भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

श्लोकानुक्रमणिका

अङ्काःश्लोकाःअङ्काःश्लोकाः
मा दाब जइ वि एसो२६राजमार्गो हि शून्योऽयं५८
मा दुग्गदोत्ति परिहवो४३रूक्षस्वरं वाशति वायसो-१०
मार्जारः क्रमणे मृग३०रे रे वीरअ किं किं
मूढे निरन्तरपयोधरया१५
मेघा वर्षन्तु गर्जन्तु१६लज्जाए भीलुदाए वा१७
मेघो जलाद्र्रमहिषोदर-लब्धा चारित्र्यशुद्धिः१०५६
मैत्रेय भोः किमिद२६लाभशशुले मम पिदा
लामेहि अ लाअवल्लहं२६
लिम्पतीव तमोऽङ्गानि३४
यं समालम्ब्य विश्वासं२६लेखअवावडहिअअं
ऽ ” ”
यः कश्चित्त्वरितगतिःवंशं वाए शत्तछिद्दं शुशद्दं११
यः स्तब्धं दिवसान्तमानत-१२वज्जम्मिणीअमाणे१०१०
यत्नेन सेवितव्यः पुरुषः३३वणिज इव भान्ति तरवः
यथा यथेदं निपुणं विचा-२५वर्षशतमस्तु दुर्दिन४८
यथैव पुष्पं प्रथमे विकाशे२६वर्षोदकमुद्गिरता३८
यदा तु भाग्यपक्षयपीडितां५३वसन्तसेना किमियं द्वितीया१०३६
यदि कुप्यसि नास्ति रतिः३४वस्त्वन्तराणि सदृशानि भवन्ति३४
यदि गर्जति वारिधरो३२वादादवेण तत्ता चोवल४६
यदि तावत्कृतान्तेन२५वाप्यां स्नाति विचक्षणो३२
यद्वदहल्याहेतोर्मृषा३०विचलइ णेउरजुअलं१६
यया मे जनितः कामः५५विद्युज्जिह्वेदं महेन्द्र५१
यस्यार्थास्तस्य सा कान्ताविद्युद्भिर्ज्वलतीव२७
यासां बलिः सपदिविधिर्नैवोपनीतस्त्वं
येन ते भवनं भित्त्वा१०५६विपर्यस्तमनश्चेष्टैः
योऽस्माभिश्चिन्तितो ब्यार्जः२१विभवानुगता भार्या२८
योऽहं लतां कुसुमितां२८विषसलिलतुलाग्निप्रार्थिते४३
विषादस्त्रस्तसर्वाङ्गी
वेगं करोति तुरगः
रक्तं च नाम मधुरं चवेदार्थान्प्राकृतस्त्वं वदसि२१
रक्तं तदेव वरवस्त्रमियं च१०४४
रन्धानुसारी विषमः२७

६६६ मृच्छकटिकम्

अङ्काःश्लोकाःअङ्काःश्लोकाः
वैदेश्येन कृतो भवेन्मम२३स तावदस्माद्व्यसनार्णवो-
व्यवहारः सविघ्नोऽयं१८सत्यं न मे विभवनाश-१३
सदा प्रदोषो मम याति३१
शंजम्मध णिअपोटंसमरव्यसनी प्रमादशून्यः
शक्कालधणे क्खु शुज्जणे१५समुद्रवीचीव चलस्वभावाः१५
शत्रुः कृतापराधः१०५४सर्वगात्रेषु विन्यस्तैः१०
शरच्चन्द्रप्रतीकाशं१६सव्यं मे स्पन्दते चक्षुः१५
शब्बकालं मए पुश्ते२८साटोपकूटकपटावृत-३६
शब्बे क्खु होइ लोए१०१५सिण्णसिलाअलहत्थो२२
शशिविमलमयूख-१०१३सीधुसुरासवमत्तिआ३०
शशपलक्कवलद्देसुअणे क्खु भिच्चवाणु कम्पके
शास्त्रज्ञः कपटानुसार-सुखं हि दुःखान्यनुभूय१०
शिखा प्रदीपस्य सुवर्ण-१५सुदृष्टः क्रियतामेषः२४
शिल मुण्डिद तुण्ड मुण्डिदेसोऽस्मद्विधानां प्रणयैः४६
शिलशि मम णिलीणे१२स्खलति चरणं भूमौ न्यस्तं
शुक्खा हि ववदेशाशे१०२०स्तम्भेषु प्रचलितवेदि-५०
शुवण्णं देमि पिअं३१स्त्रियो हि नाम खल्वेताः१९
शुष्कवृक्षस्थितो ध्वाङ्क्षः११स्त्रीभिर्विमानितानां
शून्यमपुत्रस्य गृहंस्त्रीषु न रागः कार्यः१३
शून्यैर्गृहैः खलु समाः४२
शूले विवकंते पंडवे४७हत्थशंजदो मुहशंजदो४७
हत्वा तं कुन्नृपमहं हि१०४७
सगं नैव हि कश्चिदस्य३७हत्वा रिपुं तं बलमन्त्रिहीनं१०४८
संस्रवत्तैरिव चक्रवाक-हा प्रेयसि प्रेयसि विद्यमाने१०५७
संभ्रमघग्घरकण्ठो१०हिंगुज्जले जीरकमद्दमृश्ते१३
सकामान्विष्यतेऽस्माभिः४४हिंगुज्जले दिण्णमरीचचुण्णे१४
सच्चेण सुहं क्खु लब्भइ३५हित्वाहं नरपतिबन्धनाप-

परिशिष्ट

छन्दोविवेचन

छन्दःशास्त्र के अनुसार संस्कृत के प्रत्येक श्लोक में चार पाद या चरण होते हैं। इन छन्दों के दो भेद हैं—(१) वर्णवृत्त और (२) मात्रिक। वर्णवृत्तों में प्रत्येक चरण के वर्णों की गणना की जाती है और मात्रिक छन्दों में प्रत्येक चरण की मात्राओं की गणना की जाती है। वर्णवृत्तों को वृत्त और मात्रिक छन्दों को जाति कहा जाता है, ये तीन प्रकार के होते हैं--(१) समवृत्त—इसके चारों चरणों में वर्णों की संख्या बराबर-बराबर होती है। (२) अर्धसमवृत्त—इसमें प्रथम और तृतीय चरण में तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में वर्णों की संख्या समान रहती है। (३) विषमवृत्त—इसमें सभी चरणों में समानता नहीं रहती है। इसका प्रयोग कम मिलता है।

गणपरिचय—

वर्णवृत्तों में वर्णों की गणना के लिये 'गण' का उपयोग होता है। एक गण में तीन वर्ण होते हैं। ये गण आठ हैं—(१) यगण, (२) मगण, (३) तगण, (४) रगण, (५) जगण, (६) भगण, (७) नगण, (८) सगण। इनमें लघु वर्ण के लिये '।' ऐसा और गुरु के लिये 'ऽ' ऐसा चिह्न प्रयुक्त होता है। किस गण में कौन ह्रस्व और कौन गुरु होता है इनके लिये निम्न सूत्र प्रसिद्ध है—

'यमाताराजभानसलगा।'

इसका स्पष्ट ज्ञान इस श्लोक से होता है—

“आदिमध्यावसानेषु य-र-ता यान्ति लाघवम्।
भजसा गौरवं यान्ति, मनौ तु गुरुलाघवम्॥”

जो सामान्यतया दीर्घ=गुरु प्रसिद्ध हैं उनके अतिरिक्त अनुस्वार वाला, विसर्ग वाला तथा संयुक्त अक्षर के पूर्व का लघु वर्ण भी गुरु माना जाता है। पाद के अन्त का लघु वर्ण विकल्प से गुरु माना जा सकता है—

“सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्।
वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि वा॥”

छन्दों के लक्षणों में यति=विराम का भी निर्देश रहता है।

६६८ मृच्छकटिकम्

मृच्छकटिक में प्रयुक्त छन्द—

मृच्छकटिक में विविध छन्दों का सुन्दर प्रयोग किया गया है यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।

(१) अनुष्टुप् या श्लोक—

श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् । द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ अथवा पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः । षष्ठं गुरु विजानीयाच्छेषेषु नियमो न हि ॥

इसके चार चरणों में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इनमें पंचम लघु और षष्ठ गुरु होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरण में सप्तम लघु होता है। शेष के लिये कोई नियम नहीं है। उदा० प्रथम अंक में २, १६, ३४ आदि।

(२) आर्या—

यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पंचदश साऽर्या ॥

यह मात्रिक वृत्त है। इसके प्रथम पाद में १२ मात्रायें, द्वितीय में १८, तृतीय में १२ और चतुर्थ में १५ मात्रायें होती हैं। यह छन्द भी सरलतया समझा जाता है। मृच्छकटिक में इसका पर्याप्त प्रयोग है। उदा० प्रथम अंक में ८, ११, ३३ आदि श्लोक हैं।

(३) इन्द्रवंशा—

तच्चेन्द्रवंशा प्रथमाक्षरे गुरौ ।

यह वंशस्थ के समान है। इसका प्रथम वर्ण गुरु होता है। यह स्वतन्त्ररूप से नहीं प्रयुक्त है। यह उपजाति के रूप में प्रयुक्त है। प्रथम अंक का ४६ और तृतीय का ७ श्लोक इसका उदा० है।

(४) इन्द्रवज्रा—

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।

प्रत्येक चरण में तगण तगण जगण और दो गुरु वर्णों के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। उदा० चतुर्थ अंक का १६, पंचम का ४६ और दशम का ११, २१, ४८, ५८ श्लोक हैं।

(५) उपजाति—

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः । उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।

परिशिष्ट ६६१

“अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजो पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।
इत्थंक्लिवान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ।”

इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के दो-दो पादों के मिलने पर इसी प्रकार अन्य छन्दों के मिलने पर ‘उपजाति’ भेद माना जाता है। इस छन्द का पर्याप्त प्रयोग किया गया है। उदा० प्रथम अंक का ३८, ४६, तृतीय अंक का ६, चतुर्थ अंक का १, १२, १५, ३२, पंचम अंक का २१, २९, ४०, ४७, ५२, अष्टम अंक का २७, ३०, नवम अंक का १० २६, और दशम अंक का ६, १६, ४०, ४३ श्लोक ।

(६) उपेन्द्रवज्रा--

उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।

इसमें जगण, तगण, जगण के बाद दो गुरु वर्ण होते हैं। यह प्रथम अंक में ६ चतुर्थ में २३ और षष्ठ में ३ श्लोक में है।

(७) गीति :-

आर्यापूर्वार्धसमं द्वितीयमपि यत्र भवति हंसगते ।
छन्दोविदस्तदानीं गीति ताममृतवाणि भाषन्ते ॥

यह आर्या के समान होता है केवल अन्तिम पाद में १५ के स्थान पर १८ मात्रायें होती हैं। यह चतुर्थ अंक के ३४ वें श्लोक में है। इसे ‘उद्गाथा’ भी कहते हैं।

(८) पथ्यावक्त्र--

युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।

अनुष्टुप् छन्द के द्वितीय और चतुर्थ चरण में जब चतुर्थ अक्षर के बाद जगण आता है तब यह छन्द होता है। वास्तव में यह अनुष्टुप् का भेद हैं। मृच्छकटिक में इसका प्रचुर प्रयोग है। प्रथम अंक के—२, ५४, ५८, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के १६, २४, २५, २७, २८, २६, चतुर्थ अंक के ५, ७, ८, १८, १९, २१, पंचम अंक के ७, १६, ३९, षष्ठ अंक के १७, २६, सप्तम अंक के ६, अष्टम अंक के ६, १६, १७, २१, २८, २६, ३६, नवम अंक के ७, ८, ११, १८, २०, २४, ३०, ३१, ३२, ३३, ३६, ३७, ३८, ३६, ४२, दशम अंक के ५, १७, १८, २३, २६, २७, २८, ३२, ३९, ४१, ४२, ४५, ५०, ५१, ५२, ५६।

(६) पुष्पिताग्रा--

अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।

६७० मृच्छकटिकम्

यह अर्धसम वृत्त है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में नगण, नगण, रगण, यगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में नगण, जगण, जगण, रगण और अन्त में एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के २४, ५६, द्वितीय अंक के ७, तृतीय अंक के १०, २१, २२, चतुर्थ अंक के ४, २७, २८, अष्टम अंक के ४, ८, १५, ३२ और दशम अंक का १३ श्लोक।

(१०) प्रमिताक्षरा--

प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता।

इसके पाद में सगण, जगण, सगण, सगण---इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह दशम अंक के ५६ श्लोक में हैं।

(११) प्रहर्षिणी--

त्र्याशाभिर्मनजरगा प्रहर्षिणीयम्।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, जगण, रगण और एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। इसमें ३ और १० पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के २, पञ्चम के ५०, षष्ठम् के १, सप्तम के ८, अष्टम के ४१, नवम के २७ और दशम के २५, ३३, ४७, ४९, श्लोक में है।

(१२) मालभारिणी--

विषमे ससजा गुरू समे चेत् सभरा यैन तु मालभारिणीयम्।

इसे औपच्छन्दसिक भी कहा जाता है। इसमें प्रथम तथा तृतीय पादों में सगण, सगण, जगण और दो गुरु-इस क्रम में ११, ११ अक्षर होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, रगण और यगण--इस क्रम से १२, १२ अक्षर होते हैं। यह अर्ध समवृत्त है। यह प्रथम अंक के ३, ५० श्लोक में है।

(१३) मालिनी--

ननमययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।

इसमें नगण, नगण, मगण, यगण, यगण इस क्रम से १५ अक्षर प्रत्येक पाद में होते हैं। ८ और ७ वर्णों पर यति होती है। यह प्रथम अंक के ३१, ५७, चतुर्थ अंक के २०, पंचम अंक के १७, सप्तम अंक के ३, ५, अष्टम अंक के ४२, नवम अंक के १२, ४३, दशम अंक के ३, १२, ३४, ४६ श्लोक में है।

(१४) वंशस्थ--

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

इसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण, रगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के ७, १०, ५३, तृतीय अंक के ८, १७, पंचम अंक के ३७,

परिशिष्ट ६७१

सप्तम अंक के ४, अष्टम अंक के ७, नवम अंक के २५ श्लोक में है। इसे वंशस्थ बिल भी कहा जाता है।

(१५) वसन्ततिलका--

उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः ।

इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, जगण; जगण और दो गुरु—इस क्रम से १४-१४ वर्ण होते हैं। यह छन्द प्रचुर रूपेण प्रयुक्त है। प्रथम अंक के ९, १२, १३, १७, २०, २२, २७, ३५, ४६, तृतीय अंक के ३, ४, ९, १४, १६, चतुर्थ अंक के ६, १४, २६, पंचम अंक के १, २, ४, ८, १३, १५, ३३, ३६, ४२, ४५, षष्ठ अंक के २, अष्टम अंक के २३, २४, २६, नवम अंक के ६, १६, १६, २२, २८, २६, ३४, दशम अंक के ३१, ३४, श्लोक में हैं।

(१६) विद्युन्माला--

मो मो गो गो विद्युन्माला ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण और दो गुरु-इस क्रम से ८, ८ अक्षर होते हैं। यह द्वितीय अंक के ८ श्लोक में है।

(१७) वैश्वदेवी--

वाणार्श्वेश्चिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण, यगण, यगण,—इस क्रम से १२ वर्ण होते हैं। पंचम वर्ण के बाद यति होती है। यह तृतीय अंक के १३ वें श्लोक में है।

(१८) शार्दूलविक्रीडित -

सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।

इसके प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और अन्त में एक गुरु वर्ण मिलाकर १९ वर्ण होते हैं। इसमें १२ और ७ वर्ण पर यति होती है। इसका पर्याप्त प्रयोग किया गया है। यह प्रथम अंक के १, १४, ३२, ३६ ३७, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के ५, ११, १२, १८, २०, २३, चतुर्थ अंक के ६, पंचम अंक के ५, ६, १४, १८, २०, २३, २४, २७, ३५, ४६, सप्तम अंक के २, ७, अष्टम अंक के ५, ११, २८, नवम अंक के ३, ४, ५, १४, दशम अंक के ६० श्लोक में है।

(१६) शिखरिणी--

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में लघु और एक गुरु—इस क्रम से १७-१७ वर्ण होते हैं। इसमें ६ और ११ वर्ण

६७२ मृच्छकटिकम्

पर यति होती है। यह प्रथम अंक के १५, पञ्चम अंक के १२, २२, २५, षष्ठ अंक के ४ श्लोक में है।

(२०) सुमधुरा—

म्रौ म्नौ मो नो गुरुश्चेद् हयऋतुरसैरुक्ता सुमधुरा।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, मगण, नगण, मगण, नगण, और एक गुरु--इस क्रम से १९ वर्ण होते हैं। इसमें ७ और १३ वर्ण पर यति होती है। यह नवम अंक के २१ श्लोक में है।

(२१) स्रग्धरा—

म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनि-यतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, यगण, यगण, इस क्रम से २१ वर्ण होते हैं। इसमें ७, ७, ७ वर्ण पर यति होती है। सामान्यतया प्रयुक्त छन्दों में यह सबसे बड़ा है। यह प्रथम अंक के १, ४, ४८ और दशम अंक के ५६, ६१ श्लोक में है।

(२२) हरिणी—

नसमरसलागा षड् वेदैर्हयैर्हरिणी मता।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण और लघु तथा अन्त में गुरु--इस क्रम से १७, १७ वर्ण होते हैं। इसमें ६, ४, ७ पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के ३ और नवम अंक के १३ श्लोक में है।

प्राकृत छन्द—

प्राकृत भाषा के विभिन्न रूपों का प्रयोग मृच्छकटिक में हुआ है। इस पर भूमिका में लिखा जा चुका है। प्राकृत के अनेक छन्द भी इसमें प्रयुक्त हैं। इनकी संस्कृतच्छाया भी मूल में दी गयी है। प्राकृतच्छन्दों के विषय में विशेष ज्ञान के लिये 'प्राकृत-पिंगल' आदि ग्रन्थ देखने चाहिये। यहाँ गाथा, आर्या, वैतालीय आदि छन्द प्रयुक्त हैं।

उपसंहार—

ऊपर यह प्रस्तुत किया जा चुका है कि मृच्छकटिक में लगभग २२ प्रकार के संस्कृत छन्दों का और कुछ प्राकृत छन्दों का प्रयोग किया गया है। परिशीलन से यह ज्ञात होता है कि इसके रचनाकार को (१) पथ्यावक्त्र, (२) वसन्ततिलका और (३) शार्दूलविक्रीडित छन्द अधिक प्रिय थे।

—:०:—