मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
२९८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, जोगिया दरस दीजो राज, बाँह गह्मां की लाज। लोक लाज बिसारि डारिस, छाँड्यो जग उपदेस। विरह अगिन मे प्राणि दाझै, सुणि लिज्यो आदेस। पाँच मुद्रा भाव कथा, नष सिष साजे साज। जोगिण होय जग ढूँढसूँ, म्हारी घर घर फेरी आज। दरद दिवानी'तन जाणि आपनी, मिलिया राम दयाल। मीराँ के मन आनन्द उपज्यौ, रोम रोम खुसियाल।† दोनो ही पाठो मे अन्तिम दोनो पक्तियाँ मिलन और आनन्द को ही अभिव्यक्त करती है, जब शेष सम्पूर्ण पद से वियोग और प्रतीक्षा के साथ ही साथ जोगी द्वारा प्रदर्शित अवहेलना के प्रति एक गहरी शिकायत भी लक्षित होती है। शिकायत की यह अभिव्यक्ति नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो की विशेषता है। ८ तेरो मरम नहि पायो रे जोगी। आसण माँडि गुफा मे बैठ्यो, ध्यान हरि को लगायो । गल बीच सेली, हाथ हॉजरियो, अग भभूत रमायो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, भाग लिख्यो सो ही पायो ।।५४०।। ९ कोई दिन याद करोगे, रमता राम अतीत । आसण माँडि अडिग होय बैठ्या, याही भजन की रीत। मै तो जाणू जोगी सग चलेगा, छोड़ि गया अधबीच। आत न दीसे, जात न दीसे, जोगी किस का मीत। मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, चरण न आवै चीत ।।५४१।। पद की प्रथम पंक्ति की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। इस पद और पद सं० ८ की द्वितीय पंक्ति का भाव और भाषा- साम्य विचारणीय है। इस पद की द्वितीय पंक्ति की अभिव्यक्ति "याही भजन की रीत" मे आराध्य के प्रति बड़ा मार्मिक व्यग है।
नाथ-प्रभाव द्योतक पद २६६ १० धूतारा जोगी एकर सूं हँसि बोल । जगत बदीत करी मनमोहना, कहा बजावत ढोल । अग भभूति गले मृगछाला, तू जन गुढिया खोल । सदन सरोज बदन की सोभा, ऊभी जोऊँ कपोल । सेली नाद बभूत न बटवो, अजूं मुनि मुख खोल । चढती बैस¹ नैण अनियाले², तू घूरि घरि मत डोल । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी,चेरी भई बिन मोल ॥५४२॥ ११ धूतारा जोगी एक बेरिया मुख बोल रे । कान कुडल गल बीच सेली, अवतेरी मुनि मुख खोल रे । रास रच्यो बसी बट जमुना, ता दिन कीनी कोल रे । पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका,अधबिच पड गयो झोल रे । जगत बदी ते तुम करो मोहन, अब क्यूँ बजाओ ढोल रे । तेरे कारण सब जग त्याग्यो, अब मोहैं कर सो लोल रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चैरी भई बिन मोल रे ॥५४३॥† उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्तियो मे गहरा साम्य हैं। द्वितीय पद की अभिव्यक्ति कही कही असगत और अर्थहीन हैं। प्रथम पद पर नाथ-परम्परा का विशेष प्रभाव है और दूसरे पद पर वैष्णव-परम्परा का गहरा प्रभाव है। प्रथम पद मे तो आराध्य “धूतारा जोगी” से “एकर सूं हँसि बोल” की प्रार्थना है और एतदर्थ प्रयास भी है और द्वितीय पद मे पूर्व जन्म के ‘कोल’ की याद दिलाई जा रही है। “पूरब जनम की मैं हूँ गोपिका” जैसी अभिव्यक्ति वैष्णव-प्रभाव द्योतक अन्य पदो में भी मिलती है।* इस पद की भाषा पर भी खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। १ वयस, २ तीखे ।
- देखे, मीराँ, एक अध्ययन,
३०० मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह उपर्युक्त परिस्थिति मे प्रथम पद ही .प्रामाणिकता के अधिक निकट पडता प्रतीत होता है । अभिव्यक्ति के आधार पर यह पद विशेष .विचारणीय है । १.२ जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी । ससा सोक अंग नहि त्रिसना, दुबध्या¹ सब ही त्यागी । मोर मुगट पीताम्बर सोहैं, स्याम बरन बडभागी । जनम जनम को साहिब म्हाँरो, वाही सो लौ लागी । अपणा पिव सो हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अब मै भई सुभागी॥५४४॥† पाठान्तर १, जोगियो आणि मिल्यो अनुरागी । ससय सोक अग नहि त्रिसना, दुबध्या सब ही त्यागी । मोर मुकुट पिताम्बर सोहै, स्याम बरन बड भागी । जनम जनम को मित्र हमारो, अधर सुधारस पागी । अपणा पिय सूँ हिलमिल खेलाँ, हरि दरशन अनुरागी । मीराँ तो गिरधर मनमानी, अब तो भई है सुभागी ।† नाथ प्रभाव द्योतक सम्पूर्ण पदो मे यही एक ऐसा पद है जिसमे मिलन और तद्जन्य आनन्द की अभिव्यक्ति हुई है । इस पद की एक और विशेषता भी है । अन्य सभी नाथ प्रभाव द्योतक पदो मे आराध्य की वेशभूषा का वर्णन नाथ-परम्परानुसार सुसज्जित जोगी के अनुकूल ही है, परन्तु यहाँ आराध्य का वर्णन वैष्णव-परम्परानुकूल है । उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ के आराध्य 'जोगी' 'मोर मुकुट पीताम्बर' ही धारण किए हुए है । द्वितीय पाठान्तर पर ब्रजभाषा का कुछ विशेष प्रभाव स्पष्ट है । पद विशेष रूपेण विचारणीय है । १ दुविधा ।
नाथ-प्रभाव द्योतक पद ३०१ मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ आपणा गिरधर के कारणे, (वा) मीराँ बैरागण हो गई रे । जब ते सिर पर जटा रखाई, नैणा नीद गई रे । दड कमंडल और गूदड़ी, सिर पर धार लई रे । छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लिई रे । दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ॥५४५॥† पाठान्तर १, आपणा गिरधर कै कारणै, मीराँ वैरागण भई रे । सिर पर जटा बधाई, नैणा नीद गई रे । दड कमडल और गूदडी, सिर पर धार लई रे । छापा तिलक बनाये छवि सो, माला हात लई रे । दोऊ कुल छोड़ि भई वैरागण, हरि सो टेर दई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण भई रे ।† पाठान्तर २, अपणै प्रीतम के कारणै, मीराँ वैरागण भई रे । जब तै सीस पै जटा रखाई, नैणा नीद गई रे । दोऊ कुल छाँड भई वैरागण, हरि सो टेर देई रे । छापा तिलक तुलसी की माला, कुल की लाज गई रे । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।† पाठान्तर ३, अपने प्रीतम के कारणै, वा मीराँ वैरागन हो गईं रे । जब से सिर पर जटा बिठाई, नैनन नीद गई रे ।
३०२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह दोऊ कुल छोड़ चली वृन्दावन, हरि को टेर गई रे । छापा तिलक माल गल तुलसी, कुल की लाज गई रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।† उपर्युक्त तीनो पाठो मे गेय परम्परा के कारण पडा हलका हेर- फेर स्पष्ट हो उठता है । सभी पाठो मे मीराँ के प्रति किसी अन्य की ही उक्ति स्पष्ट हो उठती है । साथ ही एक और अभिव्यक्ति भी विचार- णीय है । वैराग ण मीराँ की वेशभूषा मे नाथ और वैष्णव, दोनो ही परम्परा का समन्वय है, जैसा कि किसी भी अन्य पद मे नही है । शुद्ध राजस्थानी मे प्राप्त ऐसे पदो मे भी एक पद (स० ६) ऐसा मिलता है जिसमे मीराँ के आराध्य जोगी की वेश भूषा वैष्णव-परम्परानुसार ही है । उक्त पद के द्वितीय पाठ पर ब्रजभाषा का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव भी है । उपर्युक्त दोनो ही पद विशेष विचारणीय है । २ ऐसी लगन लगाय कहाँ तू जासी । तुम देख्या बिन कल न पडत है, तलफ तलफ जिय जासी । तेरे खातर जोगण हूँगी, करवत लूँगी कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल की दासी ।।५४६।। पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव स्पष्ट है । ३ माईं १ म्हांनै रमइयो है दे गयो भेष१ । हम जाने हरि परम सनेही, पूरब जनम को लेष । अग बिभूत गले मृगछाला, घर घर जपत अलेय । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, रामजी मिलन की टेक ।।५४७।।† इस पद पर भी वैष्णव और नाथ दोनो ही परम्पराओ का प्रभाव स्पष्ट है । "घर घर अलख जगाय" जैसी अभिव्यक्ति नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो मे प्राप्त है, परन्तु "घर घर जपत अलेष" जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है । द्वितीय पक्ति मे प्रयुक्त "लेष" के स्थान पर "पेष" का भी प्रयोग मिलता है । १ वेश ।
नाथ-प्रभाव द्योतक पद ३०३ ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ जोगिया मेरे तेरी । मनसा वाचा करमणा, प्रभु, पुरवौ मेरी । मै पतिवरत पीव की, हो मोल लयी चेरी । तुम बिन कोई दूजो देवा, सुपनै नहि हेरीं । माता पिता सुत बधु द्वारा, औँ पाँव मे बेरी । तुम बिन कोऊ नाही मेरो, प्रगट कहूँ टेरी । एक बिरियाँ१ मेरे नगर, दे जावो फेरी । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, राखो चरण मेरी ॥५४८॥ २ जोगिया री सूरत मन मे बसी । नित प्रति ध्यान धरत हूँ दिल मे, निसि दिन होत कुसी । कहा करूँ, कित जाऊँ मोरी सजनी, मानो सरप डसी । मीराँ कहै प्रभु कबर मिलोगे, प्रीति रसीली बसी ॥५४९॥ ३ जोगिया जी, तू कब रे मिलोगे आई । तेरे ही कारण जोग लियो है, घर घर अलख जगाई । दिवस न भूख, रैण नही निद्रा, तुम बिन कछु न सुहाई । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल कर तपत बुझाई ॥५५०॥ ४ जोगिया से प्रीत किया दुख होई । प्रीत कियाँ सुख न मोरी सजनी, जोगी मीत न कोई । राति दिवस कल नाहि परत है, तुम मिलिया बिन मोइ । १ बार।
३०४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ऐसी सूरत या जग माहि, फेरि न देखी सोई। मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, मिलिया आणन्द होई ॥५५१॥ ५ जोगी मत जा, मत जा, पाँव परूँ मै तेरी। प्रेम भक्ति को पैडो ही न्यारो, हम कूँ गैल बता जा। अगर चन्दन की चिता रचाऊँ, अपने हाथ जला जा। जल बल भई भस्म की ढेरी, अपने अग लगा जा। मीराँ कहै प्रभुगिरिधर नागर, जोत मे जोत मिला जा ॥५५२॥ उपर्युक्त सभी पदो मे प्रयुक्त क्रिया पदो पर आधुनिक प्रभाव विशेष विचारणीय है। गुजराती में प्राप्त पद १ मै ने सारा जगल ढूँढा रे, जोगिडा ना पाया। काना बिच कुण्डल, जोगी गले बिच सेली, घर घर अलख जगाये रे। अगर चन्दन की धुनी, जोगी, धकाई, अंग बीच भभूत लगाये रे। बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सबद का ध्यान लगाये रे। ॥५५३॥† उपर्युक्त पद गुजराती पद सग्रहो मे ही प्राप्त है, यद्यपि पद की भाषा पर गुजराती का कोई विशेष प्रभाव नही प्रतीत होता। इस पद से व्यक्त होनेवाली भावनाये नाथ-प्रभाव द्योतक प्रायः अन्य पदो मे भी मिल जाती हैं। २ मलवो¹ जटाधारी जोगेश्वर बाबा, मल्यो² रे जयधारी। हाथ माँ झारी हूं तो बाल कुँवारी, वाला, देवल³ पूजवाने चाली। १ मिलो, २ मिल गया, ३ मन्दिर।
नाथ-प्रभाव द्योतक पद ३०५ साड़ी फाड़ी ने कफनी कीधी, वाला, अंग पर विभूति लगाडी । आसण बाली बालो मढ़ी माँ बैठो, वाला घेर घेर¹ अलख जगाड़ी ! मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, प्रेम नी कटारी मुने मारी ॥५५४॥ उपर्युक्त की पद प्रथम पंक्ति में 'मलवो' और 'मल्यो' दोनो ही शब्दों का प्रयोग हुआ है। अर्थ संगति के दृष्टिकोण से यह अशुद्ध है। सम्पूर्ण पदाभिव्यक्ति के देखते 'मलवो के बदले 'मल्यो' प्रयोग ही शुद्ध प्रतीत होता है। “घेर घेर अलख जगाडी” जैसी भावना नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो की विशेषता है। ३ उठ तो चाले अवधूत, मरी माँ कोई ना बिराजे, उठ चले अवधूत । पथी हतो² ते पथे लाग्यो, आसन पड़ रही विभूत । चेलो साथी कोई ना सूधर्यो, सब ही नीबड़या³ कपूत । बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, टूट तो गए घर सूत ॥५५५। यह पद अपनी तरह का एक ही है। पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। • १ घर, २ था, ३ निकले । २०
संतमत-प्रभाव द्योतक पद राजस्थानी में प्राप्त पद १ ग्यान कूं बाण वसी हो, म्हाँराँ सतगरु जी हो। बखतर फूटी हिय, भीतर चालि खुसी। बाहरि घाव दीसत नही कोई, उरि बीच पूरि खसी। तन तरवारि भालिका भालका, सबदी की बरछी धसी। राम दिवानी मै तो पलक न बीसारूँ, जणि' र करावो (जगमे) हँसी, ॥५५६॥† पदाभिव्यक्ति मे असंगति है। साथ ही पदाभिव्यक्ति से यह भी नही आभासित होता कि पद मीराँ रचित ही है। २ बड़े घर ताली लागी रे, म्हाँराँ मन री डनारथ भागी रे। छीलरिये म्हाँरो चित्त नही रे, डाबरिये कुण जाब। गगा जमुना सो काम नही रे, मै तो जाय मिलूँ दरियाव। हाल्या मोल्याँ सूं काम नही रे, सीख नही सरदार। कामदाराँ सूं काम नही रे, लोहा चढे सिर भार। कामदाराँ सूं काम नही रे, मै तो जवाब करूँ दरबार। काचा कथीर सूं काम नही रे, म्हाँरो हीरा को व्योपार। सोना रूपाँ सूं काम नही रे, लोहा चढे सिर भार। भाग हमारो जागियो रे, भयो समद सूं सीर। अमृत प्याला छाडि के, कुण पीवै कडवो नींर। पापी कूं प्रभु परचो दियो, दियो रे खजानो पूर। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, धणी मिल्या छै हजूर ॥५५७॥†
३०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह उपर्युक्त पद राजस्थान के जन-प्रिय भजनो की लय पर है। भावाभिव्यक्ति मे अर्थ-सगति नही है। ३ चालो अगम के देस, काल देखत डरै। वहाँ भरा प्रेम का हौज, हसा केल्योँ¹ करै। ओढण लज्जा चीर, धीरज को घाघरो। छिमता कॉकण हाथ, सुमति को मून्दरो। दिल दुलडी दरियाव, साँच को दोवडो। उबटन गुरु को ज्ञान, ध्यान को धोवणो। कान अखोटा ज्ञान, जुगत को झूठणो। बेसर हरि को नाम, चूड़ो चित उजलो। जोहर सील सतोष, निरत को घूघरो। विदली गज अरू हार, तिलक गुरु ग्यान को। साज सोलह सिणगार, पहिर सोने राखड़ी। साँवलियाँ सूं प्रीति, औराँ सूं आखडी। पतिबरता की सेज प्रभु जी पधारिया। गावै मीराँ बाई दासी कर राखिया ।।५५८।।† इस तरह के गीत राजस्थान मे कीर्तन मडलियो मे विशेष रूप से प्रचलित हैं। पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। उपर्युक्त दोनो पदो की भाषा आधुनिक राजस्थानी कही जा सकती है। ४ राम नाम मेरे मन बसियो, राम रसियो रिझाऊँ, ए माय। मंद भागिण करम अभागिन, कीरत कैसे गाऊँ, ए माय। बिरह पिजर की बाड सखी री, उठ कर जी हुलसाऊँ, ए माय। मन कूँ मारि सजूँ सतगरु सूं, दुरमत दूर गमाऊँ, ए माय। १ केलि, २ प्रसन्न करूँ।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३०६ डाको नाम सुरत की डोरी, कड़ियाँ प्रेम चढाऊँ, ए माय । ज्ञान को ढोल बन्यो अति भारी, मगन होय गुण गाऊँ, ए माय । तन करूँ ताल मन करूँ मोरचंग सोती सुरत जगाऊँ, ए माय । नीरतं करूँ, मै प्रीतम आगे, तौ अमरापुर पाऊँ, ए माय । मो अबला पर किरपा कीज्यो, गुण गोविन्द को गाऊँ, ए माय । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रज चरणा की पाऊँ, ए माय ।। ५५९ ।। पाठान्तर १, रसियो राम रिझाऊँ ए माइ, राम नाम मेरे मन बसियो । बिरहै पीड की बात सखी री, काँसूँ कहूँ समझाई । तन करि ताल र मन करि मिरदग, सुणतहि सुरति जगाऊँ ए माई । सील सिगार साज तन ऊपर, प्रभु के सनमुख जाऊँ, ए माई । लोक लाज कुल सक निवारी, राम जी मिल्या सुख पाऊँ ए माई । मीराँ के प्रभु तुमरे मिलन कूँ, चरण कमल बलि जाऊँ ए माई । ५ म्हाँरो जनम मरण रो साथी, थाँ ने नही बिसरूँ दिन राती । तुम देख्याँ बिन कल न पडत है, जानत मेरी छाती । ऊँची चढ चढ पंथ निहारुँ, रोय रोय अंखियाँ राती । यो ससार सकल जग झूठो, झूठा कुल रा न्याती । दोऊकर जोडया अरज करत हूं, सुण लीज्यो मेरी बाती । यो मन मेरो बड़ो हरामी, ज्यूँ मदमातो हाथी । सदगुरु हस्त धर्यो सिर ऊपर, अकुस दे समझाती । पल पल तेरा रुप निहारुँ, निरख निरख सुख पाती । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा चित राती ।।५६०।। उपर्युक्त पद मे विभिन्न भावनाओ का समावेश हुआ है । वियोग, निर्वेद और मिलन तीनो भावनाओ की क्रमश अभिव्यक्ति हुई है । अतु. पूर्वापर सबंध मे असम्बद्धता आ गई है । “म्हाँरो” जनम
३१० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह मरण रो साथी··रोय रोय अखियाँ. राती,~" से वियोग, “यो ससार · दे समझाती” से निर्वेद और अन्तिम दो पक्तियो से मिलन- जनित आनन्द ही व्यक्त होता है । ६ मिलता जाज्यो हो गुरु ज्ञानी, थॉरी सूरत देखि लुभानी । मेरो नाम बूझि तुम लीज्यो, मै हूँ बिरह दिवानी । रात दिवस कल नाहि परत है, जैसे मीन बिन पानी । दरस बिना मोहि कछु ना सुहावै, तलफ तलफ मर जानी । मीराँ तो चरणन की चेरी, सुण लीजै सुख दानी ॥५६१॥ प्रथम पक्ति मे 'हो गुरु ग्यानी' के बदले कही कही 'हो जी गुमानी' पाठ भी मिलता है। चन्द्रसखी के नाम पर प्रचलित निम्ना- कित पद की और इस उपर्युक्त पद की प्रथम पक्तियो मे भाव और भाषा का गहरा साम्य है, यद्यपि शेष पदाभिव्यक्ति सर्वथा भिन्न पडती है। मिलता जाज्यो राज गुमानी, थॉरी सूरत देख लुभानी । म्हाँरो नाम थे जाणो बूझो, मै हूँ राम दिवानी । आमी सामी¹ पोल² नन्द की, चन्दन चोक निसानी । थे म्हॉरे घर आवो बसी वाला, करस्याँ बहुत लडानी³ । करु रसोई सोध⁴ की जी, भोत करुँ मिजमानी । थे आवो हरि धेन चरावण, मै जल जाना पाणी । थे नन्द जी का लाल कॅहावो, मै गोपी मस्तानी । ज़मना जी के नीराँ तीराँ, थे हरि धेन चराज्यो । चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, नित बरसाणे आज्यो । चन्द्रसखी के नाम पर प्रचलित इस पद मे पुनरुक्ति और अर्थ- असम्बद्धता दोनों ही दोष हैं, जो मीराँ के नाम पर प्रचलित पद मे नही है। अत. बहुत सम्भव प्रतीत होता है कि मीराँ का पद ही गेय परम्परा फलस्वरूप चन्द्रसखी के नाम पर चल पडा हो । १ आमने सामने, २ सदर दरवाजा, ३ खातिरदारी, ४ शुद्धता ।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३११ ७ आज्यो आज्यो गोविन्द म्हॉरे म्हैल, निहारॉ थॉरी वाटडली खंडीजी। म्हॉरे आज्यो। तन का त्यागू कपडा जीँ, अग ते परभात, खडी जोवती राह मे जी, सतगरु पोछे दाता आय। पियालो लियाँ हाजर खडी जी पन। साधु हमारी आतमा जी, हम साधन की देह, रोम शोम मे रम रही जी, ज्यूँ बादल मे मेह। सुरत हरि नाम से लगी जी। मीराँ हरि लाडली जी, तुम मीराँ के स्याम, मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दरसण द्यो गोविन्दा आय। सुरत निज नाम से लगी जी ॥५६२॥† ८ आवो आवो जी रग भीना, म्हॉरे म्हैल, प्याला तो लियाँ हाजर खडी सत जुग मे सूती रही, त्रेता लई जगाय। द्वापर मे समझी नही, कलजुग पोहँच्यो आय। सत्तगरु शब्द उचारिया जी, बिनती करो सुनाय। मीराँ नै गिरधर मिल्याँ जी, निरभै मगल गाय ॥५६३॥ † उपर्युक्त दोनो पदो मे अर्थ-सगति नही है। ९ राणा जी गिरधर रा गुण गास्याँ। गुर परताप साध की संगति, सहजै ही तिर जास्याँ। म्हॉरे तो पण चरणामृत को, निति उठि देवल जास्याँ। कथा करितण सुख निसि बासर, महाप्रसाद ले धास्याँ। सुनि सुनि बचन साधरा, मुषरा निरत कराँ और नाचाँ।
३१२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह प्रेम प्रतीति जाय निसी बासर, बहुरि न भो¹ जल आस्याँ । लोक वेद की काण न मानूँ, राम तणै रग राँचौँ । नाँव अमोलिक² इमरित रूपी, सिर कै साटै लास्याँ । उमड़ भायो म्हॉरे ऊपर, 'विषूरो प्यालो धरयाँ । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पीवत मन डुलास्याँ ॥५६४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। सत और वैष्णव दोनो ही मतो का प्रभाव समान रूपेण लक्षित हो उठता है । १० सतगुरु म्हॉरी प्रीत निभाज्यो जी । थे छो म्हॉरों गुण रा सागर, जोगण म्हॉरो मति जाज्यो जी । लोक न धीजै³, म्हॉरो मर्न न पतीजै⁴, मुखडारा सबद सुणाज्यो जी । म्हे तो दासी जनम जनम की, म्हॉरे ऑगणि रमता आज्यो जी । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेडा पार लगाज्यो जी ॥५६५॥† ११ पीया की खुमार, मै तो बावरी भई ये माय । अमल न खायो आयो मोकूँ, यो इचरज देखो भार । यातन की मै बीण बजाऊँ, रीग रीग⁵ बाँधू तार । समझ बूझ मिल जायें दुलारो, जद रीझै रिझवाल ॥५६६॥† उपर्युक्त पद के विषय मे श्री सूर्यकरण जी चतुवे दी लिखते है, “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर” जैसी छाप न होने पर भी यह पद भाव और भाषा की दृष्टि से मीराँ जी का है ।” मेरे विचार से ऐसे पदो को प्रक्षिप्त मानना ही युक्तियुक्त है। १ भव, २. अमूल्य, ३ विश्वास करै, ४ मन नही भरता, विश्वास नही होता, ५ रग रग।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१३ १२ जागो म्हाँरा, जगपति राइक, हँसि बोलो क्यूँ नहि। हरि छो जी हिरदा माहि, पट खोलो क्यूँ नहि। तन मन सुरति संजोडं, सीस चरणाँ धरूँ। जहाँ जहाँ देखूं म्हाँरो राम, जहाँ सेवा करूँ। सदकै करूँ जी सरीर, जुग जुग वारणै। छोड़ि छोड़ि कुल की लाज, साहिब तेरे कारणै। थोडि थोडि करूँ सिलाम, बहोत करि जाण ज्यौ। बन्दि हूँ खानाजाद, महीर, करि मान ज्यौ॥५६७॥† उपर्युक्त पद मीराँ के पदो के अन्तर्गत् ही प्राप्त है, यद्यपि पदाभिव्यक्ति से ऐसा कही से आभासित नही होता है। १३ साँवरियों म्हानै भाँग पिलाई, मेरी अँखिया मे लाली छाई। काहे री कूँडी (राधे) काहे रा घोटा, काहे री सुवाफी बणाई। तन कर कूँडी प्यारे मन कर घोटा, सुरती री सुवाफी बणाई। कदम नीचे छाँण पिवाई। पाँचो गुवाल मिल घोटन बैठे श्री गगा भर ल्याई जलझारी। प्रेम करि (राधेजी को) अधक चखाई। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, प्रेम की रीत निभाई। चरण माँहि मनड़ो लगाई ॥५६८॥† प्रभुजी मन माने तब तार। नदिया गहरी नाव पुरानी, अब कैसे उतरूँ पार। वेद पुराना सब कुछ देखे, अन्त न लागे पार। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, नाम निरन्तर सार ॥५६९॥†
३१४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १४ करना फकीरी तो क्या दिलगीरी, सदा मगन मन रहना रे। कोई दिन बाड़ी तो कोई दिन बगला कोई दिन जंगल रहना रे। कोई दिन हाथी कोई दिन घोडा, कोई दिन पाँखो से चलना रे। कोई दिन गाह्दी कोई दिन तकिया, कोई दिन भोय मे पड़ना रे। कोई दिन खाना तो कोई दिन पीना, कोई दिन भूख ही मरना रे। कोई दिन पहनों तो कोई दिन ओढा, कोई दिन चिथरा पैरना रे। मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर, ऐसा कता करना रे ॥५७०॥† मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ कित गयो पंछी बोल तो । कची रे मटीदा महल चुनाया, गोरवाँ ही गोरवाँ१ डोल तो । गुरु गोविन्द को कह्यो न मान्यो, ऐडो ही ऐडो डोल तो । ऐठी रेठढी पाग झुका तो, छाया निरख तो चाल तो । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरणा चित ल्यावतो । ॥५७१॥† पदाभिव्यक्ति सर्वथा असंगत ही है। २ बाल्हा, मै वैरागिण हूँगी हो । जो जो भेख म्हाँरो साहिब रीझै, सोइ सोइ धरूँगी हो । सील संतोष धरूँ घट भीतर, समता पकड रहूँगी हो । जाको नाम निरंजन कहि, ताको ध्यान धरूँगी हो । प्रेम प्रीत सूं हरि गुण गाऊँ, चरणन लिपट रहूँगी हो । १ बारी।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१५ या तन की. मै करूँ कीगरी, रसना नाम रटूंगी हो । मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर, साधाँ सग रहूँगी हो ।।५७२।।† पद के सभी क्रियापदो पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। प्रत्येक पंक्ति के अन्त मे 'हो' का प्रयोग अवधी प्रभाव को भी इगित करता है। ३ हेली, सुरत सोहागिन नार, मूरत मोरी राम से लगी । लगनी लहंगा पहिर सुहागिन, बीती जाय बहार। धन जोबन दिन चार का रे, जात न लागे बार। झूठे बर को क्या बरूँ जी, अधबीच मे तज जाय। बर बरलाँ राम जी, म्हाँरो चूडो अमर हो जाय। राम नाम का चुडला हो, निरगुन सुरमो सार। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा की मै दासी। चालाँ वाही देस प्रीतम पाँवाँ, चालाँ वाही देस। कहो तो कुसुम्बी झारी संगावा, कहो तो भगवाँ भेख। कहो तो मोतियन माँग भरावॉ, कहो तो छिटकावाँ केस। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुनियो बिड़द नरेस ॥५७३॥† उपर्युक्त पद स्पष्ट रूप से दो भागो मे विभक्त किया जा सकता है। "हेली सुरत सुहागन नार · हरि चरणा की मै दासी" पहला और "चालाँ वाही देस · सुनियो बिडद नरेस" दूसरा। यह दूसरा अश स्वतत्र पद के रूप मे भी प्रचलित है। दोनो अर्द्धांशो मे कोई भाव साम्य नही है। इस दूसरे अश की भाषा भी ठेठ राजस्थानी है, जब कि प्रथमांश की भाषा पर ब्रज और खडी बोलियो का भी प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।
३१६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, पिर धीवी माया जल मे पड़ी। तू तो समझि सुहागण सुस्ता नृारि, पलक कमरे रामसू लगी लगनी लँहगो पहरि सुहागण, बीतौ जाई बिन्हार । धन जोवन दिन च्यार का जातन लागे बार । राम नाम को चुडलो पहरौ, सुमरण काजल सार । माला ल्यौ हरिनाम की उतारि चलौ पैली पार । ऐसा बरकौ कांई बसूजी, जनमत ही मर जाय । बर बरस्यौ म्हाँरो साँवरोजी अमर चूड़ा होइ जाय । जनमै मरै करै घर केता, बिखराता नर नारि । मीराँ रत्ती राम सूंजी, सावरियो भरतार ॥† पाठान्तर मे पूर्व पाठ का द्वितीयाश नही है। इससे मेरे उपर्युक्त कथन का समर्थन होता है। ४ मनखा जनम पदारथ पायो, ऐसी बहुरन आता । अब के मोसर १ ज्ञान बिचारो राम राम मुख गीता । सतगुरु मिलिया सुँज पिछानी, ऐसा ब्रह्म मै पाती । सगुरा सूरा अमृत पीवै, निगुरा प्यासा जाती । मगन भयो मेरो मन सुख मे, गोविन्द का गुण गाती । साहिब पाया आदि अनादि, नातर भव मै जाती । मीराँ कहै इक आस आप की, और सूं सकुचाती ॥५७४॥† पद की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है । विचार- णीय बात है कि उपर्युक्त तीनो ही पदो की भाषा खडी बोली और ब्रज- भाषा दोनो ही से प्रभावित है । साथ ही तीनो की अभिव्यक्ति निर्वेद- द्योतक ही है। राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो से भी निर्वेद की भावना झलकती है, तथाँपि अधिकांश पदाभिव्यक्तियाँ वियोगात्मक ही हैं। १ अवसर ।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१७ ५ मै तो हरि चरणन की दासी, अब मै काहे को जाऊँ कासी । घट ही मे गगा, घट ही मे जमुना, घट घट है अविनासी । घट ही मे पुसकर औलेधेश्वर, लछिमन कबर बिलासी । जगेनाथ गगासागर है, साखी गुपाल ब्रजवासी । सेतु बध रामेश्वर ईश्वर मूलबटी सुर जासी । अवधपुरी मधुपुरी द्वारिका; चित्रकूट यमुना सी । गोवरधन गोकुल वृन्दावन, बीच मडल चौरासी । हरिद्वार कुरुखेत जनकपुर, गोदावरी हुलासी । तीरथ बडे प्रयाग गया जी, कासी तरुवर बासी । गिरिनार विन्ध्याचल सगिनार रंग है, सुघर कपिल दुखनासी । बदरी नाथ केदार गगोतरी, बैजनाथ कैलासी । पचबटी पपापुर रुक्मिणी, देव कपिल युवरासी । नैमषार श्रगीरिष मिसरिष, कासी पाप बिनासी । मुटुकनाथ अस मानसरोवर, भानलता अरु हाँसी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सहज कटै यम फाँसी ॥५७५॥† पदाभिव्यक्ति सर्वथा अर्थहीन है। भाषा की दष्टि से भी यह विचारणीय है। प्रथम और अन्तिम पक्ति मे प्रयुक्त क्रियापदो के आधार पर भाषा खडी बोली स प्रभावित कही जा सकती है। शष सम्पूर्ण पद की भाषा को बोलचाल की भाषा कहा जा सकता है। ऐसे अर्थहीन पदो को प्रामाणिक सग्रह मे स्थान नही मिलना ही उपयुक्त होगा ।