भारतकोश
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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ
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१८मुद्राराक्षसम्

दर्पणोक्त लक्षण के अनुसार श्लेषालङ्कार है । इसमें आर्या छन्द है । लक्षण श्लोक ५ की टिप्पणी में देखिए ॥६॥

नटी—अज्ज ! को उण एसो धरणीगोअरो भविअ चन्दग्गहाभिओ- आदो रक्खिदु इच्छदि । ( आर्य ! कः पुनरेष धरणीगोचरो भूत्वा चन्द्र- ग्रहाभियोगाद्रक्षितुमिच्छति । )

सूत्रधार—आर्ये ! यत्सत्यं मयापि नोपलक्षितं । भवतु । भूयोऽ- भियुक्तः स्वरव्यक्तिमुपलप्स्ये । [ ‘क्रूरग्रह’—इत्यादि पुनस्तदेव पठति । ]

[ नेपथ्ये ] आः, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति ।

सूत्रधार—[ आकर्ण्य ] आर्ये ! ज्ञातम् । कौटिल्यः !

[ नटी भयं नाटयति ]

सूत्रधार

कौटिल्यः कुटिलमतिः स एष येन क्रोधाग्नौ प्रसभमदाहि नन्दवंशः । चन्द्रस्य ग्रहणमिति श्रुते सनाम्नो मौर्य्यस्योद्विग्नपदभियोग इत्यवैति ॥७॥

तदित आवां गच्छावः । [ इति निष्क्रान्तौ । ]

इति प्रस्तावना ।

व्याख्यानटी प्राह, आर्य !, एष, कः, पुनः, धरणीगोचरः—धरणी पृथ्वी गोचरः देशो यस्य स तादृशः, भूत्वा—नेपथ्यस्थित एवेत्यर्थः, चन्द्र—चन्द्रमसः, ग्रहाभियोगात्—ग्रहस्य राहोः अभियोगात् पीडनात्, रक्षितुम्—त्रातुम्, इच्छति—वाञ्छति । सूत्रधारः कथयति, आर्ये, यत्सत्यम्—वस्तुतः, मयापि, न उपलक्षितम्—न निरूपितम् । भवतु—अस्तु, भूयः—पुनः, अभियुक्तः—अवहितः ( सन् ), स्वरव्यक्तिम्—स्वरस्य कण्ठध्वनेः व्यक्तिम् अभिव्यञ्जनम्, उपलप्स्ये—प्राप्स्यामि ज्ञास्यामि इति यावत् । ( पुनः तदेव ‘क्रूरग्रह’---इत्यादि पठति । ) नेपथ्यस्थितः पुरुषोऽपि पुनः सकोपम् ‘आः, क एष’—इत्यादि पठति । आकर्ण्य—श्रुत्वा, सूत्रधारः वक्ति, ज्ञातम्—अवगतम्, कौटिल्यः—चाणक्यः अयम् इतिनटी, ......, नाटयति—सविलासदर्शयति ।

प्रथमोऽङ्कः१६

अन्वयः—येन क्रोधाग्नौ नन्दवंशः प्रसभम् अदाहि स एष कुटिलमतिः कौटिल्यः 'चन्द्रस्य ग्रहणम्' इति श्रुतेः सनाम्नः मौर्येन्दोः द्विपदभियोग इति अवैति ॥७॥

व्याख्याः—येन बुधेन, क्रोधाग्नौ—कोपवह्नौ, नन्दवंशः—राज्ञो नन्दस्य, कुलम्, अदाहि—भस्मीकृतः, स एषः—नेपथ्यावस्थितो जनः, कुटिलमतिः—क्रूरबुद्धिः, कौटिल्यः—चाणक्यः, 'चन्द्रस्य ग्रहणम्' इति श्रुतेः—श्रवणात्, सनाम्नः—समानाख्यस्य, मौर्येन्दोः—इन्द्रसदृशस्य चन्द्रगुप्तस्य, द्विपदभियोगः—द्विपता शत्रुगा, अभियोगः आक्रमणम्, इति—एतत्, अवैति—जानाति ॥७॥

तत्—तस्मात्, इतः—अस्मात् स्थानात्, आवां, गच्छावःइति, निष्क्रान्तौ—रङ्गमञ्चादपगतौ। इति एतन्मात्रं, प्रस्तावना—कथामुखम्।

हिन्दी अनुवादनटी—आर्य ! फिर यह कौन है, जो पृथ्वी पर स्थित होकर चन्द्र को ग्रह के आक्रमण से बचाना चाहता है ?

सूत्रधार—आर्ये ! सत्य तो यह है कि मैने भी नही पहचाना । अच्छा, पुनः सावधान होकर गले की पहचान करूँगा । [ फिर वही 'क्रूरग्रहः' इत्यादि पढ़ता है । ]

[ नेपथ्य में ]

आह, यह कौन मेरे रहते चन्द्रगुप्त को जीतने की इच्छा करता है ?

सूत्रधार—[ सुनकर ] आर्ये ! समझ गया । (ये) कौटिल्य हैं।

[ नटी भय का नाट्य करती है । ]

सूत्रधार—जिन्होंने क्रोध की अग्नि मे नन्दवंश को हठात् जला दिया, वहीं ये कुटिल बुद्धि वाले चाणक्य 'चन्द्र का ग्रहण' यह सुनने से समान नाम वाले चन्द्रगुप्त पर शत्रु ( राक्षस और मलयकेतु ) का आक्रमण हो रहा है—ऐसा मानते है ॥७॥

इसलिए यहाँ से हम दोनों चले । [ दोनों चल देते है । ]

प्रस्तावना समाप्त

टिप्पणीधरणीगोचरः—पृथ्वी पर दिखाई पडने वाला (ग्रह) । गावः चरन्ति अस्मिन् इति गो√चर्+घ अधिकरणे संज्ञायाम्=गोचरः । गोचर

प्रथमोऽङ्कः (मुद्रालाभ)

२० मुद्राराक्षसम्

चरागाह को कहते हैं, किन्तु स्थान की भी यह सञ्ज्ञा है । धरणी गोचरो यस्य स बहुव्रीहि स० । यह 'र' का विधेयात्मक विशेषण है । ग्रहाभियोगात्—ग्रह के आक्रमण से । अभि√युज् + घञ् भावे अभियोग । ग्रहस्य अभियोग षष्ठीतत्०, तस्मात् 'भीत्रार्थानां भयहेतु' इत्यनेन पञ्चमी । अभियुक्त —लगा हुआ, सावधान । अभि√युज् + क्त कर्तरि । स्वरव्यक्तिम्—स्वर की स्पष्टता को । वि√अञ्ज् + क्तिन् भावे = व्यक्ति । स्वरस्य व्यक्ति षष्ठीतत्० ताम् । उपलप्स्ये—उपलब्ध करूंगा, पहचानूंगा । उप√लभ् + लृट् —स्ये । नन्दवंश —नन्द ने चाणक्य का अपमान किया था । उसका बदला चुकाने के लिए चाणक्य ने अपनी कूटनीति से नन्दवंश को समूल नष्ट कर दिया था । प्रसभम्—बलात्कार, तत्क्षण । कहते हैं कि सात दिन के भीतर आठ पुत्रों समेत नन्द को चाणक्य ने मरवा दिया था । अदाहि—भस्मसात् कर दिया । √दह् + लुङ् —त कर्मणि । इसका कर्ता 'येन' है । कुटिलमति —कुटिल बुद्धि वाले । कुटिला मति यस्य स । चाणक्य बड़े कठोर राजनीतिज्ञ थे और उनकी बुद्धि दुर्जेय थी । अतएव उन्हें कुटिलमति कहा गया है । कौटिल्य —चाणक्य । कुटिलस्य भाव कौटिल्यम् कुटिल + ष्यञ् भावे । तत् अस्ति अस्य इति कौटिल्य + अच् । अथवा कुटिल एव कौटिल्य कुटिल + ष्यञ् स्वार्थे । कुछ लोग चाणक्य का नाम कौटल्य कहते हैं । कुटल उनके पिता का नाम था । कुटल की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती है—'कुटं घटपूर्णं धान्यं लाति गृह्णाति इति कुटल = घटपरिमित धान्य का संग्रह करने वाला अथवा कुट परिवार को भी कहते हैं । तब अर्थ होगा—जो केवल अपने परिवार की जीविका चलाने मात्र धन का संचय करता है । तस्य, कुटलस्य अपत्य पुमान् कौटल्य कुटल + यञ् । चन्द्रस्य ग्रहणम्—यह पद छन्द के अनुरोध से रखा गया है । अथवा 'चन्द्रम् अभिभवितुम् इच्छति' इन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए था, जो चूर्णक में आये हैं । श्रुते —सुनने से । √श्रु + क्तिन् भावे = श्रुति , तस्या हेतौ पञ्चमी । सनाम्न —तुल्य नाम वाले । समानं नाम यस्य स सनामा बहुव्रीहि स०, 'ज्योतिर्जनपद'—इति सूत्रेण समानस्य सादेश , तस्य । यह 'मौर्येन्दो' का विशेषण है । मौर्येन्दो —चन्द्रगुप्त का । पुराण के अनुसार मुरा नाम की एक शूद्रा राजा नन्द की उपपत्नी थी । उसी का पुत्र चन्द्रगुप्त था । मुराया अपत्य पुमान् इति मुरा + ण्य 'कुर्वादिभ्यो ण्य' इत्यनेन = मौर्य । मौर्य इन्दुरिव इति मौर्येन्दु उपमित स०, तस्य । शेषे षष्ठी अथवा 'उभयप्राप्तौ कर्मणि' इत्यनेन कर्मणि षष्ठी । द्विपदभियोग —शत्रु का

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२२ मुद्राराक्षसम्

व्याख्याकः—एष, जृम्भाविदारितमुखस्य—जृम्भया शरीरस्वभावभूतयाऽऽस्यव्यादानात्मकक्रियया विदारितं प्रसारितं मुखम् आननं यस्य तस्य, हरेः—सिंहस्य, मुखात्, आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभाम्—आस्वादितं प्रपीतं यद् द्विरदशोणितं गजरक्तं तेन शोणा रक्तवर्णा शोभा कान्तिः यस्याः तादृशीम्, (अतएव) शशलाञ्छनस्य—चन्द्रमसः, सन्ध्यारुणा—सन्ध्यया सूर्यास्तमनवेलया अरुणा रक्तवर्णिता, कलाम् इव—मृगकान्तिमिव, स्फुरन्ती—विजृम्भमाणा, दंष्ट्रा—दशनं, परिभूय—अवज्ञाय, हर्तुम्—उत्पाटयितुम्, इच्छति—वाञ्छति ॥ ८ ॥

हिंदी अनुवाद—[ उसके बाद खुली हुई शिखा का स्पर्श करते हुए चाणक्य का प्रवेश ]

चाणक्य—मेरे रहते यह कौन चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है ? देखो—

कौन जँभाई के कारण फैलाये हुए मुख वाले सिंह के मुख से, पिये हुए हाथी के रक्त से लाल छविवाली और (अतएव) चन्द्रमा की सन्ध्याकालीन अरुण कान्ति-सी चमकने वाली दाढ़ को अवहेलनापूर्वक निकालना चाहता है ॥ ८ ॥

टिप्पणीमुक्तां शिखाम्—पहले चन्द्रगुप्त को राज्य दिलाने के लिए चाणक्य ने अपनी शिखा खोलकर प्रतिज्ञा की थी। यह शिखा चन्द्रगुप्त को राज्य दिला देने के बाद भी इसलिए खुली हुई थी कि अभी चन्द्रगुप्त की राज्यलक्ष्मी सुस्थिर नहीं हो सकी थी। परामृशन्—स्पर्श करते हुए। परा-आ✓मृश् + लट्—शतृ कर्तरि। यह दृश्य पाटलिपुत्र में चाणक्य के घर में प्रस्तुत होता है। कथं क एष मयि स्थिते—यहाँ से लेकर मुखसन्धि का निबन्धन किया गया है। मुखसन्धि में 'बीज' अर्थप्रकृति और 'आरम्भ' नामक अवस्था का संयोग होता है। यहाँ राक्षस को वश में करना कार्य है, चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी को स्थिर करना उस कार्य का फल है, अनुकूल भाग्य हेतु है और चाणक्य की नीति का प्रयोग 'बीज' है। उस बीज की 'आरम्भावस्था' चाणक्य की उत्सुकता है और चाणक्य की उत्सुकता यह है कि मेरे जागरूक होते हुए भी मेरे पुरुषार्थ को कुछ न समझ-कर राक्षस मौर्य-लक्ष्मी का हरण करना चाहता है। अतएव अत्यन्त वीर, दण्ड-नीति में निष्णात और स्वामी नन्द के कार्य-भार को वहन करने में समर्थ राक्षस

प्रथमोऽङ्कः | २३

को अवश्य ही वश में करना चाहिए। मयि स्थिते—अत्र 'षष्ठी चानादरे' इति सूत्रेण सप्तमी। जृम्भाविदारितमुखस्य—जँभाई लेने के कारण खोले हुए मुख वाले। जृम्भया विदारितं मुखं यस्य सः त्रिपदव्यधिकरणबहुव्रीहि स०, तस्य। यह ‘हरेः’ का विशेषण है। आस्वादित०—पिये गये गजराज के रक्त की लाली से रक्ताभ। द्वौ रदौ दन्तौ अस्य इति द्विरदः। तस्य शोणितम् षष्ठीतत्०। आस्वादितं द्विरदशोणितम् कर्मधारय स०। तेन शोणा शोभा यस्याः सा त्रिपद-व्यधि०, ताम्। यह ‘दंष्ट्राम्’ का विशेषण है। यहाँ चाणक्य हरि है और चन्द्रगुप्त की राज्य-श्री उसकी दंष्ट्रा है। इस पद्य में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है। उसका लक्षण यह है—‘ज्ञेयं वसन्ततिलकं तभजा जगौ गः’ ॥ ८ ॥

अपि च—

नन्दकुलकालभुजगीं कोपानलबहुलनीलधूमलताम् ।
अद्यापि बध्यमानां वध्यः को नेच्छति शिखां मे ॥ ६ ॥

अन्वय—वध्यः कः नन्दकुलकालभुजगी कोपानलबहुलनीलधूमलतां मे शिखाम् अद्यापि बध्यमानां न इच्छति ॥ ६ ॥

व्याख्या—वध्यः—हन्तुं योग्यः, कः—जनः, नन्दकुलकालभुजगीं—नन्द-कुलस्य नन्दवंशस्य कालभुजगी कृष्णसर्पिणीम् ( इव ), कोपानलबहुलनीलधूम-लतां—कोपः क्रोध एव अनलः अग्निः तस्य बहुलनीलाम् अतिकृष्णाम् ( ०बहुल-लोल० इति पाठभेदे तु बहुला घनीभूता चासौ लोला व्याप्तदिक् च या तथाभूताम् इति व्याख्येयम् ) धूमलताम् धूमसन्ततिम् ( इव ), मे—मम, शिखाम्, बध्यमानां—संयम्यमानां, न—नहि, इच्छति—वाञ्छति ॥ ६ ॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—वध के योग्य ( यह ) कौन ( है, जो ) नन्दवंश की कालसर्पिणी और क्रोधाग्नि की अत्यन्त काली धूमरेखा ( के समान ) मेरी शिखा को अभी भी बँधती हुई ( देखना ) नहीं चाहता है ॥ ६ ॥

टिप्पणीवध्यः—मार डालने योग्य। यहाँ वध्य मलयकेतु है, क्योंकि वही चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है। वधमर्हति इति वध्यः वध+य। अथवा √हन्+यत् वधादेशश्च 'हनो वा यद्वधश्च वक्तव्यः' इति वार्तिकेन। नन्दकुलकालभुजगीम्—नन्दवंश के लिए कालसर्पिणी ( के समान )। काली

२४ मुद्राराक्षसम्

चासौ भुजगी कर्मधारय स० । नन्दस्य कुलम्, तस्य कालभुजगी षष्ठीतत्०, ताम् । यह 'शिखाम्' का विशेषण है । कोपानल०—क्रोध रूपी अग्नि की अत्यन्त कृष्ण धूमलता ( के समान ) । बहुल नीला सुप्मुपा स० । बहुलनीला धूमलता कर्मधारय स० । कोप अनल इव इति कोपानल उपमित स० । तस्य बहुनील-धूमलता षष्ठीतत्०, ताम् । यह भी 'शिखाम्' का विशेषण है । अद्यापि—आज भी, अभी भी अर्थात् नन्दवश का विनाश करके मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकने के उपरान्त भी । बध्यमानाम्—बांधी जाती हुई । √ बन्ध् + लट् कर्मणि—शानच्, स्त्रिया टाप् = बध्यमाना, ताम् । यह 'शिखाम्' का विधेयात्मक विशेषण है । इस पद्य मे अश्लिष्टशब्दनिवन्धनमालारूप परम्परित रूपक अलङ्कार है और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण श्लोक ५ की टिप्पणी मे देखिए ॥ ६ ॥

अपि च—

उल्लङ्घयन् मम समुज्ज्वलत प्रताप
कोपस्य नन्दकुलकाननधूमकेतो ।
सद्य परात्मपरिमाणविवेकगूढ
क शालभेन विधिना लभता विनाशम् ॥ १० ॥

अन्वय—परात्मपरिमाणविवेकगूढ क मम समुज्ज्वलत नन्दकुलकानन धूमकेतो कोपस्य प्रतापम् उल्लङ्घयन् शालभेन विधिना सद्य विनाश लभताम् ॥१०॥

व्याख्या—परात्मपरिमाणविवेकगूढ—परस्य शत्रो आत्मन स्वस्य च यत् परिमाण तारतम्य तस्य विवेके विमर्शे मूढ मुग्धमति असमर्थ इति यावत्, क—जन , मम—मे, समुज्ज्वलत—दीप्यमानस्य, नन्दकुलकाननधूमकेतो—नन्दकुलम् नन्दवश एव कानन वन तस्य धूमकेतो दावाग्ने , कोपस्य—क्रोधस्य, प्रताप—प्रखरदाहम्, उल्लङ्घयन्—अतिक्रमिष्यन्, शालभेन विधिना—पतङ्गरीत्या, सद्य—झटिति, विनाश—क्षय, लभताम्—प्राप्नोतु ॥ १० ॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—पराये और अपने वलाबल के विचार से शून्य (यह) कौन (है, जो) मेरे देदीप्यमान तथा नन्दवंश रूपी वन (को जलाने) के लिए अग्निरूप क्रोध की लपटो को लांघता हुआ पतंग की रीति से शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो (रहा है) ॥ १० ॥

टिप्पणी—परात्म०—शत्रु की और अपनी सामर्थ्य को पहचानने में

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. प्रथमोऽङ्कः :२७

है )। [ हाव-भाव के साथ बैठकर मन ही मन ] नागरिकों में यह बात कैसे फैल गई कि नन्दवंश के विनाश से उत्पन्न क्रोध वाला राक्षस पिता के वध से क्रुद्ध तथा समस्त नन्द-साम्राज्य के स्वामित्व-प्रदान की शर्त से प्रेरित पर्वतक-पुत्र मलयकेतु के साथ सन्धि करके उस ( मलयकेतु ) के द्वारा इकट्ठी की गयी म्लेच्छ राजाओं की विशाल वाहिनी से युक्त होकर चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने के लिए तैयार है ? [ सोचकर ] अथवा जिस मैंने सब लोगों के सामने नन्दवंश के वध की प्रतिज्ञा करके कठिनाई से पार करने योग्य प्रतिज्ञा रूपी नदी को पार कर डाला, वह मैं क्या इस समय फैलती हुई इस बात को भी दबा देने में समर्थ नहीं हूँ ?

टिप्पणीशाङ्गर्‌रव—यह चाणक्य के शिष्य का नाम है। यहाँ संभ्रम (उतावली) में इसका दो बार उच्चारण किया गया है। उपाध्याय !—आचार्य, गुरुदेव ! नाटक में आचार्य को उपाध्याय कह कर सम्बोधित किया जाता है—'आर्येति ब्राह्मणं ब्रूयान्महाराजेति पार्थिवम्। उपाध्यायेति चाचार्यम्'— नाट्यशास्त्र। उपेत्य अस्मात् अधीते इति उपाध्यायः उप-अधि √ इ + घञ् अपादाने संज्ञायाम्। तस्य सम्बोधने उपाध्याय इति। वत्स... यह शिष्य के प्रति एक प्रकार का कोमल उपालम्भ है। क्योंकि चाणक्य देर से खड़े हैं। उन्होंने शिष्य का बिछाया हुआ आसन नहीं देखा। इसलिए मीठी फटकार देते हुए वे कहते हैं कि मैं बैठना चाहता हूँ, आसन तुमने बिछाया ही नहीं। ननु—यह आक्षेपसूचक अव्यय है। 'नन्वाक्षेपे परिप्रश्ने प्रत्युक्ताववधारणे' इति हैमः। शिष्य कुछ उत्तेजित होकर उत्तर देता है; क्योंकि वह आसन पहले ही बिछा चुका है। सन्निहित-वेत्रासना—जिसके समीप बेंत का आसन रखा हो। सम्-नि √ धा + क्त कर्मणि = सन्निहितम्। वेत्रनिर्मितम् आसनम् वेत्रासनम् मध्यमपदलोपी स०। सन्निहितं वेत्रासनं यस्याम् सा बहुव्रीहि स०। कार्याभियोगः—कार्य के प्रति एकाग्रता। अभि √ युज् + घञ् भावे = अभियोगः। कार्ये अभियोगः सुप्-सुपा स०। व्याकुलयति—व्याकुल किया करती है। वि-आ √ कुल् + अच् कर्तरि व्याकुलः। व्याकुलं करोति इति व्याकुल + णिच् + लट्—तिप्। उपाध्याय-सहभूः—आचार्यों की सहज। सह युगपत् भवति इति सह √ भू + किप् कर्तरि = सहभूः उपाध्यायानां सहभूः षष्ठीतत् ०। यह 'दुःशीलता' का विशेषण है। इससे यह सूचित किया गया है कि आचार्य लोग शिष्य के प्रति कठोरता से व्यवहार

२८ मुद्राराक्षसम्

करते हैं। गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में प्राचीन मान्यता भी यही है कि ‘लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः । तस्मात् पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत् ॥’ आजकल इसके विपरीत बरता जा रहा है । नन्दकुलविनाशजनितरोष — नन्दवंश के विनाश से उत्पन्न क्रोध वाला । नन्दस्य कुलम्, तस्य विनाश षष्ठीतत्० । तेन जनितः रोषः यस्य स व्यधिकरणबहुव्रीहि स० । पितृवधामर्षितेन— पिता (पर्वतक) की हत्या के कारण क्रुद्ध । मर्षेण मर्ष √मृष् + घञ्, भावे । न मर्ष अमर्ष । अमर्षः सञ्जात अस्य इति अमर्ष + इतच् = अमर्षित अथवा अमर्षेण योजितः इति अमर्ष + णिच् + क्त कर्मणि = अमर्षित । पितृवधेन अमर्षित तृतीयातत्०, तेन । यह 'मलयकेतुना' का विशेषण है । सकलनन्दराज्यपरिपणनप्रोत्साहितेन — सम्पूर्ण नन्दराज्य को बदले में देने की शर्त से प्रोत्साहित । परि √पण् (व्यवहारे) + ल्युट् भावे = परिपणनम् । सकलं च तत् नन्दराज्यम् कर्मधारय स० । तस्य परिपणनम् षष्ठीतत्० । तेन प्रोत्साहितः तृतीयातत्०, तेन । यह भी 'मलयकेतुना' का विशेषण है । म्लेच्छराजबलेन— म्लेच्छ राजाओं की सेना से । म्लेच्छन्ति इति √म्लेच्छ् + अच् कर्तरि = म्लेच्छाः । तेषां राजानः म्लेच्छराजाः, तेषां बलम् षष्ठीतत्० तेन । वृषलम्— चन्द्रगुप्त पर । वृषल शूद्र को कहते हैं । चन्द्रगुप्त शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुआ था । इसलिए उसे वृषल कहा गया है । वृषं धर्मं लाति नाशयति इति वृषलः वृष् √ला + क । कुछ कोशकारों ने वृषल चन्द्रगुप्त का एक नाम माना है—'वृषलो वृषलः शूद्रे चन्द्रगुप्ते च राजनि' । √वृष् + कलच् = वृषलः, तम् । सर्वलोकप्रकाशम्— सारे संसार के सामने । सर्वे च ते लोकाः कर्मधारय स० । तेषु प्रकाशः सुप्सुपा स०, ततः क्रियाविशेषणत्वात् द्वितीया नपुंसकत्वं च । निस्तीर्णा— पार किया । निर् वा निस् √तॄ + क्त कर्मणि । दुस्तरा— जिसे पार करना कठिन हो । दुर् वा दुस् √तॄ + खल् कर्मणि । उभयत्र 'अपदान्तस्य मूर्धन्यः' इति प्रतिषेधात् न षत्वम् । 'दुष्करः, निष्क्रम्य' इत्यादि तु 'इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य' इत्यनेन षत्वं भवति । प्रकाशीभवन्तम्— फैलती हुई (बात) । न प्रकाशः अप्रकाशः, स च प्रकाशः सम्पद्यमान इति प्रकाशीभवन् प्रकाश + च्वि √भू + लट्—शतृ कर्तरि, तम् । यह 'अर्थम्' का विशेषण है ।

कुतः । यस्य मम—

श्यामीकृत्याननेन्दूनरियुवतिदिशां सन्ततैः शोकधूमैः
कामं मन्त्रिद्रुमेभ्यो नयपवनहृतं मोहभस्म प्रकीर्य ।

प्रथमोऽङ्कः २६

दग्ध्वा सम्भ्रान्तपौरद्विजगणरहितान् नन्दवंशप्ररोहान्
दाह्याभावान्न खेदाज्ज्वलन इव वने शाम्यति क्रोधवह्निः ॥१९॥

अन्वय—(यस्य मम) क्रोधवह्निः अरियुवतिदिशाम् आननेन्दून् सन्ततैः शोकधूमैः श्यामीकृत्य मन्त्रिद्रुमेभ्यः नयपवनहृतं मोहभस्म कामं प्रकीर्य सम्भ्रान्तपौरद्विजगणरहितान् नन्दवंशप्ररोहान् दग्ध्वा वने ज्वलन इव दाह्याभावात् शाम्यति न खेदात् ॥१९॥

व्याख्या—( यस्य मम—चाणक्यस्य ) क्रोधवह्निः—कोपाग्निः, अरियुवतिदिशाम्—अरीणाम् रिपूणाम् नन्दानामिति यावत् युवतयः रमण्यः एव दिशः दिग्भागाः तासाम्, आननेन्दून्—आननानि मुखानि एव इन्दवः चन्द्राः तान्, सन्ततैः—अविच्छिन्नैः, शोकधूमैः—शोकः प्रियमरणादिरूपाः क्लेशभावाः त एव धूमाः तैः, श्यामीकृत्य—मलिनीकृत्य, मन्त्रिद्रुमेभ्यः—मन्त्रिरूपेभ्यो वृक्षेभ्यः नयपवनहृतं—नयः नीतिः तद्रूपेण पवनेन वायुना हृतम् आनीतं, मोहभस्म—कर्तव्यमूढतारूपं भस्म, कामं—यथेप्सितं, प्रकीर्य—विक्षिप्य, सम्भ्रान्तपौरद्विजगणरहितान्—सम्भ्रान्ताः सन्त्रस्ताः मान्याः वा ये पौराः नागरिकाः त एव द्विजगणाः पक्षिसंघाः तैः रहितान् परित्यक्तान्, नन्दवंशप्ररोहान्—नन्दरूपो वंशः वेणुः तस्य प्ररोहाः अङ्कुराः तान्, दग्ध्वा—भस्मसात् कृत्वा, वने—अरण्ये, ज्वलन इव—अग्निरिव दावाग्निरिवेत्यर्थः, दाह्याभावात्—दाह्यस्य भस्मीकरणीयस्य ( अपरस्य वस्तुनः ) अभावात् असत्त्वात्, शाम्यति—विरमति, न खेदात्—नहि श्रमात् ( शाम्यति ) ॥१९॥

हिन्दी अनुवाद—क्योकि, जिस मेरी—क्रोधाग्नि शत्रु-नारी रूपी दिशाओ के मुख रूपी चन्द्रों को घनीभूत शोकरूपी धुंओ से काले करके मन्त्री रूपी वृक्षो पर नीति रूपी वायु के द्वारा लाये हुए मोह रूपी भस्म को प्रचुरता से बिखेरकर भयभीत वा कुलीन नागरिक रूपी पक्षि-समूहों से शून्य नन्द रूपी बाँस के अंकुरों को जलाकर, जंगल मे दावाग्नि के समान, जलाने योग्य वस्तु के अभाव के कारण शान्त हो रही है न कि थकावट के कारण ( शान्त हो रही है ) । ( तात्पर्य यह है कि जैसे वन मे दावाग्नि चारो दिशाओं को धुँएं से मलिन करके सजीव वृक्षो पर राख फैलाकर और पक्षियों से परित्यक्त बाँसों या सूखे वृक्षों को जलाकर शान्त हो जाती है, उसी तरह चाणक्य की क्रोधाग्नि भी शोक से शत्र-स्त्रियों के

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३२ मुद्राराक्षसम्

मौर्यलक्ष्मी स्थिरपदा कृता, कोपप्रीत्यो द्वयो सारम् द्वितयम् फलम् अभियुक्तेन
मनसा द्विषति च सुहृदि च तुल्य विभक्तम् ॥१३॥

व्याख्याभुव—पृथिव्या, हृदयरोगा इव—हृदयस्य रोगा व्याधय इव, नव—एतत्संख्यका, नन्दा—सर्वार्थसिद्धे नवपुत्रा अथवा अष्टपुत्रसमेतो नन्द, समुत्खाता—समूलमुन्मूलिता, सरसि—सरोवरे, नलिनी इव—कमलिनी इव, मौर्ये—चन्द्रगुप्ते, लक्ष्मी—राज्यश्री, स्थिरपदा—निश्चलस्थिति, कृता—विहिता, कोपप्रीत्यो—कोप अवज्ञाजनित क्रोध प्रीति सेवाजनित प्रसाद तयो, द्वयो—उभयो, सारम्—न्याय्यम्, द्वितय—द्विविध, फलम्—परिणामम्, अभियुक्तेन—निविष्टेन, मनसा—चेतसा, द्विषति च—शत्रौ च, सुहृदि च मित्रे च, तुल्य—समान, विभक्तम्—विभज्य स्थापितम् ॥१३॥

हिन्दी अनुवाद—सो मैं इस समय प्रतिज्ञा के बोझ को उतार चुकने पर भी चन्द्रगुप्त के लिए शस्त्र धारण कर रहा हूँ। जिस मैंने—

पृथ्वी के हृदय-रोग के समान नौ नन्दों को उखाड़ फेंका है, सरोवर में कमलिनी की भांति चन्द्रगुप्त में राज्यलक्ष्मी को अचल कर डाला है और (इस प्रकार) क्रोध और प्रसन्नता दोनों के दो प्रकार के न्यायोचित फल (निग्रह और अनुग्रह) को पूरे मनोयोग से शत्रु (नन्द) और मित्र (चन्द्रगुप्त) में बांट दिया है ॥१३॥

टिप्पणीअवसितप्रतिज्ञाभर—प्रतिज्ञा के कष्ट से निवृत्त हो चुकने वाला। अव √सो + क्त कर्मणि = अवसित। वृषलापेक्षया—चन्द्रगुप्त के अनुरोध से। अत्र हेतौ तृतीया। शस्त्र धारयामि—शस्त्र (वेत्रयष्टि या तलवार) धारण करता हूँ। यह इसलिए कहा गया है कि चाणक्य उस समय चन्द्रगुप्त के प्रधान मन्त्री थे और युद्ध के अवसर पर प्रधान मन्त्री को सेनापतित्व का भार भी संभालना पड़ता था। हृदयरोगा—हृदय के रोग या शूल। हृदयस्य रोगा हृदयरोगा। 'वा शोकष्यञ्रोगेषु' इस सूत्र से विकल्प से हृदय को हृद् आदेश होने के कारण 'हृद्रोगा' और 'हृदयरोगा', दोनों रूप साधु हैं। द्वितयम्—दो प्रकार का। द्वौ अवयवौ अस्य इति द्वि + तयप्। इस पद्य में उत्प्रेक्षा अलङ्कार, उपमा अलङ्कार और यथासंख्य अलङ्कार की संसृष्टि है और शिखरिणी छन्द है। इसका लक्षण यह है—'रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी' ॥१३॥

प्रथमोऽङ्कः । ३३

अथवा, अगृहीते राक्षसे किमुत्खातं नन्दवंशस्य, किं वा स्थैर्यमुत्पादितं चन्द्रगुप्तलक्ष्म्याः [ विचिन्त्य ] अहो ! राक्षसस्य नन्दवंशे निरतिशयो भक्तिगुणः । स खलु कस्मिंश्चिदपि जीवति नन्दान्वयावयवे वृषलस्य साचिव्यं ग्राहयितुं न शक्यते । तदभियोगं प्रति निरुद्योगः शक्यः अवस्थापयितुमस्माभिः इति अनयैव बुद्ध्या तपोवनं गतोऽपि घातितस्तपस्वी नन्दवंशीयः सर्वार्थसिद्धिः । यावदसौ मलयकेतुमङ्गीकृत्य अस्मदुच्छेदाय विपुलतरं प्रयत्नम् उपदर्शयत्येव । [प्रत्यक्षवदाकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा] साधु, अमात्य राक्षस ! साधु । साधु, श्रोत्रिय ! साधु । साधु, मन्त्रिवृहस्पते ! साधु ! कुतः—

व्याख्या—अथवा—पक्षान्तरे, अगृहीते—अवशीकृते, राक्षसे—नन्दामात्ये, नन्दवंशस्य—नन्दकुलस्य, किम्, उत्खातम्—उन्मूलितम् न किञ्चिदपीत्यर्थः, वा—अथवा, चन्द्रगुप्तलक्ष्म्याः—वृषलराज्यश्रियः, किम्, स्थैर्यं—स्थिरता, उत्पादितं—जनितं न किमपीत्यर्थः । विचिन्त्य—विचार्य, अहो—आश्चर्य, राक्षसस्य, नन्दवंशे, निरतिशयः—अत्यधिकः, भक्तिगुणः—भक्तिरूपो गुणः (अस्ति) । सः—राक्षसः, खलु—निश्चितं, कस्मिंश्चिदपि—नगण्येऽपि, नन्दान्वयावयवे नन्दान्वयस्य नन्दवंशस्य अवयवे अंशे, जीवति—प्राणधारणं कुर्वति (सति), वृषलस्य, साचिव्यम्—अमात्यत्वम्, ग्राहयितु, कारयितु, न शक्यते—न क्षम्यते । तदभियोगं प्रति—तस्य नन्दान्वयावयवम्य अभियोगं प्रति प्रतिष्ठापनाभिमानं प्रति, निरुद्योगः—उद्यमहीनः, अवस्थापयितुम्—आसयितुम्, अस्माभिः शक्यः, इति अनयैव बुद्ध्या—एवमेव मत्वा, नन्दवंशीयः—नन्दकुलोत्पन्नः, तपस्वी—वराकः, सर्वार्थसिद्धिः, तपोवनं गतोऽपि—तपस्यार्थमरण्यं यातोऽपि, घातितः—नाशितः । यावत्—पक्षान्तरे, असौ—राक्षसः, मलयकेतुम्, अङ्गीकृत्य—स्वीकृत्य, अस्मदुच्छेदाय—अस्माकमुन्मूलनाय, विपुलतरम्—अत्यन्तम्, प्रयत्नम्—उद्योगम्, उपदर्शयत्येव—प्रकटयत्येव । प्रत्यक्षवत्—दृष्टिगोचरे वस्तुनि इव, आकाशे—गगने, लक्ष्यं बद्ध्वा—दृष्टिं विधाय, साधु अमात्य राक्षस, साधु—श्लाघनीयमेतत् कार्यं ते, साधु, श्रोत्रिय—सुब्राह्मण, साधु—सुन्दरमेतत्ते । साधु, मन्त्रिवृहस्पते—बृहस्पतितुल्य-मन्त्रिन्, साधु—शोभनमेतत्ते कुतः—यतो हि—

हिन्दी अनुवाद—अथवा राक्षस को वश में किये बिना मैंने नन्दवंश का

मु० रा०—३

३४मुद्राराक्षसम्

क्या उच्छेद किया ? और क्या चन्द्रगुप्त की राजलक्ष्मी को स्थिर कर लिया ? [सोचकर] ओह ! नन्दवंश के प्रति राक्षस का भक्तिरूप गुण महान् है। वह नन्दवंश के किसी भी अंश (व्यक्ति) के जीवित रहते चन्द्रगुप्त का मन्त्री नहीं बनाया जा सकता और (इसलिए) नन्दवंश के अंश को राज्य पर प्रतिष्ठित करने के प्रति उसे उद्यमहीन बनाने के विचार से ही हमने बेचारे नन्दवंशी सर्वार्थसिद्धि को तपोवन में चले जाने पर भी मरवा डाला। किन्तु तब भी यह मलयकेतु का सहारा लेकर हमारी जड़ खोदने के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न दिखा ही रहा है। [ प्रत्यक्ष के समान आकाश में दृष्टि बांधकर अर्थात् मानो शून्य में राक्षस को ही एकटक देखते हुए ] धन्य हो अमात्य राक्षस, (तुम) धन्य हो। धन्य हो द्विजवर ! धन्य हो। बृहस्पति-तुल्य मन्त्री ! धन्य हो। क्योंकि—

टिप्पणीअगृहीते—वशीभूत किये गये बिना। यह 'राक्षस' का विशेषण है, जिसमें 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' से सप्तमी हुई है। राक्षस को वश में करना ही चाणक्य का लक्ष्य है और यही इस नाटक का मुख्य उद्देश्य है।

उत्खातम्—उन्मूलन किया। उत् √खन् + क्त कर्मणि। स ग्राहयितु शक्यते—यह कर्मवाच्य का प्रयोग है। कर्तृवाच्य में होगा—'तं ग्राहयितु शक्नोमि'।

तपस्वी—बेचारा। यावत्—पक्षान्तर। 'यावत् साकल्यऽवधारणे' इत्युपक्रम्य 'पक्षान्तरे च' इति मेदिनी। यहाँ एक पक्ष तो है सर्वार्थसिद्धि के मरवा डालने पर राक्षस को चन्द्रगुप्त के विरोध करने से विरत किया जा सकता है और दूसरा पक्ष है सर्वार्थसिद्धि के मरवा डालने पर भी राक्षस विरोध कर ही रहा है।

अस्मदुच्छेदाय—हमारे विनाश के लिए। अस्माकम् उच्छेद अस्मदुच्छेद , तस्मै। तादर्थ्ये चतुर्थी। अमात्य—मन्त्री। अमा = सह वसति इत्यर्थे अमा + त्यप् = अमात्य । सम्बोधने अमात्य इति। श्रोत्रिय—वेदविद्यासम्पन्नब्राह्मण। इसका लक्षण यह है—'जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारै द्विज उच्यते। विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभि श्रोत्रिय उच्यते।' छन्द अधीते इति छन्दस् + घ, छन्दस इत्यस्य श्रोत्रा-देशश्च 'श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते' इत्यनेन = श्रोत्रिय। मन्त्रिवृहस्पते—बृहस्पति के समान मन्त्री। बृहता वाचा पति. बृहस्पति. 'तद्बृहतो करपत्यो.'—इत्यनेन सुट् तलोपश्च। मन्त्री वृहस्पतिरिव इति मन्त्रिवृहस्पति- उपमितसमास। सम्बोधने मन्त्रिवृहस्पते इति।

प्रथमोऽङ्कः ३५

ऐश्वर्यादनपेतमीश्वरमयं लोकोऽर्थतः सेवते
तं गच्छन्त्यनु ये विपत्तिषु पुनस्ते तत्प्रतिष्ठाशया ।
भर्तुर्ये प्रलयेऽपि पूर्वसुकृतासङ्गेन निःसङ्गया
भक्त्या कार्यधुरां वहन्ति न हि ते दुर्लभास्त्वादृशाः ॥१४॥

**अन्वयः—**अयं लोकः ऐश्वर्यात् अनपेतम् ईश्वरम् अर्थतः सेवते । ये पुनः विपत्तिषु तमनुगच्छन्ति ते तत्प्रतिष्ठाशया । त्वादृशाः कृतिनः ये भर्तुः प्रलयेऽपि पूर्वसुकृतासङ्गेन निःसङ्गया भक्त्या कार्यधुरां वहन्ति ते दुर्लभाः ॥१४॥

व्याख्या—अयम्—एषः, लोकः—संसारः, ऐश्वर्यात्—वैभवात्, अनपेतम्—युक्तम्, ईश्वरम्—स्वामिनम्, अर्थतः—प्रयोजनवशात्, सेवते—भजते । ये पुनः—पक्षान्तरे ये जनाः, विपत्तिषु—आपत्तिकालेषु, तम्—स्वामिनम्, अनुगच्छन्ति—अनुसरन्ति, ते जनाः, तत्प्रतिष्ठाशया—तस्य स्वामिनः या प्रतिष्ठा, पुनः राज्य-प्राप्तिः तत्र या आशा अपेक्षा तयैव (तथा कुर्वन्ति) । त्वादृशाः—भवादृशाः, कृतिनः—कृतराजकृत्याः, कृतज्ञा वा, ये, भर्तुः—स्वामिनः, प्रलयेऽपि—नाशेऽपि, पूर्वसुकृतासङ्गेन—पूर्वसुकृतस्य पूर्वकृतोपकारस्य, आसङ्गेन सम्बन्धेन अविस्मर-णेनेत्यर्थः, निःसङ्गया—फलासक्तिरहितया, भक्त्या—अनुरागेण, कार्यधुरां—कर्तव्यभारं, वहन्ति—धारयन्ति, ते, दुर्लभाः—दुष्प्रापाः ( भवन्ति ) ॥१४॥

**हिन्दी अनुवाद—**यह संसार स्वार्थ-साधन के लिए सम्पत्तिशाली स्वामी की सेवा करता है और जो विपत्ति के समय स्वामी का अनुगमन करते हैं, वे स्वामी की पुनः राज्य-प्राप्ति की आशा से ( ऐसा करते हैं ) । किन्तु तुम्हारे जैसे कर्मवीर, जो स्वामी के मर जाने पर भी पहले से किये हुए उपकार के अविस्मरण से निःस्वार्थ भक्ति के द्वारा कार्य के भार को वहन करते हैं (अर्थात् उसी का कार्य करते चलते हैं), वे दुर्लभ होते हैं ॥१४॥

टिप्पणी—अर्थतः—स्वार्थवश । हेतौ तृतीया । ततः तस् । तम्—अत्र अनु इति कर्मप्रवचनीययोगे द्वितीया । तत्प्रतिष्ठाशया—उसकी प्रतिष्ठा या अभ्युदय की आशा से । प्रति √स्था + अङ् भावे = प्रतिष्ठा । तस्य प्रतिष्ठा तत्प्रतिष्ठा षष्ठीतत्० । तस्याम् आशा तत्प्रतिष्ठाशा सुप्सुपा स०, तया । हेतौ तृतीया । कृतिनः—कृतकार्य, जिन्होंने अच्छे कार्य किये हों । कृतम् अस्ति एषाम् इति कृत + इनि । पूर्वसुकृतासङ्गेन—पूर्व किये गये उपकार की स्मृति अथवा