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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

मन्त्रिसमुद्देशः ७३ इतिहास में प्रसिद्ध है कि चाणक्य ने तीक्ष्ण दूत के प्रयोग से अकेले नन्द को मार डाला था। शत्रु के द्वारा प्रेषित वस्तु लेने के विषय में विचार— शत्रुप्रहितं शासनमुपायनं च स्वैरपरीक्षितं नोपाददीत ॥ १५ ॥ शत्रु के द्वारा प्रेषित आज्ञापत्र और भेंट उपहार आदि को बिना अपने वैद्य आदि से परीक्षित कराये हुए ग्रहण न करे। दृष्टान्त— श्रूयते हि स्पर्शविषवासिताद्भुतवस्त्रोपायनेन करहाटपतिः कैटभो वसुनामानं राजानमाशीविष-विषोपेतरत्नकरण्डकप्राभृतेन च करवालः करालं जघानेति ॥ १६ ॥ सुना जाता है कि स्पर्श-विष से वासित अद्भुत वस्त्र की भेंट देकर करहाट देश के राजा कैटभ ने वसु नामक राजा को तथा सर्प विष से संयुक्त रत्न की पिटारी का उपहार देकर करवाल नामक राजा ने कराल नामक राजा को मार डाला था। दूत की अवध्यता— महत्यपकारेऽपि न दूतमुपहन्‍यात् ॥ १७ ॥ बहुत बड़ा अपकार करने पर भी दूत का वध न करे। उद्धृतेष्वपि शस्त्रेषु दूतमुखा वै राजानः ॥ १८ ॥ शस्त्र उठ जाने पर भी अर्थात् लड़ाई छिड़ जाने पर भी राजाओं की परस्पर वार्ता दूतों के द्वारा ही होती है। तेषामन्त्यावसायिनोऽप्यवध्याः किमङ्ग पुनर्ब्राह्मणः ॥ १९ ॥ दूत नीच जाति का हो तब भी अवध्य है फिर ब्राह्मण के विषय में तो कहना ही क्या है? वध्याभावाद् दूताः सर्वं जल्पन्ति ॥ २० ॥ वध्य न होने के कारण दूत कहने न कहने योग्य सभी बातों को कहता है। कः सुधीर्दूतवचनात् परोत्कर्षं स्वात्मापकर्षं च मन्येत ॥ २१ ॥ कौन बुद्धिमान् दूत के कहने मात्र से शत्रु की उत्कृष्टता और अपनी हीनता मानता है? शत्रु दूत का परीक्षण— तदाशयरहस्यपरिज्ञानार्थं परदूतः स्त्रीभिरुभयवेतनैः तद्गुणाचार- शीलानुवर्तिभिर्वा प्रणिधातव्यः ॥ २२ ॥ शत्रु के आशय और गुप्त भेदों को जानने के लिये शत्रु के दूत को स्त्रियों

७४ नीतिवाक्यामृतम् के द्वारा, दोनों ओर से वेतन पाने वाले दूतों के द्वारा अथवा उसके शील और आचार आदि का आचरण करने वालों के द्वारा अपने वश में करे । शत्रु के लिये पत्र भेजने का प्रकार— चत्वारि वेष्टनानि खड्गमुद्रा च प्रतिपक्षलेखानाम् ॥ २३ ॥ शत्रु के लिये लेखों-पत्र आदि को चार वेष्टनों में लपेटे और ऊपर से अपने तलवार की मुद्रा लगा दे । [ इति दूत समुद्देशः ] १४. चारसमुद्देशः गुप्तचरों का महत्त्व— स्वपरमण्डलकार्याकार्यावलोकने चाराश्चक्षूंषि क्षितिपतीनाम् ॥ १ ॥ अपने और शत्रु के मण्डल ( जिले ) का भला और बुरा काम देखने के लिये राजाओं के गुप्तचर ही उनके नेत्र हैं । गुप्तचर के गुण— अलौल्यममान्द्यममृषाभाषित्त्वमभ्यूहकत्वं चेति चारगुणाः ॥ २ ॥ चाञ्चल्य न होना, आलस्य न होना, झूठ न बोलना और शत्रु के मर्मज्ञान की क्षमता का होना, ये गुप्तचर के गुण हैं । गुप्तचर सम्बन्धी अन्य विचार— तुष्टिदानमेव चाराणां वेतनम् ॥ ३ ॥ सन्तुष्टि पर्यन्त पुरस्कार देना ही गुप्तचरों का वेतन है । तेहि तल्लोभात् स्वामिकार्येष्वतीव त्वरन्ते ॥ ४ ॥ पुरस्कार के लोभ से वे स्वामी के कार्य को अधिक शीघ्रता के साथ करते हैं । सन्दिग्धविषये त्रयाणामेकवाक्ये संप्रत्ययः ॥ ५ ॥ एक गुप्तचर की बातों से जब किसी विषय में सन्देह होता हो तो तीन गुप्तचरों के ऐकमत्य से निश्चय करना चाहिए । अनवसर्पो हि राजा स्वैः परैश्चातिसंधीयते ॥ ६ ॥ गुप्तचरहीन राजा अपने आदमियों से और शत्रुओं के द्वारा वञ्चित होता हैं । किमस्त्ययामिकस्य निशि कुशलम् ॥ ७ ॥ जिसके पास रात को पहरा देने वाला आदमी नहीं है क्या उसकी रात

चारसमुद्देशः ७५ 'में कुशल है ? अर्थात् धनी के पास रात का पहरेदार न हो और राजा के पास गुप्तचर न हो तो दोनों की कुशल नहीं है। गुप्तचरों के भेद और उनके पृथक् पृथक् लक्षण— कार्पटिकोदास्थितिक·गृहपतिक·वैदेहक·तापस·कितव·किरात·यमपट्टि- काहितुण्डिक·शौण्डिक·शौभिक·पाटच्चर·विट·विदूषक·पीठमर्दक·नट·नर्तक- गायक·वादक·वाग्जीवक·गणक·शाकुनिक·भिषगैन्द्रजालिक·नैमित्तिक·सूदा- रालिक·संवाहिक·तीक्ष्ण·क्रूर·रसद्·जड·मूक·बधिरान्धच्छद्मनावस्थायियायि- भेदेनावसर्पवर्गः ॥ ८ ॥ कार्पटिक (छात्रवेष में गुप्तचर) उदास्थित (अध्यापक वेष में गुप्तचर) पटवारी, महाजन, तपस्वी, जुआ खेलने वाला, किरात, घर-घर घूमकर यमलोक यातना आदि के चित्र दिखाने वाला; मदारी, कलवार, बहुरूपिया, चोर अथवा बन्दी का वेष रखनेवाला, व्यसनी पुरुषों का संदेशादि वाहक, विदूषक, कामशास्त्री, नट, नर्तक, गायक, वादक, कथावाचक, ज्योतिषी, सगुनिया, वैद्य, जादूगर, नैमित्तिक, रसोईदार, विचित्र-विचित्र भोजन बनाने वाला, मालिश करने वाला, तीखे, रूखे, आलसी, जड़, गूंगे, बहिरे अन्धे आदि के कपट वेष में स्थायी और चर भेद से उक्त प्रकार के गुप्तचर होते हैं। परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः कार्पटिकः ॥ ९ ॥ शत्रु के गूढ रहस्य को जाननेवाला धृष्ट छात्र 'कार्पटिक' है। यं कंचन समयमास्थाय प्रतिपन्नाचार्याभिषेकः प्रभूतान्तेवासी प्रज्ञातिशययुक्तो राजपरिकल्पितवृत्तिरुदास्थितः ॥ १० ॥ इच्छानुसार किसी भी सम्प्रदाय का आश्रय लेकर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होकर बहुत से शिष्यों को पढ़ाने वाला तथा तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न और राजा के द्वारा निश्चित जीविकावाला व्यक्ति 'उदास्थित' है। गृहपतिवैदेहिकौ ग्रामकूटश्रेष्ठिनौ ॥ ११ ॥ गांव के मुखिया (पटवारी) और सूद पर रुपया बाँटने वाले गांव के महाजन 'गृहपति' और 'वैदेहिक' हैं। बाह्यव्रतविद्याभ्यां लोकदंभहेतुस्तापसः ॥ १२ ॥ दिखावटी व्रत और विद्या के नाम पर लोगों को ठगनेवाला 'तापस' संज्ञक गुप्तचर है। कितवो द्यूतकारः ॥ १३ ॥ जुआ खेलाने वाले का नाम कितव है। अल्पाखिलशरीरावयवः किरातः ॥ १४ ॥

७६ नीतिवाक्यामृतम् जिसके समस्त शरीर के अङ्ग छोटे हों वह 'किरात' है। यमपट्टिको गलत्रोटिकः ॥ १५ ॥ गले में डोरा बाँधकर उसमें नरक के दृश्यों का चित्र पट लटकाए हुए घर-घर घूमने वाले का नाम 'यमपट्टिक' है। आहितुण्डिकः सर्पक्रीडाप्रसरः ॥ १६ ॥ सांप का खेल दिखानेवाला मदारी 'आहितुण्डिक' है। शौण्डिकः कल्पपालः ॥ १७ ॥ शराब बेचने वाला शौण्डिक है। शौभिकः क्षपायां काण्डपटावरणेन नानारूपदर्शी ॥ १८ ॥ रात्रि के समय पर्दा डालकर अनेक प्रकार का रूप प्रदर्शित करनेवाला 'शौभिक' (बहुरूपिया) है। पाटच्चरश्चौरो बन्दीकारो वा ॥ १९ ॥ चोर अथवा वन्दी के वेष में वर्त्तमान गुप्तचर 'पाटच्चर' है। व्यसनिनां प्रेषणाजीवी विटः ॥ २० ॥ वेश्यादि के व्यसनी पुरुषों को वेश्याओं आदि के यहां पहुँचा कर जीविकोपार्जन करने वाले को 'विट कहते है। सर्वेषां प्रहसनपात्रं विदूषकः ॥ २१ ॥ सबको हंसी का पात्र 'विदूषक' है। कामशास्त्राचार्यः पीठमर्दकः ॥ २२ ॥ कामशास्त्र के आचार्य की 'पीठमर्दक' संज्ञा है। गीताङ्गपटावरणेन नृत्यवृत्त्याजीवी नर्त्तको नाटिकाभिनयरङ्ग- नर्तको वा ॥ २३ ॥ सङ्गीत में सहायक वस्त्रों से सुसज्जित होकर नृत्य कला द्वारा अपनी जीविका चलाने वाला अथवा नाटक नाटिका के अभिनय में रङ्गभूमि में नृत्य करने वाला 'नर्त्तक' है। रूपाजीवानृत्युपदेष्टा गायकः ॥ २४ ॥ वेश्याओं को उनकी जीविका का साधनभूत नृत्यगान का उपदेश देने वाला 'गायक' है। गीतप्रबन्धगतिविशेषवादकचतुर्विधातोद्यप्रचारकुशलो वादकः ॥ २५ ॥ गीत की रचना के अनुसार विशेष ताल लय के साथ सितार, मृदङ्ग, बांसुरी, मजीरा आदि चार प्रकार के वाद्य में कुशल व्यक्ति 'वादक' है। वाग्जीवी वैतालिकः सूतो वा ॥ २६ ॥ कविता कथा आदि के द्वारा अपनी वाणी के बल पर जीविकानिर्वा

चारसमुद्देशः ७७ करने वाला वैतालिक-चारण भाट, बन्दी आदि और सूत-कथा वाचक ये 'वाग्जीवो' हैं। गणकः संख्याविद् दैवज्ञो वा ॥ २७ ॥ गणित का पण्डित अथवा ज्योतिषी 'गणक' है। शाकुनिकः शकुनवक्ता ॥ २८ ॥ तरह-तरह के भले-बुरे सगुन बताने वालों का नाम शाकुनिक है। भिषगायुर्वेदविद्वैद्यः शल्यकर्मविच्च ॥ २९ ॥ आयुर्वेद जानने वाला वैद्य और शस्त्र कर्म अर्थात् चीड़-फाड़ जानने वाला भिषक् है। ऐन्द्रजालिकस्तन्त्रयुक्त्या मनोविस्मयकरो मायावी वा ॥ ३० ॥ तन्त्रशास्त्रों की युक्तियों द्वारा मन को चकित कर देने वाला मायावी 'ऐन्द्रजालिक' कहा जाता है। नैमित्तिको लक्ष्यवेधदैवज्ञो वा ॥ ३१ ॥ लक्ष्यवेध करने वाला अथवा, दैवज्ञ 'नैमित्तिक' है। महानसिकः सूदः ॥ ३२ ॥ रसोई बनाने वाला 'सूद' है। विचित्रभक्ष्यप्रणेता अरालिकः ॥ ३३ ॥ विभिन्न प्रकार के भोजन बनाने वाले को आरालिक कहते हैं। अङ्गमर्दनकलाकुशलो भारवाहको वा संवाहकः ॥ ३४ ॥ अङ्गमर्दन की कला में कुशल अथवा बोझा ढोने वाले कुली की 'संवा- हक' संज्ञा है। द्रव्यहेतोः कृच्छ्रेण कर्मणा यः स्वजीवितविक्रयी स तीक्ष्णोऽसह्यो वा ॥ ३५ ॥ पैसे के लिये अत्यन्त कठोर कर्म शेर बाघ आदि से लड़ना आदि के द्वारा जो अपने प्राणों तक की बाजी लगा दे उसको 'तीक्ष्ण' अथवा 'असह्य' कहते हैं। बन्धुषु निःस्नेहाः क्रूराः ॥ ३६ ॥ बन्धु-बान्धवों के प्रति स्नेह रहित व्यक्ति को 'क्रूर' कहते हैं। अलसाश्च रसदाः ॥ ३७ ॥ आलसी आदमियों की 'रसद' संज्ञा है। [ इति चारसमुद्देशः ]

७८ नीतिवाक्यामृतम् १६. विचारसमुद्देशः यहां १ से १० सूत्रों तक विचार की महत्ता और उसके स्वरूप का चिंतन किया गया है— नाविचार्य कार्यं किमपि कुर्यात् ॥ १ ॥ बिना विचार के कोई भी कार्य न करे। प्रत्यक्षानुमानागमैर्यथावस्थितवस्तुव्यवस्थापनहेतुर्विचारः ॥ २ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाण के द्वारा जो वस्तु जैसी है उसे इसी रूप में निश्चित करने के कारण का नाम विचार है। स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् ॥ ३ ॥ अपनी आंखों देखा दृश्य प्रत्यक्ष कहा जाता है। न ज्ञानमात्रात् प्रेक्षावतां प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा ॥ ४ ॥ किसी भी कार्य में विचारकों की प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति केवल ज्ञान से नहीं होती अर्थात् चिन्तनशील पुरुष किसी काम को तभी छोड़ते हैं या उसमें लगते हैं जब वे उसे प्रत्यक्ष अनुमान आदि से ठीक समझते हैं। स्वयं दृष्टेऽपि मतिर्विमुह्यति, संशेते विपर्यस्यति वा किं पुनर्न परोपदिष्टे ॥ ५ ॥ जब कि स्वयं देखे हुए भी पदार्थ में मनुष्य की बुद्धि मोह, संशय और भ्रम में पड़ जाती है तब क्या दूसरों के द्वारा बताई या कही गई वस्तु में उसे मोहादि नहीं होगा ? स खलु विचारज्ञो यः प्रत्यक्षेणोपलब्धमपि साधु परीक्ष्यानुतिष्ठति ॥६॥ विचारक वह है जो प्रत्यक्ष देखी वस्तु का भी सम्यक् परीक्षण करने के अनन्तर कार्य में प्रवृत्त होता है। अतिरभसात् कृतानि कार्याणि किं नामानर्थं न जनयन्ति ॥ ७ ॥ अत्यन्त शीघ्रता से किये गये कार्य कौन सा अनर्थ नहीं उत्पन्न करते ? अर्थात् बिना सोचे समझे किसी कार्य को जल्दबाजी में कर डालने से अनेक कठिनाइयां और उपद्रव सामने आते हैं। अविचार्याचरिते कर्मणि पश्चात् प्रतिविधानं गतोदके सेतुबन्धन- मिव ॥ ८ ॥ बिना विचारे किये गये काम में आई हुई आपत्तियों का बाद में प्रती- कार करना पानी बह जाने पर बांध बांधने के समान व्यर्थ है। कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमानम् ॥ ९ ॥ किये गये काम से बिना किये हुए काम को बुद्धि से समझ लेना अर्थात्

विचारसमुद्देशः ७६ किसी काम को थोड़ा सा करने के बाद उस पूरे काम की रूपरेखा को बुद्धि- बल से ज्ञान कर लेना निश्चय कर लेना अनुमान है । सम्भावितैकदेशो नियुक्तं विद्यात् ॥ १० ॥ किसी कार्य का एक अंश पूरा कर लेने पर पूर्ण कार्य का निश्चय कर ले । अर्थात् किसी व्यक्ति ने यदि किसी काम के प्रारंभिक अंश को सफलता के साथ कर लिया तो समझना चाहिए कि वह पूरा काम सफलता के साथ कर लेगा । होनहार राजकुमार के लक्षण— आकारः शौर्यं प्रज्ञा-सम्पत्तिरायतिर्विनयश्च राजपुत्राणां भाविनो राज्यस्य लिङ्गानि ॥ ११ ॥ शारीरिक सुन्दर आकार, शूरता, बुद्धिबल, प्रभाव, और विनय ये सब गुण राजकुमारों के भावी राज्य-शासन के चिह्न हैं । अर्थात् उक्त गुणों को देखकर यह अनुमान कर लिया जाता है या किया जा सकता है । प्राणियों के भविष्य की पहिचान— प्रकृतेर्विकृतिदर्शनं हि प्राणिनां भविष्यतोः शुभाशुभयोर्लिङ्गम् ॥१२॥ स्वभाव की विकृति ही प्राणियों के भावी शुभाशुभ का चिह्न हैं । अर्थात् किसी व्यक्ति के स्वभाव में जैसा कुछ भला-बुरा परिवर्तन समय-समय पर दिखाई पड़े वैसा ही उसका भविष्य जीवन समझे । एक कार्य में सफल व्यक्ति को अन्य कार्य में सफलता की संभावना— एकस्मिन् कर्मणि दृष्टबुद्धिपुरुषकारः कथं नाम न कर्मान्तरे समर्थः ॥१३॥ किसी एक काम में जो अपना बुद्धि और पौरुष प्रदर्शित कर चुका है वह दूसरे काम में क्यों नहीं समर्थ होगा ? आगम का लक्षण— आप्तपुरुषोपदेश आगमः ॥ १४ ॥ आप्त पुरुषों के उपदेश को आगम कहते हैं । आप्त का लक्षण— यथानुभूतामितश्रुतार्थाऽविसंवादिवचनः पुमानाप्तः ॥ १५ ॥ अनुभव, अनुमान और शास्त्रश्रुत अर्थ के अनुसार वचन बोलने वाला पुरुष आप्त है । युक्तिहीन वाक्य की व्यर्थता— सा वागुक्ताऽप्यनुक्तसमा, यत्र नास्ति सद्युक्तिः ॥ १६ ॥ जिसमें कोई अच्छी युक्ति न दी गई हो ऐसी बात कही हुई भी न कही जाने के समान है ।

८० नीतिवाक्यामृतम् व्यक्तित्व और वाणी का सम्बन्ध— वक्तृगुणगौरवाद् वचनगौरवम् ॥ १७ ॥ बोलनेवाले के गुणों की गुरुता के कारण उसकी वाणी का गौरव होता है। धन के उपयोग के विषय में— किं मितम्पचेषु धनेन चण्डालसरसि वा जलेन यत्र सतां नोप- भोगः ॥ १८ ॥ अपने ही भोजन भर को थोड़ा सा पकाने वाले अर्थात् कृपण पुरुष को धन होने से और चण्डाल के तालाब में जल होने से क्या लाभ है जब कि सामान्यरूप से सत् पुरुष उसका उपभोग नहीं कर सकते । जनता की गतानुगति— लोकस्तु गतानुगतिको यतोऽसौ सदुपदेशिनीमपि कुट्टिनीं धर्मेषु न तथा प्रमाणयति यथा गोघ्नमपि ब्राह्मणम् ॥ १९ ॥ संसार गतानुगतिक अर्थात् 'देखा-देखी' काम करने वाला है, जैसा एक करता है वैसा ही दूसरे भी करने लगते हैं। क्योंकि कुट्टिनी-वेश्या धर्म के सम्बन्ध में कैसा भी सदुपदेश क्यों न दे लोग उसे वैसा न मानेंगें जैसा गौ के भी हत्यारे ब्राह्मण के उपदेश को । [ इति विचारसमुद्देशः ] १६. व्यसन समुद्देश व्यसन और उसका भेद— व्यस्यति पुरुषं श्रेयसः इति व्यसनम् ॥ १ ॥ व्यक्ति को कल्याण मार्ग से विचलित अथवा भ्रष्ट करनेवाले कार्यों का नाम व्यसन है । व्यसनं द्विविधं सहजमाहार्यं च ॥ २ ॥ व्यसन दो प्रकार के हैं : १. सहज २. आहार्य अर्थात् एक स्वाभाविक, दूसरा दूसरों को द्यूत, मद्यपान आदि में प्रवृत्त देखकर स्वयं भी उसमें पड़ना । सहज व्यसन को दूर करने के उपाय— सहजं व्यसनं धर्मसंभूताभ्युदयहेतुभिरधर्मजनितमहाप्रत्यवायप्रति- पादनैरुपाख्यानैर्योगपुरुषैश्च प्रशमं नयेत् ॥ ३ ॥ मनुष्य को चाहिए कि वह अपने सहज व्यसनों को धर्ममूलक कल्याण- कारी साधनों और उपायों से और अधर्म से होने वाले महान् सङ्कटों को

व्यसनों से उसका मोह दूर कर सकें वे योग पुरुष हैं। Wait, in line 8: उन- Line 9: उन व्यसनों से उसका मोह दूर कर सकें वे योग पुरुष हैं।

आहार्य व्यसन को दूर करने के उपाय- शिष्ट-संसर्गदुर्जनासंसर्गाभ्यां पुरातनमहापुरुषचरितोत्थिताभिश्च कथाभिराहार्यं व्यसनं प्रतिबध्नीयात् ॥ ५ ॥ पुरुष अपने आहार्य व्यसनों को सत्पुरुषों की संगति करके और दुष्ट पुरुषों का संसर्ग त्यागकर तथा प्राचीन महापुरुषों के चरित्र से सम्बद्ध कथाओं से दूर करे ।

अठारह प्रकार के दुर्व्यसनों का क्रमशः उल्लेख और उनके दोष आदि का चर्चा- Wait, is it का चर्चा- or की चर्चा-? Line 17: का चर्चा— (Wait, looks like का चर्चा— with 'क' and 'ा' - yes, का चर्चा—).

स्त्रियमतिभजमाने भवत्यवश्यं तृतीया प्रकृतिः ॥ ६ ॥ स्त्री का अत्यधिक सेवन करने से मनुष्य अवश्य ही नपुंसक हो जाता है। सौम्यधातुक्षय

digit in line 3: In line 3, does the digit have a flat horizontal line with a downward tail? NO! It curves inward in the middle, and curves down at the bottom! WAIT! It DOES look like a ! Wait, but could it be १२ in a different font? No, this whole book is handset letterpress in the same font. Wait, why would line 3 be १३, line 9 be १३, and line 13 be १३? Wait, three 13s in a row?! Let me re-examine line 3 digit very carefully! Wait! Look at line 3: यश्च ॥ १२ ॥? Wait, look at the second digit: Top: rounded. Middle: goes left. Bottom: rounded? Wait! Look at line 21: ॥ १५ ॥. The has a vertical and curve. Line 25: ॥ १६ ॥. The has a curve to the left. Line 28: ॥ १७ ॥. The has a curve. Line 32: ॥ १८ ॥. The looks like . Line 18: ॥ १४ ॥. The looks like . Line 21: ॥ १५ ॥. The looks like .

व्यसनसमुद्देशः ८३ अतिव्ययोऽपात्रव्ययश्चार्थदूषणम् ॥ १६ ॥ अत्यन्त व्यय करना और अपात्र में बुरे कामों आदि में व्यय करना अर्थ दोष है । हर्षामर्षाभ्यामकारणं तृणांकुरमपि नोपहन्यात् किं पुनर्मनु- ष्यम् ॥ २० ॥ हर्ष और अमर्ष अर्थात् प्रसन्नता और क्रोध के भावावेश में आकर घास के अंकुर को भी न नष्ट करे फिर मनुष्य को नष्ट करने की तो बात ही क्या है ? श्रूयते हि निष्कारणं भूतावमानिनौ वातापिरिल्वलश्चासुरावगस्त्या- शनाद् विनेशतुरिति ॥ २१ ॥ यह सुना जाता है कि जीवों से अकारण द्वेष करने वाले वातापि और इल्वल नाम के दानव अगस्त्य ऋषि के द्वारा भक्षित होकर विनष्ट हो गये । यथादोषं कोटिरपि गृहीता न दुःखायते ॥ २२ ॥ दोष और अपराध के अनुसार करोड़ रूपया भी छीन लिया जाय तो दुःखदायक नहीं होता । अन्यायेन तृणशलाकापि गृहीता प्रजाः खेदयति ॥ २३ ॥ अन्यायपूर्वक यदि तिनका भी छीन लिया जाय तो उससे प्रजा दुःखी होती है । तरुच्छेदेन फलोपभोगः सकृदेव ॥ २४ ॥ पेड़ काट कर फलों का उपभोग एक ही बार तो किया जा सकता है । प्रजाविभवो हि स्वामिनोऽद्वितीयं भाण्डागारमतो युक्तितस्तमु- पयुञ्जीत ॥ २५ ॥ राजा के लिये प्रजा का धन-धान्य से सम्पन्न होना अनुपम और अक्षय भण्डार के समान है अतः उसका उपयोग उसे युक्तिपूर्वक करना चाहिए । राजपरिगृहीतं तृणमपि काञ्चनीभवति जायते च पूर्वसञ्चितस्या- प्यर्थस्यापायः ॥ २६ ॥ तिनके के बराबर तुच्छ भी राजकीय वस्तु का ग्रहण चोरी आदि सोने के समान हो जाती है अर्थात् उसका बहुत बड़ा दण्ड चुकाना पड़ता है जिससे पूर्व सञ्चित भी धन नष्ट हो जाता है । वाक्पारुष्यं शस्त्रपातादपि विशिष्यते ॥ २७ ॥ वाणी की कठोरता शस्त्र पात से भी अधिक कठोर होती है । ज्ञानिवयोवृत्तविद्याविभवानुचितं हि वचनं वाक्पारुष्यम् ॥ २८ ॥

८४ नीतिवाक्यामृतम् किसी की जाति, अवस्था, सदाचार, और विद्या तथा ऐश्वर्य के अनुकूल वचन का प्रयोग न करना ही वाक् पारुष्य अर्थात् वाणी की कठोरता है। स्त्रियम्, अपत्यं, भृत्यं वा तथोक्त्या विनयं ग्राहयेद् यथा हृदय- प्रविष्टाच्छल्यादिव वचनतो न ते दुर्मनायन्ते ॥ २९ ॥ अपनी स्त्री, सन्तान और सेवक को ऐसे वचनों से विनयी बनावे जिससे वे हृदय में प्रविष्ट तीर के समान दुःखद दुर्वचनों से दुःखी न हों। वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं वा क्रमेण दण्डपारुष्यम् ॥ ३० ॥ किसी का वध कर देना, जेल आदि में रख कर यन्त्रणा देना और धन छीन लेना ये क्रमशः दण्ड पारुष्य हैं। एकेनापि व्यसनेनोपहतश्चतुरङ्गवानपि राजा विनश्यति किं पुनर्नाष्टा- दशभिः ॥ ३१ ॥ एक भी व्यसन में लिप्त राजा सेना, हाथी, घोड़ा और पैदल इन चतुरङ्गों से युक्त होने पर भी विनष्ट हो जाता है फिर अठारह दोषों से युक्त के विषय में तो कहना ही क्या है ? [ इति व्यसन समुद्देशः ] १७. स्वामि समुद्देशः दो सूत्रों द्वारा 'स्वामी' के आवश्यक गुणों का वर्णन— धार्मिकः कुलाचाराभिजनविशुद्धः प्रतापवान् नयानुगतवृत्तिश्च स्वामी ॥ १ ॥ धार्मिक, विशुद्ध वंश, आचार और परिवार वाला, प्रतापशाली तथा नीति के अनुसार आचरण करने वाला जो हो वह स्वामी है। कोपप्रसादयोः स्वतन्त्रता आत्मातिशयवर्धनं वा यस्यास्ति स स्वामी ॥ २ ॥ क्रोध और प्रसाद में जो स्वतन्त्र हो अर्थात् क्रोध करे तो कुछ बिगाड़ सके और प्रसन्न हो तो कुछ दे सके तथा अपना उत्कर्ष करने में जो साधन सम्पन्न हो वह स्वामी है। स्वामी की आवश्यकता— स्वामिमूलाः सर्वाः प्रकृतयो भवन्त्यभिप्रेतप्रयोजना नास्वामिकाः ॥३॥ समस्त प्रजा स्वामी के ही आधार से अपना अभीष्ट सिद्ध करने में समर्थ होती है बिना स्वामी के नहीं। अस्वामिकाः प्रकृतयः समृद्धा अपि निस्तरीतुं न शक्नुवन्ति ॥ ४ ॥

स्वामिसमुद्देशः ८५ बिना स्वामी की प्रजा समृद्ध होने पर भी अपना उद्धार नहीं कर सकती । दृष्टान्त— अमूलेषु तरुषु किं कुर्यात् पुरुषप्रयत्नः ॥ ५ ॥ बिना जड़ के वृक्षों में पुरुष प्रयत्न करके भी क्या कर सकता है । असत्यवादिता के दोष— असत्यवादिनो विनश्यन्ति सर्वे गुणाः ॥ ६ ॥ असत्यवादी के सब गुण नष्ट हो जाते हैं । वञ्चक के दोष— वञ्चकेषु न परिजनो नापि चिरमायुः ॥ ७ ॥ दूसरों को ठगने और धोखा देने वालों के समीप न तो सेवक होते हैं न वे दीर्घायु होते हैं । धनदाता की लोकप्रियता— स प्रियो लोकानां यो ददात्यर्थम् ॥ ८ ॥ जो धन देता हैं वह लोकप्रिय होता है । अर्थात् दानी पुरुष शीघ्र ही सबका प्यारा बन जाता है । महान् दाता का स्वरूप— स दाता महान् यस्य नास्ति प्रत्याशोपहतं चेतः ॥ ९ ॥ महान् दाता वह है जिनके चित्त में दान के अनन्तर किसी प्रत्युपकार की आशा नहीं होती । प्रत्युपकर्त्तुरुपकारः सवृद्धिकोऽर्थन्यास इव ॥ १० ॥ प्रत्युपकार करनेवाले के प्रति उपकार करना बढ़ने वाली धरोहर के समान है । उपकार प्रत्युपकार की परम्परा की आवश्यकता— तज्जन्मान्तरेषु न केषामृणं येषामप्रत्युपकारं परार्थानुभवनम् ॥११॥ जो बिना प्रत्युपकार के परोपकार करते हैं उनका वह परोपकार जन्मा- न्तर में ऋण तुल्य होता है । अर्थात् उपकार के बदले उपकार की भावना रखनी चाहिए और उपकार के बदले उपकार करते रहना चाहिए अन्यथा वह दूसरे का उपकार अपने ऊपर जन्मान्तर तक ऋण सा लदा रहता है । दृष्टान्त— किं तया गवा या न क्षरति क्षीरं न गर्भिणी वा ॥ १२ ॥ उस गाय से क्या लाभ जो न दूध देती है न गर्भिणी होती है ?

८६ नीतिवाक्यामृतम् स्वामी की कृपा का स्वरूप— किं तेन स्वामिप्रसादेन यो न पूरयत्याशाम् ॥ १३ ॥ स्वामी की उस प्रसन्नता से क्या लाभ जिससे आशा न पूर्ण हो । क्षुद्रमण्डल के दोष— क्षुद्रपरिषत्कः सर्पवानाश्रय इव न कस्यापि सेव्यः ॥ १३ ॥ जिसकी सभा में क्षुद्र पुरुष हों अर्थात् जिसके परामर्श दाताओं के मण्डल में क्षुद्र विचार के लोग होते हैं उसका उस स्वामी का आश्रय कोई भी उसी प्रकार नहीं ग्रहण करता जिस प्रकार सर्प से बसे हुए घर में कोई नहीं रहता । कृतघ्नता का दोष— अकृतज्ञस्य व्यसनेषु न सन्ति सहायाः ॥ १५ ॥ कृतघ्न पुरुष को दुःख पड़ने पर कोई सहायक नहीं होता । प्रत्येक व्यक्ति में विशेष गुण की आवश्यकता— अविशेषज्ञः शिष्टैर्नाश्रीयते ॥ १६ ॥ जिसमें कोई विशेष गुण नहीं होता शिष्ट पुरुष उसका आश्रय नहीं लेते । अतिस्वार्थ का दोष— आत्मम्भरिः कलत्रेणापि त्यज्यते ॥ १७ ॥ केवल अपना पेट भरना जाननेवाले को अर्थात् अत्यन्त स्वार्थी को उसकी स्त्री भी छोड़ देती है । उत्साह की महिमा— अनुत्साहः सर्वव्यसनानामागमद्वारम् ॥ १८ ॥ अनुत्साह सब प्रकार के दुःखों के आने का द्वार है । अर्थात् जहां उत्साह नहीं वहां अनेक आपत्तियां आती रहती हैं । उत्साह के गुण— शौर्यममर्षः शीघ्रकारिता सत्कर्मप्रवीणत्वमित्युत्साहगुणाः ॥ १६ ॥ पराक्रम, अन्यायी पर क्रोध और कार्यों को शीघ्र करना तथा सत्कर्म में कुशल होना ये उत्साह के गुण हैं । अन्यायाचरण का दोष— अन्यायप्रवृत्तेर्न चिरं सम्पदो भवन्ति ॥ २० ॥ अन्यायाचरण करनेवाली की सम्पत्ति चिरस्थायी नहीं होती । स्वेच्छाचार का दोष— यत्किंचनकारी स्वैः परैर्वा हन्यते ॥ २१ ॥

स्वामीसमुद्देशः ८७ जो चाहे सो करने वाला अर्थात् अत्यन्त स्वेच्छाचारी पुरुष कभी न कभी आत्मीय अथवा पराए लोगों के द्वारा मार डाला जाता है। ऐश्वर्य का फल— आज्ञाफलमैश्वर्यम् ॥ २२ ॥ आज्ञा प्रदान करना और उसका पूर्ण होना ऐश्वर्य का फल है। अर्थात् ऐश्वर्य और अधिकार तभी सफल है जब आज्ञा देने का सामर्थ्य हो और लोग उसका पालन करें। धन का फल— दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ २३ ॥ दान देना और उसका उपभोग करना धन का फल है। अर्थात् धन तभी सफल है जब दान दिया जाय और तदनुकूल सुख भोगा जाय। 'स्त्री' की उपयोगिता— रतिपुत्रफला दाराः ॥ २४ ॥ सम्भोग और सन्तान की प्राप्ति स्त्री होने का फल है। अर्थात् सुखप्राप्ति और सन्ततिलाभ न हुआ तो स्त्री का होना व्यर्थ है। राजाज्ञा की उत्कृष्टता — राजाज्ञा हि सर्वेषामलङ्घ्यः प्राकारः ॥ २५ ॥ राजाज्ञा सब के लिये अलङ्घ्य प्राकार-चहारदीवारी या खाई के समान है। जिस प्रकार किले की रक्षा के लिये बनाया गया प्राकार दुर्लङ्घ्य होता है उसी प्रकार राजाज्ञा का भी उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता। अपनी आज्ञा के विषय में राजा का कर्तव्य— आज्ञाभङ्गकारिणं सुतमपि न सहेत ॥ २६ ॥ राजा को चाहिए कि यदि उसका पुत्र भी उसकी आज्ञा का उल्लङ्घन करे तो उसको सहन नहीं करना चाहिए। कस्तस्य चित्रगतस्य च राज्ञो विशेषो यस्याज्ञा नास्ति ॥ २७ ॥ जिसकी आज्ञा का पालन नहीं होता उस राजा में और चित्र में बने हुए राजा में क्या विशेषता है ? उल्लङ्घन का दण्ड— राजाज्ञावरुद्धस्य पुन-स्तदाज्ञाऽप्रतिपादनेन उत्तमःसाहसोदण्डः ॥ २८ ॥ जो राजा की आज्ञा से अवरुद्ध हुआ हो अर्थात् जेल आदि में बन्दी हो और पुनः आज्ञा का उल्लङ्घन करे तो उसे १००० पण का 'उत्तम साहस' दण्ड देना चाहिए। सम्बन्धाभावे तदातुश्च ॥ २९ ॥

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८८ नीतिवाक्यामृतम् अपराध से अपराधी का सम्बन्ध न सिद्ध हो तो जिस न्यायकर्त्ता ने दण्ड दिया हो उसे उत्तम साहस दण्ड दे । बोलने का नियम— परमर्म्मस्पर्शिकरम्, अश्रद्धेयम्, असत्यम्, अतिमात्रं च न भाषेत ॥ ३० ॥ दूसरे को मर्मान्तिक पीड़ाकारी, अविश्वास योग्य, असत्य और बहुत ज्यादा न बोले । वेष का नियम -- वेषमाचारं वाऽनभिजातं न भजेत् ॥ ३१ ॥ ऐसा वेष और व्यवहार न करे जो अभिजात न हो । अभिजात का अर्थ होता है कुलीन, सद्‌वंश में उत्पन्न और शिष्ट, अतः अनभिजात इससे प्रतिकूल अर्थ का वाची हुआ। इस प्रकार इस सूत्र का स्पष्टार्थ होगा कि मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसी वेष भूषा न धारण करे जो शिष्ट समाज में न व्यवहृत होती हो तथा ऐसा व्यवहार भी किसी से न करे जो शिष्ट परम्परा के अनुकूल न हो । राजा के अनुसार प्रजा का आचार-व्यवहार— प्रभौ विकारिणि को नाम न विकुरुते ॥ ३२ ॥ राजा के विकृत होने पर कौन नहीं विकृत होता ? अधर्मपरे राज्ञि को नाम नाधर्मपरः ॥ ३३ ॥ राजा के अधार्मिक होने पर कौन नहीं अधार्मिक होता ? राजा के द्वारा मानापमान का महत्त्व— राज्ञावज्ञातो यः स सर्वैरवज्ञायते ॥ ३४ ॥ जो राजा से तिरस्कृत होता है वह सब के द्वारा तिरस्कृत होता है । पूजितं हि पूजयन्ति लोकाः ॥ ३५ ॥ राजा से पूजित और सम्मानित को सब लोग पूजते हैं अर्थात् सम्मान करते हैं । प्रजा की देखभाल के विषय में राजा का कर्त्तव्य— प्रजाकार्यं स्वयमेव पश्येत् ॥ ३६ ॥ राजा को चाहिए कि वह प्रजा के कामों को स्वयं देखे । यथावसरमप्रतीहारसंगं द्वारं कारयेत् ॥ ३७ ॥ अवसर के अनुकूल राजा अपने द्वार परसे द्वारपाल को भी हटा दे जिससे लोग सरलता से राजा से मिल सकें । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

स्वामिसमुद्देशः ८६ दुर्दर्शो हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यतेऽतिसंधीयते च द्विषद्भिः ॥ २८ ॥ जो राजा प्रजा के कार्यों को स्वयम् नहीं देखता उस दुर्दर्श, राजा के भले और बुरे कामों को उसके आसन्न वर्ती अर्थात् पास रहने वाले लोग उलट-पुलट देते हैं और शत्रु भी ऐसे राजा को धोखा देते और ठगते हैं । राजा के सङ्कट से सेवकों की लाभ की प्रवृत्ति— वैद्येषु श्रीमतां व्याधिवर्धनादिव नियोगिषु भर्तुर्व्यसनवर्धनादपरो नास्ति जीवनोपायः ॥ ३६ ॥ जिस प्रकार धनी पुरुषों की व्याधियों के बढ़ने के अतिरिक्त दूसरा उपाय वैद्य की आजीविका का नहीं है उसी प्रकार सेवकों के लिये स्वामी के संकट में पड़ने के अतिरिक्त दूसरा जीविका का उपाय नहीं है अथवा स्वामी के द्यूत मद्यपान आदि के दुर्व्यसनी होने के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। राजा यदि दुर्व्यसनों में लिप्त हो जाता है तो नौकर चाकर उसी छल से राजा के धन का अपहरण करते रहते हैं ।

  • घूसखोरी के विषय में निर्देश और उपदेश— कार्यार्थिनो लंचो लुञ्चति ॥ ४० ॥ कार्यार्थी पुरुष को घूस-भेंट आदि लेने वाला अधिकारी लूटता है । निशाचराणां भूतबलिं न कुर्यात् ॥ ४१ ॥ राजा को चाहिए कि घूस-रिश्वत लेने वाले निशाचरों के लिये अपने भूत अर्थात् प्रजावर्ग को बलि न बनावे । अर्थात् राजा प्रजा को घूस-खोरों से बचावे । लंचो हि सर्वपातकानामागमनद्वारम् ॥ ४२॥ घूस सब पापों के आने का द्वार रूप है । मातुः स्तनमपि लुंनंति लंचोपजीविनः ॥ ४३ ॥ घूस रिश्वत से जीविकार्जन करनेवाले व्यक्ति अपनी माता का भी स्तन काट लेते हैं । लंचेन कार्याभिरुद्धः स्वामी विक्रीयते ॥ ४४ ॥ जिस स्वामी के यहाँ लंच अर्थात् घूस के कारण काम रुकता हो वह स्वामी घूसखोरों के हाथ बिक सा जाता है । घूस देने वाला उसके यहां न्याय- अन्याय सभी प्रकार के कार्य कराता है । प्रासादविध्वंसनेन लोहकीलकलाभ इव लंचेन राज्ञोऽर्थलाभः ॥४५॥ घूस रिश्वत के द्वारा धन का लाभ राजा के लिये वैसा ही है जैसे महल

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ६० नीतिवाक्यामृतम् गिराकर लोहे की कील प्राप्त करने में हैं। अर्थात् घूसखोर राजा का राज्य ही नष्ट हो जाता है। राज्ञो लंचेन कार्यकरणं कस्य नाम कल्याणम् ॥ ४६ ॥ राजा का घूस लेकर काम करना किसी के लिये भी कल्याणकारक नहीं है। देवतापि यदि चौरेषु मिलति कुतः प्रजानां कुशलम् ॥ ४७ ॥ देवतारूप राजा भी यदि चोरों में मिल जाय तो प्रजा का कुशल- मङ्गल कहां से होगा ? अर्थात् रक्षक ही यदि भक्षक बन गया तो फिर कल्याण कहां ? लंचेनार्थोपायं दर्शयन् देशं कोशं भिन्नं तन्त्रं च भक्षयति ॥ ४८ ॥ राजा को घूस से अर्थलाभ प्रदर्शित करनेवाला अमात्य राजा के देश, कोश, मित्र और सैन्य वर्ग को खा जाता है अर्थात् विनष्ट कर देता है। राजा के द्वारा अन्याय और न्यायाचार— राज्ञोऽन्यायकरणं समुद्रस्य मर्यादाल्लङ्घनम् , आदित्यस्य तमः पोष- णम् , मातुः स्वापत्यभक्षणमिति कलिकालविजृम्भितानि ॥ ४६ ॥ राजा का अन्याय करना समुद्र के मर्यादा लंघन के समान, सूर्य के द्वारा अन्धकार का पोषण होने के समान और माता का अपनी सन्तान के भक्षण के समान है और यह सब कलियुग का विलास है। राजा कालस्य कारणम् ॥ ५० ॥ प्रजा के दुःखमय अथवा सुखमय समय व्यतीत करने का कारण राजा होता है। न्यायतः परिपालके राज्ञि प्रजानां कामदुघा भवन्ति सर्वा दिशः काले च वर्षति मघवान् , सर्वाश्चेतयः प्रशाम्यन्ति ॥ ५१ ॥ जब राजा न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करता है तब प्रजा के लिये समस्त दिशाएँ कामधेनु के समान हो जाती हैं—प्रजा की समस्त अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं इन्द्र समय से वर्षा करता है और राज्य की समस्त 'ईतियां' शान्त रहती हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी दल आदि का आना, मूषकों का और चिड़ियों का उपद्रव, और राजाओं का चढ़ाई कर देना यह छह ईतियां है। राजपद की महत्ता — राजानमनुवर्त्तन्ते सर्वेऽपि लोकपालास्तेन मध्यममप्युत्तमं लोकपालं राजानमाहुः ॥ ५२ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

स्वामिसमुद्देशः ६१ समस्त लोकपाल राजा का अनुसरण करते हैं। अतः मध्यम श्रेणी का भी राजा उत्तम लोकपाल कहा जाता है। राजसहायता के अधिकारी— अव्यसनेन क्षीणधनान् मूलधनप्रदानेन कुटुम्बिनः प्रतिसंभाव- येत् ॥ ५३ ॥ द्यूत, मद्यपान आदि किसी व्यसन के कारण नहीं, किन्तु अन्य किसी कारण से अर्थात् चोरी, व्यापारिक घाटा आदि से जिनका धन नष्ट हो गया हो ऐसे कुटुम्बियों को राजा मूलधन-पूंजी के निमित्त धन प्रदान कर समा- दृत करे। राजा का कुटुम्ब और कलत्र— राज्ञो हि समुद्रावधिर्मही स्वकुटुम्बम्, कलत्राणि तु वंशवर्धन- क्षेत्राणि ॥ ५४ ॥ समुद्रपर्यन्त पृथिवी राजा का अपना कुटुम्ब है और उसके उर्वर खेत उसका वंशवर्धन करनेवाले कलत्र हैं। भेंट और उपहार के विषय में राजा का कर्त्तव्य— अर्थिनामुपायनमप्रतिकुर्वाणो न कुर्यात् ॥ ५५ ॥ उपकार न कर सके तो राजा कार्यार्थियों की भेंट न स्वीकार करे। हास-उपहास के नियम— आगन्तुकैरसहनैश्च सह नर्म न कुर्यात् ॥ ५६ ॥ अपरिचित और असहिष्णु व्यक्तियों के साथ परिहास-हंसी मजाक न करे। बड़ों से संभाषण का नियम— पूज्यैः सह नाधिरुह्य वदेत् ॥ ५७ ॥ आदरणीय व्यक्तियों के साथ कुर्सी पलंग आदि किसी आसन पर चढ़कर बातें न करें। झूठी आशा देना अनुचित— भृत्यमशक्यमप्रयोजनं च जनं नाशया क्लेशयेत् ॥ ५८ ॥ असमर्थ, सेवक और निःस्वार्थ व्यक्ति को झूठी आशा देकर पीडित न करे। दासता और धन— पुरुषो हि न पुरुषस्य दासः किन्तु धनस्य ॥ ५९ ॥ पुरुष पुरुष का दास नहीं होता किन्तु धन का दास होता है। यही बात महाभारत के भीष्मपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कही है।

६२ नीतिवाक्यामृतम् "अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥" को नाम धनहीनो न भवति लघुः ॥ ६० ॥ कौन धनहीन पुरुष छोटा नहीं हो जाता ? पराधीनेषु नास्ति शर्मसम्पत्तिः ॥ ६१ ॥ पराधीन व्यक्ति के पास सुखरूप सम्पत्ति नहीं होती। अर्थात् पराधीनता में सुख कहाँ ? विद्या की प्रशंसा— सर्वधनेषु विद्यैव प्रधानमहार्यत्वात् सहानुयायित्वाच्च ॥ ६२॥ सब प्रकार के धनों में विद्या ही प्रधान है क्योंकि उसका कोई अपहरण नहीं कर सकता और मनुष्य जहाँ भी जाता है वह उसके संग लगी रहती है। सरित् समुद्रमिव नीचमुपगतापि विद्या दुर्दर्शमपि राजानं संगमर्यात परन्तु भाग्यानां भवति व्यापारः ॥ ६३ ॥ निम्न मार्ग से बहने वाली भी नदी जिस प्रकार अपने साथ बहने वाले छोटे से छोटे और हल्के से हल्के घास-फूस को भी समुद्र से मिला देती है उसी प्रकार नीच और क्षुद्र पुरुष के भी पास की विद्या उसे दुर्लभ दर्शन वाले राजा से मिला देती है, किन्तु वहाँ पहुँच जाने पर अल्प या अधिक अर्थलाभ भाग्य के ऊपर निर्भर होता है। संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ सा खलु विद्या विदुषां कामधेनुर्यतो भवति समस्तजगतः स्थिति- ज्ञानम् ॥ ६४ ॥ विद्वानों के लिये वह विद्या कामधेनु के समान है जिससे समस्त जगत् की स्थिति का ज्ञान होता है। (संभवतः यहाँ ज्योतिष विद्या की प्रशंसा की गई है) लोक व्यवहार जानने का महत्व— लोकव्यवहारज्ञो हि सर्वज्ञोऽन्यस्तु प्राज्ञोऽप्यवज्ञायत एव ॥ ६५ ॥ लोक व्यवहार को जाननेवाला ही सर्वज्ञ है दूसरा तो विद्वान् होने पर भी अनादृत होता है। प्रज्ञापारमित का लक्षण— ते खलु प्रज्ञापारमिताः पुरुषाः ये कुर्वन्ति परेषां प्रतिबोधनम् ॥६६॥ उन पुरुषों को "प्रज्ञापारमित" कहते हैं जो दूसरों को उनके कर्त्तव्य का बोध कराने में समर्थ होते हैं।