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प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पिप्पलादके आश्रममें सुकेशादि मुनि

प्रथम प्रश्न (सम्बन्धभाष्य, प्रजापति-रयि-प्राण)

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

प्रश्नोपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित


इतः पूर्णं ततः पूर्णं पूर्णात्पूर्णं परात्परम् ।
पूर्णानन्दं प्रपद्येऽहं सद्गुरुं शङ्करं स्वयम् ॥


शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

हे देवगण ! हम कानोंसे कल्याणमय वचन सुनें । यज्ञकर्ममें समर्थ होकर नेत्रोंसे शुभ दर्शन करें । तथा स्थिर अङ्ग और शरीरोंसे स्तुति करनेवाले हमलोग देवताओंके लिये हितकर आयुका भोग करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करे, परम ज्ञानवान् [ अथवा परम धनवान् ] पूषा हमारा कल्याण करे, जो अरिष्टों (आपत्तियों) के लिये चक्रके समान [ घातक ] है वह गरुड हमारा कल्याण करे तथा बृहस्पतिजी हमारा कल्याण करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

प्रथम प्रश्न


सम्बन्धभाष्य

मन्त्रोक्तस्यार्थस्य विस्तारानुवादीदं ब्राह्मणमारभ्यते। ऋषिप्रश्नप्रतिवचनाख्यायिका तु विद्यास्तुतये। एवं संवत्सरब्रह्मचर्यसंवासाद्युक्तैस्तपोयुक्तैर्ग्राह्या पिप्पलादादिवत्सर्वज्ञकल्पैराचार्यैर्वक्तव्या च, न सा येन केनचिदिति विद्यां स्तौति। ब्रह्मचर्यादिसाधनसूचनाच्च तत्कर्तव्यता स्यात्।अथर्वणमन्त्रोक्त [मुण्डकोपनिषद्के] अर्थका विस्तारपूर्वक अनुवाद करनेवाली यह ब्राह्मणभागीय उपनिषद् अब आरम्भ की जाती है*। इसमें जो ऋषियोंके प्रश्न और उत्तररूप आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। यह विद्या आगे कहे प्रकारसे एक वर्षतक ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुकुलमें रहना तथा तप आदि साधनोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा ही ग्रहण की जानेयोग्य है तथा पिप्पलादके समान सर्वज्ञतुल्य आचार्योंसे ही कथन की जा सकती है, जिस किसीसे नहीं—इस प्रकार विद्याकी स्तुति की जाती है। तथा ब्रह्मचर्यादि साधनोंकी सूचना देनेसे उनकी कर्त्तव्यता भी प्राप्त होती है।

सुकेशा आदिकी गुरूपपत्ति

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मा-


* दश उपनिषदोंमें प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य ये तीन अथर्ववेदीय हैं। इनमें मुण्डक मन्त्रभागकी है तथा शेष दो ब्राह्मणभागकी हैं।

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


न्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाण-
यो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

भरद्वाजनन्दन सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमें उत्पन्न हुआ सौर्यायणि (सूर्यका पोता), अश्वलकुमार कौसल्य, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके पोतेका पुत्र कबन्धी—ये अपर ब्रह्मकी उपासना करनेवाले और तदनुकूल अनुष्ठानमें तत्पर छः ऋषिगण परब्रह्मके जिज्ञासु होकर भगवान् पिप्पलादके पास यह सोचकर कि ये हमें उसके विषयमें सब कुछ बतला देंगे, हाथमें समिधा लेकर गये ॥ १ ॥

सुकेशा च नामतः, भरद्वाजस्यापत्यं भारद्वाजः; शैब्यश्च शिबेः अपत्यं शैब्यः सत्यकामो नामतः; सौर्यायणी सूर्यस्तस्यापत्यं सौर्यः तस्यापत्यं सौर्यायणिश्छान्दसः सौर्यायणीति, गार्ग्यो गर्गगोत्रोत्पन्नः; कौसल्यश्च नामतोऽश्वलस्यापत्यमाश्वलायनः; भार्गवो भृगोर्गोत्रापत्यं भार्गवो वैदर्भिः विदर्भे भवः; कबन्धी नामतः, कत्यस्यापत्यं कात्यायनः, विद्यमानः प्रपितामहो यस्य सः;भरद्वाजका पुत्र भारद्वाज जो नामसे सुकेशा था; शिविका पुत्र शैव्य जिसका नाम सत्यकाम था; सूर्यके पुत्रको 'सौर्य' कहते हैं उसका पुत्र सौर्यायणि जो गर्ग-गोत्रोत्पन्न होनेसे गार्ग्य कहलाता था—यहाँ 'सौर्यायणिः' के स्थानमें 'सौर्यायणी' [ईकारान्त] प्रयोग छान्दस है; अश्वलका पुत्र आश्वलायन जो नामसे कौसल्य था; भृगुका गोत्रज होनेसे भार्गव जो विदर्भदेशमें उत्पन्न होनेसे वैदर्भि कहलाता था तथा कबन्धी नामक कात्यायन—कत्यका [युवसंज्ञक] अपत्य [यानी कत्यका प्रपौत्र] जिसका प्रपितामह अभी विद्यमान था। यहाँ 'युव' अर्थमें [गोत्रप्रत्ययान्त कत्य शब्दसे

१. 'जीवति तु वंश्ये युवा' (४। १ । १६३) इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार पितामहके जीवित रहते जो पोतेके सन्तान होती है उसकी 'युवा' संज्ञा है।

प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १
युवप्रत्ययः । ते हैते ब्रह्मपरा अपरं ब्रह्म परत्वेन गतास्तदनुष्ठाननिष्ठाश्च ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः—किं तत् यन्नित्यं विज्ञेयमिति तत्प्राप्त्यर्थं यथाकामं यतिष्याम इत्येवं तदन्वेषणं कुर्वन्तस्तदधिगमायैष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीत्याचार्यमुपजग्मुः । कथम् ? ते ह समित्पाणयः समिद्भारगृहीतहस्ताः सन्तो भगवन्तं पिप्पलादमाचार्यमुपसन्ना उपजग्मुः ॥ १ ॥'फक्' प्रत्यय होकर उसके स्थानमें 'आयन' आदेश ] हुआ है। ये सब ब्रह्मपर अर्थात् अपर ब्रह्मको ही परभावसे प्राप्त हुए और तदनुकूल अनुष्ठानमें तत्पर अतएव ब्रह्मनिष्ठ ऋषिगण परब्रह्मका अन्वेषण करते हुए—वह ब्रह्म क्या है ? जो नित्य और विज्ञेय है; उसकी प्राप्तिके लिये ही हम यथेच्छ प्रयत्न करेंगे—इस प्रकार उसकी खोज करते हुए, उसे जाननेके लिये यह समझकर कि 'ये हमें सब कुछ बतला देंगे' आचार्यके पास गये । किस प्रकार गये ? [ इसपर कहते हैं—] वे सब समित्पाणि अर्थात् जिन्होंने अपने हाथोंमें समिधाके भार उठा रखे हैं ऐसे होकर पूज्य आचार्य भगवान् पिप्पलादके समीप गये ॥१॥

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

कहते हैं, उस ऋषिने उनसे कहा—'तुम तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे युक्त होकर एक वर्ष और निवास करो; फिर अपनी इच्छानुसार प्रश्न करना, यदि मैं जानता होऊँगा तो तुम्हें सब बतला दूँगा' ॥ २ ॥

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५


तानेवमुपगतानह स किल ऋषिरुवाच भूयः पुनरेव यद्यपि यूयं पूर्वं तपस्विन एव तपसेन्द्रियसंयमेन तथापीह विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया चास्तिक्यबुद्ध्यादरवन्तः संवत्सरं कालं संवत्स्यथ सम्यग्गुरुशुश्रूषापराः सन्तो वत्स्यथ । ततो यथाकामं यो यस्य कामस्तमनतिक्रम्य यथाकामं यद्विषये यस्य जिज्ञासा तद्विषयान्प्रश्नान्पृच्छत । यदि तद्युष्मत्पृष्टं विज्ञास्यामः-अनुद्धतत्वप्रदर्शनार्थो यदि शब्दो नाज्ञानसंशयार्थः प्रश्ननिर्णयादवसीयते- सर्वं ह वो वः पृष्टं वक्ष्याम इति ॥ २ ॥इस प्रकार अपने समीप आये हुए उन लोगोंसे पिप्पलाद ऋषिने कहा—'यद्यपि तुमलोग पहलेसे ही तपस्वी हो तो भी तप—इन्द्रियसंयम, विशेषतः ब्रह्मचर्यसे तथा श्रद्धा यानी आस्तिक्यबुद्धिसे आदरयुक्त होकर गुरुशुश्रूषामें तत्पर रह एक वर्ष और भी निवास करो। फिर अपनी इच्छानुसार अर्थात् जिसकी जैसी इच्छा हो उसका अतिक्रमण न करते हुए—जिसकी जिस विषयमें जिज्ञासा हो उसी विषयमें प्रश्न करना। यदि मैं तुम्हारे पूछे हुए विषयको जानता होऊँगा तो तुम्हें तुम्हारी पूछी हुई सब बात बतला दूँगा। यहाँ 'यदि' शब्द अपनी नम्रता प्रकट करनेके लिये है अज्ञान या संशय प्रदर्शित करनेके लिये नहीं, जैसा कि आगे प्रश्नका निर्णय करनेसे स्पष्ट हो जाता है ॥ २ ॥

कबन्धीका प्रश्न—प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥

तदनन्तर (एक वर्ष गुरुकुलवास करनेके पश्चात्) कात्यायन कबन्धीने गुरुजीके पास जाकर पूछा—'भगवन् ! यह सारी प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?' ॥ ३ ॥

प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १
अथ संवत्सरादूर्ध्वं कबन्धी कात्यायन उपेत्योपगम्य पप्रच्छ पृष्टवान् । हे भगवन्कुतः कस्माद्ध वा इमा ब्राह्मणाद्याः प्रजाः प्रजायन्त उत्पद्यन्ते । अपरविद्याकर्मणोः समुच्चितयोर्यत्कार्यं या गतिस्तद्वक्तव्यमिति तदर्थोऽयं प्रश्नः ॥ ३ ॥तदनन्तर एक वर्ष पीछे कात्यायन कबन्धीने [गुरुजीके] समीप जाकर पूछा—'भगवन् ! यह ब्राह्मणादि सम्पूर्ण प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?' अर्थात् अपरब्रह्मविषयक ज्ञान एवं कर्मके समुच्चयका जो कार्य है और उसकी जो गति है वह बतलानी चाहिये । उसीके लिये यह प्रश्न किया गया है ॥ ३ ॥

रयि और प्राणकी उत्पत्ति

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

उससे उस पिप्पलाद मुनिने कहा—'प्रसिद्ध है कि प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाले प्रजापतिने तप किया । उसने तप करके एक जोड़ा उत्पन्न किया [और सोचा—] ये रयि और प्राण दोनों ही मेरी अनेक प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करेंगे' ॥ ४ ॥

तस्मा एवं पृष्टवते स होवाच तदपाकरणयाह । प्रजाकामः प्रजा आत्मनः सिसृक्षुर्वै प्रजापतिः सर्वात्मा सञ्जगत्स्रक्ष्यामिअपनेसे इस प्रकार प्रश्न करनेवाले कबन्धीसे उसकी शङ्का निवृत्त करनेके लिये पिप्पलाद मुनिने कहा—प्रजाकाम अर्थात् अपनी प्रजा रचनेकी इच्छावाले प्रजापतिने 'मैं सर्वात्मा होकर जगत्की रचना

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


इत्येवं विज्ञानवान्यथोक्तकारी तद्भावभावितः कल्पादौ निर्वृत्तो हिरण्यगर्भः सृज्यमानानां प्रजानां स्थावरजङ्गमानां पतिः सञ्जन्मान्तरभावितं ज्ञानं श्रुतिप्रकाशितार्थविषयं तपोऽन्वालोचयदतप्यत ।करूँ' इस प्रकारके विज्ञानसे सम्पन्न, यथोक्त कर्म करनेवाला (जगद्रचनामें उपयुक्त ज्ञान और कर्मके समुच्चयका अनुष्ठान करनेवाला) तद्भावभावित (पूर्वकल्पीय प्रजापतित्वकी भावनासे सम्पन्न) और कल्पके आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे उत्पन्न होकर तथा रची जानेवाली सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्रजाका पति होकर जन्मान्तरमें भावना किये श्रुत्यर्थविषयक ज्ञानरूप तपको तपा अर्थात् उस ज्ञानका स्मरण किया ।
अथ तु स एवं तपस्तप्त्वा श्रौतं ज्ञानमन्वालोच्य सृष्टिसाधनभूतं मिथुनमुत्पादयते मिथुनं द्वन्द्वमुत्पादितवान् । रयिं च सोममन्नं प्राणं चाग्निमत्तारम् एतावग्नीषोमावत्त्रन्नभूतौ मे मम बहुधानेकधा प्रजाः करिष्यत इत्येवं संचिन्त्याण्डोत्पत्तिक्रमेण सूर्याचन्द्रमसावकल्पयत् ॥ ४ ॥तदनन्तर इस प्रकार तपस्या कर अर्थात् श्रुतिप्रकाशित ज्ञानका स्मरण कर उसने सृष्टिके साधनभूत मिथुन—जोड़ेको उत्पन्न किया । उसने रयि यानी सोमरूप अन्न और प्राण यानी भोक्ता अग्निको रचा, अर्थात् यह सोचकर कि ये भोक्ता और भोग्यरूप अग्नि और सोम मेरी नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करेंगे अण्डके उत्पत्तिक्रमसे सूर्य और चन्द्रमाको रचा ॥ ४ ॥

आदित्य और चन्द्रमामें प्राण और रयि-दृष्टि

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


निश्चय आदित्य ही प्राण है और रयि ही चन्द्रमा है। यह जो कुछ मूर्त्त (स्थूल) और अमूर्त्त (सूक्ष्म) है सब रयि ही है; अतः मूर्त्ति ही रयि है ॥ ५ ॥

तत्रादित्यो ह वै प्राणोऽत्ता अग्निः। रयिरेव चन्द्रमाः, रयिः एवान्नं सोम एव। तदेतदेकमत्ता चान्नं च, प्रजापतिरेकं तु मिथुनम्, गुणप्रधानकृतो भेदः। कथम्? रयिर्वा अन्नं वा एतत् सर्वम्; किं तद्यन्मूर्त्तं च स्थूलं चामूर्त्तं च सूक्ष्मं च मूर्त्तामूर्ते अत्रान्नरूपे रयिरेव। तस्मात्प्रविभक्ताद् अमूर्ताद्यदन्यन्मूर्तरूपं मूर्तिः सैव रयिरमूर्तेनाद्यमानत्वात् ॥ ५ ॥यहाँ निश्चयपूर्वक आदित्य ही प्राण अर्थात् भोक्ता अग्नि है और रयि ही चन्द्रमा है। रयि ही अन्न है और वह चन्द्रमा ही है। यह भोक्ता (अग्नि) और अन्न एक ही हैं। एक प्रजापति ही यह मिथुनरूप हो गया है, इसमें भेद केवल गौण और प्रधान भावका ही है। सो किस प्रकार? [इसपर कहते हैं—] यह सब रयि—अन्न ही है। वह क्या है? यह जो मूर्त्त यानी स्थूल है और जो अमूर्त्त यानी सूक्ष्म है वह मूर्त्त और अमूर्त्त भोक्ता-भोग्यरूप होनेपर भी रयि ही है। अतः इस प्रकार विभक्त हुए अमूर्त्तसे अन्य जो मूर्त्तरूप है वही रयि—अन्न है क्योंकि वह अमूर्त्त भोक्तासे भोगा जाता है ॥ ५ ॥
तथामूर्त्तोऽपि प्राणोऽत्ता सर्वमेव यच्चाद्यम्। कथम्—इसी प्रकार अमूर्त्त प्राणरूप भोक्ता भी जो कुछ अन्न है वह सभी है। किस प्रकार—

अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९


जिस समय सूर्य उदित होकर पूर्व दिशामें प्रवेश करता है तो उसके द्वारा वह पूर्व दिशाके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है। इसी प्रकार जिस समय वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर और अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित करता है उससे भी वह उन सबके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है ॥ ६ ॥

अथादित्य उदयन्नुद्गच्छन् प्राणिनां चक्षुर्गोचरमागच्छन् यत्प्राचीं दिशं स्वप्रकाशेन प्रविशति व्याप्नोति; तेन स्वात्मव्याप्त्या सर्वांस्तत्स्थान्प्राणान् प्राच्यानन्तर्भूतान् रश्मिषु स्वात्मावभासरूपेषु व्याप्तिमत्सु व्याप्तत्वात्प्राणिनः संधत्ते संनिवेशयति; आत्मभूतान्करोति इत्यर्थः । तथैव यत्प्रविशति दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीमध ऊर्ध्वं यत्प्रविशति यच्चान्तरा दिशः कोणदिशोऽवान्तरदिशो यच्चान्यत् सर्वं प्रकाशयति तेन स्वप्रकाशव्याप्त्या सर्वान्सर्वदिक्स्थान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६॥जिस समय सूर्य उदित होकर—ऊपरकी ओर जाकर अर्थात् प्राणियोंके नेत्रोंका विषय होकर अपने प्रकाशसे पूर्व दिशामें प्रवेश करता है—उसे [अपने तेजसे] व्याप्त करता है; उसके द्वारा अपनी व्याप्तिसे वह उस (पूर्व दिशा) में स्थित सम्पूर्ण अन्तर्भूत प्राच्य प्राणोंको अपने अवभासरूप और सर्वत्र व्याप्त किरणोंमें व्याप्त होनेके कारण वह सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करता यानी अपनेमें प्रविष्ट कर लेता है, अर्थात् उन्हें आत्मभूत कर लेता है। इसी प्रकार जब वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे और ऊपरकी ओर प्रवेश करता है अथवा अवान्तर दिशाओंको—कोणस्थ दिशाएँ अवान्तर दिशाएँ हैं उनको या अन्य सबको प्रकाशित करता है तो अपने प्रकाशकी व्याप्तिसे वह सम्पूर्ण—समस्त दिशाओंमें स्थित प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण कर लेता है ॥ ६ ॥
१०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेत- दृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

वह यह (भोक्ता) वैश्वानर विश्वरूप प्राण अग्नि ही प्रकट होता है । यही बात ऋक्ने भी कही है ॥ ७ ॥

स एषोऽत्ता प्राणो वैश्वानरः सर्वात्मा विश्वरूपो विश्वात्मत्वाच्च प्राणोऽग्निश्च स एवान्नोदयत उद्गच्छति प्रत्यहं सर्वा दिश आत्मसात्कुर्वन् । तदेतदुक्तं वस्तु ऋचा मन्त्रेणाप्यभ्युक्तम् ॥ ७ ॥वह यह भोक्ता प्राण वैश्वानर (समष्टि जीवरूप), सर्वात्मा और सर्वरूप है तथा सर्वमय होनेके कारण ही प्राण और अग्निरूप है। वह भोक्ता ही प्रतिदिन सम्पूर्ण दिशाओंको आत्मभूत करता हुआ उदित होता अर्थात् ऊपरकी ओर जाता है। यह ऊपर कही बात ही ऋक् अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही गयी है ॥ ७ ॥

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥ ८ ॥

सर्वरूप, रश्मिवान्, ज्ञानसम्पन्न, सबके आश्रय, ज्योतिर्मय, अद्वितीय और तपते हुए सूर्यको [विद्वानोंने अपने आत्मारूपसे जाना है]। यह सूर्य सहस्रों किरणोंवाला, सैकड़ों प्रकारसे वर्तमान और प्रजाओंके प्राणरूपसे उदित होता है ॥ ८ ॥

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११


विश्वरूपं सर्वरूपं हरिणं रश्मिवन्तं जातवेदसं जातप्रज्ञानं परायणं सर्वप्राणाश्रयं ज्योतिरेकं सर्वप्राणिनां चक्षुर्भूतमद्वितीयं तपन्तं तापक्रियां कुर्वाणं स्वात्मानं सूर्यं सूरयो विज्ञातवन्तो ब्रह्मविदः। कोऽसौ यं विज्ञातवन्तः ? सहस्ररश्मिरनेकरश्मिः शतधानेकधा प्राणिभेदेन वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥विश्वरूप—सर्वरूप, हरिण—किरणवान्, जातवेदस्—जिसे ज्ञान प्राप्त हो गया है, परायण—सम्पूर्ण प्राणोंके आश्रय, ज्योतिः—सम्पूर्ण प्राणियोंके नेत्रस्वरूप, एक—अद्वितीय, और तपते हुए यानी तपन क्रिया करते हुए सूर्यको ब्रह्मवेत्ताओंने अपने आत्मस्वरूपसे जाना है। जिसे इस प्रकार जाना है वह कौन है ? जो यह सहस्ररश्मि—अनेकों किरणोंवाला और सैकड़ों यानी अनेक प्रकारके प्राणिभेदसे वर्तमान तथा प्रजाओंका प्राणरूप सूर्य उदित होता है ॥ ८ ॥

यश्चासौ चन्द्रमा मूर्तिरन्नम् अमूर्तिंश्च प्राणोऽत्तादित्यस्तदेकम् एतन्मिथुनं सर्वं कथं प्रजाः करिष्यत इति उच्यते—यह जो चन्द्रमा—मूर्ति अर्थात् अन्न है और प्राण—भोक्ता अथवा सूर्य है यह एक ही जोड़ा सम्पूर्ण प्रजाको किस प्रकार उत्पन्न कर देगा ? इसपर कहते हैं—

संवत्सरादिमें प्रजापति आदि दृष्टि

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च ।
तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव
लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः
प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः
पितृयाणः ॥ ६ ॥

६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


संवत्सर ही प्रजापति है; उसके दक्षिण और उत्तर दो अयन हैं। जो लोग इष्टापूर्तरूप कर्ममार्गका अवलम्बन करते हैं वे चन्द्रलोकपर ही विजय पाते हैं और वे ही पुनः आवागमनको प्राप्त होते हैं; अतः ये सन्तानेच्छु ऋषिलोग दक्षिण मार्गको ही प्राप्त होते हैं। [ इस प्रकार ] जो पितृयाण है वही रयि है ॥९॥


तदेव कालः संवत्सरो वै प्रजापतिस्तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य। चन्द्रादित्यनिर्वर्त्यतिथ्यहोरात्रसमुदायो हि संवत्सरः तदनन्यत्वाद्रयिप्राणमिथुनात्मक इवेत्युच्यते । तत्कथम् ? तस्य संवत्सरस्य प्रजापतेरयने मार्गौ द्वौ दक्षिणं चोत्तरं च द्वे प्रसिद्धे ह्ययने षण्मासलक्षणे याभ्यां दक्षिणेनोत्तरेण च याति सविता केवलकर्मिणां ज्ञानसंयुक्तकर्मवतां च लोकान् विदधत् ।वह मिथुन ही संवत्सररूप काल है और वही प्रजापति है, क्योंकि संवत्सर उस मिथुनसे ही निष्पन्न हुआ है। चन्द्रमा और सूर्यसे निष्पन्न होनेवाली तिथि और दिन-रात्रिके समुदायका नाम ही संवत्सर है; अतः वह ( संवत्सर ) रयि और प्राणसे अभिन्न होनेके कारण मिथुनरूप ही कहा जाता है। सो किस प्रकार ? उस संवत्सर नामक प्रजापतिके दक्षिण और उत्तर दो अयन—मार्ग हैं। ये छः-छः मासवाले दो अयन प्रसिद्ध ही हैं, जिनसे कि सूर्य केवल कर्मपरायण और ज्ञानसंयुक्त कर्मपरायण पुरुषोंके पुण्यलोकोंका विधान करता हुआ दक्षिण तथा उत्तर मार्गोंसे गमन करता है।
कथम् ? तत् तत्र च ब्राह्मणादिषु ये ह वै तदुपासत इति,सो किस प्रकार ? इसपर कहते हैं—उन ब्राह्मणादिमें जो ऋषिलोग
प्रश्न १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३
क्रियाविशेषणो द्वितीयस्तच्छब्दः, इष्टं च पूर्तं चेष्टापूर्ते इत्यादि कृतमेवोपासते नाकृतं नित्यं ते चान्द्रमसं चन्द्रमसि भवं प्रजापतेर्मिथुनात्मकस्यांशं रयिमन्नभूतं लोकमभिजयन‍्ते कृतरूपत्वाच्चान्द्रमसस्य । ते तत्रैव च कृतक्षयात्पुनरावर्तन्ते “इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु० उ० १।२।१०) इति ह्युक्तम् ।<br><br>यस्मादेवं प्रजापतिमन्नात्मकं फलत्वेनाभिनिर्वर्तयन्ति चन्द्रम् इष्टापूर्तकर्मणैत ऋषयः स्वर्गद्रष्टारः प्रजाकामाः प्रजार्थिनो गृहस्थास्तस्मात्स्वकृतमेव दक्षिणं दक्षिणायनोपलक्षितं चन्द्रं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिरन्नं यः पितृयाणः पितृयाणोपलक्षितः चन्द्रः ॥९॥निश्चयपूर्वक उस इष्ट और पूर्त यानी इष्टापूर्त्त इत्यादि कृतकी ही उपासना करते हैं—अकृतकी नहीं करते वे सर्वदा चान्द्रमस—चन्द्रमामें ही होनेवाले यानी मिथुनात्मक प्रजापतिके अंश रयि अर्थात् अन्नभूत लोकको ही जीतते हैं, क्योंकि चन्द्रलोक कृत (कर्म) रूप है । श्रुतिमें दूसरा 'तत्' शब्द क्रियाविशेषण है । वे वहाँ ही अपने कर्मका क्षय होनेपर फिर लौट आते हैं, जैसा कि “इस (मनुष्य) लोक अथवा इससे भी निकृष्ट (तिर्यगादि) लोकमें प्रवेश करते हैं” इस [मुण्डक श्रुति] में कहा है ।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये ये सन्तानार्थी ऋषि—स्वर्गद्रष्टा गृहस्थ-लोग इष्ट और पूर्त कर्मोद्वारा उनके फलरूपसे अन्नात्मक प्रजापति यानी चन्द्रलोकका ही निर्माण करते हैं; अतः वे अपने रचे हुए दक्षिण यानी दक्षिणायनमार्गसे उपलक्षित चन्द्रलोकको ही प्राप्त होते हैं । यह जो पितृयाण अर्थात् पितृयाणसे उपलक्षित चन्द्रलोक है वह निश्चय रयि—अन्न ही है ॥९॥
१४प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मान-
मन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतद-
मृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोध-
स्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

तथा तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्याद्वारा आत्माकी शोध करते हुए वे उत्तरमार्गद्वारा सूर्यलोकको प्राप्त होते हैं। यही प्राणोंका आश्रय है, यही अमृत है, यही अभय है और यही परा गति है । इससे फिर नहीं लौटते; अतः यही निरोधस्थान है । इस विषयमें यह [ अगला ] मन्त्र है—॥ १० ॥

अथोत्तरेणायनेन प्रजापतेः अंशं प्राणमत्तारमादित्यमभिजयन्ते; केन ? तपसेन्द्रियजयेन विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च प्रजापत्यात्मविषयया आत्मानं प्राणं सूर्यं जगतस्तस्थुषश्चान्विष्याहमस्मीति विदित्वादित्यमभिजयन्तेऽभिप्राप्नुवन्ति । <br><br> एतद्धा आयतनं सर्वप्राणानां सामान्यमायतनमाश्रयमेतदमृतम् अविनाशि । अभयमत एव भयवर्जितं न चन्द्रवत्क्षयवृद्धिमय-तथा उत्तरायणसे वे प्रजापतिके अंश भोक्ता प्राणको यानी आदित्यको प्राप्त होते हैं । किस साधनसे प्राप्त होते हैं ? तप अर्थात् इन्द्रियजयसे; विशेषतः ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और प्रजापतितादात्म्यविषयक विद्यासे अर्थात् अपनेको स्थावर-जङ्गम जगत्के प्राण सूर्यरूपसे अनुसंधानकर यानी यह समझकर कि यह [ सूर्य ] ही मैं हूँ आदित्यलोकपर विजय पाते अर्थात् उसे प्राप्त होते हैं । <br><br> निश्चय यही आयतन—सम्पूर्ण प्राणोंका सामान्य आयतन यानी आश्रय है । यही अमृत—अविनाशी है, अतः यह अभय—भयरहित है, चन्द्रमाके समान क्षय-वृद्धिरूप भययुक्त नहीं है तथा यही

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५


वत् । एतत्परायणं परा गतिः विद्यावतां कर्मिणां च ज्ञानवताम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्ते यथेतरे केवलकर्मिण इति । यस्मादेषोऽविदुषां निरोधः । आदित्याद्धि निरुद्धा अविद्वांसो नैते संवत्सरमादित्यमात्मानं प्राणमभिप्राप्नुवन्ति । स हि संवत्सरः कालात्माविदुषां निरोधः । तत्तत्रास्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रः ॥ १० ॥उपासकोंकी और उपासनासहित कर्मानुष्ठान करनेवालोंकी परा गति है। इस पदको प्राप्त होकर अन्य केवल कर्मपरायणोंके समान फिर नहीं लौटते, क्योंकि यह अविद्वानोंके लिये निरोध है, क्योंकि उपासनाहीन पुरुष आदित्यसे रुके हुए हैं;* ये लोग आदित्यरूप संवत्सर यानी अपने आत्मा प्राणको प्राप्त नहीं होते। वह कालरूप संवत्सर ही अविद्वानोंका निरोधस्थान है। तहाँ इस विषयमें यह श्लोक यानी मन्त्र प्रसिद्ध है १०

आदित्यका सर्वाधिष्ठानत्व

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

अन्य कालवेत्तागण इस आदित्यको पाँच पैरोंवाला, सबका पिता, बारह आकृतियोंवाला, पुरीषी (जलवाला) और द्युलोकके परार्द्धमें स्थित बतलाते हैं तथा ये अन्य लोग उसे सर्वज्ञ और उस सात चक्र और छः अरेवालेमें ही इस जगत्को अर्पित बतलाते हैं ॥ ११ ॥

पञ्चपादं पञ्चर्तवः पादा इवास्य संवत्सरात्मन आदित्यस्य तैरसौ पादैरिवर्तुभिरावर्तते ।पाँच ऋतुएँ इस संवत्सररूप आदित्यके मानो चरण हैं; इसलिये यह पञ्चपाद है, क्योंकि उन ऋतुओंसे यह चरणोंके समान

* अर्थात् वे आदित्यमण्डलको वेधकर नहीं जा सकते।

१६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न १

हेमन्तशिशिरावेकीकृत्येयं कल्पना । पितरं सर्वस्य जनयितृत्वात्पितृत्वं तस्य । तं द्वादशाकृतिं द्वादश मासा आकृतयोऽवयवा आकरणं वावयवीकरणम् अस्य द्वादशमासैस्तं द्वादशाकृतिं दिवो द्युलोकात्पर ऊर्ध्वोऽर्धे स्थाने तृतीयस्यां दिवीत्यर्थः पुरीषिणं पुरीषवन्तमुदकवन्तमाहुः कालविदः ।घूमता रहता है । यह [पाँच ऋतुओंकी] कल्पना हेमन्त और शिशिरको एक मानकर की है । सबका उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण उसका पितृत्व है, इसलिये उसे पिता कहा है । बारह महीने उसकी आकृतियाँ, अवयव या आकार हैं, अथवा बारह महीनोंद्वारा उसका अवयवीकरण (विभाग) किया जाता है, इसलिये उसे द्वादशाकृति कहा है । तथा वह द्युलोक यानी अन्तरिक्षसे परे—ऊपरके स्थानरूप तीसरे स्वर्गलोकमें स्थित है और पुरीषी—पुरीषवान् अर्थात् जलवाला हैं—ऐसा कालज्ञ पुरुष कहते हैं ।
अथ तमेवान्य 'इम उ परे कालविदो विचक्षणं निपुणं सर्वज्ञं सप्तचक्रे सप्तहयरूपेण चक्रे सततं गतिमति कालात्मनि षडरे षडृतुमत्याहुः सर्वमिदं जगत्कथयन्ति; अर्पितमरा इव रथनाभौ निविष्टमिति ।तथा ये अन्य कालवेत्ता पुरुष उसीको विचक्षण—निपुण यानी सर्वज्ञ बतलाते हैं तथा सप्त अश्वरूप सात चक्र और षडृतुरूप छः अरोंवाले उस निरन्तर गतिशील कालात्मामें ही रथकी नाभिमें अरोंके समान इस सम्पूर्ण जगत्को अर्पित—निविष्ट बतलाते हैं ।
यदि पञ्चपादो द्वादशाकृतिर्यदि वा सप्तचक्रः षडरः सर्वथापिचाहे पञ्चपाद और द्वादश आकृतियोंवाला हो अथवा सात चक्र और छः अरोंवाला हो सभी प्रकार

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७


संवत्सरः कालात्मा प्रजापतिः चन्द्रादित्यलक्षणोऽपि जगतः कारणम् ॥ ११ ॥चन्द्रमा और सूर्यरूपसे भी कालस्वरूप संवत्सरात्मक प्रजापति ही जगत्का कारण है ॥ ११ ॥
यस्मिन्निदं श्रितं विश्वं स एव प्रजापतिः संवत्सराख्यः स्वावयवे मासे कृत्स्नः परिसमाप्यते ।जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् आश्रित है वह संवत्सर नामक प्रजापति ही अपने अवयवरूप मासमें पूर्णतया परिसमाप्त हो जाता है—

मासादिमें प्रजापति आदि दृष्टि

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

मास ही प्रजापति है । उसका कृष्णपक्ष ही रयि है और शुक्लपक्ष प्राण है । इसलिये ये [ प्राणोपासक ] ऋषिगण शुक्लपक्षमें ही यज्ञ किया करते हैं तथा दूसरे [ अन्नोपासक ] दूसरे पक्षमें यज्ञ करते हैं ॥ १२ ॥

| मासो वै प्रजापतिर्यथोक्तलक्षण एव मिथुनात्मकः । तस्य मासात्मनः प्रजापतेरेको भागः कृष्णपक्षो रयिरन्नं चन्द्रमाः । अपरो भागः शुक्लपक्षः प्राण आदित्योऽत्ताग्निः । यस्माच्छुक्लपक्षात्मानं प्राणं सर्वमेव पश्यन्ति तस्मात्प्राणदर्शिन एत ऋषयः | मास ही उपर्युक्त लक्षणोंवाला मिथुनात्मक प्रजापति है । उस मासस्वरूप प्रजापतिका एक भाग—कृष्णपक्ष तो रयि—अन्न अथवा चन्द्रमा है तथा दूसरा भाग—शुक्लपक्ष ही प्राण—आदित्य अर्थात् भोक्ता अग्नि है । क्योंकि वे शुक्लपक्षस्वरूप प्राणको सर्वात्मक देखते हैं और उन्हें कृष्णपक्ष भी प्राणसे भिन्न दिखलायी नहीं देता इसलिये ये प्राणदर्शी |

१८ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


कृष्णपक्षेऽपीष्टं यागं कुर्वन्ति प्राणव्यतिरेकेण कृष्णपक्षस्तैर्न दृश्यते यस्मात् । इतरे तु प्राणं न पश्यन्तीत्यदर्शनलक्षणं कृष्णात्मानमेव पश्यन्ति । इतरस्मिन् कृष्णपक्ष एव कुर्वन्ति शुक्ले कुर्वन्तोऽपि ॥ १२ ॥ऋषिलोग कृष्णपक्षमें भी [ उसे शुक्लपक्षरूप समझकर ही ] अपना इष्ट—याग किया करते हैं । तथा दूसरे ऋषि प्राणका दर्शन नहीं करते; इसलिये वे सब‌को अदर्शनात्मक कृष्णपक्षरूप ही देखते हैं और शुक्लपक्षमें यागानुष्ठान करते हुए भी इतर यानी कृष्णपक्षमें ही करते हैं ॥ १२ ॥

दिन-रातका प्रजापतित्व

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

दिन-रात भी प्रजापति हैं । उनमें दिन ही प्राण है और रात्रि ही रयि है । जो लोग दिनके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयुक्त होते हैं वे प्राणकी ही हानि करते हैं और जो रात्रिके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयोग करते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

सोऽपि मासात्मा प्रजापतिः स्वावयवेऽहोरात्रे परिसमाप्यते । अहोरात्रो वै प्रजापतिः पूर्ववत् । तस्याप्यहरेव प्राणोऽत्ताग्नी रात्रिरेव रयिः पूर्ववत् । प्राणमहरात्मानं वा एते प्रस्कन्दन्ति निर्गमयन्ति शोषयन्तिवह मासात्मक प्रजापति भी अपने अवयवरूप दिन-रात्रिमें समाप्त हो जाता है । पहलेकी तरह अहोरात्रि भी प्रजापति है—उसका भी दिन ही प्राण—भोक्ता यानी अग्नि है और पूर्ववत् रात्रि ही रयि है । वे लोग दिनरूप प्राणको ही क्षीण करते—निकालते—सुखाते अथवा अपनेसे पृथक् करके

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९


वा स्वात्मनो विच्छिद्यापनयन्ति; के ? ये दिवाऽहनि रत्या रति-कारणभूतया सह स्त्रिया संयुज्यन्ते मिथुनं मैथुनमाचरन्ति मूढाः। यत एवं तस्मात्तन्न कर्तव्यमिति प्रतिषेधः प्रासङ्गिकः। यद्रात्रौ संयुज्यन्ते रत्या ऋतौ ब्रह्मचर्यमेव तदिति प्रशस्तत्वादृतौ भार्यागमनं कर्तव्यमित्ययमपि प्रासङ्गिको विधिः। प्रकृतं तूच्यते—सोऽहोरात्रात्मकः प्रजापतिर्व्रीहियवाद्यन्नात्मना व्यवस्थितः ॥ १३ ॥नष्ट करते हैं । कौन ? जो कि मूढ होकर दिनके समय रति—रतिकी कारणस्वरूपा स्त्रीसे संयुक्त होते हैं, अर्थात् मिथुन यानी मैथुन करते हैं । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये—यह प्रासङ्गिक प्रतिषेध प्राप्त होता है । तथा ऋतुकालमें जो रात्रिके समय रतिसे संयुक्त होते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है; अतः प्रशस्त होनेके कारण ऋतु रात्रिमें स्त्री-गमन करना चाहिये—यह भी प्रासङ्गिक विधि ही है, अब प्रकृत विषय [ अगले मन्त्रसे ] कहा जाता है । वह अहोरात्रात्मक प्रजापति [ इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर ] व्रीहि और यव आदि अन्नरूपसे स्थित हुआ है ॥ १३ ॥

एवं क्रमेण परिणम्य तत्इस प्रकार क्रमशः परिणामको प्राप्त होकर वह

अन्नका प्रजापतित्व

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥१४॥

अन्न ही प्रजापति है; उसीसे वह वीर्य होता है और उस वीर्य-हीसे यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है ॥ १४ ॥