भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
३८६* संक्षिप्त नारदपुराण *

(शुक्रदोष—) शुक्र अस्त हों तो यात्रामें हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है। सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किंतु वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम—इन पाँच गोत्रवालोंको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा राजाओंमें युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका कोप होनेपर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित* हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्चराशि (मीन)-में हो तो यात्रामें विजय होती है॥ ६३५-६३८॥

अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुकी राशिसे छठी राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी जिस राशिमें हों, उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है। परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है॥ ६३९-६४०॥

द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर राशि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्नमें अशुभ है। यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है॥ ६४१॥

धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके (रेवतीपर्यन्त) पाँच नक्षत्रोंमें गृहार्थ तृण-काष्ठोंका संग्रह, दक्षिणकी यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ग आदि)-का बनाना, घरको छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये॥ ६४२॥

यदि यात्रालग्नमें जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिसे ३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४३॥

यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्राकी दिशा)-की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्नमें शुभग्रहके वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४४॥

शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्रालग्नमें हो तो शत्रुता नाश होता है॥ ६४५॥

मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग (रास्ता) टेढ़ा हो जाता है। (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है।) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है॥ ६४६॥

जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी-नद आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है॥ ६४६ १/२॥

(लग्नभावोंकी संज्ञा—) १- मूर्ति (तन), २-कोष (धन), ३-धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४-वाहन (सवारी, माता), ५-मन्त्र (विद्या, संतान), ६-शत्रु (रोग, मामा), ७-मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८-आयु (मृत्यु), ९-मन (अन्तःकरण, भाग्य), १०-व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११- प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राप्ति (व्यय)—ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं॥ ६४७-६४८॥

पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राहु तथा केतु—ये) तीसरे और ग्यारहवेंको छोड़कर अन्य सब


* जब मङ्गलादि ग्रहोंमें किन्हीं दो ग्रहोंकी एक राशिमें अंशकला बराबर हो तो दोनोंमें युद्ध समझा जाता है। उन दोनोंमें जो उत्तर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८७

भावोंमें जानेसे भावफलको नष्ट कर देते हैं²। तीसरे और ग्यारहवें भावमें जानेसे वे इन दोनों भावोंको पुष्ट करते हैं। सूर्य और मङ्गल ये दोनों दशम भावको भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भावमें जानेसे उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म)- को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शुक्र) जिस भावमें जाते हैं, उस भावफलको पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भावमें जानेसे उस भावफल (शत्रु और रोग)-को नष्ट करते हैं॥६४९॥ शुभ ग्रहोंमें शुक्र सप्तम भावको और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१, ८) को पुष्ट नहीं करते हैं। (अपितु नष्ट ही करते हैं।)

( अभिजित्-प्रशंसा— ) अभिजित् मुहूर्त (दिनका मध्यकाल = १२ बजेसे १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करनेवाला योग है। यह दक्षिण दिशाकी यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओंकी यात्रामें शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त)-में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रामें वह उत्तम फल देनेवाला होता है॥६५०-६५१॥

( यात्रा-योग— ) लग्न और ग्रहोंकी स्थितिसे नाना प्रकारके यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियौं)- को योगबलसे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्राह्मणोंको नक्षत्रबलसे तथा अन्य मनुष्योंको मुहूर्तबलसे इष्टसिद्धि होती है। तस्करोंको शकुनबलसे अपने अभीष्टकी प्राप्ति होती है॥६५२ १/२॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति—इन तीनमेंसे कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो 'योग' कहलाता है। यदि उनमेंसे दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो 'अधियोग' कहलाता है तथा यदि तीनों लग्नसे केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (९, ५)-में हों तो योगाधियोग कहलाता है॥६५३ १/२॥ योगमें यात्रा करनेवालोंका कल्याण होता है। अधियोगमें यात्रा करनेसे विजय प्राप्त होती है और योगाधियोगमें यात्रा करनेवालेको कल्याण, विजय तथा सम्पत्तिका भी लाभ होता है॥६५४ १/२॥ लग्नसे दसवें स्थानमें चन्द्रमा, षष्ठ स्थानमें शनि और लग्नमें सूर्य हों तो इस समयमें यात्रा करनेवाले राजाको विजय तथा शत्रुंकी सम्पत्ति भी प्राप्त होती है॥६५५ १/२॥ शुक्र, रवि, बुध, शनि और मङ्गल—ये पाँचों ग्रह क्रमसे लग्न चतुर्थ, सप्तम, तृतीय और षष्ठ भावमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सम्मुख आये हुए शत्रुगण आगमें पड़ी हुई लाहकी भाँति नष्ट हो जाते हैं॥६५६ १/२॥ बृहस्पति लग्नमें और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भावमें हों तो इस योगमें यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंकी सेना यमराजके घर पहुँच जाती है॥६५७ १/२॥ यदि लग्नमें शुक्र, ग्यारहवेंमें रवि और चतुर्थ भावमें चन्द्रमा हो तो इस योगमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियोंके झुंडको सिंह॥६५८ १/२॥

अपने उच्च (मीन)-में स्थित शुक्र लग्नमें हो अथवा अपने उच्च (वृष)-का चन्द्रमा लाभ (११) भावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुंकी सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णने पूतनाको नष्ट किया था॥६५९ १/२) यदि यात्राके समय शुभग्रह केन्द्रमें या त्रिकोणमें हों तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुकि लक्ष्मी अभिसारिकाकी भाँति उसके समीप आ जाती है॥६६० १/२॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा—ये क्रमशः लग्न, ६ और ८ में हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सामने दुर्जनोंकी मैत्रीके समान शत्रुओंकी सेना नहीं ठहरती है॥६६१ १/२॥ यदि लग्नसे ३, ६, ११ में पापग्रह हों और शुभ-ग्रह बलवान् होकर


२. जैसे पापग्रह लग्न (तनुभाव)-में रहता है तो शरीरमें कष्ट-पीड़ा देता है तथा धन-भावमें धनका नाश करता है। किंतु जब तीसरेमें रहता है तो पराक्रमको और ग्यारहवें रहता है तो लाभको पुष्ट करता है।

३८८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अपने उच्चादि स्थानमें (स्थित) हों तो शत्रुको भूमि यात्रा करनेवाले राजाके हाथमें आ जाती है॥ ६६२ १/२॥ अपने उच्च (कर्क)-में स्थित बृहस्पति यदि लग्नमें हों और चन्द्रमा ११ भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥ ६६३ १/२ ॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशिमें स्थित शुक्र यदि लग्नमें हों और गुरु ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाला पुरुष तारकासुरको कार्तिकेयकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है॥ ६६४ १/२ ॥ गुरु लग्नमें और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओंको वैसे ही भस्म कर देता है, जैसे वनको दावानल॥ ६६५ १/२॥ यदि बुध लग्नमें और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्रमें हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म-ऋतुमें क्षुद्र नदियोंको सोख लेती है॥ ६६६ १/२॥ सम्पूर्ण शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अन्धकारको सूर्यकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है॥ ६६७ १/२ ॥

शुभग्रह यदि अपनी राशिमें स्थित होकर केन्द्र (१, ४, ७, १०), त्रिकोण (५, ९) तथा आय (११) भावमें हो तो यात्रा करनेवाला राजा रूईको अग्निके समान अपने शत्रुओंको जलाकर भस्म कर देता है॥ ६६८ १/२) चन्द्रमा दसवें भावमें और बृहस्पति केन्द्रमें हों तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणवसहित पञ्चाक्षर-मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) पाप-समूहका नाश कर देता है॥ ६६९ १/२ ॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्नमें स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापोंको श्रीभगवान्‌का स्मरण॥ ६७० १/२॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांशमें हो तो यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतोंको॥ ६७१ १/२ ॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्रकी राशिमें होकर केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो ऐसे समयमें यात्रा करनेवाला भूपाल सर्पोंको गरुड़के समान अपने शत्रुओंको अवश्य नष्ट कर देता है॥ ६७२ १/२ ॥ यदि एक भी शुभग्रह वर्गोत्तम नवमांशमें स्थित होकर केन्द्रमें हो तो यात्रा करनेवाला नरेश पाप-समूहोंको गङ्गाजीके समान अपने शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर देता है॥ ६७३ १/२॥ जो राजा शत्रुओंको जीतनेके लिये उपर्युक्त राजयोगोंमें यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओंकी स्त्रियोंके अश्रुजलसे शान्त होता है॥ ६७४ १/२॥ आश्विन मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि 'विजया' कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त होती है अथवा शत्रुओंसे सन्धि (मेल) हो जाती है। किसी भी दशामें उसकी पराजय नहीं होती है॥ ६७५ १/२ ॥

(मनोजय-प्रशंसा—) यात्रा आदि सभी कार्योंमें निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं ग्रहयोग)-की अपेक्षा भी मनोजय (मनको वशमें तथा प्रसन्न रखना) प्रबल है। इसलिये मनस्वी पुरुषोंके लिये यत्नपूर्वक फलसिद्धिमें मनोजय ही प्रधान कारण होता है॥ ६७६ १/२ ॥

(यात्रामें प्रतिबन्ध—) यदि घरमें उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवनकी इच्छा रखनेवालोंको बिना उत्सवको समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६७७ १/२)

(यात्रामें अपशकुन—) यात्राके समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहोंमें लड़ाई हो, स्त्रीसे कलह हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीरसे खिसककर गिर पड़े, किसीपर क्रोध हो जाय या मुखसे दुर्वचन कहा गया हो

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ ३८९

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८९


तो उस दशामें राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६७८ १/२ ॥

(दिशा, वार तथा नक्षत्र दोहद*—) यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशाकी यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशाको जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशाकी यात्रा करे तो निश्चय ही वह शत्रुओंपर विजय पाता है। रविवारको सज्जिका (मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवारको खीर, मङ्गलवारको काँजी, बुधवारको दूध, गुरुवारको दही, शुक्रवारको दूध तथा शनिवारको तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओंको जीत लेता है। अश्विनीमें कुल्माष (उड़दका एक भेद), भरणीमें तिल, कृत्तिकामें उड़द, रोहिणीमें गायका दही, मृगशिरामें गायका घी, आर्द्रामें गायका दूध, आश्लेषामें खीर, मघामें नीलकण्ठका दर्शन, हस्तमें षाष्टिक्य (साठी धान्य)-के चावलका भात, चित्रामें प्रियंगु (कँगनी), स्वातीमें अपूप (मालपुआ), अनुराधामें फल (आम, केला आदि), उत्तराषाढ़में शाल्य (अगहनी धानका चावल), अभिजित्में हविष्य, श्रवणमें कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठामें मूँग, शतभिषामें जौका आटा, उत्तरभाद्रपदमें खिचड़ी तथा रेवतीमें दही-भात खाकर राजा यदि हाथी, घोड़े, रथ या नरयान (पालकी)-पर बैठकर यात्रा करे तो वह शत्रुओंपर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है॥ ६७९-६८४॥

(यात्राविधि—) प्रज्वलित अग्निमें तिलोंसे हवन करके जिस दिशामें जाना हो, उस दिशाके स्वामीको उन्हींके समान रङ्गवाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालोंके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे। फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणोंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेकर राजाको यात्रा करनी चाहिये॥ ६८५ १/२ ॥

(दिक्पालोंके स्वरूपका ध्यान—) (१ पूर्व दिशाके स्वामी) देवराज इन्द्र शचीदेवीके साथ ऐरावतपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पा रहे हैं। उनके हाथमें वज्र है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। (२ अग्निकोणके अधीश्वर) अग्निदेवके सात हाथ, सात जिह्वाएँ और छः मुख हैं। वे भेड़पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहादेवीके प्रियतम हैं तथा स्रुक्-स्रुवा और नाना प्रकारके आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशाके स्वामी) यमराजका दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आँखें लाल हैं और वे भैंसेपर आरूढ़ हैं। उनके शरीरका रङ्ग कुछ लाली लिये हुए साँवला है। वे ऊपरकी ओर मुँह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं। (४ नैर्ऋत्यकोणके अधिपति) निर्ऋतिका वर्ण नील है। वे अपने हाथोंमें ढाल और तलवार लिये रहते हैं; मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आँखें भयंकर तथा केश ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्यशाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशाके स्वामी) वरुणकी अङ्गकान्ति पीली है। वे नागपाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है। वे कालिकादेवीके प्राणनाथ हैं और रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। (६ वायव्य कोणके अधिपति) वायुदेव काले रङ्गके मृगपर आरूढ़ हैं। अञ्जनीके पति हैं, वे समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं और वे हाथमें दण्ड धारण करते हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करे। (७ उत्तर दिशाके


१. दोहद—जिसे जिस वस्तुकी विशेष चाह होती है, जिसकी प्राप्तिसे मन प्रसन्न हो जाता है, वह उसका 'दोहद' कहलाता है। पूर्व दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवी चाहती है कि लोग घृतमिश्रित अन्न खायें। रविवारका अधिपति चाहता है कि लोग रसाला (सिखरन—मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही) खायें इत्यादि। इसी प्रकार अन्य वारादिमें भी जानना चाहिये। दोहद-भक्षण करनेसे उस वार आदिका दोष नष्ट हो जाता है।

३९० * संक्षिप्त नारदपुराण *

स्वामी) कुबेर घोड़ेपर सवार हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं। वे हाथमें कलश धारण करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके सदृश है। वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वोंके राजा हैं। (८ ईशानकोणके स्वामी) गौरीपति भगवान् शङ्कर हाथमें पिनाक लिये वृषभपर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। माथेपर चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित होता है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालोंका ध्यान और पूजन करना चाहिये) ॥ ६८६—६९३ १/२ ॥

(प्रस्थानविधि—) यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रा-लग्नमें राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहनमेंसे किसी एक वस्तुको यात्राके निर्धारित समयमें घरसे निकालकर जिस दिशामें जाना हो, उसी दिशाकी ओर दूर रखा दे। अपने स्थानसे निर्गमस्थान (प्रस्थान रखनेकी जगह) २०० दण्ड (चार हाथकी लग्गी)-से दूर होना उचित है। अथवा चालीस या कम-से-कम बारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक है। राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थानमें सात दिन न ठहरे। अन्य (राज-मन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छः या पाँच दिन न ठहरे। यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचारकर यात्रा करे॥ ६९४—६९६ १/२ ॥

असमयमें (पौषसे चैत्रपर्यन्त) बिजली चमके, मेघकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजाको सात राततक अन्य स्थानोंकी यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६९७ १/२ ॥

(शकुन—) यात्राकालमें रला नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौआ तथा कबूतर—इनके शब्द वामभागमें सुनायी दें तो शुभ होता है। छछुंदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्राके समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ जायँ तो श्रेष्ठ हैं। काले रंगको छोड़कर अन्य सब रंगोंके चौपाये यदि वाम भागमें दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमयमें कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है॥ ६९८—७००॥

यात्राकालमें सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पोंकी चर्चा शुभ होती है, किंतु किसी भूली हुई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो इनकी चर्चा अच्छी नहीं होती है। वानर और भालुओंकी चर्चाका विपरीत फल होता है॥ ७०१॥

यात्रामें मोर, बकरा, नेवला, नीलकण्ठ और कबूतर दीख जायँ तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है; परंतु लौटकर अपने नगरमें आने या घरमें प्रवेश करनेके समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ ही समझना चाहिये। यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव (मुर्दा) सामने दीख पड़े तो यात्राके उद्देश्यकी सिद्धि होती है। परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहमें प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा दीख पड़े तो वह घातक होता है॥ ७०२-७०३॥

(अपशकुन—) यात्राके समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन (उलटी) करनेवाला, शरीरमें तेल लगानेवाला, वसा, हड्डी, चर्म, अङ्गार (ज्वालारहित अग्नि), दीर्घ रोगी, गुड़, कपास (रूई), नमक, प्रश्न (पूछने या टोकनेका शब्द), तृण, गिरगिट, बन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केशवाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायँ तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है॥ ७०४-७०५॥

(शुभ शकुन—) प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदिकी सुगन्ध, फूल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, शहद, घृत, दही, गोबर, चूना, धुला

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९१

हुआ वस्त्र, शङ्ख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न (हीरा, मोती आदि), भृङ्गार (गडुवा), गौ, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदङ्ग, दुन्दुभि, घण्टा तथा वीणा (बाँसुरी) आदि वाद्योंके शब्द, वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द—ये सब यात्राके समय यदि देखने या सुननेमें आवें तो यात्रा करनेवाले लोगोंके सब कार्य सिद्ध करते हैं॥७०६-७०९॥

(अपशकुन-परिहार—) यात्राके समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेवका स्मरण करके फिर चले। दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा (वस्त्र, द्रव्य आदिसे उनका सत्कार) करके चले। यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये॥७१०॥

(छींकके फल—) यात्राके समय सभी दिशाओंकी छींक निन्दित है। गौकी छींक घातक होती है, किंतु बालक, वृद्ध, रोगी या कफवाले मनुष्यकी छींक निष्फल होती है॥७११॥

परस्त्रियोंका स्पर्श करनेवाला तथा ब्राह्मण और देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़ेको बाँध लेनेवाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योंपर कदापि हाथ न उठावे॥७१२॥

(गृह-प्रवेश—) नये घरमें प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तमें करे। पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि (नैवेद्य) अर्पण करके गृहमें प्रवेश करना चाहिये॥७१३॥

(गृह-प्रवेशमें विहित मास—) माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासोंमें गृहप्रवेश श्रेष्ठ होता है। तथा अगहन और कार्तिक इन दो मासोंमें मध्यम होता है।

(विहित नक्षत्र—) मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा और रोहिणी) नक्षत्रोंमें बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मङ्गलको छोड़कर अन्य वारोंमें रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या छोड़कर अन्य तिथियोंमें दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबलसहित उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह्न भागमें स्थिर राशिके नवमांशयुक्त स्थिर लग्नमें जब लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्रमें हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावोंमें हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ इनसे भिन्न स्थानोंमें हों, तब गृह-प्रवेश करनेवाले यजमानकी जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनोंसे उपचय (३, ६, १०, ११ वीं) राशिके गृह-प्रवेश लग्नमें विद्यमान होनेपर सब प्रकारके सुख और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समयमें गृह-प्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है॥७१४-७१९॥

(प्रवेश-विधि—) जिस नूतन गृहमें प्रवेश करना हो, उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा पुष्प-तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद-ध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियोंके माङ्गलिक गीत तथा वाद्य आदिके शब्दोंके साथ सूर्यको वाम भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिये॥७२०॥

(वृष्टि-विचार—) वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्रमें सूर्यके प्रवेश)-के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्नसे केन्द्र (१, ४, ७, १०)-में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमापर पापग्रहकी दृष्टि हो तो दीर्घकालमें अल्पवृष्टि समझनी चाहिये। (इससे सिद्ध होता है कि यदि चन्द्रमापर पाप और शुभ दोनों ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है।) जिस प्रकार चन्द्रमासे फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्रसे भी समझना चाहिये। (अर्थात् सूर्यके आर्द्रा-प्रवेशके समय चन्द्रमा और शुक्र

३१२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

दोनोंकी स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समझना चाहिये॥ ७२१-७२२॥

वर्षाकालमें आर्द्रासे स्वातीतक सूर्यके रहनेपर चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तम स्थानमें अथवा शनिसे पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थानमें हो, उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है॥ ७२३॥

यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशिमें स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु उन दोनों (बुध और शुक्र)-के बीचमें सूर्य हों तो वृष्टिका अभाव होता है॥ ७२४॥

यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रोंमें शुक्र पूर्व दिशामें उदित हों और स्वातीसे तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा)-में शुक्र पश्चिम दिशामें उदित हों तो निश्चय ही वर्षा होती है। इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिये॥ ७२५॥

यदि सूर्यके समीप (एक राशिके भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं; किंतु उनकी गति वक्र न हुई हो तभी ऐसा होता है॥ ७२६॥

दक्षिण गोल (तुलासे मीनतक)-में शुक्र यदि सूर्यसे वाम भागमें पड़े तो वृष्टिकारक होता है। उदय या अस्तके समय यदि आर्द्रांमें सूर्यका प्रवेश हो तो भी वर्षा होती है॥ ७२७॥

यदि सूर्यका आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्याके समय हो तो शस्य (धान)-की वृद्धि होती है। यदि रात्रिमें हो तो मनुष्योंको सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्य-हानि, अनावृष्टि और धान्य-वृद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्नसे केन्द्रमें पड़ते हों तो ईति (खेतीके टिड्डी आदि सब उपद्रव)-का नाश होता है॥ ७२८-७२९॥

यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें प्रवेशके समय मेघोंसे आच्छन्न हों तो आर्द्रासे मूलतक प्रतिदिन वर्षा होती है॥ ७३०॥

यदि रेवतीमें सूर्यके प्रवेश करते समय वर्षा हो जाय तो उससे दस नक्षत्र (रेवतीसे आश्लेषा)-तक वर्षा नहीं होती है। सिंह-प्रवेशमें लग्न यदि मङ्गलसे भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेशमें अभिन्न हो एवं कन्या-प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है॥ ७३१½॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है। अश्विनीको सर्वधान्योंका नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षाकाल (चातुर्मास्य)-में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरुसे सप्तम राशिमें निर्बल हों तो आर्द्रासे सात नक्षत्रतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डलमें परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशामें बिजली दीख पड़े या मेढकोंके शब्द सुनायी पड़ें तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भागमें लटका हुआ मेघ यदि आकाशके बीचमें होकर दक्षिण दिशामें जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनोंसे धरतीको खोदे, लोहे (तथा ताँबे और कांसी आदि)-में मल जमने लगे अथवा बहुत-से बालक मिलकर सड़कोंपर पुल बाँधें तो ये वर्षाके सूचक चिह्न हैं।

चींटीकी पङ्क्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाशमें बहुतेरे जुगनू दीख पड़ें तथा सर्पोंका वृक्षपर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुर्भिक्ष-सूचक हैं।

उदय या अस्त-समयमें यदि सूर्य या चन्द्रमाका रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधुके समान दीख पड़े तथा बड़े जोरकी हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है॥ ७३२-७३८½॥

(पृथ्वीके आधार कूर्मके अङ्ग-विभाग-)

कूर्मदेवता पूर्वकी ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अङ्गोंमें इस भारत भूमिके नौ विभाग

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३९३

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९३

करके प्रत्येक खण्डमें प्रदक्षिणक्रमसे विभिन्न मण्डलों (देशों)-को समझे। अन्तर्वेदी (मध्यभाग)-में पाञ्चालदेश स्थित है, वही कूर्मभगवान्‌का नाभिमण्डल है। मगध और लाट देश पूर्व दिशामें विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिङ्ग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्रविड और भिल्लदेश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कौंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र देश—ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र देश पुच्छ-भाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर—ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्य-देश वाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल) अङ्ग, वङ्ग, वाहीक और काम्बोज—ये दोनों हाथ हैं॥ ७३९-७४४॥

इन नवों अङ्गोंमें क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रोंका न्यास करे। जिस अङ्गके नक्षत्रमें पापग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशोंमें तबतक अशुभ फल होता है और जिस अङ्गके नक्षत्रोंमें शुभग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशोंमें शुभ फल होते हैं॥ ७४५॥

(मूर्ति-प्रतिमा-विकार—) देवताओंकी प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गावे, पसीनेसे तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जलका वमन करे, अधोमुख हो जाय, एक स्थानसे दूसरे स्थानमें चली जाय तथा इसी तरहकी अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें तो यह प्रतिमा-विकार कहलाता है। यह विकार अशुभ फलका सूचक होता है।

(विविध विकार—) यदि आकाशमें गन्धर्वनगर (ग्रामके समान आकार), दिनमें ताराओंका दर्शन, उल्कापातन, काष्ठ, तृण और शोणितकी वर्षा, गन्धर्वोंका दर्शन, दिग्दाह, दिशाओंमें धूम छा जाना, दिन या रात्रिमें भूकम्प होना, बिना आगके स्फुलिङ्ग (अङ्गार) दीखना, बिना लकड़ीके आगका जलना, रात्रिमें इन्द्रधनुष या परिवेश (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ दिखायी देना तथा आगकी चिनगारियोंका प्रकट होना आदि बातें दिखायी देने लगें, गौ, हाथी और घोड़ोंके दो या तीन मस्तकवाला बच्चा पैदा हो, प्रातःकाल एक साथ ही चारों दिशाओंमें अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गाँवमें गीदड़ोंका दिनमें बास हो, धूम-केतुओंका दर्शन होने लगे तथा रात्रिमें कौओंका और दिनमें कबूतरोंका क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षोंमें बिना समयके फूल या फल दीख पड़ें तो उस वृक्षको काट देना चाहिये और उसकी शान्ति कर लेनी चाहिये। इस प्रकारके और भी जो बड़े-बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम)-का नाश करनेवाले होते हैं। कितने ही उत्पात घातक होते हैं; कितने ही शत्रुओंसे भय उपस्थित करते हैं। कितने ही उत्पातोंसे भय, यश, मृत्यु, हानि, कीर्ति, सुख-दुःख और ऐश्वर्यकी भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमककी मिट्टीके ढेर)-पर शहद दीख पड़े तो धनकी हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ! इस तरहके सभी उत्पातोंमें यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधिसे शान्ति अवश्य कर लेनी चाहिये। नारदजी! इस प्रकार संक्षेपसे मैंने ज्योतिषशास्त्रका वर्णन किया है। अब वेदके छहों अङ्गोंमें श्रेष्ठ छन्दःशास्त्रका परिचय देता हूँ॥ ७४६-७५८॥ (पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५६)

३९४* संक्षिप्त नारदपुराण *

छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय¹

सनन्दनजी कहते हैं—नारद! छन्द दो प्रकारके बताये जाते हैं—वैदिक² और लौकिक³। मात्रा और वर्णके भेदसे वे लौकिक या वैदिक छन्द भी पुनः दो-दो प्रकारके हो जाते हैं (मात्रिक⁴ छन्द और वर्णिक⁵ छन्द)॥ १॥ छन्दःशास्त्रके विद्वानोंने मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु—इन्हींको छन्दोंकी सिद्धिमें कारण बताया है॥ २॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण(SSS) कहा गया है। जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण ( ISS) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण ( S IS) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण ( IIS) है॥ ३॥ जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण ( SSI) कहा गया है, जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण ( ISI) और जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण ( S II) है। मुने! जिसमें तीनों अक्षर लघु हों, वह नगण ( III)

१. शास्त्रकारोंने द्विजातियोंके लिये छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके अध्ययनका आदेश दिया है। उन्हीं अङ्गोंमेंसे छन्द भी एक अङ्ग है। इसे वेदका चरण माना गया है—‘छन्दः पादौ तु वेदस्य।’ (पा० शि० ४१) ‘अनुष्टुभा यजति, बृहत्या गायति, गायत्र्या स्तौति।’ (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (अनुष्टुप्‌से यजन करे, बृहती छन्दद्वारा गान करे, गायत्री छन्दसे स्तुति करे) इत्यादि विधियोंका श्रवण होनेसे छन्दका ज्ञान परम आवश्यक सिद्ध होता है। छन्द न जाननेसे प्रत्यवाय भी होता है; जैसा कि छन्दोग ब्राह्मणका वचन है—‘यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स स्थाणुं वर्च्छति गर्तं वा पद्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति।’ (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (जो ऋषि छन्द, देवता तथा विनियोगको जाने बिना ब्राह्मणमन्त्रसे यज्ञ कराता और शिष्योंको पढ़ाता है, वह ठूंठे काठके समान हो जाता है, नरकमें गिरता है, वेदोक्त आयुका पूरा उपभोग न करके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त होता है अथवा महान् पापका भागी होता है। उसके किये हुए समस्त वेदपाठ यातयाम (प्रभाव-शून्य व्यर्थ) हो जाते हैं); इसलिये छन्दका ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये। इसीके लिये इस छन्दःशास्त्रका आरम्भ हुआ है।

२. वेदमन्त्रोंमें जो गायत्री, अनुष्टुप्, बृहती और त्रिष्टुप् आदि छन्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको वैदिक छन्द कहते हैं। यथा—

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
—यह गायत्री छन्द है।

३. इतिहास, पुराण, काव्य आदिके पद्योंमें प्रयुक्त जो छन्द हैं, वे लौकिक कहे गये हैं। यथा—

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
—यह ‘श्लोक अनुष्टुप् छन्द है।

४. परिगणित मात्राओंसे पूर्ण होनेवाले छन्दोंको ‘मात्रिक’ कहते हैं। जैसे—आर्या छन्दके प्रथम और तृतीय पाद बारह मात्राओंसे, द्वितीय पाद अठारह मात्राओंसे और चतुर्थ पाद पन्द्रह मात्राओंसे पूर्ण होते हैं। आर्याके पूर्वार्ध सदृश उत्तरार्ध भी हो तो ‘गीति’ और उत्तरार्ध-सदृश पूर्वार्ध हो तो ‘उपगीति’ छन्द होते हैं।
आर्याका उदाहरण—

वृन्दावने सलीलं वल्गुद्रुमकाण्डनिहिततनुयष्टिः। स्मेरमुखार्पितवेणुः कृष्णो यदि मनसि कः स्वर्गः॥

५. परिगणित अक्षरोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंको ‘वर्णिक’ कहते हैं। यथा—

जयन्ति गोविन्दमुखारविन्दे मरन्दसान्द्राधरमन्दहासाः। चित्ते चिदानन्दमयं तमोघ्नममन्दमिन्दुद्रवमुद्गिरन्तः॥
—यह इन्द्रवज्रा-उपेन्द्रवज्राके मेलसे बना हुआ उपजाति नामक छन्द है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३९५

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९५

कहा गया है। तीन अक्षरोंके समुदायका नाम गण है¹॥ ४॥ आर्या आदि छन्दोंमें चार मात्रावाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघुवाले गणसे युक्त हैं²। यदि लघु अक्षरसे परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघुकी दीर्घताका बोधक होता है³। इस छन्दःशास्त्रमें 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पद्य या श्लोकके एक चौथाई भागको पाद कहते हैं। विच्छेद या विरामका नाम 'यति' है॥ ५-६॥ नारद! वृत्त (छन्द)-के तीन भेद माने गये हैं—सम वृत्त, अर्धसम वृत्त तथा विषम वृत्त। जिसके चारों चरणोंमें समान लक्षण लक्षित होता हो, वह सम वृत्त⁴ कहलाता है॥ ७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणोंमें एवं दूसरे तथा चौथे चरणोंमें समान लक्षण हों, वह अर्धसम⁵ वृत्त है। जिसके चारों चरणोंमें एक-

१. गणोंके सम्बन्धमें कुछ ज्ञातव्य बातें निम्नाङ्कित कोष्ठकसे जाननी चाहिये—

गणनाममगणयगणरगणसगणतगणजगणभगणनगण
स्वरूपSSSISSS ISIISSS IIS IS IIIII
देवतापृथ्वीजलअग्निवायुआकाशसूर्यचन्द्रमास्वर्ग
फललक्ष्मी-वृद्धिवृद्धि या अभ्युदयविनाशभ्रमणधन-नाशरोगसुयशआयु
मित्रादि संज्ञाएँमित्रभृत्यशत्रुशत्रुउदासीनउदासीनभृत्यमित्र

यदि काव्यमें ऐसे छन्दको चुना गया, जो जगण आदि अनिष्टकारी गणोंसे संयुक्त हो तो उसकी शान्तिके लिये प्रारम्भमें भगवद्वाचक एवं देवतावाचक शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये; जैसा कि भामहका वचन है— देवतावाचकाः शब्द ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युर्लिपितो गणतोऽपि वा ॥ (पिङ्गलसूत्रकी हलायुध-वृत्तिसे उद्धृत) 'जो देवतावाचक और मङ्गलादिवाचक शब्द हैं, वे सब लिपिदोष या गणदोषसे भी निन्दित नहीं होते।' (उनके द्वारा उक्त दोषोंका निवारण हो जाता है।)

२. यथा—

सर्वगुरुअन्त्यगुरुमध्यगुरुआदिगुरुचतुर्लघु
SSIISIS IS IIII II

इन भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार है—कर्ण, करतल, पयोधर, वसुचरण और विष्ठ। ३. जैसे—रामं। रामः। रामस्य। यहाँ 'राम' शब्दके 'म' में ह्रस्व अकार है, तथापि उसमें अनुस्वार और विसर्गका सम्बन्ध होनेसे वह दीर्घ ही माना जाता है। इसी प्रकार 'स्य' यह संयुक्त अक्षर परे होनेसे 'रामस्य' में मकारके परवर्ती अकारको दीर्घ समझा जाता है। पादके अन्तमें जो लघु अक्षर हो, वह भी विकल्पसे 'गुरु' माना जाता है। ४. सम वृत्तका उदाहरण— मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता। स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥ (इस 'शिखरिणी' छन्दके चारों चरणोंमें एक समान ह्रस्व-दीर्घवाले सत्रह-सत्रह अक्षर हैं।) ५. अर्धसम वृत्तका उदाहरण— I I I I I S I S I S S I I I I S I I S I S I S S त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने। वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥ यह 'पुष्पिताग्रा' छन्द है। इसके प्रथम और तृतीय चरण एक समान लक्षणवाले बारह-बारह अक्षरके हैं। उनमें २

३९६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


दूसरेसे भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषम^१ वृत्त है ॥८॥ एक अक्षरके पादसे आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जबतक छब्बीस अक्षरका पाद पूरा हो तबतक पृथक्-पृथक् छन्द बनते हैं। छब्बीस अक्षरसे अधिकका चरण होनेपर चण्डवृष्टिप्रपात आदि दण्डक^२ बनते हैं। तीन या छः पादोंसे गाथा^३ होती है। अब क्रमशः एकसे छब्बीस अक्षरतकके पादवाले छन्दोंकी संज्ञा सुनो ॥९-१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि, अत्यष्टिधृति, विधृति (या अतिधृति), कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति या अभिकृति तथा उत्कृति^४ ॥११-१३॥ ये छन्दोंकी


नगण, १ रगण और १ यगण हैं और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें एक-से लक्षणवाले तेरह-तेरह अक्षर हैं। इनमें १ नगण, २ जगण, १ रगण और १ गुरु हैं।

अर्धसम वृत्तोंमें 'पुष्पिताग्रा' के अतिरिक्त हरिणप्लुता तथा वैतालीय या वियोगिनी आदि और भी अनेक छन्द होते हैं। वैतालीय अथवा वियोगिनीके प्रथम और तृतीय चरणोंमें २ सगण, १ जगण और १ गुरु होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरणोंमें १ सगण, १ भगण, १ रगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।

उदाहरण—

    IIS I        I S IS I    S  IISS   IIS I          S IS

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परां न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥

'हरिणप्लुता' (में विषम पादोंमें ३ सगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं और सम पादोंमें १ नगण, २ भगण और १ रगण होते हैं। इसके दूसरे, चौथे पाद द्रुतविलम्बितके ही समान हैं।)

उदाहरण—

    IIS IIS      IIS IS      I IIS IIS    IIS    IS

स्फुटफेनचया हरिणप्लुता वलिमन्नोजतटा तरणेः सुता।
कलहंसकुलारवशालिनी विहरतो हरति स्म हरेर्मनः॥

१. विषम वृत्तका उदाहरण—
नलिनेक्षणं शशिमुखं च रुचिरदशनं घनच्छविम्। चारुचरणकमलं कमलाञ्चितमाव्रज व्रजमहन्द्रनन्दनम्॥
(—इस 'उद्गता' नामक छन्दमें चारों चरणोंके भिन्न-भिन्न लक्षण हैं। इसके प्रथम पादमें स, ज, स, ल; २ में न, स, ज, ग; ३ में भ, न, ज, ल, ग और ४ में स, ज, स, ज, ग होते हैं।)

२. छब्बीस अक्षरोंसे अधिकका एक-एक चरण होनेपर जो छन्द बनता है उसे, 'दण्डक' कहते हैं। सत्ताईस अक्षरोंके दण्डकका नाम 'चण्डवृष्टिप्रपात' है। इसमें दो 'नगण' और सात 'रगण' होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।

उदाहरण—
इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी
त्रिदशविजयिवीर्यदृप्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते।
जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदास्पर्शपूताश्रमे
भुवननमितपादपद्माभिधानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥

३.आचार्य पिङ्गलके मतमें पिङ्गल सूत्रोंमें जिनके नामका उल्लेख नहीं हुआ है, ऐसे छन्दोंकी 'गाथा' संज्ञा है। यहाँ मूलमें तीन पाद या छः पादके छन्दोंको 'गाथा' कहा गया है। अतः उसके किसी विशेष लक्षण या उदाहरणका उल्लेख नहीं किया गया।

४. (१) जिसके प्रत्येक चरणमें एक-एक अक्षर हो, उस छन्दका नाम 'उक्ता' है। इसके दो भेद होते हैं। पहला गुरु अक्षरोंसे बनता है, दूसरा लघु अक्षरोंसे। गुरु अक्षरोंसे जो छन्द बनता है, उसका नाम पिङ्गलाचार्यने 'श्री' रखा है। उदाहरण— 'विष्णुं वन्दे।' लघु अक्षरोंवाले उक्ता छन्दका उदाहरण 'हरिरिह' समझना चाहिये।

(२) जिसके प्रत्येक चरणमें दो-दो अक्षरोंकी संयोजना हो, वह 'अत्युक्ता' नामक छन्द है। प्रस्तारसे इसके चार भेद हो सकते हैं। यहाँ विस्तार-भयसे केवल एक प्रथम भेद 'स्त्री' का उदाहरण दिया जाता है। दो गुरु अक्षरोंवाले चार पदोंसे जो छन्द बनता है, उसको 'स्त्री' कहते हैं।

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३९७

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९७


उदाहरण— $SS 'अन्यस्त्रीभिः सङ्गस्त्याज्यः।'

(३) तीन-तीन अक्षरोंके चार पादोंसे ‘मध्या’ नामक छन्द बनता है। प्रस्तारसे उसके भेदोंकी संख्या आठ होती है। इसके प्रथम भेदका, जिसमें तीनों अक्षर गुरु होते हैं, आचार्य पिङ्गलने 'नारी' नाम नियत किया है। उदाहरण— SSS १-'सर्वासां नारीणाम्। भर्ता स्यादाराध्यः॥' S ।S २-'प्राणतः प्रेयसी। राधिका श्रीपतेः॥' यह दूसरा उदाहरण मध्याका तृतीय भेद है। इसे 'मृगी' छन्द कहते हैं। इसके प्रत्येक चरणमें एक-एक रगण होता है। (४) चार-चार अक्षरोंके चार पादवाले छन्द-समूहका नाम 'प्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके सोलह भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम 'कन्या' है। उदाहरण पढ़िये— S S S S भास्वत्कन्या सैका धन्या। यस्याः कूले कृष्णोऽखेलत् ॥ (५) पाँच-पाँच अक्षरके चार पादवाले छन्दसमुदायका नाम 'सुप्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके बत्तीस भेद होते हैं। इनमें सातवाँ भेद 'पंक्ति' है, उसे यहाँ बतलाया जाता है। भगण तथा दो गुरु अक्षरोंसे पंक्ति छन्दकी सिद्धि होती है। उदाहरण— S । । S S कृष्णसनाथा तूर्णकंपक्तिः। यामुनकच्छे चारु चचार ॥ (६) जिसके चारों चरणोंमें छः-छः अक्षर हों, उस छन्द-समूहका नाम गायत्री है। प्रस्तारसे इसके चौंसठ भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम विद्युल्लेखा, तेरहवें भेदका नाम तनुमध्या, सोलहवेंका नाम शशिवदना तथा उन्तीसवेंका नाम वसुमती है। यहाँ केवल इन्हीं चरणोंका उल्लेख किया जाता है। दो मगण (S S S S S S) होनेसे विद्युल्लेखा, एक तगण (SS।) और एक यगण (। S S) होनेसे तनुमध्या, एक नगण (।।।) और एक यगण (। S S) होनेसे शशिवदना तथा एक तगण (S S ।) और एक सगण (।।S) होनेसे वसुमती नामक छन्द बनता है। उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं— 'विद्युल्लेखा'— SSSSSS गोगोपीगोपानां प्रेयांसं प्राणेशम्। विद्युल्लेखावस्त्रं वन्देऽहं गोविन्दम् ॥ 'तनुमध्या'— S S ।।SS प्रीत्या प्रतिवेलं नानाविधखेलम्। सेवे गततन्द्रं वृन्दावनचन्द्रम् ॥ 'शशिवदना'— ।।।।SS परममुदारं विपिनविहारम्। भज प्रतिपालं व्रजपतिबालम् ॥ 'वसुमती'— SS।।।S भक्तार्तिकदनं संसिद्धिसदनम्। नौमीन्दुवदनं गोविन्दमधुना ॥ (७) सात-सात अक्षरोंके चार पादवाले छन्दसमुदायको 'उष्णिक्' कहा गया है, प्रस्तारसे इसके एक सौ अट्ठाईस भेद होते हैं। इनमेंसे पचीसवाँ भेद 'मदलेखा' और तीसवाँ भेद 'कुमारललिता' के नामसे प्रसिद्ध है। मगण, सगण तथा एक गुरु—इन सात अक्षरोंसे 'मदलेखा' तथा जगण, सगण और एक गुरुसे 'कुमारललिता' छन्दकी सिद्धि होती है। प्रथमका उदाहरण यों है— SS S।।SS SSS।।SS$ रङ्गे बाहुविरुग्णाद् दन्तीन्द्रान्मदलेखा। लग्नाभून्मुरशत्रौ कस्तूरीरसचर्चा ॥

३९८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


(८) आठ अक्षरवाले चार पदोंसे जो छन्द बनते हैं, उनकी जातिवाचक संज्ञा 'अनुष्टुप्' है। प्रस्तारसे अनुष्टुप्के दो सौ छप्पन भेद होते हैं। इसके विद्युन्माला, माणवकाक्रीड, चित्रपदा, हंसरुत, प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी, समानिका, श्लोक तथा वितान आदि अनेक भेद-प्रभेद हैं। श्लोक-छन्दके प्रत्येक चरणमें छठा अक्षर गुरु और पाँचवाँ लघु होता है। प्रथम और तृतीय चरणोंमें सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है तथा द्वितीय तथा चतुर्थ चरणोंमें वह ह्रस्व हुआ करता है। शेष अक्षरोंका विशेष नियम न होनेसे इस श्लोक-छन्दके भी बहुत-से अवान्तर भेद हो जाते हैं। उपर्युक्त छन्दोंमें विद्युन्माला अनुष्टुप्का प्रथम भेद है; क्योंकि उसमें सभी अक्षर गुरु होते हैं। इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी छियासीवाँ भेद है। इसमें जगण, रगण १ लघु तथा १ गुरु होते हैं। प्रमाणिका और समानिकाके सिवा अनुष्टुप्के जितने भेद हैं, वे सब वितानके अन्तर्गत माने जाते हैं। यहाँ विद्युन्माला, नगस्वरूपिणी, श्लोक (अनुष्टुप्) तथा माणवकाक्रीडका एक-एक उदाहरण दिया जाता है—

'विद्युन्माला'— ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानोत्पन्नं निःसामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत् ॥

'नगस्वरूपिणी'— शिवताण्डवस्तोत्र 'नगस्वरूपिणी' छन्दमें ही लिखा गया है। उसके एक-एक पद्यमें दो-दो नगस्वरूपिणी छन्द आ गये हैं। कुछ लोग उस संयुक्तछन्दको 'पञ्चचामर' आदि नाम देते हैं। इसमें ज. र. ज. र. ज. और १ गुरु होते हैं। उदाहरण यह है— । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

'श्लोक' — यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

माणवकाक्रीडमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। जैसे— ऽ ।। ऽ ऽ ।। ऽ आदिगतं तुर्यगतं पञ्चमकं चान्त्यगतम्। स्याद् गुरु चेत् तत् कथितं माणवकाक्रीडमिदम्॥

(९) नौ-नौ अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'बृहती' है। प्रस्तारसे इसके पाँच सौ बारह भेद होते हैं। इसके 'हलमुखी' (१ रगण १ नगण १ सगण) तथा 'भुजङ्गशिशुभृता' (२ नगण १ भगण) भेद यहाँ बतलाये जाते हैं। इनमें एक तो २५१ वाँ भेद है और दूसरा ६४ वाँ। उदाहरण क्रमशः यों हैं— ऽ । ऽ ।। ।।। ऽ १—हस्तयोर्मधुरमुरलीं धारयन्नधरशयने। सन्निवेश्य रवममृतं संसृजञ्जयति स हरिः ॥ ।।।। ।। ऽऽऽ २—प्रणमत नयनारामं विकचकुवलयश्यामम्। अधहरयमुनानीरे भुजगशिरसि नृत्यन्तम्॥

(१०) दस अक्षरके पादवाले छन्द-समुदायको 'पङ्क्ति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके १०२४ भेद होते हैं। इसके शुद्धविराट्, पणव, रुक्मवती, मयूरसारिणी, मत्ता, मनोरमा, हंसी, उपस्थिता तथा चम्पकमाला आदि अनेक अवान्तर भेद हैं। शुद्धविराट् पङ्क्तिका ३४५ वाँ भेद है। यहाँ शुद्धविराट् (मगण, सगण, जगण, १ गुरु) तथा चम्पकमालाके उदाहरण दिये जाते हैं— ऽऽ ऽ ।। ऽ । ऽ । ऽ विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा। सर्वेषां प्रपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥

'चम्पकमाला' के प्रत्येक पादमें भगण, मगण, सगण और एक गुरु होते हैं तथा पाँच-पाँच अक्षरोंपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें इसके अन्तिम अक्षरको कम कर देनेसे 'मणिबन्ध' छन्द हो जाता है।

उदाहरण— ऽ । ऽ ऽऽ ।। ऽऽ सौम्य गुरु स्यादाद्यचतुर्थं पञ्चमषष्ठं चान्त्यमुपान्त्यम्। इन्द्रियबाणैर्यत्र विरामः सा कथनीया चम्पकमाला॥

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३९९

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९९

(११) ग्यारह-ग्यारह अक्षरके चार चरणोंसे जिस छन्दसमुदायकी सिद्धि होती है, उसका नाम त्रिष्टुप् है। प्रस्तारसे इसके २०४८ भेद होते हैं। त्रिष्टुप्के ही अनेक अवान्तर भेद इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी, रथोद्धता और स्वागता आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। ये त्रिष्टुप्के किस संख्यावाले भेद हैं? इसका ज्ञान मूलोक्त रीतिसे कर लेना चाहिये। यहाँ उक्त सात छन्दोंके लक्षण और उदाहरण क्रमशः प्रस्तुत किये जाते हैं; क्योंकि प्राचीन और अर्वाचीन ग्रन्थोंमें इनके प्रयोग अधिक मिलते हैं।

(१) ‘इन्द्रवज्रा छन्द’—(में २ तगण, १ जगण और २ गुरु होते हैं—) ऽऽ।ऽऽ ।।ऽ।ऽऽ निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

(२) ‘उपेन्द्रवज्रा’— (-में १ जगण, १ तगण, १ जगण और दो गुरु होते हैं।) इन्द्रवज्राके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर ह्रस्व हो जाय तो उपेन्द्रवज्रा-छन्द बन जाता है। ।ऽ। ऽऽ । ।ऽ ।ऽऽ त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

(३) इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा—दोनोंके मेलसे जो छन्द बनता है, उसका नाम 'उपजाति' है। उपजातिमें कोई चरण या पाद इन्द्रवज्राका होता है, तो कोई उपेन्द्रवज्राका। प्रस्तारवश उपजातिके चौदह भेद होते हैं। उन भेदोंके नाम इस प्रकार हैं—कीर्ति, वाणी, माला, शाला, हंसी, माया, जाया, बाला, आर्द्रा, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि तथा बुद्धि। इनका स्वरूप निम्नाङ्कित चक्रमें देखिये—

इ.इ.इ.इ.शुद्धाइन्द्रवज्रा
उ.इ.इ.इ.१ उपजातिकीर्ति
इ.उ.इ.इ.वाणी
उ.उ.इ.इ.माला
इ.इ.उ.इ.शाला
उ.इ.उ.इ.हंसी
इ.उ.उ.इ.माया
उ.उ.उ.इ.जाया
इ.इ.इ.उ.बाला
१०उ.इ.इ.उ.आर्द्रा
११इ.उ.इ.उ.१०भद्रा
१२उ.उ.इ.उ.११प्रेमा
१३इ.इ.उ.उ.१२रामा
१४उ.इ.उ.उ.१३ऋद्धिः
१५इ.उ.उ.उ.१४बुद्धिः
१६उ.उ.उ.उ.शुद्धाउपेन्द्रवज्रा

उदाहरण— ऽऽ ।ऽऽ ।।ऽ । ऽऽ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्। पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥

पूर्वोक्त चक्रके अनुसार यह 'उपजाति' का बुद्धि नामक भेद है। इसीको विपरीतपूर्वा और आख्यानकी भी कहते हैं। इसमें पहला चरण इन्द्रवज्राका और शेष तीन चरण उपेन्द्रवज्राके हैं। जहाँ आदिसे तीन इन्द्रवज्राके और शेष (चौथा) उपेन्द्रवज्राका चरण हो, वहाँ 'बाला' नामक उपजाति होती है।

यथा— ऽऽ ।ऽऽ ।।ऽ।ऽ ऽ वन्द्यः स पुंसां त्रिदशाभिनन्द्यः कारुण्यपुण्योपचयक्रियाभिः। संसारसारत्वमुपैति यस्य परोपकाराभरणं शरीरम्॥

(४) 'दोधकवृत्त' (-में तीन भगण और दो गुरु होते हैं—) ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ दोधकमर्थविरोधकमग्र्यं स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्। स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुञ्चति यो नृपतिः सः सुखी स्यात्॥

‘शालिनी’— (-में मगण, तगण, तगण और दो गुरु होते हैं—) उदाहरण— ऽऽ ऽऽऽ ऽ।ऽऽ।ऽऽ रूपं यत्तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्मज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम्।

४०० * संक्षिप्त नारदपुराण *


सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपः ॥
'रथोद्धता'—(-में रगण, नगण, रगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
ऽ।ऽ। ।।ऽ ।ऽ ।ऽ
रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ॥
'स्वागता'—(-में रगण, नगण, भगण, दो गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
ऽ।ऽ ।।।ऽ।।ऽ ऽ
कुन्ददामकृतकौतुकवेषो गोपगोधनवृत्तो यमुनायाम्।
नन्दसूनुरनघे तव वत्सो नर्मदः प्रणयिनां विजहार॥
इनके सिवा सुमुखी, वातोर्मी, श्रीभ्रमर-विलसित, वृन्ता, भद्रिका, श्येनिका, मौक्तिकमाला तथा उपस्थिता आदि और भी अनेक छन्द हैं। इनके लक्षण, उदाहरण अन्यत्र देखने चाहिये।

(१२) जिसके चारों चरण बारह-बारह अक्षरोंसे बनते हैं, उस छन्दसमुदायका नाम 'जगती' है। प्रस्तारसे इसके ४०९६ भेद होते हैं। इसके भेदोंमेंसे केवल वंशस्थ, इन्द्रवंशा, द्रुतविलम्बित, तोटक, भुजङ्गप्रयात, स्रग्विणी, प्रमिताक्षरा और वैश्वदेवी छन्दोंके ही लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं—
'वंशस्थ'—(-में जगण, तगण, जगण तथा रगण—ये चार गण होते हैं। पादके अन्तमें यति है।)
उदाहरण—
।ऽ।ऽऽ ।।ऽ।ऽ।ऽ
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
'इन्द्रवंशा'—(-में तगण, तगण, जगण तथा रगण प्रयुक्त होते हैं तथा पादान्तमें यति या विराम है। वंशस्थके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर गुरु कर दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा छन्द हो जाता है।)
उदाहरण—
ऽऽ।ऽ ऽ।।ऽ ।ऽ।ऽ
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम्।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥
वंशस्थ और इन्द्रवंशाके चरणोंके मेलसे भी चौदह प्रकारकी 'उपजाति' बनती है। पूर्वोक्त चक्रमें 'उ' के स्थानमें 'वं' लिख दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा तथा वंशस्थकी उपजातिका प्रस्तार-चक्र हो जायगा। इन चौदह उपजातियोंके नाम इस प्रकार हैं—
१- वैरासिकी, २- रताख्यानकी, ३- इन्दुमा, ४- पुष्टिदा, ५- उपमेया अथवा रमणीयक, ६- सौरभेयी, ७- शीलातुरा, ८- वासन्तिका, ९- मन्दहासा, १०- शिशिरा, ११- वैधात्री, १२- शङ्खचूडा, १३- रमणा तथा १४- कुमारी। इन सबके उदाहरण ग्रन्थान्तरोंमें उपलब्ध होते हैं। यहाँ प्रथम उपजातिका एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें प्रथम चरण वंशस्थका और शेष तीन चरण इन्द्रवंशाके हैं।
।ऽ।ऽऽ।।ऽ।ऽ।ऽ
किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥
'द्रुतविलम्बित' (-में नगण, भगण, भगण, रगण—ये चार गण होते हैं। पादान्तमें यति होती है।)
उदाहरण—
।।। ऽ।।ऽ।।ऽ ।ऽ
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०१

यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ 'तोटकवृत्त'— (में चार सगण होते हैं और पादान्तमें विराग हुआ करता है— )
उदाहरण—
।।ऽ ।।ऽ ।।ऽ ।।ऽ
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥
'भुजङ्गप्रयात'— (—में चार यगण और पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
।ऽ ऽ ।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ
अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां मनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः ।
तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्नः ॥
'स्रग्विणी'— (में चार रगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
ऽ।ऽ ऽ ।ऽऽ । ऽऽ ।ऽ
स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः ।
त्वामृतेऽधीश नाङ्गैरिमैखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ॥
'प्रमिताक्षरा—(—में सगण, जगण, सगण, सगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
।।ऽ ।ऽ ।।ऽ ।।ऽ
परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिषिञ्चती श्रवणयोरमृतम् ।
प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती कविभारती हरति मे हृदयम् ॥
'वैश्वदेवी'—(में २ मगण और २ यगण होते हैं तथा पाँचवें, सातवें अक्षरोंपर विराम होता है— )
उदाहरण—
ऽऽऽऽऽ ऽ ।ऽऽ ।ऽऽ
अर्चामन्येषां त्वं विहायामराणामद्वैतनेकं विष्णुमभ्यर्च भक्त्या ।
तत्राशेषात्मन्यर्चिते भाविनी ते भ्रातः सम्पन्नाऽऽराधना वैश्वदेवी ॥

उपर्युक्त छन्दोंके अतिरिक्त बृहतीके अन्य भेद पुट, जलोद्धतगति, नत, कुसुमविचित्रा, चञ्चलाक्षिका, कान्तोत्पीडा, वाहिनी, नवमालिनी, चन्द्रवर्त्म, प्रमुदितवदना, प्रियंवदा, मणिमाला, ललिता, मोहितोज्ज्वला, जलधरमाला, प्रभा, मालती तथा अभिनव तामरस आदिके भी लक्षण और उदाहरण ग्रन्थान्तरोंमें मिलते हैं ।

(१३) तेरह-तेरह अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्द-समूहका नाम 'अतिजगती' है। प्रस्तारसे इसके ८१९२ भेद होते हैं। अतिजगतीके भेदोंमें ही एक 'प्रहर्षिणी' नामक भेद है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु होते हैं। तीन तथा दस अक्षरोंपर यति होती है।
उदाहरण—
ऽऽऽ ।।।। ऽ ।ऽ ।ऽऽ
जागर्ति प्रसभविपाकसंविधात्री श्रीविष्णोर्ललितकपोलजा नदी चेत्।
संकीर्ण यदि भवितास्ति को विषादः संवादः सकलजगत्पितामहेन ॥
इसके सिवा क्षमा, अतिरुचिरा मत्तमयूर, गौरी, मञ्जुभाषिणी और चन्द्रिका आदि भेद भी ग्रन्थान्तरोंमें वर्णित हैं। उनके उदाहरण वहीं देखने चाहिये ।

(१४) चौदह-चौदह अक्षरोंके चार पादोंवाले छन्दसमुदायको 'शक्वरी' कहते है। प्रस्तारसे इसके १६३८४ भेद होते हैं। इसके भेदोंमें वसन्ततिलका नामक छन्द यहाँ बतलाया जाता है। इसमें तगण, भगण, २ जगण और २ गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है। वसन्ततिलकाको ही कुछ विद्वान् 'सिंहोन्नता' और 'उद्धर्षिणी' भी कहते हैं।

४०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


उदाहरण— S S । S । । । S । । S । S S या दोहनेऽवहनने मथनोपलेपप्रेङ्खेऽखनाभर्भुदितोक्षणमार्जनादौ। गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥

इसके सिवा असंबाधा, अपराजिता तथा प्रहरणकलिता आदि और भी अनेक भेद हैं। उनमेंसे प्रहरणकलिताका उदाहरण यहाँ दिया जाता है, प्रहरणकलितामें २ नगण, १ भगण, १ नगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है।

यथा— । । । । । । । S । । । । । । S सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणाम्। प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥

(१५) पंद्रह-पंद्रह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंका नाम ‘अतिशक्वरी’ है। प्रस्तारसे इसके ३२७६८ भेद होते हैं। इन भेदोंमें चन्द्रावर्ता और मालिनी—ये दो ही यहाँ बताये जाते हैं। ४ नगण और १ सगणसे ‘चन्द्रावर्ता’ छन्द बनता है। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम है। यदि छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’ होता है। इसी तरह आठ और सात अक्षरोंपर विराम होनेसे उसकी ‘मणिनिकर’ संज्ञा होती है। चन्द्रावर्ताका उदाहरण इस प्रकार है—

। । । । । । । । । । । । । । S पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् । विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विशति हरिरिह शरदि शुभसरः॥

‘मालिनी’—(—में २ नगण, १ मगण और २ भगण होते हैं। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम होता है—)

उदाहरण— । । । । । । S S S । S S । S S असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥

(१६) सोलह-सोलह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायका नाम ‘अष्टि’ है। प्रस्तारसे इसके भेदोंकी संख्या ६५५३६ होती है। इसके भेदोंमें दोके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। एकका नाम है ऋषभगजविलसित और दूसरेका नाम है वाणिनी। ऋषभगजविलसितमें भगण, रगण, तीन नगण तथा एक गुरु होते हैं। सात, नौ अक्षरोंपर विराम होता है।

S । । S । S । । । । । । । । S यो हरिरुच्चखान खरतरनखशिखरैर्दुर्जयदैत्यसिंहसुविकटहृदयतटम्। किं न्विह चित्रमेष यदखिलमपहत्वान् कंसनिदेशदृप्यदृषभगजविलसितम्॥

‘वाणिनी’— (में नगण, जगण, भगण, जगण, रगण तथा १ गुरु होते हैं—)

उदाहरण— । । । । S । S । । । S । S । S S स्फुरतु ममाननेऽद्य न नु वाणि नीतिरम्यं तव चरणप्रसादपरिपाकजः कवित्वम्। भवजलराशिपारकरणक्षमं मुकुन्दं सततमहं स्तवैः स्वरचितैः स्तवानि नित्यम्॥

(१७) सत्रह-सत्रह अक्षरोंके चार चरणोंवाले छन्दसमूहका नाम ‘अत्यष्टि’ है। प्रस्तारसे इसकी संख्या १३१०७२ होती है। इसके भेदोंमेंसे केवल हरिणी, पृथ्वी, वंशपत्रपतित, मन्दाक्रान्ता और शिखरिणीके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं।

‘हरिणी’ (के प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु होते हैं। ६, ४, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।)

उदाहरण— । । । । । S S S S S । S । । S । S न समरसनाः काले भोगाश्चलं धनयौवनं कुरुत सुकृतं यावन्नेयं तनुः प्रविशीर्यते॥ किमपि कलना कालस्येयं प्रभावति सत्वरा तरुणहरिणीसंत्रस्तेव प्लवप्रविसारिणी॥

‘पृथ्वी’ (के प्रत्येक पादमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। आठ-नौ अक्षरोंपर विराम होता है।)

उदाहरण— । S । । । S । S । । S । S S । S हताः समितिशत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतश्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः। त्वया कृतपरिग्रहे रघुपतेऽद्य सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता॥

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ४०३

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०३

'वंशपत्रपतित' (में भगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। दस-सात अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ऽ। ।ऽ। ऽ। ।।ऽ ।। ।।।।ऽ अद्य कुरुष्व कर्म सुकृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव॥ 'मन्दाक्रान्ता' (में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु होते हैं। ४, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। (इसके प्रत्येक चरणके अन्तिम सात अक्षर कम कर देनेपर 'हंसी' छन्द बन जाता है।) उदाहरण— ऽऽऽऽ ।।।।।ऽ ऽ।ऽ ऽ।ऽऽ बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥ 'शिखरिणी' (-में यगण, मगण, सगण, नगण, भगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं तथा ६, ११ अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ।ऽऽ ऽऽ ऽ ।।।।।ऽ ऽ।।।ऽ महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः। अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ (१८) अठारह-अठारह अक्षरोंके चार चरणोंसे बननेवाले छन्द-समूहकी संज्ञा 'धृति' कही गयी है। प्रस्तारसे इसके २६२१४४ भेद होते हैं। उनमेंसे एक ही भेद 'कुसुमितलतावेल्लिता' नामक छन्दका लक्षण और उदाहरण दिया जाता है। इसमें मगण, तगण, नगण और तीन भगण होते हैं। ५, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽऽऽ ।।।।। ऽऽ। ऽऽ। ऽऽ धन्यानामेताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजत्परभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझङ्कारम्या ग्रामान्तःस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयान्ति॥ (१९) उन्नीस-उन्नीस अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायको 'विधृति' या 'अतिधृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके ५२४२८८ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'शार्दूलविक्रीडित' नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण और एक गुरु होते हैं तथा बारह और सात अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽ ।।ऽ ।ऽ ।।। ऽ ऽऽ। ऽऽ । ऽ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥ (२०) बीस-बीस अक्षरोंके चार पादोंसे निष्पन्न होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'कृति' है। प्रस्तारसे इसके १०४८५७६ भेद होते हैं। उनमेंसे २के लक्षण और उदाहरण यहाँ बतलाये जाते हैं। पहलेका सुवदना और दूसरेका नाम 'वृत्त' है। सुवदनामें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। ७, ७, ६ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ ऽऽऽ ।ऽऽ ।। ।।।। ऽऽऽ ।। ।ऽ या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगकालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजियिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने प्रत्यक्षं पार्वती मे भवतु भगवती स्नेहात्सुवदना॥ 'वृत्त' (में एक गुरु, एक लघुके क्रमसे २० अक्षर होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।) उदाहरण— ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । ऽ। ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ ।ऽ । जन्तुमात्रदुःखकारि कर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनां हिताय॥ (२१) इक्कीस-इक्कीस अक्षरोंके चार पादोंमें पूर्ण होनेवाले छन्दोंकी जातिवाचक संज्ञा 'प्रकृति' है। प्रस्तारसे इसके २०९७१५२ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'स्रग्धरा' के नामसे प्रसिद्ध है। इसमें मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगण

४०४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽऽऽ ऽ। ऽऽ ।।। ।। ।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्खलन्ती। क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥ (२२) बाईस-बाईस अक्षरोंके चार पादोंसे परिपूर्ण होनेवाले छन्दोंका नाम 'आकृति' है। प्रस्तारसे इसकी भेद-संख्या ४१९४३०४ होती है। इसके एक भेद **'भद्रक'**का उदाहरण यहाँ दिया जाता है। भद्रकके प्रत्येक पादमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण, एक गुरु होते हैं। दस, बारह अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ।। ऽ।ऽ ।।। ऽ ।ऽ। ।। ऽ ।ऽ ।।। ऽ भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभावनम्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः। ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुरावलीपरिवृताः॥ (२३) तेईस-तेईस अक्षरोंके चार-चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमुदायको 'विकृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके ८३८८६०८ भेद होते हैं। इनमें 'अश्वललित' और 'मत्ताक्रीडा' नामक दो छन्दोंके उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, १ लघु १ गुरु होनेसे 'अश्वललित' छन्द होता है। उदाहरण— ।।। ।ऽ ।ऽ ।। ऽ ।ऽ ।।। ऽ।ऽ ।।ऽ पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावनितया वशीकृतमिदम्। सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपान्न्रपशुः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम्॥ 'मत्ताक्रीडा' (में २ मगण, १ तगण, ४ नगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। आठ और पंद्रह अक्षरोंपर विराम होता है।) उदाहरण— ऽऽ ऽऽ ऽऽऽऽ ।।।।।।।।।।।।।ऽ वन्दे देवं श्रीगोविन्दं प्रणयपरवशमतिकरुणहृदयं मात्रा बद्धं दाम्ना साम्ना स्तुतमपि सुतमिव निजमिह सभयम्। हन्तुं याऽऽगात्तस्यै मातृव्यतरदतुलनिजगतिमतिविमलां गां गोपीर्गोपान् योऽगोपायदिह विधृतगिरिरुपचितघनतः॥ (२४) चौबीस-चौबीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते हैं, उनका नाम 'संस्कृति' है। प्रस्तारसे इसके १६७७७२१६ भेद होते हैं। इनमें 'तन्वी' नामक छन्दका उदाहरण दिया जाता है। उसमें भगण, तगण, नगण, सगण, २ भगण, नगण, यगण होते हैं। ५, ७, १२ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ। ।ऽऽ ।।।।। ऽ ऽ।।ऽ। ।।। ।। ऽऽ नाथ तवाहं तव पदकमलं सेवितुमेव मनसि मम कामो नाम सुधासोदरमतिमधुरं मे रसना रसयतु नितरां वै। प्रेमिजना ये प्रभुगुणरसिकास्तेषु सदैव भवतु मम वासो देव दयां दर्शय वस हृदये त्वां न विनेह जगति मम बन्धुः॥ (२५) पच्चीस-पच्चीस अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्दोंको 'अतिकृति' या 'अभिकृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इनके ३३५५४४३२ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेदका नाम 'क्रौञ्चपदा' है। उसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण, ४ नगण तथा १ गुरु होते हैं। ५, ५, ८, ७ अक्षरोंपर विराम होता है। उदाहरण— ऽ।। ऽऽ ऽ।। ऽऽ ।। ।।।।।।।।।।।ऽ माधव भक्तिं देह्यविभक्तिं तव चरणयुगलशरणमुपगतः संहर पापं दर्शिततापं निजगुणगणरतिमुपनय नितराम्। मोहन रूपं रम्यमनूपं प्रकटय शमय विषयविषमनिशं वादय वंशीं मानसदंशी तिमिरिनिभहृदयविहितवरवडिशाम्॥ (२६) छब्बीस-छब्बीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते हैं, उनकी जातिवाचक संज्ञा 'उत्कृति' है। प्रस्तारसे इसके ६७१०८८६४ भेद होते हैं। इनमेंसे दो भेद बताये जाते हैं। एकका नाम 'भुजङ्गविजृम्भित' और दूसरेका 'अपवाह' है। 'भुजङ्गविजृम्भित'— (में २ मगण, १ तगण, ३ नगण, १ रगण, १ सगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। ८, १९, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।)

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद *४०५

संज्ञाएँ हैं, प्रस्तारसे^१ इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षरवाले पादमें प्रथम गुरुके नीचे लघु लिखना चाहिये, फिर दाहिनी ओरकी पङ्क्तिको ऊपरकी पङ्क्तिके समान भर दे। तात्पर्य यह कि शेष स्थानोंमें ऊपरके अनुसार गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रियाको बराबर करता जाय। इसे करते हुए ऊनस्थान अर्थात् बायीं ओरके शेष स्थानमें गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक कि सभी लघु अक्षरोंकी प्राप्ति न हो जाय। इसे 'प्रस्तार' कहा गया है^२॥१४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जानेपर यदि उसके किसी भेदका स्वरूप जानना हो तो उसे जाननेकी विधिको 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं।) यदि नष्ट अङ्क सम है | तो उसके लिये एक लघु लिखे और उसका आधा भी यदि सम हो तो उसके लिये पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अङ्क विषम हो तो उसके लिये एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़कर आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिये भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक अभीष्ट अक्षरोंका पाद प्राप्त न हो जाय^३। (प्रस्तारके किसी भेदका स्वरूप तो ज्ञात हो; किंतु संख्या ज्ञात न हो तो उसके जाननेकी विधिको 'उद्दिष्ट' कहते हैं।) उद्दिष्टमें गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें पहले अक्षरपर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरोंपर दूने अङ्क लिखता जाय; फिर लघुके ऊपर जो अङ्क हों,


उदाहरण—
ऽऽऽऽऽऽऽऽ ।।।।।।।।।ऽ ऽऽ ।। ऽ ।ऽ
हेलोदञ्चन्यञ्चत्पादप्रकटविकटनटनभरो रणत्करतालकः चारुप्रेङ्खच्चूडाबर्हः श्रुतितरलनवकिसलयस्तरङ्गितहारधृत्।
त्रस्यत्रागस्त्रीभिर्भक्त्या मुकुलितकरकमलयुगं कृतस्तुतिरच्युतः पायाद्वश्चिन्दन् कालिन्दीह्रदकृतनिजवसतिबृहद् भुजङ्गविजृम्भितम्॥
'अपवाह' (-के प्रत्येक पादमें १ मगण, ६ नगण, १ सगण, २ गुरु होते हैं। ९, ६, ६, ५ अक्षरोंपर विराम होता है।)

उदाहरण—
ऽऽऽ ।।।।।।।।।।।।।।।।ऽ ऽऽ
श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणसकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम्।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम्॥

१. छन्दःशास्त्रमें छः प्रत्यय होते हैं—१- प्रस्तार, २- नष्ट, ३- उद्दिष्ट, ४- एकद्व्यादिलगक्रिया, ५- संख्यान और छठा अध्वयोग। प्रस्तारका अर्थ फैलाव; अमुक संख्यायुक्त अक्षरोंसे बने हुए पादवाले छन्दके कितने और कौन-कौनसे भेद हो सकते हैं? इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्रस्तार है। नष्ट आदिका स्वरूप आगे बतायेंगे।
२. उदाहरणके लिये चार अक्षरके पादवाले छन्दका मूलोक्त रीतिसे प्रस्तार अङ्कित किया जाता है—

१—ऽऽऽऽ९—ऽऽऽ।
२—।ऽऽऽ१०—।ऽऽ।
३—ऽ।ऽऽ११—ऽ।ऽ।
४—।।ऽऽ१२—।।ऽ।
५—ऽऽ।ऽ१३—ऽऽ।।
६—।ऽ।ऽ१४—।ऽ।।
७—ऽ।।ऽ१५—ऽ।।।
८—।।।ऽ१६—।।।।

३. जैसे किसीके द्वारा पूछा जाय कि चार अक्षरके पादवाले छन्दका छठा भेद क्या है? तो इसमें छठा अङ्क सम हैं; अतः उसके लिये प्रथम एक लघु होगा (।), फिर छः का आधा करनेपर तीन विषम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। अब तीनमें एक जोड़कर आधा किया तो दो सम अङ्क हुआ, अतः उसके लिये फिर एक लघु (।) लिखा। उस दोका आधा किया तो एक विषम अङ्क हुआ; अतः उसके लिये एक गुरु (ऽ) लिखा। सब मिलकर (।ऽ ।ऽ) ऐसा हुआ। अतः चार अक्षरवाले छन्दके छठे भेदमें प्रत्येक पादमें प्रथम अक्षर लघु, दूसरा गुरु, तीसरा लघु और चौथा गुरु होगा।