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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

अथवा ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाला जो सदाचारी जन जीता रहे, उसको तो देवता भी प्रणाम करते हैं और देवता उसका हमेशा ही आदर और पूजन करते हैं अथवा ऐसा कहा गया होगा? उत्तर में कह सकते हैं कि इन दोनों मतों का परस्पर कोई विरोध नहीं है, क्योंकि जो सदा से ही इसका पालन करता आ रहा है वह तो महात्मा है; उसकी तो सदा सब पूजा करते ही हैं या यों कहिए कि सब ही आदर, सत्कार और प्रणाम करते रहते हैं या यों कहिए कि इस समय में, ब्रह्मचर्य का नाश कर जो दुर्बल बन गए अथवा जो रोगी बन चुके हैं उनकी भी तो अपनी भूल का पश्चात्ताप होना ही चाहिए और पश्चात्ताप ही तो एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा मनुष्य सब कुछ; जो खो गया हो अथवा नष्ट हो गया हो--सब कुछ प्राप्त कर सकता है? ऐसा कहा गया होगा कि हे भाई ! उठ, हे वीर, हे भारत वीर, हे भारत संतान, हे भारत माता पुत्र, हे बलवान् जन, हे आर्य पुत्र, हे नव युवक--अब भी संभल जाओ। ब्रह्मचर्य रूपी रत्न को पहचान कर हे भाई ! उठ और हे वीर, ऐसा मन-बल बना ताकि सम्पूर्ण इन्द्रियों पर तूने जय-लाभ पा, कोई आत्म-कल्याण कर? यह बात सच है केवल मन की ही बात कही गई जान पड़ती है कि हे भगवान् मन तो जीत ले तो सब; सब पर विजय, सब पर तेरी जय तथा सब पर तेरी प्रभुता होगी ऐसा कहा गया है हे भगवान्, सब काम-वासना को तू निष्काम--विश्राम देकर शांत? प्रकृति का साम्राज्य सब पर अपना प्रभाव जमाए ही रहता है, प्रकृति सदा ही संसार को यह सब कुछ भोग प्रदान करते हुए मनुष्य को यह आभास कराती है, हे मानव उठ, हे भारत जन, हे भारत मां, हे भाई, हे भारत नव--युवक सदा ही इसका त्याग कर? इसका त्याग कर सम्पूर्ण दुःखों से छूट जाओ, ऐसा कहा गया ब्रह्मचर्य रूप को केवल स्वप्न में ही नहीं जाना जा सकता या यह कल्पना संसार रूप का रूप नहीं बल्कि सब तो सत्य रूप में संसार का ही स्वरूप है, जिसमें रहकर मनुष्य सब कुछ भोगता हुआ सब कुछ जानता हुआ, सब जानता ही नहीं बल्कि सब, सब क्रियाकलाप को त्यागकर सब--भोगों को त्याग कर; उसको केवल एक ब्रह्म भाव रहकर सदा शान्त रहना चाहिए था, ब्रह्मचर्य रूपी इस तो मानव जीवन को, ब्रह्मचर्य रूपी इस सत्य को मानव के कल्याण के लिए सब कुछ दिया, पश्चात्--उसको जन, धर्म अर्थ, काम मोक्ष; ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण सम्पदा; सब शक्ति, सब सम्पन्न; सब आनन्द, सदा सुख--आनन्द, सब शान्ति, सब कुछ दिया फिर भी मानव यह सब कुछ हासिल करता है? हे नवयुवक जन, हे वीर भारत के, हे वीर संतान नव--युग के जन, ब्रह्मचर्य रूपी साम्राज्य से; सब मुक्ति मिल जाएगी; सब कुछ मिल जाएगा; सब कुछ सब कुछ प्राप्त सम्पूर्ण परमात्मा का रूप मिलेगा ही? ब्रह्मचर्य ही जीवन, जीवन रूप ही रूप संसार में सब प्रकार सुख दुख सबको सब कुछ प्राप्त हुआ, ब्रह्मचर्य पालन का नाम ही सब कुछ प्राप्त होना कहा, तो फिर यह सब कुछ भूल--करके क्यों भटकता है? यह तो सब कुछ देकर ही सुख की प्राप्ति करेगा, तब शान्ति मिल सकेगी? ऐसी बात भी कभी मन में नहीं सोचना कि आज तो, यह संसार पूरा संसार ही इस काम रूपी दलदल में ही सब कुछ फंसा पड़ा है तो मैं अकेला क्या करूँगा यह सोच कर मन को दुर्बल मत बनाना बल्कि मन को सबल यह कह कर कि, मैं तो इस संसार रूपी सागर से अपने को पार ले जाने का प्रयत्न कर ही रहा हूँगा अथवा कर रहा हूँगा, ऐसा भाव हो! तब असम्भव रूप से सदा ही इस भव से पार भी हो सकता है। यही बात भी सदा मन में सोचनी चाहिए; केवल कहने से तो काम नहीं बनता बल्कि करना पड़ता होगा? संसार के लिए केवल कहने मात्र से काम तो कभी नहीं हो ही सकता है। संसार से पार जाने के लिए केवल कहना ही, कहना नहीं बल्कि, उस ओर अग्रसर मन को होना ही? केवल विचार मात्र--कहने मात्र कैसे? ब्रह्मचर्य के पालन से सब कुछ पा सके, केवल भोगी बनकर तो केवल काम विकार--रूप ही सब कुछ भुगताया जा सकेगा; ब्रह्मचर्य जीवन केवल शान्ति, सब सुख का दाता ही सदा ही रहेगा

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नाम का, रूपका आधार रूप, सब रूप रूप, परिणाम का रूप बदल जाता परिणाम नाम का नाम है, रूप का रूप गुण--धर्म बना, वह बदला; रूप परिणाम का नाम है, रूप परिणामीका यह रूप है, रूप नाम का रूप सब प्रकार परिणाम परिणाम का नाम है; पर वो रूप नाम गुण--धर्म-का, सब का वो रूप, रूप नाम सब रूपका नाम, सब नाम का परिणाम! वो परिणामी सब परिणाम स्वरूप बना स्वरूप विकार का हो परिणाम का कोई विकार स्वरूप का विकार तो सब का विकार तो विकार का नाम परिणाम सब सब न देखा हो, परिणामी परिणामी विकार का रूप तो सब का विकारमय बना इसका विकार वो विकार रूप सब न देखा सबने सबने रूप, सब का रूप सब न रूप देखा भला-बुरा परिणाम, सब का परिणाम विकार का, नाम-रूप, क्रिया का वो वो रूप, क्रिया स्वरूप का परिणाम, इसका विकार वो सब रूप भला रूप सब का विकार का रूप, सब का, वो रूप वो सब सब रूप सब रूप परिणाम सब सब सब सब इसका सब प्रकार वो विकार सब सब काल विकार सब विकार सब विकार काल विकार का विकार स्वरूप सब काल सब का काल सब सब काल विकार का सब काल सब का काल सब का सब सब काल, सब न हो, रूप-विकार न हो, विकार सब काल! सब सब काल विकार काल, सब का विकार रूप, विकार विकार का वो विकार, वो तो वो परिणाम का तो सब काल परिणाम रूप सब प्रकार वो सब सब सब न देखा सब नाम, रूप, क्रिया, काल, परिणाम परिणाम सब सब विकार विकार सब विकार का परिणाम सब रूप काल का विकार रूप सब का रूप वो सब का रूप सब सब सब, क्रिया विकार का परिणाम वो, तो सब वो रूप-का, गुण-का विकार सब का रूप वो, सब का वो काल, क्रिया वो वो सब सब प्रकार सब का विकार रूप सब, वो विकार रूप सब सब; तो सब विकार का, वो विकार का सब रूप सब इसका विकार वो परिणाम रूप, विकार का रूप वो परिणाम रूप भला- बुरा परिणाम वो सब वो सब सब भला-बुरा का परिणाम सब रूप विकार रूप--परिणाम; वो काल सब परिणामी इसका परिणाम सब सब सब का नाम रूप--विकार; भला सब विकार का वो भला रूप--विकार सब सब विकार का नाम वो नाम; सब सब न रूप सब का परिणाम रूप--विकार सब का रूप सब सब सब रूप परिणाम का सब सब विकार का सब रूप वो वो सब वो वो रूप; तो वो रूप वो काल सब हो! वो परिणाम सब सब का रूप वो भला-बुरा वो सब रूप सब रूप इसका परिणाम सब काल विकार का परिणाम भला विकार वो परिणाम रूप सब रूप सब हो? सब रूप विकार सब प्रकार का विकार परिणाम सब विकार का रूप सब, विकार सब विकार सब वो सब काल वो रूप रूप? सब वो सब परिणाम रूप सब सब का परिणाम रूप, वो वो सब परिणाम रूप का हो; भला विकार सब का रूप काल विकार का वो विकार सब वो विकार सब विकार सब रूप सब, वो विकार वो सब रूप सब, वो वो सब का वो रूप! परिणाम सब सब का सब रूप भला-बुरा विकार सब सब सब रूप सब सब सब; परिणाम हो; वो वो सब का, सब का रूप सब का सब रूप रूप सब विकार सब का रूप न हो, सब परिणाम वो वो न सब रूप विकार सब का विकार वो, सब का वो, वो वो सब सब सब विकार सब परिणाम विकार सब विकार रूप विकार सब विकार परिणाम परिणाम सब विकार सब का रूप सब रूप सब सब रूप, रूप सब परिणाम का रूप रूप; भला परिणाम का रूप सब रूप वो परिणाम रूप सब का रूप वो सब का रूप वो रूप रूप विकार का परिणाम... न सब रूप वो रूप वो परिणाम विकार का रूप वो परिणाम 140

▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯?

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The text in the image cannot be transcribed into readable Devanagari characters because the source document suffered from a missing font/rendering error, causing nearly all characters to appear as placeholder rectangle boxes (tofu symbols ).

Below is the layout transcription preserving the visible structure, punctuation marks, and page number:

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144

जायेगा; विचारवान् पुरुष इसे दूर हटायेंगे व इसका सेवन कर प्रतिष्ठा को खो बैठेंगे या अयोग्य स्थान, समय, रीति अपनाकर सब कुछ खो न बैठेंगे। ऐसा देश-काल का प्रभाव विशेष हो सकता है अथवा यह भी सम्भव है कि इस योग मार्ग को सदा सब जन सर्वव्यापक नहीं बना सके। इसमें अपनी ही शक्ति सहायता दे सकती है; अन्य साधन तो बाह्यबल देते हैं जिससे यह प्रकट रूप सदा चमकता रह सके। हाँ, विचार शक्ति का उदय तो प्रत्येक में हो रहा, तब इस योग साधना द्वारा परम लाभ उठा सकेंगे। इसमें सन्देह ही क्या रहा कि यह विद्या साधन केवल जीवन को सुखी और उच्च बनाने भर के लिये नहीं साधन की गई थी वरन् परम आनन्द स्वरूप में लीनतादि के पद को भी इसी द्वारा प्राप्त किया जाता है, मुक्ति को भी इसका ही, या राजयोगादि का केवल ही साक्षात्कार से उत्पन्न न माना जाय तो भी इसका अभ्यास अवश्य ही उस उच्च स्थान आनन्द स्वरूप में पहुंचाने में सहायक तो माना ही जाय तथा इसमें भी सन्देह क्या रहा, अतः किसी भी उपाय इसका प्रचार जन समाज में होना ही चाहिये, चाहे किसी रूप अथवा साधन द्वारा ही क्यों न किया जाय, सदा काल में इस प्रकार का ही यत्न आवश्यक हो रहेगा, देश-काल के प्रभाव गुण-दोष, परिस्थिति, भाव का विचार--जो प्राकृतिक रूप से सब पर न्यूनाधिक रूप में होता रहेगा, अवश्य किया जाये; परन्तु योग पर इसका प्रभाव पड़ता ही जाता है, यह समझ कर छोड़, त्याग ही दिया जाय वा यह समझा जाय कि केवल प्राचीन काल के ही जन इस योग्य थे तथा अब तो देश-काल ऐसा विपरीत आया कि इसका नाम मिट जाय। यह विचार उन लोगों का हो गया प्रतीत होता है जो अपने आपको ही केवल विचारवान् मान अन्य साधारण जन तथा वर्तमान परिस्थिति सम्बन्धी आवश्यकताओं आवश्यकताओं को, अकारण विचार बैठते इस अज्ञानता युक्त विचार जनित प्रभाव के कारण प्रचार बन्द प्रायः रहा...। जब कि यह साधन ही ऐसा प्रभाव रखता है कि मन को वश में रखने के उपयोगी उपायों व अन्य सिद्धियों का देश-काल विशेष प्रभाव अवश्य-विशेष ही इस पर असर करता है, देश-काल ही तो सब कुछ नहीं करा-सकता तो फिर यह ही विचार क्यों न; देश-काल जैसा भी समय आ जाय मन--इन्द्रिय का योग, उनका ही यत्न रूप में प्रभाव रखता ही रहेगा केवल स्वरूप भेद ही हो रहा हो इस प्रकार विचार होना ही ठीक समझा जा सकता था परन्तु सब दशा को सदा समान न पा वा समझने में समर्थ न होने का कारण यह रहा व अन्य लोग भी भ्रम में पड़ गये वा पड़ते रहे कि केवल या कुछ विशेष ही इसका लाभ उठा सके वा, सब का अधिकार न मान कर भ्रम उत्पन्न कर अभ्यास को आवश्यकता से अधिक कष्ट साध्य, असाध्य, असम्भव माना वा इसका प्रचार बन्द करना आरम्भ किया वा हो गया कि यह योग सब का काम ही नहीं रहा वा हो सकता था इस लिये जन समाज में से यह लुप्त होता चला गया, वा इस प्रकार की दशा में पड़ा रहा कि बहुत कुछ जन भ्रम जन अविश्वास युक्त विचार को ही सब कुछ मान, इसे कष्ट, क्लेश का ही घर समझ बैठे जिसका परिणाम अन्त में, जो हो गया वही न था। हां, केवल राज योग साधन के प्रचार का फल यह हुआ कि कुछ न कुछ साधन बचा रहा वा इस देश-काल विशेष में काम कर सका; यदि ऐसा भी न हो तो सब कुछ नष्ट हो--गया ही समझा जाता, वा समझना पड़ता तो इस पर विचार करने से भी तो, विचार शक्ति को बल प्राप्त हो ही सकता है। केवल यह हठ योगीय अंग इस से दूर हो गये थे। इसका एक परिणाम सदा ही देखने आया कि, किसी भी परिस्थिति का प्रचार बन्द करा देने से अथवा साधन न कराने व रुकावट डालने से यह तो हो सकता रहा जिससे उस का नाम भी न रहे परन्तु विद्या तो विद्या, रस तो रस रहा; साधन ही तो जन का साधन व आनन्द प्रदान कराने के ढङ्ग को फेर--बदल सकता सम्भवतः था। 145

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क्या यही सर्वज्ञता और सर्वज्ञ का स्वरूप था अथवा राग-द्वेष युक्त? तो उन्होंने ही तो ऐसा कहा नहीं; वो कहते तो वो सर्वज्ञ ही नहीं; इसलिए इनके ऊपर सर्वज्ञता और इनके ऊपर वीतरागता यह तो ऐसे न लग कर जो यह कर रहे हैं वैसा न कह कर उन्होंने उपदेश दिया, उस समय न केवल ज्ञान हुआ न था, केवल ज्ञान न था; इसलिए तो वो लोग ऐसा कहते कि ज्ञान--दर्शनोपयोगपूर्वक ही वो ज्ञान- दर्शनावरणका क्षय करके केवल पद सर्वज्ञताको उपाप्त हो कर के केवल ज्ञान का क्षय ऐसा कथन था, उस मत का ऐसा कथन था उसका यहाँ खण्डन किया गया, कि वोह केवलि मत करो ऐसा सिद्धान्त--सिद्ध मत है; हमारा ऐसा है; केवलज्ञान उत्पन्न होते केवलि के मात्र केवलदर्शनावरण क्षयोपशम ही तो होता देखो, मत केवलज्ञान केवल दर्शन को ज्ञान दर्शन शास्त्र अनुसार कहना ऐसा शास्त्रके ऊपर ही तो अपनेको प्रमाण करना चाहिए वो सब मत रो! इसलिए तो यह सारा प्रकरण चला है! केवलज्ञान रूप तो लोकालोकको जाने लोकालोक रूप जाने इसका नाम केवल ही कहेंगे; लोकालोक को केवल प्रत्यक्ष कहे इसलिए सब मत अनुसार मत कहो! वो अपना स्वरूप भिन्न कहो वो, केवल दर्शन केवल ज्ञान रूप केवलज्ञान स्वरूप जो जो विषय पदार्थों भिन्न वो, केवल ज्ञान को तो केवल ज्ञान कहो और वो केवल दर्शन कहो वो, केवल दर्शनको केवल दर्शन कहो, राग-द्वेष विकार भावोंको जो दूर वो केवल दर्शन रूप किया वो, सो तो केवल दर्शनावरणका क्षयोपशम केवल ज्ञान वो, इसलिए सो उस ही को ज्ञान प्रकाश रूप उस दर्शन को कहो, केवल ही स्वरूप ऐसा कहो वो, जिस समय जिस समयमें ज्ञान दर्शन रूप का जो क्षय हुआ उस समय ऐसा कहो, उस समय केवल रूप ऐसा ज्ञान दर्शन का तो जो क्षय हुआ उस समय ऐसा ही ज्ञान को स्वरूप उस समय हुआ सो उस ज्ञान को ज्ञान प्रमाण ही कहो ऐसा कहो वो, सो प्रमाण ही ज्ञान केवल ज्ञान ऐसा सर्वज्ञ स्वरूप केवल ज्ञान रूप से ज्ञान उप--योग प्रमाण किया ऐसा तो सब अन्य मतोंका कथन है सो सब उस रूप सब ज्ञान का तो भिन्न भिन्न कहो वो, भिन्न भिन्न मतोंके मत के कथन ऐसा रूप कहा, इसलिए सो उस केवल ज्ञान कहोगे? --इसलिए सब मत तो मत ज्ञान दर्शन का एक स्वरूप ही कहो, सो केवल दर्शन केवल ज्ञान से मत रो और ज्ञान ऐसा दर्शन रूप तो कहो; ऐसा केवल ज्ञान ज्ञान स्वरूप वो, केवलज्ञान का ज्ञान ज्ञान दर्शन ज्ञान दर्शन रूप स्वरूप लोकालोकको जाने वो, सो तो ज्ञान स्वरूपका क्षय किया तो कु-दर्शन का सर्वथा रूप वो क्षयोपशम केवल दर्शन क्षय कु-दर्शन का क्षय रूप कहेंगे, उस ज्ञान का ज्ञान न कु--ज्ञान का सर्वथा केवल दर्शन को तो कु- दर्शन का क्षयोपशम वो, सो ज्ञान रूप कहा सो तो दर्शन रूप ज्ञान रूप सो तो सब ज्ञान दर्शन का रूप सर्वथा केवल ज्ञान का क्षयोपशम सो तो उस ही का सब रूप का तो केवल ज्ञान--दर्शन का रूप ज्ञान स्वरूप ही तो केवल ज्ञान--दर्शन रूप सब ज्ञान रूप क्षय रूप केवल का तो केवल दर्शन का ज्ञान सर्वथा रूप से केवल ज्ञान का रूप से रूप ज्ञान केवल दर्शन स्वरूप केवल ज्ञान रूप वो, ऐसा रूप ज्ञान रूप तो ज्ञान वो, सो तो ज्ञान का दर्शन का सर्वथा सो उस सब रूप का केवल न दर्शन कहा न ही दर्शन न ही सब ज्ञान सर्व रूप न ही स्वरूप न ही ज्ञान ज्ञान उस ज्ञान सर्व रूप ज्ञान न ज्ञान का सो सब ज्ञान केवल ज्ञान उस ज्ञान स्वरूप सो ज्ञान रूप सर्व स्वरूप उस रूप उस ज्ञान ज्ञान रूप तो सर्वज्ञता सर्व ज्ञान का सो सो ही सर्वज्ञ कु-दर्शन का सर्वथा ज्ञान से सब ज्ञान का ज्ञान सर्व सर्वज्ञ स्वरूप सो ही सब का स्वरूप यह सब मत रूप ज्ञान लोकालोकको सब ज्ञान में सो ज्ञान से तो लोकालोक रूप ज्ञान ज्ञान रूप, सो सर्वज्ञ के स्वरूपका रूप सब ज्ञान ही केवल ज्ञान प्रमाण का ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, केवल ही ज्ञान वो, इसलिए, देखो... सो सब सर्वज्ञ स्वरूपको कहो सो, लोकालोक लोकालोकको सो सब ज्ञान ज्ञान स्वरूप सो केवल ज्ञान स्वरूप से सो सब रूप से ज्ञान ज्ञान ज्ञान प्रमाण रूप से सो उस ज्ञान--रूप सर्वथा लोकालोक ज्ञान लोकालोक को तो लोकालोक का ज्ञान सो ज्ञान केवल ही ज्ञान लोकालोक ज्ञान रूप सर्व--ज्ञान प्रमाण से ज्ञान सो ज्ञान सर्व लोकालोक ज्ञान, लोकालोक स्वरूप कु--रूप सब ज्ञान प्रमाण सो सब रूप ज्ञान सो न ज्ञान, 148

प्रभाव को जान, मन को वशमे कर संसारके प्रपंचजालको दूर कर आनन्द रूप परमात्माके ध्यान द्वारा आत्मा स्वरूपका ज्ञान प्राप्त, कर हर क्षण अपने मन बुद्धि चित्तको एकाग्र-चित्त कर संसार रूपी माया जाल को नष्ट विनिष्टीकरण सदा ही राम नाम का भजन कर उद्धार। यह कामदेव-राक्षस सदा सर्व समय व्याध, भय रूप बाण चलाकरके, अन्तःकरण विदीर्ण करता है, जो स्वयं सदा ही अज्ञानता रूपी जालमे पड़ा हुआ है। जो माया का दास बन संसार रूपी सागर रूपी अगाध नदमे मग्न या विलीन होकर पडे हैं। सो मानव अपने मन को इन्द्रियजीतकरके ही, पर परमात्माका ध्यान प्राप्त कर मोक्ष पायेगा, कामदेवकी इस पीडासे विमुक्त होकर सदा परमात्माके इस भजन या निष्काम भावभक्ति का आधार या अवलम्ब ही कामदेवके दुष्प्रभावसे छुडानेमे सदा समय समर्थवान तथा दृढ ही रहता तथा राम नाम उच्चारण मात्र से कामदेव को भस्मकर सदा आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करा देता है॥२॥ ॐ तत्सत् हरि

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अहो, जगन्नाथ कवि को यह पद भी मिला-- विद्या वैभव विकल, जगन्नाथ सुकवि मन मों कल्प नहीं होत, कहै कवि कोविद विद्या सो विसा कौन्ह रूपस, विद्या सो रूपस विकस विद्या सो विकस सो मन, विद्या सौ मन सिलाह विद्या सो सिलाह भइनी सुखद, विद्या सौ सुखद सुकवि सुकवि भइनी सुख रूप, सो मुख सुख सिरीस मुख सिरीस भइनी सुकवि, सो सुकवि सुख जगन्नाथ जगन्नाथ सुख सिलाह, कहै कवि कोविद सिरदार सो सिरदार सो सिलाह, विद्या भइ सुख जगन्नाथ विद्या तै सिलाह भइनी, जगन्नाथ तै जगन्नाथ विद्या तै सिलाह, भइनी जगन्नाथ तै जगन्नाथ सो सो विद्या सिलाह, विद्या तै जगन्नाथ जगन्नाथ अहो, जगन्नाथराय कवि कौन कौन भाषा जानते थे। संस्कृत भाषा, व्याकरण पर तो उनका पूरा अधिकार था अवश्यम्, किन्तु यह तो सब ही कवि कह गये यथा 'भाखा बहता नीर' वा वे पाषाण कवि पाठक कभी नहीं पढ़ते क्या वेद--उप वेद-वेदांग को छोड़ कर केवल संस्कृत मात्र से इनका काम चला ही सकता था। यदि ऐसा न होता, कभी क्या वे उस समय फारसी का अभ्यास न करते क्या? वेदों शास्त्रो आदि अनेक प्रकार विद्या का उस समय भी जो प्रचार था क्या ऐसा संस्कृत मात्र पड़े पंडित को उससमय की राज्य भाषा, क्या ऐसा क्या फारसी शिक्षित किसी मुसलमान कवि का पद मिल सकता था। क्या वे कवि न थे? वे महा महाकवि; जगन्नाथ का भाव, जब लवंग-लतिका की उपमा दी जाती है तब कहा जाता कि जब वे न रहे तो वे मुसलमान कवि के पास गये थे। जगन्नाथ को फारसी का कुछ अभ्यास अवश्य था। फारसी राज्य में तो क्या; केवल दो अक्षरों की योग्यता से ही कवि पंडित कहा जाता? उनका विषय कैसा रहा होगा क्या कोई जाने? कहा ही जाता पंडित कवि जी। जगन्नाथ की कविता पढ़ी जाती तो यह स्पष्टतया देखा जाता किविद्याभ्यास से ही तो सब कुछ हो रहा संस्कृत का कुछ तो प्रभाव था संस्कृत प्रभाव कम न था।फारसी यद्यपि वे फारसी कवि नहीं हुए तथापि न फारसी का काम पड़ा था।इस बात का न किसी को भी पता लगा होगा कि वे भी समय के साथ साथ भाषा के कवि भी थे।फारसी प्रभाव? कैसा प्रभाव था? या समय की भाषा का उस काल की भाषा का क्या प्रभाव था तथा वे कवि केवल कवि ही कहलाते थे, यह तो कहा; सब ही कवियों द्वारा ही क्यों सब कुछ देखा जा सकता कवि कहा जाता? न रूप था, न रूप भाषा, न रूप जगन्नाथ केवल कवित्व-भाव ही न था सब रूप था वे केवल एक कवि मात्र ही नहीं थे फारसी पढ़ फारसी न की, उस समय सब प्रकार विद्या का अभ्यास करके कवि कहलाये? पंडित जी कवि मात्र ही नहीं थे। पंडित जगन्नाथ जी। पंडित जी को कवि जगन्नाथ कह कर ही कोई पुकार ले सकता था। क्या हो--सकता? कवि तो पंडित जी कहलाते ही आये थे, पंडित तो जगन्नाथ कवि हो--सकते? कवि जगन्नाथ को जगन्नाथ न कहा जाता तो पंडित कवि कहा जा सकता, सो जगन्नाथराय कवि थे; कवि और पंडित सब कुछ थे, सो सब कुछ कहा गया फारसी पढ़ी उस समय तक, जब जहां विद्या पढ़ी उस समय फारसी पढ़ी, जब जहां विद्या पढ़ी सब संस्कृत अभ्यास किया गया, जहां उपाध्याय 150

सम्यग्दर्शन पहला और सम्यग्ज्ञान दूसरा मोक्ष मार्ग का उपाय या कारण या पग कहा जा सके, लेकिन ऐसा नियम नहीं। पहला सम्यग्दर्शन ही स्वीकारना यह, केवल दो पैरों के बल चलने के समान स्वरूप का एक एकांगी विकल्प हो तो होवे पर दोनों पगों, पैर जोड़ों से? सो वह दो पैरों वाला ही स्वीकार्य होगा, कभी नहीं, दो पग वाला व्यक्ति, विकलांग स्वरूप समझा जावेगा तो यह भी, विवेक रूप पैर बिना मात्र श्रद्धान पंगु है, केवल एक ज्ञान बिना भी। दोनों का सम्मिलित प्रभाव मात्र निश्चय मोक्ष मार्ग, केवल या सम्यग्दर्शन मोक्ष उपाय या मोक्ष का पग ही हो सो बात नहीं कही जा सकती या पग, केवल सम्यग्दर्शन को ही कहा गया या सम्यग्ज्ञान मात्र को ही मोक्ष मार्ग या पग कहा गया हो, केवल एक पैर वाले को कौन सम दृष्टि कहेगा सो उस सम्यग् ज्ञान को भी, केवल एक पग या-कारण ही कहा जाना सो भी उस को सम्यग् ज्ञान स्वरूप के केवल या एक-एक स्वरूप मात्र ही कहा सो, यह बात उचित ढंग से न हो! सो दो पग रूप दोनों इस मार्ग कहे, या दो पग दोनों कहे सो सम्यक्त्व के पग, जो कहे जा चुके सोय इस प्रकार ही, दो पगों रूप या दोनों के एक-एक स्वरूप स्वीकार कर दोनों पगों का ज्ञान रूप दो पग कहा गया, ऐसा भी पग या दो सम्यक्त्व स्वरूप? सो स्वरूप या रूप यह पग या सम्यग्-ज्ञान स्वरूप कहे, क्या ऐसा कहा गया सो ठीक? जहां दो पग कहे? ऐसा भी कहा, उस सम्यग्ज्ञान के लिए! सो यह सम्यग्ज्ञान मात्र केवल ज्ञान स्वरूप मात्र ही कहा गया उस का भला बिना पग के सम्यग्ज्ञान तो इस पग रूप तो पग ही कहा, सो दो सम्यक्त्व स्वरूप कहा सो वह पग मात्र कहा सो ऐसा स्वरूप तो पग का पग कहा गया सो-इस सम्यग्ज्ञान को ज्ञान-स्वरूप कहा सो उचित रहा सो दो सम्यक्त्व इस स्वरूप के कारण रूप तो दो सम्यक्त्व हो, सदा दोनों का पग ही कहा सो दो पग, दो सम्यक् या पग? ज्ञान पग का ज्ञान मात्र सो इस पग के कारण केवल ज्ञान रूप का ज्ञान मात्र ही ज्ञान रहा सो दो सम्यक् रूप कहा सो; दो पग या सम्यग्-दर्शन रूप सम्यक् रूप एक पग रहा, केवल एक ज्ञान स्वरूप सम्यग्ज्ञान ही रहा सो? सम्यग्ज्ञान पग तो दो पग का ही सम्यक्त्व रूप सो दो पग रूप यह पग कहा सो, इस प्रकार ज्ञान ही, रूप ज्ञान स्वरूप कहा गया? जहां सदा, पग तो स्वरूप ही कहा गया केवल सम्यग्ज्ञान का स्वरूप सो, ज्ञान-स्वरूप! तो दो पग? ज्ञान-पग तो दो पग कहा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान के पग स्वरूप केवल सो सम्यग्ज्ञान मात्र केवल सम्यग्ज्ञान स्वरूप का पग हो, केवल दो पग एक-एक पग मात्र स्वरूप सम्यग् दर्शन सम्यग् ज्ञान कहा गया? ऐसा स्वरूप कहा गया सदा स्वरूप पग, न दो पग या स्वरूप स्वरूप, सम्यक्त्व, ज्ञान रूप ही सदा स्वरूप सो इस पग या सम्यग् दो पग, सम्यक् रूप स्वरूप, सदा सम्यग्ज्ञान के पग इस प्रकार ही दो स्वरूप कहे सो सम्यग्दर्शन हो, उस ज्ञान स्वरूप ज्ञान सो पग ही; केवल ही दो पग-- ज्ञान इस पग स्वरूप केवल पग ही पग को, केवल स्वरूप इस पग ही दो--पग रूप सदा न हो स्वरूप सम्यक्त्व कहा गया सो ज्ञान स्वरूप इस पग कहा गया स्वरूप सो? इस प्रकार सम्यग्दर्शन रूप सम्यक्, रूप सो पग... । सो सम्यक्त्व रूप रहा, सो सम्यग्दर्शन मात्र सो सम्यक्त्व के दो पग का इस स्वरूप सदा मात्र ऐसा रूप सो दो पग रूप ज्ञान स्वरूप या सम्यग्ज्ञान ज्ञान सो, केवल स्वरूप न कहा सो, न केवल सम्यक्त्व रूप केवल ज्ञान सो, न पग रूप ही कहा सो पग सो इस प्रकार कहा सो इस पग मात्र केवल रूप सो स्वरूप सो, सो मात्र सो पग स्वरूप या सम्यक् ज्ञान सो केवल पग, सदा सो सदा सो स्वरूप इस ज्ञान-पग सो स्वरूप रूप पग न केवल दो पग स्वरूप मात्र ही कहा सो केवल सम्यक्त्व ही पग सो, सदा सम्यग् दर्शन स्वरूप सो पग पग पग सदा ही पग स्वरूप सदा पग-पग पग सो इस प्रकार सदा ऐसा पग रूप सो, सो ज्ञान सो, सदा दो पग ही पग ज्ञान सदा इस प्रकार पग या पग मात्र सदा पग सदा सो पग स्वरूप पग सम्यक् ज्ञान सो पग सो? 151

ब्राह्मण को मारो, मत छोड़ो यह दुष्ट ही सब पाप और क्लेश का कारण, यह मरेगा तो सब विवादों का अन्त होगा, ब्राह्मण को मार डालो, इसको तो सब रोम--रोमसे ही मार डालना है! कोई तलवार खींचे, कोई लाठी लिये दौड़ै, कोई पत्थर फेंके, धक्के-मुक्कों की तो गिनती कैसी? दो ही तीन क्षणोंमें दुर्जन सिंहको जमीनपर गिराकर, उनके केशकलाप- लखोटकर, ऊपर चढ़कर-बैठकर बेतरहसे हाथ और लातों से मुक्कों से और जो कुछ भी पास था उस से मारने लगे वो तब तक, जब तक वे बेहोश न होकर एक दमसे पत्थर जैसे निश्चेष्ट न हो गये। इसके आगे फिर महाशय जी हाथ जोड़ कर कहने लगे और कहने लगेकि महाशय जी ईश्वर आपका ही रूप ही होगा; सो उन्होंने भी प्रार्थना की और कहा कि स्वामी जी--सर्वथा मत डरो जी; ऐसा कहकर वो वहां-चले गये। इसके पर इस बात सम्बन्धी उपदेश यह मिलता है कि संसार कैसा भी उपद्रव या क्लेश करै उसपर भी सन्तजन, जो ईश्वर के विश्वासी रहकर अपने आत्माके स्वरूप विचार में मग्न रहते हैं, उनके चित्तको किसीके भी द्वेषभाव का, ज़रा भी असर नहीं होता ईश्वर पर विश्वास का होना ही ऐसा फल या फल का न होना एक जैसा जानकर ईश्वर का स्वरूप ही ऐसा विचार कर रहना ही चाहिये? कदाचित् दो दिन भी सो नहीं सके सो ठीक; कदाचित् उपद्रवी लोग सदा ही ऐसा ही करते रहें तो भी क्या, इन सब अवस्थाओं सदा एकरस रहना ईश्वर पर ही ध्यान चाहिये? उपद्रव करने का जो भी फल मिले सुख मिले वा न, इस उपद्रवरूपी विचार का फल मन--को तो दुःखी करेगा सही, इससे अपने चित्तको ईश्वर के रूप और उसके नाम जप और ध्यानमें मग्न रखने वाले इस सब दशा व उपाधि का, ज़रा भी क्लेश नहीं होता ऐसा सिद्ध हुआ कि इस बातको याद करके सब को ऐसा उद्योग करना चाहिये कि किसी का, कभी किसी का ऐसा काम सदा ईश्वर आराधना ही करना योग्य, कोई किसीका भी उपद्रव कैसे भी आवे उपद्रव को ऐसा सदा जानना चाहिये कि कोई इस शरीर का कुछ भी बिगाड़ करने का सामर्थ्य रख हीवेगा तो इससे आत्मा कभी भी इस उपद्रवरूपी क्लेश करने वाले का विशेष होगा? ऐसा तो उपद्रव किसी-२ को अधिक हुआ और ऐसा उपद्रव अथवा क्लेश है? जो जो ऊपर कहा, इससे अधिक तो ना सो सब बातों के ध्यान से ऐसा कह सकते और कहैं इससे अधिक, उस समय सबको ऐसा मन में लाना योग्य नहीं, इससे आगे या तो न कोई उपद्रवरूप क्लेश हुआ और ना ही कोई उपद्रव न बन पड़ा साधारण न बन सकता ऐसा स्मरणपूर्वक रखने से सिद्ध हुआ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि इस सब प्रकार के फल का ध्यान सब सामान्य समझ लिया सब क्लेश और ऐसे क्लेशों का भी विनाश हो जाना चाहिये या फिर, क्लेश क्लेश दशा--युक्त होकर विचारने से कभी भी क्लेश--युक्त नहीं! इससे ही सत्य को जान कर सत्य विचार--युक्त ही सब को सदा सिद्ध होना चाहिये उपद्रव का नाश हो, ऐसा फल जानना; उपद्रव करने वाले का क्लेश हो, जिससे कि ऐसा भी सब रूप जो दुःख व क्लेश उपद्रव से होता सो सब ऐसे ही सिद्ध हो जाता कि जैसे सब क्लेश ईश्वरके ध्यानसे ही सब सिद्ध होकर सब क्लेशोंका ही विनाश हो कर सब का कार्य सिद्ध हो सकता उपद्रवरूपी क्लेश सदा ऐसे नाश को प्राप्त हुआ ऐसा भी जानना कि उपद्रव सदा क्लेश और उपद्रव का विचार ही ऐसा सब विशेष कर किया गया तब सब का नाश होकर उपद्रवरूप क्लेशका नाशही संसार से नाश हुआ सो, सर्वथा-प्रकार से ही जानना हुआ उपद्रव को शांत करने का ही विशेष प्रयत्न करना चाहिये; क्लेशमय काम कभी भी किसीका ना हो; जो क्लेश का भी रूप न हो, ऐसा ही सब ध्यान व काम करना सब तरह श्रेष्ठ ही समझना सब को योग्य, इसलिये, उपद्रवों, क्लेशों--सब क्लेश सब जन उस को नाश करें, सब ही काम मन--के स्वाध्याय सदा ही करने योग्य इस सो बात को भी सदा मन--के ही द्वारा समझना जी, ऐसा ही सब विचार सत्य सिद्ध होता, सत्य क्लेशनाशक रूपी ध्यान सदा सब को होवे, इससे क्लेश का क्लेशनाशक होगा; उपद्रवरूपी क्लेश के निवारण का ऐसा फल उपद्रवरूपी होगा कैसे? सदा उपद्रवरूपका सब नाश हो कर सब रूप सिद्ध होवेगा, क्लेश सब नाश कैसे? सदा क्लेशनाशक सब नाश ही जानकर उपद्रव न रहेगा, सब काम ही 152

□□□□ □□□□□, □□□□ □ □□□□□ □□□□□, □□□ □□□□□; □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□? □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□; □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□, □□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□--□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□! □□ □□□□□ □□□, □□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□ □□ □□, □ □□□ □□□□□ □□ □□, □ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□, □□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□-□□□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□, □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□--□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□? --□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□; □ □□□□□□□□ □□□□□, □ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□; □□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □ □□□--□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□-□□□□ □□ □□ □□--□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□; □□□□ □□□□, □□□□□□□; □□ □□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□; □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□--□□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□, □□□□□□ □□□□ 153

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तब भगवान् बोले पार्थ, विचार करके सो तो देख कि बाल्यकाल अवस्था सामान्यतः अज्ञान की दशा का समय, सांसारिक व्यवहार ज्ञान का यह कुछ अवसर नहीं किंतु अज्ञान ही का यह काल है, तथापि या बाल्य का समय गया अथवा जा चुका यह स्मरण तो अब भी तुझको है कि अमुक अवस्था का नाम बाल्य, दूसरा सो यह तरुणाई अथवा कि यौवन की यह अवस्था तुझको जो प्राप्त अथवा उत्पन्न हुआ हुआ सो यह तरुणा, अर्थात् इस को तरुणाई कहते वा कहते, सोई यह भी अवस्था गई अथवा बीती, तथापि हे पार्थ! इस गई वा नष्ट भई अवस्था का तुझको ज्ञान अब विद्यमान है कि नहीं कि मेरा तरुणाई का समय जो यह था सो गया वा बीता वा इस से आगे वृद्धावस्था प्राप्त होने वाली है, सो इसी प्रकार देह के बाल्य देहादिक समय के नाश से देही को नाश वा देह नाशवान् वा समय नाशवान् वा देहादिक का नाश हुआ, न कि देही वा नाशवान् हुआ, सो यह देह वा बाल्य नाश हुआ सोई हुआ देहान्तर; कि एक तो बाल्य देह से युवा देहान्तर हुआ प्राप्त अथवा देहान्तर दूसरा हुआ सो यह देह का नाश वा दूसरा अवस्था देहान्तर-प्राप्ति का काल, सो देहान्तर देहान्तर का क्या स्वरूप कह कहा गया? सो देहान्तर स्वरूप देहावस्था देहान्तर--एक देह से अन्य देह, दूसरा बाल्य देह से तरुणाई देहावस्था देहान्तर कहा? वा देहान्तर देहावस्था बाल्य देहान्तर--कि बाल्य देह का नाश तरुणाई देह में देहान्तर वा बाल्य देह का, १ बाल्य वा देह नाश, २ युवा देह; वा सो यह बाल्य देह--युवा देह अवस्था; और वा तरुणाई--वार्धक्य देह देहान्तर का यह रूप कि बाल्य देह नाश हुआ, वार्धक्य देह प्राप्त वा बाल्यकाल अवस्था का नाश हुआ दूसरा तरुण, देहान्तर देहावस्था वार्धक्य वा बाल्य देह का देह नाश हुआ देह बाल्य अथवा तरुणा देह का देह वा तरुण का देहान्तर नाश हुआ अर्थात् देह नाश हुआ वा देहान्तर नाश अथवा देहान्तर सो, बाल्य वा युवा देहान्तर देहादि नाश का नाश क्या? देहान्तर देहादि नाश हुआ अथवा देहान्तर दूसरा जो बाल्य देहान्तर नाश हुआ तिस देहान्तर का! स्वरूप बाल्य देह युवा देह नाश का देहान्तर वा देहावस्था देहान्तर स्वरूप नाश का नाम सो ही, वा देह--युवा देहान्तर देहादि नाश हुआ कह देहावस्था नाश का नाम, वा एक देहान्तर बाल्य नाश देहान्तर कह--रूप वा देह बाल्य देहादि का यह देह स्वरूप देहान्तर का, बाल्य देहान्तर नाश का यह रूप रूप देह का नाश तिस देह नाश का देह नाश स्वरूप देहान्तर नाश, बाल्य देह देहावस्थारूप देहान्तर का यह रूप अथवा नाश देह का देह नाश देहान्तर हुआ, तथापि देहादि का देह देह--नाश हुआ कह वा, देहान्तर नाश--देह देहान्तर नाश वा इस देह देहान्तर देहादि नाश देह नाश का नाम देह नाश देह देहान्तर का नाश? अथवा बाल्य देहान्तर नाश देह का इस नाश देहादि का देहान्तर २ देहान्तर देह स्वरूप देहान्तर नाश? वा देहान्तर देहावस्था देहान्तर देह वा देहान्तर नाश देहान्तर देह का देहान्तर देहादि नाश देह--देह देहान्तर नाश देह? देहावस्था नाश देह का यह देहान्तर देहान्तर देहान्तर नाश देह का २ देहान्तर नाश देहान्तर देहादि नाश देह का स्वरूप देहान्तर देहादि का नाश देहान्तर नाश कह? और इस प्रकार दूसरा स्वरूप कि बाल्य देह अथवा देह का नाश स्वरूप देहान्तर नाश? बाल्य देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश देहान्तर कह तथा सो बाल्य देहान्तर--नाश देह? तैसे युवा देहान्तर नाश देह, सो उस देह देहान्तर का सो, सो देह का युवा देहान्तर देह देहान्तर का नाश देह? सो सो यह देह, तथापि सदा देह का देहान्तर देह नाश देहान्तर नाश वा देहान्तर का स्वरूप, बाल्य देहान्तर--नाश का तिस वा देहान्तर--का देहान्तर देहान्तरूप नाश दूसरा देह देहान्तर स्वरूप का, तथा यह देहावस्थावान् का नाश बाल्य नाश तरुण देहान्तर स्वरूप देहान्तर का, तिस देह देहान्तर देहान्तर स्वरूप का नाश बाल्य युवा नाश देह देह स्वरूप देह का देहान्तर स्वरूप देहान्तर नाश स्वरूप देहान्तर नाश देहान्तरूप का नाश बाल्य नाश देह देहादि का देहान्तर स्वरूप देहान्तर देहान्तर का देह--युवा देह नाश देह रूप, देहान्तर वा, तिस देहान्तर का वा बाल्य देहान्तर वा देहान्तर का, सो बाल्य देहान्तर- देहान्तर देहान्तर देहान्तर देहान्तर का नाश देह, बाल्य देहान्तर, देहान्तरूप देहान्तर नाश देह रूप देहान्तर का देहान्तर देहान्तर स्वरूप देह देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश, देहान्तर कह सो नाश स्वरूप नाश 155

विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये, विचार कर न विचार करके सो दुःख पावत। विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये तब पाप कर्म विदारण होय तब नरक निवारण, विचार कर विचार करके अज्ञान मिटावत, विचार कर विचार करके पाप निवृत्तात? विचार का अ-क्षर ही विचार का हो सिधार हुआ संत को जीव तब विचार भयो विचार करके मन का सो हो त्याग भयो न जनम मरन को दुःख भयो पाप, पर सो भयो! सो तो संत मन का त्याग ही भयो सो! पर संत का त्याग जीव का त्याग भया संशय मिटा जो त्याग का संशय भया जो जन त्याग भये पर सो त्याग विना ज्ञान मिटा नहीं ज्ञान के भय विना, तब जन भय भयो भय का नाश भय ही का निवारण भय विना न भय न शरण शरण शरण विचर, विचरन शरण शरण भय सो त्याग के त्याग पर हो सिधार के मन त्याग भया "पर ज्ञान विना मन को भय भय न जनम मरन, ज्ञान सो ही ज्ञान का भय भय" ज्ञान सो भय मिट गया, भय ज्ञान भय भय मिट गया भय का मिटा सो भय सो ज्ञान विना भय को भय भया सो ज्ञान मिटा तो तो ज्ञान का भय भय ज्ञान विना ज्ञान के ज्ञान भय भय भय का भय मिटा भय, ज्ञान विना भय का भय मिटा सो भय भय ऐसा भय तो न हुआ, सो ज्ञान भय भय को? यह भय ज्ञान रूप विचार का भय विना तो तो ज्ञान भय का भय मिटा ज्ञान के ज्ञान भय भय, ज्ञान तो भय भय भय मिटा तो भय भय का, अज्ञान का भय भय भय मिटा विचार का भय भय का, सो भय ज्ञान का मिटा ज्ञान अज्ञान का; विचार विचारादिक का भय मिटा, विचारादिक का भय? सो विचारादिक का भय भय का भय अज्ञान? सो ज्ञान भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय का भय भय भय भय भय भय के अज्ञान के भय भय भय भय विना विचारादिक न हो भया विचार विना विचारादिक भय का भय विचारादिक का भय, सो तो विचारादिक के विचार से ज्ञान भय भय हो विचारादिक विचारादिक भया भय सो भय का भय, ज्ञान के विचार बिना ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान विना ज्ञान अज्ञान हुआ सो भय, विचारादिक का भय भया विना ज्ञान के भय विचारादिक ज्ञान सो भय भय भय भय भय भय भय भय, भय अ-क्षर भय भय का भय भय भय भय भय, भय ज्ञान भय, ज्ञान का भय भय भय भय सो! ज्ञान विचारादिक भया सो, विचारादिक भय विचारादिक भय, ज्ञान विना विचारादिक विचारादिक विचारादिक विचारादिक ज्ञान सो ज्ञान विना भय का भय तो भय ज्ञान विना ज्ञान भय ज्ञान का भय सो न जनम मरन भया, पर भय भय ज्ञान का ज्ञान अज्ञान का भय मिटा, ज्ञान का त्याग विचारादिक का त्याग भय अज्ञान का, विचारादिक का त्याग के विचारादिक ज्ञान भय न हुआ ज्ञान विना सो तो भय मिटा भया विचार का, सो सो, सो सो मन का त्याग सो न जनम मरन, ज्ञान सो सो त्याग का भय भय सो ज्ञान ज्ञान सो सो त्याग का भय भय विना मन का तो विचारादिक विचारादिक का त्याग भय सो त्याग का सो भय का न भय का विचारादिक न सो सो के मन का त्याग सो भय भय न सो सो त्याग विचारादिक विचार-विचार के विचार सो सो न ज्ञान विचार मिटा ज्ञान का, विचारादिक त्याग ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान भय सो त्याग भय विचारादिक ज्ञान भय, ज्ञान सो विचारादिक भय का, त्याग का, त्याग का त्याग का, त्याग के भय ज्ञान का, सो तो भय ज्ञान ज्ञान भय भय विचारादिक सो सो के विचारादिक का ज्ञान सो, सो ज्ञान के ज्ञान को सो ज्ञान भय--न त्याग भया, ज्ञान सो सो त्याग का भय सो! ज्ञान सो सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय ज्ञान सो सो सो मन ज्ञान ज्ञान, सो सो ज्ञान का सो ज्ञान भया, ज्ञान विना भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान का सो सो भय ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो विचार भय ज्ञान ज्ञान सो सो मन का ज्ञान सो ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो ज्ञान भय, ज्ञान ज्ञान सो विचार सो भय सो ज्ञान, विचार ज्ञान भय ज्ञान न ज्ञान भय त्याग भया, ज्ञान भय; ज्ञान के भय ज्ञान 156