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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
  • अध्याय २९० * १०८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मं पाद्ममिमं यस्तु पठेत् पर्वणि पर्वणि।<br>तस्य धर्मे मतिर्ब्रह्मा करोति विपुलां श्रियम्॥ १७<br><br>यस्तु दद्यादिमान् कृत्वा हैमान् पर्वणि पर्वणि।<br>ब्रह्मविष्णुपुरे वासं मुनिभिः पूज्यते दिवि॥ १८<br><br>सर्वपापक्षयकरं कल्पदानं यतो भवेत्।<br>मुनिरूपांस्ततः कृत्वा दद्यात् कल्पान् विचक्षणः॥ १९<br><br>पुराणसंहिता चेयं तव भूप मयोदिता।<br>सर्वपापहरा नित्यमारोग्यश्रीफलप्रदा॥ २०<br><br>ब्रह्मसंवत्सरशतादेकाहं शैवमुच्यते।<br>शिववर्षशतादेकं निमेषं वैष्णवं विदुः॥ २१<br><br>यदा स विष्णुर्जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत्।<br>यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति॥ २२परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक पर्वमें इन ब्रह्म तथा पद्म नामक पुराणोंका पाठ करता है, उसकी बुद्धिको ब्रह्मा धर्ममें लगाते हैं तथा उसे प्रचुर सम्पत्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति पर्व आनेपर इन्हें सोनेका बनवाकर दान करता है, वह ब्रह्मा तथा विष्णुके पुरमें निवास करते हुए स्वर्गमें मुनियोंद्वारा पूजित होता है; क्योंकि कल्पदान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला होता है। विचक्षण पुरुषको इन कल्पोंको मुनिके समान स्वरूपवाला बनाकर दान करना चाहिये। राजन्! यह पुराण-संहिता, जो मैंने तुम्हें बताया है, सभी पापोंको नष्ट करनेवाली तथा नित्य आरोग्य एवं श्रीरूप फल प्रदान करनेवाली है। ब्रह्माका सौ वर्ष शिवका एक दिन तथा शिवका सौ वर्ष विष्णुका एक निमेष कहा जाता है। जब वे विष्णु जागते रहते हैं, तब यह जगत् भी चेष्टावान् रहता है और जब वे शान्त होकर शयन करते हैं, तब सारा जगत् शान्त हो जाता है॥ १२—२२॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदेवेशो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत॥ २३<br><br>वैवस्वतो हि भगवान् विसृज्य विविधाः प्रजाः।<br>स्वान्तरं पालयामास मार्तण्डकुलवर्धनः॥ २४<br><br>यस्य मन्वन्तरं चैतदधुना चानुवर्तते।<br>पुण्यं पवित्रमेतद् वः कथितं मत्स्यभाषितम्।<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां यदेतन्मूर्ध्नि संस्थितम्॥ २५**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ऐसा कहकर मत्स्यरूपी देवदेवेश्वर जनार्दन सभी प्राणियोंके सामने वहीं अन्तर्हित हो गये। विवस्वान्‌के पुत्र मार्तण्ड-कुलवर्धन भगवान् मनु विविध प्रजाओंकी सृष्टि कर अपनी अवधितक उनका पालन करते रहे। उन्हींका यह मन्वन्तर अभीतक चला आ रहा है। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे मत्स्यभगवान्‌द्वारा कहे गये पुण्यप्रद पवित्र पुराणका वर्णन कर दिया। यह मत्स्यपुराण सभी शास्त्रोंमें शिरोभूषण-रूपसे अवस्थित है॥ २३—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कल्पानुकीर्त्तनं नाम नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्पानुकीर्तन नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९०॥

१०८२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय

मत्स्यपुराणकी अनुक्रमणिका

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! विश्वस्वरूप मत्स्यभगवान्‌ने धर्म, अर्थ और कामके साधनभूत जिस सम्पूर्ण मत्स्यपुराणका वर्णन किया था, वह सब मैंने आपलोगोंको बतला दिया। उसमें आदिमें मनुका संवाद, ब्रह्माण्डका वर्णन तथा चतुर्मुख ब्रह्माके मुखसे उद्भूत शारीरिक सांख्यका वर्णन है। तत्पश्चात् देवताओं और असुरोंकी उत्पत्ति, मरुद्गणोंकी उत्पत्ति, मदनद्वादशी, लोकपालोंका पूजन, मन्वन्तरोंका उद्देश्य, राजा पृथुका वर्णन, सूर्य और वैवस्वत मनुकी उत्पत्ति, बुधका इलासे संयोग, पितृवंशका वर्णन, श्राद्धके कालका निर्णय, पितृतीर्थोंमें प्रवास, सोमकी उत्पत्ति, सोमवंशका वर्णन, ययातिका चरित्र, कार्तवीर्य अर्जुनका माहात्म्य, वृष्णिवंशका वर्णन, भृगुशाप, विष्णुका दैत्योंको शाप, पुरुषेशका कीर्तन, अग्नि-वंशका वर्णन, पुराणोंका वर्णन, क्रियायोगका विवेचन, नक्षत्रसंज्ञकव्रत, मार्तण्डशयन, कृष्णाष्टमीव्रत, रोहिणीचन्द्रव्रत, तडागविधिका माहात्म्य, पादोत्सर्ग-विधि, सौभाग्यशयनव्रत, अगस्त्यव्रत, अनन्ततृतीयाव्रत, रसकल्याणीव्रत, आर्द्रानन्दकरीव्रत, सारस्वतव्रत, उपरागाभिषेकव्रत, सप्तमीस्नपनव्रत, भीमद्वादशीव्रत, अनङ्गशयनव्रत, अशून्यशयनव्रत, अङ्गारकव्रत, सप्तमीसप्तकव्रत, विशोकद्वादशीव्रत, दस प्रकारके मेरुओंके दानकी विधि, ग्रहशान्ति, ग्रहोंके स्वरूपका कथन, शिवचतुर्दशीव्रत, सर्वफलत्यागव्रत तथा सूर्यवार-व्रतका निरूपण हुआ है॥ १—१४॥
एतद्वः कथितं सर्वं यदुक्तं विश्वरूपिणा।<br>मात्स्यं पुराणमखिलं धर्मकामार्थसाधनम्॥ १<br>यत्रादौ मनुसंवादो ब्रह्माण्डकथनं तथा।<br>सांख्यं शारीरकं प्रोक्तं चतुर्मुखमुखोद्भवम्॥ २<br>देवासुराणामुत्पत्तिर्मारुतोत्पत्तिरेव च।<br>मदनद्वादशी तद्वल्लोकपालाभिपूजनम्॥ ३<br>मन्वन्तराणामुद्देशो वैन्यराजाभिवर्णनम्।<br>सूर्यवैवस्वतोत्पत्तिर्बुधसङ्गमनं तथा॥ ४<br>पितृवंशानुकथनं श्राद्धकालस्तथैव च।<br>पितृतीर्थप्रवासश्च सोमोत्पत्तिस्तथैव च॥ ५<br>कीर्तनं सोमवंशस्य ययातिचरितं तथा।<br>कार्तवीर्यस्य माहात्म्यं वृष्णिवंशानुकीर्तनम्॥ ६<br>भृगुशापस्तथा विष्णोर्दैत्यशापस्तथैव च।<br>कीर्तनं पुरुषेशस्य वंशो हौताशनस्तथा॥ ७<br>पुराणकीर्तनं तद्वत् क्रियायोगस्तथैव च।<br>व्रतं नक्षत्रसंख्याकं मार्तण्डशयनं तथा॥ ८<br>कृष्णाष्टमीव्रतं तद्वद् रोहिणीचन्द्रसंज्ञितम्।<br>तडागविधिमाहात्म्यं पादपोत्सर्ग एव च॥ ९<br>सौभाग्यशयनं तद्वदगस्त्यव्रतमेव च।<br>तथानन्ततृतीया तु रसकल्याणिनी तथा॥ १०<br>आर्द्रानन्दकरी तद्वद् व्रतं सारस्वतं पुनः।<br>उपरागाभिषेकश्च सप्तमीस्नपनं पुनः॥ ११<br>भीमाख्या द्वादशी तद्वदनङ्गशयनं तथा।<br>अशून्यशयनं तद्वत् तथैवाङ्गारकव्रतम्॥ १२<br>सप्तमीसप्तकं तद्वद् विशोकद्वादशी तथा।<br>मेरुप्रदानं दशधा ग्रहशान्तिस्तथैव च॥ १३<br>ग्रहस्वरूपकथनं तथा शिवचतुर्दशी।<br>तथा सर्वफलत्यागः सूर्यवारव्रतं तथा॥ १४

* अध्याय २९१ *

१०८३


| संक्रान्तिस्नपनं तद्वद् विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>षष्टिव्रतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रमः॥ १५<br>प्रयागस्य तु माहात्म्यं सर्वतीर्थानुकीर्तनम्।<br>ऐलाश्रमव्रतं तद्वद् द्वीपलोकानुकीर्तनम्॥ १६<br>सूर्यचन्द्रगतिस्तद्वदादित्यरथवर्णनम् ।<br>तथान्तरिक्षचारश्च ध्रुवमाहात्म्यमेव च॥ १७<br>भुवनानि सुरेन्द्राणां त्रिपुराघोषणं तथा।<br>पितृपिण्डदमाहात्म्यं मन्वन्तरविनिर्णयः॥ १८<br>वज्राङ्गस्य तु सम्भूतिस्तारकोत्पत्तिरेव च।<br>तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुमन्त्रणम्॥ १९<br>पार्वतीसम्भवस्तद्वत् तथा शिवतपोवनम्।<br>अनङ्गदेहदाहस्तु रतिशोकस्तथैव च॥ २०<br>गौरीतपोवनं तद्वद् विश्वनाथप्रसादनम्।<br>पार्वतीऋषिसंवादस्तथैवोद्वाहमङ्गलम् ॥ २१<br>कुमारसम्भवस्तद्वत् कुमारविजयस्तथा।<br>तारकस्य वधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम्॥ २२<br>पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवान्धकघातनम्।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च॥ २३<br>प्रवरानुक्रमस्तद्वत् पितृगाथानुकीर्तनम्।<br>तथोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च॥ २४<br>तथा सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च।<br>यात्रानिमित्तकथनं स्वप्नमाङ्गल्यकीर्तनम्॥ २५<br>वामनस्य तु माहात्म्यं तथैवाथ वराहजम्।<br>क्षीरोदमथनं तद्वत् कालकूटाभिशासनम्॥ २६<br>देवासुरविमर्दश्च वास्तुविद्यास्तथैव च।<br>प्रतिमालक्षणं तद्वद् देवताराधनं ततः॥ २७<br>प्रासादलक्षणं तद्वन्मण्डपानां तु लक्षणम्।<br>भविष्यद्राजनिर्देशो महादानानुकीर्तनम्।<br>कल्पानुकीर्तनं तद्वद् ग्रन्थानुक्रमणी तथा॥ २८ | उसी प्रकार संक्रान्तिस्नपनव्रत, विभूतिद्वादशीव्रत, साठ व्रतोंका माहात्म्य, स्नानविधिका क्रम, प्रयागका माहात्म्य, समस्त तीर्थोंका वर्णन, ऐलाश्रमव्रत, द्वीप और लोकोंका कथन, सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन, आदित्यके रथका वर्णन, उसका अन्तरिक्षमें गमन, ध्रुवका माहात्म्य, सुरेन्द्रोंके भुवन, त्रिपुरके प्रति घोषणा, पितरोंके पिण्डदानका माहात्म्य, मन्वन्तरोंका निर्णय, वज्राङ्गकी उत्पत्ति, तारककी उत्पत्ति, तारकासुरकी प्रशंसा, ब्रह्मा और देवताओंकी मन्त्रणा, पार्वतीकी उत्पत्ति, शिवका तपोवन-गमन, कामदेवके शरीरका दाह, रतिका शोक, पार्वतीका तपोवन-गमन, विश्वनाथकी प्रसन्नता, पार्वती और सप्तर्षियोंका संवाद, पार्वतीका विवाहोत्सव, कुमार स्कन्दकी उत्पत्ति, कुमारकी विजय, तारकासुरका भयंकर वध, नरसिंहावतारका वर्णन, पद्मोद्भवका विसर्ग, अन्धकासुरका वध, वाराणसीका माहात्म्य, नर्मदाका माहात्म्य, प्रवरोंका अनुक्रम, पितृगाथाका वर्णन, उभयमुखी दान तथा कृष्णमृगचर्मके दानका वर्णन, सावित्रीका उपाख्यान, राजधर्मका वर्णन, यात्राके निमित्तका कथन, शुभ-अशुभ स्वप्नों और शकुनोंका निरूपण, वामनका माहात्म्य, वराहका माहात्म्य, क्षीरसागरका मन्थन, कालकूटका दमन, देवों और असुरोंका संग्राम, वास्तुविद्याका कथन, प्रतिमाओंके लक्षण, देवताओंकी आराधना, प्रासादोंका लक्षण, मण्डपोंका लक्षण, भविष्यत्कालीन राजाओंका वर्णन, महादानोंका कथन, कल्पोंका वर्णन तथा ग्रन्थोंकी अनुक्रमणिकाका कथन हुआ है॥ १५–२८॥ | | एतत् पवित्रमायुष्यमेतत् कीर्तिविवर्धनम्।<br>एतत् पवित्रं कल्याणं महापापहरं शुभम्॥ २९ | यह पुराण परम पवित्र, आयु प्रदान करनेवाला, कीर्तिवर्धक, परम पावन, कल्याणकारक, बड़े-बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला और मङ्गलमय है। इस पुराणसे मनुष्योंको | | अस्मात् पुराणात् सुकृतं नराणां तीर्थावलीनामवगाहनानाम् ।<br>समस्तधर्माचरणोद्भवानां सदैव लाभश्च महाफलानाम्॥ ३० | सदैव पुण्य तथा समस्त तीर्थोंमें स्नान करने और सम्पूर्ण धर्माचरणसे उत्पन्न हुए महान् फलोंका लाभ प्राप्त होता है। |

१०८४ * मत्स्यपुराण *


एतत् पुराणं परमं सर्वदोषविघातकम्।<br>मत्स्यरूपेण हरिणा कथितं मनवेऽर्णवे॥ ३१<br>अस्मात् पुराणादपि पादमेकं<br>पठेत् तु यः सोऽपि विमुक्तपापः।<br>नारायणस्यास्पदमैति नून-<br>मनङ्गवद् दिव्यवपुः सुखी स्यात्॥ ३२<br>पुराणमेतत् सकलं रहस्यं<br>श्रद्धान्वितः पुण्यमिदं शृणोति।<br>स चाश्वमेधावभृथप्रभावं<br>फलं समाप्नोति हरप्रसादात्॥ ३३<br>शिवं विष्णुं समभ्यर्च्य ब्रह्माणं सदिवाकरम्।<br>श्लोकं श्लोकार्धपादं वा श्रद्धया यः शृणोति वा।<br>श्रावयेद् वापि धर्मज्ञस्तत्फलं शृणुत द्विजाः॥ ३४<br>ब्राह्मणो लभते विद्यां क्षत्रियो लभते महीम्।<br>वैश्यो धनमवाप्नोति सुखं शूद्रस्तु विन्दति॥ ३५<br>आयुष्मान् पुत्रवांश्चैव लक्ष्मीवान् पापवर्जितः।<br>श्रुत्वा पुराणमखिलं शत्रुभिश्चापराजितः॥ ३६यह परमोत्तम पुराण सम्पूर्ण दोषोंका नाशक है। इसे मत्स्यरूपधारी श्रीहरिने प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मनुके प्रति कहा था। जो मनुष्य इस पुराणके एक श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह भी पापोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है तथा कामदेवकी भाँति दिव्य शरीर धारणकर निश्चय ही नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठमें चला जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस पुण्यप्रद एवं रहस्यमय सम्पूर्ण पुराणको सुनता है, वह शंकरजीकी कृपासे अश्वमेध-यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ-स्नानके सदृश प्रभावशाली फलको प्राप्त करता है। द्विजवरो! जो धर्मज्ञ मनुष्य शिव, विष्णु, ब्रह्मा और सूर्यकी अर्चना करके श्रद्धापूर्वक इस पुराणके एक श्लोक, आधे श्लोक अथवा एक चरणको सुनता है अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह ब्राह्मण हो तो विद्या, क्षत्रिय हो तो पृथ्वी, वैश्य हो तो धन और शूद्र हो तो सुख प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पुराण सुननेवाला पापरहित होकर आयुष्मान्, पुत्रवान् और लक्ष्मीवान् हो जाता है तथा उसे शत्रु पराजित नहीं कर सकते॥ २९—३६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽनुक्रमणिका नामैकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनुक्रमणिका नामक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९१॥


पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः।<br>वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः॥ १<br><br>अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि॥ २<br><br>पुराणं ये च सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः।<br>शृण्वन्ति च कथां भक्त्याऽदरिद्राः स्युर्न संशयः॥ ३<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः॥ ४जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न, अन्य कार्योंकी लालसासे रहित, मौन, पवित्र और शान्तचित्तसे (पुराणकी कथाको) श्रवण करते हैं, वे ही पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य भक्तिरहित होकर पुण्यकथाको सुनते हैं, उन्हें पुण्यफल तो मिलता नहीं, उलटे प्रत्येक जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है। जो लोग ताम्बूल, पुष्प, चन्दन आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा पुराणकी भलीभाँति पूजा करके भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे निःसंदेह दरिद्रतारहित अर्थात् धनवान् होते हैं। जो मनुष्य कथा होते समय अन्य कार्यके लिये वहाँसे उठकर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी पत्नी और
* पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म *१०८५

| सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः॥ ५<br><br>ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>श्वविष्ठां खादयन्त्येताननयन्ति यमकिङ्कराः॥ ६<br><br>ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।<br>अक्षय्यनरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः॥ ७<br><br>ये वै वरासनारूढा ये च मध्यासनस्थिताः।<br>शृण्वन्ति सत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः॥ ८<br><br>असम्प्रणम्य शृण्वन्ति विषभक्षा भवन्ति ते।<br>तथा शयानाः शृण्वन्ति भवन्त्यजगरा नराः॥ ९ | सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। जो पापी अधम मनुष्य मस्तकपर पगड़ी बाँधकर (या टोपी लगाकर) पवित्र कथाको सुनते हैं, वे (दूसरे जन्ममें) बगुला होकर उत्पन्न होते हैं। जो लोग पान चबाते हुए पवित्र कथाको सुनते हैं, उन्हें कुत्तेका मल खाना पड़ता है और यमदूत उन्हें यमपुरीमें ले जाते हैं। जो ढोंगी मनुष्य (व्यासासनसे) ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे ही अक्षय नरकोंका भोग करके कौआ होते हैं। जो लोग (व्यासासनसे) श्रेष्ठ आसनपर अथवा मध्यम आसनपर बैठकर उत्तम कथाको श्रवण करते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं। जो मनुष्य (पुराणकी पुस्तक और व्यासको) बिना प्रणाम किये ही कथा सुनते हैं, वे विषभक्षी होते हैं तथा जो लोग सोते हुए कथा सुनते हैं, वे अजगर साँप होते हैं॥ १—९॥ | | यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनसंस्थितः।<br>गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत्॥ १०<br><br>ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वै पापहारिणीम्।<br>ते वै जन्मशतं मर्त्याः सूकराः सम्भवन्ति हि॥ ११<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।<br>ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्तथैव च॥ १२<br><br>कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।<br>ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनसूकराः॥ १३<br><br>ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः।<br>अशृण्वन्तोऽपि ते यान्ति शाश्वतं परमं पदम्॥ १४<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।<br>कोट्यब्दं नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः॥ १५<br><br>ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्।<br>कल्पकोटिशतं सांग्रं तिष्ठन्ति ब्रह्मणः पदे॥ १६<br><br>आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः।<br>कम्बलाजिनवासांसि मञ्चं फलकमेव च॥ १७<br><br>स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।<br>स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्॥ १८ | इसी प्रकार जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरु-शय्या-गमनके समान पापका भागी होकर नरकगामी होता है। जो मनुष्य पुराणोंके ज्ञाता (व्यास) और पापोंको हरण करनेवाली कथाकी निन्दा करते हैं, वे सौ जन्मोंतक सूकर-योनिमें उत्पन्न होते हैं। कथा होते समय जो लोग वक्ताको बुरा उत्तर देते हैं, वे गदहा तथा गिरगिटकी योनिमें पैदा होते हैं। जो मनुष्य इस पुण्य कथाको कभी भी नहीं सुनते, वे घोर नरकोंका भोग करके बनैले सूअर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ कही जाती हुई कथाका अनुमोदन करते हैं, वे कथा न सुननेपर भी अविनाशी परम पदको प्राप्त होते हैं। जो दुष्ट कही जाती हुई कथामें विघ्न पैदा करते हैं, वे करोड़ों वर्षोतक नरकोंका भोग करके अन्तमें ग्रामीण सूअर होते हैं। जो लोग साधारण मनुष्योंको पुराणसम्बन्धिनी पुण्य कथा सुनाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक ब्रह्मलोकमें निवास करते हैं। जो मनुष्य पुराणके ज्ञाता वक्ताको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, सिंहासन और चौकी प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर अभीष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास कर अन्तमें निरामय पदको प्राप्त होते हैं॥ १०—१८॥ | | पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये वरासनमुत्तमम्।<br>भोगिनो ज्ञानसम्पन्ना भवन्ति च भवे भवे॥ १९ | इसी तरह जो लोग पुराणकी पुस्तकके लिये उत्तम श्रेष्ठ आसन प्रदान करते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगोंका उपभोग करनेवाले एवं ज्ञानी होते हैं। |

१०८६ * मत्स्यपुराण *


ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये।<br>पुराणश्रवणादेव ते प्रयान्ति परं पदम्॥ २०<br>एवंविधविधानेन पुराणं शृणुयान्नरः।<br>भुक्त्वा भोगान् यथाकामं विष्णुलोकं प्रयाति सः॥ २१<br>पुस्तकं पूजयेत् पश्चाद् वस्त्रालङ्करणादिभिः।<br>वाचकं विप्रसंयुक्तं पूजयीत प्रयत्नवान्॥ २२<br>गोभूमिहेमवस्त्राणि वाचकाय निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चान्मण्डलड्डुकपायसैः॥ २३<br>त्वं व्यासरूपी भगवन् बुद्ध्या चाङ्गिरसोपमः।<br>पुण्यवाञ्शीलसम्पन्नः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ २४<br>प्रसन्नमानसं कुर्याद् दानमानोपचारतः।<br>त्वत्प्रसादादिमान् धर्मान् सम्पूर्णाञ्श्रुतवानहम्॥ २५<br>एवं प्रार्थनकं कृत्वा व्यासस्य परमात्मनः।<br>यशस्वी च भवेन्नित्यं यः कुर्याद्देवमादरात्॥ २६<br>नारदोक्तानिमान् धर्मान् यः कुर्यान्नियतेन्द्रियः।<br>कृत्स्नं फलमवाप्नोति पुराणश्रवणस्य वै॥ २७जो महापातकोंसे युक्त होते हैं अथवा जो उपपातकी होते हैं, वे सभी पुराणकी कथा सुननेसे ही परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य इस प्रकारके नियम-विधानसे पुराणकी कथा सुनता है, वह स्वेच्छानुसार भोगोंको भोगकर विष्णुलोकको चला जाता है। कथा समाप्त होनेपर श्रोता पुरुष प्रयत्नपूर्वक वस्त्र और अलंकार आदिद्वारा पुस्तककी पूजा करे। तत्पश्चात् सहायक ब्राह्मणसहित वाचककी पूजा करे। उस समय वाचकको गौ, पृथ्वी, सोना और वस्त्र देना चाहिये। तदुपरान्त ब्राह्मणोंको मलाई, लड्डू और खीरका भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर परमात्मा व्याससे प्रार्थना करे—'आप व्यासरूपी भगवान्! बुद्धिमें बृहस्पतिके समान, पुण्यवान्, शीलसम्पन्न, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं, आपकी कृपासे मैंने इन सम्पूर्ण धर्मोंको सुना है।' इस प्रकार प्रार्थना कर दान, मान और सेवासे उनके मनको प्रसन्न करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकार आदरपूर्वक करता है, वह सदा यशस्वी होता है। जो जितेन्द्रिय मनुष्य देवर्षि नारदद्वारा कहे गये इन धर्मोंका पालन करता है, वह पुराण-श्रवणका सम्पूर्ण फल पाता है॥ १९—२७॥
सूत उवाच<br>मत्स्यरूपी स भगवान् मनवे बुद्धिशालिने।<br>अवापोद्घातसहितमुक्त्वा ह्यन्तर्दधौ तदा॥ २८॥**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उस समय मत्स्यरूपी भगवान् बुद्धिशाली मनुसे आदि-अन्त-सहित इस पुराणको कहकर अन्तर्हित हो गये॥ २८॥

इति पुराणश्रवणकालीनधर्माः।

इति श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीतं मत्स्यपुराणं समाप्तम्।
इस प्रकार श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीत मत्स्यपुराण समाप्त हुआ॥

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य

श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित ( कोड 26, 27 ) ग्रन्थाकार—श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। पत्राकारकी तरह बेड़िया ( कोड 1951, 1552 ) सचित्र, सजिल्द, ( कोड 1552, 1553 ) गुजराती, ( कोड 1678, 1735 ) सानुवाद, मराठी, ( कोड 1739, 1740 ), कन्नड़, ( कोड 1577, 1744 ) बँगला, ( कोड 1966, 1967, 1968 ) तमिल, ( कोड 1831, 1832 ) ओड़िआ, ( कोड 1975, 1976 ) तेलुगु, ( कोड 564, 565 ) अंग्रेजी-अनुवाद, ( कोड 25 ) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, ( कोड 1945 ) ( वि० सं०) केवल हिन्दी ( कोड 1930 ) केवल हिन्दी, ( कोड 1608 ) केवल गुजराती, ( कोड 29 ) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार ( कोड 1573 ) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार ( कोड 124 ) मूल मझला आकार, ( कोड 1855 ) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी।

संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप ( कोड 789 ) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण ( कोड 1468 ) हिन्दी एवं ( कोड 1286 ) गुजरातीमें भी उपलब्ध।

संक्षिप्त पद्मपुराण ( कोड 44 ) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण ( कोड 539 ) ग्रन्थाकार—भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित ( कोड 48 ) ग्रन्थाकार—इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द ( कोड 1364 ) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध।

संक्षिप्त नारदपुराण ( कोड 1183 ) ग्रन्थाकार—इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त स्कन्दपुराण ( कोड 279 ) ग्रन्थाकार—यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण ( कोड 1111 ) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त गरुडपुराण—( कोड 1189 ) ग्रन्थाकार—इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त भविष्यपुराण—( कोड 584 ) ग्रन्थाकार—यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त श्रीवराहपुराण (कोड 1361) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ-साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण (कोड 631) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें चार खण्ड हैं—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका विस्तृत वर्णन, अनेक रोचक एवं रहस्यमयी कथाएँ, श्रीराधाकी गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

वामनपुराण, अनुवादसहित (कोड 1432) ग्रन्थाकार— यह पुराण मुख्यरूपसे त्रिविक्रम भगवान् विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है। इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण, भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ-साथ भक्त प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

अग्निपुराण, केवल हिन्दी-अनुवाद (कोड 1362) ग्रन्थाकार— इसमें परा-अपरा विद्याओंका वर्णन, महाभारतके सभी पर्वोंकी संक्षिप्त कथा, रामायणकी संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारोंकी कथाएँ, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओंके मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

मत्स्यमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 557)— यह पुराण मत्स्यावतारके रूपमें भगवान् विष्णुकी लीलाओंका सुन्दर परिचायक है। इसमें मत्स्यावतारकी कथा, सृष्टि-वर्णन, मन्वन्तर तथा पितृवंश-वर्णन, ययाति-चरित्र, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुन-शास्त्र आदि अनेक विषयोंका सरल वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

कूर्मपुराण, अनुवादसहित (कोड 1131)— इस पुराणमें भगवान्‌के कूर्मावतारकी कथाके साथ-साथ सृष्टि वर्णन, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन, युगधर्म, मोक्षके साधन, तीर्थ-माहात्म्य, २८ व्यासोंकी कथाएँ, ईश्वर-गीता, व्यास-गीता आदि विविध विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न दृष्टियोंसे इस पुराणका पठन-पाठन सबके लिये कल्याणकारी है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत-मोटा टाइप (कोड 1133) ग्रन्थाकार— यह पुराण परम पवित्र वेदकी प्रसिद्ध श्रुतियोंके अर्थसे अनुमोदित, अखिल शास्त्रोंके रहस्यका स्रोत तथा आगमोंमें अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है। यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणोंसे पूर्ण है। पराम्बा भगवतीके पवित्र आख्यानोंसे युक्त इस पुराणका पठन-पाठन तथा अनुष्ठान भक्तोंके त्रितापोंका शमन करनेवाला तथा सिद्धियोंका प्रदाता है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1897, 1898) अनुवादसहित (कोड 1326) गुजराती।

नरसिंहपुराण, अनुवादसहित (कोड 1113) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें दशावतारकी कथाएँ एवं सात काण्डोंमें भगवान् श्रीरामके पावन चरित्रके साथ-साथ सदाचार, राजनीति, वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, योग-साधना आदिका सुन्दर विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान् नरसिंहकी विस्तृत महिमा, अनेक कल्याणप्रद उपाख्यानोंका वर्णन, भौगोलिक वर्णन, सूर्य-चन्द्रादिसे उत्पन्न राजवंशोंका वर्णन तथा अनेक स्तुतियोंका उल्लेख है। सचित्र, सजिल्द।

महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण, अनुवादसहित (कोड 38) ग्रन्थाकार— हरिवंशपुराण वेदार्थ-प्रकाशक महाभारत ग्रन्थका अन्तिम पर्व है। पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंशपुराणके श्रवणकी परम्परा भारतवर्षमें चिरकालसे प्रचलित है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्धित अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। धार्मिक जन-सामान्यके कल्याणार्थ इसके अन्तमें सन्तानगोपाल-मन्त्र, अनुष्ठान-विधि, सन्तान-गोपाल-यन्त्र तथा संतान-गोपालस्तोत्र भी संगृहीत हैं। सचित्र, सजिल्द। (कोड 1589) केवल हिन्दीमें भी।

महाभागवत [देवीपुराण], अनुवादसहित (कोड 1610) ग्रन्थाकार— इस पुराणमें मुख्य रूपसे भगवती महाशक्तिके माहात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रोंका विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल प्रकृति भगवतीके गङ्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, तुलसी आदि रूपोंमें विवर्तित होनेके मनोरम आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

लिङ्गमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 1985) संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी टीका— यह पुराण भगवान् शिवकी उपासना एवं महिमाका विस्तृत परिचायक है। इसमें शैवदर्शन, पाशुपतयोग, लिङ्ग-स्वरूप, लिङ्ग-माहात्म्य, लिङ्गार्चन एवं योगाचार्यों तथा शिव भक्तोंकी कथाओंका सरस वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।