भारतकोश
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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

भाग 8 (पृष्ठ 141-154)

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इस प्रकार वह सब विचार परस्पर कर ही रहे थे कि इतने में किसी का रोने का भयानक स्वर सुनायी दिया। कौन रो रहा? किसी पर उपद्रव आया क्या? कोई पीड़ा भोगनेवाला प्राणी या विपत्ति का शिकार बना हुआ? सब स्तब्ध होकर उठे, सब साथी उस स्थान पर पहुंचे जहां से वह रोने का स्वर सुनायी दिया, देखकर वे अवाक रह गये कि उनका साथी चन्द्रदेव न वहां था न उस वन में था और न उस वृक्ष पर जिस नीचे सभी साथी एकत्रित हो रहे थे। सब कहने लगे कि यह भयानक चीत्कार हमारे उस देश- दूत साथी का था, उस समय चन्द्रदेव का निवास उस भयानक वन में नहीं था जहां वह विचार कर रहे थे। सभी साथी अब विवश थे। चन्द्रदेव तो जब वन में गिरा था तो उस समय वह कुछ समय ले--टा रहा। होश में आते ही वह उठने लगा, देखा कि भयानक अन्धेरी निशा थी, विशाल वृक्ष आकाश चुम्बी खड़े थे, जिनमें घने पत्ते तथा फूल लदकर सघनता फैला रहे थे। इसके अतिरिक्त वनस्पति का विस्तार इस प्रकार फैला हुआ था कि पग धरने का मार्ग नहीं था, पर जाना तो उस दिशा में था जहां से प्रकाश की किरणें आ रही थीं। उसने देखा कि कोई-सा दीपक दूर चमक रहा था। उसने मार्ग न पाकर, या मार्ग खोज-खोजकर आगे कदम बढ़ाना आरम्भ कर दिया। वह जहां-जहां मार्ग खोज रहा था वहां-वहां कांटे तथा हिंसक पशु विचरते दिखाई दिये। कांटों ने उसके तन को बींधना आरम्भ कर दिया था? पग-पग आगे बढ़ने लगा। पग-पग पर उस भयानक झाड़ी में, जहां-जहां भी पांव पड़ता था वहां-वहां कांटे ही कांटे पग में चुभते थे। अपने पगों में से कांटों को निकालने लगा। जहां-तहां से रक्त बहने लगा था। इन कांटों से व्यथा बढ़ गयी, शरीर का रोम-रोम, केश-केश पर भी पीड़ा व्याप्त होकर टीस उठने लगी, तभी, उसने उस कांतारमय वन में कह दिया! कोई दया करो मुझ पर। इस वन में सब प्रकार संकट झेलता हुआ मैं निराधार होकर पड़ा हुआ हूं। कोई तो आ कर मुझको इस वन से निकाल कर मेरा उद्धार कर दो, हे दयावान्! कृपा करो मेरे ऊपर। इस संकट से मुझे बचाओ! उस का यह रोना-चीत्कार, इस वन में सब ओर गूंज उठा। सब ही विह्वल हुए, कांप-कांप उठे, पर आ न सके। क्योंकि वे सब अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। पर चन्द्रदेव विवशता से रो रहा था। सुनो! कोई दया का भण्डार दयालु बन कर आ जाओ! इस भयानक कांतार वन से मुझे निकालो। मुझ पर दया कर इस संकट से मुझे बचा लो। चन्द्रदेव कहता था? मुझ पर कृपा करो, मुझे इस भयानक कांतार से बचाओ! सब कह रहे थे, तू अपना धीरज न छोड़ना! कोई न कोई शक्ति इस ओर आ ही रही होगी! वह सब ही चन्द्रदेव का सहारा बनने का यत्न कर रहे थे! वे सब ही चन्द्रदेव को दिलासा दे रहे थे। चन्द्रदेव की पुकार तो किसी पर प्रभाव नहीं डाल सकी, वह तो कांतार वन के संकट को और भी बढ़ा रही थी। चन्द्रदेव को तो कोई शक्ति उस वन से पार नहीं कर सकी! सुनो! सुनो! उस चन्द्रदेव का यह सब कुछ तो व्यर्थ प्रतीत हुआ, वह तो मृत्यु के मुख में था। "ओम्" का नाम सब कुछ-कुछ तो कह रहे थे, चन्द्रदेव के मुख से... न निकला था! चन्द्रदेव पुकार किसे रहा था? जिसने उस वाणी को जन्म दिया था, उस प्रभु को? अथवा अन्य जीवों को? उस अज्ञान को? उस अविद्या की शरण को? उस भयानक अन्धकारमय वन में जब वह, उसी समय भयंकर अन्धड़ का एक तेज झोंका आया उस भयानक वेग से वन कांपने लगा था कि भय से चन्द्रदेव कांप उठा। साथ ही तेज वर्षा होने लगी। ओलावृष्टि से वह पीड़ित होने लगा। वर्षा की मोटी-मोटी बूंदें उस पर पड़ कर पीड़ा बढ़ा रही थीं, बिजली की कड़क अलग थी, अन्धेरी निशा तो थी ही। उस पर भयानक वज्रपात भी होने लगा था, जिससे उसका हृदय कांप उठा। ऐसा लग रहा था कि अब मृत्यु आ ही गयी, वह अपने को असहाय पा रहा था। वर्षा, अन्धड़, बिजली-कड़क तथा ओलों ने उस पर भयानक मार की। उसने उस संकट में एक वृक्ष का सहारा लेना चाहा, तो वह वृक्ष भी वर्षा से भीग चुका था, उससे जल की धाराएं उस पर गिरकर उसकी व्यथा को और भी बढ़ा रही थीं। उसने उस अन्धकार में चारों ओर दृष्टि डाली, पर कोई भी ऐसा न था, जो उस का सहारा बने। वह रोता-चिल्लाता हुआ अपने प्राणों की रक्षा के लिये पुकारने लगा। तभी उसका ध्यान उस दीपक की ओर गया, जो बहुत दूर चमक रहा था। वह उस ओर देखने लगा, पर जब वह देखता, तभी घोर अन्धकार छा जाता और वह घबरा उठता था, क्योंकि वह 143

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छवि में दिखाई देने वाले स्वरूप का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:

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इस प्रकार महाराज पृथुकी यह बात सुनकर सब सभा विस्मित होकर श्री राजा पृथुकी-बड़ाई बड़े प्रेम करके बारम्बार कहने लगी, कि जिसने अपनी प्रजाको सब सुखीकिया सो तो सब जगत् जानता हैपर यह बात, सब प्रजा जिसपर प्रसन्न रहे यह गुण इस महाराजहीके विषे पाया जाता, इससेअधिकक्याकहें जिस बातपर प्रजा प्रसन्न हो सो बात महाराज प्रजाको सुख देनेवाली विचारके करें इस प्रकार सब राजाके गुण गातेथेकि इतनेमें चारों सनकादिक मुनि आये सो ऐसे प्रकाशित मानों चार सूर्य्यही उदय हुएहों अथवा ब्रह्माजी के चार वेदही मूर्त्तमान हों, उनको इस प्रकारसे आये देख राजा पृथु-सहित जितनी सभाथी, जितने लोग वहांपरथे वे सब उठकरके खड़े हुए और हाथ जोड़ करके जो वस्तु भेंट धरने की योग्यथी सो हाथमें धरके चरणोंपर दण्डवतकी और कहा, हेप्रभो ! कहो कैसे? हम पर कृपा करके आयेहो सो कहो, महाराज कहिये, कुशल तो आपकी? मुनिबोले कि कुशल तो सर्व, प्रजा अपनीपर जो तू दयाल रहताहै! कुशल हमारी, जहां तुम्हारी कुशल? सो कहो सब प्रकार कुशलहै? राजा पृथुबोले सब प्रकार आपकी कृपासे कुशल? सो कहिये महाराज! सन मुनिका रूप जब यह सुना, राजा तो सब बातन योग्य, सो महाराज को! राजा पृथुकी प्रसन्नता देखके; राजा पृथुके आसन बैठके सनकादिक चार भाइयों को बिठाये; फिर राजा जो पृथुके संग आये राजा मुनियोंके चरनामृत को अपने सिर पर डारके फिर हाथ जोड़के सन मुनियों के आगे खड़े! हाथ जोड़, राजा यह बोले? प्रसन्न हो गयेहो? यह कहके दोनों कर जोड़े खड़ारहे! तब सनक जी बोले, हेराजा बहुत प्रसन्न होकर हम आयेहैं सो महाराज तुम्हारी भक्ति से प्रसन्नहैं सो तूने जो, ऐसा राजा हो कर मुनि जनन का मान किया सो सब बातन योग्य यह महाराजा का धर्म सो सब पूर्ण, पर हम यह जाने हैंकि जो ज्ञानी होय और सब जीवों पर दयालहो सोई राजा सब को सुख दाता होय, सोई राजा तू, पर हमपर कृपा जो करी सो बातन योग्य हैपर, तू ऐसा राजा दयाल सब प्रजापर; जो अपने सेवक जनपर दया राखै, अपने-आपपर भी दया राखै कृपाका पात्र होताहै सो तू, और सब प्रकार सो समर्थ होकर धर्मके कार्यमें लीनहै! राजा पृथु, राजा सगर. राजा हरिश्चन्द्र, पृथु-महाराज भये सोई, और जो जो बड़े बड़े महाराजा भये सो राजाओं का जो मान करे सो पुण्यात्मा राजा पृथुकी यह सबबातें सन मुनिकी सुनके मुनिको आसनपर बैठायके सब चरण धो, उनके चरनामृत को अपने सिर ऊपर डारके, सब सभा पर छिड़क छिड़काया पृथुकी यह विनम्रता देखकर मुनि बोले, सुनो राजा पृथु, तुम बड़े भाग्यवान् हो, सो भगवान् प्रसन्न भये हैं? सो राजा यह बोले, हे मुनि कृपासे सब बात समर्थ हो सो बातन सामर्थ्य होय, हमारे भाग्य बड़े दया जो आपकी सन मुनि बोले हम सब तो नारायणके भक्त होकर सब जगमें भ्रमण करते हैंपर जो पर दयाल हो सो जन बड़ा सो जगमें सब साधु-संतन को मान देय सोई ज्ञानी भक्त दयाल कहलाय नारायण का सो भक्तकहलाय, सो तू ऐसा दयाल सर्वपर दया, सब पर कृपा करके नारायण चरण को चित्तमें आराधनकिये दयाल भये सोई ज्ञानी सो राजा पृथुके ऐसे वचन सुन, राजा पृथु-सनकादिक मुनि जन सब मुनि को प्रणाम करि हाथ जोड़के अपने हृदय पर हाथ राखके बोला हेप्रभो, जो महाराज आयेहो सो जग तारन... को आयेहो महाराज बात हमारी ऐसी नारायण कृपासे सबबात समर्थ ज्ञानी वैकुण्ठ पधारे मुनि, एक बातन का संशय मोको निवारिये सब बातन को जानिये सब बात को जानने समर्थ हम सब संशयको निवार करके सब संशयको दूरकरो, हमारा संश मिटाइये? जो ऐसा जो सब को जानत सब, सब जानन हार, हमारा यह संशय है? इसका निवारण कीजिये मुने! सनक जी बोले, हेराजा तू, अपना सब संशय कहिये? राजा पृथुने हाथ जोड़ हाथ जोड़के कहा, हेप्रभो संसार की सब माया जगत विषे व्याप रही सोई सब जनन को मोह से बांधे अपने स्वरूपको भूल माया द्वारा भ्रमाये जीवों को संसारमें बांधे, पर, इसका कारण क्याहै? माया तो सब जगमें, माया को कौन जानै सो यह बात सुनो, मुनिराज! ऐसी मायाकी संशय दूरकरो जी, जो-जीव माया को जानै सो कैसे जानै माया व्यापत सब जीव पर यह राजा पृथुकी सुनके सन बोले, जब तू सब जान गया सो सब बातन योग्य जगत का मोह सब संतोंको सो सब मोह को त्याग करके भजे, तब मुक्ति पावैगा सो तू ऐसा ज्ञान रखके माया रूपको भी नारायणकी ही माया जानकरके भजो अब तू मायारहित होकर नारायणको ही भजकरकेसदा सुखी रहै और 145

विचारवान् पुरुष संसारके यावन्मात्र दुःखोंको उसी क्षण भूल जाता है जब अपने प्राणनाथ प्रभुका नाम प्रेमपूर्वक उसके कर्णरन्ध्रोंके द्वारा हृदयके अन्दर पहुँचकर अपना निवास बना... ॥ ओ नाथ! फिर, जब आप स्वयं मेरे पास पधारे तब फिर मुझे किसी भी बात का अंदेशा या संशय भला क्यों हो, इस बात को जाने दो, मुझे केवल यह बता कृपा करो कि इस संसार में जिस बात को सब लोग भला या बुरा कहते हैं वह भला बुरा वस्तुतः है, या नहीं? संसार केवल भ्रम ही भ्रम प्रतीत होता है, प्रभु इस भ्रम को दूर करो जिससे मुझे न संशय रहे, जिससे कि मैं सुखी होऊँ! यह सब बात सुनकर प्रभु ने कहा, 'तात! जो बात प्रभु ने कही वह तो परम रहस्य थी जिसे केवल ज्ञानी पुरुष ही समझ सकते हैं। हे भरद्वाज, इस बातको समझकर जो सो रहा है वह जागेगा कि जो कुछ ज्ञान दृष्टिसे अथवा पंच ज्ञानेन्द्रियों और मन के द्वारा इस संसार विषयक जो कुछ भी रूप रंग या गुण दोष दीख पड़ता, या अनुभव में आता प्रतीत होता ऐसा है? प्रभु बोले? सुनो हे तात, जैसे स्वप्न संसार मिथ्या होता है उस दशा, ज्ञान दशा में सत्य रूप में भास हो रहा है! जाग्रत दशा में ही, स्वप्न दशा मिथ्या हो कर नष्ट हो जाती है। स्वप्नकाल में जाग्रत संसार मिथ्या हो जाता है, जब स्वप्न समाप्त हो जाता तब, जाग्रत! संसार का सत्य रूप सामने उपस्थित! होता है। वास्तव में देखा जाये तो दोनों दशाएं एक-दूसरे को नष्ट कर रहीं हैं! इन दोनों से परे जो आत्मा है, वही सत्य है। वह, आत्माही परमार्थ रूप से सत्य स्वरूप, अपने आपको भूलने पर ही यह मोह या अविद्या रूपी संसार सत्य सा भास होता, जिससे यह प्रतीत हुआ, कि मन ही कारण है सुख या दुःखको उत्पन्न कर देने वाला या बनाने में निमित्त? कदापि! नहिं मन तो केवल एक साधन मात्र ही इस जग प्रपंच को रचने वाला सो यह बात यथार्थ सत्य रूप सिद्ध हो कर प्रकट हुई कि जीव, जिसे भ्रम हो रहा है इस बात का कि वह स्वयं दुख रूप तथा इस बात को भी जान चुका कि आत्मा सर्वदा सुख ही सुख है। सो इस से यह सिद्ध हुआ कि जीव भी भ्रम के कारण इस संसार में या दुःख में फंसा हुआ प्रतीत हो रहा है, जो अविद्या ही का कार्य है। इस लिए केवल आत्म-अनुसन्धान ही, अविद्या को दूर करने का एक मात्र उपाय हुआ अतः सर्वदा-सर्वकाल में, केवल उस एक, अपनी स्वरूप निष्ठा रूपी ही सत्य में ही लीन रहने रूपी प्रयत्न ही सब को कल्याण कर देने के उपाय में श्रेष्ठ रूप सिद्ध हुआ। क्योंकि सुख तो अपना रूप, अविद्या जन्य संशय, भ्रान्ति रूपी इस संसार में केवल भ्रम ही भ्रम दृष्टिगोचर होता रहता है। प्रभु के मुखारविन्द से इस बात को सुन कर सब श्रोतागण अति प्रफुल्लित हो, अपने स्वरूप को ही सत्य समझ, उस ओर ही लीन हुए, सबने ही प्रभुके इस परम रहस्य युक्त वचनकी भूरि भूरि ही सराहना की। प्रभु का कहना था कि अविद्या रूपी भ्रम, मनुष्य जिसके वशीभूत हो कर इस संसार सम्बन्धी, सब बातों को सत्य समझ? के सुख और, दुःख पाता रहता है। वस्तुतः, भ्रम और मन से परे आत्मा रूपी केवल आनन्द ही आनन्द मात्र ही तो है? जब इस बात का निश्चय पूर्ण रूप से मन में दृढ़ता पूर्वक हो गया तो फिर? प्रभु के इस उपदेश से सब लोग जो उस समय एकत्र थे तृप्त होकर परम आनन्द को, प्राप्त हो गये, भगवान् रामचन्द्र जी की जय जय ध्वनि से गगन, उस समय गुंजायमान होने लगा, अनेक प्रकार के वाद्य उस समय बजने लगे! इस प्रकार विचार कर संसार से परे उस परमात्मा को ही सबने अपना जीवन का मुख्य ध्येय बना कर निश्चय किया, सो ही इस संसार में सब बातों से बड़ा कर्तव्य सब जीवों का परम कल्याण कर सकता जिससे जीव मुक्त होकर, परमेश्वर स्वरूप, सनातन स्वरूप, सर्वव्यापक सच्चिदानन्द घन को प्राप्त करने का यत्न कर सके। हे भरद्वाज जी, भगवान् रामके परम पद, उस दिव्य रूप को जो कोई भक्त निरन्तर अपने मन ध्यान द्वारा, प्रेमपूर्वक धारण करता रहेगा, उस व्यक्ति विशेष रूपी सब संसार सागर से पार निकल जाना, केवल भगवान् रामके चरणोंमें ही मन लगाने मात्रसे सहज होगा। केवल दो ही अवस्था हैं संसार में, अज्ञान रूप तो, यह जग है, और एक मात्र भगवान् ही स्वरूप रूपी कैवल्य, केवल रूपी ज्ञानका, ही नाम है। जिस को जान कर मनुष्य मुक्त

इस प्रकार व्यापक स्वरूप आत्मा को जो जानकर उस का स्मरण करता रहेगा, वह सर्वव्यापक प्रभु, उस जीवात्मा साक्षात्कार को उपलब्ध होगा, सो निष्काम हो कर प्रभु सम्बन्धी विचार करके, जो कि सब पाप तथा अन्य प्रकार क्लेशों का नाश करने वाला है, मन तथा सब इन्द्रियों सहित मन, आत्मा सम्बन्धी सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय रस को पान करने वाला होगा सो उत्तम गति रूप मोक्ष को प्राप्तकर्त्ता तथा सर्वव्यापक को ही एकमात्र आश्रय रूप मान कर मोक्ष सुखमय सुख भोगेगा! अब आत्मा शुद्ध है, इस को जो निष्कामभाव साधना करता रहेगा, वह आत्मा का साक्षात्कार करेगा सो, उस का साधन यह, कि जो अज्ञान जनित क्लेशों रूप मलों का निवारण कर उस शुद्ध ब्रह्म रूप परमात्मा को, जो निष्काम होकर सर्व कर्मों का फलदाता परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त है, सो परमात्मा तथा आत्मा सम्बन्धी ज्ञान के विषय विचार में प्रवृत्त होगा, सो ही मुक्ति लाभ करेगा, इस प्रकार का आचरण करेगा, सो ही सुख लाभ करेगा सर्वदा इस ही का आचरण सब को करना योग्य कर्तव्य, सब विद्या का विचार करके मोक्षार्थ--ज्ञान का आचरण सब जन करें॥ सो यह उपासना के रूप ज्ञान द्वारा न ही प्राप्त होता है, यह ज्ञान-कर्म का फल जीवात्मा प्राप्त करता है, इस का भी ज्ञान जीवात्मा द्वारा होना चाहिये सो जीवात्मा के लिये क्या रूप वा गुण जीवात्मा स्वभावतः रखता, जानता वा धारण करवाता; जीवात्मा स्वभावतः अज्ञानवान्, परमात्मा के सदृश सर्वज्ञता का न ज्ञान रखता वा रूप तथा अन्य गुणों का जीवात्मा सम्बन्धी जानता, परमात्मा के समान सर्वव्यापक वा सब प्रकार प्रकाश वा प्रकाशक स्वरूप का प्रकाश वा सब को प्रकाशित करने की शक्ति का रूप जीवात्मा द्वारा प्रकाश स्वरूप का प्रकाश वा ज्ञान हो सके प्रकार का प्रकाश ज्ञान उस को प्राप्त होवे, जो जीवात्मा स्वभाव से विद्या रूप वा अविद्या रूप स्वभाव सम्बन्ध द्वारा प्राप्त होता, विद्या-अविद्या, दोनों-प्रकार रूप अविद्या द्वारा तथा ज्ञान जो कि परमात्मा का स्वरूप उस द्वारा ज्ञान को प्राप्त होवे, तब स्वरूप प्रकाश का ज्ञान या रूप उस ज्ञान का जीवात्मा को, प्रभु की शरण से, उस का स्वरूप रूप विद्या क्या, विद्या-अविद्या, विद्या-अविद्या से युक्त जीवात्मा कब तक? प्रभु की गति को जो सम्मुख कब तक? प्रभु का रूप या नाम या पदार्थ किस रूप में सब तक? विद्या कब तक, अविद्या कब तक ज्ञान से पृथक् हो कर प्राप्त हो कर रहे? अविद्या का क्या रूप? ज्ञान द्वारा जीवात्मा का? रूप ज्ञान द्वारा उस का रूप वा स्वभाव क्या? सो सो सम्मुख ही सम्मुख या जीवात्मा रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा उस जीवात्मा स्वरूप का साक्षात्कार हो, विद्या रूप ज्ञान का रूप ज्ञान, जीवात्मा का ज्ञान या, उस का ज्ञान या, विद्या का प्रकाश जीवात्मा रूप ज्ञान जीवात्मा का रूप या ज्ञान प्रकाश उस का स्वरूप रूप, विद्या सम्बन्धी या, विद्या प्रकाश स्वरूप रूप का ज्ञान रूप परमात्मा की सत्ता द्वारा उस जीवात्मा रूप ज्ञान ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा, उस ज्ञान प्रकाश रूप में सब को सम्मुख हो प्रकाश स्वरूप, प्रकाश का, प्रकाश जीवात्मा सम्बन्धी ज्ञान रूप प्रकार का रूप ज्ञान स्वरूप, प्रभु विद्या प्रकाश रूप ज्ञान द्वारा ही ज्ञान द्वारा प्राप्त हो सम्मुख होकर उस ज्ञान रूप द्वारा उस रूप को! उस प्रकार प्रभु का, उस रूप प्रकाश का प्रकाश ज्ञान रूप ज्ञान रूप, उस की सत्ता रूप ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान हो हो! जीवात्मा रूप को जीवात्माओं का जीवात्मा रूप जीवात्मा ज्ञान का ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान का ज्ञान वा जीवात्माओं को सब का ज्ञान का ज्ञान या सब रूप ज्ञान जीवात्मा स्वरूप जीवात्मा का रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा रूप ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान प्रकाश, जीवात्माओं का रूप! जीवात्माओं ज्ञान विद्या का, उस प्रकार ज्ञान का ज्ञान रूप, उस का ज्ञान रूप सम्मुख हो कर ही ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप का ज्ञान रूप जीवात्मा का या जीवात्मा का न ही या सब प्रकार ज्ञान जीवात्मा विद्या रूप रूप का स्वरूप रूप रूप का रूप से प्रकार का प्रकाश उस का हो सके, सो ज्ञान ज्ञान का ज्ञान रूप रूप का ही जीवात्मा का ज्ञान ज्ञान रूप ही हो ज्ञान ज्ञान का प्रकाश ही का ज्ञान रूप उस जीवात्मा का जीवात्मा रूप जीवात्मा का ज्ञान का ज्ञान का ही रूप ही रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा जीवात्मा ज्ञान विद्या ज्ञान जीवात्मा का 147

चोट का नाम सुनते सुनते सब को कादम्बरीके स्मरण का बड़ा भय लगा और महाश्वेता मारे शोकके गिर पड़ती थी, रोती! बड़े कष्टसेउसने मन को धीर करके रोना छोड़ा चन्द्रापीड़ कहने लगा, सुनो प्रिये, सुनो सब लोग! महाश्वेता को शाप देकर उसने जब दूसरा शरीर धरा तो यह चन्द्रापीड़ भी मर गया था पर इसका रूप ऐसा नहीं बदला था, बल्कि तन पर कान्ति बची, कांति का रूप ऐसा दिव्य था जिसके बलसे इस का शरीर अब तक बना रहा। सब को भय था कि--इस प्रकार रूप का नाश न, किसी का जीव लौट सकता--इस विचार सब शोक को छोड़ कर बैठे, आगे को देख कर जो कुछ हुआ सो सब वृत्तान्त ऊपर कह चुका हूँ। केवल यह, केवल यह, जो कुछ भी इस देह बारे कहूं थोड़ा क्योंकि जब इसके शरीर छूटे तो सुख का रूप बना व कान्ति का प्रकाश इस प्रकार था, कि उस देहने सब को फिर जीवन किया था। इसके पर सब के सब जो इस बात को सुनते विस्मय में आ रहे थे, तारापीड़ बड़े स्नेह और विस्मयके प्रभाव बड़े ही प्रेम से कादम्बरीको देख कर उस को छाती से लगाया विलासवती ने प्रेम से पुत्र की माता को गले से लगा कर, प्यार कर के उस को मुख बार बार चूमा। महाश्वेता ने पूछा कि क्या यह सच है? चन्द्रापीड़ ने कहा, यह सब सच है। रानी जी, सच तो यही व इससे अधिक आश्चर्य यह बात हुई। पुण्डरीक भी लौट कर फिर आ गया है, पर उस को कपिंजल अभी रोके, केवल यह दिखलाने लिये गया हैकि उन के पिता श्वेतकेतु अपनी तपस्याके प्रभाव से दोनों कुमारों सहित यह सब सुख देखें, जिस से उन का चित्त प्रसन्न हो।इस से चन्द्रमा का रूप पहले चन्द्रापीड़ फिर उसी प्रकार हुआ। दोनों ओरके चारों महाजनों सहित सब को बड़ा आनन्द हुआ और उस बात के होते ही, तारापीड़ ने उस बड़े भारी दलको चलने कीआज्ञा दी।वे लोग सब आदर से चले। चन्द्रापीड़ ने जब तक वहां का काम देखा तब तक अछोद सरोवरपर ठहरा। वहां रुकनेपर, तारापीड़ ने तारापीड़ के आज्ञाकारी को आज्ञाकारी दल की बात कही सब लोग वहां से चल कर, राजा तारापीड़ के पीछे के लोग, सब तारापीड़ के साथ ही साथ चले। बाकी के लोगों ने जो कुछ कहा था सो सब ठीक हुआ, राजा तारापीड़ को यह सब सुख उज्जैनी नगरमें, उन दिनों मिला जब कि वे लोग सब-- बात वहां कह कर अपने सुखका दम लेचुके, तारापीड़ के साथ सब लोग उन के--नगर पहुंच गये। तारापीड़ ने उज्जैनी नगरमें पहुंचकर जो आनन्द देखा कादम्बरी के मन मेंआया कि, रानी तो यह बात जान-बूझ कर पूछती हैं? शुकनास मन्त्री हैं? राजा जी देवता? स्वयं राजा विलासी हैं? रानी मनोरमा माता हैं? रानी की आज्ञा कैसी? उसने कहा, किससे? सब तारापीड़ के चरणों प्रणाम करतीहूं, जिस तरह आज्ञाकरेंगे, वैसा सब लोग करेंगे। चन्द्रापीड़ ने कहा, तू कैसी बात? उसने कहा तूतो सब जानतीहै किइन सब के आगे लज्जा उत्पन्न होती है। इसी तरह सब के आगे बात करने को लज्जा आती है, फिर तारापीड़ और उन की, रानी के आगे यह बात कहना, कि मैं विवाह कराती हूं? सब को मालूम ही सब को इस बात कीलाज आतीहै, केवल तुझेही, केवल को छोड़ कर। कादम्बरी कहने लगी बात सुनो, क्यों ना होवे? जब सब लोग ही आ रहे हैं, तारापीड़ को छोड़ कर कोई न रहा, राजा लोग भी सब हैं, तो विलासवती का मनसब सब को बुलाने लगा। फिर तारापीड़ ने रानी को कहा कि जब सब लोग आवेगे तब न? तारापीड़ राजा ने कहा कि, राजा लोग सब आये हैं। क्या कोई न? तारापीड़ ने सब बात की आज्ञा दी, जिस प्रकार से सब का आदर हुआ, रानी तारा के मन में बात आईकि तारापीड़ ने सब बात कह दी। अब विवाह न? तारापीड़ ने सिर झुका कर कहा कि हां क्यों न? तारापीड़ के मन आदर भरा थाकि यह सब क्यों न? सब लोग अपने अपने काम में लगे थे, राजा लोग खड़े रहे थे, किसी किसीने काम कर दिया। इसके पर ही सब लोग आ कर उस सुख--स्थान बैठे! जिस को देखकर सब प्रसन्न व सुखी, राजा लोग! रानी लोग सब बैठे। रानी तारापीडने कहा कि, आज सब को इस बात का आनन्द हुआ जिस कावर्णन लोग कर ही सकते थे, आज हम को इस बात का ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जिस का नाम सुनकर स्वर्ग भी हार गया।सब लोग प्रसन्न होकर उस के गुणको गाने लगे। 148

पाप का परिणाम दुख मिलता ही है। जिसे सुखद जीवन जीना हो, उसे सदा शुद्ध भावों रूप ही रहना या मन का रूख करना सदा, जो कभी भूल कर पाप कर्म न करो, तब समझो न कभी, दुख कभी न भोगना पड़ेगा। पाप कर्म के फल से ही संसार का हर प्राणी संतप्त या परेशान है। अतः प्रत्येक भावुक को पाप से सर्वदा बचते अहिंसादि, अहिंसक भाव रूप आचरण तथा वचनों रूप नियमों का पालनपूर्वक, सुमार्ग अपनाना चाहिए। पाप से जो विरक्ति रूप भावों धारण कर लेता वह सुख पाता हुआ दिखाई देगा, जो पापों रूप कर्म का कर्ता, वह कभी सुखी? रह ही नहीं सकता यह कथन भी सत्य। दया का भाव प्रत्येक मानव में ही नहीं बल्कि संसार के हर जीव मात्र प्रति हो, दया का भाव यदि मन में नहीं बन रहा हो, दया के नाम मात्र से भी नहीं रहा हो, कोई भी कार्य दया से युक्त नहीं कर रहे हों अनाचार रूप ही आचरण हो, जिसे तन मन धन द्वारा भी किसी प्राणी को कष्ट पहुंचे या सताया गया उस समय किए जाने वाले कर्म अवश्य भयानक ही फल के भागीदार होंगे। दया स्वभाव ही आत्मा स्वरूप, आत्मा को समझना दया का अपनाना ही आत्मभाव का ही अपना रूप, आत्मा ही, ज्ञान--दर्शन सुख--वीर्य का धारी ही आत्मभाव का रूप है। दया स्वभाव धारण अपनाना, त्याग अपनाना, तप का ही अपनाना ही आत्मा का रूप होगा, पर-भव को सदा भव्य रूप से ही बना लो, भव्य ही वही जो जीव, भव्य ही भव-भवन्तरों का सुधारने का रूप, मन को अपने वशी भूत ही रख सदा भव्य रूप बन सकेगा, अनाचार विषय के रूप रस गंध को, त्याग कर सदा ज्ञान रूप बन कर आत्म रूप को ही पा लो यह मन भी, कभी कषाय भावों अनाचार का रूप बन ही नहीं रहा हो तो आत्मा भव्य ही होगा, पर भव सुधर अनाचार के हर रूप का निवारण कर लेगा। संयम रूपी नौ, जो संसार के भ्रमण से पार कर मोक्ष रूप तट-बंध तक ले जाने का काम करती संयम को सदा मन वचन काया द्वारा भव्य ही जीव-भव भव्य बनने का काम करता यह कभी संयम कर्म के कारण ही आत्मा पर से भारी, पाप रूपी, अशुद्ध भावों का रूप नष्ट हो सकता ही अशुद्ध विचारों का त्याग, जो मानव संयम धारण कर उस भाव रूप संयम करता रहे, उसी रूप ही कर्मों नाश संभव बना ही रहे! जो भव्य रूप के साक्षात ज्ञान प्राप्त अध्यात्म का रूप, पाप- रूप कर्म-पुद्गल को भस्म करने में जो अनाहत आवाज स्वरूप ही ज्ञान के प्रकाश से प्रकाश के प्रकाश का नाश ही सदा ही होगा, जो उस रूप केवल स्वरूप ज्ञान है। आत्मस्वरूप धारण जिसने सदा किया अनाहत ज्ञान प्रगट ही सदा रहा जान लो, वह जीव सदा केवल ज्ञान ही सदा पाता रहेगा, संसार का नाश रूप ही, ज्ञान स्वरूपता से ही प्रकाश रूप ज्ञान ज्योति सदा बनी ही रहती। अतः, विषय वासना विकट भाव रूप जो दुर्धर विपाक रूपी कर्म के कारण विकट अनाचारों उत्पन्न ही सदा रहा आत्मा को, संसार रूपी सागर कभी शांत नहीं रहा या शांत हो भी कैसे जब अनाचार का रूप संसार को जब तक मिटाया न गया हो जन्म मरण का भाव सदा संसार ही सदा संसार का स्वभाव ही विकार रूप रहेगा, जिसे ही नष्ट ज्ञान रूप ही से किया गया, जो सहज शांत केवल प्रकाश का रूप सदा आत्मा में ही सदा प्रकाश रूप से बन कर सदा आत्मभाव सदा ही ही अनाहत ज्ञान प्रगट हो भव-भव दुखों का नाश कर ही तो रहा रूप है। या जो? केवल ज्ञान-रूप ज्ञान सदा ही बन रहा हो तो उस जीव का ही मोक्ष का मार्ग बन रहा, जो भव-भवन्तरों का नाश कर ही डी.एस.जैन का यह कथन ही ज्ञान रूप बन सदा भव्य जीव को ही व उस ज्ञान भाव रूप बन कर, संसार के जन्म मरण कष्ट को सदा ही दूर कर देगा। वो भव्य जीव! संसार के बंधनों से तो दूर रहता ही भव्य स्वरूप सदा आत्मा के ही ही रूप सदा बना रहेगा प्रत्येक ज्ञानी आत्मा का ही तो ज्ञान स्वरूप कहा जो हमेशा साक्षात रूप बन ही तो ज्ञान रूप स्वरूप प्रकाश करता ही अनाहत--प्रकाश का नाम, जिसे रूप ही आत्मा रूप से बन सदा भव्य ही रूप बनता रहे? आत्मा स्वरूप ही तो सदा भव्य रहेगा? आत्मा स्वरूप ही ही 149

यद्यपि इस पर सब लोग ध्यान देते अथवा नहिन किन्तु यदि कोई इस बात पर चेत करेके देखे, तोभी बहुत कठिन कि जब सब के सब मनुष्य दुराचारिता ही के काम को करेंगे व मत के काम कोई नहिं मानेंगे और किसी प्रकार की हानि वा दुःख किसी को नहिं होगा तब वे कहेंगे कि मत के काम से वा ईश्वर के भजन से क्या प्रयोजन व्यभिचार आदि काम सब ही के मत में बडे पाप हैं, जैसे कि चोरी वा हत्या है, सो जब ईश्वर इस पाप का कुछ दण्ड नहीं देता तो हम भी इस पाप को क्यों छोडे जिस से सब प्रकार का सुख होता है सो ऐसा न समझना कि ईश्वर कुछ नहीं देखता वह सब कुछ देखता है, क्योंकि वह सब कुछ जानता है सब के कर्मों को, तो वह नित्य न्याय करने वाला भी है, दण्ड भी देगा! सो ऐसा न हो जाय कि तुम परमेश्वर के न्याय को भूल जाओ व्यभिचार रूपी अन्धे-कूप में पडे रहो और उस से फिर कोई रक्षा न कर सके इस के सिवाय, व्यभिचार का दृष्टान्त रूपी सत्य न्याय अन्धे-कूप जैसा होता कि जिस में कोई गिर पडे तो वह उस कूप रूपी गढ़े में सुख-रूप अपने को ही जाने तथा कभी भी उस से निकल न सके और यदि कोई, सत्य ज्ञान-रूपी पुरुष आवे और उस को उस कूप से निकाले भी, तथापि वह उस की, बात को न सुने वा न ही उस उत्तम पुरुष को जाने कि जो उस का मित्र है वा सुख का दाता पर-मेश्वर सब को उत्तम ज्ञान का देने हारा तथा सब का सब से बडा सच्चा मित्र वा हित का करने वाला है उस व्यभिचारी को अनेक रीति से ज्ञान भी देता है तथा उस के पापों की रक्षा का उपाय भी करता है और सब प्रकार से सुख भी देता है परन्तु वह अन्धा उस ज्ञान को सत्य नहीं मानता जो सत्य मार्ग को बतलावे, जैसा कि कोई अन्धे को कूप से बाहर ले जाने के लिये उस का हाथ पकड-कर ले चलना चाहे परन्तु अन्धा उस का साथ न देवे और उस से छूट कर फिर अन्धे-कूप में गिर पडे वा उस को ही लाठी-डण्डा मार-कर भगा देवे, तब वह अन्धा कूप ही में रहे! ईश्वर का यह स्वभाव, सत्य दयालुता किसी के मुख को देखि के नहीं, किन्तु सबों ऊपर एक महा-कृपा रूपी सत्य न्याय से सब का पालन करता है वा सब का उपदेशक भी है इस लिये वह सब के आचरणों को देखता हुआ सब को उस के आचरण के अनुकूल फल देता है! निश्चय जानो! क्या जो कान, को बनाता क्या नहीं सुनता? क्या वह, जिस ने सब को रचा सब का कर्ता है सो सब के पापों को नहीं जानता? क्या जो अज्ञान से ज्ञानवान् करे सो अपने को अज्ञान रखेगा अर्थात् कभी नहीं, कभी ऐसा न समझना कि ईश्वर अन्धा वा बहरा वा मूर्ख है सो उस परमेश्वर के साथ धूर्तता रूपी व्यभिचार के काम को करके मत छिपो क्योंकि यह, पर-पुरुषगामी स्त्री तथा पर-स्त्रीगामी पुरुष को नित्य एक महा भयानक अन्धा कूप जिस का नाम नरक वा नरकाग्नि है उस में निरन्तर के लिये वास करने को पडेगा तथा इस न्याय से कभी न छूटेगा क्योंकि, वह ईश्वर का शत्रु है, सो ईश्वर के वचन के अनुकूल नरक में कष्ट भोगने के लिये जन्म लेता है॥ सो हे, मेरे प्यारे मनुष्यो तुम सब लोग ऐसा मत करो किन्तु परमेश्वर को जो सब का साक्षी तथा अन्तर्यामी न्याय करने वाला दयालु, सब से बडा राजा सब का उत्पत्तिकर्ता है अपने मन के अग्रे सदा उपस्थित रखो और उस के भय को नित्य रखो, सो जो उस की आज्ञा रूपी परम धर्म को तोड कर व्यभिचार रूपी पर-स्त्रीगामी अथवा पराये धन की अभिलाषा के कुकर्म रूपी अन्धे कूप में गिरेंगे वे अवश्य नरक, में गिरेंगे, कभी बच नहीं सकते क्योंकि वह सर्व-शक्तिमान् के आगे कोई बलवान् वा ज्ञानी नहीं ठहर सकता और ज्ञान-रूपी बल से उस के न्याय को कोई नहीं बदल सकता सो उस के भय में सदा रह कर व्यभिचार रूपी दुर्गुणों से सदा बचो जिस से परमेश्वर के न्याय से बच कर नित्य आनन्द भोगो॥ ईश्वर के इस न्याय तथा, दयालुता को विचार कर मनुष्य को सब-प्रकार से, सत्य-ज्ञान का यत्न सदा करना योग्य है जिस से ईश्वर प्रसन्न हो, सो उस परमेश्वर की कृपा से जो यह पुस्तक व्यभिचार के निषेध के अर्थ बनाई, सो इस को अवश्य पढ कर, प्रत्येक नर वा नारी को अपने तथा अन्य पुरुषों को उपदेश करना चाहिये, जिस से इस संसार में सुख तथा सत्य का मार्ग खुले वा ईश्वर का भजन व उस का भय सब के हृदय में स्थिर हो कर मुक्ति को प्राप्त होवे॥ 150

भगवान् हमारे मन जानता, वचन को मन अनुसार करता? पर ऐसा होता नहीं तब सब लोग अपने मन अनुसार वरदान लेते ही रहते, क्यों, किसलिए तपस्यादि कर्मफल भोगना पड़ता! केवल मनोमय वाणी सत्य तब सर्व लोग वाणी द्वारा सब काम करते; केवल कर्ममय वाणी द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त कभी नहीं हो सकता जिससे निश्चय हुआ कि मन का मन पर कोई वश नहीं रहता, इसलिए जो मन का निग्रह करे, सो महाबली वा धीर वा तपस्वी होगा जो इस पर विचारवान् पुरुष होगा, सोचेगा कि, तपस्या करो, वा तीर्थ करो, दान पुण्य करो वा जो कुछ करो सो सब मन स्वाधीन वा वश किए बिना निष्फल वा व्यर्थ होता वा हो गया वा होगा, इसलिए मन तपस्या, दान वा तीर्थादिकों को सब लोग व्यर्थ समझ मन स्वाधीन वा, निर्मल करने यत्न करो, तब निश्चय जानो कि जो मनुष्य वा पुरुष, तपस्वी, निर्मल आत्मा, परमात्मा का दर्शन पावेगा निर्मल करे, मन न रोके, निर्मल न करे वा निष्काम तपस्या, दान तीर्थादिक, तीर्थादि स्नान, दान करके निष्फल, पाखण्डी हो लोक को ठगने वाले सब लोग पापी वा नरकगामी वा दुराचारी कहलाते, फिर उनका वा उस पाखण्ड का संशय वा भ्रम दूर किए बिना काम कभी नहीं, तब, जब तक अविद्यादिकों को दूर कर वा अपने को अविद्या से छुड़ाएगा नहीं, वा निष्काम वा निष्कपट हो भक्ति वा सब काम वा विद्या वा अविद्या--भ्रम जाल को काटे, अविद्यादि जाल को अविद्या--भ्रम जाल को काटे वा सब काम वा विद्या किंवा सब काम वा उस अविद्या भ्रम, पाखण्ड जाल, तथा विद्या ज्ञान करके नष्ट वा दूर करे, तब ज्ञानपूर्वक सब काम सदा ही बन पावे इस प्रकार मन को वश करने से सब प्रकार का संशय तथा अविद्यादि संशय आदि नाश होकर, आत्मा विशुद्ध हो जाता है। जो अविद्यावान्, कामी, क्रोधी, लोभी मनुष्य मन के वश में होकर सब कर्म करता, फिर उसी फल भोगता, इसलिए मन को वश करके सब काम करें। जब तक मन वश नहीं तब तक कोई कर्म सिद्ध नहीं होता, संशय भी बना ही रहता? इस बात से यह भी जाना गया कि कर्म पहले होता है वा ज्ञान अथवा कर्म से ज्ञान होता अथवा ज्ञान से कर्म-उपासना का फल ज्ञान, ज्ञान का कर्म--उपासना फल प्राप्त होता वा नहीं होता, यदि कहो कि दोनों का एक साथ; दोनों परस्पर एक साथ, तो नहीं; कभी कर्म पहले हो गया, तो कर्म निष्फल हो; कभी जो ज्ञानाभ्यासपूर्वक सब कर्म, उपासना बिना निष्फल सिद्ध होगी; कर्म का फल सब लोग चाहते, किन्तु अविद्या रूपी अविद्या का नाश हो कर ज्ञान, तब जो कर्म वा उपासना किया फल-दायक हो जाता वा निष्फल नहीं, जिससे कि दोनों का परस्पर विरोध वा एक साथ दोनों परस्पर वा इनका संयोग होना सिद्ध हुआ कि नहीं हुआ वा हुआ सिद्ध? हुआ सिद्ध? सिद्ध हुआ? तो इसका उत्तर यह जानना, संशय तब दूर हो सके, जिससे सब भ्रम दूर हो जावे, जिससे सब लोग एक दूसरेको समझा कर बोलें, जिस प्रकार विचारवान् निष्पक्ष हो, सच्चा न्याय करता है, वैसा न्याय करना चाहिए संशय का यह अभिप्राय कि सब पदार्थों का एक रूप ज्ञान निश्चय रूप नहीं होता वा संशय से विपरीतज्ञान बने, सो संशय को इस रूप में जानना चाहिए कि एक तो संशय का विपरीतज्ञान रूप वा अज्ञान ज्ञान वा संशय रूप इन दो दो प्रकार का ज्ञान बने, संशय का प्रकार सब पर विदित ही रहता हुआ, ज्ञान वा अज्ञानपूर्वक वा ज्ञान किए बिना वा अज्ञान जानकर वा भ्रम से ज्ञान संशय का, यथार्थ ज्ञान बने, संशय ज्ञान बना, संशय ज्ञान अज्ञान का प्रयोजक रूप न बन सके, न ज्ञान अज्ञान का, न ज्ञान अज्ञान का, न उस संशय रूप अज्ञान का प्रयोजक ज्ञान स्वरूप बने, ज्ञान अज्ञान रूप न, ज्ञान अज्ञान दोनों स्वरूप तो बने, किन्तु दो पदार्थों का ज्ञान यथार्थ वा अयथार्थ रूप से जाना जाय तब संशय का नाश रूप जो स्वरूप वह एक ज्ञान वा विद्या रूप में संशय का फल दूर हो ज्ञानरूप ही बन जाता इस प्रकार से संशय अविद्या का नाश ज्ञान से हो कर सब काम वा विद्या की यथार्थता को जान सकता अविद्यादिकों को दूर वा नष्ट कर मुक्ति को पावेगा, परमात्मा केवल वा अद्वितीय अविद्यारहित सब जीवों का स्वामी--हे सब मन के, हे सब जीवों के, हे सब जीवों तथा अविद्यावान् सब जीवों के मन स्वामी--हे सब प्राणों के, हे सब जगत् तथा अविद्यावान् संसारी जीवों सब अविद्यादिकों सहित संशय भ्रम सब दूर करो, सब ज्ञान रूप विद्या के प्रकाश से सब को ज्ञान रूप रस पिलाओ 151

इस लिए भगवान् का धन्यवाद कर, यह कि प्रभु का नियम यह बतलाता कि निष्कामता किसे कहते और उसका फल क्या होता और यह भी कि पाप पुण्य दोनों के बन्धन क्यों दोनों एक रूप कहे गये, भला सोच तो सही, क्या तू भी पापी की नाईं संशय युक्त अथवा उस पर जो पूर्ण ज्ञान-वान् सर्वज्ञ सर्व--ज्ञ हो कर शिक्षा देता, उस पर तू संशय करे, ऐसा विचार अत्यन्त--ही तो पापो का फल-रूप होना योग्य कहा जावेगा सो भगवान् के नियम रूप पर ध्यान कर, इस से तो मन ज्ञान रूप होगा अज्ञान के प्रकाश के स्थान ज्ञान रूप का उदय उस के भाव को नाश कर देगा, जिस लिए भगवान् कह कि, निष्कामता रूप जो कर्मयोग सर्व-प्रकारक सब पापों को, जिनको कि अज्ञान के आश्रय से कहा, प्रकाश से नाश कर देता है, फिर तू संशय के विचार में क्यों उलझ रहा क्या तुझे ज्ञान प्राप्त निष्कामता रूप से नहीं हुआ जो तू संशय निष्कामता कर्म में ही मन द्वारा लगा रक्खे हुए है कि पाप, वा पुण्य का फल क्यों होता जिस से तू, क्या तू ही ? सब ज्ञान प्राप्तों को संशय हो? सो यह सिद्ध हुआ, कि तू, शास्त्र के मत अनुसार फल पावे; फलदाता को अन्यथा विचारना कि यह फल ऐसा क्यों हुआ और निष्काम कर्म संन्यास के समान क्यों हुआ संशय तो यह, फलदाता के भावों को तूने जाना ही नहीं! तो ज्ञान कहा रहा? संशय तब होता जब, शास्त्र से ही ज्ञान को प्राप्त निष्काम भावों द्वारा हो फल पाता और फल-त्याग भी, फल रूप पाया जाता तब तो यह, संशय होता? सो भगवान् ने कह, अर्जुन सुनो, शास्त्र के भाव को त्याग कर जो संशय अज्ञानी उत्पन्न हो निष्काम कर्म के स्वरूप को अशुद्ध विचार ज्ञान लाभ लाभ न हो कर ज्ञान नाश को प्राप्त होता, सोई पुरुष इस लोक में--परलोक, दोनों से रहित हो कर नष्ट होवेगा! सो हे अर्जुन ऐसा भाव तू त्याग कर, कर्म-योग निष्काम कर, जिस ज्ञान से ही तू सब प्रकार द्वारा सुखी होने का अधिकारी होने के योग्य, सुख का ज्ञान प्राप्त हो, शास्त्र अनुसार विचार कर जो ज्ञान स्वरूप कर्म-योग ज्ञान को संशयवान् पुरुष ज्ञान से प्राप्त नहीं कर सकता जिस से कि वह संशय में ही विचारवान् रहता कि फल देने वाले परमेश्वर ने कैसा ज्ञान रूप फल या पाप पुण्य के बन्धन रूप फल-त्याग से समान ज्ञान दिया वा फल किस प्रकार का? सो फल के ज्ञान, रूप को प्राप्त होता, जो ज्ञान से परे ऐसा निष्ठा युक्त विचार रूप में संशय रूप फल को प्राप्त कर देता, जिस से ज्ञान फल युक्त संशयवान् ज्ञान से रहित हो अज्ञान रूप फल को भोगता सो निष्काम कर्म के फलवान् विचार ज्ञान द्वारा प्राप्त हुए को, उस फल को प्राप्त निष्ठा, ज्ञान युक्त ही परम निष्ठा युक्त सुख प्राप्त होता अथवा संशय रूप को नाश निष्काम के द्वारा किए बिना ज्ञान की निष्ठा होना, निष्काम फल रूप फल से रहित-किए रूप फल निष्ठा को पा निष्काम के स्वरूप ज्ञान रूप संशय से परे नहीं हुआ क्योंकि अज्ञानी ज्ञान द्वारा निष्काम फल योग को संशयवान् त्याग ज्ञान द्वारा फल को निष्काम तो कह रहा, परन्तु फल त्याग द्वारा ही, जो ज्ञान रूप फल प्राप्त हो रहा था सो फल तो संशय युक्त, त्याग के फल निष्ठा को प्राप्त किए ही रहा तो फल, त्याग से फल रूप निष्ठा स्वरूप हुआ सो केवल फल रूप, जो ज्ञान द्वारा निष्ठा को त्याग कर केवल फल निष्ठावान् बना रहा, फल-त्याग रूप फल को प्राप्त न कर सका सो संशय के रूप रहा, जिस फलवान् से ही फल द्वारा फल का त्याग हो कर ज्ञान फल रूप, सो संशय के वश हुआ सो ज्ञान द्वारा संशय को नाश कर, हे अर्जुन निष्काम १ हो, हे अर्जुन तू अब सब संशय रूपी शंका त्याग कर संशय, वश से हट जा, चित्त-वृत्त को ज्ञान युक्त 152

सुनो, भगवान् हमारे साथ क्यों रहें अथवा क्यों न रहें इसका विचार किसी सांसारिक या अन्य रीति द्वारा नहीं किया जाता है; उनका विचार केवल यह रहता रहा, कि जो उनके नियमों विश्‍वासों व आज्ञा पर पूरा उतरता वह क्यों? हृदय से पाप को निकालो! फिर जब पाप का डर निकल गया तो डर किसी दूसरी शक्ति, भय आदि का तो स्वाभाविक ही सम्भव ही नहीं पर जब तू पाप करे, तब समझ रख, अपने आपको, उन नियमों सदा एक साथ छोड़ दे रहा है, जो स्वाभाविक सत्य! केवल मनुष्य ही वह जीव है, जो जान कर भी पाप कर जाता दूसरा जीव या तो ज्ञान हीन होने के कारण ऐसा न करे, पर सदा सब कुछ जान कर भी जीव ऐसा कार्य करता जिस पर स्वयं पश्चात्ताप तो करे, पर फिर दोहरा देवे, फिर किस प्रकार विश्‍वास ही करे, सब कुछ जान कर भी पाप में प्रवृत्त हो उस समय अपने आपको पाप से बचाने का उपाय तो दो-एक ही ज्ञान वा पश्चा-त्ताप ही समझ लिया जाता है, जिस पर मनुष्य स्वयं विचार करके अपने आपको पाप से दूर रख सब से समझ ले, कि सब कुछ जान कर भी पाप की ओर अपने आपको प्रवृत्त किया गया! तो फिर यह न न जाने वा पाप का फल भोग ही, जाने-अनजाने न कहो कुछ भी, पर स्वयं कहो-यह तो पाप निश्चय हुआ, जाने-अनजाने में कोई अन्तर न रहा, हाँ! एक बात कहो, निश्चय ही, निश्चय ही, निश्चय ही, निश्चय ही कहो, निश्चय ही यह, स्वयं सब कुछ जान कर भी पाप किया, तो फिर पाप को ही क्यों सहारा दिया गया! तो पश्चा- त्तापी बन कर अपने पापों का निवारण भी तो कर ले! पश्चात्तापी बन कर, तो अपने को पाप से दूर रख ही, जिस प्रकार मनुष्य समझता है, उस बात द्वारा भी, तू सदा पाप को जन्म देवे सदा ही सत्य को समझ, सत्य द्वारा अपने जीवन का जो सत्य ही जन्म ले चुका सब कुछ अपने से पाप हटाकर सत्य को जन्म देता हुआ ही रह जावे, सत्य स्वरूप केवल ही ऐसा बन, फिर तो न पाप का न स्वयं सत्य स्वरूप द्वारा जन्म लेवे पाप का जन्म तो तब ही हुआ, जब पाप को जन्म दिया! पाप तो तू द्वारा सब कुछ बन गया, तो फिर इसका निवारण भी! पाप छोड़ दे, सब कुछ सत्य द्वारा कर, सत्य द्वारा ही, जो कुछ सत्य के लिये हो उसी आधार पर ही तू यह सब कुछ करने लग जा बस! केवल पाप का निवारण यही है जब सदा सत्य रूप ही ले लेवे सब कुछ तो अवश्य ही पाप सब तरह से ही नष्ट होकर सब कुछ पाप से रहित हो जायेगा, सो तू सत्य समझ, जब तक तू सत्य को सत्य रूप से अपने आप द्वारा ही जान लेवे केवल सदा ही? तो फिर पश्चात् पश्चात्ताप कर रहा है, अब सदा ही पश्चात्ताप ही मत कर, पाप छोड़ कर सब कुछ सत्य ही कर, जो निवारण भी इस प्रकार, तू तो केवल सदा पश्चा- त्तापी बन पाप करेगा तो तो पाप ही करता जा रहा है सब कुछ जान कर भी सब पश्चात् पश्चात्ताप करता जा रहा है केवल, तू फिर केवल पश्चात्तापी ही मत बन! केवल पाप त्याग कर, सब से बड़ा पाप का त्याग ही पश्चात्ताप से बड़ा माना जाता है इसलिए तू पाप को फिर जन्म मत देवे, सो पाप का जब विचार जन्म लेगा तभी पाप जन्म लेता हुआ नजर आवेगा तो पाप को जन्म मत दे केवल सत्य को जन्म देवे! केवल पश्चात्तापी, पश्चात्ताप स्वरूप बनकर मत रह केवल पश्चात्ताप मत कर वरन् सदा ऐसा त्याग कर, पश्चात् तू फिर सब कुछ उस पश्चात् को त्याग, सब व पश्चात्ताप को त्याग केवल सत्य ही स्वरूप बना फिर पाप का रूप सदा व नष्ट हुआ जान सब कुछ पश्चात् सदा ही बन जा, फिर पश्चात् का डर भय, जो बार-बार के पश्चात्ताप से आ रहा रहेगा, समाप्त होगा ही, तो पाप को त्याग कर ही सब डर भय को दूर कर अपने भय को दूर कर सदा के लिए रख, विश्‍वास, सदा सत्य का! केवल सत्य ही रख, सब प्रकार, पश्चा-त्तापी! केवल मत बन, केवल पश्चा त्तापी ही मत बनकर रह जावे, जो केवल पाप कर फिर उस पाप का पश्चात्ताप ही तो किया! पर पाप को दूर तो न कर सका न पश्चात्ताप से छुटकारा ही पा सका इस प्रकार, केवल तो पश्चात् पश्चात् करता ही रह गया तू, केवल पाप को जन्म देता रहा सब कुछ पाप ही स्वरूप रहा, उस से अपने आपको छुड़ा तो सदा सत्य के त्याग रूप को प्राप्त करके दिखा, त्याग कर, त्याग द्वारा निश्चय कर, सत्य के रूप को पश्चात् से दूर कर, तू सदा ही अपने जीवन को ज्ञान से पूर्ण कर सकेगा 153

विचारशील मनुष्य सदा सोचा करते, संसार असार तथा नश्वर जानकर इस भवबन्धनसे छूटनेका यत्न करते हैं। हे प्रभो! हमारे सिरपर अनेक प्रकारके क्लेशोंका भार भरा हुआ संसारसागरके! हम बड़े दुर्बल, ज्ञान तथा बलसे हीन, संसारके विषयसुखों पर मोहित हो विषयान्धकारमें पड़े हुए, मोहवश इस नश्वर देहको स्थिर समझकर अनेक तरहके पाप कर रहे हैं। हे दयासिन्धु! कृपानिधान! हमें अपनी शरणमें लो तथा ऐसा ज्ञान प्रदान करो कि जिससे हम समस्त पापोंसे छूटकर इस नश्वर देहके मोहको छोड़ आपके पादारविन्दोंमें मग्न रहें। भगवान्‌की इस प्रकारकी गुणस्तुति--प्रार्थना करके शान्तिस्वरूप परमात्मा चिन्ता दूर करके अपने स्वरूपमें विलीन होजाते। इस उपनिषद्‌का यही रहस्य है, सब प्रकारके सब पदार्थोंका त्यागकर नित्य आनन्दस्वरूपकी ओर अपनी वृत्ति लगानी चाहिये तथा परमात्माके ध्यान तथा ज्ञानको प्राप्त करके सन्तोष, आत्म-लाभ करना, यही परम कर्त्तव्य है। हे सर्व-शक्तिमान् प्रभो, हे अनाथ-शरण दीनबन्धो, हे दयामय अशरण शरण परम दयालो, हे हमारे दुःखोंके दूर करने वाले, हे नित्य आनन्द प्रदान करने वाले हम तेरे अनाथ बालकोंपर दया करो तथा ज्ञान देकर हमें मोह-निद्रासे जगाओ, सदा अपने ज्ञान, बल तथा आनन्दमें लीन रखो जिससे कि हम सब भी सब प्रकारके द्वन्द्वों, मान-अपमानको समान समझकर, सब प्रकारके मोहको छोड़कर, उस परम पदको प्राप्त करनेमें रत रहें। आत्माको सब प्रकारके दोषोंसे रहित मान, सब कुछ त्यागकर, उस परम विभुको सब भूतोंमें सम प्रकाश करनेवाला जान उसका ध्यान करना चाहिये? उसको जानना? उसकी ओर ध्यान देना? उसकी स्तुति-प्रार्थना करना? सर्व-व्यापक विभु सच्चिदानन्दकी शरणमें जाना चाहिये जिससे कि जन्म- मरणका भय, पाप-पुण्यका भय, अज्ञान-अधर्मका भय सर्वथा निवृत्त होजाय, तथा परमात्माके ज्ञान स्वरूप होकर जीवात्माको उस आनन्द रूपका तथा आत्म-तत्त्वका यथार्थ स्वरूप समझमें आ जाता है। तब वह इस नश्वर जगत्‌के विषयोंमें सदा आसक्त न रहकर नित्य अपने स्वरूपका मनन करता हुआ, अपने स्वरूप अर्थात्‌ ईश्वरको ही सबमें ओतप्रोत देखता है। ईश्वरके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान जबतक मनुष्यको प्राप्त नहीं होता, तबतक अज्ञानके कारण नाना प्रकारके क्लेशों तथा दुःखोंका भोग करना पड़ता है। जीवात्मा मोह तथा अज्ञानावस्थाके कारण ईश्वरको अपनेसे पृथक् समझता है। यह नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता हुआ उस जगदीश्वरपर दोष लगाता है, जो कि सर्वथा भ्रम तथा अज्ञानका ही परिणाम है। अतः जगत्-सृष्टिके सब पदार्थोंका यथार्थ रूप जानकर, निर्लेप, निर्विकार, निष्काम, शुद्ध तथा निर्मल आनन्द-स्वरूप परमात्मामें सदा लीन रहना चाहिये। इस प्रकारसे परमात्माके ध्यानके अभ्यासका फल बतलाकर अब उस ध्यान योगके रूपको वर्णन करते हुए उस जगदीश्वरके स्वरूपको सब प्रकारके दोषोंसे रहित तथा सब भूतोंमें उस परमात्माके व्यापक स्वरूपको दिखाते हुए, उस व्यापक नित्यस्वरूप परमात्माके ध्यान तथा मननके द्वारा समस्त प्रकारके क्लेशोंसे छुटकारा पानेका उपदेश इस मन्त्रमें दिया गया है। क्या स्वरूप है? उस सब प्रकारके क्लेशोंसे छुड़ानेवाले, उस परमात्माके स्वरूपका इस मन्त्रमें वर्णन किया गया है। परमात्माका स्वरूप सब प्रकारके अज्ञानसे परे प्रकाश स्वरूप माना गया है। वह सच्चिदानन्द प्रभु है। आत्माको उस परमात्माके उस ज्योतिर्मय रूपका ध्यान करना चाहिये जिससे कि यह अज्ञान, सब प्रकारके अन्धकारसे परे होकर उस सर्वव्यापक परमात्माके शरणको प्राप्त होकर मुक्ति लाभ करके जन्म मरणके चक्रसे छूटजाय। ईश्वर अविद्याके सब प्रकारके अन्धकारसे परे प्रकाश रूप आत्मा, ज्योतिर्मय आनन्द-स्वरूप परमात्मतत्त्वके रूपमें अपने भक्तजनोंके हृदयमें सदा प्रकाशमान है। परमात्माका स्मरण करते हुए, उसकी स्तुतिको बारम्बार पढ़े॥५॥ 154