भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

प्रकरण ७०-७३ ] इक्षुरस, तथा घुड़सवारोंका प्रबन्ध [ ५९ ब्राह्मण इस कुत्तेको, जो यद्यपि अस्पृश्य है, तथापि उसे कन्धे पर ढोता है, यह लोभ ही की लीला है । इसलिये लोभ ही एक अच्छा नहीं है । इस प्रकार यह 'एक अच्छा नहीं है' प्रबन्ध पूरा हुआ । * ७२) ‡ अन्य किसी समय, केवल मित्रको साथ ले कर राजा रातमें घूम रहा था, तो उसे बड़े जोरकी प्यास लगी । तब उसने एक वेश्याके घर जा कर मित्रके मुखसे जल माँगा । तब बड़े प्रेमके साथ शंभवली नामरू दासी बड़ी देर करके, ईखके रससे भरा पात्र, कुछ खेदके साथ ले आई । मित्रने जो खेदका कारण पूछा, तो बोली कि पहले ईखकी एक ही लट्ठीमेंसे, जब वह शूलसे छेदी जाती थी तो, इतना रस निकल आता था कि घड़ेके साथ पुरवा (शकोरा) भी भर जाता था; पर इस समय राजाका मन प्रजाके विरुद्ध हो रहा है, इसलिये बड़ी देरके बाद भी केवल पुरवा ही भर पाया है । यही इस खेदका कारण है । राजाने उसके खेदके कारण को सुन कर विचार किया कि जिस वणिकने शिव मन्दिरमें वह बडा नाटक करवाया है उसको मैंने अपने मन ही मन, लूटनेका विचार किया था; इसलिये इसकी यह बात ठीक ही समझनी चाहिए । बादमें लौट कर अपने स्थान पर आ कर सो गया । दूसरे दिन प्रजा पर वत्सल भाव मनमें रखता हुआ राजा वेश्याके घर गया । उस दिन उसने यह कह कर राजाको सन्तुष्ट किया कि आज राजा प्रजाके प्रति कृपालु है, क्यों कि आज ईखसे बहुत रस निकला है । इस प्रकार यह इक्षुरसका प्रबन्ध पूर्ण हुआ । * ७३) अन्य किसी एक अवसर पर, धारानगरीके शालापुरमें एक गोत्र देवीका मंदिर था जिसमें नमस्कार करनेके लिये [राजा] नित्य आया करता था, उसमें कुछ बेलाका व्यतिक्रम हो गया । इससे वह देवता प्रत्यक्ष हो कर द्वार पर आ कर उस राजाको देखने लगी, जो उस समय बहुत थोडे नौकरोंके साथ द्वार- देश पर आ पहुंचा था । राजाको देख कर ससंभ्रम वह अपने आसन पर बैठनेकी गड़बड़में, निजका आसन लांघ गई । राजाने प्रणाम करके इस वृत्तान्तको पूछा । देवताने निकट ही शत्रुसेनाका आना बता कर कहा कि शीघ्र जाओ । कुछ ही समयमें राजाने अपनेको गूर्जर सैन्यसे घिरा पाया । वेगवान् घोड़ेपर चढ़कर तेजीसे जाता हुआ वह धारा नगरीके फाटक पर पहुँचा, तो उस समय आल्हया और कोल्हया नामके दो गुजराती सवारोंने उसके कंठमें धनुष्य फेंके और यह कह कर उसे छोड दिया कि 'तुम इतने-ही-से मार डाले जाते !' ११९. जिसके 'गुण'-वान् धनुषने, मानों यह समझ कर ही कि यह भोज 'गुणी' है भागते हुए उस राजाको घोड़ेसे [नीचे] नहीं गिराया । इस प्रकार यह घुडसवारोंका प्रबन्ध पूर्ण हुआ । * [इसके आगे Pb प्रतिमें निम्नांकित प्रबन्ध पाया जाता है-] अन्यदा एक बार रातमें जग कर राजा भोजने अपनी समृद्धिके विस्तारको अपने हृदयमें सोच कर काव्यके ये तीन चरण पढे- ‡ यह इक्षुरसवाला प्रबन्ध किसी प्रतिमें, विक्रम राजाके सम्बन्धमें लिखा हुआ मिलता है और इसलिये इसके पहले, ऊपर पृष्ठ ९ पर भी यह आया हुआ है, लेकिन वहाँ यह प्रक्षिप्त मालूम देता है ।

६० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश [ ८० ] मनोहर युवतियाँ, अनुकूल स्वजन, अच्छे बांधव और प्रेममय वचन बोलनेवाले नौकर हैं।, [ द्वार पर ] हाथियोंके झुंड गरज रहे हैं, और तरल ( तेज ) घोड़े [ हिनहिना रहे हैं ]- इस प्रकार राजा जब यह बारंबार बोल रहा था और चौथे चरणके लिये अक्षर ढूंढ रहा था, उसी समय कोई वेश्याव्यसनी विद्वान्, जो अपनी वेश्याके वचनसे रानीके दो कुण्डल चुरानेके लिये राजाके महलमें चोर बन कर घुसा था, उसने उन तीन चरणोंको सुना । तब उसने सोचा कि 'जो होना हो सो हो, पर जो चौथा चरण मनमें स्फुरित हो आया है उसे कैसे दबा रखू ?' और यह बोला- ' आंखोंके मींच जाने पर [ इनमेंसे फिर ] कुछ भी नहीं है ।' राजाने सन्तुष्ट हो कर कुण्डलके साथ उसको मनोवांछित दिया । ७४) अन्य समय, एक बार, यही राजा, राजपाटीसे लौट कर नगरके गोपुरमें [ जब आ रहा था तब ] एक बिना लगामका घोड़ा दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देख कर लोग आकुल-व्याकुल हो कर इधर उधर भागने लगे । उनमें एक तक्र विक्रय करनेवाली ग्वालिन भी सपाटेमें आ गई और उसके सिरपर जो छाँछसे भरी हुई हंडिया थी वह नीचे गिर पड़ी । उसमेंसे नदीके प्रवाहकी तरह गोरस निकल कर बह चला, जिसे देख कर उसका मुख-कमल खिल उठा । भोज ने यह देख कर पूछा कि विषादके समय भी तुम्हारे इस हर्षका कारण क्या है ? राजाके यह पूछने पर वह बोली- १२०. राजाको मार कर, पतिको सांपसे काटा हुआ देख कर, मैं विधिवश परदेशमें वेश्या हुई । पुत्रको [ अपने साथ ] वेश्यागामी पा कर मैं चितामें प्रविष्ट हुई । इसके बाद, गोपकी गृहिणी बनी; तो फिर आज मैं इस तक्रके लिये क्या सोच करूं ? [ वह इस प्रकार बोली । उस प्रदेशसे एक बड़ी नदी प्रादुर्भूत हुई, जिसका नाम मही पड़ा । ] इस प्रकार गोपगृहिणीका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * ७५) एक बार, प्रातःकाल, श्री भोज एक उपशिला ( छोटे पत्थर ) को लक्ष्य करके आनन्दपूर्वक धनुर्वेदका अभ्यास कर रहा था, उसी समय श्वेताम्बर वेशधारी श्री चंदनाचार्यने अपनी तात्कालिकोत्पन्न प्रतिभाकी सुन्दरतासे इस उचित पद्यको कहा- १२१. यह खण्डित शिला चाहे खण्डित हो जाओ, पर हे राजन् ! इसके बाद क्रीड़ा करना बस कर दीजिये; और देव ! प्रसन्न हो कर पाषाणवेधके व्यसनकी यह रसिकता छोड़िये । क्यों कि अगर यह क्रीड़ा बढ़ी तो बड़े बड़े पर्वतोंको बेध करोगे और यह धरती ध्वस्ताधारा ( आधार जिसका ध्वस्त हो गया है) हो कर, हे नृपतिलक ! पातालके मूलमें चली जायगी । उनकी इस प्रकारकी कविताके चमत्कारसे चमत्कृत हो कर भी राजाने कुछ सोच कर कहा-'सर्व- शास्त्र-पारंगत हो कर भी आपने जो 'ध्वस्ताधारा' यह पढ़ा उससे कोई उत्पात सूचित होता है ।' * भोज और कर्णका संघर्ष । ७६) इधर, डाहल देशके राजाकी देम ति नामक रानी महा योगिनी थी । एक बार, जब कि वह आसन्न प्रसवा थी, सदैव ज्योतिर्विदोंसे यह पूछा करती थी कि 'किस शुभ लग्नमें उत्पन्न पुत्र सार्वभौम (सम्राट) होता है !' इसके बाद, उन्होंने अच्छी तरह विचार कर बताया कि 'जब शुभ ग्रह उच्च राशि, और केन्द्र (प्रथम

प्रकरण ७४-७६ ] भोज और कर्णका संघर्ष [ ६१ चतुर्थ, सप्तम, और दशम ) में हों, तथा पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ और एकादशमें हों, तो जो पुत्र होगा वह सार्वभौम राजा होगा। यह सुन कर, निश्चित प्रसव समयके बाद, १६ पहर तक, योगकी युक्तिसे गर्भस्तंभ करके ज्योतिषीके निर्णीत लग्नमें कर्ण नामक पुत्रको उसने जन्म दिया। उस गर्भधारणके दोषसे पुत्रप्रसवके अनन्तर आठवें पहरमें वह मर गई। सुलग्नमें जन्म होनेके कारण कर्णने अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त किया। एक सौ छत्तीस राजाओंके, भौंरेके समान काले-काले केश-कलापसे उसके दोनों विमल चरण-कमल पूजे जाते थे और चारों प्रकारकी राजनीतियोंमें परम प्रवीणता प्राप्त करके, विद्यापति प्रभृति महाकवियोंसे वह स्तुत होता था। जैसे [ एक बार कर्पूर कविने कहा-] १२२. + जिनके मुंहमें तो 'हारावाप्ति'१ है, आँखोंमें 'कंकणभार'२ है, नितंबमें 'पत्रावली'३ है, और दोनों हाथ 'सतिलक'४ है—हे श्री कर्ण ! तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंको, विधिवश, वनमें, इस समय भूषण पहननेकी यह कैसी [विलक्षण] रीति ग्रहण करनी पड़ी है। ऐसा कहने पर चतुर चक्रवर्ती राजाने कहा—'यदि 'विधिवश' ऐसा हुआ तो फिर वर्णनीय राजाका क्या रहा ? दैवने भी जिस बातकी चिन्ता नहीं की वह हो।' अतएव राजाको इसमें कुछ भी चमत्कार नहीं जान पड़ा और उसे बिना कुछ दिये ही विदा कर दिया। घर जाने पर भार्याने पूछा-'क्या दिया राजाने?' उसने कहा—'वही वृत्तस्वरूप !' (अर्थात् श्लोकमें जो वर्णन किया गया है वही स्वरूप) वह बोली- यदि 'विधिवशात्' की जगह 'त्वत् वशात्' कहा गया होता तो वह सब कुछ दिलाता। तब फिर नाचिराज कविने कर्ण नृपकी स्तुति की। जैसे- [८१] गोपियोंके पीन पयोधरसे विष्णुका हृदय [रूपी कमल] आहत हो गया है इसलिये मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी कमलकी आशंकासे तुम्हारे नेत्रोंमें ही अब विश्राम कर रही है। इसलिये हे श्रीमन् कर्ण नरेश ! जहाँ तुम्हारी भ्रूलता चलती है वहाँ भयभ्रान्त हो कर दारिद्यकी मुद्रा टूट जाती है। इससे अत्यन्त तुष्ट हो कर राजाने हाथके मारुले इत्यादिके उचित दानसे उसे पुरस्कृत किया। इस प्रकार जब वह मार्गमें आ रहा था, तो कर्पूर कविने खीस कहा कि राजाने मुझे जो कुछ दिया है उसे, अब मैं अपने घर ले आता हूं। यह कह कर वह उसके सामने गया। [२२] 'हे कन्ये ! तू कौन है?'-'कर्पूर कवि ! क्या तू मुझे नहीं पहचानता ?'-'क्या भारती है?'-' 'सच है'-'तू विथुरा क्यों है?'-'मैं लूट ली गई!'-'माँ किसके द्वारा ?'-'दुष्ट विधाताके द्वारा'- 'उसने तुम्हारा क्या ले लिया ?'-'मुझ और भोज रूपी दोनों आँख '-'तो जी कैसे रही हो?' --'क्योंकि दीर्घायु श्री नाचिराज कवि अन्धेकी लकड़ी रूप बने होनेसे।' नाचिराज कविने इस काव्यसे सन्तुष्ट हो कर कर्णराजसे जो कुछ स्वर्ण, दुकूल आदि प्राप्त किया था वह सब कर्पूर कविको दे दिया। कर्ण नरेन्द्रने यह सुना, तो कर्पूरको बुलाके पूछा कि-' हे कवे ! भोज के विद्यमान रहते 'मुझ-भोज' यह पद कैसे उदाहृत किया ?' वह बोला-'महाराज, जल्दी में 'हर्ष- मुझ' की जगह मुझ-भोज मुंहसे निकल गया।' तब राजाने सोचा कि यह बात भोजका अमंगल सूचित करती है। [८३] श्रीमत् कर्ण नरेन्द्रने मान और विनयसे सब याचकोंका मनोरथ पूर्ण कर दिया, इसलिये चिन्तामणिके आँगनमें शिखावाली दूर्वायें हमेशा श्यामल हो रही है। कल्पतरुके शून्य तटमें निर्भीक होकर पशु-पक्षी बैठ रहे हैं। और कामधेनु निकट ही रुडंदको बेटा कर आलस्यमे निद्रा ले रही है।

  • इस पद्यमें शब्दोंके श्लेष द्वारा दो भिन्न अर्थ निकाले गये हैं । १ हारावाप्ति=हारकी प्राप्ति और 'हा' ऐसा 'राव' शब्दकी प्राप्ति । २ कंकण=हाथका आभूषण और क=कनी उसका कण=अश्रुबिंदु । यों तो पत्रावली स्तन पर बंधी जाती है, लेकिन इन स्त्रियोंको तो पहननेके लिये पूरा वस्त्र नहीं है इस लिये पत्रवर्गोंसे नितंब प्रदेशको ढाकना पड़ा है। ४ सतिलक तो कपाल होता है लेकिन इन स्त्रियोंके तो अब हाथ ही सतिलक=तिलवाले हैं।

६२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ७७) इस प्रकार महाकवि गण उसके नाना यशकी स्तुति करते थे । एक बार उस कर्ण राजाने श्री भोज के प्रति प्रधानोंको भेज कर [ यह कहलाया-] ‘ आपकी नगरीमें आपके बनाये हुए १०४ मन्दिर हैं, इतने ही आपके गीत-प्रबंध और इतने ही विरुद हैं; इसलिये, या चतुरंग [ सेना ] की लड़ाईमें, या द्वन्द्व युद्धमें, या चारों विद्याओंका शास्त्रार्थ करनेमें, या त्यागमें मुझे जीत कर एक सौ पांच विरुदोंके पात्र बनो । नहीं तो मैं तुम्हें जीत कर १३७ राजाओंका स्वामी बनूँगा ।’ इस प्रकार उसके प्रभावके आवि- र्भावसे भोज का मुखकमल किंचित् म्लान हो गया । वह काशी नगरीके स्वामीको सब प्रकारसे जीत जाने योग्य समझ कर और अपनेको पराजित मान कर, अनुरोधपूर्वक उसकी अभ्यर्थना करके इस प्रकार उससे स्वीकार कराया कि-' मैं अवन्ती में, और श्री कर्ण वाणारसी में एक ही लग्नमें नींव दे कर स्पर्द्धाके साथ ऐसे मंदिर बनवावें जो ५० हाथ ऊंचे हों। जहाँके प्रासादमें प्रथम कलश ध्वजारोपणका उत्सव हो उसमें दूसरा राजा छत्र-चामर छोड़ कर, हाथी पर बैठ कर वहाँ आवे । इस प्रकार भोज के यथा-रुचि अंगीकार करनेकी बात जब कर्ण के कानों पहुँची तो वह यद्यपि क्रुद्ध हुआ तथापि भोज को उस तरह भी नीचा दिखानेके लिये [उद्यत हुआ]। एक ही लग्नमें अलग अलग दोनों जगह जब प्रासाद आरंभ किये गये तो, सारी तैयारी करके, सूत्रधारोंसे कर्ण ने अपने प्रासादको बनाते समय पूछा कि-' बताओ एक दिनमें, सूर्योदय और सूर्यास्तके बीच कितना काम किया जा सकता है ? ' इसके जवाबमें उन्होंने, चतुर्दशीके अनध्यायके दिन, सात हाथ ऊंचे ग्यारह मन्दिर, सूर्योदयमें आरम्भ करके शामको कलश तक बना कर राजाको दिखा दिये। उस सारी सामग्रीसे राजाने प्रसन्न हो, आलस्य छोड़ कर, भोजके मंदिरका जब मुँडेरा बाँधा जा रहा था तभी अपने मंदिर पर कलश स्थापित करा दिया; और ध्वजारोपणका लग्न निर्णय कर, दूत भेज कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके लिये श्री भोज को निमंत्रित किया। तब मालवा मण्डलका अधिपति भोज अपनी प्रतिज्ञा भंग होनेके भयसे, उस तरह जानेमें असमर्थ हो कर चुप हो रहा । इसके बाद प्रासाद पर ध्वजारोपण हो जानेके बाद, पुरातन कर्णके नवीन अवतारके समान उस कर्ण राजाने उतने ही राजाओंके साथ प्रयाण करके श्री भोज के ऊपर आक्रमण किया । उस अवसर पर श्री भोजके राज्यका आधा हिस्सा देनेकी प्रतिज्ञा करके श्री कर्ण ने मालवमण्डल पर पूंठ पीछेसे आक्रमण करनेके लिये श्री भीमको आमंत्रित किया । इस तरह उन दो राजाओंसे आक्रान्त होने पर राजा भोजका दर्प, मंत्रसे आक्रान्त सर्पके विषकी भाँति दूर हो गया । अकस्मात् उसी समय भोजका स्वास्थ्य बिगड़ गया जिसको वहाँ वालोंने छुपा रखा, और नियुक्त मनुष्यों द्वारा सभी घाटोंके रास्ते रोक दिये गये तथा अन्यदेशीय पुरुषोंका प्रवेश एकदम अटका दिया गया । तब भीम ने अपने सन्धिविग्रहिक डामरको, जो उस समय कर्णके पास था, भोजका वृत्तान्त जाननेके लिये अपने आदमी भेज कर पूछा । उसने भी उस पुरुषको एक गाथा पढ़ा कर भेजा, जिसने श्री भीमकी सभामें आ कर कह सुनाया । यथा- १२३. आमका फल [अब] पक गया है, वृन्त शिथिल हो गया है, आँधी जोरोंसे चल रही है और शाखा काँपने लगी है। और आगे हम नहीं जानते कि इस कार्यका परिणाम क्या होगा । इस गाथाके रहस्यको जान कर राजा भीम चुप हो रहा । श्री भोज के परलोक-मार्ग की यात्रा जब निकट आई तो उसने उपयुक्त धर्मकृत्य किया और समस्त राजपुरुषोंको राज्यानुशासन दे कर और यह आदेश दे कर कि मेरे हाथ विमानके बाहर रखना, स्वर्ग गया । [ २४ ] अरे ! पुत्र, कलत्र और पुत्रियोंको क्या कर रहे हो और खेती बाड़ीको भी क्या कर रहे हो ! मनुष्यको तो अपने हाथ पग दोनों झाड़कर अकेले ही आना है और अकेले ही जाना है । भोज के इस वाक्यको वैद्याने लोगोंसे कहा । ’ *

. प्रकरण ७७-७८ ] भोज और कर्णका संघर्ष [ ६३ कर्णसे भीमका आधा भाग लेना । ७८) [ इसके बाद, जब वह राजा भोज स्वर्गगामी हुआ ] तो उस वृत्तान्तको जान कर कर्णने उसके दुर्गम दुर्गको तोड़ कर भोज की सारी लक्ष्मी हस्तगत की । तब श्री भीमने डामरको आदेश किया कि- 'तुम या तो श्री कर्णसे मेरा प्राप्य आधा राज्य ले आओ या अपना सिर ले आओ।' इस प्रकार राजादेश पालन करनेकी इच्छासे, ३२ पदातियोंके साथ, उसने राजाके तंबूमें घुसकर मध्याह्न कालमें सोये हुए श्री कर्ण को बन्दीरूपमें गिरफ्तार किया । इसके बाद उस राजाने राज्य-ऋद्धिके दो विभागोंमेंसे एकमें शिव, शालिग्राम, गणेश इत्यादि देवताओंको रखा और दूसरेमें राज्यकी अन्य सारी वस्तुओंको रखा । 'अपनी इच्छाके अनुसार इन दोमेंसे एक हिस्सा ले लो ।' उसके ऐसा कहने पर, वह सोलह प्रहर तक तो वैसे ही पडा रहा, फिर भीम की आज्ञा [ आने पर ] देवताओंके भंडारको ले कर ही उन्हें श्री भीम को भेंट किया । इस प्रबन्धका सारा इतिहास इन दो काव्योंमें संगृहीत है । जैसे- १२४. पचास हाथ प्रमाणके दो शिवमंदिर एक ही लग्नमें प्रारम्भ किये गये । यह स्थिर हुआ कि जिस राजाके मंदिर पर पहले कलशारोपण होगा, उसके पास दूसरा राजा छत्र और चामर रहित हो कर आयगा । इस संवादमें राजा भोज की बुद्धि व्ययसे विमुख हो गई और इस प्रकार वह कर्ण देवके द्वारा जीता गया । १२५. भोज राजाके स्वर्ग जानेके बाद अतिबली कर्णने जो धारापुरीके भंग करनेका उपाय किया तो राजा भीम को सहायक बनाया । उसके भृत्य डामरने बंदी किये हुए कर्ण से गणपति के सहित नीलकंठेश्वरको सोनेकी पालकीके साथ ग्रहण किया । १२६. कवियों और कामियोंमें, योगियों और भोगियोंमें, धन देनेवालों और सज्जनोंका उपकार करनेवालोंमें, तथा धनी, धनुर्धर और धार्मिकोंमें भोज जैसा राजा पृथ्वी तलपर नहीं हुआ । १२७. राजा भोज ने अपने त्यागोंके कारण कल्पवृक्षके समान अशेष दुःखोंको त्रासित किया, साक्षात् बृहस्पति की नांई शीघ्रतापूर्वक नाना प्रबंधोंकी रचना की । राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) करने में वह अर्जुनके समान [ सिद्ध ] था । इसीलिये बहुत दिनोंसे, उसकी कीर्तिसे उत्सुक-चित्त देवताओंके द्वारा निमंत्रित हो कर वह स्वर्ग गया । इस प्रकार भोज के अनेक प्रबन्ध हैं जो परंपराके अनुसार जानने चाहिये । * इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'श्रीभोजराज और श्रीभीमराजके नाना यशोंका वर्णन' नामक यह दूसरा प्रकाश समाप्त हुआ ।

. ६४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश ८. सिद्धराजादि प्रबन्ध । मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रबन्ध । ७९) इसके बाद, किसी समय, गूर्जर देशमें अनावृष्टिके कारण जब वर्षा नहीं हुई तो विशोपक (?) दण्डाहि देशके भागोंके कुटुम्बी (कुनबी = किसान) जनोंके राजाका कर (भाग) देनेमें असमर्थ हो जाने पर राजनियुक्त व्यापारियों (कर्मचारियों) ने उस देशके सभी लोगोंको, उनके धन और जनके साथ, पत्तन में ले आकर राजा भीम के सामने निवेदित किया। एक दिन सबेरे श्री मूलराज कुमारने टहलते टहलते देखा कि राज्यके आदमी फसलका दान (कर) वसूल करनेके लिये सभी लोगोंको व्याकुल कर रहे हैं। अपने निकटके आदमियोंसे उस सारे वृत्तान्तके जानने पर उसकी आँखोंमें करुणाके कुछ आँसू आ गये। बादमें घुड़दौड़के मैदानमें उसने अपनी अनुपम कला दिखा कर राजाको सन्तुष्ट किया। उसपर राजाने आदेश दिया कि 'वर माँगो'। उसने [राजाको] सूचित किया कि- 'यह वरदान अभी भाण्डागार ही में रखा रहे। राजाने जब कहा कि- 'अभी क्यों नहीं कुछ मांग लेते ?' तो उसने कहा कि- 'प्राप्ति होनेका कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता-इसलिये।' राजाके उसका अनुरोध पूर्वक खुलासा पूछने पर, उन कुटुम्बियोंका लगान माफ़ कर देनेका उसने वर माँगा। तब हर्षके कारण जिसकी आँखें आँसुओंसे गद्गद् हो गई हैं ऐसे उस राजाने 'ऐसा ही हो' कह कर 'और भी कुछ माँगो' यह कहा। १२८. केवल अपना ही भरण-पोषण करनेवाले क्षुद्र पुरुष तो हजारों हैं पर जिसका परार्थ ही स्वार्थ है ऐसा सज्जनोंका अगुआ पुरुष तो [हजारोंमें] कोई एक होता है। बाडव अग्नि समुद्रको अपने दुष्पूरणीय पेटको भरनेके लिये पीता है पर बादल तो पीता है ग्रीष्मके तापसे तपे हुए जगत्का सन्ताप दूर करनेके लिये। इस प्रकार इस काव्यार्थके भावको समझ कर, अधिक लोभका निग्रह करके फिर और कुछ नहीं माँगा। इस तरह मानोन्नत हो कर वह अपने स्थान पर गया। उसके द्वारा, इस तरह बन्धन-विमुक्त बने हुए वे लोग देवताकी भाँति उसकी पूजा और स्तुति करने लगे। दैववशात् तीसरे ही दिन, उनके सन्तोषकी दृष्टिसे स्तुत होता हुआ [वह राजकुमार] मृत्यु प्राप्त कर स्वर्ग लोकको चला गया। राजा, राजपुरुष और बन्धन-विमुक्त वे सब प्रजाजन उस शोकसागरमें डूब गये जिन्हें [अन्यान्य] समझदार लोगोंने, अनेक प्रकारके बोधवचन सुना सुना कर, कितने ही दिनोंके बाद उनको शोक-विमुक्त किया। इसके बाद, दूसरे साल, यथेष्ट वृष्टि होनेके कारण खूब फसल पैदा हुई। इससे वे किसान लोग अत्यन्त हर्षित हो कर, उस वर्षका और बीते हुए वर्षका भी, लगान देनेको तत्पर हुए पर राजाने उसे ग्रहण नहीं किया। तब उन्होंने एक उत्तर-सभाका सम्मेलन किया। सभा और सभ्योंका लक्षण यह है- १२९. वह सभा ही नहीं जिसमें वृद्ध न हों, और वे वृद्ध नहीं जो धर्मका कथन नहीं करते। यह धर्म नहीं है जिसमें सत्य नहीं और वह सत्य नहीं है जो छलिटलसे अनुरूद्ध हो। ऐसा [शास्त्र] निर्णय कर सभ्योंने राजासे गत साल और उस सालका लगान ग्रहण करवाया। राजाने उस द्रव्यसे तथा खजानेमेंसे और कुछ द्रव्य मिलाकर मूलराज कुमारके कल्याणार्थ नया त्रिपुरुष प्रासाद [नामक शिवमन्दिर] बनवाया।

प्रकरण ७९-८४] कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त [ ६५ ८०) इसने पत्तनमें श्री भीमेश्वरदेव और भट्टारिका (पटरानी) भीरु आणीके [नामसे शिवके] प्रासाद बनवाये। संवत् १०७७ से लेकर ४२ वर्ष १० मास ९ दिन राज्य किया । (B. P: प्रतियोंमें- संवत् १०६५ से आरंभ कर ४२ वर्ष राज्य किया।) कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त । ८१) उसकी रानीने जिसका नाम उदयमति था [और जो नरवाहन खंगारकी लड़की थी], पत्तनमें एक बहुत बडी नयी वापी (बावडी) बनवाई, जो सहस्रलिंग सरोवरसे भी कहीं अधिक आकर्षक थी। ८२) इसके बाद, सं० ११२० चैत्र वदि ७ सोमवार, हस्त नक्षत्र, मीन लग्नमें श्री कर्णदेवका राज्याभिषेक हुआ। ८३) इधर, शुभकेशी नामक कर्नाट देश का राजा घोड़ेसे [जिसको अपने काबूमें न रख सकनेके कारण] उठाया जा कर किसी घने जंगलमें जा पड़ा। वहाँ पत्र फलसे भरे किसी वृक्षकी छायाका उसने आश्रय लिया। उसके पास ही दावाग्नि लगी। जिस वृक्षने [अपनी छायामें] विश्राम दे कर उपकार किया था उसे, कृतज्ञताके कारण छोड़ कर चले जानेकी उसकी इच्छा न हुई। और इसलिये, उसीके साथ दावानलमें उसने अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। फिर इसके बाद, मंत्रियोंने उसके पुत्र जयकेशीको राज-पद पर अभिषिक्त किया। क्रमशः उसके एक मयणल्ला देवी नामकी पुत्री पैदा हुई। शिवभक्तोंने उसके सामने [किसी समय] ज्यों ही सोमेश्वरका नाम लिया त्यों ही उसको अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया कि- 'मैं पूर्व जन्ममें ब्राह्मणी थी। बारहों मासके उपवास करके प्रत्येकके उद्यापनके समय बारह वस्तुओंका दान किया करती थी। [इसके बाद] श्री सोमेश्वर को प्रणाम करनेके लिये प्रस्थान करके बाहुलोड नगर में आई। वहाँपर कर देनेमें असमर्थ हो [आगे] न जा सकी। उसीके शोकमें, यह प्रतिज्ञा करके कि 'भविष्य जन्ममें मैं इस करको मिटादेने वाली बनूं' - मर कर इस कुलमें पैदा हुई। ऐसी यह उसे पूर्व जन्मकी स्मृति हुई। इसके अनुसार बाहुलोड के करको हटा देनेकी इच्छासे उसने गूर्जर नरेश जैसे श्रेष्ठ वरकी कामना करके अपने पितासे यह सब वृत्तांत कहा। जयकेशी राजाने यह व्यतिकर जान कर अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा, श्रीकर्ण से अपनी पुत्री श्री मयणल्ला देवीको [पत्नीरूपमें ग्रहण करनेकी] स्वीकृति माँगी। श्रीकर्णने जब उसकी कुरूपताकी बात सुनी तो वह उदासीन हो गया। पर उस कन्याका मन उसीमें लगा देख कर पिताने मयणल्ला देवी को उसके यहाँ, स्वयंवरा रूपमें-जिसने स्वयं अपना वर चुन लिया है-उसीके पास भेज दिया। इधर कर्ण गुप्तरूपसे स्वयं ही उसे कुरूपा देख कर उसके प्रति सर्वथा निरादर हो गया। राजाके इस प्रकार त्यागके कारण अपनी आठ सखियोंके साथ मयणल्लादेवीको प्राणत्याग करनेकी इच्छुक जान कर श्रीकर्ण की माता उदयमति रानीने, उनकी यह विपद देखनेमें असमर्थ हो कर, उन्हींके साथ प्राणत्यागका सङ्कल्प किया। क्यों कि- १३०. महान् लोग अपनी विपत्तिसे उतने दुःखी नहीं होते जितने दूसरोंकी विपत्तिसे । अपने ऊपर आघात होने पर जो पृथ्वी अचल रहती है वही दूसरोंकी विपद् देख कर काँपने लगती है। इसके बाद महा उपद्रव उपस्थित हुआ जान कर मातृभक्तिवश श्री कर्णने उससे विवाह कर लिया। पर बादमें [बहुत समय तक] उसकी ओर नज़र उठा कर ताका भी नहीं। ८४) एक बार मुञ्जाल मंत्रीको कञ्चुकीसे यह मालूम हुआ कि राजाका मन किसी अधम स्त्रीके प्रति साभिलाष है। [यह जान कर] उसने ऋतुस्नाता मयणल्लादेवी को, उसीका रूप धारण कराके एकान्तमें १७-१८

तृतीय प्रकाश: राजा भोज व धारा साम्राज्य प्रबन्ध

६६ ] प्रबंधचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश उसके पास भेजा। राजाने यह समझ कर कि यह वही स्त्री है, उसके साथ सप्रेम उपभोग किया और उससे उसको गर्भाधान हो गया। फिर उसने सङ्केत बतानेके लिये राजाके हाथसे उसकी नामाङ्कित अँगूठी ले ली और अपनी अँगुलीमें पहन ली। बादमें प्रात काल, उस दुर्विलासके कारण राजाको ग्लानि हुई और उस रहस्यमय वास्तविक वृत्तान्तको न जानते हुए उसने प्राणत्याग करनेका सङ्कल्प किया। स्मृतिशास्त्रियोंके, ताँबेकी बनी हुई प्रतप्त मूर्तिके साथ आलिङ्गन करनेसे इसका प्रायश्चित्त हो जायगा, ऐसा विधान बतलानेसे राजाने उसी प्रकार करनेकी इच्छा की। तब उस मन्त्रीने यह सारी बात जैसी बनी थी वैसी कह सुनाई। ( इस जगह P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं - ) [ ८५ ] [ अपने ] भारी पराक्रमके कारण तो वह पिता [ भीम ] के समान हुआ। और रमणीय आकारके कारण वह राजा अपने पुत्र [ जयसिंह-सिद्धराज ] के समान हुआ। [ ८६ ] बिना कर्ण ( राजाके ) के स्त्री-नेत्रोंको कहीं भी रति ( प्रीति ) नहीं प्राप्त होती थी इसी लिये उन (स्त्री नेत्रों) की प्रवृत्ति कर्ण (कान) तक हुई। (अर्थात् इसी लिये मानों स्त्रियोंके नेत्र कानतक लंबे होने लगे।) [ ८७ ] मानों कर्ण और अर्जुनके उस पुराने बैरको स्मरण करते हुए ही, उस कर्णने [ अपने ] अर्जुन ( श्वेत ) यशको देशान्तरमें पहुँचा दिया। सिद्धराज जयसिंहका जन्म। [ ८८ ] जिस प्रकार दशरथके पुत्र मनोहर गुणोंसे युक्त श्री राम हुए उसी प्रकार इस [ कर्ण ] का जगद्विजयी ऐसा जयसिंह नामक पुत्र हुआ। ८५) अच्छे लग्न (मुहूर्त) में पैदा हुए उस पुत्रका नाम राजाने 'जयसिंह' ऐसा रखा। वह बालक जब तीन वर्षका था उसी समय समवयस्क कुमारोंके साथ खेलता हुआ सिंहासनपर आरूढ हो गया। इस बातको व्यवहार विरुद्ध समझ कर राजाने ज्योतिषियोंसे पूछा। उन्होंने निवेदन किया कि यह [बड़ा] आभ्युदयिक लग्न है। राजाने उसी समय उस पुत्रका राज्याभिषेक करा दिया। ८६) सं० ११५० पौष वदी ३ शनिवार, श्रवण नक्षत्र, वृष लग्नमें, श्रीसिद्धराज का पट्टाभिषेक हुआ। ८७) राजा स्वयं, आशापल्ली नामक ग्रामके रहनेवाले आशा नामक भीलके ऊपर युद्धके लिये चढ़ाई करके गया। भैरव देवीका शुभ शकुन होने पर, वहाँ कोछरव्व नामक देवीका मंदिर बनवाया [और वहीं शिबिर निवेश किया] फिर, एक लाख खड्गके अधिपति उस भीलको जीतकर और उस प्रासादमें जयन्ती देवीकी प्रतिष्ठा करके, कर्णेश्वर देवताका मंदिर और कर्णसागर तालाबसे सुशोभित कर्णावती पुरीकी स्थापना कर खुद वहीं राज्य करने लगा। उस राजाने पत्तन में श्री कर्णमेरु नामक प्रासाद बनवाया। सं० ११२० चैत्र सुदि ७ से ले कर, सं० ११५० पौष वदी २ तक, २९ वर्ष ८ मास २१ दिन इस राजाने राज्य किया। सिद्धराजका राज्यवर्णन - लीला वैद्यका प्रबन्ध। ८८) इसके बाद, जब श्री कर्णका स्वर्गवास हो गया तो श्रीमती उदयमति देवीका भाई मदनपाल असम्मत भावसे वर्तने लगा। उसने लीला नामक वैद्यको, - जिसने देवतासे वरप्रसाद पाया था और तात्कालिक नागरिक लोग कृतहृदय हो कर जिसकी काञ्चन-दान आदि पूजा द्वारा अभ्यर्थना किया

प्रकरण ८९-९० ] उदयन मंत्रीका प्रबन्ध : [ ६७ करते थे-अपने महलमें बुलाया। शरीरमें बनावटी रोग बतला कर नाडी दिखाई। वैद्यने उपयुक्त पथ्यका सेवन करना बतलाया तो [उस मदनपालने कहा] 'वही तो नहीं है।' और इसीलिये मैंने तुम्हें बुलाया है। [किसी और प्रकारका] पथ्य दे कर भूख शान्त करनेके लिये तुम्हें नहीं [बुलाया है]। इसलिये पचीस हजार [रुपये] हाजर करो, यह कह कर उसे बंदी कर लिया। उसने वह सब वैसा करके (अर्थात् उसका मांगा हुआ द्रव्य दे-दिला कर) फिर इस तरहका अभिग्रह (नियम) ग्रहण किया कि-'मैं इसके बाद प्रतीकारके लिये राजाका घर छोड़ कर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा'। इसके बाद परम आतुर रोगियोंका प्रत्ररण (पेशाब) मात्र देख कर ही वह उनका निदान और चिकित्सा करता रहा। [एक समय] किसी मायावीने, कल्पित रोगकी चिकित्सा कौशलको जाननेकी इच्छासे एक बैलका मूत्र दिखाया। उसने अच्छी तरह उसे देख कर सिर हिलाते हुए कहा-'यह बैल बहुत खानेके कारण फूल गया है। इसलिये शीघ्र ही इसे तेलकी नाली दो। नहीं तो मर जायगा।' ऐसा कह कर उसने उसके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न किया। एक बार राजाने अपनी गर्दनकी पीडाका प्रतीकार पूछा। उसके यह कहने पर कि, दो पल भर कस्तूरीको भिगो कर लेप करनेसे रोग शान्त होगा, वैसा ही किया गया। गर्दन ठीक हो गई। फिर राजाकी पालकी ढोनेवाले किसी गरीब मनुष्यने ग्रीवा (गर्दन) की पीड़ाकी दवा पूछी। उससे कहा कि 'करीरकी जड़ घिस कर उसके रसमें उसी जगहकी मिट्टी मिला कर उसका लेप करो।' तब राजाने पूछा कि यह क्या बात है ?। इस पर उसने बताया कि 'आयुर्वेदज्ञ लोग देश, काल, बल, शरीर और प्रकृति देख कर चिकित्सा किया करते हैं।' एक बार, कुछ धूर्त एक मत हो कर दो दोकी संख्यामें पृथक् पृथक् हो गये। पहले दोने बाजारके रास्तेमें पूछा कि 'क्या बात है कि आप शरीरसे खिन्न दिखाई देते हैं।' दूसरे दोने श्री मुञ्जालस्वामी प्रासादके सोपान पर [वही बात] पूछी। तीसरे दोने राजद्वार पर और चौथे दोने द्वारतोरण पर वही बात पूछी। इस प्रकार बार बार पूछनेसे उसे [अपने स्वास्थ्यके विषयमें बड़ी] शंका उत्पन्न हो गई और तत्काल ही उसे माहेन्द्र ज्वर हो गया। [और उससे] तेरहवें दिन वह वैद्य मर गया। इस प्रकार यह ठ० लींला वैद्यका प्रबंध समाप्त हुआ। * ८९) इसके बाद, सान्‍तू नामक मंत्री, कालकी नाँई अन्यायी उस मदनपालको मारनेकी इच्छासे किसी समय, कर्णके पुत्र-कुमार जयसिंह-को हाथी पर चढ़ा कर राजपाटिकाके बहाने उसके घर ले गया और वहाँ [कुछ तूफान मचा कर] वीरोंके हाथसे उसको मरवा डाला। * उदयन मंत्रीका प्रबन्ध । ९०) इधर, मरु देश का रहनेवाला कोई श्रीमालवंशीय वणिक् जिसका नाम 'उदा' था, अच्छा घी खरीदनेके लिये, वर्षाकालकी अँधेरी रातमें कहीं जा रहा था। वहाँ जंगलमें उसने देखा कि कुछ कर्मचारी किसी खेतमें एक क्यारीसे दूसरी क्यारीमें जल भर रहे हैं। उनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो। उन्होंने जब कहा कि 'हम फलाँ आदमीके कामुक (हितचिन्तक) है' तो उसने पूछा कि मेरे भी कहीं हैं ?। इस पर उनके यह बताने पर कि 'कर्णावती में हैं' वह सकुटुंब [उस स्थानको छोड़ कर] वहाँ (कर्णावती) पहुँचा। वहाँ पर बायटीय जिन मन्दिरमें [देवदर्शन करते हुए उसको] किसी 'लछि' नामक एक डिम्पिका श्राविकाने, उसे साधर्मिक जान कर प्रणाम किया। उसके यह पूछने पर कि आप किसके अतिथि हैं ? [उदाने कहा कि] 'मैं विदेशी हूँ, आप ही को अतिथि समझिए !' यह सुन कर उसने उसको अपने साथ ले जा कर, किसी वणि-

६८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश कके घर भोजन बनवा कर उसे खिलाया और अपने घरके नीचेके तलमें खाट बिछवा कर रहनेकी जगह दी। कालक्रमसे उसके पास खूब सम्पत्ति हो गई। फिर उसने अपना निजका ईंटोका घर बनवानेकी इच्छा की। उसकी नींव खोदते समय [ जमीनमेंसे ] अपरिमित धन निकल आया। वह उस स्त्रीको बुला कर उस निधिको जब देने लगा तो उसने अस्वीकार किया। उसी प्रतिके प्रभावसे, यहाँ पर, वह उदयन मंत्रीके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ९१) [ फिर उस धनसे ] उसने कर्णावती में अतीत, भविष्य और वर्तमानके चौवीस चौवीस जिनोंसे सुशोभित श्री उदयन विहार [नामक मन्दिर] बनवाया। ९२) उसको भिन्न भिन्न मातासे उत्पन्न ऐसे चार पुत्र हुए, जिनके नाम चाहड, आंबड, वाहड और सोलाक इस प्रकार थे। * सान्तू मंत्रीका प्रबन्ध ९३) एक दूसरे अवसर पर, सान्तू नामक महामंत्री हाथी पर चढ कर राजवाटिका में जाकर लौटा और अपनी ही बनवाई हुई सान्तू वस हिकामें देवनन्दन करनेकी इच्छासे उसमें प्रवेश करते हुए, उसने, किसी चैत्यवासी श्वेताम्बर यतिको, बार-वेश्याके कंधे पर हाथ रखे हुए देखा। मंत्रीने हाथीसे उतर कर उत्तरासङ्ग करके, पञ्चाङ्ग प्रणामके द्वारा, गौतम मुनिकी भाँति, उसको प्रणाम किया। वहाँ पर क्षणभर ठहर कर, फिर उसे प्रणाम करके, वह चला गया। वह यति तो लाजके मारे मुँह नीचा किये पातालमें गड़ा-सा जाने लगा; और फिर तत्काल सब छोड़-छाड़ कर 'मलयधारी श्री हेम सूरिके पास उपसम्पदा ग्रहण करके, संवेग रससे पूर्ण हो शत्रुञ्जय पर्वत पर चला गया और बारह वर्षतक वहाँ तप किया। किसी समय वही मंत्री श्री शत्रुञ्जय पर देवचरणोंकी यात्राके लिये गया तब वहाँ उस मुनिको अपरिचितकी नाँई देख कर, उसके चरित्रसे मनमें चकित हो कर, उसका गुरुंकुल आदि पूछा। 'असलमें तो आप ही गुरु हैं'--उसके ऐसा कहने पर कान बंद करके मंत्रीने कहा- नहीं, नहीं, ऐसा मत 'कहिये।' असल बात न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए उस मंत्रीसे उसने कहा- १३१. चाहे गृही हो चाहे त्यागी, जो जिसको शुद्ध धर्ममें स्थापित करता है वही उसका धर्मगुरु होता है। इस प्रकार उसे मूल वृत्तान्त बता कर उसकी धर्ममे दृढ़ता निर्माण की। इस प्रकार यह मन्त्री सान्तूकी दृढ़धर्मताका प्रबंध समाप्त हुआ। * मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना। ९४) उसके बाद, श्री मयणल्लादेवीने, अपने पूर्व जन्मकी स्मृतिके ज्ञानसे जाना हुआ, पूर्वभवका वह वृत्तांत, जब सिद्धराज से कह बताया, तो वह श्री सोमनाथ के योग्य सत्रा करोड़ मूल्यकी सुवर्णमयी पूजा- सामग्री साथ ले कर यात्राके लिये माताके साथ चला। वह इस प्रकार, बाहुलोड नगर पहुँची, तो यहा पर, पञ्चकुल - कर वसूल करने वाले राजपुरुष - के द्वारा, कापडी आदिप्रवासी भिक्षुक गण, कर देनेके लिये पीड़ित किये जा कर, उनकी अवहेलना की गई। वे आँखों में, आसू भर कर पीछे लौटने लगे। मयणल्ला देवी ने जो यह बनाव देखा तो उसके दर्शनसे [ स्वच्छ ] हृदयमें उनकी पीड़ा संक्रान्त हो गई। वह भी [ उनके साथ यात्रा किये बिना ] पीछे लौटने लगी। तब सिद्धराज ने बीचमें पड कर कहा- 'स्वामिनि ! आपका यह कैसा संभ्रम है! आप क्यों पीछे लौट रही हैं!' राजाके ऐसा कहने पर [ उसने कहा-] जबी यह कर सर्वथा बन्द कर दिया जायगा तभी मै सोमेश्वर को प्रणाम करूंगी, अन्यथा नहीं। और तो क्या, इसके बाद भोजन और पानका भी मुझे नियम है।' यह सुन कर राजाने पञ्चकुलको बुलाया और उसका हिसाब पूछा, तो उसमें ७२

प्रकरण ९१-९६ ] मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना [ ६९ लाखकी आमदनी मालूम दी । राजाने उस करके पट्टेको फाड कर, माताके कल्याणार्थ उस करको उठा दिया और अंजलीमें जल ले कर उसकी प्रतिज्ञा की । इसके बाद उस ( मयणल्लादेवी ) ने सोमेश्वर के पास जा कर उस सुवर्णसे पूजा की; तथा तुलापुरुषदान, गजदान आदि अनेक महादान दिये । रातको वह ऐसे गर्वके साथ कि 'मेरे समान संसारमें न कोई हुई और न कोई होने वाली है' गाढ़ी नींदमें सो गई । तपस्वी वेष धारण करके उसी देव (सोमेश्वर) ने [ स्वप्नमें प्रत्यक्ष हो कर के ] कहा-' यहाँ मेरे देवालयमें एक कार्पटिक स्त्री यात्राके लिये आई है । तुम्हें उसका पुण्य माँगना चाहिये । ऐसा आदेश करके जब वह देवता अन्तर्धान हो गये तो [ फिर प्रातःकाल ] राजपुरुषोंसे खोज करा कर उस स्त्रीको उसने बुलवाया । उसके पुण्यको माँगने पर भी वह किसी तरह जब देनेको तत्पर न हुई तो उससे पूछा कि ' यात्रामें तुमने क्या [द्रव्य] व्यय किया है?' तो वह बोली कि मैं भीख माँग माँग कर १०० योजन दूरसे, कई देश पार करके, कलके दिन यहाँ देवालयमें आई हूँ । तीर्थोपवास करके, पारणामें किसी सुकृतिके यहाँसे, मैं निर्भागिनी थोडासा पिण्याक (खली) प्राप्त करके, उसके एक टुकड़ेसे मैने श्री सोमेश्वरकी पूजा की, एक टुकड़ा अतिथिको दिया और एक टुकड़ा स्वयं खा कर उपवासका पारणा किया । आप तो बड़ी पुण्यवती हैं-जिसके पिता, भाई, पति और पुत्र राजा हैं। आपने यह बाहुलोडकर, जो ७२ लाखका था, उठवा दिया है । सत्रा करोड़ मूल्यकी सामग्रीसे देवकी पूजा कर अगणित पुण्य अर्जन किया है । आप मेरे इस क्षुद्र पुण्य पर क्यों लोभ करती हैं ? और यदि क्रोध न करें तो कुछ कहूँ । असलमें तुम्हारे पुण्यसे मेरा पुण्य अधिक है । क्यों कि- १३२. संपत्ति होने पर नियम करना, शक्ति रहते सहन करना, यौवनावस्थामें व्रत लेना और दरिद्रा- वस्थामें दान देना,-यह सब बहुत थोडा होने पर भी अधिक पुण्यका कारण होता है । इस प्रकारके युक्ति-युक्त वाक्यसे उसने उसके गर्वका निराकरण किया । * ९५) इसके बाद, सिद्धराज जब समुद्रके किनारे खड़ा हो कर उसको देख रहा था तब एक चारणने आ कर इस प्रकार स्तुति की- १३३. हे चक्रवर्ती नाथ ! तुम्हारे चित्तको तो कौन जानता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि हे कर्णपुत्र आप शीघ्र ही लंका लेना चाहते हैं और उसीके लिये यहाँ खडे खड़े मार्ग देख रहे हैं। [ तब एक ] दूसरे चारणने कहा- १३४. हे जेसल ( जयसिंह ) ! यह समुद्र दौड कर तुम्हारे पैर धो रहा है; इसलिये कि तुमने और तो सब राजाओंको जीत लिया है और सिर्फ एक मेरा विभीषण राजा बाकी रह गया है; सो उसको छोड़ दीजिए । * सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्ष । ९६) राजा जब इस प्रकार यात्रामें व्यस्त था, उसी समय मालवाका छ्हानवेपो राजा यशोवर्मा गूर्जर देश में [ आ कर ] उपद्रव करने लगा । सान्तू मंत्री ने पूछा कि 'भलों, आप कैसे इस चढ़ाईसे निवृत्त हो सकते हैं?' उसने कहा कि 'यदि तुम अपने स्वामीकी सोमेश्वर देवकी यात्राका पुण्य मुझे दे दो तो।' ऐसा कहने पर उस मंत्रीने उसके चरण धो कर, उस पुण्यदानके निदानरूप जलको चुल्लमें ले कर उसके हाथ पर छोड़ दिया और ऐसा करके उसको [ गूर्जर देश से ] वापस लौटाया । [ यात्रासे लौट कर ] श्रीसिद्धराज जब नगरमें आया और मंत्री और मालव नरेशके उस वृत्तान्तको सुना तो वह बड़ा क्रुद्ध हुआ । मंत्रीने उससे

७० ] प्रवन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [ शांत करते हुए ] यों कहा - 'स्वामिन् ! यदि मेरे देनेसे तुम्हारा पुण्य चला जाता है तो मैं उसका तथा अन्य पुण्यवानोंका पुण्य इसी तरह आपको भी दे देता हूँ । और असलमें तो बात यह थी कि जिस-किसी भी उपायसे शत्रुसेनाको स्वदेशमें प्रवेश करनेसे रोकनी जरूर थी।' ऐसा कह कर उसने नृपतिको अनुनय किया । इसके बाद इसी अमर्षवश उसने मालव मण्डल पर चढ़ाई करनेकी इच्छा की । सहस्रलिंग [ सरोवरादि ] धर्म- स्थानके कार्यका जो आरंभ किया गया था उसकी देखरेखका काम मंत्रियों और शिल्पियों (कारीगरों) को सौंपा। बड़ी शीघ्रताके साथ उसका काम चलने पर राजाने युद्धके लिये प्रयाण किया । वहाँ जय-जयकारके साथ बारह वर्ष तक युद्ध होता रहा । फिर भी जन किसी प्रकार धारा [ नगरी ] का किला नहीं टूटता दिखाई दिया तो [ एक दिन राजाने यह ] प्रतिज्ञा की कि धाराके किलेको तोड़े बिना आज अन्न ही न खाऊँगा । सायंकाल हो जाने पर भी ऐसा करनेमें असमर्थ होनेके कारण, सचिवोंने आटेकी बनावटी धारा बना कर और वहाँ पर परमार राजपूतको अपने सैनिकों द्वारा मरवा कर, उस प्रतिज्ञाका निर्वाह कराया । इस प्रकार प्रपञ्चसे राजाने प्रतिज्ञा तो पूरी की, लेकिन कार्यमें सफलता प्राप्त न होनेसे वापस लौटनेकी अपनी इच्छा सुआछ नामक मंत्रीको बताई । उसने अपने गुप्तचरोंको तीन रास्ते, चौराहे और चबूतरे इत्यादिक स्थानों पर भेज कर, धाराके किलेके भग होनेकी बातें जाननी चाहीं । लोगोंके परस्पर वार्तालाप करते हुए, धाराके रहने वाले किसी [ जानकार ] पुरुषने कहा कि ' दक्षिण दिशाके दरवाजेकी ओरसे शत्रुसेना हमला करे तब ही कहीं धारा के किलेका तोड़ना सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।' यह बात सुन कर [उन गुप्त चर लोगोंने] मन्त्रीको सूचित किया। उसने इस वृत्तान्तको गुप्तरूपसे राजाको विज्ञापित किया। राजाने भी यह वृत्तान्त जान कर उधर ही से सेनाके साथ आक्रमण किया । तो भी दुर्गको बड़ा दुर्गम समझ कर राजा स्वयं 'यशःपटल' नामक अपने प्रधान बलवान् पत्त हाथीपर चढ़ा । उसके पीछे सामछ नामक महावत खड़ा रहा । त्रिपोलिया दरवाजेके दोनों किवाड़ोंको, जिनके अंदर लोहेकी जबर्दस्त अर्गला लगी हुई थी, तोडनेके लिये उस हाथीने अपना सर्व सामर्थ्य खर्च कर दिया । किवाड़ तो टूट गये लेकिन हाथीकी हड्डी भी साथमें टूट गई। महावतने सिद्धराजको उस परसे उतारा और ज्यों ही यह स्वयं उस पर चढ़नेको उद्यत हुआ त्यों ही वह हाथी पृथ्वीपर गिर पड़ा। वह हाथी बड़ा वीर होनेके कारण मर कर अपने यशसे धवल हो कर घउसर ग्राममें यशोधवल नाम ग्रहण करके विनायक रूपसे अवतीर्ण हुआ । १३५. सिद्धिके स्तनमण्डलके तटदेशके आघातके कारण मानो जिसका दूसरा दांत टूट गया है, वह एक दाँत धारण करनेवाला गजवदन ( विनायक ) तुम्हारा श्रेय करे । इस तरह उसकी स्तुति [की जाती] है । इस प्रकार दुर्गका भग करने पर युद्धमें आरूढ़ यशोवर्मा को [ सन्धि-विग्रहादि ] ६ गुणोंसे बाँध कर, उस जगह पर अपनी जगन्मान्य आज्ञाकी उद्घोषणा करवाई और यशोवर्मा [ राजाको बन्दि बना कर अपने साथमें ले ] पत्तन में आया । [ पर क्षत्रियोंने ऐसी स्तुतिया पढ़ीं-] [८९] ओ क्षत्रियो, ऐसा न समझो कि इस सिद्धराज के कृपाणने अनेक राजाओंकी सेनाका नाश किया है इसलिये अब इसकी धार कुंठित हो गई है। नहीं नहीं; प्रज्वल प्रतापरूप अग्निके ऊपर आरूढ हो कर यह सप्ताणधार (=१ जिसने धारा नगरीको प्राप्त किया है, २ जिसने तेजदार धार पाई है) कृपाण चिरकाल तक मालव रमणियोंका अश्रुजल पी कर और अधिक तेज होगा [९०] हे महाराज ! आपने शत्रुओंके विजय करनेमें दुग्धकी धाराके समान जो उज्ज्वल यश प्राप्त किया है उसके कारण आपकी तलवार तो उज्ज्वल ही थी पर इन मालव-नारियोंके काजल [मिश्रित अश्रुजल] पी पी कर, इसने, तुम्हारी महिमा सूचक, यह कालिका धारण कर ली है ।।

प्रकरण ९६-९७ ] सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन [ ७१ सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन । ९७) प्रति दिन सब दर्शन [के आचार्यों] को आशीर्वाद और दानके लिये बुलाये जाने पर, यथावसर बुलाये गये श्री हेमचन्द्र प्रभृति जैनाचार्य श्री सिद्धराज के पास गये । राजाके दुकूल आदि दे कर उनका सत्कार करने पर, उन सभी अप्रतिम प्रतिभा पूर्ण पंडितों द्वारा दोनों तरह पुरस्कृत हो कर हेमचन्द्राचार्य ने राजाको इस प्रकार आशीर्वाद दिया- १३६. हे कामधेनु ! तू अपने गोमयके रससे भूमिका आसेचन कर, हे समुद्रो ! तुम अपने मोतियोंसे स्वस्तिक बनाओ, हे चन्द्र ! तूं पूर्णकुंभ बन जा और हे दिग्गजो ! तुम अपने सरल सूंडोंसे कल्पवृक्षके पत्ते तोड़ कर उनके तोरण सजाओ - क्यों कि संसारका विजय करके सिद्धराज आ रहा है । इस प्रकार निष्प्रपञ्च (सरल) काव्यके विवेचन करने पर उनकी वचन-चातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर राजाने [यथेष्ट] प्रशंसा की । इस पर कुछ असहिष्णुओके-अर्थात् ब्राह्मणोंके-यह कहने पर कि 'हमारे शास्त्रोंके - अर्थात् पाणिन्यादि व्याकरण ग्रंथोंके - अध्ययनके बल पर ही इन (जैनों) की विद्वत्ता है।' राजाने श्री हेमचन्द्र आचार्यसे पूछा । [उन्होंने कहा-] प्राचीन कालमें श्री जिनेन्द्र महावीर ने अपने शासन कालमें इन्द्रके सामने जिसकी व्याख्या की थी उसी जैनेन्द्र व्याकरणको हम लोग पढ़ते हैं । उनके ऐसा कहने पर उस पिशुनने कहा कि इन पुरानी बातोंको तो छोड़ दो और हमारे समयके ही किसी तुम्हारे व्याकरण कर्त्ताका पता बता सकते हो तो बताओ । इस पर वे राजासे बोले कि यदि महाराज श्री सिद्धराज सहायक हों तो, मैं ही स्वयं कुछ दिनोंमें ही पञ्चाङ्ग पूर्ण नूतन व्याकरण तैयार कर सकता हूँ। राजाने कहा- मैंने [साहाय्य करना] स्वीकार किया। आप अपने वचनका निर्वाह करें । ऐसा कह कर उसने सब सूरियोंको विदा किया । वे भी अपने अपने स्थानको गये । राजाने [पहले ही यह एक] प्रतिज्ञा करली थी कि यशोवर्माके हाथमें बिना म्यानकी छुरी देकर और उसको अपने पीछे बिठा कर हाथी पर सवार होकर हम नगरमें प्रवेश करेंगे । राजाकी इस प्रतिज्ञाको सुन कर मुञ्जाल नामक मंत्री [असंतुष्ट बना और उस] ने प्रधान पद छोड़ दिया । राजाके बार बार कारण पूछने पर १३७. राजा लोग चाहे सन्धि [करना] न जाने और विग्रह भी [करना] न जाने; पर यदि वे [मंत्रियोंका] आख्यात (कहा हुआ) ही सुनते रहें तो इसीसे वे पण्डित हो सकते हैं । इस प्रकारका नीतिशास्त्रका उपदेश है। महाराजने स्वयं अपनी बुद्धिसे जो यह प्रतिज्ञा की है, भविष्यमें यह बिल्कुल ही हितकर न होगी। राजाने प्रतिज्ञाभंग होनेके भयसे भीत हो कर कहा कि 'प्राणोंका त्याग करना अच्छा है। किन्तु विश्वविदित इस प्रतिज्ञाका नहीं।' इस पर मंत्रीने काठकी छुरी बना कर शालवृक्षके पाण्डुरंगके गोंदसे उसे परिमार्जित कर, पीछेके आसन पर बैठे हुए यशोवर्माके हाथमें दी । उसके आगेके आसन पर राजा सिद्धराज बैठा और खूब समारोहके साथ उसने अणहिल्लपुरमें प्रवेश किया । प्रावेशिक मंगलकी धूमधाम समाप्त हो जाने पर राजाने व्याकरण वृत्तान्तकी याद दिलाई। इस पर बहुतसे देशोंके तज्ज्ञ पंडितोंके साथ सभी व्याकरणोंको नगरमें मंगवा कर श्री हेमचन्द्राचार्य ने श्री सिद्धहैम नामक नूतन पञ्चाङ्ग व्याकरण एक वर्षमें तैयार किया । इसका ग्रंथप्रमाण सवालाख श्लोक था । राजाके निजके बैठनेके हाथी पर उस पुस्तकको रख कर उसका जुलूस निकाला गया। उसके ऊपर श्वेतच्छत्र लगाया गया और दो चामरग्राहिणिया चामर झलने लगीं । इस प्रकार उस ग्रंथकी महिमा करके उसे कोषागारमें रखा। फिर राजाकी

७२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश आज्ञासे अन्य व्याकरणोंको छोड़कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर किसी मत्सरने राजासे कहा कि 'इस व्याकरणमें आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है।' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह बात किसी राजपुरुषसे जान कर श्रीहेमाचार्यने [तत्क्षण] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया। प्रातःकाल जब राजसभा में व्याकरण बांचा गया तो- १३८. हरिकी भाँति बलि बंधकर (= १ बलिको बाँधनेवाला, २ बलियोंको बंदी करनेवाला), शिवकी नाँई त्रिशक्तियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (= १ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला- लक्ष्मीका आश्रय) श्री मूलराज नृपकी जय हो। इत्यादि, चौलुक्य वंशकी स्तुतिवाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोंके अन्तमे आये सुन कर राजा मनमें प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्रीसिद्धराज के दिग्विजय वर्णनमें [हेमाचार्यने] द्वयाश्रय नामक [काव्य] ग्रंथ बनाया। [हेमाचार्यके बनाए इस सिद्ध हेम व्याकरण के विषयमें विद्वानोंने ऐसी उक्तियाँ कही हैं-] १३९. हे भाई! पाणिनि के प्रलापको बंद करो, कातन्त्र का चीथड़ा मत फाड़ो शाकटायन के कटु वचनको मत पढ़ो, और क्षुद्र चांद्रव्याकरण से क्या मतलब है, भलौँ, और कण्ठाभरण आदि व्याकरणोंसे अपने आपको कोई क्यों भुलायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्धहेम की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं। ९८) इसके बाद, श्री सिद्धराज ने पत्तन में यशोवर्मराजा को, त्रिपुरुषप्रभृति सभी राजप्रासादों और सहस्रलिंग प्रभृति धर्मस्थानोंको दिखा कर बताया कि-[हमारे राज्यमें] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़ द्रव्य व्यय किया जाता है।! और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर?'। वह बोला-मैं तो अठारह लाख संख्यावाले (!) मालवदेश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ?। पर यह देश तो पहले ही महाकालदेव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मालवी लोग उपभोग कर रहे हैं; और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है। आपके वंशवाले राजा भी इतना देवद्रव्य व्यय करनेमें असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार वे विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायेंगे। * सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना। ९९) इसके पश्चात, एक बार श्री सिद्धराज ने सिद्धपुर में रुद्रमहालय का प्रासाद बनवाना चाहा। किसी [प्रसिद्ध] स्थपति (कारीगर) को अपने पास रख कर, प्रासादके प्रारंभ होनेके समय उसकी कंठासिकाको-जो उसने किसी साहूकारके यहाँ एक लाखमें बंधक रखी थी-छुड़ा कर उसको दिलवाई। वह बांसकी कमचियोंकी बनी हुई थी; उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है? इस पर उस स्थपतिने कहा कि मैने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है। फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते हुए भी लौटा दिया। फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सर्वाङ्गपूर्ण प्रासाद बनवाया। उस प्रासादमें अश्वपति, गजपति, नरपति प्रभृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ बनवा कर रखीं और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी मूर्ति भी बनवाई। [जिसका आशय यह है कि राजा] उनसे वर माँगता है कि देशका भङ्ग करते हुए भी इस प्रासादका कोई भंग न करें। उस मंदिर पर ध्वजारोपका उत्सव करते समय सभी जैन प्रासादोंकी पताकायें उतरवा दी गईं। जैसे मालव देश के महाकालके मंदिरमें जब वैजयंती चढ़ाई जाती है तब जैन प्रासादोंमें ध्वजारोपण नहीं होने पाता। १ यह कलासिका नामका कारीगरका कोई ओजार है जिसका ठीक अर्थ समझमें नहीं आता।

प्रकरण ९९-१०१ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । [ ७३ सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । १००) एकवार, सिद्धराज ने मालवक मण्डलके प्रति जाना चाहा तब किसी व्यवहारीने [ जो उस काममें नियुक्त अधिकारी था ] सहस्रलिंग सरोवरके कारखानेके लिये कुछ द्रव्य और भाग माँगा । राजा उसे कुछ भी दिये बिना चला गया । कुछ दिनोंके बाद द्रव्याभावसे उस कामके चलनेमें देरी होते देख, उस व्यवहारी (अधिकारी) ने अपने लड़केसे किसी धनाढ्य पुरुषकी स्त्रीका ताडंक (करन फूल) चुरा लिया, और फिर स्वयं उसके दण्डस्वरूप तीन लाख द्रव्य दे दिया । उससे वह काम पूरा हो गया । यह बात मालव मण्डलमें, वर्षाकालमें ठहरे हुए राजाने सुनी । सुन कर उसे जो आनन्द हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसके बाद वर्षाकालकी घनी वृष्टिसे जब सारी पृथ्वी एक समुद्रकी भाँति जलमय हो गई तो प्रधान पुरुषोंने राजाको बधाई देनेके लिये किसी मरुदेश वासीको भेजा । उसने [जा कर] राजाके सामने विस्तार पूर्वक वर्षाका स्वरूप कहना आरम्भ किया । इसी बीच, उसी समय आया हुआ कोई धूर्त गुजराती जल्दीसे बोल उठा—‘महाराज बधाई ! सहस्रलिंग सरोवर [जलसे परिपूर्ण] भर गया है । उसके ऐसा कहनेके साथ ही राजाने उस गुजरातीको अपने शरीरके सारे आभरण दे दिये । वह मरुवासी छींकेसे गिरे हुए मार्जार की भाँति देखता ही रह गया । १०१) इसके बाद, वर्षा बीतते ही, राजा वहाँसे लोटा । [रास्तेमें] नगर महास्थान (वडनगर) में डेरा डाला और वहाँ बनवाये गए मच-मडपमें राजसभाकी बैठक की गई । नगरके प्रासादोंमें ध्वज लगे हुए देख कर ब्राह्मणोंसे पूछा कि ‘ये कौनसे प्रासाद हैं ?’ उन्होंने जब वहाँके जिन और ब्रह्माके मंदिरोंका हाल बताया तो क्रुद्ध हो कर राजाने कहा कि ‘जब मैंने गूर्जर मडलमें, जैन मदिरोंमें पताका लगानेका निषेध किया है, तो फिर आप लोगोंके इस नगरमें इन जैन मंदिरों पर ये पताकायें क्यों उड़ रहीं हैं ?’ उन्होंने कहा कि—‘सुनिये, कृतयुगके प्रारंभमें श्रीमन्महादेवने इस महास्थान की स्थापना करते हुए श्री ऋषभनाथ और श्री ब्रह्मदेवके प्रासाद स्वयं बनाये और उन पर ध्वजायें चढाईं । सो इन दोनों प्रासादोंका सुकृतियों द्वारा उद्धार होते रहने पर ये चार युग बीत गये । दूसरी बात यह है कि—पहले यह नगर शत्रुञ्जय महागिरिकी उपत्यका भूमि था । क्यों कि नगर पुराण में भी कहा है कि— १४०. कहा जाता हे कि आदिकालमें इस जिनेश्वरके पर्वतकी मूलभूमिका विस्तार पचास योजन था ऊपरकी भूमिका विस्तार दश योजन था और ऊँचाई आठ योजन थी । कृतयुगमें आदिदेव श्री ऋषभदेव के पुत्र भरत नामरूप हुए । उन्हींके नामसे यह ‘भरतखण्ड’ प्रसिद्ध हुआ । १४१. नाभि और [उनकी पत्नी] मरुदेवीके पुत्र श्री वृषभ (ऋषभ देव) हुए जिन्होंने समदृक् हो कर मुनियोग्य चर्याका आचरण किया । वे स्वच्छ, प्रशान्त अन्त करण, समदृक् और सुधी थे । ऋषिगण उनके अर्हत पदको मानते हैं । १४२. मरुदेवी के गर्भसे नाभिके (श्री ऋषभदेव) पुत्र हुए जो अष्टम [विष्णुके अवतार स्वरूप] थे और सब आश्रमसे नमस्कृत थे । जिन्होंने धीरोंको अथवा वीरोंको [मोक्षका] मार्ग दिखाया । (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित-अनुवादवाले-श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [९१] स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामरूप हुए, उनके पुत्र हुए अग्नीन्ध्र, उनके नाभि और उनके पुत्र ऋषभ । १९-२०

७४ ] प्रबंधचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [९२] मोक्षधर्मका विधान करनेकी इच्छासे वासुदेव ही अंशरूपसे अवतीर्ण हुए हैं, यह बात उनके निश्चयमें [ मुनियोंने ] कही है । उनके सौ पुत्र हुए जो सभी ब्रह्मपारंगत थे । [९३] उनमें सबसे ज्येष्ठ भरत थे जो नारायणके भक्त थे । जिनके नामसे यह अद्भुत ऐसा भारतवर्ष विख्यात हुआ । [९४] अर्हन्, शिव, भव, विष्णु, सिद्ध, बुद्ध, परमात्मा, और पर—ये सभी शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं । [९५] मनीषियोंने जैन, बौद्ध, ब्राह्म, शैव, कापिल और नास्तिक इन छहोंको दर्शन कहा है । [९६] उसमें, इन सबके कुलके आदि बीज विमलवाहन हैं । मरुदेव और नाभि ये भरतखंडमें कुल-सत्तम ( कुलश्रेष्ठ ) हुए । इत्यादि पुराण वाक्योंको सुना कर, विशेष विश्वासके लिए ऋषभदेवके मन्दिरके भण्डारमेंसे, राजा भरतके नामसे अंकित, पाँच आदमियों द्वारा उठाये जाने लायक काँसेका बड़ा ताल ले आ कर राजाको ब्राह्मणोंने दिखाया । और इस प्रकार जैनधर्मका आदिधर्म होना उन्होंने सिद्ध किया । इसके बाद खेदसे मनमें खिन्न हो कर राजाने, एक वर्षके बाद, जैन मंदिरों पर पुनः ध्वजारोपण करवाये । १०२) तदुपरान्त, पत्तन में पहुँचने पर राजाको जब सरोवरके खर्चका हिसाब बताया गया तो व्यवहारीके उस अपराधी पुत्रसे दण्डस्वरूप तीन लाख लिये जानेकी भी बात सुनी । यह तीन लाख उसके घर भिजवा दिया । इसके बाद वह व्यवहारी राजाके लिये हाथमें भेंट ले कर उसके समीप आया और बोला कि ‘यह आपने क्या किया!’ तब फिर उस कर्मस्थायके अधिकारी व्यवहारीसे राजाने कहा— ‘जो व्यवहारी कोटीध्वज है वह ताडङ्कका चोरनेवाला कैसे हो सकता है ? तुमने इस धर्मस्थानके बनवानेमें कुछ धर्मभाग मांगा था, लेकिन उसके न मिलने पर प्रपञ्चमें चतुर—तथा मुँहसे मृग और भीतरसे व्याघ्रकी वृत्तिवाले, ऊपरसे गूथ सरछ और अंतरसे शठभागवाले मनुष्यकी तरह—तुम्हींने यह कर्म ( ताडङ्ककी चोरी ) करवाया है।’ [ इस प्रकारकी और भी कितनी ही बातें कह कर उसे खूब लज्जित किया । ] १४३. जिस सरोवरके भीतर, शिवके मन्दिरके दीपक प्रतिबिंबित हो कर पातालमें सर्पोंके सिरपरके मणियोंकी भाँति शोभा पाते हैं । १४४. सिद्धराजके इस सरोवरके शोभित रहते, मेरा मन मानसरोवरमें नहीं रमता, पम्पा सर उसका आनंद सम्पादन नहीं करता और अच्छोद सरोवर, जिसका जल बहुत ही अच्छा है, यह भी असार ( जान पड़ता ) है । * एक बार श्री सिद्धराजने रामचन्द्र [ कवि ] से पूछा ‘ग्रीष्म ऋतुमें दिन क्यों बड़े होते हैं ?’ रामचन्द्रने कहा— [९७] हे श्री गिरिदुर्गके मल्ल महाराज ! आपके दिग्विजयके उत्सवमें दौड़ते हुए वीरोंके घोड़ोंकी टापसे पृथ्वीमण्डल खोद डाला गया है और इससे उड़ी हुई उसकी धूलने जा कर आकाशगंगाने मिल कर उसे पंकावलीके रूपमें परिणत कर दिया है। इससे उसमें दूर्वा उग गई है और उसे सूर्यके घोड़े चरने लग गये हैं । इसी लिए यह दिन बड़ा हो गया है ।

प्रकरण १०२-१०३ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना . [ ७५ [ ९८] मार्गणोंने तुम्हारे शत्रुओंके पास लक्ष ( निशाना ) पा लिया है और तुम्हारे पास वे विलक्ष ( निशानेसे रहित ) हो कर रहे हैं। फिर भी हे सिद्धराज ! तुम्हारा 'दाता'पनका जो यश है वह ऊपर सिर उठाये रह रहा है-बढ़ता चला जाता है ! * इसके बाद, एक बार राजाने प्रथिनाचार्य जयमङ्गल सूरि से नगरवर्णन करनेको कहा । उन्होंने कहा- [९९] मालूम होता है कि इस नगरीकी नागरिकोंके चातुर्यसे निर्जित हो कर सरस्वती देवी है सो हक्की-बक्की-सी हो कर अपनी कच्छपी वीणाको अपने बाहुसे उतार कर यहाँ पर छोड़ दी है और स्वयं पानी वहन करने लगी है। उसकी इस वीणाका यह सहस्रलिंग सरोवर तो मानों तुंबा है और कीर्तिस्तंभ मानों उसका उच्च दण्ड है । १०३) इसके बाद, जब श्रीपाल कविकी रची हुई सहस्रलिङ्गसरोवरकी प्रशस्ति, पट्टिका पर लिखी गई तो उसके संशोधनके लिये सर्व दर्शनके ( आचार्योंके ) बुलाये जाने पर श्रीहेमचंद्राचार्य ने [ अपने प्रधान शिष्य ] रामचंद्र पण्डितको यह कह कर भेजा कि 'प्रशस्ति काव्य जो सभी विद्वानोंको अनुमत हो तो उसमें अपना कुछ भी पाण्डित्य मत दिखाना ।' फिर उन सब विद्वानोंने प्रशस्ति काव्यको शोधनेकी दृष्टिसे पढ़ा और राजाके अनुरोधसे तथा श्रीपालकविकी चतुरतापूर्ण पाण्डित्यसे प्रसन्न हो कर सारे काव्यको मान्य किया । उसमें भी उन सभीने निम्नलिखित काव्यकी विशेष प्रशंसा की- १४५. " कोशसे युक्त होते हुए भी तथा दल ( १ पत्ता, २ सेना ) से समृद्ध हो कर भी यह कमल अपने ही कण्टकोंके समूहको उच्छिन्न करनेमें असमर्थ है और इसके अतिरिक्त पुंस्त्व भी नहीं धारण करता । ( कमल शब्द पुंल्लिंग नहीं है ) [ दूसरी ओर सिद्धराज का जो कृपाण है ] यह अकेला ही बिना कोश- ( म्यान ) के भी भूतलको निष्कण्टक कर रहा है, ऐसा समझ कर लक्ष्मीने [ अपने उस निवासस्थान रूप ] कमलको छोड़ कर इसके कृपाणका आश्रय लिया है। इस विषयमें श्री सिद्धराज ने रामचन्द्र से खास पूछा तो उसने कहा कि 'यह कुछ सदोष है।' उन सभी पंडितोंसे पूछे जाने पर [ उसने कहा कि ] 'इस काव्यमें सेनाका वाचक 'दल' शब्द और कमल शब्दका 'नित्यक्लीवत्व' ये दो दोष चिन्तनीय हैं। तब उन सभी पंडितोंसे अनुरोध करके राजाने 'दल' शब्दको तो सेनाके अर्थमें प्रमाणित कराया। किन्तु कमल शब्दका 'नित्यक्लीबत्व' जो लिङ्गानुशासनसे असिद्ध है उसे कौन प्रमाणित कर सकता । इसलिये 'पुंस्त्वं च धत्ते न वा' (कभी पुंस्त्व धारण करता है, कभी नहीं) इस प्रकार इस पदमें अक्षरभेद करवाया [ जिससे वह अशुद्धि दूर हो गई ] । उस समय रामचन्द्र को सिद्धराज का दृष्टिदोष लगा और वह ज्यों ही वसतिमें प्रवेश करने लगा त्यों ही उसकी एक आँख नष्ट हो गई । * १ इस श्लोकमें 'मार्गण' और 'लक्ष' शब्द पर श्लेष है । 'मार्गण' का एक अर्थ है बाण और दूसरा अर्थ है मंगन=याचक । 'लक्ष' का एक अर्थ है लाख संख्या परिमित द्रव्य और दूसरा अर्थ है लक्ष्य=निशाना । मार्गणका अर्थ जब बाण ऐसा विवक्षित है तब उसके साथ लक्षका अर्थ निशाना लेना होगा; और जब मंगन=याचक ऐसा अर्थ अपेक्षित होगा तब लक्षका अर्थ लाख द्रव्य लेना होगा । सिद्धराजके मार्गण याने बाण विपक्ष याने शत्रुके पक्षमें लब्धलक्ष्य-निशाना प्राप्त करनेवाले

  • होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते; और वे ही बाण (शत्रुके फेंके हुए) सिद्धराजके पक्षमें विलक्ष-लक्ष्यभ्रष्ट हो कर रह जाते हैं। इससे विपरीत, मार्गण याने याचक लोग हैं वे सिद्धराजके पास लब्धलक्ष याने लाखोंका द्रव्य प्राप्त करते हैं और शत्रु राजाओंके पास विलक्ष याने विगतलक्ष-बिनाही प्राप्तिके रह जाते हैं।

७६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश १०४) किसी समय, सान्धिविग्रहिकों द्वारा डाहल देशके राजाका निम्न लिखित श्लोक, जो यमल पत्र (मित्रताका संबंध सूचक पत्र) पर लिखा हुआ था, सुनाया गया- १४६. आ-युक्त हो कर लोकमें प्राणदान करता है, वि-युक्त हो कर मुनियोंको प्रिय होता है, सं-युक्त हो कर सर्वथा अनिष्ट कारक बनता है और केवल-अकेला होने पर स्त्रियोंका प्रिय बनता है। राजाने पूछा कि 'इसमें क्या बात है?' उन्होंने कहा- 'आपके देशमें एक-से-एक प्रधान ऐसे बहुतसे विद्वान् रहते हैं। सो उनसे इस दुर्बोध्य श्लोककी व्याख्या कराइये।' उनकी यह बात सुन कर सभी विद्वान् उसका अर्थ सोचने लगे पर किसीकी समझमें नहीं आया। राजाने आचार्य हेमचन्द्र से पूछा। उन्होंने इस प्रकार व्याख्या की- 'इसमें 'हार' शब्दका अध्याहार है। उसके साथ 'आ' उपसर्गका योग होनेसे 'आहार' बनता है जो सब जीवोंको प्राण देता है। 'वि' उपसर्गके योगसे 'विहार' बन कर दोनों तरहसे यतियोंका प्रिय होता है। 'सं' के योगसे 'संहार' बनता है जो सर्वथा अनिष्ट लगता है और बिना किसी उपसर्गके स्त्रियोंका प्रिय आभूषण गलेका 'हार' होता है।' * १०५) एक दूसरी बार, सपादलक्ष देशके राजाने 'उगी हुई चन्द्रकला तो गौरीके मुखकमलका अनुहार नहीं कर सकती।' इस प्रकारकी समस्यावाला आधा दोहा यहाँ पर (पाटनमें) भेजा। अन्यान्य उन कवियोंके उसकी पूर्ति न करने पर '(और) जो न देखी गई वैसी प्रतिपदाकी चन्द्रकलाकी उपमा दी कैसे जाय।' इस प्रकारका उत्तरार्द्ध कह कर मुनीन्द्र हेमचन्द्रने उसको पूर्ण किया। * सिद्धराजका सौराष्ट्रके राजा खंगारको विजय करना। १०६) श्रीसिद्धराजने, नवघण नामक आभीर राणाका निग्रह करनेमें, पहले ग्यारह बार अपनी सेनाका पराजित होना जान कर, बर्द्धमान (वडधाण) आदि नगरोंमें बड़े बड़े प्राकार बनवा कर, स्वयम् ही उसके लिये प्रयाण किया। उस (नवघन) के भगिनी पुत्रने [किलेका रहस्य आदि बतलानेवाले] संकेत देते समय यह वचन लिया था कि 'किलेका कब्जा करते समय इस नवघन को सिर्फ द्रव्यमारसे मारना (अर्थात् भारी दण्ड दे कर द्रव्य वसूल करना), लेकिन किसी शस्त्रके मारसे नहीं मारना।' [राजाके किल सर कर लेने पर] उस नवघनको उसकी स्त्रीने कहीं अन्दर छुपा दिया जिसको राजाने उस विशाल महलमेंसे बहार खींच निकाला और धनके भरे हुए बर्तनोंसे उसे पीट पीट कर मार डाला। उसकी स्त्रीको यह कह कर कि 'इसको हमने द्रव्यके मारसे ही मारा है' अपने वचनका पालन बतलाया और उसे शांत किया। शोकसे निमग्न उसकी रानी [सूनलदेवी] के ये वाक्य कहे जाते हैं- १४८. वह राणा स्वघरमें नहीं है। न कोई उसे लाया है, न कोई लायेगा। खंगारके साथ मैं स्वयं अपने प्राण अग्निमें क्यों न होम दूँ। १४९. और सब राणा तो बनिये हैं और उनमें यह जेसल (जय सिंह) बड़ा सेठ है। हमारे गढके नीचे इसने यह कैसा व्योपार मांड रखा है। १५०. हे गौरवशाली गिरनार तैंने क्यों मनमें मात्सर्य धारण कर लिया है ? खंगार के मरने पर तैंने अपना एक शिखर भी नहीं गिराया।

प्रकरण १०४-१०८ ] सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना [ ७७ [ १०१ ] हे गरवा गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ । [ खंगार के लिये ] लंबा बुलावा आया है । इसके जैसा भारक्षम ( समर्थ ) सज्जन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा । [ १०२ ] मुझको इतने-ही-से संतोष होगा, जो प्रभु ( स्वामी ) के पगोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ] प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोष है । ये दोनों खंगार के साथ चले गये । [ १०३ ] हे मन ! अब तंबोल मत माँगो, खुले मुँह मत झांको । देउलवाडे के संग्राममें खंगार के साथ वह सब चला गया है । [ १०४ ] हे जेसल ! मेरी बाँह मत मोडो और वारंवार विरूप भाव न बताओ । नवघनके बिना नदीमें नया प्रवाह नहीं आता । [ १०५ ] हे वढवाण ! मैं तुझसे क्या लडूं - भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती । हे भोगावा ( वढवाण के पासकी नदी ) तँने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया । इस प्रकारके बहुतसे वाक्ये [ कहे जाते ] हैं । ये यथाप्रसंग जानलेने योग्य हैं । १०७) इसके बाद, महं० जाम्ब के वंशज दण्डाधिपति सज्जन की योग्यता देखकर उसे सुराष्ट्र देश का प्रबन्धक ( गवर्नर ) नियुक्त किया । उसने स्वामीको बिना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए [ राजकीय ] द्रव्यसे श्री उज्जयन्त ( गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पत्थरका मन्दिर बनवाया । चौथे वर्ष चार सामंतोंको भेज कर राजाने सज्जन दण्डाधिपतिको पत्तन में बुलवाया । उससे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला - 'महाराज ! श्री उज्जयन्त के मंदिरके जीर्णोद्धारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनोंमेंसे चाहे सो एक ले लें ।' उसके ऐसा बताने पर उसकी अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्धराज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया । वह सज्जन फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुंजय और उज्जयन्त इन दोनों तीर्थोंमें उनके बीचके बारह योजन विस्तृत अन्तरके जितना ही लंबा दुकूलका बना हुआ महाध्वज चढ़ाया । इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना । .१०८) इसके बाद, एक बार फिर सोमेश्वर की यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्धराज ने, रैवतकगिरिकी उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन ( मन्दिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनवाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका है, इसलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है ।' राजाने वहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और शत्रुञ्जय महातीर्थके पास आ कर पड़ार डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले कर तीर्थ पर जानेका मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सबेरा होनेके पहले ही, कापड़ीका वेष बना कर, और जिसके दोनों ओर गंगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी बहंगी कंधे पर रख कर, खुद इन ब्राह्मणोंके बीचमें हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किसीने उसके स्वरूपको नहीं जाना । [ ऊपर जा कर ] गंगाजलसे श्री युगादि देव ( ऋषभनाथ ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उस १ ये जो वाक्य ऊपर अनूदित किये गये हैं, उनमेंका कितनाक कथन अस्पष्ट और अस्फुटार्थक है । जो अर्थ यहा पर दिया गया है यह निर्भ्रान्त है ऐसा नहीं कह सकते ।

७८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर वह उन्मुद्रित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नाँई खडा रह गया । [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी-वन और नदियोंसे परिपूर्ण पर्वत पर, यहीं, [ नये ] विंध्यवनकी रचना करूँगा ' - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाथ हो गया था, उस मनोरथसे मैने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ यह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। * वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन । १०९) अथ यहाँ पर देवसूरिका चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुदचंद्र नामक दिगम्बर [ विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्णाटक देशसे गूर्जर देशको जीतनेकी इच्छासे कर्णावती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देवसूरि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक बार श्री अरिष्टनेमिके मंदिरमें जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिष्ट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी । उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुदचन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रोंमें प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवाचार्य की बहन तपोवना शीलसुन्दरी को चेटकाधिष्ठित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक ( टोना आदि ) के दूर होने पर वह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट पराभवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्त्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे। ( यहाँ पर P प्रतिमें इस विषयके निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [ १०३ ] हा ! मै किसके आगे पुकार करूँ ? मेरे प्रभु तो कर्णरहित हैं। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। [ साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे- ] [ १०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कण्ठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओंका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ !-जो मैं उनके शासन ( धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारकी विडंबनाओके डबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ । [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] [१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेतांबरोंके अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दूर्वा जैसी है, गुरुवर श्री देवसूरिके ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे। श्री देवसूरिने [ दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्याविनोद ( शास्त्रार्थ-विनोद ) के लिये आप पत्तन चलें। वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे ।' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्तन को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्धराजने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वही डेरा डाल कर ठहरा। सिद्धराज ने