भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

२६६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


कार्योंके लिये उनसे पूछनेमें कोई हर्ज नहीं।

वैश्य बोला—ठीक है, आप अपने पिताजीसे पूछें तो आपके लिये यह कामचर्चा हो सकती है; किन्तु मेरे लिये यह कामचर्चा नहीं है, अतः मैं ही पूछूँगा।

वैश्यके यों कहनेपर राजकुमार चुप हो गये। तब उसने राजकुमारका जो विचार था, वह सब उसके पितासे कह सुनाया। तब राजकुमारके पिताने ऋचीक आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा राजकुमारको भी महलमें बुलाकर मुनियोंसे सब वृत्तान्त निवेदन किया और कहा—'इस विषयमें जो कर्तव्य हो, उसके लिये आपलोग आज्ञा दें।'

ऋषि बोले—राजकुमार! पहले तुम्हारा विवाह किसी मूर्द्धाभिषिक्त राजाकी कन्यासे होना चाहिये। उसके बाद यह वैश्य-कन्या भी तुम्हारी स्त्री हो सकती है। ऐसा करनेसे दोष न होगा। अन्यथा पहले ही वैश्य-कन्याका अपहरण करनेपर तुम्हारी उत्कृष्ट जाति चली जायगी।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—यह सुनकर नाभागने उन महात्माओंके वचनकी अवहेलना कर दी और घरसे निकलकर तलवार हाथमें ले वह बोला—'मैंने राक्षस-विवाहके अनुसार इस वैश्य-कन्याका अपहरण किया है। जिसकी सामर्थ्य हो, वह इसे मेरे हाथसे छुड़ा ले।' वैश्यने उस कन्याको राजकुमारके चंगुलमें पड़ी देख 'त्राहि, त्राहि' कहते हुए उसके पिताकी शरण ली। तब राजकुमारके पिताने कुपित होकर बहुत बड़ी सेनाको आज्ञा दी, 'दुष्ट नाभाग धर्मको कलङ्कित कर रहा है, अतः उसे मार डालो, मार डालो।' राजाकी आज्ञा पाकर सेनाने राजकुमारके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। नाभाग अस्त्रोंका ज्ञाता था, उसने अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे अधिकांश सैनिकोंको मार गिराया। राजकुमारके द्वारा सेनाके मारे जानेका समाचार सुनकर राजा अपने सैनिकोंको साथ ले स्वयं ही युद्धके लिये गये। फिर तो उनका अपने पुत्रके साथ संग्राम छिड़ गया। उसमें अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगमें राजकुमारकी अपेक्षा उसके पिता ही बढ़े-चढ़े सिद्ध हुए। इसी समय सहसा आकाशसे परिव्राट् मुनि उतर पड़े और राजासे बोले—'महाभाग! अपने पुत्रके साथ युद्ध बंद कीजिये, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट हो चुका है। पुरुष अपने वर्णकी कन्याके साथ विवाह न करके जिस-जिस हीन जातिकी कन्याका पाणिग्रहण करता है, उसी-उसीके वर्णका वह भी हो जाता है। अतः आपका यह मन्दबुद्धि पुत्र अब वैश्य हो गया है, इसका क्षत्रियके साथ युद्ध करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये अब आप युद्धसे निवृत्त हो जाइये।' तब राजा अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेसे रुक गये। उसने भी उस वैश्य-कन्याके साथ विवाह कर लिया। वैश्यत्वको प्राप्त होनेपर उसने राजाके पास जाकर पूछा—'भूपाल! अब मेरा जो कर्तव्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये।'

राजा ने कहा—बाभ्रव्य आदि तपस्वी धार्मिक न्यायके लिये नियुक्त हैं, वे तुम्हारे लिये जो कर्म धर्मानुकूल बतावें, उसीका अनुष्ठान करो।

तब राजसभामें रहनेवाले बाभ्रव्य आदि मुनियोंने नाभागके लिये पशुपालन, कृषि तथा वाणिज्य—ये ही उत्तम धर्म बतलाये। राजाकी आज्ञाके अनुसार उसने भी वैसा ही किया। नाभागके उस वैश्य-कन्यासे एक पुत्र हुआ, जिसका नाम भान्दन था।

वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह २६७

वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह

मार्कण्डेयजी कहते हैं— इस पृथ्वीपर विदूरथ नामके एक राजा हो चुके हैं। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। उनके दो पुत्र थे—सुनीति और सुमति। एक दिन राजा विदूरथ शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्हें एक विशाल गड्ढा दिखायी दिया, जो पृथ्वीका मुख-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर राजाने सोचा, यह भयंकर गर्त क्या है? मालूम होता है पातालतक जानेवाली गुफा है, पृथ्वीका साधारण गर्त नहीं; देखनेमें भी पुराना नहीं जान पड़ता। उस निर्जन वनमें इस प्रकार सोचते-विचारते हुए राजाने वहाँ सुव्रत नामके तपस्वी ब्राह्मणको आते देखा और निकट आनेपर उनसे पूछा—'यह क्या है? यह गर्त बहुत ही गहरा है, इसमें पृथ्वीका भीतरी भाग दिखायी दे रहा है।'

ऋषिने कहा— राजन्! क्या आप इसे नहीं जानते? इस पृथ्वीपर जो कुछ भी है, वह सब राजाको जानना चाहिये। रसातलमें एक महापराक्रमी भयंकर दानव निवास करता है; वह पृथ्वीको जृम्भित (छिद्रयुक्त) कर देता है, इसलिये उसे कुजृम्भ कहते हैं। नरेश्वर! वह पृथ्वीपर अथवा स्वर्गमें जो कुछ करता है, उसकी जानकारी आप क्यों नहीं रखते। पूर्वकालमें विश्वकर्माने जिसका निर्माण किया था, वह सुनन्द नामका मूसल उस दुष्टात्माने हड़प लिया। उसीसे युद्धमें वह शत्रुओंका संहार करता है। पातालके अंदर रहकर उस मूसलसे ही वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर देता है और इस प्रकार समस्त असुरोंके आने जानेके लिये द्वार बना लेता है। जब आप पातालके भीतर रहनेवाले इस शत्रुक्रा नाश करेंगे, तभी वास्तवमें सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी हो सकेंगे। राजन्! उस मूसलके बलाबलके विषयमें विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं कि यदि कोई स्त्री वह मूसल छू दे तो वह उस दिन निर्बल हो जाता है; किन्तु दूसरे दिन फिर पूर्ववत् प्रबल हो जाता है। युवतीकी अँगुलियोंके स्पर्शसे उसकी शक्तिके नष्ट हो जानेका जो दोष या प्रभाव है, उसे वह दुराचारी दैत्य भी नहीं जानता। भूपाल! आपके नगरके समीप ही उसने यह पृथ्वीमें छेद किया है, फिर भी आप निश्चिन्त क्यों हैं।

इतना कहकर ब्रह्मर्षि सुव्रत चले गये। राजाने भी अपने नगरमें जाकर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंसे परामर्श किया और कुजृम्भके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब कह सुनाया। उन्होंने मूसलका वह प्रभाव भी, कि स्त्रीके स्पर्शसे उसकी शक्तिका ह्रास हो जाता था, मन्त्रियोंको बताया। जिस समय राजा मन्त्रियोंके साथ परामर्श कर रहे थे, उस समय उनकी कन्या मुदावती भी पास ही बैठी सब कुछ सुन रही थी। तदनन्तर कुछ

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दिनोंके बाद कुजृम्भने सखियोंसे घिरी हुई उस राजकन्याको उपवनसे हर लिया। यह बात सुनकर राजाके नेत्र क्रोधसे चञ्चल हो उठे और उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंसे, जो वनके मार्ग भलीभाँति जानते थे, कहा—'तुमलोग शीघ्र जाओ। उस दानवने निर्विन्ध्याके तटपर गढ़ा बना रखा है, उसीके मार्गसे रसातलमें जाकर मुदावतीका अपहरण करनेवाले उस दुष्टको मार डालो।'

तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दोनों राजकुमार उस गर्तके मार्गसे सेनासहित रसातलमें जा पहुँचे और कुजृम्भसे युद्ध करने लगे। उनमें परिघ, खड्ग, शक्ति, शूल, फरसे तथा बाणोंकी मारसे निरन्तर अत्यन्त भयानक संग्राम होता रहा। फिर मायाके बली दैत्यने युद्धमें उन दोनों राजकुमारोंको बाँध लिया और उनके समस्त सैनिकोंका संहार कर डाला। यह समाचार पाकर राजाको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने अपने सभी योद्धाओंसे कहा—'जो इस दैत्यका वध करके मेरे दोनों पुत्रोंको छुड़ा लायेगा, उसको मैं अपनी कन्या ब्याह दूँगा।' भानन्दनके पुत्र वत्सप्रीने भी यह घोषणा सुनी। वह बलवान्, अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता तथा शूरवीर था। उसने अपने पिताके प्रिय मित्र राजा विदूरथके पास आकर उन्हें प्रणाम किया और विनीत भावसे कहा—'महाराज! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपके ही तेजसे उस दैत्यको मारकर आपके दोनों पुत्रों तथा कन्याको छुड़ा लाऊँगा।' यह सुनकर राजाने अपने प्यारे मित्रके उस पुत्रको प्रसन्नतापूर्वक छातीसे लगा लिया और कहा—'वत्स! जाओ, तुम्हें अपने कार्यमें सफलता प्राप्त हो।'

तदनन्तर वीर वत्सप्री खड्ग और धनुष ले, अँगुलीयोंमें गोधाके चर्मसे बने हुए दस्ताने पहनकर पूर्वोक्त गढ़ेके मार्गसे तुरंत पातालमें गया। वहाँ उसने अपने धनुषकी भयंकर टङ्कार सुनायी, जिससे सारा पाताल गूँज उठा। वह टङ्कार सुनकर दानवराज कुजृम्भ अपनी सेना साथ ले बड़े क्रोधके साथ वहाँ आया और राजकुमारके साथ युद्ध करने लगा। दोनोंके पास अपनी-अपनी सेनाएँ थीं, एक बलवान्‌का दूसरे बलवान् वीरके साथ युद्ध हो रहा था। लगातार तीन दिनोंतक घमासान युद्ध होता रहा, तब वह दानव अत्यन्त क्रोधमें भरकर मूसल लानेके लिये दौड़ा। प्रजापति विश्वकर्माका बनाया हुआ वह मूसल सदा अन्तः-पुरमें रहता था और गन्ध, माला तथा धूप आदिसे प्रतिदिन उसकी पूजा होती थी। राजकुमारी मुदावती उस मूसलके प्रभावको जानती थी। अतः उसने अत्यन्त नम्रतासे मस्तक झुकाकर उस श्रेष्ठ मूसलका स्पर्श किया। वह महान् दैत्य जबतक उस मूसलको हाथमें ले, तबतक ही उसने नमस्कारके बहाने अनेक बार उसका स्पर्श कर लिया; फिर उस दैत्यराजने युद्धभूमिमें जाकर

  • वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह * २६९

मूसलसे युद्ध आरम्भ किया; किन्तु उसके शत्रुओंपर मूसलके प्रहार व्यर्थ सिद्ध होने लगे। उस दिव्य अस्त्रके निर्बल पड़ जानेपर दैत्यने दूसरे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा शत्रु‌का सामना किया। राजकुमारने उसे रथहीन कर दिया। तब वह ढाल-तलवार लेकर उसकी ओर दौड़ा। उसे क्रोधमें भरकर वेगसे आते देख राजकुमारने कालाग्निके समान प्रज्वलित

आग्नेय-अस्त्रसे उसपर प्रहार किया। उससे दैत्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँची और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। उसके मारे जानेपर रसातलनिवासी बड़े-बड़े नागोंने महान् उत्सव मनाया। राजकुमारपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्वराज गाने लगे और देवताओंके बाजे बज उठे। राजकुमार वत्सप्रीने उस दैत्यको मारकर राजा विदूरथके दोनों पुत्रों तथा कृशाङ्गी कन्या मुदावतीको भी बन्धनसे मुक्त किया। कुजृम्भके मारे जानेपर नागोंके अधिपति शेषसंज्ञक भगवान् अनन्तने उस मूसलको ले लिया। मुदावतीने सुनन्द नामक मूसलके गुणको

जानकर उसका बारंवार स्पर्श किया था, इसलिये नागराज अनन्तने उसका नाम सुनन्दा रख दिया। तत्पश्चात् राजकुमारने भाइयोंसहित उस कन्याको शीघ्र ही पिताके पास पहुँचाया और प्रणाम करके कहा—'तात! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके दोनों पुत्रों और इस मुदावतीको भी छुड़ा लाया। अब मुझसे और भी जो कार्य लेना हो, उसके लिये आज्ञा कीजिये।'

इसपर महाराज विदूरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उच्चस्वरसे बोले—'बेटा! बेटा!! तूने बहुत अच्छा किया, बहुत अच्छा किया। आज देवताओंने तीन कारणोंसे मेरा सम्मान बढ़ाया है—एक तो तुम जामाताके रूपमें मुझे प्राप्त हुए,

दूसरे मेरा शत्रु मारा गया तथा तीसरे मेरी सन्तानें कुशलपूर्वक लौट आयीं; अतः आज शुभ मुहूर्तमें तुम मेरी इस कन्याका पाणिग्रहण करो।' यों कहकर राजाने उन दोनोंका विधिपूर्वक विवाह कर दिया। नवयुवक वत्सप्री मुदावतीके साथ

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रमणीय प्रदेशों तथा महलोंमें विहार करने लगा। कुछ कालके बाद उसके वृद्ध पिता भनन्दन वनमें चले गये और वत्सप्री राजा हुआ। उसने सदा ही प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए अनेक यज्ञ किये। वह प्रजाको पुत्रकी भाँति मानकर उसकी रक्षा करता था। उसके राज्यमें वर्णसङ्कर सन्तानकी उत्पत्ति नहीं हुई। कभी किसीको लुटेरों, सर्पों तथा दुष्टोंका भय नहीं हुआ। इसके शासनकालमें किसी प्रकारके उत्पातका भी भय नहीं था।


राजा खनित्रकी कथा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—सुनन्दाके गर्भसे वत्सप्रीके बारह पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—प्रांशु, प्रवीर, शूर, सुनक्र, विक्रम, क्रम, बली, बलाक, चण्ड, प्रचण्ड, सुविक्रम और स्वरूप। ये सभी महाभाग संग्रामविजयी थे। इनमें महापराक्रमी प्रांशु ज्येष्ठ थे, अतः वे ही राजा हुए। शेष भाई सेवककी भाँति उनकी आज्ञाके अधीन रहते थे। उनके यज्ञमें इतना धन दान दिया गया कि ब्राह्मणों तथा विप्रवर्गके लोगोंने भी राशि-राशि द्रव्य छोड़ दिया। [अधिक होनेके कारण साथ न ले जा सके।] वह सभी द्रव्य पृथ्वीपर पड़ा रह गया, जिससे इस पृथ्वीका 'वसुंधरा' (धन धारण करनेवाली) नाम सार्थक हुआ। वे प्रजाका और पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। उनके खजानेमें जो धन एकत्रित होता था, उसके द्वारा उन्होंने जो लाखों यज्ञ सम्पन्न किये, उनकी कोई संख्या नहीं है। प्रांशुके पुत्र प्रजाति थे। प्रजातिके खनित्र आदि पाँच पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े खनित्र राजा हुए। वे अपने पराक्रमके लिये विख्यात थे। खनित्र बड़े ही शान्त, सत्यवादी, शूरवीर, समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहनेवाले, स्वधर्मपरायण, वृद्ध पुरुषोंके सेवक, अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, वक्ता, विनयशील, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, डींग न हाँकनेवाले और सब लोगोंके प्रिय थे। वे दिन-रात यही कामना किया करते थे—'समस्त प्राणी प्रसन्न रहें। दूसरोंपर भी स्नेह रखें। सब जीवोंका कल्याण हो। सभी निर्भय हों। किसी भी प्राणीको कोई व्याधि एवं मानसिक व्यथा न हो। समस्त प्राणी सबके प्रति मित्रभावके पोषक हों। ब्राह्मणोंका कल्याण हो। सबमें परस्पर प्रेम रहे। सब वर्णोंकी उन्नति हो। समस्त कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त हो। लोगो! सब भूतोंके प्रति तुम्हारी बुद्धि कल्याणमयी हो। तुमलोग जिस प्रकार अपना तथा अपने पुत्रोंका सर्वदा हित चाहते हो, उसी प्रकार सब प्राणियोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हुए बर्ताव करो। यह तुम्हारे लिये अत्यन्त हितकी बात है। कौन किसका अपराध करता है। यदि कोई मूढ़ किसीका थोड़ा भी अहित करता है तो वह निश्चय ही उसका फल भोगता है; क्योंकि फल सदा कर्ताको ही मिलता है। लोगो! यह विचारकर सबके प्रति पवित्र भाव रखो। इससे इस लोकमें पाप नहीं बनेगा और तुम्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी। बुद्धिमानो! मैं तो यह चाहता हूँ कि आज जो मुझसे स्नेह रखता है, उसका इस पृथ्वीपर सदा ही कल्याण हो तथा जो इस लोकमें मेरे साथ द्वेष रखता है, वह भी कल्याणका ही भागी बने।*'


* नन्दन्तु सर्वभूतानि स्निह्यन्तु विजनेष्वपि। स्वस्त्यस्तु सर्वभूतेषु निरातङ्कानि सन्तु च॥
मा व्याधिरस्तु भूतानामाधयो न भवन्तु च। मैत्रोमशेषभूतानि पुष्णन्तु सकले जने॥

  • राजा खनित्रकी कथा * २७१

राजा प्रजातिके पुत्र ऐसे थे। वे समस्त गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे। उनके नेत्र पद्मपत्रके समान सुशोभित थे। उन्होंने अपने भाइयोंको प्रेमपूर्वक पृथक्-पृथक् राज्योंमें अभिषिक्त कर दिया और स्वयं समुद्रवसना पृथ्वीका उपभोग करने लगे। उन्होंने पूर्व दिशामें अपने भाई शौरिको, दक्षिण दिशामें उदावसुको, पश्चिममें सुनयको और उत्तरमें महारथको अभिषिक्त किया। उन चारों भाइयोंके तथा स्वयं राजा खनित्रके भिन्न-भिन्न गोत्रवाले मुनि पुरोहित हुए और वे ही वंशपरम्पराके क्रमसे मन्त्री भी होते आये। उक्त चारों राजा अपने-अपने राज्यका उपभोग करने लगे। खनित्र उन सबके सम्राट् थे। वे सारी पृथ्वीके स्वामी थे। महाराज खनित्र उन चारों भाइयों तथा समस्त प्रजापर सदा पुत्रोंकी भाँति स्नेह रखते थे। एक दिन राजा शौरिसे उनके मन्त्री विश्ववेदीने एकान्तमें कहा—'राजन्! मुझे आपसे कुछ कहना है। जिसके अधिकारमें यह सारी पृथ्वी रहती है, उसीके वशमें अन्य सब राजा भी रहते हैं। वह तो राजा होता ही है, उसके पुत्र-पौत्र तथा वंशके लोग भी क्रमशः राजा होते हैं। इसलिये आप हमलोगोंको साधन बनाकर अपने बाप-दादोंके राज्यपर अधिकार कर लीजिये। हम इस लोकमें ही आपको लाभ पहुँचा सकते हैं, परलोकमें नहीं।'

राजा ने कहा—'हमारे ज्येष्ठ भाई राजा हैं और हमलोगोंको पुत्रकी भाँति प्रेमसे अपनाये रखते हैं; फिर हम उनके राज्यपर किस प्रकार अधिकार जमावें।

विश्ववेदी बोले—राजन्! आप राज्यपर अधिकार कर लेनेके बाद राजाचित धन-सम्पत्तिके द्वारा अपने बड़े भाईकी पूजा करते रहियेगा। भला, राज्य-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंमें यह छोटे-बड़ेका भेद कैसा।

विश्ववेदीके इस प्रकार समझानेपर शौरिने उनकी इच्छाके अनुसार काम करनेकी प्रतिज्ञा की। तब मन्त्रीने उनके अन्य भाइयोंको भी वशमें किया। फिर साम-दान आदिके द्वारा उन सबके पुरोहितोंको भी फोड़ लिया। फिर वे चारों पुरोहित महाराज खनित्रके विरुद्ध भयङ्कर पुरश्चरण करने लगे। उनके आभिचारिक कर्मसे चार कृत्याएँ


शिवमस्तु द्विजातीनां प्रीतिरस्तु परस्परम्। समृद्धिः सर्ववर्णानां सिद्धिरस्तु च कर्मणाम्॥
हे लोकाः सर्वभूतेषु शिवा वोऽस्तु सदा मतिः। यथाऽऽत्मनि यथा पुत्रे हितमिच्छथ सर्वदा॥
तथा समस्तभूतेषु वर्तध्वं हितबुद्धयः। एवंहि हितमन्त्यन्तं को वा कस्मापराध्यते॥
यत् करोत्यहितं किञ्चित् कस्यचित्क्षुद्रमानसः। तं संनयति तद्धर्मं कांगानि फलं यतः॥
इति मत्वा मनस्तेषु भो लोकाः कृतबुद्धयः। सन्तु मा लौकिके पापे लोकान् प्राप्स्यथ वै मृधाः।
यो मेऽद्य सिद्ध्यते तस्य शिवमस्तु सदा भुवि। यश्च मांद्वैष्टि लोकेऽस्मिन् सोऽपि भद्राणि पश्यतु।
\hfill [११७। २२। १९]

२७२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

उत्पन्न हुईं। वे सभी विकराल, बड़े-बड़े मुखवाली तथा देखनेमें अत्यन्त भयङ्कर थीं। उनके हाथोंमें भयानक एवं विशाल त्रिशूल था। वे सभी राजा खनित्रके पास आयीं। राजा साधु पुरुष थे, अतः उनके पुण्य-समूहसे वे परास्त हो गयीं और लौटकर उन दुष्टात्मा पुरोहितोंपर ही टूट पड़ीं। कृत्याओंने उन चारों पुरोहितों तथा शौरिके दुष्ट मन्त्री विश्ववेदीको भी जलाकर भस्म कर डाला।

इस घटनासे सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ; क्योंकि भिन्न-भिन्न नगरोंमें निवास करनेवाले वे सभी पुरोहित और मन्त्री एक ही समय नष्ट हुए। महाराज खनित्रने भी जब सुना कि भाइयोंके पुरोहित मर गये और मन्त्री विश्ववेदी भी जलकर भस्म हो गये, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने सोचा यह क्या बात हो गयी। महाराजको इसका कुछ भी कारण नहीं मालूम हुआ। तब उन्होंने अपने घरपर पधारे हुए महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'ब्रह्मन्! भाइयोंके पुरोहित और मन्त्री जो नष्ट हो गये, इसका क्या कारण है?' राजाके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि वसिष्ठने सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया। शौरिके मन्त्रीने जो भाइयोंमें भेद डालनेवाली बात कही थी और शौरिने जो उत्तर दिया था, पुरोहितोंने जो अभिचार-कर्म किया तथा जिस कारण उनकी मृत्यु हुई, वे सब बातें महर्षिने निवेदन कीं। यह सब समाचार सुनकर महाराज खनित्रने कहा—'मुझ पापी, भाग्यहीन तथा दुष्टको धिक्कार है, जिनके कारण चार ब्राह्मणोंकी हत्या हुई। मेरे राज्यको धिक्कार है तथा महान् राजाओंके कुलमें लिये हुए जन्मको भी धिक्कार है, क्योंकि मैं ब्राह्मणोंके विनाशका कारण बन गया। वे पुरोहित तो अपने स्वामी, मेरे भाइयोंका कार्य कर रहे थे, उस दशामें उनकी मृत्यु हुई है। अतः दुष्ट वे नहीं हैं, मैं ही दुष्ट हूँ; क्योंकि मैं ही उनके नाशका कारण बना हूँ।' ऐसा विचार करके महाराज खनित्र अपने क्षुप नामक पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके तीनों पत्नियोंके साथ तपस्याके लिये वनमें चले गये। वे वानप्रस्थके नियमोंके ज्ञाता थे, अतः वनमें जाकर उन्होंने साढ़े तीन सौ वर्षोंतक घोर तपस्या की। तपस्यासे शरीरको दुर्बल करके समस्त इन्द्रियोंको रोककर वनवासी नरेशने अपने प्राण त्याग दिये। इससे वे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अक्षय पुण्यलोकोंमें गये। उनकी तीनों पत्नियाँ भी उन्हींके साथ प्राण त्यागकर उन्हीं लोकोंमें गयीं। राजा खनित्रका यह चरित्र सुनने और पढ़नेपर मनुष्योंका पाप नष्ट करनेवाला है। अब क्षुपका वृत्तान्त सुनो।

• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७३


क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजा खनित्रके पुत्र क्षुपने भी राज्य पानेके बाद पिताकी ही भाँति धर्मपूर्वक प्रजाजनोंका पालन किया। वे दानशील तथा अनेक यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे। उन्होंने व्यवहार आदिके मार्गमें शत्रु और मित्र दोनोंके प्रति समान भाव रखा। एक दिन महाराज क्षुप अपने राज्य-सिंहासनपर बैठे थे। उस समय सूतों एवं वन्दीजनोंने कहा—'महाराज! पूर्वकालमें जैसे क्षुप नामके राजा हुए थे, वैसे ही आप भी हैं। प्राचीन राजा क्षुप ब्रह्माजीके पुत्र थे। उनका चरित्र जैसा था, वैसा ही वर्तमान महाराजका भी है। पहलेके महाराज क्षुप गौ और ब्राह्मणोंसे कर नहीं लेते थे तथा उन महात्माने प्रजासे प्राप्त हुए छठे भागके द्वारा इस पृथ्वीपर अनेक यज्ञ किये थे।'

राजा बोले—'मेरे-जैसा कौन मनुष्य उन महात्मा राजाओंका पूर्णरूपसे अनुसरण कर सकेगा, तथापि उत्तम आचरणवाले पुरुषोंके समान कार्य करनेके लिये उद्योग अवश्य करना चाहिये। अतः इस समय मैं जो प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे सुनो—मैं महाराज क्षुपके चरित्रका अनुसरण करूँगा तथा खेतीका अभाव होने या उसका अभाव दूर होनेपर तीन-तीन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। मेरी यह प्रतिज्ञा सम्पूर्ण भूमण्डलके लिये है। आजके पहले गौ और ब्राह्मणोंने जो राजकर दिया है, वह सब उन्हींकी सेवामें लौटा दूँगा।

ऐसी प्रतिज्ञा करके राजा क्षुपने सब कुछ वैसा ही किया। वे खेती मारी जानेपर तीन-तीन यज्ञोंका अनुष्ठान करते थे। पहले गौ-ब्राह्मणोंने पूर्वके राजाओंको जितना कर दिया था, उतना धन उन्होंने उन्हें लौटा दिया। उनकी पत्नी प्रमथाके गर्भसे वीर नामक उत्तम पुत्र हुआ। उसने अपने प्रताप और पराक्रमसे पृथ्वीके समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था। विदर्भराजकुमारी नन्दिनी उसकी प्रियतमा पत्नी थी, जिसके गर्भसे उसने विविंश नामक पुत्रको जन्म दिया। विविंश भी महाबलवान् राजा हुआ। उसके शासनकालमें आबादी अधिक हो जानेसे समूची पृथ्वी मनुष्योंसे भर गयी थी। समयपर वर्षा होती, पृथ्वीपर खेती लहराया करती, खेतीमें अच्छे दाने लगते और दानोंमें पूर्ण रस भरे रहते थे। वे रस मनुष्योंके लिये पुष्टिकारक होते; किन्तु वह पुष्टि उन्माद पैदा करनेवाली नहीं होती थी। लोगोंके पास जो धनका संग्रह होता, वह उनके मदका कारण नहीं बनता था। विविंशके प्रतापसे शत्रु सदा भयभीत रहते थे। प्रजा स्वस्थ थी और सुहृद्वर्ग भलीभाँति पूजित हो प्रसन्नता प्राप्त करता था। राजा विविंश बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान तथा पृथ्वीका भलीभाँति पालन करके संग्राममें मृत्यु पाकर यहाँसे इन्द्रलोकमें चला गया।

विविंशका पुत्र खनीनेत्र हुआ, जो महाबलवान् और पराक्रमी था। उसके यज्ञोंमें गन्धर्वगण विस्मित हो यह गाथा गाया करते थे—'खनीनेत्रके समान दूसरा राजा इस पृथ्वीपर नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने दस हजार यज्ञ पूर्ण करके समुद्रसहित यह सारी पृथ्वी दान कर दी थी।' महात्मा ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान दे उन्होंने तपस्यासे द्रव्य संग्रह किया और उसके द्वारा पृथ्वीको छुड़ाया। राजा खनीनेत्रने सरसठ हजार सरसठ सौ सरसठ यज्ञ किये थे और सबमें प्रचुर दक्षिणा दी थी। राजाको कोई पुत्र नहीं था; इसलिये वे पापनाशिनी गोमतीके तटपर गये और वहाँ मन, वाणी एवं शरीरको संयममें रखकर घोर तपस्या

२७४* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

करने लगे। सन्तानके लिये उन्होंने इन्द्रका स्तवन किया। उनके स्तोत्र, तपस्या और भक्तिसे सन्तुष्ट होकर इन्द्रने कहा—'राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो।'

राजा बोले—देवेश्वर! मुझे कोई पुत्र नहीं है, अतः आपकी कृपासे मुझे पुत्र प्राप्त हो। वह पुत्र समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षय ऐश्वर्यसे युक्त, धर्मपालक तथा धर्मज्ञ हो।

इन्द्रने 'एवमस्तु' कहकर आशीर्वाद दिया। राजाका मनोरथ पूर्ण हो गया, अब वे प्रजाका पालन करनेके लिये अपने नगरमें आये। वहाँ वे विधिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान तथा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे। उस समय इन्द्रकी कृपासे उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उसके पिताने बलाश्र्व रखा। फिर राजाने पुत्रको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा दी। पिताके मरनेके बाद जब बलाश्र्व राज्यसिंहासनपर आसीन हुए, तब उन्होंने पृथ्वीके सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें कर लिया। परन्तु बहुत-से महापराक्रमी राजा, जो सब प्रकारके साधन और धनसे सम्पन्न थे, एक साथ मिल गये और उन्होंने राजा बलाश्र्वको उनकी राजधानीमें ही घेर लिया। नगरपर घेरा पड़ जानेसे राजा बलाश्र्वको बड़ा क्रोध हुआ, परन्तु उनका खजाना बहुत थोड़ा रह गया था; इसलिये सैनिक बलकी कमी हो जानेसे वे अत्यन्त विकल हो गये। जब उन्हें और कोई शरण नहीं दिखायी दी, तब वे आर्त हो दोनों हाथ मुँहके आगे करके जोर-जोरसे साँस लेने लगे; फिर तो उनके हाथकी अँगलियोंके छिद्रसे, मुखकी वायुसे प्रेरित हो सैकड़ों योद्धा, रथ, हाथी और घोड़े निकलने लगे। क्षणभरमें राजाका सारा नगर बहुत बड़ी सेनासे भर गया। तब उस विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकलकर उन्होंने उन शत्रु राजाओंको परास्त किया और सबको अपने अधीन करके उनपर कर लगा दिया। करका धमन करने (हाथोंको फूँकने)-से उन्होंने शत्रुओंका दाह करनेवाली सेना उत्पन्न की थी, इसलिये वे राजा बलाश्र्व करन्धम कहलाने लगे। करन्धम धर्मात्मा, सब प्राणियोंके मित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे। जब राजा सङ्कटमें पड़े थे, तब साक्षात् उनके धर्मने उनके पास पहुँचकर शत्रुनाशक सेना प्रदान की थी और फिर स्वयं ही उसे अदृश्य कर दिया।

राजा वीर्यचन्द्रकी सुन्दरी कन्या वीराने, जो उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाली थी, स्वयंवरमें महाराज करन्धमका वरण किया था। उसके गर्भसे महाराजने अबीक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसके इस नामका प्रसङ्ग सुनो। पुत्र उत्पन्न होनेपर राजा करन्धमने उसके ग्रह आदिके विषयमें ज्योतिषियोंसे पूछा। तब ज्योतिषियोंने कहा—'महाराज! आपका पुत्र उत्तम मुहूर्त, श्रेष्ठ नक्षत्र और शुभ लग्नमें उत्पन्न हुआ है; अतः यह महान् पराक्रमी, परम सौभाग्यवान् तथा अधिक बलशाली होगा। बृहस्पति और शुक्र सातवें स्थानमें तथा चन्द्रमा चौथे स्थानमें रहकर इस बालकको देखते हैं। ग्यारहवें स्थानमें स्थित बुध भी इसको देखते हैं। सूर्य, मङ्गल और शनैश्चरकी इसपर दृष्टि नहीं है; अतः यह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त होगा।' ज्योतिषियोंकी बात सुनकर राजा करन्धमके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—''इसे बृहस्पति और बुध देखते हैं और सूर्य, शनैश्वर एवं मङ्गलसे यह अबीक्षित (अदृष्ट) है; इसलिये इसका नाम 'अवीक्षित' होगा।''

करन्धमके पुत्र अवीक्षित वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हुए। उन्होंने मुनिवर कण्वके पुत्रसे सम्पूर्ण अस्त्रविद्याकी शिक्षा ग्रहण की। वे रूपमें अश्विनीकुमार, बुद्धिमें बृहस्पति, कान्तिमें चन्द्रमा,

• ध्रुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवेक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७९


तेजमें सूर्य, धैर्यमें समुद्र और क्षमामें पृथ्वीके समान थे। वीरतामें तो उनकी समानता करनेवाला कोई था ही नहीं। एक समयकी बात है, वे वैदिशके राजा विशालकी कन्या वैशालिनीको प्राप्त करनेके लिये उसके स्वयंवरमें गये। वह सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी समस्त राजाओंकी उपेक्षा करके चली जा रही थी, इतनेमें ही अवेक्षितने उसे बलपूर्वक पकड़ लिया। उन्हें अपने बलका बहुत अभिमान था। उनके इस कार्यसे अन्य समस्त राजाओंका, जो बहुत बड़ी संख्यामें एकत्रित थे, अपमान हुआ; अतः वे खिन्न होकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'अनेक बलशाली राजाओंके होते हुए किसी एकके द्वारा नारीका अपहरण हो और आपलोग उसे क्षमा कर दें, तो यह धिक्कार देनेयोग्य बात है। क्षत्रिय वह है, जो दुष्ट पुरुषोंसे सताये जानेवालेकी रक्षा करे, उसकी क्षति न होने दे। जो ऐसा नहीं करते, वे लोग इस नामको व्यर्थ ही धारण करते हैं। संसारमें कौन मनुष्य मृत्युसे नहीं डरता, किन्तु युद्ध न करके भी कौन अमर रह गया है। यह विचारकर शस्त्रधारी क्षत्रियोंको पुरुषार्थका त्याग नहीं करना चाहिये।'

यह सुनकर सब राजा अमर्षमें भर गये और परस्पर सलाह करके सभी हथियार ले उठ खड़े हुए। कुछ रथोंपर जा बैठे। कुछ हाथियों और घोड़ोंपर सवार हुए तथा दूसरे कितने ही राजा कुपित हो पैदल ही अवेक्षितसे लोहा लेनेको जा पहुँचे। अवेक्षित अकेले थे। उनके विरोधमें बहुत-से राजा और राजकुमार थे। उनमें बड़ा भयङ्कर संग्राम हुआ। तलवार, शक्ति, गदा और धनुष-बाण लिये हुए समस्त राजा अवेक्षितपर प्रहार करने लगे तथा राजकुमार अवेक्षित भी अकेले ही उन सारे राजाओंसे भिड़ गये और सैकड़ों बाणोंसे मारकर उन्हें घायल करने लगे। अवेक्षितने किसीकी बाँह काट डाली, किसीकी गर्दन उड़ा दी, किसीकी छाती छेद डाली और किसीके वक्षमें प्रहार किया। शत्रुओंके आते हुए बाणोंको वे बाण मारकर दो टुकड़े कर देते थे। किसीकी तलवार काट देते और किसीका धनुष खण्डित कर देते थे। कोई राजकुमार अपना कवच कट जानेके कारण पलायन कर गया। दूसरा अवेक्षितके बाणोंसे घायल होकर पैदल ही रणभूमिसे भाग गया। इस प्रकार जब राजाओंकी सारी मण्डली व्याकुल हो गयी, तब सात सौ वीर मरनेका निश्चय करके युद्धके लिये डट गये। उन सबको अपने उत्तम कुल, युवावस्था तथा शौर्यकी लाज रखनी थी। जब सारी सेना परास्त होकर भागने लगी तब ये ही सात सौ राजा एक साथ मिलकर अवेक्षितसे युद्ध करने लगे। अवेक्षित अत्यन्त क्रोधमें भरकर धर्मयुद्धके नियमसे लड़ने लगे। उन्होंने उन सबके हथियारों और कवचोंको काट गिराया। तब उन राजाओंने धर्मसे विमुख हो चारों ओरसे अवेक्षितको घेर लिया और सब ओरसे उन्हें हजारों बाणोंसे बाँधने लगे। बहुतोंके प्रहारसे पीड़ित हो वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और अत्यन्त विह्वल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस अवस्थामें उन सबने मिलकर धर्मपूर्वक उन्हें बाँध लिया और राजा विशालके साथ वैदिश नगरमें प्रवेश किया।

तदनन्तर राजा करन्धम, उनकी पत्नी वीरा तथा अन्य राजाओंने अवेक्षितके बाँधे जानेका समाचार सुना। कुछ लोगोंने करन्धमसे कहा—'महाराज! ये सभी राजा वध करनेके योग्य हैं, जिन्होंने अधिक संख्यामें सम्मिलित होकर अकेले राजकुमारको अधर्मपूर्वक बाँधा है।' दूसरे बोले—'आप चुपचाप बैठे क्यों हैं, शीघ्र ही सेना तैयार कीजिये। दुष्ट विशालको तथा वहाँ आये हुए

२७६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

अन्य समस्त राजाओंको भी बाँध लीजिये।' उन सबकी यह बात सुनकर वीरपुत्रा वीराने, जो वीरवंशमें उत्पन्न एवं वीर पतिकी पत्नी थी, हर्षमें भरकर कहा—'राजाओ ! मेरे पुत्रने समस्त राजाओंको जीतकर जो बलपूर्वक कन्याको अपने अधिकारमें कर लिया है, यह ठीक ही किया है। इसके लिये मनमें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। उसका युद्धमें बन्दी होना प्रशंसाकी ही बात है। अब तुमलोगोंके मस्तकपर भी अस्त्र-शस्त्रोंके गिरनेका समय आ पहुँचा है। युद्धके लिये शीघ्रता करो। अपने-अपने रथोंपर सवार हो जाओ। हाथी, घोड़े और सारथियोंको भी जल्दी तैयार करो। विलम्ब नहीं होना चाहिये। जो सबको परास्त करके शोभा पाता है, वही शूर है। जैसे सूर्य अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, उसी प्रकार शूरवीर शत्रुओंको हराकर यशस्वी होता है।'

इस प्रकार पत्नीके उत्साहित करनेपर राजा करन्धमने पुत्रके शत्रुओंका वध करनेके लिये सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर उनका विशाल और उनके साथियोंके साथ घोर युद्ध हुआ। तीन दिनतक युद्ध होनेके पश्चात् विशाल और उनके सहायक राजाओंका मण्डल जब प्रायः पराजित हो गये, तब राजा विशाल हाथमें अर्घ्य लेकर महाराज करन्धमके पास आये। उन्होंने बड़े प्रेमसे करन्धमका पूजन किया। उनका पुत्र अवीक्षित बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। राजाने एक रात वहाँ बड़े सुखसे व्यतीत की। दूसरे दिन राजा विशाल अपनी कन्याको साथ लेकर महाराज करन्धमके पास उपस्थित हुए। उस समय अवीक्षितने अपने पिताके सामने ही कहा—'मैं इसको तथा दूसरी किसी युवतीको भी अब नहीं ग्रहण करूँगा, क्योंकि इसके देखते-देखते शत्रुओंद्वारा युद्धमें परास्त हो गया। अब आप किसी औरके साथ इसका विवाह कर दें अथवा यह उस पुरुषका वरण करे, जिसका यश और पराक्रम अखण्डित हो तथा जिसे शत्रुओंके हाथसे अपमानित न होना पड़ा हो। पुरुष सबल होनेके कारण स्वतन्त्र होता है और स्त्रियाँ अबला होनेके कारण सदा परतन्त्र रहती हैं। परन्तु जहाँ पुरुष भी दूसरेके परतन्त्र हो गया, वहाँ उसमें मनुष्यता ही क्या रह गयी। जब इसके सामने ही राजाओंने मुझे पृथ्वीपर गिरा दिया, तब अब मैं इसे अपना मुँह कैसे दिखाऊँगा?' अवीक्षितके ऐसा कहनेपर राजा विशालने अपनी पुत्रीसे कहा—'बेटी! इन महात्माकी बात तुमने सुनी है न? शुभे! जिसमें तुम्हारी रुचि हो, ऐसे किसी दूसरे पुरुषको पतिरूपमें वरण करो अथवा हम जिसे तुम्हें दे दें, उसीका तुम आदर करो।'

कन्या बोली—पिताजी! यद्यपि संग्राममें इनके यश और पराक्रमकी हानि हुई है, तथापि ये उसमें धर्मानुकूल बर्ताव करते रहे हैं। वे अकेले थे तो भी बहुतोंने मिलकर इन्हें परास्त किया है; अतः वास्तवमें इनकी पराजय हुई, यह कहना ठीक नहीं है। युद्धके लिये जब बहुत-से राजा आये, तब ये उनमें सिंहकी भाँति अकेले घुस गये और निरन्तर डटकर सामना करते रहे। इससे इनका महान् शौर्य प्रकट हुआ है। ये वीरता और पराक्रमसे युक्त होकर धर्मयुद्धमें संलग्न थे। ऐसे समयमें समस्त राजाओंने मिलकर इनपर अधर्मपूर्वक विजय पायी है। अतः इसमें इनके लिये लज्जाकी कौन-सी बात है। तात! मैं इनके रूप मात्रपर लुभा गयी हूँ, ऐसी बात नहीं है, इनकी वीरता, पराक्रम और धीरता आदि सद्गुण मेरे चित्तको चुराये लेते हैं। अतः अब अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है। आप मेरे लिये महाराजसे इन्हीं

• स्तूप, विविक्त, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७७

महानुभावकी याचना कीजिये। इनके सिवा दूसरा कोई पुरुष मेरा पति नहीं हो सकता।

विशालने कहा—राजकुमार! मेरी पुत्रीने बहुत अच्छी बातें कही हैं। इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारे जैसा वीर कुमार इस भूतलपर दूसरा कोई नहीं है। तुम्हारे शौर्यकी कहीं समता नहीं है। तुम्हारा पराक्रम अनन्त है। वीर! तुम मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके मेरे कुलको पवित्र करो।

तब महाराज करन्धमने अपने पुत्रको समझाते हुए कहा—'बेटा! तुम राजा विशालकी कन्याको स्वीकार करो। इस सुन्दरीका तुम्हारे प्रति अत्यन्त दृढ़ अनुराग है।'

राजकुमारने कहा—पिताजी! मैंने पहले कभी आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं किया है; अतः ऐसी आज्ञा दीजिये, जिसका मैं पालन कर सकूँ।

उस राजकुमारका अत्यन्त निश्चित विचार देख विशालने व्याकुल होकर अपनी कन्यासे कहा—'बेटी! अब तुम इनकी ओरसे अपना मन हटा लो और दूसरेको पतिरूपमें वरण करो। यहाँ बहुत-से राजकुमार हैं।'

कन्या बोली—पिताजी! यदि ये मुझको नहीं ग्रहण करना चाहते तो मैं तपस्या करके इन्हें अपना पति बनाऊँगी। इस जन्ममें इनके सिवा दूसरा कोई मेरा पति नहीं होगा।

तदनन्तर राजा करन्धम राजा विशालके साथ प्रसन्नतापूर्वक तीन दिनोंतक टिके रहे, फिर अपने नगरको लौट आये। अवीक्षितको उनके पिता तथा अन्य राजाओंने प्राचीन दृष्टान्तोंके द्वारा बहुत कुछ समझाया। इससे वे भी उनके साथ नगरमें लौट आये। राजकन्या वैशालिनी अपने बन्धु-बान्धवोंसे विदा ले वनमें चली गयी और वहाँ दृढ़ वैराग्यमें स्थित हो निराहार रहकर तपस्या करने लगी। तीन महीनोंतक उपवास करनेके बाद उसको बड़ी पीड़ा हुई। वह अत्यन्त दुबली हो गयी और उसके शरीरकी एक-एक नाड़ी दिखायी देने लगी। उसका उत्साह मन्द पड़ गया। वह मरणासन्न हो चली। तब उस राजकुमारीने शरीर त्याग देनेका विचार किया। उसका अभिप्राय जानकर देवताओंने उसके पास एक दूत भेजा। दूतने वहाँ आकर कहा—'राजकुमारी! मैं देवताओंका दूत हूँ। देवताओंने तुम्हारे पास मुझे जिस कार्यके लिये भेजा है, उसे सुनो। यह मानव-शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। तुम अकारण इसका परित्याग न करो। कल्याणी! तुम चक्रवर्ती राजाकी जननी होओगी। तुम्हारा पुत्र अपने शत्रुओंका संहार करके सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका अखण्ड राज्य भोगेगा। कहीं भी उसकी आज्ञाका उल्लङ्घन न होगा। वह चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें स्थापित करके उन सबका पालन करेगा। लुटेरों, म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करेगा। उत्तम दक्षिणाओंसे पूर्ण नाना प्रकारके यज्ञ करेगा। उसके द्वारा अश्वमेध आदि यज्ञोंका छः हजार बार अनुष्ठान होगा।'

वह दूत आकाशमें ही खड़ा था। उसके शरीरपर दिव्य हार और चन्दन शोभा पा रहे थे। उसे इस रूपमें देख राजकन्याने कोमल वाणीमें कहा—'तुम देवताओंके दूत हो, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। सचमुच ही तुम स्वर्गसे यहाँ आये हो; किन्तु तुम्हीं बताओ, पतिके बिना मुझे पुत्र कैसे होगा? मैंने पिताके समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि इस जन्ममें अवीक्षितके सिवा दूसरा कोई पुरुष मेरा पति नहीं होगा; किन्तु वे अवीक्षित मेरे पिताके, अपने पिताके तथा स्वयं मेरे कहनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण करना चाहते।'

देवदूतने कहा—'महाभागे! बहुत कहनेसे क्या लाभ है। तुम्हें पुत्र अवश्य होगा। तुम अधर्मपूर्वक इस शरीरका त्याग न करो। इसी

२७८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


वनमें रहो और अपने दुर्बल शरीरका पोषण करो। तपस्याके प्रभावसे तुम्हारा सब कुछ भला ही होगा।

यों कहकर देवदूत जैसे आया था, लौट गया तथा वह सुन्दरी प्रतिदिन अपने शरीरका पोषण करने लगी।

उधर अवीक्षितकी वीरप्रसविनी माता वीराने किसी शुभ दिनको अपने पुत्र अवीक्षित्‌को पास बुलाया और इस प्रकार कहा—'बेटा! मैं तुम्हारे पिताकी आज्ञासे एक व्रत करूँगी। उसका नाम किमिच्छक व्रत है, किन्तु वह है बहुत दुष्कर। फिर भी उसके करनेसे कल्याण ही होगा। यदि तुम कुछ बल और पराक्रम दिखाओ तो वह अवश्य साध्य हो जायगा। तुम्हारे लिये वह असाध्य हो या दुःसाध्य, यदि तुम उसके लिये प्रतिज्ञा कर लोगे तो मैं उसका अनुष्ठान आरम्भ कर दूँगी। अब तुम्हारा जो विचार हो, सो कहो।'

अवीक्षित बोले—माँ! यदि पिताजीने तुम्हें आज्ञा दे दी है तो तुम निश्चिन्त होकर किमिच्छक व्रतका अनुष्ठान करो। मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता न करो।

तदनन्तर महारानी वीराने उपवासपूर्वक उस व्रतका आरम्भ किया तथा शास्त्रोंमें बताये अनुसार कुबेरकी, सम्पूर्ण निधियोंकी, निधिपालगणोंकी और लक्ष्मीजीकी बड़ी भक्तिके साथ पूजा की। उन्होंने अपने मन, वाणी और शरीरको काबूमें कर लिया था। उधर महाराज करन्धम जब एकान्त घरमें बैठे हुए थे, उस समय नीति-शास्त्र-विशारद मन्त्रियोंने उनके पास जाकर कहा—'राजन्! इस पृथ्वीका शासन करते हुए आपकी वृद्धावस्था आ गयी। आपके एक ही पुत्र हैं अवीक्षित, जिन्होंने स्त्रीका सम्पर्क ही छोड़ दिया है; इससे आपका वंश अब लुप्त हो जायगा। पितरोंको पिण्ड और पानी देनेवाला कोई नहीं रहेगा। अतः आप ऐसा कोई यत्न कीजिये, जिससे आपका पुत्र पितरोंका उपकार करनेवाली बुद्धि ग्रहण करे—विवाह करनेपर राजी हो जाय।'

इसी समय राजा करन्धमके कानोंमें एक आवाज आयी। रानी वीराके पुरोहित याचकोंसे कह रहे थे, 'कौन क्या चाहता है? किसके लिये कौन-सी वस्तु दुःसाध्य है, जिसका साधन किया जाय? महाराज करन्धमकी रानी किमिच्छक व्रतका अनुष्ठान करती हैं; अतः जिसकी जो इच्छा हो, वह पूर्ण की जायगी।' पुरोहितकी बात सुनकर राजकुमार अवीक्षित्‌ने भी राजद्वारपर आये हुए समस्त याचकोंसे कहा—'मेरी परम सौभाग्यवती माता किमिच्छक-व्रत कर रही हैं; अतः मेरे शरीरसे किसीका कोई कार्य सिद्ध होनेवाला हो तो वह बतलावे। सब याचक सुन लें, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ। इस किमिच्छक-व्रतके अनुष्ठानके अवसरपर तुमलोग क्या चाहते हो, बताओ! उसे मैं दूँगा।'

अपने बेटेके मुखसे यह बात सुनकर महाराज करन्धम तुरंत सामने आये और बोले—'मैं याचक हूँ। मुझे मेरी माँगी हुई वस्तु दो।'

अवीक्षित बोले—तात! आपको क्या देना है? बतलाइये। मेरा कर्तव्य दुष्कर हो, साध्य हो अथवा अत्यन्त दुःसाध्य हो; बताइये मैं उसे पूर्ण करूँगा।

राजाने कहा—यदि तुम सत्यप्रतिज्ञ हो और सबको इच्छानुसार दान देते हो तो मेरी गोदमें पौत्रका मुँह दिखलाओ।

अवीक्षित बोले—महाराज! मैं आपका एक ही पुत्र हूँ और ब्रह्मचर्यका पालन मेरा व्रत है। मेरे कोई पुत्र है ही नहीं, फिर आपको पौत्रका मुख कैसे दिखाऊँ?

• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७९


राजाने कहा—बहुत कहनेसे क्या लाभ, तुम ब्रह्मचर्यको छोड़ो और अपनी माताके इच्छानुसार मुझे पौत्रका मुख दिखाओ।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—जब पुत्रके बहुत कहनेपर भी राजाने दूसरी कोई वस्तु नहीं माँगी, तब उन्होंने कहा—'पिताजी! मैं आपको किमिच्छक दान देकर बड़े सङ्कटमें पड़ गया। अब निर्लज्ज होकर फिर विवाह करूँगा। स्त्रीके सामने परास्त हुआ और पृथ्वीपर गिराया गया; फिर भी मुझे स्त्रीका स्वामी बनना पड़ेगा, यह बड़ा ही दुष्कर कर्म है। तथापि मैं क्या करूँ, सत्यके बन्धनमें बँधा हूँ। आपने जो आज्ञा दी है, वह करूँगा।'

एक दिन राजकुमार अवीक्षित शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ वे हरिण, वराह तथा व्याघ्र आदि जन्तुओंको अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे। इतनेमें ही उन्हें सहसा किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुनायी दिया। वह भयसे गद्गदवाणीमें उच्चस्वरसे बार-बार क्रन्दन करती हुई त्राहि-त्राहिकी रट लगा रही थी। राजकुमार अवीक्षितने 'मत डरो, मत डरो' ऐसा कहते हुए अपने घोड़ेको उसी ओर बढ़ाया, जिधरसे वह शब्द आ रहा था। उस निर्जन वनमें दनुके पुत्र दृढ़केशके द्वारा पकड़ी गयी वह कन्या विलाप करती हुई कह रही थी, 'मैं महाराज करन्धमके पुत्र अवीक्षितकी पत्नी हूँ, किन्तु यह नीच दानव मुझे हरकर लिये जाता है। जिन महाराजके समक्ष समस्त राजा, गन्धर्व तथा गुह्यक भी खड़े होनेकी शक्ति नहीं रखते, जिनका क्रोध मृत्यु और पराक्रम इन्द्रके समान है, उन्हींकी पुत्रवधू होकर आज मैं एक दानवके द्वारा हरी जा रही हूँ।'

वह इस प्रकार कह-कहकर रो ही रही थी कि राजकुमार अवीक्षित तुरंत वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने देखा, एक अत्यन्त मनोहर कन्या है, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे शोभा पा रही है और हाथमें डंडा लिये दनु-पुत्र दृढ़केशने उसे पकड़ रखा है तथा वह करुण स्वरमें 'त्राहि-त्राहि' पुकार रही है। यह देखकर अवीक्षितने उससे कहा—'तुम भय न करो।' फिर उस दानवसे कहा—'ओ दुष्ट! अब तू मारा जायगा। भूमण्डलके समस्त राजा जिनके प्रतापके सामने मस्तक झुकाते हैं, उन महाराज करन्धमके राज्यमें कौन दुष्ट जीवित रह सकता है।' राजकुमारको श्रेष्ठ धनुष लिये आया देख वह कृशाङ्गी युवती बार-बार कहने लगी, 'आप मुझे बचाइये। यह दुष्ट मुझे हरकर लिये जाता है। मैं महाराज करन्धमकी पुत्रवधू और अवीक्षितकी पत्नी हूँ। सनाथ हूँ तो भी इस वनमें यह दुष्ट मुझे अनाथकी भाँति हरकर लिये जाता है।'

यह सुनकर अवीक्षित उसकी बातपर विचार करने लगे—'यह किस प्रकार मेरी भार्या तथा पिताजीकी पुत्रवधू हुई? अथवा इस समय तो इसे छुड़ाऊँ, फिर समझ लूँगा। पीड़ितोंकी रक्षा करनेके लिये ही क्षत्रिय हथियार धारण करते हैं।' ऐसा निश्चय करके वीर अवीक्षितने उस खोटी बुद्धिवाले दानवसे कुपित होकर कहा—'पापी! यदि जीवित रहना चाहता है तो इसे छोड़कर चला जा; अन्यथा तेरे प्राण नहीं बचेंगे।' इतना सुनते ही वह दानव उस कन्याको छोड़कर डंडेको ऊपर उठा अवीक्षितकी ओर दौड़ा। तब उन्होंने भी बाणोंकी वर्षासे उसे ढँक दिया। दानव दृढ़केश अत्यन्त मदसे मतवाला हो रहा था। राजकुमारके बाणोंसे रोके जानेपर भी उसने सौ कीलोंसे युक्त वह डंडा उनपर दे मारा; किन्तु राजकुमारने अपनी ओर आते हुए उस डंडेके बाण मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर दानवने कुपित होकर राजकुमारपर जो-जो हथियार चलाया, वह सब उन्होंने अपने बाणोंसे काट गिराया। डंडे और हथियारोंके कट

२८० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

जानेपर उसे बड़ा क्रोध हुआ और वह मुक्का तानकर राजकुमारकी ओर दौड़ा। पास आते ही राजकुमारने वेतसपत्र नामक बाणसे उसका मस्तक काट गिराया। इस प्रकार उस दुराचारी दानवके मारे जानेपर समस्त देवताओनि अवीक्षितको साधुवाद दिया और वर माँगनेके लिये कहा। तब उन्होंने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे एक महापराक्रमी पुत्र माँगा।

देवता बोले- राजकुमार ! जिसका तुमने अभी उद्धार किया है, इसी कन्याके गर्भसे तुम्हें महाबली चक्रवर्ती पुत्रकी प्राप्ति होगी।

राजकुमारने कहा- देवगण ! राजाओंसे परास्त होनेपर मैंने विवाहका विचार छोड़ दिया था, किन्तु पिताद्वारा सत्यके बन्धनमें बाँधे जानेपर मैं अब पुत्रकी अभिलाषा करता हूँ। पहले राजा विशालकी कन्याको मैंने त्याग दिया था, किन्तु उसने मेरे ही लिये दूसरे किसी पुरुषको पति बनानेका विचार छोड़ रखा है। अतः उस त्यागमयी देवीको छोड़कर क्रूरहृदय हो मैं दूसरी स्त्रीको कैसे अपनी पत्नी बना सकूँगा?

देवता बोले- यही राजा विशालकी कन्या और तुम्हारी भार्या है, जिसको तुम सदा प्रशंसा करते हो। यह सुन्दरी तुम्हारे लिये ही तप करती रही है। इसके गर्भसे तुम्हारे चक्रवर्ती एवं वीर पुत्र उत्पन्न होगा। वह सातों द्वीपोंका शासक तथा सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला होगा।

करन्धम-कुमार अवीक्षितसे यों कहकर समस्त देवता वहाँसे चले गये। तब उन्होंने उस स्त्रीसे कहा— भीरु ! कहो तो यह क्या बात है! तब वैशालिनीने अपना वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया—'नाथ! आपने जब मुझे त्याग दिया तो इस जीवनसे वैराग्य हो गया और मैं बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर वनमें चली आयी। वीर ! यहाँ तपस्या करते-करते मैंने अपना शरीर सुखा दिया और तब इसे त्याग देनेको उद्यत हो गयी। इसी समय देवताओंके दूतने आकर मुझे रोका और कहा—'तुम्हें महाबलवान् चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा, जो देवताओंको तृप्त करेगा और असुरोंका संहार करेगा।' इस प्रकार देवदूतने जब देवताओंकी आज्ञा सुनायी, तब आपके समागमकी आशासे मैंने इस देहका त्याग नहीं किया।'

मार्कण्डेयजी कहते हैं— वैशालिनीके ये वचन सुनकर तथा किमिच्छक व्रतमें की हुई प्रतिज्ञाके समय पिताके कहे हुए उत्तम वचनोंका स्मरण करके अवीक्षितने उस कन्यासे प्रेमपूर्वक कहा—'देवि ! उस समय शत्रुओंसे पराजित होनेके कारण मैंने तुम्हारा त्याग किया था और अब फिर शत्रुओंको जीतकर ही तुम्हें पाया है। अब बताओ, क्या करूँ?' इसी अवसरपर मय नामक गन्धर्व श्रेष्ठ अप्सराओं तथा अन्य गन्धर्वोंके साथ वहाँ आया।

गन्धर्व बोला— राजकुमार ! यह कन्या वास्तवमें मेरी पुत्री भामिनी है। महर्षि अगस्त्यके शापसे यह राजा विशालकी पुत्री हुई थी। बचपनमें खेलते समय इसने अगस्त्य मुनिको कुपित कर दिया था। तब उन्होंने शाप देते हुए कहा—'जा, तू मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होगी।' तब हमलोगोंने मुनिको प्रसन्न करते हुए कहा—'ब्रह्मर्षे! अभी यह निरी बालिका है, इसे भले-बुरेका विवेक नहीं है, तभी इसके द्वारा आपका अपराध बन गया है। अतः इसके ऊपर कृपा कीजिये।' तब उन महामुनिने कहा—'बालिका समझकर ही मैंने इसे बहुत थोड़ा शाप दिया है। अब यह टल नहीं सकता।' यही महर्षिका शाप था, जिससे यह मेरी पुत्री भामिनी राजा विशालके भवनमें उत्पन्न हुई। इसके लिये ही मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। आप

• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २८१


मेरी इस कन्याको ग्रहण कीजिये। इससे आपको चक्रवर्ती पुत्रकी प्राप्ति होगी।

तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजकुमारने विधिपूर्वक उसका पाणिग्रहण किया। उस समय वहाँ तुम्बुरु मुनिने हवन किया। देवता और गन्धर्व गीत गाते रहे। मेघोंने फूलोंकी वर्षा की और देवताओंके बाजे बजते रहे। विवाहके पश्चात् दोनों दम्पति महात्मा मयके साथ गन्धर्वलोकमें गये। अवीक्षित अपनी पत्नीके साथ कभी अत्यन्त रमणीय नगरोद्यानमें और कभी पर्वतकी उपत्यकामें बिहार करने लगे। वहाँ मुनि, गन्धर्व और किन्नरलोग उन दोनोंके लिये भोजनकी सामग्री, चन्दन, वस्त्र, माला तथा पीनेयोग्य पदार्थ आदि उत्तम वस्तुएँ प्रस्तुत किया करते थे। मनुष्योंके लिये दुर्लभ गन्धर्वलोकमें अवीक्षित इस प्रकार भामिनीके साथ बिहार करते रहे। कुछ समयके बाद भामिनीने वीर अवीक्षितके पुत्रको जन्म दिया। उस महापराक्रमी पुत्रका जन्म होनेपर उससे कार्यसिद्धिकी अपेक्षा रखनेवाले गन्धर्वोंके यहाँ बड़ा भारी उत्सव हुआ। उसमें सब देवता तथा निर्मल देवर्षि भी पधारे। पातालसे नागराज शेष, वासुकि और तक्षक भी आये। देवता, असुर, यक्ष और गुह्यकोंमें जो-जो प्रधान थे, वे सब उपस्थित हुए। सभी मरुद्गण भी पधारे थे। तुम्बुरुने उस बालकका जातकर्म आदि करके स्तुतिपूर्वक स्वस्तिवाचन किया और कहा— 'आयुष्मन्! तुम चक्रवर्ती, महापराक्रमी, महाबाहु एवं महाबलवान् होकर समस्त पृथ्वीका शासन करो। वीर! ये इन्द्र आदि लोकपाल तथा महर्षि तुम्हारा कल्याण करें और तुम्हें शत्रुनाशक शक्ति प्रदान करें। पूर्व दिशामें बहनेवाले मरुत्, जिनमें धूलका समावेश नहीं होता, तुम्हारा कल्याण करें। दक्षिण दिशाके निर्मल मरुत् तुम्हें स्वस्थ रखें। पश्चिमके मरुत् उत्तम पराक्रम दें तथा उत्तरके मरुत् तुम्हें उत्कृष्ट बल प्रदान करें।'

इस प्रकार स्वस्त्ययनके पश्चात् आकाशवाणी हुई, 'पुरोहितने 'मरुत् तव' (मरुत् तुम्हारा कल्याण करें)-का अनेक बार प्रयोग किया है, इसलिये यह बालक पृथ्वीपर 'मरुत्त' के नामसे विख्यात होगा। भूमण्डलके सभी राजा इसकी आज्ञाके अधीन रहेंगे और यह वीर सब राजाओंका सिरमौर बना रहेगा। अन्य भूपालोंको जीतकर यह महापराक्रमी चक्रवर्ती होगा और सात द्वीपोंवाली समूची पृथ्वीका उपभोग करेगा। यज्ञ करनेवाले राजाओंमें यह प्रधान होगा तथा समस्त नरेशोंमें इसका शौर्य और पराक्रम सबसे अधिक होगा।'

देवताओंमेंसे किसीने यह आकाशवाणी की थी। इसे सुनकर ब्राह्मण, गन्धर्व तथा बालकके माता-पिता बहुत प्रसन्न हुए। तदनन्तर राजकुमार अवीक्षित अपने प्रिय पुत्रको गोदमें ले गन्धर्वोंके साथ ही अपने पिताके नगरमें आये। पिताके घरमें पहुँचकर उन्होंने उनके चरणोंमें आदरपूर्वक मस्तक झुकाया तथा लज्जावती भामिनीने भी श्वशुरके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय राजा करन्धम धर्मासनपर विराजमान थे। अवीक्षितने पुत्रको लेकर कहा—'पिताजी! माताके किमिच्छक-व्रतमें मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार अब आप गोदमें लेकर इस पौत्रका मुख देखिये।' यों कहकर उन्होंने पिताकी गोदमें बालकको रख दिया और उसके जन्मका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया। राजा करन्धमके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उन्होंने पौत्रको छातीसे लगाकर अपने भाग्यकी प्रशंसा करते हुए कहा—'मैं बड़ा ही सौभाग्यशाली हूँ।' इसके बाद उन्होंने वहाँ आये हुए गन्धर्वोंका अर्घ्य आदिके द्वारा सत्कार किया। उस समय उनको और किसी

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बातकी बात नहीं रही! उस नगरमें, पुरवासियोंके घर-घरमें महान् आनन्द छा गया। सब प्रसन्न होकर कहते थे—'हमारे महाराजके पोता हुआ है।' राजा करन्धमने हर्षमग्न होकर ब्राह्मणोंको रत्न, धन, गौ, वस्त्र और आभूषण दान किये। वह बालक शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। उसे देखकर पिता आदिको बड़ी प्रसन्नता होती थी। वह सब लोगोंका प्यारा था। कुछ बड़ा होनेपर उपनयनके बाद उसने आचार्योंके पास रहकर पहले वेदोंकी, फिर समस्त शास्त्रोंकी तथा अन्तमें धनुर्वेदकी शिक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात् भृगुपुत्र शुक्राचार्यसे अन्यान्य अस्त्रविद्याओंका ज्ञान प्राप्त किया। वह गुरुके समक्ष विनीतभावसे मस्तक झुकाता तथा सदा उन्हें प्रसन्न रखनेकी चेष्टामें संलग्न रहता था। वह अस्त्रविद्याका ज्ञाता, वेदका विद्वान्, धनुर्वेदमें पारङ्गत तथा सब विद्याओंमें निष्णात था। उस समय मरुत्तसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं था।

राजा विशालको भी जब अपनी पुत्रीका सारा समाचार ज्ञात हुआ तथा दौहित्रकी उत्तम योग्यता सुनायी पड़ी, तब उनका मन आनन्दमें निमग्न हो गया। पौत्रको देखकर महाराज करन्धमका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अनेक यज्ञ किये और याचकोंको बहुत दान दिये। तदनन्तर वन जानेके लिये उत्सुक होकर उन्होंने अपने पुत्र अवीक्षित्‌से कहा—'बेटा! मैं बूढ़ा हो गया, अब वनमें तपस्याके लिये जाऊँगा। तुम मुझसे यह राज्य ले लो। मैं कृतकृत्य हूँ। तुम्हारा राजतिलक करनेके अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य शेष नहीं है।' यह सुनकर राजकुमार अवीक्षित्‌ने बड़ी नम्रताके साथ पितासे कहा—'तात! मैं पृथ्वीका पालन नहीं कर सकूँगा; मेरे मनसे लज्जा अभी दूर नहीं होती। आप इस राज्यपर किसी औरको नियुक्त कीजिये। मैं बन्धनमें पड़नेपर पिताके हाथों मुक्त हुआ हूँ, अपने बलसे नहीं। अतः मुझमें क्या पौरुष है। जिनमें पौरुष हो, वे ही इस पृथ्वीका पालन कर सकते हैं। जब मैं अपनी भी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हूँ, तब इस पृथ्वीकी रक्षा कैसे कर सकूँगा। इसलिये राज्य किसी औरको दे दीजिये।'

पिता बोले—'बेटा! पुत्रके लिये पिता और पिताके लिये पुत्र भिन्न नहीं है। यदि पिताने तुम्हें बन्धनसे छुड़ाया तो यही मानना चाहिये कि किसी दूसरेने नहीं छुड़ाया है।'

पुत्रने कहा—महाराज! मेरे हृदयका भाव बदल नहीं सकता। जो पिताकी कमायी हुई सम्पत्ति भोगता है, जो पिताके बलसे ही संकटसे उद्धार पाता है तथा पिताके नामपर ही जिसकी ख्याति होती है, अपने गुणोंसे नहीं—ऐसा मनुष्य कभी कुलमें उत्पन्न न हो। जो स्वयं ही धनका उपार्जन करते, स्वयं ख्याति पाते और स्वयं ही संकटोंसे मुक्त होते हैं, ऐसे पुरुषोंकी जो गति होती है, वही मेरी भी हो।

पिताके बहुत कहनेपर भी जब अवीक्षित् पूर्वोक्त उत्तर ही देते चले गये, तब महाराज करन्धमने उनके पुत्र मरुत्तको ही राजा बना दिया। पिताकी आज्ञाके अनुसार पितामहसे राज्य पाकर मरुत्त अपने सुहृदोंका आनन्द बढ़ाते हुए उसका भलीभाँति पालन करने लगे। राजा करन्धम अपनी पत्नी वीराको साथ ले वनमें तपस्याके लिये चले गये। वहाँ मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर उन्होंने एक हजार वर्षोंतक दुष्कर तपस्या की और अन्तमें शरीर त्यागकर वे इन्द्रलोकमें चले गये। उनकी पत्नी वीराने सौ वर्ष बादतक कठोर तप किया। उसके सिरपर जटाएँ बढ़ी हुई थीं, शरीरपर मैल जम गयी थी। वह स्वर्गमें गये हुए अपने महात्मा पतिके सालोक्य

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पारती हुई फल-मूलका आहार करके भार्गवके आश्रमपर तपस्या करती थीं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंमें रहकर उनकी सेवामें तत्पर रहती थीं।

क्रौष्टुकि बोले— भगवन्! आपने करन्धम और अवीक्षितके चरित्रका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन किया। अब मैं अवीक्षितकुमार महात्मा मरुत्तका चरित्र सुनना चाहता हूँ। सुना जाता है, उनका चरित्र अलौकिक था। वे चक्रवर्ती, महान् सौभाग्यशाली, शूरवीर, सुन्दर, परम बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, धर्मात्मा तथा पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करनेवाले थे।

मार्कण्डेयजीने कहा— पिताके आदेशसे पितामहका राज्य पाकर मरुत्त जिस प्रकार पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार प्रजाजनोंका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। ऋत्विजों और पुरोहितके आदेशसे प्रसन्न होकर बहुत-से यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया और उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दीं। उनका शासन-चक्र सातों द्वीपोंमें अबाधरूपसे फैला हुआ था। आकाश, पाताल और जल आदिमें भी उनकी गति कुण्ठित नहीं होती थी। राजा तो यज्ञ करते ही थे, चारों वर्णोंके अन्य लोग भी अपने-अपने कर्ममें आलस्य छोड़कर संलग्न रहते और महाराजसे धन प्राप्त कर इष्टापूर्त आदि पुण्य-क्रियाएँ करते थे। राजा मरुत्तने सौ यज्ञ करके देवराज इन्द्रको भी मात कर दिया। उनके पुरोहित अङ्गिरानन्दन संवर्तजी थे, जो बृहस्पतिजीके भाई एवं तपस्याके भण्डार थे। मुञ्जवान् नामसे प्रसिद्ध एक सोनेका पर्वत था, जहाँ देवता निवास करते थे। महाराज मरुत्तने उसका शिखर तोड़कर गिरा दिया और उसे अपने यहाँ मँगा लिया। उसके द्वारा उन्होंने यज्ञकी सब सामग्री—भू-विभाग और महल आदि सोनेके ही बनवाये। सदा स्वाध्याय करनेवाले महर्षि मरुत्तके चरित्रके विषयमें सदा यह गाथा गाते रहते हैं—'महाराज मरुत्तके समान यजमान इस भूतलपर दूसरा कोई नहीं हुआ, जिनके यज्ञमें समस्त यज्ञमण्डप और महल सुवर्णके ही बने थे; उसमें ब्राह्मण पर्याप्त दक्षिणा पाकर तृप्त हो गये। इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता उसमें ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका काम करते थे। राजा मरुत्तके यज्ञमें जैसा समारोह था, वैसा किस राजाके यज्ञमें हुआ है, जहाँ रत्नोंसे घर भरा रहनेके कारण ब्राह्मणोंने दक्षिणामें मिला हुआ सारा सुवर्ण त्याग दिया। उस छोड़े हुए धनको पाकर कितने ही लोगोंका मनोरथ पूरा हो गया और वे भी उसी धनसे अपने-अपने देशमें पृथक्-पृथक् अनेक यज्ञ करने लगे।'

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले राजा मरुत्तके पास एक दिन कोई तपस्वी आया और इस प्रकार कहने लगा—'महाराज! आपकी पितामही वीरा देवीने तपस्वियोंको मदोन्मत्त सर्पोंके विषसे पीड़ित देख आपके पास यह सन्देश दिया है—'राजन्! तुम्हारे पितामह स्वर्गवासी हो गये। मैं और्व मुनिके आश्रमपर रहकर तपस्या करती हूँ। मुझे तुम्हारे राज्य-शासनमें बहुत बड़ी त्रुटि दिखायी देती है। पातालसे सर्पोंने आकर यहाँ दस मुनिकुमारोंको डँस लिया है तथा जलाशयोंके जलको भी दूषित कर दिया है। ये पसीने, मूत्र और विष्ठासे हविष्यको दूषित कर देते हैं। यद्यपि महर्षि इन सबको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखते हैं, किन्तु किसीको दण्ड देनेका अधिकार इनका नहीं है। इसके अधिकारी तो तुम्हीं हो। राजकुमारोंको तभीतक भोगजनित सुखकी प्राप्ति होती है, जबतक उनके मस्तकपर राज्याभिषेकका जल नहीं पड़ता। कौन मित्र हैं, कौन शत्रु हैं, मेरे शत्रुका बल कितना है, मैं कौन हूँ? मेरे मन्त्री कौन हैं, मेरे

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पक्षमें कौन-कौन से राजा हैं, वे मुझसे विरक्त हैं या अनुरक्त? शत्रुओंने उन्हें फोड़ तो नहीं लिया है? शत्रुपक्षके लोगोंकी भी क्या स्थिति है, मेरे इस नगर अथवा राज्यमें कौन मनुष्य श्रेष्ठ है, कौन धर्म-कर्मका आश्रय लेता है, कौन मूढ़ है तथा किसका बर्ताव उत्तम है, किसको दण्ड देना चाहिये, कौन पालन करने योग्य है, किन मनुष्योंपर सदा मुझे दृष्टि रखनी चाहिये—इन सब बातोंपर सदा विचार करते रहना राजाका कर्तव्य है। देश-कालकी अवस्थापर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह सब ओर कई गुप्तचर लगाये रखे। वे गुप्तचर परस्पर एक-दूसरेसे परिचित न हों। उनके द्वारा यह जाननेकी चेष्टा करे कि कोई राजा अपने साथ की हुई सन्धिका भंग तो नहीं करता। राजा अपने समस्त मन्त्रियोंपर भी गुप्तचर लगा दे। इन सब कार्योंमें सदा मन लगाते हुए राजा अपना समय व्यतीत करे। उसे दिन-रात भोगासक्त नहीं होना चाहिये। भूपाल! राजाओंका शरीर भोग भोगनेके लिये नहीं होता, वह तो पृथ्वी और स्वधर्मके पालनपूर्वक भारी क्लेश सहन करनेके लिये मिलता है। राजन्! पृथ्वी और स्वधर्मका भलीभाँति पालन करते समय जो इस लोकमें महान् कष्ट होता है, वही स्वर्गमें अक्षय एवं महान् सुखकी प्राप्ति करानेवाला होता है। अतः नरेश्वर! तुम इस बातको समझो और भोगोंका त्याग करके पृथ्वीका पालन करनेके लिये कष्ट उठाना स्वीकार करो। तुम्हारे शासन-कालमें ऋषियोंको सर्पोंकी ओरसे जो भारी संकट प्राप्त हुआ है, उसे तुम नहीं जानते। मालूम होता है तुम गुप्तचररूपी नेत्रसे अन्धे हो। अधिक कहनेसे क्या लाभ, तुम दुष्टोंको दण्ड दो और सज्जन पुरुषोंका पालन करो। इससे तुम प्रजाके धर्मके छठे अंशके भागी हो सकोगे। यदि तुम प्रजाजनोंकी रक्षा नहीं करोगे तो दुष्टलोग उच्छृङ्खलतावश जो कुछ भी पाप करेंगे, वह सब तुम्हींको भोगना पड़ेगा—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो वह करो।' महाराज! आपकी पितामहीने जो कुछ कहा था, वह सब मैंने सुना दिया। अब आपको जैसी रुचि हो, वैसा करें।''

तपस्वीकी यह बात सुनकर राजा मरुत्तको बड़ी लज्जा हुई, 'सचमुच ही मैं गुप्तचररूपी नेत्रसे अन्धा हूँ। मुझे धिक्कार है'—यों कहकर लंबी साँस ले उन्होंने धनुष उठाया और तुरंत ही और्वके आश्रमपर पहुँचकर अपनी पितामही वीराको तथा अन्यान्य तपस्वी महात्माओंको प्रणाम किया। उन सबने आशीर्वाद देकर राजाका अभिनन्दन किया। तत्पश्चात् सर्पोंके काटनेसे मरकर पृथ्वीपर पड़े हुए सात तपस्वियोंको देख उन सबके सामने मरुत्तने बारंबार अपनी निन्दा की और कहा—'मेरे पराक्रमकी अवहेलना करके ब्राह्मणोंके साथ द्वेष करनेवाले दुष्ट सर्पोंकी मैं जो दुर्दशा करूँगा, उसे देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण संसार देखे।'

यों कहकर राजाने कुपित हो पाताललोक-निवासी सम्पूर्ण नागोंका संहार करनेके लिये संवर्तक नामक अस्त्र उठाया। तब उस महान् अस्त्रके तेजसे सारा नागलोक सब ओरसे सहसा जल उठा। उस समय जो घबराहट हुई, उसमें नागोंके मुखसे 'हा तात! हा माता! हा वत्स!' की पुकार सुनायी देती थी। किन्हींके पूँछ जलने लगे और किन्हींके फण। कुछ सर्प अपने वस्त्र और आभूषण छोड़कर स्त्री-पुत्रोंको साथ ले पाताल त्यागकर मरुत्तकी माता भामिनीकी शरणमें गये, जिसने पूर्वकालमें उन्हें अभय-दान दे रखा था। भामिनीके पास पहुँचकर भयसे व्याकुल हुए

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समस्त सर्पोंने प्रणामपूर्वक गद्गदवाणीमें कहा—'वीरजननी! आजसे पहले रसातलमें हमलोगोंने जो आपका सत्कार किया था और आपने हमें अभय-दान दिया, उसके पालनका यह समय आ पहुँचा है। हमारी रक्षा कीजिये। यशस्विनि! आपके पुत्र मरुत्त अपने अस्त्रके तेजसे हमलोगोंको दग्ध कर रहे हैं। इस समय आपके सिवा और कोई हमें शरण देनेवाला नहीं है। आप हमपर कृपा कीजिये।'

सर्पोंकी यह बात सुनकर और पहले अपने दिये हुए वचनको याद करके साध्वी भामिनीने तुरंत ही अपने पतिसे कहा—'नाथ! मैं पहले ही आपको वह बात बता चुकी हूँ कि नागोंने पातालमें मेरा सत्कार करके मेरे पुत्रसे प्राप्त होनेवाले भयकी चर्चा की थी और मैंने इनकी रक्षाका वचन दिया था। आज ये भयभीत होकर मेरी शरणमें आये हैं। मरुत्तके अस्त्रसे ये सब लोग दग्ध हो रहे हैं। जो मेरे शरणागत हैं, वे आपके भी हैं; क्योंकि मेरा धर्माचरण आपसे पृथक् नहीं है तथा मैं स्वयं भी आपकी शरणमें हूँ। अतः आप अपने पुत्र मरुत्तको आदेश देकर रोकिये, मैं भी उससे अनुरोध करूँगी। मेरा विश्वास है, वह अवश्य शान्त हो जायगा।'

अवीक्षित बोले—देवि! निश्चय ही किसी भारी अपराधके कारण मरुत्त कुपित हुआ है, अतः मैं तुम्हारे पुत्रका क्रोध शान्त करना कठिन मानता हूँ।

नागोंने कहा—राजन्! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हमपर कृपा करें। पीड़ितोंकी रक्षा करनेके लिये ही क्षत्रियलोग शस्त्र धारण करते हैं।

शरण चाहनेवाले नागोंकी यह बात सुनकर तथा पत्नीके प्रार्थना करनेपर महायशस्वी अवीक्षितने कहा—'मैं तुरंत चलकर नागोंकी रक्षाके लिये तुम्हारे पुत्रसे कहता हूँ, क्योंकि शरणागतोंका त्याग करना उचित नहीं है। यदि राजा मरुत्त मेरे कहनेसे अपने शस्त्रको नहीं लौटायेगा तो मैं अपने अस्त्रोंसे उसके अस्त्रका निवारण करूँगा।' यह कहकर क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ अवीक्षित धनुष ले अपनी स्त्रीके साथ तुरंत ही और्व मुनिके आश्रमपर गये।

वहाँ पहुँचकर अवीक्षितने देखा, भामिनीका पुत्र अपने हाथमें एक श्रेष्ठ धनुष लिये हुए है, उसका अस्त्र बड़ा ही भयानक है, उसकी ज्वालासे समस्त दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं। वह अपने अस्त्रसे आग उगल रहा है, जो समस्त भूमण्डलको जलाती हुई पातालके भीतर पहुँच गयी है। वह अग्नि अत्यन्त भयानक और असह्य है। राजा मरुत्तको भौंहें टेढ़ी किये खड़ा देख अवीक्षितने कहा—'मरुत्त! क्रोध न करो, अपने अस्त्रको लौटा लो।' यह बात उन्होंने बार-बार कही और इतनी शीघ्रतासे कही कि उतावलीके कारण कितने ही अक्षरोंका उच्चारण नहीं हो पाता था।

पिताकी बात सुनकर और बारंबार उन्हें देखकर हाथमें धनुष लिये हुए मरुत्तने माता और पिता दोनोंको प्रणाम किया और इस प्रकार उत्तर दिया—'पिताजी! मेरा शासन होते हुए भी सर्पोंने मेरे बलकी अवहेलना करके भारी अपराध किया है। इन महर्षियोंके आश्रममें घुसकर नागोंने दस मुनिकुमारोंको डँस लिया है। इतना ही नहीं, इन दुराचारियोंने हविष्यको भी दूषित किया है तथा यहाँ जितने जलाशय हैं, उन सबको विष मिलाकर खराब कर दिया है। ये सभी सर्प ब्रह्महत्यारे हैं, अतः इनका वध करनेसे आप हमें न रोकें।'

अवीक्षित बोले—'राजन्! ये सर्प मेरी शरणमें आ गये हैं, अतः मेरे गौरवका ध्यान रखते हुए ही तुम इस अस्त्रको लौटा लो। क्रोध करनेकी आवश्यकता नहीं है।