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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

प्रथम मुण्डक

प्रथम खण्ड

सम्बन्धभाष्यम्

ॐ ब्रह्मा देवानामित्याद्याथर्वणोपनिषत्। अस्याश्च विद्यासम्प्रदायकर्तृपारम्पर्यलक्षणसम्बन्धम् आदावेवाह स्वयमेव स्तुत्यर्थम्। एवं हि महद्भिः परमपुरुषार्थसाधनत्वेन गुरुणायासेन लब्धा विद्येति श्रोतृबुद्धिप्ररोचनाय विद्यां महीकरोति। स्तुत्या प्ररोचितायां हि विद्यायां सादराः प्रवर्तेरन्निति।<br><br><sub>[उपक्रमः]</sub><br><br>प्रयोजनेन तु विद्यायाः साध्यसाधनलक्षणसम्बन्धम् उत्तरत्र वक्ष्यति 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' (मु० उ० २।२।८)।<br><br><sub>[ब्रह्मविद्यायाः सम्बन्धप्रयोजन-निरूपणम्]</sub>'ॐ ब्रह्मा देवानाम्' इत्यादि [वाक्यसे आरम्भ होनेवाली] उपनिषद् अथर्ववेदकी है। श्रुति इसकी स्तुतिके लिये इसके विद्यासम्प्रदायके कर्त्ताओंकी परम्परास्वरूप सम्बन्धका सबसे पहले स्वयं ही वर्णन करती है। इस प्रकार यह दिखलाकर कि 'इस विद्याको परमपुरुषार्थके साधनरूपसे महापुरुषोंने अत्यन्त परिश्रमसे प्राप्त किया था' श्रुति श्रोताओंकी बुद्धिमें इसके लिये रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी महत्ता दिखलाती है, जिससे कि लोग स्तुतिके कारण रुचिकर प्रतीत हुई विद्याके उपार्जनमें आदरपूर्वक प्रवृत्त हों।<br><br>अपने प्रयोजनके साथ ब्रह्मविद्याका साध्यसाधनरूप सम्बन्ध आगे चलकर 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि मन्त्रद्वारा बतलाया जायगा।
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ

संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
इत्यादिना, अत्र चापरशब्दवाच्या-<br>यामृग्वेदादिलक्षणायां विधिप्रति-<br>षेधमात्रपरायां विद्यायां संसार-<br>कारणाविद्यादिदोषनिवर्तकत्वं<br>नास्तीति स्वयमेवोक्त्वा परापर-<br>विद्याभेदकरणपूर्वकम् ‘अविद्या-<br>यामन्तरे वर्तमानाः’ (मु० उ०<br>१।२।८) इत्यादिना । तथा<br>परप्राप्तिसाधनं सर्वसाधनसाध्य-<br>विषयवैराग्यपूर्वकं गुरुप्रसाद-<br>लभ्यां ब्रह्मविद्यामाह—‘परीक्ष्य<br>लोकान्’ (मु० उ० १।२।१२)<br>इत्यादिना । प्रयोजनं चास-<br>कृद्ब्रवीति ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव<br>भवति’ (मु० उ० ३।२।९) इति<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’<br>(मु० उ० ३। २। ६) इति च ।यहाँ तो ‘विधि-प्रतिषेधमात्रमें तत्पर<br>अपर शब्दवाच्य ऋग्वेदादिरूप<br>विद्या संसारके कारणभूत अज्ञान<br>आदि दोषकी निवृत्ति करनेवाली नहीं<br>है’—यह बात ‘अविद्यायामन्तरे<br>वर्तमानाः’ इत्यादि वाक्योंसे विद्याके<br>पर और अपर भेद करते हुए स्वयं<br>ही बतलाकर फिर ‘परीक्ष्य लोकान्’<br>इत्यादि वाक्योंसे साधन-साध्यरूप<br>सब प्रकारके विषयोंसे वैराग्यपूर्वक<br>गुरुकृपासे प्राप्य ब्रह्मविद्याको ही<br>परब्रह्मकी प्राप्तिका साधन बतलाया<br>है । तथा ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’<br>‘परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे’ इत्यादि<br>वाक्योंसे उसका प्रयोजन तो<br>बारम्बार बतलाया है ।
ज्ञानमात्रे यद्यपि सर्वाश्रमिणाम्<br><sub>[संन्यासनिष्ठैव ब्रह्मविद्या मोक्षसाधनम्]</sub> अधिकारस्तथापि<br>संन्यासनिष्ठैव ब्रह्म-<br>विद्या मोक्षसाधनं<br>न कर्मसहितेति ‘भैक्ष्यचर्यां<br>चरन्तः’ (मु० उ० १।२।११)<br>‘संन्यासयोगात्’ (मु० उ०<br>३।२।६) इति च ब्रुवन्दर्शयति ।यद्यपि ज्ञानमात्रमें सभी आश्रम-<br>वालोंका अधिकार है तथापि<br>ब्रह्मविद्या केवल संन्यासगत होनेपर<br>ही मोक्षका साधन होती है कर्म-<br>सहित नहीं—यह बात श्रुति<br>‘भैक्ष्यचर्यां चरन्तः’ ‘संन्यासयोगात्’<br>इत्यादि कहते हुए प्रदर्शित<br>करती है ।
मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १
(संस्कृत-भाष्य)(हिन्दी-अनुवाद)
ज्ञानकर्मविरोध-निरूपणम्<br>विद्याकर्मविरोधाच्च । न हि ब्रह्मात्मैकत्वदर्शनेन सह कर्म स्वप्नेऽपि सम्पादयितुं शक्यम्। विद्यायाः कालविशेषाभावादनियतनिमित्तत्वात्कालसङ्कोचानुपपत्तिः ।इसके सिवा विद्या और कर्मका विरोध होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है। ब्रह्मात्मैक्यदर्शनके साथ तो कर्मोंका सम्पादन स्वप्नमें भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि विद्यासम्पादनका कोई कालविशेष नहीं है और न उसका कोई नियत निमित्त ही है; अतः किसी काल-विशेषद्वारा उसका संकोच कर देना उचित नहीं है।
यत्तु गृहस्थेषु ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृत्वादि लिङ्गं न तत्स्थितन्यायं बाधितुमुत्सहते । न हि विधिशतेनापि तमःप्रकाशयोरेकत्र सद्भावः शक्यते कर्तुं किमुत लिङ्गैः केवलैरिति ।गृहस्थोंमें जो ब्रह्मविद्याका सम्प्रदायकर्तृत्व आदि लिङ्ग (अस्तित्व-सूचक निदर्शन) देखा गया है वह पूर्वप्रदर्शित स्थिरतर नियमको बाधित करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि तम और प्रकाशकी एकत्र स्थिति तो सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं की जा सकती, फिर केवल लिङ्गोंकी तो बात ही क्या है ?
उपनिषच्छब्द-निरुक्तिः<br>एवमुक्तसम्बन्धप्रयोजनाया उपनिषदोऽल्पाक्षरं ग्रन्थविवरणमारभ्यते। य इमां ब्रह्मविद्यामुपयन्त्यात्मभावेन श्रद्धाभक्तिपुरःसराःइस प्रकार जिसके सम्बन्ध और प्रयोजनका निर्देश किया है उस [ मुण्डक ] उपनिषद्‌की यह संक्षिप्त व्याख्या आरम्भ की जाती है। जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आत्मभावसे इस ब्रह्मविद्याके समीप

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


सन्तस्तेषां गर्भजन्मजरारोगा-<br>द्यनर्थपूगं निशातयति परं वा<br>ब्रह्म गमयत्यविद्यादिसंसार-<br>कारणं चात्यन्तमवसादयति<br>विनाशयतीत्युपनिषत् । उपनि-<br>पूर्वस्य सदेरेवमर्थस्मरणात् ।जाते हैं यह उनके गर्भ, जन्म,<br>जरा और रोग आदि अनर्थसमूहका<br>छेदन करती है, अथवा उन्हें परब्रह्मको<br>प्राप्त करा देती है, या संसारके<br>कारणरूप अविद्या आदिका अत्यन्त<br>अवसादन—विनाश कर देती है;<br>इसीलिये इसे 'उपनिषद्' कहते हैं,<br>क्योंकि 'उप' और 'नि' पूर्वक 'सद्'<br>धातुका यही अर्थ माना गया है ।

आचार्यपरम्परा

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा- मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

सम्पूर्ण देवताओंमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ । वह विश्वका रचयिता और त्रिभुवनका रक्षक था । उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वाको समस्त विद्याओंकी आश्रयभूत ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया ॥ १ ॥

ब्रह्मा परिवृढो महान्धर्मज्ञान-<br>वैराग्यैश्वर्यैः सर्वानन्यानतिशेते<br>इति । देवानां द्योतनवतामिन्द्रा-<br>दीनां प्रथमो गुणैः प्रधानः सन्<br>प्रथमोऽग्रे वा सम्बभूवाभिव्यक्तः<br>सम्यक्स्वातन्त्र्येणेत्यभिप्रायः ।<br>न तथा यथा धर्माधर्मवशात्ब्रह्मा—परिवृढ ( सबसे बढ़ा<br>हुआ ) अर्थात् महान्, जो धर्म,<br>ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यमें अन्य सबसे<br>बढ़ा हुआ था, देवताओं—द्योतन<br>करनेवालों ( प्रकाशमानों ), इन्द्रा-<br>दिकोंमें प्रथम—गुणोंद्वारा प्रधान-<br>रूपसे अथवा सम्यक् स्वतन्त्रता-<br>पूर्वक सबसे पहले उत्पन्न हुआ<br>था यह इसका तात्पर्य है; क्योंकि<br>“जो यह अतीन्द्रिय, अग्राह्य…………है

६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १


संसारिणोऽन्ये जायन्ते ।<br><br>“योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः···”<br><br>(मनु० १।७) इत्यादिसमृतेः ।<br><br>विश्वस्य सर्वस्य जगतः कर्तोत्पादयिता । भुवनस्योत्पन्नस्य गोप्ता पालयितेति विशेषणं ब्रह्मणो विद्यास्तुतये । स एवं प्रख्यातमहत्त्वो ब्रह्मा ब्रह्मविद्यां ब्रह्मणः परमात्मनो विद्यां ब्रह्मविद्यां 'येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्' (मु०उ० १।२।१३) इति विशेषणात्परमात्मविषया हि सा ब्रह्मणा वाग्रजेनोक्तेति ब्रह्मविद्या तां सर्वविद्याप्रतिष्ठां सर्वविद्याभिव्यक्तिहेतुत्वात्सर्वविद्याश्रयामित्यर्थः; सर्वविद्यावेद्यं वा वस्त्वनयैव विज्ञायत इति,<br><br>“येनाश्रुतं श्रुतं भवति अमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्” (छा० उ० ६।१।३) इति श्रुतेः ।[ वह परमात्मा स्वयं उत्पन्न हुआ ]"<br>इत्यादि स्मृतिके अनुसार वह, जैसे अन्य संसारी जीव उत्पन्न होते हैं उस तरह धर्म या अधर्मके वशीभूत होकर उत्पन्न नहीं हुआ ।<br><br>'विश्व अर्थात् सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता—उत्पन्न करनेवाला तथा उत्पन्न हुए भुवनका गोप्ता—पालन करनेवाला' ये ब्रह्माके विशेषण [ उसकी उपदेश की हुई ] विद्याकी स्तुतिके लिये हैं । जिसका महत्त्व इस प्रकार प्रसिद्ध है उस ब्रह्माने ब्रह्मविद्याको—ब्रह्म यानी परमात्माकी विद्याको, जो 'जिससे अक्षर और सत्य पुरुषको जानता है' ऐसे विशेषणसे युक्त होनेके कारण, परमात्मसम्बन्धिनी ही है अथवा अग्रजन्मा ब्रह्माके द्वारा कही जानेके कारण जो ब्रह्मविद्या कहलाती है उस ब्रह्मविद्याको, जो समस्त विद्याओंकी अभिव्यक्तिकी हेतुभूत होनेसे, अथवा “जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, मनन न किया हुआ मनन हो जाता है तथा अज्ञात ज्ञात हो जाता है” इस श्रुतिके अनुसार इसीसे सर्वविद्यावेद्य वस्तुका ज्ञान होता है, इसलिये जो सर्वविद्याप्रतिष्ठा यानी सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रयभूता है, अपने ज्येष्ठ पुत्र

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


सर्वविद्याप्रतिष्ठामिति च स्तौति । विद्यामंथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह । ज्येष्ठश्चासौ पुत्रश्चानेकेषु ब्रह्मणः सृष्टिप्रकारेष्वन्यतमस्य सृष्टिप्रकारस्य प्रमुखे पूर्वमथर्वा सृष्ट इति ज्येष्ठस्तस्मै ज्येष्ठपुत्राय प्राहोक्तवान् ॥ १ ॥अथर्वासे कहा । यहाँ 'सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्' इस पदसे विद्याकी स्तुति करते हैं । जो ज्येष्ठ ( सबसे बड़ा ) पुत्र हो उसे ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं । ब्रह्माकी सृष्टिके अनेकों प्रकारोंमें किसी एक सृष्टिप्रकारके आदिमें सबसे पहले अथर्वाको ही उत्पन्न किया गया था, इसलिये वह ज्येष्ठ है। उस ज्येष्ठ पुत्रसे कहा ॥ १ ॥

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा- थर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥

अथर्वाको ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्मविद्या पूर्वकालमें अथर्वाने अङ्गीको सिखायी । अङ्गीने उसे भरद्वाजके पुत्र सत्यवहसे कहा तथा भरद्वाजपुत्र ( सत्यवह ) ने इस प्रकार श्रेष्ठसे कनिष्ठको प्राप्त होती हुई वह विद्या अङ्गिरासे कही ॥ २ ॥

यामेतामथर्वणे प्रवदेतावद्-ब्रह्मविद्यां ब्रह्मा तामेव ब्रह्मणः प्राप्तामथर्वा पुरा पूर्वमुवाचोक्तवानङ्गिरेऽङ्गिर्नाम्ने ब्रह्मविद्याम् । स चाङ्गीर्भारद्वाजाय भरद्वाज-जिस ब्रह्मविद्याको ब्रह्मा ने अथर्वासे कहा था, ब्रह्मासे प्राप्त हुई उसी ब्रह्मविद्याको पूर्वकालमें अथर्वाने अङ्गीसे यानी अङ्गी नामक मुनिसे कहा । फिर उस अङ्गी मुनिने उसे भारद्वाज सत्यवहसे यानी भरद्वाजगोत्रमें उत्पन्न

८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १

गोत्राय सत्यवहाय सत्यवहनाम्ने प्राह प्रोक्तवान्। भारद्वाजोऽङ्गिरसे स्वशिष्याय पुत्राय वा परावरां परस्मात्परस्मादवरेण प्राप्तेति परावरा परापरसर्वविद्याविषयव्याप्तेर्वा तां परावरामङ्गिरसे प्राहेत्यनुषङ्गः ॥ २ ॥हुए सत्यवह नामक मुनिसे कहा। तथा भारद्वाजने अपने शिष्य अथवा पुत्र अङ्गिरासे वह परावरा—पर (उत्कृष्ट) से अवर (कनिष्ठ) को प्राप्त हुई, अथवा पर और अवर सब विद्याओंके विषयोंकी व्याप्तिके कारण 'परावरा' कही जानेवाली वह विद्या अङ्गिरासे कही। इस प्रकार 'परावराम्' इस कर्मपदका पूर्वोक्त 'प्राह' क्रियासे सम्बन्ध है ॥ २ ॥

शौनकी गुरूपपत्ति और प्रश्न

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थने अङ्गिराके पास विधिपूर्वक जाकर पूछा—'भगवन् ! किसके जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?' ॥ ३ ॥

शौनकः शौनकस्यापत्यं महाशालो महागृहस्थोऽङ्गिरसं भारद्वाजशिष्यमाचार्यं विधिवद्यथाशास्त्रमित्येतत् । उपसन्न उपगतः सन्पप्रच्छ पृष्टवान् । शौनकाङ्गिरसोः संबन्धादर्वाग्महाशाल—महागृहस्थ शौनक—शुनकके पुत्रने भारद्वाजके शिष्य आचार्य अङ्गिराके पास विधिवत् अर्थात् शास्त्रानुसार जाकर पूछा। शौनक और अङ्गिराके सम्बन्धसे पश्चात् 'विधिवत्' विशेषण मिलनेसे

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९


विधिवद्विशेषणादुपसदनविधेः पूर्वेषामनियम इति गम्यते । मर्यादाकरणार्थं मध्यदीपिकान्यायार्थं वा विशेषणम्; अस्मदादिष्वप्युपसदनविधेरिष्टत्वात् । <br><br> किमित्याह—कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते नु इति वितर्के, भगवो हे भगवन्सर्वं यदिदं विज्ञेयं विज्ञातं विशेषेण ज्ञातमवगतं भवतीति एकस्मिञ्ज्ञाते सर्वविद्भवतीति शिष्टप्रवादं श्रुतवाञ्शौनकस्तद्विशेषं विज्ञातुकामः सन्कस्मिन्न्विति वितर्कयन्पप्रच्छ । अथवा लोकसामान्यदृष्ट्या ज्ञात्वैव पप्रच्छ । सन्ति लोकेयह जाना जाता है कि इनसे पूर्व आचार्योंमें [ गुरूपसदनका ] कोई नियम नहीं था । अतः इसकी मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये अथवा मध्यदीपिकान्यायके लिये* यह विशेषण दिया गया है, क्योंकि यह उपसदनविधि हमलोगोंमें भी माननीय है। <br><br> शौनकने क्या पूछा, सो बतलाते हैं—भगवः—हे भगवन् ! 'कस्मिन्नु' किस वस्तुके जान लिये जानेपर यह सब विज्ञेय पदार्थ विज्ञात—विशेषरूपसे ज्ञात यानी अवगत हो जाता है ? यहाँ 'नु' का प्रयोग वितर्क (संशय) के लिये किया गया है । शौनकने 'एकहीको जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है' ऐसी कोई सभ्य पुरुषोंकी कहावत सुनी थी । उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे ही उसने 'कस्मिन्नु' इत्यादि रूपसे वितर्क करते हुए पूछा । अथवा लोगोंकी सामान्य दृष्टिसे जान-बूझकर ही पूछा । लोकमें

* देहलीपर दीपक रखनेसे उसका प्रकाश भीतर-बाहर दोनों ओर पड़ता है—इसीको मध्यदीपिका या देहलीदीपन्याय कहते हैं। अतः यदि यह कथन इस न्यायसे ही हो तो यह समझना चाहिये कि गुरूपसदन-विधि इससे पूर्व भी थी और उससे पीछे हमलोगोंके लिये भी आवश्यक है; और यदि यह कथन मर्यादा निर्दिष्ट करनेके लिये हो तो यह समझना चाहिये कि यहींसे इस पद्धतिका आरम्भ हुआ ।

१० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १ ]


सुवर्णादिशकलभेदाः सुवर्णत्वाद्येकत्वविज्ञानेन विज्ञायमाना लौकिकैः । तथा किं न्वस्ति सर्वस्य जगद्भेदस्यैकं कारणम्, यदेकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवतीति ।सुवर्णादि खण्डोंके ऐसे भेद हैं जो सुवर्णरूप होनेके कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा [ स्वर्णदृष्टिसे ] उनकी एकताका ज्ञान होनेपर जान लिये जाते हैं । इसी प्रकार [ प्रश्न होता है कि ] 'सम्पूर्ण जगद्भेदका वह एक कारण कौन-सा है जिस एकके ही जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है ?'
नन्वविदिते हि कस्मिन्निति प्रश्नोऽनुपपन्नः । किमस्ति तदिति तदा प्रश्नो युक्तः । सिद्धे ह्यस्तित्वे कस्मिन्निति स्यात्, यथा कस्मिन्निधेयमिति ।शङ्का—जिस वस्तुका ज्ञान नहीं होता उसके विषयमें 'कस्मिन्' ( किसको )* इस प्रकार प्रश्न करना तो बन नहीं सकता । उस समय तो 'क्या वह है ?' ऐसा प्रश्न ही उचित है; फिर उसका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर ही 'कस्मिन्' ऐसा प्रश्न हो सकता है। जैसा कि [ अनेक आधारोंका ज्ञान होनेपर ] 'किसमें रखा जाय' ऐसा प्रश्न किया जाता है ।
न; अक्षरबाहुल्यादायासभीरुत्वात्प्रश्नः सम्भवत्येव कस्मिन्नेकस्मिन्विज्ञाते सर्ववित्स्यात् इति ॥ ३ ॥समाधान—ऐसा मत कहो, क्योंकि [ तुम्हारे कथनानुसार प्रश्न करनेसे ] अक्षरोंकी अधिकता होती है और अधिक आयासका भय रहता है, अतः 'किस एकके ही जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ?' ऐसा प्रश्न बन सकता है ॥ ३ ॥

* क्योंकि 'किस' या 'कौन' सर्वनामका प्रयोग वहीं होता है जहाँ अनेकोंकी सत्ता स्वीकारकर उनमेंसे किसी एकका निश्चय करना होता है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११


अङ्गिराका उत्तर—विद्या दो प्रकारकी है

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥

उससे उसने कहा—'ब्रह्मवेत्ताओंने कहा है कि दो विद्याएँ जाननेयोग्य हैं—एक परा और दूसरी अपरा' ॥ ४ ॥

संस्कृत टीकाहिन्दी अनुवाद
तस्मै शौनकायाङ्गिरा आह किलोवाच । किमित्युच्यते । द्वे विद्ये वेदितव्ये इत्येवं ह स्म किल यद्ब्रह्मविदो वेदार्थाभिज्ञाः परमार्थदर्शिनो वदन्ति । के ते इत्याह—परा च परमात्मविद्या । अपरा च धर्माधर्मसाधनतत्फलविषया ।उस शौनकसे अङ्गिराने कहा । क्या कहा ? सो बतलाते हैं—'दो विद्याएँ वेदितव्य अर्थात् जाननेयोग्य हैं' ऐसा जो ब्रह्मविद्—वेदके अर्थको जाननेवाले परमार्थदर्शी हैं वे कहते हैं। वे दो विद्याएँ कौन-सी हैं ? इसपर कहते हैं—परा अर्थात् परमात्मविद्या और अपरा—धर्म, अधर्मके साधन और उनके फलसे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ।'
ननु कस्मिन्विदिते सर्वमिदं भवतीति शौनकेन पृष्टं तस्मिन्वक्तव्येऽपृष्टमाहाङ्गिरा द्वे विद्ये इत्यादिना ।शङ्का— शौनक ने तो यह पूछा था कि 'किसको जान लेनेपर पुरुष सर्वज्ञ हो जाता है ?' उसके उत्तरमें जो कहना चाहिये था उसकी जगह 'दो विद्याएँ हैं' आदि बातें तो अङ्गिराने बिना पूछी ही कही हैं ।
नैष दोषः; क्रमापेक्षत्वात् प्रतिवचनस्य । अपरा हि विद्याविद्या सा निराकर्तव्या । तद्-समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्तर तो क्रमकी अपेक्षा रखता है । अपरा विद्या तो अविद्या ही है; अतः उसका निराकरण किया जाना चाहिये । उसके
१२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १
विषये हि विदिते न किञ्चित्त्वतो विदितं स्यादिति । निराकृत्य हि पूर्वपक्षं पश्चात्सिद्धान्तो वक्तव्यो भवतीति न्यायात् ॥ ४ ॥विषयमें जान लेनेपर तो तत्त्वतः कुछ भी नहीं जाना जाता, क्योंकि यह नियम है कि 'पहले पूर्वपक्षका खण्डन कर पीछे सिद्धान्त कहा जाता है' ॥ ४ ॥

परा और अपरा विद्याका स्वरूप

तत्रापरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्माका ज्ञान होता है वह परा है ॥ ५ ॥

तत्र कापरेत्युच्यते—ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इत्येते चत्वारो वेदाः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्यङ्गानि षडेषापरा विद्या ।<br><br>अथेदानीमियं परा विद्या उच्यते यया तद्वक्ष्यमाणविशेषणम् अक्षरमधिगम्यते प्राप्यते; अधि-उनमें अपरा विद्या कौन-सी है, सो बतलाते हैं । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छः वेदाङ्ग अपरा विद्या कहे जाते हैं।<br><br>अब यह परा विद्या बतलायी जाती है, जिससे आगे (छठे मन्त्रमें) कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त उस अक्षरका अधिगम अर्थात् प्राप्ति होती है, क्योंकि 'अधि'पूर्वक
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३

[विद्यायाः परापरभेद-मीमांसा] <br><br> पूर्वस्य गमेः प्रायशः प्राप्त्यर्थत्वात् । न च परप्राप्तेरवगमार्थस्य भेदोऽस्ति। अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् । <br><br> ननु ऋग्वेदादिवाह्या तर्हि सा कथं परा विद्या स्यान्मोक्षसाधनं च। <br><br> "या वेदवाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । <br> सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः" (मनु० १२।९५) <br><br> इति हि स्मरन्ति । कुदृष्टित्वान्निष्फलत्वादनादेया स्यात्। उपनिषदां च ऋग्वेदादिवाह्यत्वं स्यात् । ऋग्वेदादित्वे तु पृथक्करणमनर्थकम् अथ परेति । <br><br> न; वेद्यविषयविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । उपनिषद्द्वेद्याक्षर-'गम' धातु प्रायः 'प्राप्ति' अर्थमें प्रयुक्त होती है इसके सिवा परमात्माकी प्राप्ति और उसके ज्ञानके अर्थमें कोई भेद भी नहीं है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति ही परमात्माकी प्राप्ति है, इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं । <br><br> शङ्का— तब तो वह (ब्रह्मविद्या) ऋग्वेदादिसे बाह्य है, अतः वह परा विद्या अथवा मोक्षकी साधनभूत किस प्रकार हो सकती है ? स्मृतियाँ तो कहती हैं कि "जो वेदवाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ (कुविचार) हैं वे परलोकमें निष्फल और नरककी साधन मानी गयी हैं।" अतः कुदृष्टि होनेसे निष्फल होनेके कारण वह ग्राह्य नहीं हो सकती । तथा इससे उपनिषद् भी ऋग्वेदादिसे बाह्य माने जायेंगे और यदि इन्हें ऋग्वेदादिमें ही माना जायगा तो 'अथ परा' आदि वाक्यसे जो परा विद्याको पृथक् बतलाया गया है वह व्यर्थ हो जायगा । <br><br> समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ परा विद्यासे ] वेद्यविषयक ज्ञान बतलाना अभीष्ट है ।

१४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १ ]


विषयं हि विज्ञानमिह परा विद्येति प्राधान्येन विवक्षितं नोपनिषच्छब्दराशिः। वेदशब्देन तु सर्वत्र शब्दराशिरिर्विवक्षितः । शब्दराश्यधिगमेऽपि यत्नान्तरमन्तरेण गुर्वभिगमनादिलक्षणं वैराग्यं च नाक्षराधिगमः सम्भवतीति पृथक्करणं ब्रह्मविद्यायाः परा विद्येति कथनं चेति ॥ ५ ॥यहाँ प्रधानतासे यही बतलाना इष्ट है कि उपनिषद्द्येय अक्षरविषयक विज्ञान ही परा विद्या है, उपनिषद्‌की शब्दराशि नहीं। और 'वेद' शब्दसे सर्वत्र शब्दराशि ही कही जाती है। शब्दसमूहका ज्ञान हो जानेपर भी गुरूपसत्ति आदिरूप प्रयत्नान्तर तथा वैराग्यके बिना अक्षरब्रह्मका ज्ञान नहीं हो सकता; इसीलिये ब्रह्मविद्याका पृथक्करण और 'अथ परा विद्या' आदिका कथन किया गया है ॥ ५ ॥

[परविद्याया वाक्यार्थज्ञान-जन्यत्वम्] <br><br> यथा विधिविषये कर्त्राद्यनेक- <br> कारकोपसंहारद्वारेण <br> वाक्यार्थज्ञानकालाद् <br> अन्यत्रानुष्ठेयोऽर्थोऽस्ति <br> अग्निहोत्रादिलक्षणो न तथेह <br> परविद्याविषये; वाक्यार्थज्ञान- <br> समकाल एव तु पर्यवसितो <br> भवति । केवलशब्दप्रकाशितार्थ- <br> ज्ञानमात्रनिष्ठाव्यतिरिक्ताभावात् ॥जिस प्रकार विधि (कर्मकाण्ड) के सम्बन्धमें [उसका प्रतिपादन करनेवाले] वाक्योंका अर्थ जाननेके समयसे भिन्न कर्ता आदि अनेकों कारकों (क्रियानिष्पत्तिका साधनों) के उपसंहारद्वारा अग्निहोत्र आदि अनुष्ठेय अर्थ रह जाता है, उस प्रकार परा विद्याके सम्बन्धमें नहीं होता। इसका कार्य तो वाक्यार्थ-ज्ञानके समकालमें ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि केवल शब्दोंके योगसे प्रकाशित होनेवाले अर्थ-ज्ञानमें स्थिति कर देनेसे भिन्न इसका और कोई प्रयोजन नहीं है। अतः

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५


तस्मादिह परां विद्यां सविशेषणेन अक्षरेण विशिनष्टि यत्तदद्रेश्यम् इत्यादिना । वक्ष्यमाणं बुद्धौ संहृत्य सिद्धवत्परामृश्यते—यत्तदिति ।यहाँ 'यत्तदद्रेश्यम्' इत्यादि विशेषणोंसे विशेषित अक्षरब्रह्मका निर्देश करते हुए उस परा विद्याको विशेषित करते हैं । आगे जो कुछ कहना है उसे अपनी बुद्धिमें बिठाकर 'यत्तद्' इत्यादि वाक्यसे उसका सिद्ध वस्तुके समान उल्लेख करते हैं—

परविद्याप्रदर्शन

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणि- पादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥

वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चक्षुःश्रोत्रादिहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका कारण है उसे विवेकीलोग सब ओर देखते हैं ॥ ६ ॥

अद्रेश्यमदृश्यं सर्वेषां बुद्धीन्द्रियाणामगम्यमित्येतत् । दृशेर्बहिःप्रवृत्तस्य पञ्चेन्द्रियद्वारकत्वात् ।<br><br>अग्राह्यं कर्मेन्द्रियाविषयमित्येतत् ।<br><br>अगोत्रं गोत्रमन्वयो मूलमित्यनर्थान्तरमगोत्रमनन्वयमित्यर्थः ।वह जो अद्रेश्यम्—अदृश्य अर्थात् समस्त ज्ञानेन्द्रियोंका अविषय है, क्योंकि बाहरको प्रवृत्त हुई दृक्शक्ति पञ्चज्ञानेन्द्रियरूप द्वारवाली है; अग्राह्य अर्थात् कर्मेन्द्रियोंका अविषय है; अगोत्रम्—गोत्र अन्वय अथवा मूल—ये किसी अन्य अर्थके वाचक नहीं हैं [अर्थात् इनका एक ही अर्थ है] अतः अगोत्र यानी अनन्वय है, क्योंकि उस
१६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

| न हि तस्य मूलमस्ति येन अन्वितं स्यात् । वर्ण्यन्त इति वर्णा द्रव्यधर्माः स्थूलत्वादयः शुक्लत्वादयो वा । अविद्यमाना वर्णा यस्य तदवर्णमक्षरम् । अचक्षुःश्रोत्रं चक्षुश्च श्रोत्रं च नामरूपविषये करणे सर्वजन्तूनां ते अविद्यमाने यस्य तदचक्षुः-श्रोत्रं, 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इति चेतनावत्त्वविशेषणात् प्राप्तं संसारिणामिव चक्षुःश्रोत्रादिभिः करणैरर्थसाधकत्वं तदिहाचक्षुः-श्रोत्रमिति वार्यते “पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः” (श्वे० उ० ३ । १९) इत्यादिदर्शनात् ।<br><br>किं च तदपाणिपादं कर्मेन्द्रिय-रहितमित्येतत् । यत एवमग्राह्य- | अक्षर [अक्षरब्रह्म] का कोई मूल नहीं है जिससे वह अन्वित हो; जिनका वर्णन किया जाय वे स्थूलत्वादि या शुक्लत्वादि द्रव्यके धर्म ही वर्ण हैं—वे वर्ण जिसमें विद्यमान नहीं हैं वह अक्षर अवर्ण है; अचक्षुःश्रोत्रम्—चक्षु (नेत्रेन्द्रिय) और श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) ये सम्पूर्ण प्राणियोंकी रूप और शब्दको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियाँ हैं, वे जिसमें नहीं हैं उसे ही 'अचक्षुः-श्रोत्र' कहते हैं । 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इस श्रुतिमें पुरुषके लिये चेतनावत्त्व विशेषण दिया गया है, अतः अन्य संसारी जीवोंके समान उसके लिये भी चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों-से अर्थसाधकत्व प्राप्त होता है, यहाँ 'अचक्षुःश्रोत्रम्' कहकर उसीका निषेध किया जाता है, जैसा कि उसके विषयमें “बिना नेत्रवाला होकर भी देखता है, बिना कान-वाला होकर भी सुनता है” इत्यादि कथन देखा गया है ।<br><br>यही नहीं, वह अपाणिपाद अर्थात् कर्मेन्द्रियोंसे भी रहित है । क्योंकि इस प्रकार वह अग्राह्य |

. खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७


मग्राहकं चातो नित्यम् अविनाशि। विभुं विविधं ब्रह्मादि-स्थावरान्तप्राणिभेदैर्भवति इति विभुम्। सर्वगतं व्यापकमाकाश-वत्सुसूक्ष्मं शब्दादिस्थूलत्व-कारणरहितत्वात् । शब्दादयो ह्याकाशाव्वादीनामुत्तरोत्तरं स्थूलत्यकारणानि तदभावात् सूक्ष्मम्। किं च तदव्ययमुक्तधर्म-त्वादेव न व्येतीत्यव्ययम् । न हि अनङ्गस्य स्वाङ्गापचयलक्षणो व्ययः सम्भवति शरीरस्येव। नापि कोशा-पचयलक्षणो व्ययः सम्भवति राज्ञ इव । नापि गुणद्वारको व्ययः सम्भवत्यगुणत्वात्सर्वात्म-कत्वाच्च ।और अग्राहक भी है, इसलिये वह नित्य—अविनाशी है। तथा विभु—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त प्राणि-भेदसे वह विविध (अनेक प्रकारका) हो जाता है, इसलिये विभु है, सर्वगत—व्यापक है और शब्दादि स्थूलताके कारणोंसे रहित होनेके कारण आकाशके समान अत्यन्त सूक्ष्म है; शब्दादि गुण ही आकाश-वायु आदिकी उत्तरोत्तर स्थूलताके कारण हैं, उनसे रहित होनेके कारण वह [ अक्षरब्रह्म ] सुसूक्ष्म है। तथा उपर्युक्त धर्मवाला होनेसे ही कभी उसका व्यय (ह्रास) नहीं होता इसलिये वह अव्यय है; क्योंकि अङ्गहीन वस्तुका शरीरके समान अपने अङ्गोंका क्षयरूप व्यय नहीं हो सकता, न राजाके समान कोशक्षयरूप व्यय ही सम्भव है और न निर्गुण तथा सर्वात्मक होनेके कारण उसका गुणक्षयद्वारा ही व्यय हो सकता है।
यदेवंलक्षणं भूतयोनिं भूतानां कारणं पृथिवीव स्थावरजङ्ग-मानां परिपश्यन्ति सर्वत आत्म-भूतं सर्वस्याक्षरं पश्यन्ति धीराः<br>पृथिवी जैसे स्थावर-जङ्गम जगत्‌का कारण है उसी प्रकार जिस ऐसे लक्षणोंवाले भूतयोनि—भूतोंके कारण सबके आत्मभूत अक्षरब्रह्मको धीर—बुद्धिमान्—

१८ - मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १.


धीमन्तो विवेकिनः । ईदृशमक्षरं यया विद्ययाधिगम्यते सा परा विद्येति समुदायार्थः ॥ ६ ॥विवेकी पुरुष सब ओर देखते हैं, ऐसा अक्षर जिस विद्यासे जाना जाता है वही परा विद्या है—यह इस सम्पूर्ण मन्त्रका तात्पर्य है॥६॥

अक्षरब्रह्मका विश्वकारणत्व

भूतयोन्यक्षरमित्युक्तम् । तत्कथं भूतयोनित्वमित्युच्यते प्रसिद्धदृष्टान्तैः—पहले कहा जा चुका है कि अक्षरब्रह्म भूतोंकी योनि है। उसका वह भूतयोनित्व किस प्रकार है, सो प्रसिद्ध दृष्टान्तोंद्वारा बतलाया जाता है—

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥

जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और उसे निगल जाती है, जैसे पृथिवीमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुषसे केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है।

यथा लोके प्रसिद्धम्, ऊर्णनाभिर्लूताकीटः किञ्चित्कारणान्तरमनपेक्ष्य स्वयमेव सृजते स्वशरीराव्यतिरिक्तानेव तन्तून्बहिः प्रसारयति पुनस्तानेव गृह्णते च गृह्णाति स्वात्मभावमेवापादयति ।जिस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है कि ऊर्णनाभि—मकड़ी किसी अन्य उपकरणकी अपेक्षा न कर स्वयं ही अपने शरीरसे अभिन्न तन्तुओंको रचती अर्थात् उन्हें बाहर फैलाती है और फिर उन्हींको ग्रहण भी कर लेती है, यानी अपने शरीरसे
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१९

यथा च पृथिव्यामोषधयो व्रीह्यादिस्थावरान्ता इत्यर्थः। स्वात्माव्यतिरिक्ता एव प्रभवन्ति। यथा च सतो विद्यमानाज्जीवनः पुरुषात्केशलोमानि केशाश्च लोमानि च सम्भवन्ति विलक्षणानि।अभिन्न कर देती है, तथा जैसे पृथिवीमें व्रीहि-यव इत्यादिसे लेकर वृक्षपर्यन्त समस्त ओषधियाँ उससे अभिन्न ही उत्पन्न होती हैं और जैसे सत्—विद्यमान अर्थात् जीवित पुरुषसे उससे विलक्षण केश और लोम उत्पन्न होते हैं।
यथैते दृष्टान्तास्तथा विलक्षणं सलक्षणं च निमित्तान्तरानपेक्षाद्यथोक्तलक्षणादक्षरात्सम्भवति समुत्पद्यत इह संसारमण्डले विश्वं समस्तं जगत्। अनेकदृष्टान्तोपादानं तु सुखार्थप्रबोधनार्थम् ॥ ७ ॥जैसे कि ये दृष्टान्त हैं उसी प्रकार इस संसारमण्डलमें इससे विभिन्न और समान लक्षणोंवाला यह विश्व—समस्त जगत्, किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करनेवाले उस उपर्युक्तलक्षणविशिष्ट अक्षरसे ही उत्पन्न होता है। ये अनेक दृष्टान्त केवल विषयको सरलतासे समझानेके लिये ही लिये गये हैं ॥ ७ ॥

सृष्टिक्रम

यद्ब्रह्मण उत्पद्यमानं विश्वं तदनेन क्रमेणोत्पद्यते न युगपद्बदरमुष्टिप्रक्षेपवदिति क्रमनियमविवक्षार्थोऽयं मन्त्र आरभ्यते—ब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाला जो जगत् है वह इस क्रमसे उत्पन्न होता है, बेरोंकी मुट्ठी फेंक देनेके समान एक साथ उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार उस क्रमके नियमको बतलानेकी इच्छावाला यह मन्त्र आरम्भ किया जाता है—

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥

२०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक १

[ ज्ञानरूप ] तपके द्वारा ब्रह्म कुछ उपचय ( स्थूलता ) को प्राप्त हो जाता है, उसीसे अन्न उत्पन्न होता है । फिर अन्नसे क्रमशः प्राण, मन, सत्य, लोक, कर्म और कर्मसे अमृतसंज्ञक कर्मफल उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

तपसा ज्ञानेनोत्पत्तिविधिज्ञ-उत्पत्तिविधिकाज्ञाता होनेके कारण तप अर्थात् ज्ञानसे भूतोंका कारण-
तया भूतयोन्यक्षरं ब्रह्म चीयतरूप अक्षरब्रह्म उपचित होता है; अर्थात् इस जगत्को उत्पन्न करनेकी
उपचीयत उत्पिपादयिषदिदंइच्छा करते हुए वह कुछ स्थूलताको प्राप्त हो जाता है, जैसे अङ्कुर-
जगदङ्कुरमिव बीजमुच्छूनतांरूपमें परिणत होता हुआ बीज कुछ स्थूल हो जाता अथवा पुत्र उत्पन्न
गच्छति पुत्रमिव पिता हर्षेण ।करनेकी इच्छावाला पिता हर्षसे उल्लसित हो जाता है ।
एवं सर्वज्ञतया सृष्टिस्थितिसंहारशक्तिविज्ञानवत्त्वोपचितात्इस प्रकार सर्वज्ञ होनेके कारण सृष्टि स्थिति और संहार-शक्तिकी विज्ञानवत्ततासे वृद्धिको प्राप्त हुए
ततो ब्रह्मणोऽन्नमद्यते भुज्यतउस ब्रह्मसे अन्न—जो खाया यानी भोजन किया जाय उसे अन्न
इत्यन्नमव्याकृतं साधारणं संसा-कहते हैं, वह सबका साधारण कारणरूप अव्याकृत संसारियोंकी
रिणां व्याचिकीर्षितावस्थारूपेणव्याचिकीर्षित ( व्यक्त की जाने-
अभिजायत उत्पद्यते । ततश्चवाली ) अवस्थारूपसे उत्पन्न होता है । उस अव्याकृतसे यानी व्याचि-
अव्याकृताद्व्याचिकीर्षितावस्थातःकीर्षित अवस्थावाले अन्नसे प्राण—
अन्नात्प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्मणोहिरण्यगर्भ यानी ब्रह्मकी ज्ञान और क्रियाशक्तियोंसे अधिष्ठित, व्यष्टि
ज्ञानक्रियाशक्त्यधिष्ठितजगत्सा-जीवोंका समष्टिरूप तथा अविद्या,
धारणोऽविद्याकामकर्मभूतसमु-काम, कर्म और भूतोंके समुदायरूप

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१


कार्यबीजाङ्कुरो जगदात्माभिजायत इत्यनुषङ्गः ।बीजका अङ्कुर जगदात्मा उत्पन्न होता है। यहाँ प्राण शब्दका 'अभिजायते' क्रियासे सम्बन्ध है ।
तस्माच्च प्राणान्मनो मनआख्यं सङ्कल्पविकल्पसंशयनिर्णयाद्यात्मकमभिजायते । ततोऽपि सङ्कल्पाद्यात्मकान्मनसः सत्यं सत्याख्यमाकाशादि भूतपञ्चकम् अभिजायते। तस्मात्सत्याख्याद्भूतपञ्चकाद् अण्डक्रमेण सप्तलोका भूर्वादयः । तेषु मनुष्यादिप्राणिवर्णाश्रमक्रमेण कर्माणि । कर्मसु च निमित्तभूतेष्वमृतं कर्मजं फलम् । यावत्कर्माणि कल्पकोटिशतैरपि न विनश्यन्ति तावत्फलं न विनश्यति इत्यमृतम् ॥ ८ ॥तथा उस प्राणसे मन यानी संकल्प-विकल्प-संशय-निर्णयात्मक मननामक अन्तःकरण उत्पन्न होता है । उस सङ्कल्पादिरूप मनसे भी सत्य—सत्यनामक आकाशादि भूतपञ्चककी उत्पत्ति होती है । फिर उस सत्यसंज्ञक भूतपञ्चकसे ब्रह्माण्डक्रमसे भूः आदि सात लोक उत्पन्न होते हैं । उनमें मनुष्यादि प्राणियोंके वर्ण और आश्रमके क्रमसे कर्म होते हैं तथा उन निमित्तभूत कर्मोंसे अमृत—कर्मजनित फल होता है । जबतक सौ करोड़ कल्पतक भी कर्मोंका नाश नहीं होता तबतक उनका फल भी नष्ट नहीं होता; इसलिये कर्मफलको 'अमृत' कहा है ॥ ८ ॥

उक्तमेवार्थमुपसंजिहीर्षुर्मन्त्रो वक्ष्यमाणार्थमाह—पूर्वोक्त अर्थका ही उपसंहार करनेकी इच्छावाला [ यह नवम ] मन्त्र आगे कहा जानेवाला अर्थ कहता है—

प्रकरणका उपसंहार

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद्ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥