भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

१५६ मुद्राराक्षस-

यह प्रख्यात हुआ। मार्टिन साहब ने जरासन्ध ही के विषय मे एक अपूर्व कथा लिखी है। वह कहते हैं कि जरासन्ध दो पहाडियों पर दो पैर रख कर द्वारका मे जब स्त्रिया नहाती थी तो ऊचा होकर उन को घूरता था। इसी अपराध पर ५ श्रीकृष्ण ने उस को मरवा डाला ! ! ! मगध शब्द मग से बना है। कहते हैं कि "श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने शाकद्वीप से मग जाति के ब्राह्मणों को अनु ष्ठान करने को बुलाया था और वे जिस देश मे बसे उस की मगध सज्ञा हुई।" जिन अगरेज विद्वानों ने 'मगध देश' १० शब्द को मद्ध (मध्यदेश) का अपभ्रंश माना है उन्ह शुद्ध भ्रम हो गया है जैसा कि मेजर विल्फर्ड पालीबोत्रा को राजमहल के पास गङ्गा और कोसी के सङ्गम पर बतलाते और पटने का शुद्ध नाम पद्मावती कहते हैं। यों तो पाली इस नाम के कई शहर हिन्दुस्तान मे प्रसिद्ध हैं किन्तु पालीबोत्रा पाट १५ लिपुत्र ही है। सोन के किनारे मावलीपुर एक स्थान है जिस का शुद्ध नाम महाबलीपुर है। महाबली नन्द का नामान्तर भी है, इसी से और वहा प्राचीन चिन्ह मिलने से कोई कोई शंका करते हैं, कि बलीपुर वा बलीपुत्र का पालीबोत्रा अप- भ्रंश है, किन्तु यह भी भ्रम ही है। राजाओ के नाम से अनेक २० ग्राम बसते हैं इस मे कोई हानि नही, किन्तु इन लोगों की राजधानी पाटलिपुत्र ही थी। कुछ विद्वानों का मत है कि मग लोग मिश्र से आए और यहा आकर siris और Osiris नामक देव और देवी की पूजा प्रचलित की। यह दोनों शब्द ईश और ईश्वरी के अप २५ भ्रंश बोध होते हैं। किसी पुराण मे "महाराज दशरथ ने शाकद्वीपियों को बुलाया" यह लिखा है। इस देश मे पहले कोल और चेरु (चोल) लोग बहुत रहते थे। शूनक और

उपसंहार ( उत्तर ) ख ' १५७

अजक इस वंश में प्रसिद्ध हुए। कहते हैं कि इन दोनों को लड़ कर ब्राह्मण ने निकाल दिया। इसी इतिहास से भुइहार जाति का भी सूत्रपात होता है और जरासन्ध के यज्ञ में भुइहारों की उत्पत्ति वाली किम्बदन्ती इस का पोषण करती है। बहुत दिन तक ये युद्धप्रिय ब्राह्मण यहां राज्य करते रहे। किन्तु एक जैन पण्डित 'जो ८०० वर्ष ईसामसीह के पूर्व हुआ है' लिखता है कि इस देश के प्राचीन राजा को मग नामक राजा ने जीत कर निकाल दिया। कहते हैं कि बिहार के पास बारागज में इसके किले का चिन्ह भी है। यूनानी विद्वानों और वायु पुराण के मत से उदयाश्व ने मगधराज संस्थापन किया। इसका समय ५५० ई० पू० बतलाते हैं और चन्द्रगुप्त को इस से तेरहवां राजा मानते हैं। यूनानी लोगों ने सोन का नाम Erannobaos (इरन्नोबाओस लिखा है), यह शब्द हिरण्यवाह का अपभ्रंश है। हिरण्यवाह, स्वर्णनद और शोण का अपभ्रंश सोन है। मेगास्थिनस अपने लेख में पटने के नगर को ८० स्टेडिया (आठ मील) लम्बा और १५ चौड़ा लिखता है, जिस से स्पष्ट होता है कि पटना पूर्वकाल ही से लम्बा नगर है * उस ने उस समय नगर के चारों ओर ३० फुट गहरी खाई, फिर ऊंची


* जिस पटने का वर्णन उस काल के यूनानियों ने उस समय इस धूम से किया है उस की वर्तमान स्थिति यह है। पटने का जिला २४° ५८′ से २५° ४२′ लैटि० और ८४° ४४′ से ८६° ०५′ लौंगि० पृथ्वी २१०१ मील समचतुष्कोण १५५६६३८ मनुष्य संख्या। पटने की सीमा उत्तर गंगा, पश्चिम सोन, पूर्व मुंगेर का जिला और दक्षिण गया का जिला। नगर की बस्ती अब सवा तीन लाख मनुष्य और बावन हजार घर हैं। साढ़े आठ लाख मन के लगभग बाहर से प्रतिवर्ष यहां माल आता और पांच लाख मन के लगभग जाता है। हिन्दुओं में छः जातियां यहां विशेष हैं। यथा एक लाख अस्सी हजार ग्वाला, एक लाख सत्तर हजार कुनबी, एक लाख सत्रह हजार भुइहार, पचासी हजार चमार, अस्सी हजार काइरी और आठ हजार राजपूत, अब दो लाख के आस पास मुसलमान पटने के ज़िले में बसते हैं।

१५८ मुद्राराक्षस—

दीवार और उस मे ५७० बुर्ज और ६४ फाटक लिखे है। यूनानी लोग जो इस देश को Prassi प्रास्सि कहते है वह पलाशी का अपभ्रंश बोध होता है, क्योंकि जैनग्रन्थों मे उस भूमि के पलाश वृत्त से आच्छादित होने का वर्णन देखा गया है। ५ जैन और बौद्धों से इस देश से और भी अनेक सम्बन्ध हैं। मसीह से छ सौ बरस पहले बुद्ध पहले पहल राजगृह ही मे उदास हो कर चले गए थे। उस समय इस देश की बड़ी समृद्धि लिखी है और राजा का नाम बिम्बसार लिखा है। (जैन लोग अपने बीसवे तीर्थङ्कर सुव्रत स्वामी का राजगृह में १० कल्याणक भी मानते है)। बिम्बसार ने राजधानी के पास ही इनके रहने को कलंद नामक बिहार भी बना दिया था फिर अजातशत्रु और अशोक के समय मे भी बहुत से स्तूप बने। बौद्धों के बडे बडे धर्मसमाज इस देश मे हुए। उस काल में हिन्दू लोग इस बौद्ध धर्म के अत्यन्त विद्वेषी थे। क्या १५ आश्चर्य्य है कि बुद्धों के द्वेष ही से मगध देश को इन लोगों ने अपवित्र ठहराया हो और गौतम की निन्दा ही के हेतु अहल्या की कथा बनाई हो।

भारत नक्षत्र नक्षत्री राजा शिवप्रसाद साहब ने अपने

इतिहास तिमिरनाशक के तीसरे भाग मे इस समय और देश २० के विषय में जो लिखा है वह हम पीछे प्रकाशित करते है। इस से बहुत सी बाते उस समय की स्पष्ट हो जायगी।

प्रसिद्ध यात्री हिआन सांग सन ६३७ ई० मे जब भारत

वर्ष मे आया था तब मगध देश हर्षवर्द्धन नामक कन्नौज के राजा के अधिकार मे था। किन्तु दूसरे इतिहासलेखक सन् २५ २०० से ४०० तक बौद्ध कर्णवंशी राजाओ को मगध का राजा बतलाते है और अन्ध्रवंश का भी राज्यचिन्ह सम्भलपुर मे दिखलाते हैं।

उपसंहार (अक्षर ख। १५६

सन् १२६२ ई० मे पहिले इस देश मे मुसलमानों का राज्य हुआ। उस समय पटना, बनारस के बन्दावत राजपूत राजा इन्द्रदमन के अधिकार मे था। सन् १२२५ मे अलतिमश ने गयासुद्दीन को मगध प्रान्त का स्वतन्त्र सूबेदार नियत किया। इस के थोड़े ही काल पीछे फिर हिन्दू लोग स्वतन्त्र हो गए। ५ फिर मुसलमानों ने लडकर अधिकार किया सही, किन्तु झगड़ा नित्य होता रहा। यहा तक कि सन् १३६३ मे हिन्दू लोग स्वतन्त्र रूप मे फिर यहा के राजा हो गए और तीसरे महमूद की बड़ी भारी हार हुई। यह दो सौ बरस का समय भारतवर्ष का पैलेस्टाइन का समय था। इस समय में गया के उद्धार के १० हेतु कई महाराणा उदयपुर के देश छोड़ कर लड़ने आए *।


* गया के भूगोल में पण्डित शिवनारायण त्रिवेदी भी लिखते हैं—"औरंगाबाद से तीन कोस अग्निकोण पर देव बडी भारी बस्ती है। यहां श्रीभगवान सूर्यनारायण का बड़ा भारी सगीन पश्चिम रुख का मन्दिर है। यह मन्दिर देखने से बहुत प्राचीन जान पड़ता है। यहां कातिक और चैत को छठ को बडा मेला लगता है। दूर दूर के लोग यहां आते और अपने लड़कों का मुण्डन छेदन आदि की मनौती उतारते हैं। मन्दिर से थोड़ी दूर दक्खिन बाजार के पूरब ओर सूर्य्यकुण्ड का तालाब है। इस तालाब से सटा हुआ और एक कच्चा तालाब है उस में कमल बहुत फूलते हैं। व राजनी है। यहां के राजामहाराजा उदयपुर के घराने के मडियार राजपूत हैं। इस घराने के लोग सिपाहगरी के काम में बहुत प्रसिद्ध होते आये हैं। यहां के महाराज श्रीजयप्रकाश सिंह के० सी० एस० आई० बड़े शूर सुशील और उदार मनुष्य थे। यहां से दो कोस दक्खिन कञ्चनपुर में राजा साहिब का बाग और मकान देखने लायक बना है। देव से तीन कोस पूरब उमगा एक छोटी सी बस्ती है, उस के पास पहाड़ के ऊपर देव के सूर्य्यमन्दिर के ढंग का एक महादेव का मंदिर है। पहाड़ के नीचे एक टूटा गढ़ भी देख पड़ता है। जान पड़ता है कि पहले राजा देव के घराने के लोग यहां ही रहते थे, पीछे देव में बसे, देव और उमगा दोनो इन्हीं के राजधानी थी, इस से दोनो नाम साथ ही बोले जाते हैं (देवमूगा)। तिल संक्रान्ति को उमगा में बड़ा मेला लगता है।" इससे स्पष्ट हुआ कि उदयपुर से जो राणा लोग आये उन्ही के खानदान में देव के राजपूत हैं। और बिहारदर्पण से भी यह बात पाई जाती है कि मटियारे लोग मेवाड से आये हैं।

१६० मुद्राराक्षस -

ये और पञ्जाब से लेकर गुजरात दक्षिण तक के हिन्दू मगध देश मे जाकर प्राणत्याग करना बडा पुण्य समझते थे। प्रजा पाल नामक एक राजा ने सन् १४०० के लगभग बोस बरस मगध देश को स्वतन्त्र रक्खा। किन्तु आय्यमत्सरी दैव ने यह स्वतन्त्रता स्थिर नही रक्खी और पुण्यधाम गया फिर मुसलमानों के अधिकार में चला गया। सन् १४७८ तक यह प्रदेश जौनपुर के बादशाह के अधिकार म रहा। फिर बहलोलवश ने इस को जीत लिया था, किन्तु १०६१ मे सनशाह ने फिर जीत लिया। इस के पीछे बगाल के पठानां से और जोनपुर वालों से कई लड़ाई हुई और १४६४ मे दोनों राज्य मे एक सुलहनामा हो गया। इस के पीछे सूर लोगों का अधिकार हुआ और शेरशाह ने बिहार छोड कर पटने को राजधानी किया। सूरों के पीछे क्रमान्वय से (१५७५ ई०) यह देश मुगलों के अधीन हुआ और अन्त में जरासन्ध और चन्द्रगुप्त की राजधानी पवित्र पाटलिपुत्र ने आर्य्य वेश और आर्य्य नाम परित्याग कर के औरङ्गजेब के पोते अजीमशाह के नाम पर अपना नाम अजीमाबाद प्रसिद्ध किया। (१६६७ ई०) बगाले के सूबेदारो में सब से पहले सिराजुद्दौला ने अपने को स्वतन्त्र समझा था किन्तु १७५७ ई० की पलासी की लडाई मे मीरजाफर अङ्गरेजो के बल से बिहार, बगाला और उडीसा का अधिनायक हुआ। किन्तु अन्त मे जगद्विजयी अङ्गरेजो ने सन १७६३ मे पूर्व मे पटना अधिकार करके दूसरे बरस बक्सर की प्रसिद्ध लड़ाई जीत कर स्वतन्त्र रूप से सिहचिन्ह की ध्वजा की छाया के नीचे इस देश के प्रात मात्र को हिन्दुस्तान के मानचित्र मे लाल रङ्ग से स्थापित कर दिया।

उपसंहार ( अक्षर ) ख । १६१

जस्टिन (Justin) कहता है—(१) सन्द्रकुत्तस महापराक्रमी था। असंख्य सैन्य संग्रह कर के विरुद्ध लोगों का इसने सामना किया था। डियोडारस सिक्यूलस (Deodorus Siculus) कहता है—(२) प्राच्यदेश के राजा जन्द्रमा के पास २०००० अश्व, २००००० पदाति, २००० रथ और ४००० हाथी थे। यद्यपि यह Xandramas शब्द चन्द्रमा का अपभ्रंश है, किन्तु कई भ्रान्त यूनानियों ने नन्द को भी इसी नाम से लिखा है। क्विन्तस करशिअस (Quintus Curtius) लिखता है—(३) चन्द्रमा के जौरकार पिता ने पहले मगध राज को फिर उस के पुत्रों को नाश कर के रानी के गर्भ से अपने उत्पन्न किए हुए पुत्र को गद्दी पर बैठाया। स्ट्राबो (Strabo) कहता है—४) सेल्युकस ने मेगास्थनिस को सन्द्रकुत्तस के निकट भेजा और अपना भारतवर्षीय समस्त राज्य देकर उस से सन्धि कर लिया। ओरियन (Orriun) लिखता है—(५) मेगास्थनिस अनेक बार सन्द्रकुत्तस की सभा मे गया था। प्लूटार्क (Plutarch) ने (६) चन्द्रगुप्त को दो लक्ष सेना का नायक लिखा है। इन सब लेखो को पौराणिक वर्णनों से मिलाने से यद्यपि सिद्ध होता है कि सिकन्दरकृत पुरुपराजय के पीछे मगधराज मन्त्री द्वारा निहत हुए और उनके लड़के भी उसी गति को पहुंचे और उसके पीछे चन्द्रगुप्त राजा हुआ, किन्तु बहुत से यूनानी लेखकों ने


(1) Justin His Phellipp Lib XV Chap IV
(2) Deodorus Siculus XVII 93
(3) Quintus Curtius IX 2
(4) Strabo XV 2 9
(5) Orriun Indica X 5
(6) Plutarch Vita Alexandri O. 62

१६२ मुद्राराक्षस—

चन्द्रगुप्त को पट्टरानी के गर्भ मे औरकार से उत्पन्न लिख कर व्यर्थ अपने को भ्रम मे डाला है। चन्द्रगुप्त क्षत्रियवीर्य से दासी मे उत्पन्न था यह सब साधारण का सिद्धान्त है। (७) इस क्रम से ३२७ ई० पू० मे नन्द का मरण और ३१४ ई० पू० मे चन्द्र- ५ गुप्त का अभिषेक निश्चय होता है। पारसदेश की कुमारी के गर्भ से सिल्यूकस को जो एक अति सुन्दर कन्या हुई थी वही चन्द्रगुप्त को दी गई। ३०२ ई० पू० मे यह सन्धि और विवाह हुआ इसी कारण अनेक यवनसेना चन्द्रगुप्त के पास रहती थी। २६२ ई०पू० मे चन्द्रगुप्त २४ बरस राज्य कर के मरा।

१० चन्द्रगुप्त के इस मगधराज्य को आइनेअकबरी मे मकता लिखा है। डिग्विगनेस ( Deguignes ) कहता है कि चीनी मगध देश को मकियात कहते है। केम्फर ( Kemfer ) लिखता है कि जापानी लोग उस को मगत् कफ कहते ह । ( कफ शब्द जापानी मे देशवाची है।) प्राचीन फारसी लेखकों १५ ने इस देश का नाम मावाद वा मुवाद लिखा है। मगधराज्य में अनुगाग प्रदेश मिलने ही से तिब्बतवाले इस देश को अनु खेक वा अनोनाखेक कहते है, और तातारवाले इस देश को एनाकाक लिखते है।

सिसली डिउडारस ने लिखा है, कि मगधराजधानी पाली २० पुत्र भारतवर्षीय हर्क्यूलस (हरि कुल) देवता द्वारा स्थापित हुई। सिसिरो ने हर्क्यूलस (हरिकुल) देवता का नामान्तर बेलस (बल) लिखा है। बल शब्द बलदेव जी का बोध करता है और इन्ही का नामान्तर बली भी है। कहते है कि निज पुत्र अङ्गद के निमित्त बलदेव जी ने यह पुरी निर्माण की,


(७) टाट आदि कई लोगो का अनुमान है कि मेरी वश के चौहान जो बापाराव के पूर्व चित्तोर क राजा थे वे भी मौर्य थे। क्य। चन्द्रगुप्त चौहान था ? या ये मोर। सब शूद्र थ ?

उपसंहार ( अक्षर ) ख । १६३

इसी से बलीपुत्र पुरी इस का नाम हुआ । इसी से पालीपुत्र और फिर पाटलीपुत्र हो गया । पाली भाषा, पाली धर्म, पाली देश इत्यादि शब्द भी इसी से निकले हैं । कहते हैं बाणासुर के बसाए हुए जहा तीन पुर थे उन्हो को जीत कर बलदेव जी ने अपने पुत्रों के हेतु पर निर्माण किए । यह तीनों नगर ५ महाबलीपुर इस नाम से एक मद्रास हाते मे, एक बिदर्भदेश मे ( मुजफ्फरपुर वर्त्तमान नाम ) और एक ( राजमहल वर्त्तमान नाम से ) वङ्गदेश मे है । कोई कोई बालेश्वर, मैसूर, पुरनिया प्रभृति को भी बाणासुर की राजधानी बतलाते हैं । यहा एक बात बड़ी विचित्र प्रकट होती है । बाणासुर भी १० बलीपुत्र है । क्या आश्चर्य है कि पहले उसी के नाम से बली- पुत्र शब्द निकला हो । कोई नन्द ही का नामान्तर महाबली कहते हैं और कहते हैं कि पूर्व मे गङ्गाजी के किनारे नन्द ने केवल एक महल बनाया था, उसके चारों ओर लोग धीरे २ बसने लगे और फिर यह पत्तन ( पटना ) हो गया । कोई १५ महाबली के पितामह उदसी उदासो, उदय, श्रीउदय सिह ( ? ) ने ४५० ई० पू० इस को बसाया मानते हैं । कोई पाटली देवी के कारण पाटलिपुत्र नाम मानते हैं ।

विष्णुपुराण और भागवत में महापद्म के बड़े लडके का नाम सुमाल्य लिखा है । बृहत्कथा मे लिखते हैं कि शकटाल २० ने इन्द्रदत्त का शरीर जला दिया इस से योगानन्द ( अर्थात् नन्द के शरीर मे इन्द्रदत्त की आत्मा ) फिर राजा हुआ । व्याड़ि जाने के समय शकटाल को नाश करने का मन्त्र दे गया था । वररुचि मन्त्री हुआ किन्तु योगानन्द ने मदमत्त हो कर उसको नाश करना चाहा इस से वह शकटार के घर मे २५ छिपा । उस की स्त्री उपकोशा पति को मृत समझ कर सती हो गई । योगानन्द के पुत्र हिरण्यगुप्त के पागल होने पर वररुचि फिर राजा के पास गया था, किन्तु फिर तपोवन में

१६४ मुद्राराक्षस-

चला गया। फिर शकटाल के कौशल से चाणक्य नन्द के नाश का कारण हुआ। उसी समय शकटाल ने हिरण्यगुप्त को कि योगानन्द का पुत्र था उस को मार कर चन्द्रगुप्त को, जो कि असली नन्द का पुत्र था, गद्दी पर बैठाया। ५ ढुंढि पण्डित लिखते हे कि सर्वार्थसिद्धि नन्दों मे मुख्य था। इस को दो स्त्रिया थी। सुनन्दा बड़ी थी और दूसरी शूद्रा थी, उस का नाम मुरा था। एक दिन राजा दोनों रानियों क साथ एक ऋाष के यहा गया और ऋषिकृत मार्जन के समय सुनन्दा पर नौ और मुरा पर एक छींट पानी की पड़ी। १० मुरा ने ऐसी भक्ति से उस जल को ग्रहण किया कि ऋषि ने प्रसन्न हो कर वरदान दिया। सुनन्दा को एक मासपिण्ड और मुरा को मौर्य उत्पन्न हुआ। राक्षस ने मास पिण्ड काट कर नौ टुकड़े किया, जिससे नौ लड़के हुए। मौर्य को सौ लडके थे, जिस मे चन्द्रगुप्त सब से बड़ा बुद्धि १५ मान् था। सर्वार्थसिद्धि ने नन्दों को राज्य दिया और आप तपस्या करने लगा। नन्दों ने ईर्षा से मौर्य और उस के लड़कों को मार डाला, किन्तु चन्द्रगुप्त चाणक्य ब्राह्मण के पुत्र विष्णु- गुप्त की सहायता से नन्दों को नाश कर के राजा हुआ। योंही भिन्न २ कवियों और विद्वानों ने भिन्न भिन्न कथाये २० लिखी है। किन्तु सब के मूल का सिद्धान्त पास पास एक ही आता है। इतिहासतिमिरनाशक मे इस विषय मे जो कुछ लिखा है वह नीचे प्रकाश किया जाता है। बिम्बसार को उस के लड़के अजातशत्रु ने मार डाला। २५ मालूम होता है कि यह फसाद ब्राह्मणों ने उठाया। अजातशत्रु बौद्ध मत का शत्रु था। शाक्यमुनि गौतम बुद्ध श्रावस्ति मे रहने लगा। यहा भी प्रसेनजित को उस के बेटे ने गद्दी से उठा दिया, शाक्यमुनि गौतम बुद्ध कपिलवस्तु मे गया।

उपसंहार ( अख्तर ) ख । १६५

अजातशत्रु की दुश्मनी बौद्ध मत से धीरे धी बहुत कम हो गयी । शाक्यमुनि गौतम बुद्ध फिर मगध मे गया । पटना उस समय एक गाव था, वहा हरकारों की चौकी में ठहरा । वहा से विशाली (१) मे गया । विशाली की रानी एक वेश्या थी । वहां से पावा (२) गया, वहा से कुशीनार गया । बौद्धों के लिखने बमूजिब उसी जगह सन् ईसवी ५४३ बरस पहले ८० बरस की उमर मे साल के वृक्ष के नीचे बाई करवट लेटे हुए इस का निर्वाण (३) हुआ । काश्यप उस का जानशीन हुआ । अजातशत्रु के पीछे तीन राजा अपने बाप को मार कर मगध की गद्दी पर बैठे, यहा तक कि प्रजा ने घबराकर विशाला की वेश्या के बेटे शिशुनाग मन्त्री को गद्दी पर बैठा दिया । यह बड़ा बुद्धिमान था । इस के बेटे काल अशोक ने, जिस का नाम ब्राह्मणों ने काकवर्ण भी लिखा है, पटना अपनी राजधानी बनाया ।

जब सिकन्दर का सेनापति बावेल का बादशाह सिल्यूकस सूबेदारों के तदारुक को आया, पटने से सिन्धु किनारे तक नन्द के बेटे चन्द्रगुप्त के अमल दखल मे पाया, बड़ा


(१) जैनी महावीर के समय विशाली अथवा विशाला का राजा चेटक * बतलाते हैं, यह जगह पटना के उत्तर तिरहुत में है, उजड गयी है । वहा बाले अब उसे बसहर पुकारते हैं ।

(२) जैनी यहा महावीर का निर्वाण बतलाते हैं, पर जिस जगह को अब पावापुर मानते हैं असल में वह नही है, पावा विशाली से पश्चिम और गंगा से उत्तर होना चाहिए ।

(३) जैन अपने चौबीसवे अर्थात् सब से पिछले तीर्थंकर महावीर का निर्वाण बिक्रम के संवत से ४७०, अर्थात् सन् ईस्वी से ५२७ बरस पहले बतलाते हैं और महावीर के निर्वाण से २५० बरस पहले अपने तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का निवारण मानते हैं ।


* कैसे आश्चर्य की बात है, चेटक रंडी के भडवे को भी कहते हैं (हरिश्चन्द्र) ।

१६६ मुद्राराक्षस-

बहादुर था, शेर ने इस का पसीना चाटा था और जंगली हाथी ने इसके सामने सिर झुका दिया था।

पुराणों ने बिम्बसार को शिशुनाग के बेटे काकवर्ण का परपोता बतलाया है और नन्दिवर्द्धन को बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु का परपोता, और कहा है कि नन्दिवर्द्धन का बेटा महानन्द और महानन्द का बेटा शूद्रा से महापद्मनन्द और इसी महापद्मनन्द और उसके आठ लडकों के बाद, जिन्हे नवनन्द कहते हैं, चन्द्रगुप्त मौर्य गद्दी पर बैठा। बौद्ध कहते हैं कि तक्षसिला के रहनेवाले चाणक्य ब्राह्मण ने धननन्द को मार के चन्द्रगुप्त को राजसिंहासन पर बैठाया और वह मोरिया नगर के राजा का लड़का था और उसी जाति का था जिस मे शाक्यमुनि गोतम बुद्ध पैदा हुआ।

मेगास्थिनीज लिखता है कि पहाड़ो मे शिव और मैदान मे विष्णु पुजाते हैं। पुजारी अपने बदन रंग * कर और सिर मे फूलों की माला लपेट कर घण्टा और झांझ बजाते हैं। एक वर्ण का आदमी दूसरे वर्ण की स्त्री ब्याह नही सकता है और पेशा भी दूसरे का इख्तियार नही कर सकता है। हिन्दू घुटने तक जामा पहनते हैं और सिर और कन्धों पर कपडा + रखते हैं। जूते उन के रङ्ग बरङ्ग के चमकदार और कारचोबी के होते हैं। बदन पर अक्सर गहने भी मिहदी से रंगते हैं और दाढी मूछ पर खिजाब करते हैं। छतरी, सिवाय बड़े आदमियों के, और कोई नही लगा सकता। रथों मे लडाई के समय घोड़े और मजिल काटने के लिये बैल जोते जाते है। हाथियों पर भारी जर्दोजी झूल डालते हैं। सडकों की मरम्मत होती है, पुलिस का अच्छा इन्तिजाम है। चन्द्रगुप्त के लशकर


* च दन इत्यादि लगा कर।
+ अर्थात् पगड़ी दुपट्टा।

उपसहार ( अन्तर ) ख । १६७

में औसत चोरी तीस रुपये रोज से ज़ियादा नहीं सुनी जाती है । राजा जमीन की पैदावार से चौथाई लेता है ।

चन्द्रगुप्त सन् ई० के ६१ बरस पहले मरा । उस के बेटे बिन्दुसार के पास यूनानी एलची दयोमेकज (Diamachos) आया था परन्तु वायुपुराण मे उस का नाम भद्रसार और ५ भागवत मे वारिसार और मत्स्यपुराण मे शायद बृहद्रथ लिखा है । केवल विष्णुपुराण बौद्ध ग्रन्थों के साथ बिन्दुसार बतलाता है । उस के १६ रानी थी और उन से १०१ लड़के, उन मे अशोक * जो पीछे से "धर्म्मअशोक" कहलाया बहुत तेज था, उज्जैन का नाजिम था । वहा के एक सेठ × की १० लड़की देवी उस से ब्याही थी, उसा से महेन्द्र लड़का और सघमिता ' जिसे सुमित्रा भी कहते है ) लड़की हुई थी ।


* जैनियो के ग्रन्थो में इसी का नाम अशोक भी लिखा है ।
× सेठ श्रे ष्ठा का अपभ्रंश है, अर्थात् जो सब से बड़ा हो ।

शेषपूरण ।

इस लेख के पढने से स्पष्ट होगा कि श्रीमान् भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के सामने ही यह लेख पण्डित विनायक शास्त्री जी ने सुनाया था और इसी हेतु उन को इस विषय मे स्मरण देकर मगाया है—जो 'चन्द्रबिम्ब पूरन भये ' दोहे के ऊपर ३ पत्र के नोट पर समझना चाहिये—

श्री भारतेन्दु का इस उदयपुर मे शुभागमन हुआ । उस समय मुद्राराक्षस छप चुका था केवल उस के विषय मे क्रूर-ग्रह सकेतु ' इस श्लोक पर श्री ६ गुरुवर्य बापूदेव शास्त्री जी का और श्रीसुधाकर जी का आशय विचार किया गया था उस पर यही निम्न लिखित विचार श्री गुरुचरणों का ध्यान करने से हृदय मे उपस्थित हुआ सो दूसरे दिन मै ने श्री भारते दु को सुनाया । उसी क्षण बड़ी प्रसन्नता से उत्तर दिया कि मुद्राराक्षस के द्वितीय सस्करण मे तुम्हारा यह विषय अवश्य ही दे दिया जायगा ।

इधर हरिश्चन्द्रकला का जन्म हुआ, आप का पत्र भी आया पर मै अभागी अनेक कार्यों से व्यग्र नही जानता था कि मुद्राराक्षस ही पहिले छपेगा । अस्तु, आप अपने पत्र का उत्तर और यह विषय दोनों लीजिये और “ कला ” के किसी अङ्क मे अङ्कित कीजिये ।

जिस परविचार था वह श्लोक यह है —

क्रूरग्रहस्सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलाद्रक्षत्येनन्तु बुधयोग ॥ १ ॥

इस का अन्वय सहित अर्थ जो ग्रहण के अर्थ को प्रकाशित करता है। स क्रूरग्रह केतु इदानी पूर्णमण्डल चन्द्रमस बलात् अभिभवितुमिच्छति एन बुधयोगस्तु रक्षति । यह क्रूरग्रह केतु इस समय पूरे चन्द्रर्मा को

शेषपूरण। १६०

बलात्कार से ग्रसने चाहता है, सूर्य से बुध का योग रक्षा करता है। आङ् अव्यय मर्यादा वा अभिविधि अर्थ मे ले कर उस से इन शब्द से समास "आङ् मर्यादाभि- विध्यो" इस सूत्र से करते है तब "एन" बनता है अनाङ् निषेध रहने से "निपात एकाजनाङ्" सूत्र से प्रगृह्य संज्ञा हो के ५ प्रकृतिभाव नही हो सकता।

यदि कोई कहे कि 'एन' इदम् वा एतद् शब्द से बना है तो विचारो कि "द्वितीयाटौस्वेनः" इस सूत्र से जो इदम् वा एतद् शब्द के स्थान मे एन आदेश होता है सो "अन्वादेश" ही मे होता है। अन्वादेश उसे कहते हैं कि किसी कार्य के १० लिये उसी का फिर प्रयोग करना पड़े। उदाहरण—अनेन व्याकरणमधीत एनं छन्दो ऽध्यापय। अनयो पवित्र कुल एनयो प्रभूत स्वम्। इत्यादि। यहा समस्त श्लोक भर मे कही इदम् वा एतद् शब्द का प्रयोग नही है तो अन्वादेश भी नही हुआ। और अन्वादेश नही रहने से "एन" इदम् वा एतद् १५ शब्द का व्याकरणरीति से बन नही सकता इस लिये पूर्वोक्त अर्थ करना पड़ा।

बुधाना योग बुधयोग इस अर्थ से—अधिक बुद्धिमान बुध, गुरु, शुक्र तीनों का योग सूर्य को रहने से ग्रहण नही हो सकता वा ग्रहण का अशुभफल नही हो सकता, ऐसा सूत्रधार २० नटी से कहता है यही अभिप्राय ठीक है।

पञ्चग्रहसंयोगान्न किल ग्रहणस्य सम्भवो भवति। (वाराहीसंहिता राहुचार श्लोक १७)

अर्थ—पाच ग्रहों का सयोग होने से ग्रहण का सम्भव नही होता। यहा भी राहु, सूर्य, बुध, गुरु और शुक्र पाच ग्रहों २५ का सयोग हुआ ही, इस लिये ग्रहण का सम्भव नही हय सूत्रधार का तात्पर्य होगा।

अथवा, वाराही संहिता राहुचार श्लोक ६२ देखो।

१७० मुद्राराक्षस—

यदशुभमवलोकनाभिरुक्तं ग्रहजनितं ग्रहणे प्रमोक्षणे वा । सुरपतिगुरुणावलोकिते तच्छममुपयाति जलैरिवाग्निरिद्ध ॥

अर्थ जो ग्रहजनित अशुभफल दृष्टि के वश से ग्रहण और मोक्ष समय मे कहा वह बृहस्पति की दृष्टि होने से शात हो जाता है, जैसे सुलगा हुआ अग्नि जल से शांत होता है। यहा भी उक्त अर्थ से बृहस्पति की दृष्टि है, अत अशुभफल नही हो सकता। यह सूत्रधार का तात्पर्य होगा—ऐसा भी कह सकते है।

उक्त श्लोक का अन्वयसहित अर्थ जो चन्द्रगुप्त के अर्थ को प्रकाश कर के चाणक्य के प्रवेश की प्रस्तावना करता है।

इदानीं सकेतु क्रूरग्रह असम्पूर्णामंडल चन्द्रं बलात् अभिभवितुमिच्छति एनं बुधयोगस्तु रक्षति। इस समय केतु (मलयकेतु) सहित क्रूरग्रह (राक्षस) जिस का मण्डल (राज्य) पूरा नही हुआ है उस चन्द्र (चन्द्रगुप्त) को बलात्कार से पराजय करने चाहता है, प्रभून्क बुद्धिमानों का (गुप्त पुरुष जो चाणक्य के भेजे थे उन का) योग तो रक्षा करता है। एन शब्द की सिद्धि पूर्वप्रकार से ही जानो, केवल भेद इतना ही है कि पहले अर्थ मे इन शब्द से सूर्ये और दूसरे अर्थ मे प्रभु (राजा वा बड़े लोक) लेते है। “इन सूर्ये प्रभौ” नानार्थ-वर्ग अमरकोष मे लिखा भी है।

सारांश—इस लिखित अर्थ पर सब लोक विचार कर के फिर उस के गुण दोषों पर ध्यान देवें इतनी ही प्रार्थना है।

इति शुभम्

$\left.\begin{array}{l}\text{उदयपुर,} \ \text{१८ नवम्बर}\end{array}\right}$ विनायक शास्त्री ।

केतुवर्णन

कवि वचनसुधा जिल्द १२ नम्बर ४६—१८—७—८१
प्राचीन भारतवर्षीय सिद्धान्तज्ञों का केतु सम्बन्धी विचार।

जो अकस्मात् अग्नि सदृश आकाश मे देख पड़े उसे केतु कहते है, परन्तु खद्योतादि से भिन्न हो। ये केतु तीन प्रकार के होते है—दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम। जिनकी स्थिति न वायु से ऊपर है वे दिव्य, जिन के रूप घोड़े, हाथी, ध्वज, वृक्षादि के सदृश होते है, अर्थात् जो भूवायु से उत्पन्न होते है वे आन्तरिक्ष और इन से भिन्न भौम हैं।

बहुत विद्वान् कहते हैं कि एक सौ एक केतु हैं, कितने कहते हैं कि हजार केतु है, परन्तु नारद मुनि कहते हैं कि यह एक ही केतु है अनेक रूप और स्थान बदल बदल कर दर्शन देता है।

तीन पक्ष के अनन्तर जितने दिनों तक केतुओं का दर्शन होता है उतने मास तक इनका फल होता है और जितने मास तक दर्शन होता है उतने वर्ष तक फल होता है। प्राचीनों ने इन केतुओं के रङ्ग, रूप और उदयास्त पर से सञ्ज्ञा विशेष और उन पर से शुभाशुभ ज्ञान जैसा किया है उसे हम संक्षेप से लिखते है। जिन केतुओं की चोटी सुवर्ण और मणि के सदृश हो और पूरब पश्चिम दोनों दिशाओ मे उदय हों वे रविपुत्र कहलाते है और इनके उदय से राजाओं मे परस्पर विरोध होता है, ऐसे पच्चीस केतु है। जो अग्नि दिशा मे उदय होते है और जिनका रङ्ग लाल होता है वे अग्निपुत्र है, उनके उदय से संसार मे भय होता है उनकी संख्या भी पच्चीस ही है।

जिनकी चोटी टेढ़ी और काली हो ऐसे केतु भी पच्चीस है। ये दक्षिण दिशा मे उदय होते हैं, इनके उदय से मनुष्य बहुत मरते हैं, इनको मृत्युपुत्र कहते हैं। बाईस केतु ऐसे हैं

१७० मुद्राराक्षस-

जिनको चोटी नही होती और उनका आकार दर्पण सा चिपटा और गोल होता है । रङ्ग जल मे पड़ा हुआ तैल के सदृश जान पड़ता ह । ये ईशान कोण मे उदय होते है । इन के उदय से भी भय उत्पन्न होता है और इनको मङ्गलभ्रातृ ५ कहते हैं । तीन केतु चन्द्रपुत्र है । इनका रूप चान्दी ऐसा श्वेत होता है, ये उत्तर दिशा मे देख पड़ते है, इनका दर्शन सुभिक्षकारक है । एक केतु ब्रह्मपुत्र है । इसको तीन चोटी होती है और तीनों तीन रङ्ग की । इसके उदय की दिशा का नियम नही, यह युगान्त मे उदय होता है ।

१० चौरासी शुक्रपुत्र है । इनका तारा शुक्ल और बड़ा होता है और इनका उत्तर और ईशान मे उदय होता है और तीव्र फल है । साठ शनैश्चर के पुत्र हैं । इनको दो चोटी होती है, आकाश मे सर्वत्र इनका उदय होता है और नाम कनक है, ये अतिकष्टद हैं ।

१५ गुरु के पुत्र विकच ना मक पैंसठ है, इनको चोटी नही होती, याम्य दिशा म उदय होते है, बुरे फल देते हैं । तस्कर नाम के इक्यावन बुध के पुत्र हैं, ये स्पष्ट दिखाई नही देते और लम्बे और श्वेत होते हैं, सब दिशाओं मे इनका उदय होता ह, ये भी बुरे फल देने वाले हैं । तीन चोटी के कौकुम २० नाम के मङ्गल के पुत्र साठ केतु हैं, ये उत्तर दिशा मे उदय होते है और बुरे हे, तेतीस राहुपुत्र तामसकिलक नाम के है, ये रवि, चन्द्रमा के साथ देख पड़ते है, इनका फल रविचार के अधीन हे । एक सौ बीस अग्नि के पुत्र विश्व-रूप नाम के हैं ये अग्निबाधा करने वाले हैं ।

२५ जिनकी चोटी चामर ऐसी और कृष्ण रङ्ग वर्ण की होती हैं वे वायुपुत्र हैं और उनका अरुण नाम है । ये पाप फल देनेवाले हैं और इनकी संख्या सतहत्तर है । बहुत तारोंवाले

केतुवर्णन । १७३

प्रजापति के आठ पुत्र गणक नाम के है और दो सै चार ब्रह्म- सन्तान चतुर्भुजाकार है । बत्तीस वरुण के पुत्र कङ्का नाम के है, इनमे चन्द्रमा ऐसी कान्ति रहती है । ये केतु बहुत तीव्र फल को देने वाले है, इनका रूप बांस के वृत्तसदृश होता है, छानवे काल के पुत्र है इन का कबन्ध ५ नाम है रूप भी कबन्ध ऐसा होता है, बड़े घोर दारुण फल के देनेवाले हैं। नव केतु केवल विदिशा मे उदय होते है इनका बड़ा और श्वेत तारा होता है, इस प्रकार से हजार केतु का फल गर्ग, पराशर और असित देवलादिकों ने कहा है । अब इन से विशेष केतुओ का फल नीचे लिखते है ।— १० जिस केतु का उदय पश्चिम भाग मे हो और उत्तर भाग में फेला हो, मूर्त्ति चिकनी हो तो उसे बसा केतु कहते है यह तुरन्त ही मरगी करता है परन्तु इस के उदय से सुभिक्ष बहुत होता है । उसी लक्षण के अस्थिकेतु और शस्त्रकेतु भी होते है, १५ परन्तु पहिला रूक्ष और दूसरा पूर्व मे उदय होता है पहिला भयप्रद और दूसरा महामारीकारक है । जो केतु अमावस्या मे उदय होता है और उस की चोटी मे धूम रहता है उसे कपालकेतु कहते हैं यह मरगी, अवर्षण और रोग कारक है और यह आकाश के आधे ही मे रहता है । २० इसी प्रकार का रौद्र नामक केतु है । इस की चोटी नोकीली और ताम्रवर्ण की होती हे, यह आकाश के विभाग मे ही चलता है । चल केतु उसे कहते हैं जिसकी चोटी का अग्र दक्षिण ओर और उंचाई एक अगुल हो और ज्यों ज्यों उत्तर की ओर चले त्यों त्यों बढ़ता जाय, सप्तऋषि अभिजित और २५ ध्रुव को स्पर्श कर फिर लोट कर दक्षिण भाग में अस्त हो और आंधे ही आकाश मे रहै । यह केतु प्रयाग से लेकर अवन्तीपुष्क- रावरण और उत्तर मे देविकानद तक मध्यदेश और अन्य अन्य

१८५ मुद्राराक्षस-

देशों पे भी रोग, दुर्भिक्ष से प्रजा को दुख देता है, इसका फल कोई दश मास तक और कोई अठारह मास तक रहता है।

श्वेत और कनाम का केतु ये दोनों साथ ही साथ दिन तक देख पड़ते है, इनका अग्र याम्यभाग मे रहताहै और ५ अर्द्धरात्रि के पूर्व ही इन का दर्शन होता है। ये दोनों सुभिक्ष और कल्याण के देनेवाले हैं।

इन मे यदि केवल केतु का दर्शन हो तो दश वर्ष तक संसार मे महाताप और शस्त्रकोप रहता है, श्वेत केतु जो जटाकार होता, हे यदि रुज हो, आकाश के त्रिभाग मे रहे, और १० लोट कर बाये ओर से आवे तो केवल तृतीयांश प्रजा बचे और सब का नाश हो।

कृत्तिका नक्षत्र मे स्थित हो कर जिस केतु का उदय हो उसे रश्मिकेतु कहते है। इस की चोटी म धूंआ रहता है इसका फल श्वेत कतु के समान है।

१५ ध्रुवकेतु का प्रमाण, वर्ण, आकृति इत्यादि नियत नही होते और दिव्य, आन्तरिक्ष, भौम ये तीनों भेद उस मे पाये जाते है यह अच्छा फल देनेवाला है।

राजाओ की सेना और महलों के ऊपर, वृक्ष पहाड़ और गृहों के ऊपर यह ध्रुवकेतुउनका नाश करने के लिए अकस्मात् २० दर्शन देता है।

कुमुद केतु की श्वेत कुमुद ऐसी कांति होती हे, पश्चिम मे उदय और पूर्व ओर चोटी रहती है, एक ही रात्रि देख पड़ता हे, यह दश वर्ष तक सुभिक्ष करता हे।

मणिकेतु की चोटी दूध ऐसी और सीधी होती है, तारा २५ बहुत सूक्ष्म रहता है, पश्चिम भाग मे केवल एक ही दिन प्रहर तक देख पड़ता है यह साढ़े चार मास तक सुभिक्ष और क्षुद्र जन्तुओं की उत्पत्ति करता है। जलकेतु पश्चिम ओर देख पड़ता

केतुवर्णन । १७५

और चोटी भी पश्चिम भाग मे रहती है, रूप स्वच्छ होता है। यह नव मास तक सुभिक्ष और प्राणियों को शांत रखता है।

भवकेतु एक रात्रि के पूर्व भाग मे देख पड़ता है। उसकी चोटी सिंह के पुच्छ ऐसी दक्षिण से घूमी हुई होती है। यह जै मुहूर्त्त रात्रि मे देख पड़ता है, उतने मास तक सुभिक्ष करना ५ है परन्तु यदि रूक्ष हो तो प्राणियों का नाश करता है।

पद्मकेतु कमल के मृणाल ऐसा उज्ज्वल होता है और पश्चिम दिशा मे एक ही रात्रि देख पड़ता है। यह सात वर्ष तक सुभिक्ष करता है।

आवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे आधी रात को देख पड़ता है, १० इस की चोटी लाल और बाईं ओर को रहती है। यह जै मुहूर्त्त रात्रि में देख पड़ता है उतने ही मास सुभिक्ष करता है।

संवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे सन्ध्या काल मे उदय होता है और आकाश के तृतीयांश तक फैला रहता है, इस की चोटी धूमसहित ताम्रवर्ण की होती है और उस का अग्र शूल ऐसा १५ जान पड़ता है। यह जै मुहूर्त्त देख पड़ता है उतने वर्ष शस्त्रों के आघात से अनेक राजाओं का नाश करता है और जिस नक्षत्र पर उदय होता हे उसे भी दुःख देता है।

बुरे केतुओं के अश्विन्यादि नक्षत्रों मे उदय होने के क्रम। अरमकपति, किरातगज, कलिङ्गपति, शूरसेनपति, उशी- २० नरपति, जलजजीवपति, अश्मकपति, मगधपति, अशिकपति, अङ्गपति, पाण्ड्यपति, उज्जयिनीपति, दण्डकपति, कुरुक्षेत्रपति, काश्मीरपति, कम्बोजपति, इक्ष्वाकुपति, रत्नकपति, पुण्ड्रपति, केकयपति, सार्वभोम, अध्रपति, भद्रकपति, काशीपति, चैद्या- दिपति, पञ्चनदपति, सिंहलपति, अगपति, नेमिषपति, किरात- २५ पति, इन राजाओं का मरण होता है, परन्तु यदि केतु की चोटी उल्कादिकों से चोट खाय तो इन राजाओं का कल्याण