाके समान शान्ति धारण करके आते हैं, क्षत्रियोंके लिये जिनका वर्ण नवोदित सूर्यके समान है, जो वैश्योंके यहाँ सुवर्णके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं तथा शूद्रोंके लिये जो श्याम वर्णके हो जाते हैं, वे समस्त पितर मेरे दिये हुए पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न और जल आदिसे तथा अग्निहोत्रसे
२४६
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
सदा तृप्ति लाभ करें। मैं उन सबको प्रणाम करता हूँ। जो वैश्वदेवपूर्वक समर्पित किये हुए श्राद्धको पूर्ण तृप्तिके लिये भोजन करते हैं और तृप्त हो जानेपर ऐश्वर्यकी तुष्टि करते हैं, वे पितर यहाँ तृप्त हों। मैं उन सबको नमस्कार करता हूँ। जो राक्षसों, भूतों तथा भयानक असुरोंका नाश करते हैं, प्रजाजनोंका अमङ्गल दूर करते हैं, जो देवताओंके भी पूर्ववर्ती तथा देवराज इन्द्रके भी पूज्य हैं, वे यहाँ तृप्त हों। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। अग्निष्वात्त पितृगण मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें, बर्हिषद् पितृगण दक्षिण दिशाकी रक्षा करें। आज्यप नामवाले पितर पश्चिम दिशाकी तथा सोमप संज्ञक पितर उत्तर दिशाकी रक्षा करें। उन सबके स्वामी यमराज राक्षसों, भूतों, पिशाचों तथा असुरोंके दोषसे सब ओरसे मेरी रक्षा करें। विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति—ये पितरोंके नौ गण हैं। कल्याण, कल्पताकर्ता, कल्प, कल्पतराश्रय, कल्पता-हेतु तथा अनघ—ये पितरोंके छः गण माने गये हैं। वर, वरेण्य, वरद, पुष्टिद, तुष्टिद, विश्वपाता तथा धाता—ये पितरोंके सात गण हैं। महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल—ये पितरोंके पापनाशक पाँच गण हैं। सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद—ये पितरोंके चार गण कहे जाते हैं। इस प्रकार कुल इकतीस पितृगण हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। वे सब पूर्ण तृप्त होकर मुझपर सन्तुष्ट हों और सदा मेरा हित करें।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार स्तुति करते हुए रुचिके समक्ष सहसा एक बहुत ऊँचा तेजःपुञ्ज प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त था। समस्त संसारको व्याप्त करके स्थित हुए उस महान् तेजको देखकर रुचिने पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और इस स्तोत्रका गान किया—
रुचिरुवाच
अर्चितानाममूर्त्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्॥
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितॄनप्युदधावपि॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥
देवर्षीणां जनितॄंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातॄन् नमस्येऽहं कृताञ्जलिः॥
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे॥
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्त्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥
- रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा * २४७
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितॄनहम्।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः॥
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः॥
रुचि बोले— जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टिसम्पन्न हैं, उन पितरोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरोंके भी नेता हैं, कामनाकी पूर्ति करनेवाले उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मनु आदि राजर्षियों, मुनीश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमाके भी नायक हैं, उन समस्त पितरोंको मैं जल और समुद्रमें भी नमस्कार करता हूँ। नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वीके भी जो नेता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। जो देवर्षियोंके जन्मदाता, समस्त लोकोंद्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फलके दाता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण तथा योगेश्वरोंके रूपमें स्थित पितरोंको सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। सातों लोकोंमें स्थित सात पितृगणोंको नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम करता हूँ। चन्द्रमाके आधारपर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणोंको मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत्के पिता सोमको नमस्कार करता हूँ तथा अग्निस্বরূপ अन्य पितरोंको भी प्रणाम करता हूँ; क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है। जो पितर तेजमें स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरोंको मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारंबार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुनिश्रेष्ठ! रुचिके इस प्रकार स्तुति करनेपर वे पितर दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए उस तेजसे बाहर निकले। रुचिने जो फूल, चन्दन और अङ्गराग आदि समर्पित किये थे, उन सबसे विभूषित होकर वे पितर सामने खड़े दिखायी दिये। तब रुचिने हाथ जोड़कर पुनः भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और बड़े आदरके साथ सबसे पृथक्-पृथक् कहा—'आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है।' इससे प्रसन्न होकर पितरोंने मुनिश्रेष्ठ रुचिसे कहा—'वत्स! तुम कोई वर माँगो।' तब उन्होंने मस्तक झुकाकर कहा—'पितरो! इस समय ब्रह्माजीने मुझे सृष्टि करनेका आदेश दिया है; इसलिये मैं दिव्य गुणोंसे सम्पन्न उत्तम पत्नी चाहता हूँ, जिससे सन्तानकी उत्पत्ति हो सके।'
पितरोंने कहा— वत्स! यहीं, इसी समय तुम्हें अत्यन्त मनोहर पत्नी प्राप्त होगी और उसके गर्भसे तुम्हें 'मनु' संज्ञक उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। वह
२४८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
बुद्धिमान् पुत्र मन्वन्तरका स्वामी होगा और तुम्हारे ही नामपर तीनों लोकोंमें 'रौच्य' के नामसे उसकी ख्याति होगी। उसके भी महाबलवान् और पराक्रमी बहुत-से महात्मा पुत्र होंगे, जो इस पृथ्वीका पालन करेंगे। धर्मज्ञ! तुम भी प्रजापति होकर चार प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करोगे और फिर अपना अधिकार क्षीण होनेपर सिद्धिको प्राप्त होओगे। जो मनुष्य इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक हमारी स्तुति करेगा, उसके ऊपर सन्तुष्ट होकर हमलोग उसे मनोवाञ्छित भोग तथा उत्तम आत्मज्ञान प्रदान करेंगे। जो नीरोग शरीर, धन और पुत्र-पौत्र आदिकी इच्छा करता हो, वह सदा इस स्तोत्रसे हमलोगोंकी स्तुति करे। यह स्तोत्र हमलोगोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाला है। जो श्राद्धमें भोजन करनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके सामने खड़ा हो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके यहाँ स्तोत्रश्रवणके प्रेमसे हम निश्चय ही उपस्थित होंगे और हमारे लिये किया हुआ श्राद्ध भी निःसन्देह अक्षय होगा। चाहे श्रोत्रिय ब्राह्मणसे रहित श्राद्ध हो, चाहे वह किसी दोषसे दूषित हो गया हो अथवा अन्यायोपार्जित धनसे किया गया हो अथवा श्राद्धके लिये अयोग्य दूषित सामग्रियोंसे उसका अनुष्ठान हुआ हो, अनुचित समय या अयोग्य देशमें हुआ हो या उसमें विधिका उल्लङ्घन किया गया हो अथवा लोगोंने बिना श्रद्धाके या दिखावेके लिये किया हो तो भी वह श्राद्ध इस स्तोत्रके पाठसे हमारी तृप्ति करनेमें समर्थ होता है। हमें सुख देनेवाला यह स्तोत्र जहाँ श्राद्धमें पढ़ा जाता है, वहाँ हमलोगोंको बारह वर्षांतक बनी रहनेवाली तृप्ति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र हेमन्त-ऋतुमें श्राद्धके अवसरपर सुनानेसे हमें बारह वर्षोंके लिये तृप्ति प्रदान करता है। इसी प्रकार शिशिर ऋतुमें यह कल्याणमय स्तोत्र हमें चौबीस वर्षोंतक तृप्तिकारक होता है। वसन्त ऋतुके श्राद्धमें सुनानेपर यह सोलह वर्षोंतक तृप्तिकारक होता है तथा ग्रीष्म-ऋतुमें पढ़े जानेपर भी यह उतने ही वर्षोंतक तृप्तिका साधक होता है। रुचे! वर्षा-ऋतुमें किया हुआ श्राद्ध यदि किसी अङ्गसे विकल हो तो भी इस स्तोत्रके पाठसे पूर्ण होता है और उस श्राद्धसे हमें अक्षय तृप्ति होती है। शरत्कालमें भी श्राद्धके अवसरपर यदि इसका पाठ हो तो यह हमें पंद्रह वर्षोंतकके लिये तृप्ति प्रदान करता है। जिस घरमें यह स्तोत्र सदा लिखकर रखा जाता है, वहाँ श्राद्ध करनेपर हमारी निश्चय ही उपस्थिति होती है; अतः महाभाग! श्राद्धमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंके सामने तुम्हें यह स्तोत्र अवश्य सुनाना चाहिये; क्योंकि यह हमारी पुष्टि करनेवाला है।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— क्रोष्टुकिजी! तदनन्तर रुचिके समीप उस नदीके भीतरसे छरहरे अङ्गोंवाली मनोहर अप्सरा प्रम्लोचा प्रकट हुई और महात्मा रुचिसे मधुर वाणीमें विनयपूर्वक बोली—'तपस्वियोंमें श्रेष्ठ रुचि! मेरी एक परम सुन्दरी कन्या है, जो वरुणके पुत्र महात्मा पुष्करसे उत्पन्न हुई है। मैं
- भौत्य मन्वन्तरकी कथा तथा चौदह मन्वन्तरोंके श्रवणका फल * २४९
उस सुन्दरी कन्याको तुम्हें पत्नी बनानेके लिये देती हूँ, ग्रहण करो। उसके गर्भसे तुम्हारे पुत्र महाबुद्धिमान् मनुका जन्म होगा।' तब रुचिने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात स्वीकार की। इसके बाद प्रम्लोचाने अपनी कन्या मालिनीको जलके बाहर प्रकट किया। मुनिश्रेष्ठ रुचिने महर्षियोंको बुलाकर नदीके तटपर उसका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उसीके गर्भसे महापराक्रमी परम बुद्धिमान् पुत्रका जन्म हुआ, जो इस भूमण्डलमें पिताके नामपर 'रौच्य' मनुके नामसे ही विख्यात हुए। उनके मन्वन्तरमें जो देवता, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र नृपगण होनेवाले हैं, उन सबके नाम तुम्हें बतलाये जा चुके हैं। इस मन्वन्तरकी कथा सुननेपर मनुष्योंके धर्मकी वृद्धि, आरोग्यकी प्राप्ति तथा धन-धान्य और पुत्रकी उत्पत्ति होती है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। महामुने! पितरोंका स्तवन तथा उनके भिन्न-भिन्न गणोंका वर्णन सुनकर मनुष्य उन्हींके प्रसादसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है।
भौत्य मन्वन्तरकी कथा तथा चौदह मन्वन्तरोंके श्रवणका फल
मार्कण्डेयजी कहते हैं— ब्रह्मन्! इसके पश्चात् अब तुम भौत्य मनुकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग सुनो तथा उस समय होनेवाले देवर्षियों और पृथ्वीका पालन करनेवाले मनु पुत्रों आदिके नाम भी श्रवण करो। अङ्गिरा मुनिके एक शिष्य थे, जिनका नाम भूति था। वे बड़े ही क्रोधी तथा छोटी-सी बातके लिये अपराध होनेपर प्रचण्ड शाप देनेवाले थे। उनकी बातें कठोर होती थीं। उनके आश्रमपर हवा बहुत तेज नहीं बहती थी। सूर्य अधिक गर्मी नहीं पहुँचाते थे और मेघ अधिक कीचड़ नहीं होने देते थे। उन अत्यन्त तेजस्वी क्रोधी महर्षिके भयसे चन्द्रमा अपनी समस्त किरणोंसे परिपूर्ण होनेपर भी अधिक सर्दी नहीं पहुँचाते थे। समस्त ऋतुएँ उनकी आज्ञासे अपने आनेका क्रम छोड़कर आश्रमके वृक्षोंपर सदा ही रहतीं और मुनिके लिये फल-फूल प्रस्तुत करती थीं। महात्मा भूतिके भयसे जल भी उनके आश्रमके समीप मौजूद रहता और उनके कमण्डलुमें भी भरा रहता था।
भूति मुनिके एक भाई थे, जो सुवर्चाके नामसे विख्यात थे। उन्होंने यज्ञमें भूतिको निमन्त्रित किया। वहाँ जानेकी इच्छासे भूतिने अपने परम बुद्धिमान्, शान्त, जितेन्द्रिय, विनीत, गुरुके कार्यमें सदा संलग्न रहनेवाले, सदाचारी और उदार शिष्य मुनिवर शान्तिसे कहा—'वत्स! मैं अपने भाई सुवर्चाके यज्ञमें जाऊँगा। उन्होंने मुझे बुलाया है। तुम्हें यहीं आश्रमपर रहना है। यहाँ तुम्हारे लिये जो कर्तव्य है, सुनो। मेरे आश्रमपर तुम्हें प्रतिदिन अग्निको प्रज्वलित रखना होगा और सदा ऐसा प्रयत्न करना होगा, जिससे अग्नि बुझने न पाये।'
गुरुकी यह आज्ञा पाकर जब शान्ति नामक
[ 539 ] सं० मा० पु०—१
२५० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
शिष्यने 'बहुत अच्छा' कहकर इसे स्वीकार किया, तब अपने छोटे भाईके बुलानेपर भूति मुनि उनके यज्ञमें चले गये। इधर शान्ति गुरुभक्तिके वशमें होकर उन महात्मा गुरुकी सेवाके लिये जबतक समिधा, फूल और फल आदि जुटाते रहे तथा अन्य आवश्यक कार्य करते रहे, तबतक भूति मुनिके द्वारा रक्षित अग्नि शान्त हो गयी। अग्निको शान्त हुआ देख शान्तिको बड़ा दुःख हुआ और वे भूतिके भयसे बहुत चिन्तित हुए। उन्होंने सोचा, 'यदि इस अग्निके स्थानमें मैं दूसरी अग्नि स्थापित करूँ तो सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले मेरे गुरु अवश्य ही मुझे भस्म कर डालेंगे, मैं पापी अपने गुरुके क्रोध और शापका कारण बनूँगा! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि गुरुके अपराध करनेका शोक है। अग्नि शान्त हुई देख गुरुदेव मुझे निश्चय ही शाप दे देंगे। जिनके प्रभावसे डरकर देवता भी उनके शासनमें रहते हैं, वे मुझ अपराधीको शापसे दग्ध न करें, इसके लिये क्या उपाय हो सकता है?'
अपने गुरुके डरसे डरे हुए बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शान्ति मुनिने इस तरह अनेक प्रकारसे सोच-विचार करके अग्निदेवकी शरण ली। उसने मनपर संयम किया और पृथ्वीपर घुटने टेक हाथ जोड़ एकाग्रचित्त हो स्तोत्र आरम्भ किया।
शान्तिने कहा—समस्त प्राणियोंके साधक महात्मा अग्निदेवको नमस्कार है। उनके एक, दो और पाँच स्थान हैं। वे राजसूय-यज्ञमें छः स्वरूप धारण करते हैं। समस्त देवताओंको वृत्ति देनेवाले अत्यन्त तेजस्वी अग्निदेवको नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्के कारणरूप तथा पालन करनेवाले हैं, उन अग्निदेवको प्रणाम है। अग्ने! तुम सम्पूर्ण देवताओंके मुख हो। भगवन्! तुम्हारे द्वारा ग्रहण किया हुआ हविष्य सब देवताओंको तृप्त करता है। तुम्हीं समस्त देवताओंके प्राण हो। तुममें हवन किया हुआ हविष्य अत्यन्त पवित्र होता है, फिर वही मेघ बनकर जलरूपमें परिणत हो जाता है। फिर उस जलसे सब प्रकारके अन्न आदि उत्पन्न होते हैं। अनिलसारथे! फिर उन समस्त अन्न आदिसे सब जीव सुखपूर्वक जीवन धारण करते हैं। अग्निदेव! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न की हुई ओषधियोंसे मनुष्य यज्ञ करते हैं। यज्ञोंसे देवता, दैत्य तथा राक्षस तृप्त होते हैं। हुताशन! उन यज्ञोंके आधार तुम्हीं हो, अतः अग्ने! तुम्हीं सबके आदिकारण और सर्वरूप हो। देवता, दानव, यक्ष, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, मनुष्य, पशु वृक्ष, मृग, पक्षी तथा सर्प—ये सभी तुमसे ही तृप्त होते और तुम्हींसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। तुम्हींसे इनकी उत्पत्ति है और तुम्हींमें इनका लय होता है। देव! तुम्हीं जलकी सृष्टि करते और तुम्हीं उसको पुनः सोख लेते हो। तुम्हारे पकानेसे ही जल प्राणियोंकी पुष्टि करता है। तुम देवताओंमें तेज, सिद्धोंमें कान्ति, नागोंमें विष और पक्षियोंमें वायुरूपसे स्थित हो। मनुष्योंमें क्रोध, पक्षी और मृग आदिमें मोह, वृक्षोंमें स्थिरता, पृथ्वीमें कठोरता, जलमें द्रवत्व तथा वायुमें जलरूपसे तुम्हारी स्थिति है। अग्ने! व्यापक होनेके कारण तुम आकाशमें आत्मारूपसे स्थित हो। अग्निदेव! तुम सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें विचरते तथा सबका पालन करते हो। विद्वान् पुरुष तुमको एक कहते हैं, तथा फिर वे ही तुम्हें तीन प्रकारका बतलाते हैं। तुम्हें आठ रूपोंमें कल्पित करके ऋषियोंने आदियज्ञका अनुष्ठान किया था। महर्षिगण इस विश्वको तुम्हारी सृष्टि बतलाते हैं। हुताशन! तुम्हारे बिना यह सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मण हव्य-कव्य आदिके द्वारा 'स्वाहा' और 'स्वधा' का उच्चारण करते हुए तुम्हारी पूजा करके
• भौत्य मन्वन्तरकी कथा तथा चौदह मन्वन्तरोंके श्रवणका फल • २५१
अपने कर्मोंके अनुसार विहित उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। देवपूजित अग्निदेव! प्राणियोंके परिणाम, आत्मा और वीर्यस्वरूप तुम्हारी ज्वालाएँ तुमसे ही निकलकर सब भूतोंका दाह करती हैं। परम कान्तिमान् अग्निदेव! संसारको यह सृष्टि तुमने ही की है। तुम्हारा ही यज्ञरूप वैदिक कर्म सर्वभूतमय जगत् है। पीले नेत्रोंवाले अग्निदेव! तुम्हें नमस्कार है। हुताशन! तुम्हें नमस्कार है। पावक! आज तुम्हें नमस्कार है। हव्यवाहन! तुम्हें नमस्कार है। तुम ही खाये-पीये हुए पदार्थोंको पचानेके कारण विश्वके पालक हो। तुम्हीं खेतीको पकानेवाले और जगत्के पोषक हो। तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं समस्त प्राणियोंका पोषण करनेके लिये खेतीके हेतुभूत बीज हो। भूत, भविष्य और वर्तमान—सब तुम्हीं हो। तुम्हीं सब जीवोंके भीतर प्रकाश हो। तुम्हीं सूर्य और तुम्हीं अग्नि हो। अग्ने! दिन-रात तथा दोनों सन्ध्याएँ तुम्हीं हो। सुवर्ण तुम्हारा वीर्य है। तुम सुवर्णकी उत्पत्तिके कारण हो। तुम्हारे गर्भमें सुवर्णकी स्थिति है। सुवर्णके समान तुम्हारी कान्ति है। मुहूर्त्त, क्षण, त्रुटि और लव—सब तुम्हीं हो। जगत्प्रभो! कला, काष्ठा और निमेष आदि तुम्हारे ही रूप हैं। यह सम्पूर्ण दृश्य तुम्हीं हो। परिवर्तनशील काल भी तुम्हारा ही स्वरूप है। प्रभो! तुम्हारी जो काली नामकी जिह्वा है, वह कालको आश्रय देनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापोंके भयसे हमें बचाओ तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो कराली नामकी जिह्वा है, वह महाप्रलयकी कारणरूपा है। उसके द्वारा हमें पापों तथा इहलोकके महान् भयसे बचाओ। तुम्हारी जो मनोजवा नामकी जिह्वा है, वह लघिमा नामक गुणस्वरूपा है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो सुलोहिता नामकी जिह्वा है, वह सम्पूर्ण भूतोंकी कामनाएँ पूर्ण करती है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो सुधूम्रवर्णा नामकी जिह्वा है, वह प्राणियोंके रोगोंका दाह करनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो स्फुलिङ्गिनी नामक जिह्वा है जिससे सम्पूर्ण जीवोंके शरीर उत्पन्न हुए हैं, उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो विश्वा नामकी जिह्वा है, वह समस्त प्राणियोंका कल्याण करनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। हुताशन! तुम्हारे नेत्र पीले, ग्रीवा लाल और रंग साँवला है। तुम सब दोषोंसे हमारी रक्षा करो और संसारसे हमारा उद्धार कर दो। वह्नि, सप्तार्चि, कृशानु, हव्यवाहन, अग्नि, पावक, शुक्र तथा हुताशन—इन आठ नामोंसे पुकारे जानेवाले अग्निदेव! तुम प्रसन्न हो जाओ। तुम अक्षय, अचिन्त्य समृद्धिमान्, दुःसह एवं अत्यन्त तीव्र वह्नि हो। तुम मूर्तरूपमें प्रकट होकर अविनाशी कहे जानेवाले सम्पूर्ण भयंकर लोकोंको भस्म कर डालते हो अथवा तुम अत्यन्त पराक्रमी हो—तुम्हारे पराक्रमकी कहीं सीमा नहीं है। हुताशन! तुम सम्पूर्ण जीवोंके हृदय-कमलमें स्थित उत्तम, अनन्त एवं स्तवन करने योग्य सत्त्व हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर विश्वको व्याप्त कर रखा है। तुम एक होकर भी यहाँ अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हो। पावक! तुम अक्षय हो, तुम्हीं पर्वतों और वनोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य तथा दिन-रात हो। महासागरके उदरमें बड़वानलके रूपमें तुम्हीं हो तथा तुम्हीं अपनी परा विभूतिके साथ सूर्यकी किरणोंमें स्थित हो। भगवन्! तुम हवन किये हुए
२५२
* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
हविष्यका साक्षात् भोजन करते हो, इसलिये बड़े-बड़े यज्ञोंमें नियमपरायण महर्षिगण सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। तुम यज्ञमें स्तुत होकर सोमपान करते हो तथा वषट्का उच्चारण करके इन्द्रके उद्देश्यसे दिये हुए हविष्यको भी तुम्हीं भोग लगाते हो और इस प्रकार पूजित होकर तुम सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करते हो। विप्रगण अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये सदा तुम्हारा ही यजन करते हैं। सम्पूर्ण वेदाङ्गोंमें तुम्हारी महिमाका गान किया जाता है। यज्ञपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारी ही प्रसन्नताके लिये सर्वदा अङ्गोंसहित वेदोंका पठन-पाठन करते रहते हैं। तुम्हीं यज्ञपरायण ब्रह्मा, सब भूतोंके स्वामी भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, अर्यमा, जलके स्वामी वरुण, सूर्य तथा चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हींको हविष्योंद्वारा संतुष्ट करके मनोवाञ्छित फल प्राप्त करते हैं। कितने ही महान् दोषसे दूषित वस्तु क्यों न हो, वह सब तुम्हारी ज्वालाओंके स्पर्शसे शुद्ध हो जाती है। सब स्नानोंमें तुम्हारे भस्मसे किया हुआ स्नान ही सबसे बढ़कर है, इसीलिये मुनिगण सन्ध्याकालमें उसका विशेष रूपसे सेवन करते हैं। शुचि नामवाले अग्निदेव! मुझपर प्रसन्न होओ। वायुरूप! मुझपर प्रसन्न होओ। अत्यन्त निर्मल कान्तिवाले पावक! मुझपर प्रसन्न होओ। विद्युत्सख! आज मुझपर प्रसन्न होओ। हविष्यभोजी अग्निदेव! तुम मेरी रक्षा करो। वह्ने! तुम्हारा जो कल्याणमय स्वरूप है, देव! तुम्हारे जो सात जालामयी जिह्वाएँ हैं, उन सबके द्वारा तुम मेरी रक्षा करो—ठीक उसी तरह, जैसे पिता अपने पुत्रकी रक्षा करता है। मैंने तुम्हारी स्तुति की है।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुने! शान्तिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् अग्निदेव ज्वालाओंसे घिरे हुए उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्मन्! अग्निदेव उस स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट थे। शान्ति उनके चरणोंमें पड़ गये; फिर उन्होंने मेघके समान गम्भीर वाणीमें शान्तिसे कहा—‘विप्रवर! तुमने जो भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया है, उससे मैं सन्तुष्ट हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, माँग लो।’
शान्तिने कहा— भगवन्! मैं तो कृतार्थ हो गया, क्योंकि आज आपके दिव्य स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा हूँ। तथापि मैं भक्तिसे विनीत होकर जो कुछ आपसे कहता हूँ, उसे आप सुनें। देव! मेरे आचार्य अपने आश्रमसे भाईके यज्ञमें गये हैं। वे जब लौटकर आयें तो इस स्थानको आपसे सनाथ देखें। साथ ही यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो यह दूसरा वर भी दीजिये। मेरे गुरुदेवके कोई पुत्र नहीं है, उन्हें कोई सुयोग्य पुत्र प्राप्त हो; फिर उस पुत्रमें वे जितना स्नेह करें, उतना ही सम्पूर्ण भूतोंके प्रति भी उनका स्नेह हो। उनका हृदय सबके प्रति कोमल बन जाय।
- भौत्य मन्वन्तरकी कथा तथा चौदह मन्वन्तरोंके श्रवणका फल * २५३
शान्तिकी यह बात सुनकर अग्निदेवने कहा—'महागुणे! तुमने गुरुके लिये वर दो माँगे हैं, अपने लिये नहीं। इससे तुमपर मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी है। तुमने गुरुके लिये जो कुछ माँगा है, वह सब प्राप्त होगा। उनके पुत्र होगा और सम्पूर्ण भूतोंके प्रति उनकी मैत्री भी बढ़ जायगी। उनका पुत्र 'भौत्य' नामसे प्रसिद्ध एवं मन्वन्तरोंका स्वामी होगा; साथ ही वह महाबली, महापराक्रमी और परम बुद्धिमान् होगा। जो एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्रके द्वारा मेरी स्तुति करेगा, उसकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण होंगी तथा उसे पुण्यकी भी प्राप्ति होगी। यज्ञोंमें, पर्वके समय, तीर्थोंमें और होमकर्ममें जो धर्मके लिये मेरे इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके लिये यह अत्यन्त पुष्टिकारक होगा। होम न करने तथा अयोग्य समयमें होम करने आदिके जो दोष हैं और अयोग्य पुरोडाश हवन करनेसे जो दोष उत्पन्न होते हैं, उन सबको यह स्तोत्र सुननेमात्रसे शान्त कर देता है। पूर्णिमा, अमावास्या तथा अन्य पर्वोंपर मनुष्योंद्वारा सुना हुआ मेरा यह स्तोत्र उनके पापोंका नाश करनेवाला होता है।'
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! यों कहकर भगवान् अग्नि उनके देखते-देखते बुझे हुए दीपककी भाँति तत्काल अदृश्य हो गये। अग्निदेवके चले जानेपर शान्तिका चित्त बहुत सन्तुष्ट था। उनके शरीरमें हर्षके कारण रोमाञ्च हो आया था। इसी अवस्थामें उन्होंने गुरुके आश्रममें प्रवेश किया और वहाँ अग्निदेवको पहलेकी ही भाँति प्रज्वलित देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। इसी बीचमें उनके गुरु भी छोटे भाईके यज्ञसे अपने आश्रमको लौटे। शिष्य शान्तिने गुरुके सामने जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। उनके दिये हुए आसन और पूजाको स्वीकार करके गुरुने उनसे कहा—'वत्स! तुमपर तथा अन्य जीवोंपर भी मेरा स्नेह बहुत बढ़ गया है। मैं नहीं जानता, यह क्या बात है। यदि तुम्हें कुछ पता हो तो बताओ।' तब शान्तिने अपने आचार्यसे अग्निके बुझने आदिकी सब बातें यथार्थरूपसे कह सुनायीं। यह सुनकर गुरुके नेत्र स्नेहके कारण सजल हो आये। उन्होंने शान्तिको हृदयसे लगा लिया और उन्हें अङ्ग-उपाङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान कराया। तदनन्तर भूति मुनिके 'भौत्य' नामक पुत्र हुआ, जो भविष्यमें मनु होगा। उस मन्वन्तरमें चाक्षुष, कनिष्ठ, पवित्र, भ्राजिर तथा धारावृक—ये पाँच देवगण माने गये हैं; इन सबके इन्द्र होंगे शुचि, जो महाबली, महापराक्रमी तथा इन्द्रके समस्त गुणोंसे युक्त होंगे। आग्नीध्र, अग्निबाहु, शुचि, मुक्त, माधव, शुक्र और अजित—ये सात उस समयके सप्तर्षि होंगे। गुरु, गभीर, नध्र, भरत, अनुग्रह, स्वोमनी, प्रवीर, विष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी तथा सुबल—ये मनुके पुत्र होंगे।
क्रौष्टुकिजी! इस प्रकार मैंने तुमसे चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन किया। उन सबका क्रमशः श्रवण करके मनुष्य पुण्यका भागी होता है तथा उसकी सन्तान कभी क्षीण नहीं होती। प्रथम मन्वन्तरका वर्णन सुनकर मनुष्य धर्मका भागी होता है। स्वारोचिष मन्वन्तरकी कथा सुननेसे उसे सब कामनाओंकी प्राप्ति होती है। औत्तम मन्वन्तरके श्रवणसे धन, तामसके श्रवणसे ज्ञान तथा रैवत मन्वन्तरके श्रवणसे बुद्धि एवं सुन्दरी स्त्रीकी प्राप्ति होती है। चाक्षुष मन्वन्तरके श्रवणसे आरोग्य, वैवस्वतके श्रवणसे बल तथा सूर्यसावर्णिक मन्वन्तरके श्रवणसे गुणवान् पुत्र-पौत्रोंकी प्राप्ति होती है। ब्रह्मसावर्णिक मन्वन्तरके श्रवणसे महिमा बढ़ती है। धर्मसावर्णिकके श्रवणसे कल्याणमयी बुद्धि प्राप्त होती है और रुद्रसावर्णिकके श्रवणसे मनुष्य विजयी होता है। दक्षसावर्णिकके श्रवणसे मनुष्य
१५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
अपने कुलमें श्रेष्ठ तथा उत्तम गुणोंसे युक्त होता है तथा रौच्य मन्वन्तरकी कथा सुननेसे वह शत्रुओंकी सेनाका संहार कर डालता है। भौत्य मन्वन्तरकी कथा श्रवण करनेपर मनुष्य देवताकी कृपा प्राप्त करता है; इतना ही नहीं, उसे अग्निहोत्रके पुण्य तथा गुणवान् पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र, मनु, मनुके पुत्र तथा राजवंशोंका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। देवता, ऋषि, इन्द्र, राजा तथा मन्वन्तरोंके स्वामी- ये प्रसन्न होकर कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं। वैसी बुद्धि पाकर मनुष्य शुभ कर्म करता है, जिससे वह चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त उत्तम गतिका उपभोग करता है।
सूर्यका तत्त्व, वेदोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सृष्टि-रचनाका आरम्भ
क्रौष्टुकि बोले- द्विजश्रेष्ठ! आपने मन्वन्तरोंकी स्थितिका भलीभाँति वर्णन किया और मैंने क्रमशः विस्तारपूर्वक उसे सुना। अब राजाओंका सम्पूर्ण वंश, जिसके आदि ब्रह्माजी हैं, मैं सुनना चाहता हूँ; आप उसका यथावत् वर्णन कीजिये।
मार्कण्डेयजीने कहा- वत्स! प्रजापति ब्रह्माजीको आदि बनाकर जिसकी प्रवृत्ति हुई है तथा जो सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है, उस राजवंशका तथा उसमें प्रकट हुए राजाओंके चरित्रोंका वर्णन सुनो- जिस वंशमें मनु, इक्ष्वाकु, अनरण्य, भगीरथ तथा अन्य सैकड़ों राजा, जिन्होंने पृथ्वीका पालन किया था, उत्पन्न हुए थे। वे सभी धर्मज्ञ, यज्ञकर्ता, शूरवीर तथा परम तत्त्वके ज्ञाता थे। ऐसे वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। पूर्वकालमें प्रजापति ब्रह्माने नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छा लेकर दाहिने अँगूठेसे दक्षको उत्पन्न किया और बाँये अँगूठेसे उनकी पत्नीको प्रकट किया। दक्षके अदिति नामकी एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसके गर्भसे कश्यपने भगवान् सूर्यको जन्म दिया।
क्रौष्टुकिने पूछा- भगवन्! मैं भगवान् सूर्यके यथार्थ स्वरूपका वर्णन सुनना चाहता हूँ। वे किस प्रकार कश्यपजीके पुत्र हुए? कश्यप और अदितिने कैसे उनकी आराधना की? उनके यहाँ अवतीर्ण हुए भगवान् सूर्यका कैसा प्रभाव है? वे सब बातें यथार्थरूपसे बताइये।
मार्कण्डेयजी बोले- ब्रह्मन्! पहले यह सम्पूर्ण लोक प्रभा और प्रकाशसे रहित था। चारों ओर घोर अन्धकार घेरा डाले हुए था। उस समय परम कारणस्वरूप एक अविनाशी एवं बृहत् अण्ड प्रकट हुआ। उसके भीतर सबके प्रपितामह, जगत्के स्वामी, लोकस्रष्टा, कमलयोनि साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान थे। उन्होंने उस अण्डका भेदन किया। महामुने! उन ब्रह्माजीके मुखसे 'ॐ' यह महान् शब्द प्रकट हुआ। उससे पहले भूः, फिर भुवः, तदनन्तर स्वः-ये तीन व्याहृतियाँ उत्पन्न हुईं, जो भगवान् सूर्यका स्वरूप हैं। 'ॐ' इस स्वरूपसे सूर्यदेवका अत्यन्त सूक्ष्म रूप प्रकट हुआ। उससे 'महः' यह स्थूल रूप हुआ, फिर उससे 'जन' यह स्थूलतर रूप उत्पन्न हुआ। उससे 'तप' और तपसे 'सत्य' प्रकट हुआ। इस प्रकार ये सूर्यके सात स्वरूप स्थित हैं, जो कभी प्रकाशित होते हैं और कभी अप्रकाशित रहते हैं। ब्रह्मन्! मैंने 'ओम्' यह रूप बताया है; वह
- सूर्यका तत्त्व, वेदोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सृष्टि-रचना * २५५
सृष्टिका आदि-अन्त, अत्यन्त सूक्ष्म एवं निराकार है; वही परब्रह्म तथा वही ब्रह्मका स्वरूप है।
उक्त अण्डका भेदन होनेपर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रथम मुखसे ऋचाएँ प्रकट हुईं। उनका वर्ण जपाकुसुमके समान था। वे सब तेजोमयी, एक-दूसरीसे पृथक् तथा रजोगुण रूप धारण करनेवाली थीं। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके दक्षिण मुखसे यजुर्वेदके मन्त्र अन्धाश्रयरूपसे प्रकट हुए। जैसा सुवर्णका रंग होता है, वैसा ही उनका भी था। वे भी एक-दूसरेसे पृथक् पृथक् थे। फिर परमेष्ठी ब्रह्माके पश्चिम मुखसे सामवेदके छन्द प्रकट हुए। सम्पूर्ण अथर्ववेद, जिसका रंग भ्रमर और कज्जलराशिके समान काला है तथा जिसमें अभिचार एवं शान्तिकर्मके प्रयोग हैं, ब्रह्माजीके उत्तरमुखसे प्रकट हुआ। उसमें सुखमय सत्त्वगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता है। वह घोर और सौम्यरूप है। ऋग्वेदमें रजोगुणकी, यजुर्वेदमें सत्त्वगुणकी, सामवेदमें तमोगुणकी तथा अथर्ववेदमें तमोगुण एवं सत्त्वगुणकी प्रधानता है। ये चारों वेद अनुपम तेजसे देदीप्यमान होकर पहलेकी ही भाँति पृथक्-पृथक् स्थित हुए। तत्पश्चात् वह प्रथम तेज, जो 'ॐ' के नामसे पुकारा जाता है, अपने स्वभावसे प्रकट हुए ऋग्वेदमय तेजको व्याप्त करके स्थित हुआ। महामुने! इसी प्रकार उस प्रणवरूप तेजने यजुर्वेद एवं सामवेदमय तेजको भी आवृत किया। इस प्रकार उस अधिष्ठानस्वरूप परम तेज ॐकारमें चारों वेदमय तेज एकत्वको प्राप्त हुए। ब्रह्मन्! तदनन्तर वह पुञ्जीभूत उत्तम वैदिक तेज परम तेज प्रणवके साथ मिलकर जब एकत्वको प्राप्त होता है, तब सबके आदिमें प्रकट होनेके कारण उसका नाम आदित्य होता है। महाभाग! वह आदित्य ही इस विश्वका अविनाशी कारण है। प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्नकालमें आदित्यकी अङ्गभूत वेदत्रयी ही, जिसे क्रमशः ऋक्, यजु, और साम कहते हैं, तपती है। पूर्वाह्नमें ऋग्वेद, मध्याह्नमें यजुर्वेद तथा अपराह्नमें सामवेद तपता है। इसीलिये ऋग्वेदोक्त शान्तिकर्म पूर्वाह्नमें, यजुर्वेदोक्त पौष्टिकरूप मध्याह्नमें तथा सामवेदोक्त आभिचारिक कर्म अपराह्नकालमें निश्चित किया गया है। आभिचारिक कर्म मध्याह्न और अपराह्न दोनों कालोंमें किया जा सकता है, किन्तु पितरोंके श्राद्ध आदि कार्य अपराह्नकालमें ही सामवेदके मन्त्रोंसे करने चाहिये। सृष्टिकालमें ब्रह्मा ऋग्वेदमय, पालनकालमें विष्णु यजुर्वेदमय तथा संहारकालमें रुद्र सामवेदमय कहे गये हैं। अतएव सामवेदकी ध्वनि अपवित्र मानी गयी है। इस प्रकार भगवान् सूर्य वेदात्मा, वेदमें स्थित, वेदविद्यास्वरूप तथा परम पुरुष कहलाते हैं। वे सनातन देवता सूर्य ही रजोगुण और सत्त्वगुण आदिका आश्रय लेकर क्रमशः सृष्टि, पालन और संहारके हेतु बनते हैं और इन कर्मोंके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु आदि नाम धारण करते हैं। ये देवताओंद्वारा सदा स्तवन करने योग्य हैं, वेदस्वरूप हैं। उनका कोई पृथक् रूप नहीं है। वे सबके आदि हैं। सम्पूर्ण मनुष्य उन्हींके स्वरूप हैं। विश्वकी आधारभूता ज्योति वे ही हैं। उनके धर्म अथवा तत्त्वका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता। ये वेदान्तगम्य ब्रह्म एवं परसे भी पर हैं।
तदनन्तर भगवान् सूर्यके तेजसे नीचे तथा ऊपरके सभी लोक सन्तप्त होने लगे। यह देख सृष्टिकी इच्छा रखनेवाले कमलयोनि ब्रह्माजीने सोचा—सृष्टि, पालन और संहारके कारणभूत भगवान् सूर्यके सब ओर फैले हुए तेजसे मेरी रची हुई सृष्टि भी नाशको प्राप्त हो जायगी। जल ही समस्त प्राणियोंका जीवन है, वह जल सूर्यके तेजसे सूखा जा रहा है। जलके बिना इस विश्वकी
२६८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
सृष्टि हो ही नहीं सकती—ऐसा विचारकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने एकाग्रचित्त होकर भगवान् सूर्यकी स्तुति आरम्भ की।
ब्रह्माजी बोले—यह सब कुछ जिनका स्वरूप है, जो सर्वमय हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका शरीर है, जो परम ज्योतिःस्वरूप हैं तथा योगीजन जिनका ध्यान करते हैं, उन भगवान् सूर्यको मैं नमस्कार करता हूँ। जो ऋग्वेदमय हैं, यजुर्वेदके अधिष्ठान हैं, सामवेदकी योनि हैं, जिनकी शक्तिका चिन्तन नहीं हो सकता, जो स्थूलरूपमें तीन वेदमय हैं और सूक्ष्मरूपमें प्रणवकी अर्धमात्रा हैं तथा जो गुणोंसे परे एवं परब्रह्मस्वरूप हैं, उन भगवान् सूर्यको मेरा नमस्कार है। भगवन्! आप सबके कारण, परम ज्ञेय, आदिपुरुष, परम ज्योति, ज्ञानातीतस्वरूप, देवतारूपसे स्थूल तथा परसे भी परे हैं। सबके आदि एवं प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपकी जो आद्याशक्ति है, उसीकी प्रेरणासे मैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, उनके देवता तथा प्रणव आदिसे युक्त समस्त सृष्टिकी रचना करता हूँ। इसी प्रकार पालन और संहार भी मैं उस आद्याशक्तिकी प्रेरणासे ही करता हूँ, अपनी इच्छासे नहीं। भगवन्! आप ही अग्निस্বরূপ हैं। आप जब जल सोख लेते हैं, तब मैं पृथ्वी तथा जगत्की सृष्टि करता हूँ। आप ही सर्वव्यापी एवं आकाशस्वरूप हैं तथा आप ही इस पाञ्चभौतिक जगत्का पूर्णरूपसे पालन करते हैं। सूर्यदेव! परमात्मतत्त्वके ज्ञाता विद्वान् पुरुष सर्वयज्ञमय विष्णुस्वरूप आपका ही यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं तथा अपनी मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय यति आप सर्वेश्वर परमात्माका ही ध्यान करते हैं। देवस्वरूप आपको नमस्कार है। यज्ञरूप आपको प्रणाम है। योगियोंके ध्येय परब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! मैं सृष्टि करनेके लिये उद्यत हूँ और आपका यह तेजःपुञ्ज सृष्टिका विनाशक हो रहा है; अतः अपने इस तेजको समेट लीजिये।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने अपने महान् तेजको समेटकर स्वल्प तेजको ही धारण किया, तब ब्रह्माजीने पूर्वकल्पान्तरोंके अनुसार जगत्की सृष्टि आरम्भ की। महामुने! ब्रह्माजीने पहलेकी ही भाँति देवताओं, असुरों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वृक्ष लताओं तथा नरक आदिकी भी सृष्टि की।
- अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार * २५७
अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने ! इस जगत्की सृष्टि करके ब्रह्माजीने पूर्वकल्पोंके अनुसार वर्ण, आश्रम, समुद्र, पर्वत और द्वीपोंका विभाग किया। देवता, दैत्य तथा सर्प आदिके रूप और स्थान भी पहलेकी ही भाँति बनाये। ब्रह्माजीके मरीचि नामसे विख्यात जो पुत्र थे, उनके पुत्र कश्यप हुए। उनकी तेरह पत्नियाँ हुईं, वे सब-की-सब प्रजापति दक्षकी कन्याएँ थीं। उनसे देवता, दैत्य और नाग आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए। अदितिने त्रिभुवनके स्वामी देवताओंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको तथा दनुने महापराक्रमी एवं भयानक दानवोंको उत्पन्न किया। विनतासे गरुड और अरुण—दो पुत्र हुए। खसाके पुत्र यक्ष और राक्षस हुए। कद्रूने नागोंको और मुनिने गन्धर्वोंको जन्म दिया। क्रोधासे कुल्याएँ तथा अरिष्टासे अप्सराएँ उत्पन्न हुईं। इराके ऐरावत आदि हाथियोंको उत्पन्न किया। ताम्राके गर्भसे श्येनी आदि कन्याएँ पैदा हुईं। उन्हींके पुत्र श्येन (बाज), भास और शुक आदि पक्षी हुए। इलासे वृक्ष तथा प्रथासे जलजन्तु उत्पन्न हुए। कश्यप मुनिके अदितिके गर्भसे जो सन्तानें हुईं, उनके पुत्र-पौत्र, दौहित्र तथा उनके भी पुत्रों आदिसे यह सारा संसार व्याप्त है। कश्यपके पुत्रोंमें देवता प्रधान हैं। इनमें कुछ तो सात्त्विक हैं, कुछ राजस हैं और कुछ तामस हैं। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने देवताओंको यज्ञभागका भोक्ता तथा त्रिभुवनका स्वामी बनाया; परन्तु उनके सौतेले भाई दैत्यों, दानवों और राक्षसोंने एक साथ मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाना आरम्भ कर दिया। इस कारण एक हजार दिव्य वर्षोंतक उनमें बड़ा भयङ्कर युद्ध हुआ। अन्तमें देवता पराजित हुए और बलवान् दैत्यों तथा दानवोंकी विजय प्राप्त हुई। अपने पुत्रोंको दैत्यों और दानवोंके द्वारा पराजित एवं त्रिभुवनके राज्याधिकारसे वञ्चित तथा उनका यज्ञभाग छिन गया देख माता अदिति अत्यन्त शोकसे पीड़ित हो गयीं। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधनाके लिये महान् यत्न आरम्भ किया। वे नियमित आहार करती हुई कठोर नियमोंका पालन और आकाशमें स्थित तेजोराशि भगवान् सूर्यका स्तवन करने लगीं।
अदिति बोलीं—भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म सुनहरी आभासे युक्त दिव्य शरीर धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप तेजःस्वरूप, तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजके आधार एवं सनातन पुरुष हैं; आपको प्रणाम है। गोपते! आप जगत्का उपकार करनेके लिये जब अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल ग्रहण करते हैं, उस समय आपका जो तीव्र रूप प्रकट होता है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ। आठ महीनोंतक सोममय रसको ग्रहण करनेके लिये आप जो अत्यन्त तीव्र-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। भास्कर! उसी सम्पूर्ण रसको बरसानेके लिये जब आप छोड़नेको उद्यत होते हैं, उस समय आपका जो तृप्तिकारक मेघरूप प्रकट होता है, उसको मेरा नमस्कार है। इस प्रकार जलकी वर्षासे उत्पन्न हुए सब प्रकारके अन्नोंको पकानेके लिये आप जो भास्कर-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। तरणे! जड़हन धानकी वृद्धिके लिये जो आप पाला गिराने आदिके कारण अत्यन्त शीतल रूप धारण करते हैं, उसको मेरा नमस्कार है। सूर्यदेव! वसन्त ऋतुमें जो आपका सौम्य रूप प्रकट होता है, जिसमें न अधिक गर्मी होती है न अधिक सर्दी, उसे मेरा बारंबार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करनेवाला और