पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६४० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
यह सब करनेके पश्चात् गुरुकी पूजा करे। उन्हें वस्त्र, पगड़ी तथा जामा दे। अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा भी दे। फिर भोजन और ताम्बूल निवेदन करके आचार्यको संतुष्ट करे। निर्धन पुरुषोंको भी यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक पक्षवर्धिनी एकादशीका व्रत करना चाहिये। तदनन्तर गीत, नृत्य, पुराण-पाठ तथा हर्षके साथ रात्रिमें जागरण करे।
जो मनीषी पुरुष पक्षवर्धिनी एकादशीका माहात्म्य श्रवण करते हैं, उनके द्वारा सम्पूर्ण व्रतका अनुष्ठान हो जाता है। पञ्चाग्निसेवन तथा तीर्थोंमें साधना करनेसे जो पुण्य होता है, वह श्रीविष्णुके समीप जागरण करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। पक्षवर्धिनी एकादशी परम पुण्यमयी तथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। ब्रह्मन् ! यह उपवास करनेवाले मनुष्योंकी करोड़ों हत्याओंका भी विनाश कर डालती है। मुने ! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, ध्रुव तथा राजा अम्बरीषने भी इसका व्रत किया था। यह तिथि श्रीविष्णुको अत्यन्त प्रिय है। यह काशी तथा द्वारकापुरीके समान पवित्र है। भक्त पुरुषके उपवास करनेपर यह उसे मनोवाञ्छित फल प्रदान करती है। जैसे सूर्योदय होनेपर तत्काल अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार पक्षवर्धिनीका व्रत करनेसे पापराशि नष्ट हो जाती है।
नारद ! अब मैं एकादशीकी रातमें जागरण करनेका माहात्म्य बतलाऊँगा, ध्यान देकर सुनो। भक्त पुरुषको चाहिये कि एकादशी तिथिको रात्रिके समय भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन करके वैष्णवोंके साथ उनके सामने जागरण करे। जो गीत, वाद्य, नृत्य, पुराण-पाठ, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दनानुलेप, फल, अर्घ्य, श्रद्धा, दान, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण तथा शुभकर्मके अनुष्ठानपूर्वक प्रसन्नताके साथ श्रीहरिके समक्ष जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान्का प्रिय होता है। जो विद्वान् मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप जागरण करते, श्रीकृष्णकी भावना करते हुए कभी नींद नहीं लेते तथा मन-ही-मन बारम्बार श्रीकृष्णका नामोच्चारण करते हैं, उन्हें परम धन्य समझना चाहिये। विशेषतः एकादशीकी रातमें जागनेपर तो वे और भी धन्यवादके पात्र हैं। जागरणके समय एक क्षण गोविन्दका नाम लेनेसे व्रतका चौगुना फल होता है, एक पहरतक नामोच्चारणसे कोटिगुना फल मिलता है और चार पहरतक नामकीर्तन करनेसे असीम फलकी प्राप्ति होती है। श्रीविष्णुके आगे आधे निमेष भी जागनेपर कोटिगुना फल होता है, उसकी संख्या नहीं है। जो नरश्रेष्ठ भगवान् केशवके आगे नृत्य करता है, उसके पुण्यका फल जन्मसे लेकर मृत्युकालतक कभी क्षीण नहीं होता। महाभाग ! प्रत्येक प्रहरमें विस्मय और उत्साहसे युक्त हो पाप तथा आलस्य आदि छोड़कर निर्वेदशून्य हृदयसे श्रीहरिके समक्ष नमस्कार और नीराजनासे युक्त आरती उतारनी चाहिये। जो मनुष्य एकादशीको भक्तिपूर्वक अनेक गुणोंसे युक्त जागरण करता है, वह फिर इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेता। जो धनकी कंजूसी छोड़कर पूर्वोक्त प्रकारसे एकादशीको भक्तिसहित जागरण करता है, वह परमात्मामें लीन होता है।
जो भगवान् विष्णुके लिये जागरणका अवसर प्राप्त होनेपर उसका उपहास करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। प्रतिदिन वेद-शास्त्रमें परायण तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला ही क्यों न हो, यदि एकादशीकी रातमें जागरणका समय आनेपर उसकी निन्दा करता है तो उसका अधःपतन होता है। जो मेरी (शिवकी) पूजा करते हुए विष्णुकी निन्दामें तत्पर रहता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ नरकमें पड़ता है। विष्णु ही शिव हैं और शिव ही विष्णु हैं। दोनों एक ही मूर्तिकी दो झांकियोंके समान स्थित हैं, अतः किसी प्रकार भी इनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। यदि जागरणके समय पुराणकी कथा बाँचनेवाला कोई न हो तो नाच-गान कराना चाहिये। यदि कथावाचक मौजूद हों तो पहले पुराणका ही पाठ होना चाहिये। वत्स ! श्रीविष्णुके लिये जागरण करनेपर एक हजार अश्वमेध तथा दस हजार वाजपेय यज्ञोंसे भी करोड़गुना पुण्य प्राप्त होता है। श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये जागरण करके मनुष्य पिता, माता तथा पत्नी—तीनोंके कुलोंका उद्धार कर देता है।
यदि एकादशीके व्रतका दिन दशमीसे विद्ध हो तो
उत्तराखण्ड ] * पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य * ६४१
श्रीहरिका पूजन, जागरण और दान आदि सब व्यर्थ होता है—ठीक उसी तरह, जैसे कृतघ्न मनुष्योंके साथ किया हुआ नेकीका बर्ताव व्यर्थ हो जाता है। जो वेधरहित एकादशीको जागरण करते हैं, उनके बीचमें साक्षात् श्रीहरि संतुष्ट होकर नृत्य करते हैं। जो श्रीहरिके लिये नृत्य, गीत और जागरण करता है, उसके लिये ब्रह्माजीका लोक, मेरा कैलास-धाम तथा भगवान् श्रीविष्णुका वैकुण्ठधाम—सब-के-सब निश्चय ही सुलभ हैं। जो स्वयं श्रीहरिके लिये जागरण करते हुए और लोगोंको भी जगाये रखता है, वह विष्णुभक्त पुरुष अपने पितरोंके साथ वैकुण्ठलोकमें निवास करता है। जो श्रीहरिके लिये जागरण करनेकी लोगोंको सलाह देता है, वह मनुष्य साठ हजार वर्षोंतक श्वेतद्वीपमें निवास करता है। नारद ! मनुष्य करोड़ों जन्मोंमें जो पाप सञ्चित करता है, वह सब श्रीहरिके लिये एक रात जागरण करनेपर नष्ट हो जाता है। जो शालग्राम-शिलाके समक्ष जागरण करते हैं, उन्हें एक-एक पहरमें कोटि-कोटि तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है। जागरणके लिये भगवान्के मन्दिरमें जाते समय मनुष्य जितने पग चलता है, वे सभी अश्वमेध यज्ञके समान फल देनेवाले होते हैं। पृथ्वीपर चलते समय दोनों चरणोंपर जितने धूलिकण गिरते हैं, उतने हजार वर्षोंतक जागरण करनेवाला पुरुष दिव्यलोकमें निवास करता है।
इसलिये प्रत्येक द्वादशीको जागरणके लिये अपने घरसे भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाना चाहिये। इससे कलिमलका विनाश होता है। दूसरोंकी निन्दामें संलग्न होना, मनका प्रसन्न न रहना, शास्त्रचर्चाका न होना, संगीतका अभाव, दीपक न जलाना, शक्तिके अनुसार पूजाके उपचारोंका न होना, उदासीनता, निन्दा तथा कलह—इन दोषोंसे युक्त नौ प्रकारका जागरण अधम माना गया है।* जिस जागरणमें शास्त्रकी चर्चा, सात्त्विक नृत्य, संगीत, वाद्य, ताल, तैलयुक्त दीपक, कीर्तन, भक्तिभावना, प्रसन्नता, संतोषजनकता, समुदायकी उपस्थिति तथा लोगोंके मनोरञ्जनका सात्त्विक साधन हो, वह उक्त बारह गुणोंसे युक्त जागरण भगवान्को बहुत प्रिय है। शुक्ल और कृष्ण दोनों ही पक्षोंकी एकादशीको प्रयत्नपूर्वक जागरण करना चाहिये।† नारद ! परदेशमें जानेपर मार्गका थका-माँदा होनेपर भी जो द्वादशीको भगवान् वासुदेवके निमित्त किये जानेवाले जागरणका नियम नही छोड़ता, वह मुझे विशेष प्रिय है। जो एकादशीके दिन भोजन कर लेता है, उसे पशुसे भी गया-बीता समझना चाहिये; वह न तो शिवका उपासक है न सूर्यका, न देवीका भक्त है और न गणेशजीका। जो एकादशीको जागरण करते हैं, उनका बाहर-भीतर यदि करोड़ों पापोंसे घिरा हो तो भी वे मुक्त हो जाते हैं। वेधरहित द्वादशीका व्रत और श्रीविष्णुके लिये किया जानेवाला जागरण यमदूतोंका मानमर्दन करनेवाला है। मुनिश्रेष्ठ ! एकादशीको जागरण करनेवाले मनुष्य अवश्य मुक्त हो जाते हैं।
जो रातको भगवान् वासुदेवके समक्ष जागरणमें प्रवृत्त होनेपर प्रसन्नचित्त हो ताली बजाते हुए नृत्य करता, नाना प्रकारके कौतुक दिखाते हुए मुखसे गीत गाता, वैष्णवजनोंका मनोरञ्जन करते हुए श्रीकृष्ण-चरितका पाठ करता, रोमाञ्चित होकर मुखसे बाजा बजाता तथा स्वेच्छानुसार धार्मिक आलाप करते हुए भाँति-भाँतिके नृत्यका प्रदर्शन करता है, वह भगवान्का प्रिय है। इन भावोंके साथ जो श्रीहरिके लिये जागरण करता है, उसे नैमिष तथा कोटितीर्थका फल प्राप्त होता है। जो शान्तचित्तसे श्रीहरिको धूप-आरती दिखाते हुए रातमें जागरण करता है, वह सात द्वीपोंका अधिपति होता है।
* परापवादसंयुक्तं मनःप्रसादवर्जितम्। शास्त्रहीनमगानञ्च तथा दीपविवर्जितम्॥
शक्त्योपचाररहितमुदासीनं सनिन्दनम्। कलियुक्तं विशेषेण जागरं नवधाऽधमम्॥ (३९। ५३-५४)
† सशास्त्रं जागरं यच्च नृत्यगन्धर्वसंयुतम्। सवाद्यं तालसंयुक्तं सदीपं मधुभिर्युतम्॥
उच्चैरास्तु समायुक्तं यथोक्तैर्भक्तिभावितैः। प्रसन्नं तुष्टिजननं समूढं लोकरञ्जनम्॥
गुणैर्द्वादशभिर्युक्तं जागरं माधवप्रियम्। कर्तव्यं तत् प्रयत्नेन पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ (३९। ५५—५७)
६४२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ****************************************************************************************************
ब्रह्महत्याके समान भी जो कोई पाप हों, वे सब श्रीकृष्णकी प्रीतिका लिये जागरण करनेपर नष्ट हो जाते हैं। एक ओर उत्तम दक्षिणाके साथ समाप्त होनेवाले सम्पूर्ण यज्ञ और दूसरी ओर देवाधिदेव श्रीकृष्णको प्रिय लगनेवाला एकादशीका जागरण—दोनों समान हैं।
जहाँ भगवान्के लिये जागरण किया जाता है वहाँ काशी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य, शालग्राम नामक महाक्षेत्र, अर्बुदारण्य (आबू), शूकरक्षेत्र (सोरोँ), मथुरा तथा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। समस्त यज्ञ और चारों वेद भी श्रीहरिके निमित्त किये जानेवाले जागरणके स्थानपर उपस्थित होते हैं। गङ्गा, सरस्वती, तापी, यमुना, शतद्रू (सतलज), चन्द्रभागा तथा वितस्ता आदि सम्पूर्ण नदियाँ भी वहाँ जाती हैं। द्विजश्रेष्ठ ! सरोवर, कुण्ड और समस्त समुद्र भी एकादशीको जागरणस्थानपर जाते हैं। जो मनुष्य श्रीकृष्णप्रीतिके लिये होनेवाले जागरणके समय वीणा आदि बाजोंसे हर्षमें भरकर नृत्य करते और पद गाते हैं, वे देवताओंके लिये भी आदरणीय होते हैं। इस प्रकार जागरण करके श्रीमहाविष्णुकी पूजा करे और द्वादशीको अपनी शक्तिके अनुसार कुछ वैष्णव पुरुषोंको निमन्त्रित करके उनके साथ बैठकर पारण करे।
द्वादशीको सदा पवित्र और मोक्षदायिनी समझना चाहिये। उस दिन प्रातःस्नान करके श्रीहरिकी पूजा करे और उन्हें निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अपना व्रत समर्पण करे—
अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥
(३९।८१-८२)
'केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो रहा हूँ, आप इस व्रतसे प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।'
इसके बाद यथासम्भव पारण करना चाहिये। पारण समाप्त होनेपर इच्छानुसार विहित कर्मोंका अनुष्ठान करे। नारद ! यदि दिनमें पारणके समय थोड़ी भी द्वादशी न हो तो मुक्तिकामी पुरुषको रातको ही [पिछले पहरमें] पारण कर लेना चाहिये। ऐसे समयमें रात्रिको भोजन करनेका दोष नहीं लगता। रात्रिके पहले और पिछले पहरमें दिनकी भाँति कर्म करने चाहिये। यदि पारणके दिन बहुत थोड़ी द्वादशी हो तो उषाःकालमें ही प्रातःकाल तथा मध्याह्नकालकी भी संध्या कर लेनी चाहिये। इस पृथ्वीपर जिस मनुष्यने द्वादशी-व्रतको सिद्ध कर लिया है, उसका पुण्य-फल बतलानेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। एकादशी देवी सब पुण्योंसे अधिक है तथा यह सर्वदा मोक्ष देनेवाली है। यह द्वादशी नामक व्रत महान् पुण्यदायक है। जो इसका साधन कर लेते हैं, वे महापुरुष समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं। अम्बरीष आदि सभी भक्त, जो इस भूमण्डलमें विख्यात हैं, द्वादशी-व्रतका साधन करके ही विष्णुधामको प्राप्त हुए हैं। यह माहात्म्य, जो मैंने तुम्हें बताया है, सत्य है ! सत्य है !! सत्य है !!! श्रीविष्णुके समान कोई देवता नहीं है और द्वादशीके समान कोई तिथि नहीं है। इस तिथिको जो कुछ दान किया जाता, भोगा जाता तथा पूजन आदि किया जाता है, वह सब भगवान् माधवके पूजित होनेपर पूर्णताको प्राप्त होता है। अधिक क्या कहा जाय, भक्तवल्लभ श्रीहरि द्वादशी-व्रत करनेवाले पुरुषोंकी कामना कल्पान्ततक पूर्ण करते रहते हैं। द्वादशीको किया हुआ सारा दान सफल होता है।
<div align="center">═══ ★ ═══</div>उत्तराखण्ड ] * एकादशीके जया आदि भेद, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन * ६४३
एकादशीके जया आदि भेद, नक्तव्रतका स्वरूप, एकादशीकी विधि, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन
नारदजीने पूछा— महादेव ! महाद्वादशीका उत्तम व्रत कैसा होता है। सर्वेश्वर प्रभो ! उसके व्रतसे जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
महादेवजीने कहा— ब्रह्मन् ! यह एकादशी महान् पुण्यफलको देनेवाली है। श्रेष्ठ मुनियोंको भी इसका अनुष्ठान करना चाहिये। विशेष-विशेष नक्षत्रोंका योग होनेपर यह तिथि जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी—इन चार नामोंसे विख्यात होती है। ये सभी पापोंका नाश करनेवाली हैं। इनका व्रत अवश्य करना चाहिये। जब शुक्लपक्षकी एकादशीको 'पुनर्वसु' नक्षत्र हो तो वह उत्तम तिथि 'जया' कहलाती है। उसका व्रत करके मनुष्य निश्चय ही पापसे मुक्त हो जाता है। जब शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'श्रवण' नक्षत्र हो तो वह उत्तम तिथि 'विजया' के नामसे विख्यात होती है; इसमें किया हुआ दान और ब्राह्मण-भोजन सहस्रगुना फल देनेवाला है तथा होम और उपवास तो सहस्रगुनेसे भी अधिक फल देता है। जब शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'रोहिणी' नक्षत्र हो तो वह तिथि 'जयन्ती' कहलाती है; वह सब पापोंको हरनेवाली है। उस तिथिको पूजित होनेपर भगवान् गोविन्द निश्चय ही मनुष्यके सब पापोंको धो डालते हैं। जब कभी शुक्ल-पक्षकी द्वादशीको 'पुष्य' नक्षत्र हो तो वह महापुण्यमयी 'पापनाशिनी' तिथि कहलाती है। जो एक वर्षतक प्रति-दिन एक प्रस्थ तिल दान करता है तथा जो केवल 'पापनाशिनी' एकादशीको उपवास करता है, उन दोनोंका पुण्य समान होता है। उस तिथिको पूजित होनेपर संसारके स्वामी सर्वेश्वर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं तथा प्रत्यक्ष दर्शन भी देते हैं। उस दिन प्रत्येक पुण्यकर्मका अनन्त फल माना गया है। सगरनन्दन ककुत्स्थ, नहुष तथा राजा गाधिने उस तिथिको भगवान्की आराधना की थी, जिससे भगवान्ने इस पृथ्वीपर उन्हें सब कुछ दिया था। इस तिथिके सेवनसे मनुष्य सात जन्मोंके कायिक, वाचिक और मानसिक पापसे मुक्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। पुष्य नक्षत्रसे युक्त एकमात्र पापनाशिनी एकादशीका व्रत करके मनुष्य एक हजार एकादशियोंके व्रतका फल प्राप्त कर लेता है। उस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजा आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसका अक्षय फल माना गया है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इसका व्रत करना चाहिये। जिस समय धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर पञ्चम अश्वमेध यज्ञका स्नान कर चुके, उस समय उन्होंने यदुवंशावतंस भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रश्न किया।
युधिष्ठिर बोले— प्रभो ! नक्तव्रत तथा एकभुक्त व्रतका पुण्य एवं फल क्या है ? जनार्दन ! यह सब मुझे बताइये।
श्रीभगवान्ने कहा— कुन्तीनन्दन ! हेमन्त ऋतुमें जब परम कल्याणमय मार्गशीर्ष मास आये, तब उसके कृष्णपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास (व्रत) करना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है—दृढ़तापूर्वक उत्तम
६४४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
व्रतका पालन करनेवाला शुद्धचित्त पुरुष दशमीको सदा एकभुक्त रहे अथवा शौच-सन्तोषादि नियमोंके पालनपूर्वक नक्तव्रतके स्वरूपको जानकर उसके अनुसार एक बार भोजन करे। दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका तेज मन्द पड़ जाता है, उसे 'नक्त' जानना चाहिये। रातको भोजन करना 'नक्त' नहीं है। गृहस्थके लिये तारोंके दिखायी देनेपर नक्तभोजनका विधान है और संन्यासीके लिये दिनके आठवें भागमें; क्योंकि उसके लिये रातमें भोजनका निषेध है। कुन्तीनन्दन ! दशमीकी रात व्यतीत होनेपर एकादशीको प्रातःकाल व्रत करनेवाला पुरुष व्रतका नियम ग्रहण करे और सबेरे तथा मध्याह्नको पवित्रताके लिये स्नान करे। कुएँका स्नान निम्न श्रेणीका है। बावलीमें स्नान करना मध्यम, पोखरेमें उत्तम तथा नदीमें उससे भी उत्तम माना गया है। जहाँ जलमें खड़ा होनेपर जल-जन्तुओंको पीड़ा होती हो, वहाँ स्नान करनेपर पाप और पुण्य बराबर होता है। यदि जलको छानकर शुद्ध कर ले तो घरपर भी स्नान करना उत्तम माना गया है। इसलिये पाण्डव श्रेष्ठ ! घरपर उक्त विधिसे स्नान करे। स्नानके पहले निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर शरीरमें मृत्तिका लगा ले—
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्॥
(४०। २८)
'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं। भगवान् विष्णुने भी वामन अवतार धारण कर तुम्हें अपने पैरोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने पूर्वकालमें जो पाप सञ्चित किया है, उस मेरे पापको हर लो।'
व्रती पुरुषको चाहिये कि वह एकचित्त और दृढ़ सङ्कल्प होकर क्रोध तथा लोभका परित्याग करे। अन्त्यज, पाखण्डी, मिथ्यावादी, ब्राह्मणनिन्दक, अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेवाले अन्यान्य दुराचारी, परधनहारी तथा परस्त्रीगामी मनुष्योंसे वार्तालाप न करे। भगवान् केशवकी पूजा करके उन्हें नैवेद्य भोग लगाये। घरमें भक्तियुक्त मनसे दीपक जलाकर रखे। पार्थ ! उस दिन निद्रा और मैथुनका परित्याग करे। धर्मशास्त्रसे मनोरञ्जन करते हुए सम्पूर्ण दिन व्यतीत करे। नृपश्रेष्ठ ! भक्तियुक्त होकर रात्रिमें जागरण करे, ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और प्रणाम करके उनसे त्रुटियोंके लिये क्षमा माँगे। जैसी कृष्णपक्षकी एकादशी है, वैसी ही शुक्लपक्षकी भी है। इसी विधिसे उसका भी व्रत करना चाहिये।
पार्थ ! द्विजको उचित है कि वह शुक्ल और कृष्ण-पक्षकी एकादशीके व्रती लोगोंमें भेदबुद्धि न उत्पन्न करे। शङ्खोद्धार तीर्थमें स्नान करके भगवान् गदाधरका दर्शन करनेसे जो पुण्य होता है तथा संक्रान्तिके अवसरपर चार लाखका दान देकर जो पुण्य प्राप्त किया जाता है, वह सब एकादशीव्रतकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। प्रभासक्षेत्रमें चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके अवसरपर स्नान-दानसे जो पुण्य होता है, वह निश्चय ही एकादशीको उपवास करनेवाले मनुष्यको मिल जाता है। केदारक्षेत्रमें जल पीनेसे पुनर्जन्म नहीं होता। एकादशीका भी ऐसा ही माहात्म्य है। यह भी गर्भवासका निवारण करनेवाली है। पृथ्वीपर अश्वमेध यज्ञका जो फल होता है, उससे सौगुना अधिक फल एकादशी-व्रत करने-वालेको मिलता है। जिसके घरमें तपस्वी एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करते हैं उसको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह एकादशी-व्रत करनेवालेको भी अवश्य मिलता है। वेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको सहस्र गोदान करनेसे जो पुण्य होता है, उससे सौगुना पुण्य एकादशी-व्रत करनेवालेको प्राप्त होता है। इस प्रकार व्रतीको वह पुण्य प्राप्त होता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। रातको भोजन कर लेनेपर उससे आधा पुण्य प्राप्त होता है तथा दिनमें एक बार भोजन करनेसे देहधारियोंको नक्त-भोजनका आधा फल मिलता है। जीव जबतक भगवान् विष्णुके प्रिय दिवस एकादशीको उपवास नहीं करता, तभीतक तीर्थ, दान और नियम अपने महत्त्वकी गर्जना करते हैं। इसलिये पाण्डव-श्रेष्ठ ! तुम इस व्रतका अनुष्ठान करो। कुन्तीनन्दन ! यह गोपनीय एवं उत्तम व्रत है, जिसका मैंने तुमसे वर्णन किया है। हजारों यज्ञोंका अनुष्ठान भी एकादशी-व्रतकी तुलना नहीं कर सकता।
उत्तरखण्ड ] * एकादशीके जया आदि भेद, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन * ६४५
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन् ! पुण्यमयी एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई ? इस संसारमें क्यों पवित्र मानी गयी ? तथा देवताओंको कैसे प्रिय हुई ?
श्रीभगवान् बोले— कुन्तीनन्दन ! प्राचीन समयकी बात है, सत्ययुगमें मुर नामक दानव रहता था। वह बड़ा ही अद्भुत, अत्यन्त रौद्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके लिये भयङ्कर था। उस कालरूपधारी दुरात्मा महासुरने इन्द्रको भी जीत लिया था। सम्पूर्ण देवता उससे परास्त होकर स्वर्गसे निकाले जा चुके थे और शंकित तथा भयभीत होकर पृथ्वीपर विचरा करते थे। एक दिन सब देवता महादेवजीके पास गये। वहाँ इन्द्रने भगवान् शिवके आगे सारा हाल कह सुनाया।
इन्द्र बोले— महेश्वर ! ये देवता स्वर्गलोकसे भ्रष्ट होकर पृथ्वीपर विचर रहे हैं। मनुष्योंमें रहकर इनकी शोभा नहीं होती। देव ! कोई उपाय बतलाइये। देवता किसका सहारा लें ?
महादेवजीने कहा— देवराज ! जहाँ सबको शरण देनेवाले, सबकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले जगत्के स्वामी भगवान् गरुड़ध्वज विराजमान हैं, वहाँ जाओ। वे तुमलोगोंकी रक्षा करेंगे।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! महादेवजीकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ वहाँ गये। भगवान् गदाधर क्षीरसागरके जलमें सो रहे थे। उनका दर्शन करके इन्द्रने हाथ जोड़कर स्तुति आरम्भ की।
इन्द्र बोले— देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। देवता और दानव दोनों ही आपकी वन्दना करते हैं। पुण्डरीकाक्ष ! आप दैत्योंके शत्रु हैं। मधुसूदन ! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। जगन्नाथ ! सम्पूर्ण देवता मुर नामक दानवसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं।
भक्तवत्सल ! हमें बचाइये। देवदेवेश्वर ! हमें बचाइये। जनार्दन ! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। दानवोंका विनाश करनेवाले कमलनयन ! हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो ! हम सब लोग आपके समीप आये हैं। आपकी ही शरणमें आ पड़े हैं। भगवन् ! शरणमें आये हुए देवताओंकी सहायता कीजिये। देव ! आप ही पति, आप ही मति, आप ही कर्ता और आप ही कारण हैं। आप ही सब लोगोंकी माता और आप ही इस जगत्के पिता हैं। भगवन् ! देवदेवेश्वर ! शरणागतवत्सल ! देवता भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं। प्रभो ! अत्यन्त उग्र स्वभाववाले महाबली मुर नामक दैत्यने सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर. इन्हें स्वर्गसे निकाल दिया है।*
* ॐ नमो देवदेवेश देवदानववन्दित। दैत्यारे पुण्डरीकाक्ष त्राहि नो मधुसूदन ॥
सुराः सर्वे समायाता भयभीताश्च दानवात्। शरणं त्वां जगन्नाथ त्राहि नो भक्तवत्सल ॥
त्राहि नो देवदेवेश त्राहि त्राहि जनार्दन। त्राहि वै पुण्डरीकाक्ष दानवानां विनाशक ॥
त्वत्समीपं गताः सर्वे त्वामेव शरणं प्रभो। शरणागतदेवानां साहाय्यं कुरु वै प्रभो ॥
त्वं पतिस्त्वं मतिर्देव त्वं कर्ता त्वं च कारणम्। त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता ॥
भगवन् देवदेवेश शरणागतवत्सल। शरणं तव चायाता भयभीताश्च देवताः ॥
देवता निर्जिताः सर्वाः स्वर्गभ्रष्टाः कृता विभो। अत्युग्रेण हि दैत्येन मुरनाम्ना महौजसा ॥ (४०। ५७—६३)
६४६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
इन्द्रकी बात सुनकर भगवान् विष्णु बोले— 'देवराज ! वह दानव कैसा है ? उसका रूप और बल कैसा है तथा उस दुष्टके रहनेका स्थान कहाँ है ?'
इन्द्र बोले—देवेश्वर ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीके वंशमें तालजङ्घ नामक एक महान् असुर उत्पन्न हुआ था, जो अत्यन्त भयङ्कर था। उसका पुत्र मुर दानवके नामसे विख्यात हुआ। वह भी अत्यन्त उत्कट, महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयङ्कर है। चन्द्रावती नामसे प्रसिद्ध एक नगरी है, उसीमें स्थान बनाकर वह निवास करता है। उस दैत्यने समस्त देवताओंको परास्त करके स्वर्गलोकसे बाहर कर दिया है। उसने एक दूसरे ही इन्द्रको स्वर्गके सिंहासनपर बैठाया है। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, वायु तथा वरुण भी उसने दूसरे ही बनाये हैं। जनार्दन ! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ। उसने सब कोई दूसरे ही कर लिये हैं। देवताओंको तो उसने प्रत्येक स्थानसे वञ्चित कर दिया है।
इन्द्रका कथन सुनकर भगवान् जनार्दनको बड़ा क्रोध हुआ। वे देवताओंको साथ लेकर चन्द्रावतीपुरीमें गये। देवताओंने देखा, दैत्यराज बारम्बार गर्जना कर रहा है; उससे परास्त होकर सम्पूर्ण देवता दसों दिशाओंमें भाग गये। अब वह दानव भगवान् विष्णुको देखकर बोला, 'खड़ा रह, खड़ा रह ।' उसकी ललकार सुनकर भगवान्के नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे बोले—'अरे दुराचारी दानव ! मेरी इन भुजाओंको देख।' यह कहकर श्रीविष्णुने अपने दिव्य बाणोंसे सामने आये हुए दुष्ट दानवोंको मारना आरम्भ किया। दानव भयसे विह्वल हो उठे। पाण्डुनन्दन ! तत्पश्चात् श्रीविष्णुने दैत्य-सेनापर चक्रका प्रहार किया। उससे छिन्न-भिन्न होकर सैकड़ों योद्धा मौतके मुखमें चले गये। इसके बाद भगवान् मधुसूदन बद्रिकाश्रमको चले गये। वहाँ सिंहावती नामकी गुफा थी, जो बारह योजन लम्बी थी। पाण्डु-नन्दन ! उस गुफामें एक ही दरवाजा था। भगवान् विष्णु उसीमें सो रहे। दानव मुर भगवान्को मार डालनेके उद्योगमें लगा था। वह उनके पीछे लगा रहा। वहाँ पहुँचकर उसने भी उसी गुहामें प्रवेश किया। वहाँ भगवान्को सोते देख उसे बड़ा हर्ष हुआ। उसने सोचा, 'यह दानवोंको भय देनेवाला देवता है। अतः निस्सन्देह इसे मार डालूँगा।' युधिष्ठिर ! दानवके इस प्रकार विचार
उत्तराखण्ड ] \qquad\qquad * मार्गशीर्ष शुक्लपक्षकी 'मोक्षा' एकादशीका माहात्म्य * \qquad\qquad ६४७
करते ही भगवान् विष्णुके शरीरसे एक कन्या प्रकट हुई, जो बड़ी ही रूपवती, सौभाग्यशालिनी तथा दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त थी। वह भगवान्के तेजके अंशसे उत्पन्न हुई थी। उसका बल और पराक्रम महान् था। युधिष्ठिर ! दानवराज मुरने उस कन्याको देखा। कन्याने युद्धका विचार करके दानवके साथ युद्धके लिये याचना की। युद्ध छिड़ गया। कन्या सब प्रकारकी युद्धकलामें निपुण थी ! वह मुर नामक महान् असुर उसके हुंकार-मात्रसे राखका ढेर हो गया। दानवके मारे जानेपर भगवान् जाग उठे। उन्होंने दानवको धरतीपर पड़ा देख, पूछा—'मेरा यह शत्रु अत्यन्त उग्र और भयङ्कर था, किसने इसका वध किया है ?'
कन्या बोली— स्वामिन् ! आपके ही प्रसादसे मैंने इस महादैत्यका वध किया है।
श्रीभगवान्ने कहा— कल्याणी ! तुम्हारे इस कर्मसे तीनों लोकोंके मुनि और देवता आनन्दित हुए हैं ! अतः तुम्हारे मनमें जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझसे कोई वर माँगो; देवदुर्लभ होनेपर भी वह वर मैं तुम्हें दूँगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
वह कन्या साक्षात् एकादशी ही थी। उसने कहा, 'प्रभो ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपकी कृपासे सब तीर्थोंमें प्रधान, समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाली तथा सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली देवी होऊँ। जनार्दन ! जो लोग आपमें भक्ति रखते हुए मेरे दिनको उपवास करेंगे, उन्हें सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त हो। माधव ! जो लोग उपवास, नक्त अथवा एकभुक्त करके मेरे व्रतका पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म और मोक्ष प्रदान कीजिये।'
श्रीविष्णु बोले— कल्याणी ! तुम जो कुछ कहती हो, वह सब पूर्ण होगा।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! ऐसा वर पाकर महाव्रता एकादशी बहुत प्रसन्न हुई। दोनों पक्षोंकी एकादशी समान रूपसे कल्याण करनेवाली है। इसमें शुक्ल और कृष्णका भेद नहीं करना चाहिये। यदि उदयकालमें थोड़ी-सी एकादशी, मध्यमें पूरी द्वादशी और अन्तमें किञ्चित् त्रयोदशी हो तो वह 'त्रिस्पृशा' एकादशी कहलाती है। वह भगवान्को बहुत ही प्रिय है। यदि एक त्रिस्पृशा एकादशीको उपवास कर लिया जाय तो एक सहस्र एकादशीव्रतोंका फल प्राप्त होता है तथा इसी प्रकार द्वादशीमें पारण करनेपर सहस्रगुना फल माना गया है। अष्टमी, एकादशी, षष्ठी, तृतीया और चतुर्दशी—ये यदि पूर्व तिथिसे विद्ध हों तो उनमें व्रत नहीं करना चाहिये। परवर्तिनी तिथिसे युक्त होनेपर ही इनमें उपवासका विधान है। पहले दिन दिनमें और रातमें भी एकादशी हो तथा दूसरे दिन केवल प्रातःकाल एक दण्ड एकादशी रहे तो पहली तिथिका परित्याग करके दूसरे दिनकी द्वादशीयुक्त एकादशीको ही उपवास करना चाहिये। यह विधि मैंने दोनों पक्षोंकी एकादशीके लिये बतायी है। जो मनुष्य एकादशीको उपवास करता है, वह वैकुण्ठधाममें, जहाँ साक्षात् भगवान् गरुडध्वज विराजमान हैं, जाता है। जो मानव हर समय एकादशीके माहात्म्यका पाठ करता है, उसे सहस्र गोदानोंके पुण्यका फल प्राप्त होता है। जो दिन या रातमें भक्तिपूर्वक इस माहात्म्यका श्रवण करते हैं, वे निःसन्देह ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। एकादशीके समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है।
मार्गशीर्ष शुक्लपक्षकी 'मोक्षा' एकादशीका माहात्म्य
युधिष्ठिर बोले— देवदेवेश्वर ! मैं पूछता हूँ—मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ? कौन-सी विधि है तथा उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है ? स्वामिन् ! यह सब यथार्थरूपसे बताइये।
श्रीकृष्णने कहा— नृपश्रेष्ठ ! मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षमें 'उत्पत्ति' नामकी एकादशी होती है, जिसका वर्णन मैंने तुम्हारे समक्ष कर दिया है। अब शुक्लपक्षकी एकादशीका वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। उसका नाम है—'मोक्षा'
६४८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ***********************************************************************************************
एकादशी, जो सब पापोंका अपहरण करनेवाली है। राजन् ! उस दिन यत्नपूर्वक तुलसीकी मञ्जरी तथा धूप-दीपादिसे भगवान् दामोदरका पूजन करना चाहिये। पूर्वोक्त विधिसे ही दशमी और एकादशीके नियमका पालन करना उचित है। 'मोक्षा' एकादशी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। उस दिन रात्रिमें मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य, गीत और स्तुतिके द्वारा जागरण करना चाहिये। जिसके पितर पापवश नीच योनिमें पड़े हों, वे इसका पुण्य दान करनेसे मोक्षको प्राप्त होते हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। पूर्वकालकी बात है, वैष्णवोंसे विभूषित परम रमणीय चम्पक नगरमें वैखानस नामक राजा रहते थे। वे अपनी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे। इस प्रकार राज्य करते हुए राजाने एक दिन रातको स्वप्नमें अपने पितरोंको नीच योनिमें पड़ा हुआ देखा। उन सबको इस अवस्थामें देखकर राजाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और प्रातःकाल ब्राह्मणोंसे उन्होंने उस स्वप्नका सारा हाल कह सुनाया।
राजा बोले— ब्राह्मणो ! मैंने अपने पितरोंको नरकमें गिरा देखा है। वे बारम्बार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि 'तुम हमारे तनुज हो, इसलिये इस नरक-समुद्रसे हमलोगोंका उद्धार करो।' द्विजवरो ! इस रूपमें मुझे पितरोंके दर्शन हुए हैं। इससे मुझे चैन नहीं मिलता। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है। द्विजोत्तमो ! वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरकसे छुटकारा पा जायें, बतानेकी कृपा करें। मुझ बलवान् एवं साहसी पुत्रके जीते-जी मेरे माता-पिता घोर नरकमें पड़े हुए हैं ! अतः ऐसे पुत्रसे क्या लाभ है।
ब्राह्मण बोले— राजन् ! यहाँसे निकट ही पर्वत मुनिका महान् आश्रम है। वे भूत और भविष्यके भी ज्ञाता हैं। नृपश्रेष्ठ ! आप उन्हींके पास चले जाइये।
ब्राह्मणोंकी बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत मुनिके आश्रमपर गये और वहाँ उन मुनिश्रेष्ठको देखकर उन्होंने दण्डवत्-प्रणाम करके मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने भी राजासे राज्यके सातों<sup>१</sup> अङ्गोंकी कुशल पूछी।
राजा बोले— स्वामिन् ! आपकी कृपासे मेरे राज्यके सातों अङ्ग सकुशल हैं। किन्तु मैंने स्वप्नमें देखा है कि मेरे पितर नरकमें पड़े हैं; अतः बताइये किस पुण्यके प्रभावसे उनका वहाँसे छुटकारा होगा ?
राजाकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ रहे। इसके बाद वे राजासे बोले— 'महाराज ! मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें जो 'मोक्षा' नामकी एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो और उसका पुण्य पितरोंको दे डालो। उस पुण्यके प्रभावसे उनका नरकसे उद्धार हो जायगा।'
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! मुनिकी यह बात सुनकर राजा पुनः अपने घर लौट आये। जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया, तब राजा वैखानसने मुनिके कथनानुसार 'मोक्षा' एकादशीका व्रत करके उसका पुण्य समस्त पितरोंसहित पिताको दे दिया। पुण्य देते ही क्षणभरमें आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। वैखानसके पिता पितरोंसहित नरकसे छुटकारा पा गये और आकाशमें आकर राजाके प्रति यह पवित्र वचन बोले—'बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो।' यह कहकर वे स्वर्गमें चले गये। राजन् ! जो इस प्रकार कल्याणमयी 'मोक्षा' एकादशीका व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरनेके बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यह मोक्ष देनेवाली 'मोक्षा' एकादशी मनुष्योंके लिये चिन्तामणिके समान समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है। इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है।
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१. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये ही परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अङ्ग हैं।
उत्तरखण्ड ] * पौष मासकी 'सफला' और 'पुत्रदा' नामक एकादशीका माहात्म्य * ६४९
पौष मासकी 'सफला' और 'पुत्रदा' नामक एकादशीका माहात्म्य
युधिष्ठिरने पूछा- स्वामिन् ! पौष मासके
कृष्णपक्षमें जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ?
उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस देवताकी पूजा की
जाती है ? यह बताइये।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- राजेन्द्र ! बतलाता
हूँ, सुनो; बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे भी मुझे उतना
संतोष नहीं होता, जितना एकादशी-व्रतके अनुष्ठानसे
होता है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके एकादशीका व्रत
करना चाहिये। पौष मासके कृष्णपक्षमें 'सफला' नामकी
एकादशी होती है। उस दिन पूर्वोक्त विधानसे ही
विधिपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा करनी चाहिये।
एकादशी कल्याण करनेवाली है। अतः इसका व्रत
अवश्य करना उचित है। जैसे नागोंमें शेषनाग, पक्षियोंमें
गरुड़, देवताओंमें श्रीविष्णु तथा मनुष्योंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ
है, उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतोंमें एकादशी तिथि श्रेष्ठ है।
राजन् ! 'सफला' एकादशीको नाम-मन्त्रोंका उच्चारण
करके फलोंके द्वारा श्रीहरिका पूजन करे। नारियलके
फल, सुपारी, बिजौरा नीबू, जमीरा नीबू, अनार, सुन्दर
आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषतः आमके फलोंसे
देवदेवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार
धूप-दीपसे भी भगवान्की अर्चना करे। 'सफला'
एकादशीको विशेषरूपसे दीप-दान करनेका विधान है।
रातको वैष्णव पुरुषोंके साथ जागरण करना चाहिये।
जागरण करनेवालेको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह
हजारों वर्ष तपस्या करनेसे भी नहीं मिलता।
नृपश्रेष्ठ ! अब 'सफला' एकादशीकी शुभकारिणी
कथा सुनो। चम्पावती नामसे विख्यात एक पुरी है, जो
कभी राजा माहिष्मतकी राजधानी थी। राजर्षि
माहिष्मतके पाँच पुत्र थे। उनमें जो ज्येष्ठ था, वह सदा
पापकर्ममें ही लगा रहता था। परस्त्रीगामी और
वेश्यासक्त था। उसने पिताके धनको पापकर्ममें ही खर्च
किया। वह सदा दुराचारपरायण तथा ब्राह्मणोंका निन्दक
था। वैष्णवों और देवताओंकी भी हमेशा निन्दा किया
करता था। अपने पुत्रको ऐसा पापाचारी देखकर राजा
माहिष्मतने राजकुमारोंमें उसका नाम लुम्भक रख दिया।
फिर पिता और भाइयोंने मिलकर उसे राज्यसे बाहर
निकाल दिया। लुम्भक उस नगरसे निकलकर गहन
वनमें चला गया। वहीं रहकर उस पापीने प्रायः समूचे
नगरका धन लूट लिया। एक दिन जब वह चोरी करनेके
लिये नगरमें आया तो रातमें पहरा देनेवाले सिपाहियोंने
उसे पकड़ लिया। किन्तु जब उसने अपनेको राजा
माहिष्मतका पुत्र बतलाया तो सिपाहियोंने उसे छोड़
दिया। फिर वह पापी वनमें लौट आया और प्रतिदिन
मांस तथा वृक्षोंके फल खाकर जीवन-निर्वाह करने
लगा। उस दुष्टका विश्राम-स्थान पीपल वृक्षके निकट
था। वहाँ बहुत वर्षोंका पुराना पीपलका वृक्ष था। उस
वनमें वह वृक्ष एक महान् देवता माना जाता था।
पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था।
बहुत दिनोंके पश्चात् एक दिन किसी संचित पुण्यके
प्रभावसे उसके द्वारा एकादशीके व्रतका पालन हो गया।
पौष मासमें कृष्णपक्षकी दशमीके दिन पापिष्ठ लुम्भकने
वृक्षोंके फल खाये और वस्त्रहीन होनेके कारण रातभर
जाड़ेका कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आयी
और न आराम ही मिला। वह निष्प्राण-सा हो रहा था।
सूर्योदय होनेपर भी उस पापीको होश नहीं हुआ।
'सफला' एकादशीके दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा।
दोपहर होनेपर उसे चेतना प्राप्त हुई। फिर इधर-उधर
दृष्टि डालकर वह आसनसे उठा और लँगड़ेकी भाँति
पैरोंसे बार-बार लड़खड़ाता हुआ वनके भीतर गया। वह
भूखसे दुर्बल और पीड़ित हो रहा था। राजन् ! उस
समय लुम्भक बहुत-से फल लेकर ज्यों ही विश्राम-
स्थानपर लौटा, त्यों ही सूर्यदेव अस्त हो गये। तब उसने
वृक्षकी जड़में बहुत-से फल निवेदन करते हुए कहा-
'इन फलोंसे लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु संतुष्ट हों।' यों
कहकर लुम्भकने रातभर नींद नहीं ली। इस प्रकार
अनायास ही उसने इस व्रतका पालन कर लिया। उस
६५०
- अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *
[ संक्षिप्त पद्मपुराण
समय सहसा आकाशवाणी हुई- 'राजकुमार ! तुम
कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। इसलिये दोनों
'सफला' एकादशीके प्रसादसे राज्य और पुत्र प्राप्त
पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोकमें डूबे रहते थे। राजाके
करोगे।' 'बहुत अच्छा' कहकर उसने वह वरदान
पितर उनके दिये हुए जलको शोकोच्छ्वाससे गरम
स्वीकार किया। इसके बाद उसका रूप दिव्य हो गया।
करके पीते थे। 'राजाके बाद और कोई ऐसा नहीं
तबसे उसकी उत्तम बुद्धि भगवान् विष्णुके भजनमें लग
दिखायी देता, जो हमलोगोंका तर्पण करेगा' यह
गयी। दिव्य आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न होकर उसने
सोच-सोचकर पितर दुःखी रहते थे।
अकण्टक राज्य प्राप्त किया और पंद्रह वर्षोंतक वह
एक दिन राजा घोड़ेपर सवार हो गहन वनमें चले
उसका संचालन करता रहा। उस समय भगवान्
गये। पुरोहित आदि किसीको भी इस बातका पता न
श्रीकृष्णकी कृपासे उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न
था। मृग और पक्षियोंसे सेवित उस सघन काननमें राजा
हुआ। जब वह बड़ा हुआ, तब लुम्भकने तुरंत ही
भ्रमण करने लगे। मार्गमें कहीं सियारकी बोली सुनायी
राज्यकी ममता छोड़कर उसे पुत्रको सौंप दिया और वह
पड़ती थी तो कहीं उल्लुओंकी। जहाँ-तहाँ रीछ और मृग
भगवान् श्रीकृष्णके समीप चला गया, जहाँ जाकर
दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार घूम-घूमकर राजा
मनुष्य कभी शोकमें नहीं पड़ता। राजन् ! इस प्रकार जो
वनकी शोभा देख रहे थे, इतनेमें दोपहर हो गया।
'सफला' एकादशीका उत्तम व्रत करता है, वह इस
राजाको भूख और प्यास सताने लगी। वे जलकी खोजमें
लोकमें सुख भोगकर मरनेके पश्चात् मोक्षको प्राप्त होता
इधर-उधर दौड़ने लगे। किसी पुण्यके प्रभावसे उन्हें एक
है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो 'सफला' एकादशीके
उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियोंके
व्रतमें लगे रहते हैं। उन्हींका जन्म सफल है। महाराज !
बहुत-से आश्रम थे। शोभाशाली नरेशने उन आश्रमोंकी
इसकी महिमाको पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार
ओर देखा। उस समय शुभकी सूचना देनेवाले शकुन
आचरण करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है।
होने लगे। राजाका दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ
युधिष्ठिर बोले- श्रीकृष्ण ! आपने शुभकारिणी
'सफला' एकादशीका वर्णन किया। अब कृपा करके
शुक्लपक्षकी एकादशीका महत्त्व बतलाइये। उसका क्या
नाम है ? कौन-सी विधि है ? तथा उसमें किस देवताका
पूजन किया जाता है ?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - राजन् ! पौषके
शुक्लपक्षकी जो एकादशी है, उसे बतलाता हूँ; सुनो।
महाराज ! संसारके हितकी इच्छासे मैं इसका वर्णन
करता हूँ। राजन् ! पूर्वोक्त विधिसे ही यत्नपूर्वक इसका
व्रत करना चाहिये। इसका नाम 'पुत्रदा' है। यह सब
पापोंको हरनेवाली उत्तम तिथि है। समस्त कामनाओं
तथा सिद्धियोंके दाता भगवान् नारायण इस तिथिके
अधिदेवता हैं। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें
इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं है। पूर्वकालकी
बात है, भद्रावती पुरीमें राजा सुकेतुमान् राज्य करते थे।
उनकी रानीका नाम चम्पा था। राजाको बहुत समयतक
उत्तराखण्ड ] $\qquad\quad$ * माघ मासकी 'षट्तिला' और 'जया' एकादशीका माहात्म्य * $\qquad\quad$ ६५१
फड़कने लगा, जो उत्तम फलकी सूचना दे रहा था। सरोवरके तटपर बहुत-से मुनि वेद-पाठ कर रहे थे। उन्हें देखकर राजाको बड़ा हर्ष हुआ। वे घोड़ेसे उतरकर मुनियोंके सामने खड़े हो गये और पृथक्-पृथक् उन सबकी वन्दना करने लगे। वे मुनि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले थे। जब राजाने हाथ जोड़कर बारम्बार दण्डवत् किया, तब मुनि बोले—'राजन्! हमलोग तुमपर प्रसन्न हैं।'
राजा बोले—आपलोग कौन हैं ? आपके नाम क्या हैं तथा आपलोग किसलिये यहाँ एकत्रित हुए हैं ? यह सब सच-सच बताइये।
मुनि बोले—राजन्! हमलोग विश्वेदेव हैं, यहाँ स्नानके लिये आये हैं। माघ निकट आया है। आजसे पाँचवें दिन माघका स्नान आरम्भ हो जायगा। आज ही 'पुत्रदा' नामकी एकादशी है, जो व्रत करनेवाले मनुष्योंको पुत्र देती है।
राजाने कहा—विश्वेदेवगण! यदि आपलोग प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये।
मुनि बोले—राजन्! आजके ही दिन 'पुत्रदा' नामकी एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रतका पालन करो। महाराज! भगवान् केशवके प्रसादसे तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त होगा।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन मुनियोंके कहनेसे राजाने उत्तम व्रतका पालन किया। महर्षियोंके उपदेशके अनुसार विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशीका अनुष्ठान किया। फिर द्वादशीको पारण करके मुनियोंके चरणोंमें बारम्बार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये। तदनन्तर रानीने गर्भ धारण किया। प्रसवकाल आनेपर पुण्यकर्मा राजाको तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने अपने गुणोंसे पिताको संतुष्ट कर दिया। वह प्रजाओंका पालक हुआ। इसलिये राजन् ! 'पुत्रदा'का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिये। मैंने लोगोंके हितके लिये तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर 'पुत्रदा'का व्रत करते हैं, वे इस लोकमें पुत्र पाकर मृत्युके पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्यको पढ़ने और सुननेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है !
— $\bigstar$ —
माघ मासकी 'षट्तिला' और 'जया' एकादशीका माहात्म्य
युधिष्ठिरने पूछा—जगन्नाथ ! श्रीकृष्ण ! आदिदेव ! जगत्पते ! माघ मासके कृष्ण पक्षमें कौन-सी एकादशी होती है ? उसके लिये कैसी विधि है ? तथा उसका फल क्या है ? महाप्राज्ञ ! कृपा करके ये सब बातें बताइये।
श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ ! सुनो, माघ मासके कृष्ण पक्षकी जो एकादशी है, वह 'षट्तिला'के नामसे विख्यात है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। अब तुम 'षट्तिला'की पापहारिणी कथा सुनो, जिसे मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यने दालभ्यसे कहा था।
दालभ्यने पूछा—ब्रह्मन् ! मृत्युलोकमें आये हुए प्राणी प्रायः पापकर्म करते हैं। उन्हें नरकमें न जाना पड़े, इसके लिये कौन-सा उपाय है ? बतानेकी कृपा करें।
पुलस्त्यजी बोले—महाभाग ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, बतलाता हूँ; सुनो। माघ मास आनेपर मनुष्यको चाहिये कि वह नहा-धोकर पवित्र हो इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और चुगली आदि बुराइयोंको त्याग दे। देवाधिदेव ! भगवान्का स्मरण करके जलसे पैर धोकर भूमिपर पड़े हुए गोबरका संग्रह करे। उसमें तिल और कपास छोड़कर एक सौ आठ पिंडिकाएँ बनाये। फिर माघमें जब आर्द्रा या मूल नक्षत्र आये, तब कृष्ण पक्षकी एकादशी करनेके लिये नियम ग्रहण करे। भलीभाँति स्नान करके पवित्र हो शुद्धभावसे देवाधिदेव श्रीविष्णुकी पूजा करे। कोई भूल हो जानेपर श्रीकृष्णका नामोच्चारण करे। रातको जागरण और होम करे। चन्दन, अरगजा, कपूर, नैवेद्य आदि सामग्रीसे शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करे। तत्पश्चात्
६५२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
भगवान्का स्मरण करके बारम्बार श्रीकृष्णनामका उच्चारण करते हुए कुम्हड़े, नारियल अथवा बिजौरेके फलसे भगवान्को विधिपूर्वक पूजकर अर्घ्य दे। अन्य सब सामग्रियोंके अभावमें सौ सुपारियोंके द्वारा भी पूजन और अर्घ्यदान किये जा सकते हैं। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव।
संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज॥
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते।
(४४। १८–२०)
'सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप बड़े दयालु हैं। हम आश्रयहीन जीवोंके आप आश्रयदाता होइये। पुरुषोत्तम! हम संसार-समुद्रमें डूब रहे हैं, आप हमपर प्रसन्न होइये। कमलनयन! आपको नमस्कार है, विश्वभावन! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! महापुरुष! सबके पूर्वज! आपको नमस्कार है। जगत्पते! आप लक्ष्मीजीके साथ मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार करें।'
तत्पश्चात् ब्राह्मणकी पूजा करे। उसे जलका घड़ा दान करे। साथ ही छाता, जूता और वस्त्र भी दे। दान करते समय ऐसा कहे—'इस दानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों।' अपनी शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणको काली गौ दान करे। द्विजश्रेष्ठ! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह तिलसे भरा हुआ पात्र भी दान करे। उन तिलोंके बोनेपर उनसे जितनी शाखाएँ पैदा हो सकती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तिलसे स्नान करे, तिलका उबटन लगाये, तिलसे होम करे; तिल मिलाया हुआ जल पिये, तिलका दान करे और तिलोंको भोजनके काममें ले। इस प्रकार छः कामोंमें तिलका उपयोग करनेसे यह एकादशी 'षट्तिला' कहलाती है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है।*
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने माघ मासके कृष्ण पक्षकी 'षट्तिला' एकादशीका वर्णन किया। अब कृपा करके यह बताइये कि शुक्ल पक्षमें कौन-सी एकादशी होती है? उसकी विधि क्या है? तथा उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजेन्द्र! बतलाता हूँ, सुनो। माघ मासके शुक्ल पक्षमें जो एकादशी होती है, उसका नाम 'जया' है। वह सब पापोंको हरनेवाली उत्तम तिथि है। पवित्र होनेके साथ ही पापोंका नाश करनेवाली है तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करती है। इतना ही नहीं, वह ब्रह्महत्या-जैसे पाप तथा पिशाचत्वका भी विनाश करनेवाली है। इसका व्रत करनेपर मनुष्योंको कभी प्रेतयोनिमें नहीं जाना पड़ता। इसलिये राजन्! प्रयत्नपूर्वक 'जया' नामकी एकादशीका व्रत करना चाहिये।
एक समयकी बात है, स्वर्गलोकमें देवराज इन्द्र राज्य करते थे। देवगण पारिजात वृक्षोंसे भरे हुए नन्दनवनमें अप्सराओंके साथ विहार कर रहे थे। पचास करोड़ गन्धर्वोके नायक देवराज इन्द्रने स्वेच्छानुसार वनमें विहार करते हुए बड़े हर्षके साथ नृत्यका आयोजन किया। उसमें गन्धर्व गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा उसका पुत्र—ये तीन प्रधान थे। चित्रसेनकी स्त्रीका नाम मालिनी था। मालिनीसे एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जो पुष्पवन्तीके नामसे विख्यात थी। पुष्पदन्त गन्धर्वके एक पुत्र था, जिसको लोग माल्यवान् कहते थे। माल्यवान् पुष्पवन्तीके रूपपर अत्यन्त मोहित था। ये दोनों भी इन्द्रके संतोषार्थ नृत्य करनेके लिये आये थे। इन दोनोंका गान हो रहा था, इनके साथ अप्सराएँ भी थीं। परस्पर अनुरागके कारण ये दोनों मोहके वशीभूत हो गये। चित्तमें भ्रान्ति आ गयी। इसलिये वे शुद्ध गान न गा सके। कभी ताल भंग हो जाता और कभी गीत बंद हो जाता था। इन्द्रने इस प्रमादपर विचार किया और इसमें अपना अपमान
* तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी। तिलदाता च भोक्ता च षट्तिला पापनाशिनी॥ (४४। २४)
उत्तरखण्ड ] * फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य * ६५३ ************************************************************************************
समझकर वे कुपित हो गये। अतः इन दोनोंको शाप देते हुए बोले—'ओ मूर्खों ! तुम दोनोंको धिक्कार है ! तुमलोग पतित और मेरी आज्ञा भंग करनेवाले हो; अतः पति-पत्नीके रूपमें रहते हुए पिशाच हो जाओ।'
इन्द्रके इस प्रकार शाप देनेपर इन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वे हिमालय पर्वतपर चले गये और पिशाच-योनिको पाकर भयङ्कर दुःख भोगने लगे। शारीरिक पातकसे उत्पन्न तापसे पीड़ित होकर दोनों ही पर्वतकी कन्दराओंमें विचरते रहते थे। एक दिन पिशाचने अपनी पत्नी पिशाचीसे कहा—'हमने कौन-सा पाप किया है, जिससे यह पिशाच-योनि प्राप्त हुई है ? नरकका कष्ट अत्यन्त भयङ्कर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दुःख देनेवाली है। अतः पूर्ण प्रयत्न करके पापसे बचना चाहिये।'
इस प्रकार चिन्तामग्न होकर वे दोनों दुःखके कारण सूखते जा रहे थे। दैवयोगसे उन्हें माघ मासकी एकादशी तिथि प्राप्त हो गयी। 'जया' नामसे विख्यात तिथि, जो सब तिथियोंमें उत्तम है, आयी। उस दिन उन दोनोंने सब प्रकारके आहार त्याग दिये। जलपानतक नहीं किया। किसी जीवकी हिंसा नहीं की, यहाँतक कि फल भी नहीं खाया। निरन्तर दुःखसे युक्त होकर वे एक पीपलके समीप बैठे रहे। सूर्यास्त हो गया। उनके प्राण लेनेवाली भयङ्कर रात उपस्थित हुई। उन्हें नींद नहीं आयी। वे रति या और कोई सुख भी नहीं पा सके। सूर्योदय हुआ। द्वादशीका दिन आया। उन पिशाचोंके द्वारा 'जया'के उत्तम व्रतका पालन हो गया। उन्होंने रातमें जागरण भी किया था। उस व्रतके प्रभावसे तथा भगवान् विष्णुकी शक्तिसे उन दोनोंकी पिशाचता दूर हो गयी। पुष्पवन्ती और माल्यवान् अपने पूर्वरूपमें आ गये। उनके हृदयमें वही पुराना स्नेह उमड़ रहा था। उनके शरीरपर पहले ही-जैसे अलङ्कार शोभा पा रहे थे। वे दोनों मनोहर रूप धारण करके विमानपर बैठे और स्वर्गलोकमें चले गये। वहाँ देवराज इन्द्रके सामने जाकर दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया। उन्हें इस रूपमें उपस्थित देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'बताओ, किस पुण्यके प्रभावसे तुम दोनोंका पिशाचत्व दूर हुआ है। तुम मेरे शापको प्राप्त हो चुके थे, फिर किस देवताने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया है ?'
माल्यवान् बोला— स्वामिन् ! भगवान् वासुदेवकी कृपा तथा 'जया' नामक एकादशीके व्रतसे हमारी पिशाचता दूर हुई है।
इन्द्रने कहा— तो अब तुम दोनों मेरे कहनेसे सुधापान करो। जो लोग एकादशीके व्रतमें तत्पर और भगवान् श्रीकृष्णके शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन् ! इस कारण एकादशीका व्रत करना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! 'जया' ब्रह्महत्याका पाप भी दूर करनेवाली है। जिसने 'जया' का व्रत किया है, उसने सब प्रकारके दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है।
फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य
युधिष्ठिरने पूछा— वासुदेव ! फाल्गुनके कृष्णपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है? कृपा करके बताइये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— युधिष्ठिर ! एक बार नारदजीने कमलके आसनपर विराजमान होनेवाले ब्रह्माजीसे प्रश्न किया—'सुरश्रेष्ठ ! फाल्गुनके कृष्णपक्षमें जो 'विजया' नामकी एकादशी होती है, कृपया उसके पुण्यका वर्णन कीजिये।'
ब्रह्माजीने कहा— नारद ! सुनो—'मैं एक उत्तम कथा सुनाता हूँ, जो पापोंका अपहरण करनेवाली है। यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पापनाशक है। यह 'विजया' नामकी एकादशी राजाओंको विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। पूर्वकालकी बात है, भगवान् श्रीरामचन्द्रजी चौदह वर्षके लिये वनमें
६५४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
गये और वहाँ पञ्चवटीमें सीता तथा लक्ष्मणके साथ रहने लगे। वहाँ रहते समय रावणने चपलतावश विजयात्मा श्रीरामकी तपस्विनी पत्नी सीताको हर लिया। उस दुःखसे श्रीराम व्याकुल हो उठे। उस समय सीताकी खोज करते हुए वे वनमें घूमने लगे। कुछ दूर जानेपर उन्हें जटायु मिले, जिनकी आयु समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने वनके भीतर कबन्ध नामक राक्षसका वध किया। फिर सुग्रीवके साथ उनकी मित्रता हुई। तत्पश्चात् श्रीरामके लिये वानरोंकी सेना एकत्रित हुई। हनुमान्जीने लङ्काके उद्यानमें जाकर सीताजीका दर्शन किया और उन्हें श्रीरामकी चिह्नस्वरूप मुद्रिका प्रदान की। यह उन्होंने महान् पुरुषार्थका काम किया था। वहाँसे लौटकर वे श्रीरामचन्द्रजीसे मिले और लङ्काका सारा समाचार उनसे निवेदन किया। हनुमान्जीकी बात सुनकर श्रीरामने सुग्रीवकी अनुमति ले लङ्काको प्रस्थान करनेका विचार किया और समुद्रके किनारे पहुँचकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा—'सुमित्रानन्दन ! किस पुण्यसे इस समुद्रको पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयङ्कर जलजन्तुओंसे भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमतासे पार किया जा सके।'
लक्ष्मण बोले—महाराज ! आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है ? यहाँ द्वीपके भीतर बकदालभ्य नामक मुनि रहते हैं। यहाँसे आधे योजनकी दूरीपर उनका आश्रम है। रघुनन्दन ! उन प्राचीन मुनीश्वरके पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये।
लक्ष्मणकी यह अत्यन्त सुन्दर बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदालभ्यसे मिलनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनिको प्रणाम किया। मुनि उनको देखते ही पहचान गये कि ये पुराणपुरुषोत्तम श्रीराम हैं, जो किसी कारणवश मानव-शरीरमें अवतीर्ण हुए हैं। उनके आनेसे महर्षिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने पूछा—'श्रीराम ! आपका कैसे यहाँ आगमन हुआ ?'
श्रीराम बोले—ब्रह्मन् ! आपकी कृपासे राक्षसोंसहित लङ्काको जीतनेके लिये सेनाके साथ समुद्रके किनारे आया हूँ। मुने ! अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, वह उपाय बताइये। मुझपर कृपा कीजिये।
बकदालभ्यने कहा—श्रीराम ! फाल्गुनके कृष्ण-पक्षमें जो 'विजया' नामकी एकादशी होती है, उसका व्रत करनेसे आपकी विजय होगी। निश्चय ही आप अपनी वानरसेनाके साथ समुद्रको पार कर लेंगे। राजन् ! अब इस व्रतकी फलदायक विधि सुनिये। दशमीका दिन आनेपर एक कलश स्थापित करे। वह सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टीका भी हो सकता है। उस कलशको जलसे भरकर उसमें पल्लव डाल दे। उसके ऊपर भगवान् नारायणके सुवर्णमय विग्रहकी स्थापना करे। फिर एकादशीके दिन प्रातःकाल स्नान करे। कलशको पुनः स्थिरतापूर्वक स्थापित करे। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदिके द्वारा विशेषरूपसे उसका पूजन करे। कलशके ऊपर सप्तधान्य और जौ रखे। गन्ध, धूप, दीप और भाँति-भाँतिके नैवेद्यसे पूजन
उत्तरखण्ड ] * फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य * ६५५
करे। कलशके सामने बैठकर वह सारा दिन उत्तम कथा-वार्ता आदिके द्वारा व्यतीत करे तथा रातमें भी वहाँ जागरण करे। अखण्ड व्रतकी सिद्धिके लिये घीका दीपक जलाये। फिर द्वादशीके दिन सूर्योदय होनेपर उस कलशको किसी जलाशयके समीप—नदी, झरने या पोखरेके तटपर ले जाकर स्थापित करे और उसकी विधिवत् पूजा करके देव-प्रतिमासहित उस कलशको वेदवेत्ता ब्राह्मणके लिये दान कर दे। महाराज ! कलशके साथ ही और भी बड़े-बड़े दान देने चाहिये। श्रीराम ! आप अपने यूथपतियोंके साथ इसी विधिसे प्रयत्नपूर्वक 'विजया' का व्रत कीजिये। इससे आपकी विजय होगी।
ब्रह्माजी कहते हैं— नारद ! यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिके कथनानुसार उस समय 'विजया' एकादशीका व्रत किया। उस व्रतके करनेसे श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राममें रावणको मारा, लङ्कापर विजय पायी और सीताको प्राप्त किया। बेटा ! जो मनुष्य इस विधिसे व्रत करते हैं, उन्हें इस लोकमें विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! इस कारण 'विजया' का व्रत करना चाहिये। इस प्रसङ्गको पढ़ने और सुननेसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है।
युधिष्ठिरने कहा— श्रीकृष्ण ! मैंने विजया एकादशीका माहात्म्य, जो महान् फल देनेवाला है, सुन लिया। अब फाल्गुन शुक्लपक्षकी एकादशीका नाम और माहात्म्य बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाभाग धर्मनन्दन ! सुनो—तुम्हें इस समय वह प्रसङ्ग सुनाता हूँ, जिसे राजा मान्धाताके पूछनेपर महात्मा वसिष्ठने कहा था। फाल्गुन शुक्लपक्षकी एकादशीका नाम 'आमलकी' है। इसका पवित्र व्रत विष्णुलोककी प्राप्ति करानेवाला है।
मान्धाताने पूछा— द्विजश्रेष्ठ ! यह 'आमलकी' कब उत्पन्न हुई, मुझे बताइये।
वसिष्ठजीने कहा— महाभाग ! सुनो—पृथ्वीपर 'आमलकी' की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बताता हूँ। आमलकी महान् वृक्ष है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् विष्णुके थूकनेपर उनके मुखसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एक बिन्दु प्रकट हुआ। वह बिन्दु पृथ्वीपर गिरा। उसीसे आमलकी (आँवले) का महान् वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह सभी वृक्षोंका आदिभूत कहलाता है। इसी समय समस्त प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये भगवान्ने ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। उन्हींसे इन प्रजाओंकी सृष्टि हुई। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अन्तःकरणवाले महर्षियोंको ब्रह्माजीने जन्म दिया। उनमेंसे देवता और ऋषि उस स्थानपर आये, जहाँ विष्णुप्रिया आमलकीका वृक्ष था। महाभाग ! उसे देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए उत्कण्ठापूर्वक उस वृक्षकी ओर देखने लगे और खड़े-खड़े सोचने लगे कि प्लक्ष (पाकर) आदि वृक्ष तो पूर्व कल्पकी ही भाँति हैं, जो सब-के-सब हमारे परिचित हैं, किन्तु इस वृक्षको हम नहीं जानते। उन्हें इस प्रकार चिन्ता करते देख आकाशवाणी हुई—'महर्षियो ! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकीका वृक्ष है, जो विष्णुको प्रिय है। इसके स्मरणमात्रसे गोदानका फल मिलता है। स्पर्श करनेसे इससे दूना और फल भक्षण करनेसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिये सदा प्रयत्नपूर्वक आमलकीका सेवन करना चाहिये। यह सब पापोंको हरनेवाला वैष्णव वृक्ष बताया गया है। इसके मूलमें विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्धमें परमेश्वर भगवान् रुद्र, शाखाओंमें मुनि, टहनियोंमें देवता, पत्तोंमें वसु, फूलोंमें मरुद्गण तथा फलोंमें समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी सर्वदेवमयी बतायी गयी है।* अतः विष्णुभक्त पुरुषोंके लिये यह परम पूज्य है।'
ऋषि बोले— [ अव्यक्त स्वरूपसे बोलनेवाले महापुरुष ! ] हमलोग आपको क्या समझें—आप कौन
* तस्या मूले स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्वं च पितामहः। स्कन्धे च भगवान् रुद्रः संस्थितः परमेश्वरः ॥
शाखासु मुनयः सर्वे प्रशाखासु च देवताः। पर्णेषु वसवो देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा ॥
६५६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
हैं? देवता हैं या कोई और? हमें ठीक-ठीक बताइये।
आकाशवाणी हुई—जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्ता और समस्त भुवनोंके स्रष्टा हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुष भी कठिनतासे देख पाते हैं, वही सनातन विष्णु मैं हूँ।
देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कथन सुनकर उन ब्रह्मकुमार महर्षियोंके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वे आदि-अन्तरहित भगवान्की स्तुति करने लगे।
ऋषि बोले—सम्पूर्ण भूतोंके आत्मभूत, आत्मा एवं परमात्माको नमस्कार है। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले अच्युतको नित्य प्रणाम है। अन्तरहित परमेश्वरको बारम्बार प्रणाम है। दामोदर, कवि (सर्वज्ञ) और यज्ञेश्वरको नमस्कार है। मायापते ! आपको प्रणाम है। आप विश्वके स्वामी हैं; आपको नमस्कार है।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि संतुष्ट हुए और बोले—महर्षियो ! तुम्हें कौन-सा अभीष्ट वरदान दूँ?'
ऋषि बोले—भगवन्! यदि आप संतुष्ट हैं तो हमलोगोंके हितके लिये कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला हो।
श्रीविष्णु बोले—महर्षियो ! फाल्गुन शुक्लपक्षमें यदि पुष्य नक्षत्रसे युक्त द्वादशी हो तो वह महान् पुण्य देनेवाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। द्विजवरो ! उसमें जो विशेष कर्तव्य है, उसको सुनो। आमलकी एकादशीमें आँवलेके वृक्षके पास जाकर वहाँ रात्रिमें जागरण करना चाहिये। इससे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और सहस्र गोदानोंका फल प्राप्त करता है। विप्रगण ! यह व्रतोंमें उत्तम व्रत है, जिसे मैंने तुमलोगोंको बताया है।
ऋषि बोले—भगवन्! इस व्रतकी विधि बतलाइये। यह कैसे पूर्ण होता है? इसके देवता, नमस्कार और मन्त्र कौन-से बताये गये हैं? उस समय स्नान और दान कैसे किया जाता है? पूजनकी कौन-सी विधि है तथा उसके लिये मन्त्र क्या है? इन सब बातोंका यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।
भगवान् विष्णुने कहा—द्विजवरो ! इस व्रतकी जो उत्तम विधि है, उसको श्रवण करो! एकादशीको प्रातःकाल दन्तधावन करके यह सङ्कल्प करे कि 'हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरणमें रखें।' ऐसा नियम लेनेके बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, मर्यादा भंग करनेवाले तथा गुरुपत्नीगामी, मनुष्योंसे वार्तालाप न करे। अपने मनको वशमें रखते हुए नदीमें, पोखरेमें, कुएँपर अथवा घरमें ही स्नान करे। स्नानके पहले शरीरमें मिट्टी लगाये।
मृत्तिका लगानेका मन्त्र अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम् ॥ (४७।४३)
'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन अवतारके समय भगवान् विष्णुने भी तुम्हें अपने पैरोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने करोड़ों जन्मोंमें जो पाप किये हैं, मेरे उन सब पापोंको हर लो।'
स्नान-मन्त्र त्वं मात: सर्वभूतानां जीवनं तत्तू रक्षकम्। स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसानां पतये नमः ॥ स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु हृदप्रस्रवणेषु च। नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत् ॥ (४७।४४-४५)
'जलकी अधिष्ठात्री देवी! मात:! तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये जीवन हो। वही जीवन, जो स्वेदज और उद्भिज्ज जातिके जीवोंका भी रक्षक है। तुम रसोंकी स्वामिनी हो। तुम्हें नमस्कार है। आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरोंमें स्नान कर चुका। मेरा यह स्नान उक्त सभी स्नानोंका फल देनेवाला हो।'
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह परशुरामजीकी सोनेकी प्रतिमा बनवाये। प्रतिमा अपनी शक्ति और
प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेव व्यवस्थिताः। सर्वदेवमयी ह्येषा धात्री च कथिता मया ॥ (४७।२०-२३)
उत्तरखण्ड ] * फाल्गुन मासकी 'विजया' तथा 'आमलकी' एकादशीका माहात्म्य * ६५७
धनके अनुसार एक या आधे माशे सुवर्णकी होनी चाहिये। स्नानके पश्चात् घर आकर पूजा और हवन करे। इसके बाद सब प्रकारकी सामग्री लेकर आँवलेके वृक्षके पास जाय। वहाँ वृक्षके चारों ओरकी जमीन झाड़-बुहार, लीप-पोतकर शुद्ध करे। शुद्ध की हुई भूमिमें मन्त्रपाठ-पूर्वक जलसे भरे हुए नवीन कलशकी स्थापना करे। कलशमें पञ्चरत्न और दिव्य गन्ध आदि छोड़ दे। श्वेतचन्दनसे उसको चर्चित करे। कण्ठमें फूलकी माला पहनाये। सब प्रकारके धूपकी सुगन्ध फैलाये। जलते हुए दीपकोंकी श्रेणी सजाकर रखे। तात्पर्य यह कि सब ओरसे सुन्दर एवं मनोहर दृश्य उपस्थित करे। पूजाके लिये नवीन छाता, जूता और वस्त्र भी मँगाकर रखे। कलशके ऊपर एक पात्र रखकर उसे दिव्य लाजों (खीलों) से भर दे। फिर उसके ऊपर सुवर्णमय परशुरामजीकी स्थापना करे। 'विशोकाय नमः' कहकर उनके चरणोंकी, 'विश्वरूपिणे नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'उग्राय नमः' से जाँघोंकी, 'दामोदराय नमः' से कटिभागकी, 'पद्मनाभाय नमः' से उदरकी, 'श्रीवत्सधारिणे नमः' से वक्षःस्थलकी, 'चक्रिणे नमः' से बायीं बाँहकी, 'गदिने नमः' से दाहिनी बाँहकी, 'वैकुण्ठाय नमः' से कण्ठकी, 'यज्ञमुखाय नमः' से मुखकी, 'विशोक निधये नमः' से नासिकाकी, 'वासुदेवाय नमः' से नेत्रोंकी, 'वामनाय नमः' से ललाटकी, 'सर्वात्मने नमः' से सम्पूर्ण अङ्गों तथा मस्तककी पूजा करे। ये ही पूजाके मंत्र हैं। तदनन्तर भक्तियुक्त चित्तसे शुद्ध फलके द्वारा देवाधिदेव परशुरामजीको अर्घ्य प्रदान करे। अर्घ्यका मंत्र इस प्रकार है—
नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोऽस्तु ते।
गृहाणार्घ्यमिमं दत्तममलक्या युतं हरे॥
(४७।५७)
'देवदेवेश्वर ! जमदग्निनन्दन ! श्रीविष्णुस्वरूप परशुरामजी ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आँवलेके फलके साथ दिया हुआ मेरा यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'
तदनन्तर भक्तियुक्त चित्तसे जागरण करे। नृत्य, संगीत, वाद्य, धार्मिक उपाख्यान तथा श्रीविष्णुसम्बन्धिनी कथा-वार्ता आदिके द्वारा वह रात्रि व्यतीत करे। उसके बाद भगवान् विष्णुके नाम ले-लेकर आमलकी वृक्षकी परिक्रमा एक सौ आठ या अट्ठाईस बार करे। फिर सबेरा होनेपर श्रीहरिकी आरती करे। ब्राह्मणकी पूजा करके वहाँकी सब सामग्री उसे निवेदन कर दे। परशुरामजीका कलश, दो वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएँ दान कर दे और यह भावना करे कि 'परशुरामजीके स्वरूपमें भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् आमलकीका स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करे और स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये। तदनन्तर कुटुम्बियोंके साथ बैठकर स्वयं भी भोजन करे। ऐसा करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब बतलाता हूँ; सुनो। सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनसे जो पुण्य प्राप्त होता है तथा सब प्रकारके दान देनेसे जो फल मिलता है, वह सब उपर्युक्त विधिके पालनसे सुलभ होता है। समस्त यज्ञोंकी अपेक्षा भी अधिक फल मिलता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह व्रत सब व्रतोंमें उत्तम है, जिसका मैंने तुमसे पूरा-पूरा वर्णन किया है।
वसिष्ठजी कहते हैं— महाराज ! इतना कहकर देवेश्वर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् उन समस्त महर्षियोंने उक्त व्रतका पूर्णरूपसे पालन किया। नृपश्रेष्ठ ! इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— युधिष्ठिर ! यह दुर्धर्ष व्रत मनुष्यको सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है।
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६५८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
चैत्र मासकी 'पापमोचनी' तथा 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! फाल्गुन शुक्लपक्षकी आमलकी एकादशीका माहात्म्य मैंने सुना। अब चैत्र कृष्णपक्षकी एकादशीका क्या नाम है, यह बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजेन्द्र! सुनो—मैं इस विषयमें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाताके पूछनेपर महर्षि लोमशने कहा था।
मान्धाता बोले— भगवन्! मैं लोगोंके हितकी इच्छासे यह सुनना चाहता हूँ कि चैत्रमासके कृष्णपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है? उसकी क्या विधि है तथा उससे किस फलकी प्राप्ति होती है? कृपया ये सब बातें बताइये।
लोमशजीने कहा— नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, अप्सराओंसे सेवित चैत्ररथ नामक वनमें, जहाँ गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने किङ्करोंके साथ बाजे बजाती हुई विहार करती हैं, मञ्जुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर मेधावीको मोहित करनेके लिये गयी। वे महर्षि उसी वनमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करते थे। मञ्जुघोषा मुनिके भयसे आश्रमसे एक कोस दूर ही ठहर गयी और सुन्दर ढंगसे वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी। मुनिश्रेष्ठ मेधावी घूमते हुए उधर जा निकले और उस सुन्दरी अप्सराको इस प्रकार गान करते देख सेनासहित कामदेवसे परास्त होकर बरबस मोहके वशीभूत हो गये। मुनिकी ऐसी अवस्था देख मञ्जुघोषा उनके समीप आयी और वीणा नीचे रखकर उनका आलिङ्गन करने लगी। मेधावी भी उसके साथ रमण करने लगे। कामवश रमण करते हुए उन्हें रात और दिनका भी भान न रहा। इस प्रकार मुनिजनेचित सदाचारका लोप करके अप्सराके साथ रमण करते उन्हें बहुत दिन व्यतीत हो गये। मञ्जुघोषा देवलोकमें जानेको तैयार हुई। जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेधावीसे कहा—'ब्रह्मन्! अब मुझे अपने देश जानेकी आज्ञा दीजिये।'
मेधावी बोले— देवी! जबतक सबेरेकी सन्ध्या न हो जाय तबतक मेरे ही पास ठहरो।
अप्सराने कहा— विप्रवर! अबतक न जाने कितनी सन्ध्या चली गयीं! मुझपर कृपा करके बीते हुए समयका विचार तो कीजिये।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! अप्सराकी बात सुनकर मेधावीके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उस समय उन्होंने बीते हुए समयका हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते सत्तावन वर्ष हो गये। उसे अपनी तपस्याका विनाश करनेवाली जानकर मुनिको उसपर बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने शाप देते हुए कहा—'पापिनी! तू पिशाची हो जा।' मुनिके शापसे दग्ध होकर वह विनयसे नतमस्तक हो बोली—'विप्रवर! मेरे शापका उद्धार कीजिये। सात वाक्य बोलने या सात पद साथ-साथ चलने मात्रसे ही सत्पुरुषोंके साथ मैत्री हो जाती है। ब्रह्मन्! मैंने तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं; अतः स्वामिन्! मुझपर कृपा कीजिये।'
मुनि बोले— भद्रे! मेरी बात सुनो—यह शापसे उद्धार करनेवाली है। क्या करूँ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है। चैत्र कृष्णपक्षमें जो शुभ एकादशी आती है उसका नाम है 'पापमोचनी'। वह सब पापोंका क्षय करनेवाली है। सुन्दरी! उसीका व्रत करनेपर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी।
ऐसा कहकर मेधावी अपने पिता मुनिवर च्यवनके आश्रमपर गये। उन्हें आया देख च्यवनने पूछा—'बेटा! यह क्या किया? तुमने तो अपने पुण्यका नाश कर डाला!'
मेधावी बोले— पिताजी! मैंने अप्सराके साथ रमण करनेका पातक किया है। कोई ऐसा प्रायश्चित्त बताइये, जिससे पापका नाश हो जाय।
च्यवनने कहा— बेटा! चैत्र कृष्णपक्षमें जो पापमोचनी एकादशी होती है, उसका व्रत करनेपर पापराशिका विनाश हो जायगा।
उत्तरखण्ड ] * चैत्र मासकी 'पापमोचनी' तथा 'कामदा' एकादशीका माहात्म्य * ६५९
पिताका यह कथन सुनकर मेधावीने उस व्रतका अनुष्ठान किया। इससे उनका पाप नष्ट हो गया और वे पुनः तपस्यासे परिपूर्ण हो गये। इसी प्रकार मञ्जुघोषाने भी इस उत्तम व्रतका पालन किया। 'पापमोचनी'का व्रत करनेके कारण वह पिशाच-योनिसे मुक्त हुई और दिव्य रूपधारिणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर स्वर्गलोकमें चली गयी। राजन्! जो श्रेष्ठ मनुष्य पापमोचनी एकादशीका व्रत करते हैं, उनका सारा पाप नष्ट हो जाता है। इसको पढ़ने और सुननेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। ब्रह्म-हत्या, सुवर्णकी चोरी, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले महापातकी भी इस व्रतके करनेसे पापमुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत पुण्यमय है।
युधिष्ठिरने पूछा— वासुदेव! आपको नमस्कार है। अब मेरे सामने यह बताइये कि चैत्र शुक्लपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजन्! एकाग्रचित्त होकर यह पुरातन कथा सुनो, जिसे वसिष्ठजीने दिलीपके पूछनेपर कहा था।
दिलीप ने पूछा— भगवन्! मैं एक बात सुनना चाहता हूँ। चैत्रमासके शुक्लपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ?
वसिष्ठजी बोले— राजन्! चैत्र शुक्लपक्षमें 'कामदा' नामकी एकादशी होती है। वह परम पुण्यमयी है। पापरूपी ईंधनके लिये तो वह दावानल ही है। प्राचीन कालकी बात है, नागपुर नामका एक सुन्दर नगर था, जहाँ सोनेके महल बने हुए थे। उस नगरमें पुण्डरीक आदि महा भयङ्कर नाग निवास करते थे। पुण्डरीक नामका नाग उन दिनों वहाँ राज्य करता था। गन्धर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी उस नगरीका सेवन करती थीं। वहाँ एक श्रेष्ठ अप्सरा थी, जिसका नाम ललिता था। उसके साथ ललित नामवाला गन्धर्व भी था। वे दोनों पति-पत्नीके रूपमें रहते थे। दोनों ही परस्पर कामसे पीड़ित रहा करते थे। ललिताके हृदयमें सदा पतिकी ही मूर्ति बसी रहती थी और ललितके हृदयमें सुन्दरी ललिताका नित्य निवास था। एक दिनकी बात है, नागराज पुण्डरीक राजसभामें बैठकर मनोरञ्जन कर रहा था। उस समय ललितका गान हो रहा था। किन्तु उसके साथ उसकी प्यारी ललिता नहीं थी। गाते-गाते उसे ललिताका स्मरण हो आया। अतः उसके पैरोंकी गति रुक गयी और जीभ लड़खड़ाने लगी। नागोंमें श्रेष्ठ कर्कोटकको ललितके मनका सन्ताप ज्ञात हो गया; अतः उसने राजा पुण्डरीकको उसके पैरोंकी गति रुकने एवं गानमें त्रुटि होनेकी बात बता दी। कर्कोटककी बात सुनकर नागराज पुण्डरीककी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उसने गाते हुए कामातुर ललितको शाप दिया— 'दुर्बुद्धे! तू मेरे सामने गान करते समय भी पत्नीके वशीभूत हो गया, इसलिये राक्षस हो जा।'
महाराज पुण्डरीकके इतना कहते ही वह गन्धर्व राक्षस हो गया। भयङ्कर मुख, विकराल आँखें और देखनेमात्रसे भय उपजानेवाला रूप। ऐसा राक्षस होकर वह कर्मका फल भोगने लगा। ललिता अपने पतिकी विकराल आकृति देख मन-ही-मन बहुत चिन्तित हुई। भारी दुःखसे कष्ट पाने लगी। सोचने लगी, 'क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? मेरे पति पापसे कष्ट पा रहे हैं।' वह रोती हुई घने जंगलोंमें पतिके पीछे-पीछे घूमने लगी। वनमें उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया, जहाँ एक शान्त मुनि बैठे हुए थे। उनका किसी भी प्राणीके साथ वैर-विरोध नहीं था। ललिता शीघ्रताके साथ वहाँ गयी और मुनिको प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हुई। मुनि बड़े दयालु थे। उस दुःखिनीको देखकर वे इस प्रकार बोले— 'शुभे! तुम कौन हो ? कहाँसे यहाँ आयी हो ? मेरे सामने सच-सच बताओ।'
ललिताने कहा— महामुने! वीरधन्वा नामवाले एक गन्धर्व हैं। मैं उन्हीं महात्माकी पुत्री हूँ। मेरा नाम ललिता है। मेरे स्वामी अपने पाप-दोषके कारण राक्षस हो गये हैं। उनकी यह अवस्था देखकर मुझे चैन नहीं है। ब्रह्मन्! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, वह बताइये। विप्रवर! जिस पुण्यके द्वारा मेरे पति राक्षसभावसे छुटकारा पा जायँ, उसका उपदेश कीजिये।'
ऋषि बोले— भद्रे! इस समय चैत्र मासके