रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
द्वितीयोऽध्यायः । ६७
द्वितीयोऽध्यायः । ६७
मारणे प्रकारान्तरमाह—
गन्धर्वपत्रतोयेन गुडेन सह भावितम् ।
अधोध्वं वटपत्राणि निश्चन्द्रं त्रिपुटैः खगम् ॥ ४३ ॥
क्षुधं करोति चात्यर्थं गुञ्जार्धमितिसेवया ।
तत्तद्रोगहरैर्योगैः सर्वरोगहरं परम् ॥ ४४ ॥
यदि अभ्रक में गुड़ मिला कर एरण्ड (रेडी) के पत्तों के स्वरस की भावना देकर शराव में रख कर ऊपर से वट पत्र रख कर शराव को कपड़ मिट्टी कर फूंक दे । इस तरह तीन पुट देने से अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म तय्यार होती है । इस भस्म को आधे रत्ती की मात्रा में सेवन करने से अत्यन्त क्षुधा लगती है और यह भस्म भिन्न २ दवाइयों या अनुपान के साथ देने से सर्व व्याधियों को दूर करती है ॥ ४३-४४ ॥
अथ सत्वस्य शोधनमारणे—
सत्त्वस्य गोलकं ध्मातं सस्यसंयुक्तकाञ्जिके ।
निर्वाप्य तत्क्षणेनैव कुट्टयेल्लोहपारया ॥ ४५ ॥
संप्रताप्य घनस्थूलकणान्क्षिप्त्वाऽथ काञ्जिके ।
तत्क्षणेन समाहृत्य कुट्टयित्वा रजश्चरेत् ॥ ४६ ॥
गोधृतेन च तच्चूर्णं भर्जयेत्पूर्ववत्त्रिधा ।
धात्रीफलरसैस्तद्वद्धात्रीपत्ररसेन वा ॥ ४७ ॥
भर्जने भर्जने कार्यं शिलापट्टे न पेषणम् ।
ततः पुनर्नवावासारसैः काञ्जिकमिश्रितैः ॥ ४८ ॥
प्रपुटेद्दशवाराणि दशवाराणि गन्धकैः ।
एवं संशोधितं व्योमसत्त्वं सर्वगुणोत्तरम् ।
यथेष्टं विनियोक्तव्यं जारणे च रसायने ॥ ४९ ॥
द्रुतयो नैव निर्दिष्टाः शास्त्रे दृष्टा अपि दृढम् ॥
विना शंभोः प्रसादेन न सिध्यन्ति कदाचन ॥ ५० ॥
अभ्रक सत्व का गोला बना कर उसे प्रतप्त करें और फिर बिना छानी काञ्जी में बुझावे और उसी समय लोह के मूसल से चूर्ण करता जाय । इस तरह अभ्रक सत्व के स्थूल कणों को बार २ प्रतप्त कर के काञ्जी में बुझा कर उसी समय निकाल
६८ | रसरत्नसमुच्चये—
कर चूर्ण करलें, फिर उस चूर्ण को पूर्वोक्त विधि से गोघृत से भूँजना चाहिए । अथवा इसी तरह आंवले के फल या पत्नों के स्वरस से भूनना चाहिए । प्रत्येक भर्जन के समय शिलापट्ट से चूर्ण करना आवश्यक है । बाद में पुनर्नवा और वासा के स्वरस में काञ्जी मिला कर घोट कर दश वार पुट देना चाहिए । इसी तरह गन्धक के साथ भी घोट कर दस पुट देना चाहिए । इस तरह शोधित किया हुआ अभ्रक सत्व सर्वगुण युक्त होता है और उस का पारद के जारण या रसायन में यथेष्ट प्रयोग कर सकते हैं। द्रुतियों का शास्त्र में वर्णन होने पर भी उपयोग ठीक विधि से नहीं बताया गया है और ये शिवजी की अनुकम्पा के बिना सिद्ध भी नहीं होती हैं ॥ ४५–५० ॥
अथाभ्रप्रयोगः—
वेल्लव्योषसमन्वितं घृतयुतं वल्लोन्मितं सेवितं
दिव्याभ्रं क्षयपाण्डुरुग्ग्रह णिकाशूलामकुष्ठामयम् ।
जूर्ति श्वासगदं प्रमेहमरुचिं कासामयं दुर्धरं
मन्दाग्निं जठरव्यथां विजयते योगैरशेषामयान् ॥ ५१ ॥
इत्यभ्रकाधिकारः ।
वायविडङ्ग, सोंठ, मिर्च, पिप्पल, प्रत्येक का दो दो रत्ती चूर्ण करले फिर उस चूर्ण में घृत मिलाकर दो रत्ती अभ्रक रस मिलाकर सेवन करे । इससे क्षय, पाण्डु, ग्रहणी, खांसी, शूल, आंव, और कुष्ठ रोग, ज्वर, श्वास, बीस प्रकार के प्रमेह, अरुचि, असाध्य कास रोग, मन्दाग्नि, उदर की समस्त व्याधियां और भिन्न २ अनुपानों से समग्र व्याधियां नष्ट हो जाती है ॥ ५१ ॥
अथ वैक्रान्तः—
अष्टास्रश्चाष्टफलकः षट्कोणो मसृणो गुरुः ।
शुद्धमिश्रितवर्णैश्च युक्तो वैक्रान्त उच्यते ॥ ५२ ॥
आठ कोनों तथा आठ फलकों से युक्त और षट्कोणवाला, स्निग्ध, भारी, शुद्ध और मिश्रित रङ्ग वाला उत्तम वैक्रान्त होता है ॥ ५२ ॥
अथ वैक्रान्तस्य वर्णभेदाः—
श्वेतो रक्तश्च पीतश्च नीलः पारावतच्छविः ।
श्यामलः कृष्णवर्णश्च कर्बुरश्चाष्टधा हि सः ॥ ५३ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । ६९
श्वेत, रक्त, पीत, नील, धूमवर्ण, कृष्ण, श्याम तथा चित्रवर्ण या स्वर्णवर्ण इन वर्ण भेदों से वैक्रान्त आठ तरह का है ॥ ५३ ॥
अथ वैक्रान्तगुणाः—
आयुष्प्रदश्च बलवर्णकरोऽतिवृष्यः प्रज्ञाप्रदः सकलदोषगदापहारी । दीप्ताग्निकृत्पविसमानगुणस्तरस्वी वैक्रान्तकः खलु वपुर्बललोहकारी॥५४॥ रसायनेषु सर्वेषु पूर्वगण्यः प्रतापवान् । वज्रस्थाने नियोक्तव्यो वैक्रान्तः सर्वदोषहा ॥ ५५ ॥
वैक्रान्त अवस्था बढाता है, शरीर में बल तथा वर्ण पैदाकरता है, अत्यन्त वृष्य तथा बुद्धिप्रद है, सम्पूर्ण कुपित वातादि दोष और व्याधियों को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, वज्र (हीरक) के समान गुणकारी है, तथा शक्ति पैदा करता है, शरीर को बलयुक्त एवं लौह सदृश दृढ करता है । जितने भी रसायन हैं उनमें यह प्रधान और प्रभावसम्पन्न तथा सम्पूर्ण दोषों को नष्ट करने वाला है । इसका हीरे के स्थान में भी प्रयोग करते हैं ॥ ५४-५५ ॥
अथ वैक्रान्तोत्पत्तिः—
दैत्येन्द्रो माहिषः सिद्धः सहदेवसमुद्भवः । दुर्गा भगवती देवी तं शूलेन व्यमर्दयत् ॥ ५६ ॥ तस्य रक्तं तु पतितं यत्र यत्र स्थितं भुवि । तत्र तत्र तु वैक्रान्तं वज्राकारं महारसम् ॥ ५७ ॥
देवताओं ( अथवा सहदेव ) के साथ उत्पन्न तथा शङ्करजी से सिद्धिप्राप्त दैत्यों के राजा महिषासुर को भगवती दुर्गा ने जब अपने त्रिशूल से मारा था उस वक्त उसका रक्त जहां २ पृथ्वी पर पड़ा वहां २ वज्र के सदृश आकार वाले महारस वैक्रान्त की उत्पत्ति हुई ॥ ५६-५७ ॥
**विमर्शः—**वैक्रान्त को टर्मुली ( Turmuly ) कहते हैं ।
**परिचय—**यह एक । विशेष खनिज है जो कि अभ्रक के साथ २, तथा कभी २ स्वतन्त्र रूप से भी प्राप्त होता है । सम्भव है कि इसी कारण इसका अभ्रक के बाद पाठ रखा गया है । इसकी जो मूल में उत्पत्ति दिखाई गई है वह अलङ्कारिक भाषा से ओतप्रोत होती हुई भी समर्थ का प्रतिपादन करती है । किन्तु आजकल के जौहरियों के प्रयोग के आधार पर इसके विषय में जो दग्ध हीरक होने की धारण लोगों की बनी हुई यह भ्रम से परिपूर्ण है । यह स्वतन्त्र खनिज है ।
७० | रसरत्नसमुच्चये—
**उपलब्धि—**यह खनिज प्रथम सीलोन से निकलता था किन्तु आजकल विशेष कर अफ्रीका से निकलता है तथा वहीं से सर्वत्र वितरित होता है। इसके जो अनेक वर्ण के सुन्दर २ कण (क्रिस्टल्स् Crystals) आते हैं उनकी गणना रत्नों में होती है। इसी लिये इस ग्रन्थ में इसका आगे रत्नों के साथ भी उल्लेख किया गया है। इसके बहुमूल्य कणों को जौहरी अनेक प्रकार के आभूषणों में काम में लाते हैं।
इसके कृष्णवर्ण के खनिज में लोहे का अंश अधिक होता है इस लिये उसका ही विशेष कर के औषध कर्म में प्रयोग करना चाहिए।
वैक्रान्तस्य स्थानं निरुक्तिञ्चाह—
विन्ध्यस्य दक्षिणे भागे ह्युत्तरे वाऽस्ति सर्वतः।
विक्रन्तयति लोहानि तेन वैक्रान्तकः स्मृतः ॥ ५८ ॥
यह वैक्रान्त विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर तथा दक्षिण भाग में सर्वत्र खानों में प्राप्त होता है तथा लौह ताम्रादिक समग्र धातुओं को काट डालने से वैक्रान्त कहा जाता है॥ ५८ ॥
मतान्तरेण वर्णभेदकथनम्—
श्वेतः पीतस्तथा रक्तो नीलः पारावतप्रभः।
मयूरकण्ठसदृशश्चान्यो मरकतप्रभः ॥ ५९ ॥
यह श्वेत, पीत, रक्त, नील और कबूतर के समान धूम्रवर्ण वाला तथा मयूर के कण्ठ के समान चित्रवर्ण युक्त और मरकतमणि के तुल्य वर्ण वाला सात रङ्ग का होता है॥ ५९ ॥
वर्णभेदेन कार्यभेदकथनम्—
देहसिद्धिकरं कृष्णं पीते पीतं सिते सितम्।
सर्वार्थसिद्धिदं रक्तं तथा मरकतप्रभम्॥
शेषे द्वे निष्फले वर्ज्ये वैक्रान्तमिति सप्तधा ॥ ६० ॥
कृष्णवर्ण वाला वैक्रान्त शरीर को सिद्धि प्रदान (अजरअमर) करता है। पीत वैक्रान्त को स्वर्ण के जारण मारण में प्रयोग करते हैं। इसी तरह श्वेत को चांदी के लिये या श्वेत कुष्ठादिरोगों में प्रयुक्त करते हैं। लाल तथा मरकत मणि समान वर्ण वाले वैक्रान्त को सेवन करने से सम्पूर्ण सिद्धियां प्राप्त होती हैं। शेष दो रंगवाला (नील तथा कबूतर वर्ण) वैक्रान्त विशेष फल नहीं करने से वर्जनीय है। इस तरह वैक्रान्त सात प्रकार का होता है॥ ६० ॥
द्वितीयोऽध्यायः। ७१
द्वितीयोऽध्यायः। ७१
: अथाऽऽहरणविधिः—
यत्र क्षेत्रे स्थितं चैव वैक्रान्तं तत्र भैरवम् ।
विनायकं च संपूज्य गृह्णीयाच्छुद्धमानसः ॥ ६१ ॥
जिस खान (क्षेत्र) में वैक्रान्त हो वहां पर भैरव तथा गणेशजी की पूजन कर शुद्धचित्त होकर उसे ग्रहण करें ॥ ६१ ॥
: अथ गुणान्तरम्—
वैक्रान्तो वज्रसदृशो देहलोहकरो मतः ।
विषघ्नो रसराजश्च ज्वरकुष्ठक्षयप्रणुत् ॥ ६२ ॥
वैक्रान्त हीरे के समान है तथा शरीर को लौह तुल्य बनाता है । विषों का प्रभाव नष्ट करता है । ज्वर, कुष्ठ और क्षय रोगों को नष्ट करता है । यह रसों का राजा कहलाता है ॥ ६२ ॥
अथ शोधनम्—
वैक्रान्तकाः स्युस्त्रिदिनं विशुद्धाः संस्वेदिताः क्षारपटूनि दत्त्वा ।
अम्लेषु मूत्रेषु कुलत्थरम्भानीरेऽथवा कोद्रववारिपक्वाः ॥ ६३ ॥
सर्व प्रकार के वैक्रान्त को काञ्जी में, गोमूत्र में, कुलत्थी के काढ़े में, या केले के स्वरस में क्षारवर्ग के क्षार डालकर दोला यन्त्र में तीन दिन स्वेदन करके शुद्ध करते हैं। अथवा कोदो धान के जल में पकाने से भी शुद्ध हो जाता है ॥ ६३ ॥
मतान्तरे शोधनमारणे—
कुलत्थक्वाथसंस्विन्नो वैक्रान्तः परिशुध्यति ।
म्रियतेऽष्टपुटैर्गन्धनिम्बुकद्रवसंयुतः ॥ ६४ ॥
कुलत्थी के काढ़े में एक प्रहर स्वेदन करने से वैक्रान्त शुद्ध हो जाता है । बाद में सम भाग शुद्ध गन्धक डाल कर निम्बूरस से घोट कर आठ पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ ६४ ॥
मतान्तरम्—
वैक्रान्तेषु च तप्तेषु हयमूत्रं विनिक्षिपेत् ।
पौनःपुन्येन वा कुर्याद्द्रवं दत्त्वा पुटं त्वनु ॥
भस्मीभूतं तु वैक्रान्तं वज्रस्थाने नियोजयेत् ॥ ६५ ॥
वैक्रान्त को प्राप्त करके घोड़े के मूत्र में बुझावे ! इस तरह २१ बार प्रतप्त कर
७२ रसरत्नसमुच्चये—
नया मूत्र डाल २ कर बुझाना चाहिए । बाद में पुट देने पर वज्र के स्थान पर प्रयोग करने लायक भस्म हो जाती है ॥ ६५ ॥
अथ सत्त्वपातनम्—
मोचमोरटपालाशक्षारगोमूत्रभावितम् ।
वज्रकन्द निशाकल्क फलचूर्णसमन्वितम् ॥ ६६ ॥
तत्कल्कं टङ्कणं लाक्षाचूर्णं वैक्रान्तसम्भवम् ।
नरसारसमायुक्तं मेषशृङ्गीद्रवान्वितम् ॥ ६७ ॥
पिण्डितं मूकमूषस्थं ध्मापितं च हठाग्निना ।
तत्रैव पतते सत्त्वं वैक्रान्तस्य न संशयः ॥ ६८ ॥
कदली कन्द (केले की जड़) मोरट (इक्षुमूल) रस पलाश (ढाक) का क्षार और गोमूत्र इनसे वैक्रान्त को भावित करे। पश्चात् उसमें जङ्गली सूरण कन्द तथा हल्दी का कल्क और त्रिफला का चूर्ण, सोहागा, लाह चूर्ण और नोसादर मिलाकर मेंढासिङ्गी के स्वरस से घोट कर गोला बनावे । उस गोले को अन्धमूषा में रख कर धौंकनी (भस्त्रा) से अग्नि को दीप्त करके फूंके । इससे निश्चय ही सत्व निकल आता है ॥ ६६-६८ ॥
अथ मतान्तरम्—
सत्त्वपातनयोगेन मर्दितश्च वटीकृतः ।
मूषास्थो घटिकाध्मातो वैक्रान्तः सत्त्वमुत्सृजेत् ॥ ६९ ॥
सत्त्व निकालने में प्रयुक्त होने वाली औषधियों के साथ वैक्रान्त को घोट कर गोला बनाकर मूषायन्त्र में रख कर एक घण्टे तक तीव्र अग्नि से धमन करने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ६९ ॥
अथ मृतवैक्रान्तस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च—
भस्मत्वं समुपागतो विक्रान्तको हेम्ना मृतेनान्वितः
पादांशेन कणाज्यवेल्लसहितो गुञ्जामितः सेवितः ।
यक्ष्माणं जरणं च पाण्डुगुदजं श्वासं च कासामयं
दुष्टां च ग्रहणीमुरःक्षतमुखान् रोगान्क्षयेद्देहकृत् ॥ ७० ॥
भस्म हुए एक रत्ती वैक्रान्त में चतुर्थभाग रूप में सुवर्ण भस्म मिलाकर विडङ्ग, छोटी पीपल और घृत मिला कर सेवन करने से राजयक्ष्मा, बुढापा,
द्वितीयोऽध्यायः। ७३
द्वितीयोऽध्यायः। ७३
पाण्डुरोग, अर्श, श्वास, कास, दुषित ग्रहणी, उरःक्षत तथा मुख के रोग नष्ट होते हैं तथा शरीर भी वलयुक्त होता है ॥ ७० ॥
अथ प्रयोगान्तरम्— सूतभस्मार्धसंयुक्तं नीलवैक्रान्तभस्मकम् मृताभ्रसत्त्वमुभयोस्तुलितं परिमर्दितम् ॥ ७१ ॥ क्षौद्राज्यसंयुक्तं प्रातर्गुञ्जामात्रं निषेवितम् । निहन्ति सकलान् रोगान् दुर्जयानन्यभेषजैः । त्रिःसप्तदिवसैर्नॄणां गङ्गांभ इव पातकम् ॥ ७२ ॥ इति वैक्रान्ताधिकारः ।
पारद भस्म ( रससिन्दूर ) आधा भाग, एक भाग नील वर्ण के वैक्रान्त की भस्म तथा दोनों के तुल्य मृत अभ्रक का सत्व मिला कर घोट कर शहद तथा घृत मिला कर प्रातःएक रत्ती भर ( १ गुञ्जा ) २१ दिन तक सेवन करने से अन्य औषधियों से असाध्य भी मनुष्यों के सकल रोग नष्ट हो जाते हैं जिस तरह गङ्गा जल पापों को नष्ट कर देता है ॥ ७१-७२ ॥
अथ माक्षिकम्— माक्षिकोत्पत्तिवर्णनम् सुवर्णशैलप्रभवो विष्णुना काञ्चनो रसः । ताप्यां किरातचीनेषु यवनेषु च निर्मितः ॥ ताप्यः सूर्य्यांशुसन्तप्तो माधवे मासि दृश्यते ॥ ७३ ॥ विष्णु भगवान की कृपा से सुमेरु पर्वत से उत्पन्न हुआ तथा सुवर्ण के समान चमकने वाला माक्षिक धातु तापी नदी और किरात, चीन इत्यादि यवन देशों में निर्मित हुआ है और यह तापी नदी से उत्पन्न माक्षिक वैशाखमास में सूर्य की प्रखर किरणों से तप्त होने पर दिखाई देता है ॥ ७३ ॥
अथ माक्षिकस्य गुणाः— मधुरः काञ्चनाभासः साम्लो रजतसन्निभः । किञ्चित् कषायमधुरः शीतः पाके कटुर्लघुः । तत्सेवनाज्जरायाधिविषैर्न परिभूयते ॥ ७४ ॥ सुवर्ण के समान चमकदार माक्षिक मधुररसवाला होता है और रजतवर्ण
५४ रसरत्नसमुच्चये—
माक्षिक अम्ल तथा कुछ कसैला और मधुर, पाक में शीतवीर्य कटु और लघु होता है। इन दोनों प्रकार के माक्षिक का सेवन करने से मनुष्य जरा व्याधि और विष से आक्रान्त नहीं होता है ॥ ७४ ॥
अथ माक्षिकभेदाः—
माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः ।
तत्राऽऽद्यं माक्षिकं कान्यकुब्जोत्थं स्वर्णसन्निभम् ॥ ७५ ॥
तपतीतीरसम्भूतं पञ्चवर्णसुवर्णवत् ।
पाषाणबहुलः प्रोक्तस्ताराख्योऽल्पगुणात्मकः ॥ ७६ ॥
माक्षिक धातु सुवर्ण और रजत का भाग मिलने से दो तरह का होता है। इनमें प्रथम सुवर्ण माक्षिक जो कि कान्यकुब्ज ( कन्नोज या कानपुर ) देश की खानों से निकलता है सुवर्ण के समान होता है। किन्तु तापी नदी के तट के पास की खानों से निकाला हुआ सोनामाखी धातु पांच रङ्ग वाला तथा सुवर्ण सदृश होता है, रौप्यमाक्षिक में पत्थर का भाग ज्यादा होता है तथा वह अल्प गुणदायक है ॥७५-७६॥
**विमर्शः—**भारतवर्ष में माक्षिक कोयलों की खानों में मिलता है। आचार्यों ने इसके तीन भेद बताये हैं किन्तु इस पन्थ में इसके दो ही भेद हैं। तथा आगे विमल ( रौप्यमाक्षिक ) के तीन भेद किए हैं किन्तु यह अन्य रसग्रन्थों से विरुद्ध है।
"माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः” ( इति० र० र० स० )
१ स्वर्णमाक्षिक—कापरं पेराइटिज़् ( Copperpyritis Cu,fes 2 )
२ रोप्यमाक्षिक ( विमल )—आयर्न पेराइटिज़् ( Iron pyritis )
३ कांस्यमाक्षिक ( आर्सेनो पेराइटिज़् Arsano pyritis )
ये तीनों खनिज ताम्र, लौह, और संखिये के गन्धित हैं। इनमें से गन्धक निकाल देने से उक्त तीनों पदार्थों की प्राप्ति होती है। यद्यपि इनमें अन्य खनिज भी रहते हैं किन्तु प्रधान रूप में उपर्युक्त ही होते हैं। इस लिये इनकी भस्म बनाने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यद्यपि बजार में आने वाले स्वर्ण तथा रौप्य माक्षिक में दोनों ( स्वर्णरजत ) की मात्रा नहीं होती है। किन्तु विदेशों से कुछ इनके अधिक मूल्य खनिज आते हैं उनमें दोनों धातुओं का कुछ अंश रहता है इसलिये रस शास्त्रों में जहां २ स्वर्ण और चांदी के भस्म के अभाव में इन दोनों का ग्रहण करना हो तब उक्त अधिक मूल्यवान माक्षिक खनिजों की भस्म बनाकर प्रयोग करना चाहिये।
द्वितीयोऽध्यायः । ७५
द्वितीयोऽध्यायः । ७५
माक्षिकगुणाः—
माक्षीकधातुः सकलामयघ्नः प्राणो रसेन्द्रस्य परं हि वृष्यः ।
दुर्मेललोहद्वयमेलनश्च गुणोत्तरः सर्वरसायनाग्र्यः ॥ ७७ ॥
माक्षिक धातु सम्पूर्ण रोग नाशक है, पारद के गुणों का उत्कर्ष करता है तथा अत्यन्त वृष्य है । परस्पर कठिनता से मिश्रित होने वाले लोह द्वय को मिला देता है ॥ ७७ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकशोधनमारणे—
एरण्डतैललुङ्गाम्बुसिद्धं शुद्ध्यति माक्षिकम् ।
सिद्धं वा कदलीकन्दतोयेन घटिकाद्वयम् ।
तप्तं क्षिप्तं वराक्वाथे शुद्धमायाति माक्षिकम् ॥ ७८ ॥
मातुलुङ्गाम्बुगन्धाभ्यां पिष्टं मूषोदरे स्थितम् ।
पञ्चक्रोडपुटैर्दग्धं म्रियते माक्षिकं खलु ॥ ७९ ॥
एरण्डस्नेहगव्याज्यैर्मातुलुङ्गरसेन वा ।
खर्परस्थं दृढं पक्वं जायते धातुसन्निभम् ॥
एवं मृतं रसे योज्यं रसायनविधावपि ॥ ८० ॥
माक्षिक का चूर्ण कर एरण्ड तेल (रेड़ी तेल), बिजौरे निम्बू का रस या केले की जड़ के रस में डालकर दोलायन्त्र विधि से दो घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती हैं । अथवा त्रिफला के क्वाथ में तपा कर सात बार बुझाने से शुद्ध हो जाता है । बिजौरे निम्बू का रस और समान गन्धक शुद्ध माक्षिक में मिला कर खरल करें । बाद में गोला बनाकर मूषायन्त्र में रख कर वाराह पुट में पांच पुट देने से निश्चय ही माक्षिक की भस्म हो जाती है । इसी तरह एरण्ड तैल या गाय के घी को कड़ाह में डालकर उसमें सोनामाखी को खूब पकाने से भस्म सदृश हो जाता है । केवल बिजौरे के रस से भी पकाने पर भस्म हो जाती है, इस तरह मृत माक्षिक को रस और रसायन में उपयोग करना चाहिए ॥ ७८-८० ॥
अथ सत्त्वपातनम्—
त्रिंशांशनागसंयुक्तं क्षारैरम्लैश्च मर्दितम् ।
ध्मातं प्रकटमूषायां सत्त्वं मुञ्चति माक्षिकम् ॥ ८१ ॥
७६ रसरत्नसमुच्चये—
सप्तवारं परिद्राव्य क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे ।
माक्षीकसत्त्वसम्मिश्रं नागं नश्यति निश्चितम् ॥ ८२ ॥
क्षौद्रगन्धर्वतैलाभ्यां गोमूत्रेण घृतेन च ।
कदलीकन्दसारेण भावितं माक्षिकं मुहुः ॥
मूषायां मुञ्चति ध्मातं सत्त्वं शुल्वनिभं मृदु ॥ ८३ ॥
माक्षिक के चूर्ण में तीसवें भाग की मात्रा से नागभस्म मिलाकर समान भाग क्षार (स्वर्जिका, यवक्षार, टङ्कण) और अम्ल रसों से घोट कर गोला बनाकर सत्व पातन करने की मूषा में रखकर फूंकने से माक्षिक अपना सत्व छोड़ देता है। इस सत्व को अग्नि पर तप्त कर निर्गुण्डी के रस में सात बार बुझाने से माक्षिक के सत्व के साथ मिश्रित नाग निश्चय ही नष्ट हो जाता है। माक्षिक को क्रम से शहद, एरण्डतैल, गोमूत्र घृत और केले के कन्द के रस में भावना देकर गोला बना कर मूषा में रख कर फूंकने से ताम्र के समान लाल और मृदु सत्व निकल जाता है ॥ ८१-८३ ॥
अथ विशुद्धताप्यसत्वलक्षणम्—
गुञ्जाबीजसमच्छायं द्रुतद्रावं च शीतलम् ।
ताप्यसत्त्वं विशुद्धं तद्देहलोहकरं परम् ॥ ८४ ॥
गुञ्जाबीज के समान रक्तवर्ण और अग्नि पर जल्दी पिघलने वाला तथा शीतल शुद्ध माक्षिक सत्व होता है। वह देह को श्रेष्ठ बनाता है ॥ ८४ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकरसायनम्—
माक्षीकसत्त्वं च रसेन पिष्टं कृत्वा विलीने च बलिं निधाय ।
सम्मिश्र्य सम्मर्च च खल्वमध्ये निःक्षिप्यसत्त्वं द्रुतिमभ्रकस्य ॥ ८५ ॥
विधाय गोलं लवणाख्ययन्त्रे पचेद्दिनाद्धं मृदुवह्निना च ।
स्वतः सुशीतं परिचूर्ण्य सम्यग्वल्लोन्मितं व्योषविडङ्गयुक्तम् ॥ ८६ ॥
संसेवितं क्षौद्रयुतं निहन्ति जरां सरोगांस्त्वपमृत्युमेव ।
दुस्साध्यरोगानपि सप्तवासरैर्नैतेन तुल्योऽस्ति सुधारसोऽपि ॥८७॥
माक्षिक सत्व को शुद्ध समान भाग पारे के साथ खूब घोट कर चमक रहित कजली बनावे। फिर उसमें सत्व के बराबर ही गन्धक मिला कर घोटे, गन्धक के मिल जाने पर माक्षिक सत्व के समान भाग ही में अभ्रक सत्व की द्रुति मिलाकर
द्वितीयोऽध्यायः। [५७]
घोट कर गोला बनावे। उस गोले को लवण नामक यन्त्र में रख कर मृदु अग्नि से आधे दिन तक पकावे। स्वाङ्गशीतल होने पर निकाल कर चूर्ण कर ले। इसमें से एक रत्ती की मात्रा में लेकर सोंठ, मिर्च, पीपल और वायविडङ्ग के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से समग्र रोग, जरा तथा अत्यन्त कष्टसाध्य भी रोग और अकाल मृत्यु सात दिन में दूर हो जाते हैं। इसके समान अमृत रस भी गुण नहीं करता है ॥ ८५-८७ ॥
अथ सुवर्णमाक्षिकरसायनम्—
एरण्डोत्थेन तैलेन गुञ्जा क्षौद्रं च टङ्कणम् ।
मर्दितं तस्य वापेन सत्त्वं माक्षिकजं द्रवेत् ॥ ८८ ॥
इति माक्षिकाधिकारः ।
एरण्ड तेल, गुन्जा का चूर्ण, शहद और सुहागा इनके चूर्ण के साथ सुवर्ण माक्षिक सत्व के चूर्ण को डाल कर अग्नि पर गलाने से सोना माखी के सत्व का द्रवण हो जाता है ॥ ८८ ॥
विमलभेदाः—
विमलस्त्रिविधः प्रोक्तो हेमाद्यस्तारपूर्वकः ।
तृतीयः कांस्यविमलस्तत्तत्कान्त्या स लक्ष्यते ॥ ८९ ॥
कुछ लोग (पर्यायमुक्तावलोकार) विमल को रूपमाखी कहते हैं। विमल भी माक्षिक धातु का ही एक भेद है। विमल के ३ भेद हैं। सुवर्ण का भाग मिला रहने से सुवर्ण विमल, चांदी का भाग मिला रहने से तार विमल और कांस्य का भाग रहने से कांस्य विमल कहलाता है। चमक से ही विमल के भेदों का ज्ञान होता है ॥ ८९ ॥
विमल— इसको रौप्यमाक्षिक कहते हैं। बाजारों में इसके चतुष्कोण कण मिलते हैं और उनका वर्ण स्वर्ण के समान होता है। इसी लिये इसको फूल्स गोल्ड ( Fools gold ) भी कहते हैं तथा अज्ञ लोग इसे स्वर्ण माक्षिक मान कर स्वर्ण के अभाव में प्रयुक्त करते हैं। किन्तु यह गन्धक तथा लोहे का यौगिक है। इस में स्वल्प मात्रा में भी स्वर्ण नहीं रहता है।
जो असली स्वर्णमाक्षिक होता है उसमें ताम्र का अंश रहता है तथा वह कणरूप में नहीं आता है। "सत्त्वं चन्द्रार्कसङ्काशम्" इस पद से सिद्ध होता है कि प्राचीनाचार्यों ने भी असली स्वर्णमाक्षिक में ताम्र की उपस्थिति को माना है।
७८ : रसरत्नसमुच्चये—
**उपलब्धि—**आज कल माक्षिक धातु विशेष करके बिहार, नेपाल, पञ्जाब और बुन्देलखण्ड की रियासतों में मिलता है तथा विदेश में भी इसकी खाने हैं।
अथ विमलस्य लक्षणगुणाः—
वर्तुलः कोणसंयुक्तः स्निग्धश्च फलकान्वितः ।
मरुत्पित्तहरो वृष्यो विमलोऽतिरसायनः ॥ ६० ॥
जो विमल गोल तथा चारों ओर कोण युक्त हो तथा स्पर्श में स्निग्ध और फलकाकार हो वह श्रेष्ठ है, तथा कुपित वात और पित्त को नष्ट करता है तथा अत्यन्त रसायन और वृष्य है ॥ ९० ॥
विमलभेदानां प्रयोगनिर्देशः—
पूर्वो हेमक्रियासूक्तो द्वितीयो रूप्यकृन्मतः ।
तृतीयो भेषजे तेषु पूर्वपूर्वो गुणोत्तरः ॥ ६१ ॥
सुवर्ण विमल सोने के जारण मारण या उसके स्थान में प्रयुक्त होता है । तार विमल चांदी के कार्य में और तृतीय कांस्य विमल औषध में काम आता है । इन तीनों में पूर्व से पूर्व श्रेष्ठ माना गया है ॥ ९१ ॥
अथ विमलशोधनम्—
आटूरूषजले स्विन्नो विमलो विमलो भवेत् ।
जम्बीरस्वरसे स्विन्नो मेषशृङ्गीरसेऽथवा ॥
आयाति शुद्धिं विमलो धातवश्च यथाऽपरे ॥ ६२ ॥
विमल को दोला यन्त्र द्वारा वासा के रस में या नीम्बू के रस में या मेढा-सिङ्गी के रस में दो घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है । इस विधि से अन्य धातुओं को भी शुद्ध करना चाहिये ॥ ९२ ॥
अथ विमलस्य मारणम्—
गन्धाश्मलकुचाम्लैश्च म्रियते दशभिः पुटैः ॥ ६३ ॥
विमल के चूर्ण में समान भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर बड़हर (लकुच) के स्वरस में या निम्बू के रस में घोट कर १० पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ ९३ ॥
अथ विमलस्य सत्वपातनविधिः—
सटङ्कण्लंकुचद्रावैर्मेषशृंग्याश्च भस्मना ।
पिष्टो मूषोदरे लिप्तः संशोष्य च निरुध्य च ॥ ६४ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । ७९
द्वितीयोऽध्यायः । ७९
षट्प्रस्थकोकिलैर्ध्मातो विमलः सीससन्निभः । सत्त्वं मुञ्चति तद्युक्तो रसः स्यात्स रसायनः ॥ ९५ ॥
विमल भस्म में बराबर भाग में सुहागा और मेढासिङ्गी की भस्म मिलाकर बडहर के रस में घोट कर मूषा के अन्दर लेप कर के सुखा लें । फिर मूषा यन्त्र को बंध कर के ६ प्रस्थ कोयले की आंच में फूंकने से सीसे के समान श्वेत सत्त्व निकल आता है । इस सत्त्व को पारे के साथ मिलाने से उत्तम रसायन तैयार हो जाता है ॥ ९४-९५ ॥
अथ मतान्तरेण सत्वपातनम्—
विमलं शिग्रुतोयेन कांक्षीकासीसटङ्कणम् । वज्रकन्दसमायुक्तं भावितं कदलीरसे ॥ ९६ ॥ मोक्षकक्षारसंयुक्तं ध्मापितं मूकमूषगम् । सत्त्वं चन्द्रार्कसंकाशं पतते नात्र संशयः ॥ ९७ ॥
विमल भस्म के बराबर २ फिटकिरी, हीराकासीस, सोहागा और जङ्गली सूरण-कन्द लेकर इनको कदली कन्द स्वरस या सहजन ( शिग्रु ) की छाल के क्वाथ से घोट कर पाढल क्षार भी मिला कर मूकमूषा यन्त्र में बन्द कर फूंकने से चन्द्र और अर्क (सूर्य) के समान श्वेत या चन्द्रकिरणवत् श्वेत सत्त्व निकलता है । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ९६-९७ ॥
अथ विमलस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च—
तत्सत्त्वं सूतसंयुक्तं पिष्टं कृत्वा सुमर्दितम् । विलीनं गन्धके क्षिप्त्वा जारयेत् त्रिगुणालकम् ॥ ९८ ॥ शिलां पञ्चगुणां चापि वालुकायन्त्रके खलु । तारभस्म दशांशेन तावद्वैक्रान्तकं मृतम् ॥ ९९ ॥ सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पटेन परिगाल्य च । निक्षिप्य कूपिकामध्ये परिपूर्य प्रयत्नतः ॥ १०० ॥ लीढो व्योषवरान्वितो विमलको युक्तो घृतैः सेवितो हन्याद्दुर्भगकृज्ज्वराङ्गश्वयथुकं पाण्डुप्रमेहारुचीः । मूलात्तिं ग्रहणीं च शूलमतुलं यक्ष्मामयं कामलाम् सर्वाञ्पित्तमरुद्गदान्किमपरैर्यौगैरशेषामयान् ॥ १०१ ॥
८० रसरत्नसमुच्चये-
विमल का सत्व और शुद्ध पारद समान मात्रा में घोटकर अग्नि में द्रुत हुए गन्धक के साथ मिलाकर तीन गुणी हरताल के साथ जारण करें। फिर विमल सत्व से पांच गुणी मनःशिला मिला कर वालुका यंत्र में पाक करना चाहिए। स्वाङ्ग शीत होने पर उस यन्त्र से निकाल कर सत्व से दशमांश चांदीभस्म और उतनी ही वैक्रान्त भस्म मिलाकर घोट कर वस्त्र से छान कर शीशी में रख लेना चाहिये। फिर इस विमल रसायन को बलानुसार एक या दो रत्ती के प्रमाण से त्रिकटु और त्रिफला तथा घृत के साथ सेवन करने से तीव्रज्वर, शोथ, पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श, अरुचि, संग्रहणी, शूल, राजयक्ष्मा, कामला, शिरदर्द तथा समग्र वात तथा पित्त जन्य रोगों को नष्ट करता है। ज्यादा क्या कहें जैसे २ रोग हो उनके अनुकूल अनुपान के साथ देने से लाभ करता है ॥ ९८-१०१ ॥
अथ शिलाजतु-
शिलाजतुभेदाः-
शिलाधातुर्द्विधा प्रोक्तो गोमूत्राद्यो रसायनः ।
कर्पूरपूर्वकश्चान्यस्तत्राद्यो द्विविधः पुनः ॥
ससत्त्वश्चैव निःसत्त्वस्तयोः पूर्वो गुणाधिकः ॥ १०२ ॥
शिलाजीत दो तरह की होती है। एक गोमूत्र के समान गन्धवाली और दूसरी कर्पूर के समान गन्धवाली। इन दोनों भेदों में गोमूत्र गंधी शिलाजीत उत्तम रसायन है। इस गोमूत्रगंधी शिलाजीत के भी दो भेद हैं। एक सत्व सहित, दूसरी सत्वहीन, इनमें भी प्रथम अधिक गुण प्रद होती हैं ॥ १०२ ॥
शिलाजतुन उत्पत्तिः-
ग्रीष्मे तीव्रार्कतप्तेभ्यः पादेभ्यो हिमभूभृतः ।
स्वर्णरूप्यार्कगर्भेभ्यः शिलाधातुर्विनिःसरेत् ॥ १०३ ॥
ग्रीष्म कालीन सूर्य के तीव्र ताप से तपे हुए और सुवर्ण, चांदी, तथा ताम्र धातुओं से युक्त हिमालय पर्वत के शिखरों की चट्टानों से शिलाजंतु निकलती है ॥ १०३ ॥
विमर्शः- आजकल शिलाजीत गिलगिट (कश्मीर का सीमा प्रान्त) ब्रिटिश गढवाल, बाघेश्वर, भूटान तथा तिब्बत के पहाड़ों से आती है। इसका यौगिक क्या है इसका अभी तक ठीक २ निर्णय नहीं हुआ है तथापि प्राचीनशास्त्र मत तथा अर्वाचीन रसायन शास्त्र के मतों का समन्वय करने से प्रतीत होता है कि यह खनिजतेल
द्वितीयोऽध्यायः।
८१
(मिनरल ओइल Mineral oil) का यौगिक है। इसलिये इसको अग्नि पर तपाने का निषेध है। क्योंकि उसमें पेट्रोल जाति का तैल होने से शीघ्र ही उड़न शील है तथा अग्निपरीक्षा करने पर निर्धूम होने को लिखा है और जल के अन्दर डूबने का भी निषेध है (अर्थात् यह खनिज तैल है इससे जलपर तैरेगा)
यथा—"वह्नौ क्षिप्तं भवेद्यत्तल्लिङ्गाकारमधूमकम् ।
सलिलेऽप्यविलीनञ्च तच्छुद्धं हिशिलाजतु ॥
यह द्रव्य शिलाजत्वादिक लौह आदि अनेकों योगों में पड़ता है तथा उन से क्षयरोग में बहुत लाभ होता है। आधुनिक चिकित्सक भी पेट्रोलियम इमल्शन (Patrolium Imultion) का क्षय में बहुत प्रयोग करते हैं। इस को वेन्जर्स इमल्शन कहते हैं। यह आधुनिक चिकित्सकों ने प्राचीन चिकित्सकों के रसग्रन्थों से ही सीखकर प्रयोग करना प्रारम्भ किया है। तथा इसग्रन्थ में जो इनके उत्पत्ति का (ग्रीष्मे तीव्रार्कतप्तेभ्यः,) इत्यादि श्लोकों से वर्णन किया गया है वह अत्यन्त युक्तियुक्त है।
स्वर्णगर्भ गिरेर्जातो जपापुष्पनिभो गुरुः ।
स स्वल्पतिक्तः सुस्वादुः परमं तद्रसायनम् ॥ १०४ ॥
रूप्यगर्भ गिरेर्जातं मधुरं पाण्डुरं गुरु ।
शिलाजं पित्तरोगघ्नं विशेषात्पाण्डुरोगहृत् ॥ १०५ ॥
ताम्रगर्भ गिरेर्जातं नीलवर्णं घनं गुरु ।
शिलाजं कफवातघ्नं तिक्तोष्णं क्षयरोगहृत् ॥ १०६ ॥
जिस हिमालय पर्वत की खान या चट्टान में सुवर्ण भाग ज्यादा होता है उससे निकली शिलाजीत जपापुष्प के समान लालवर्ण, वजन में भारी और कुछ स्वाद में तिक्त तथा स्वादु होता है। यह उत्तम रसायन है। चांदी की खान वाले स्थान से निकली शिलाजीत भारी, मधुर और पाण्डुरवर्ण की होती है। इससे पित्तरोग और विशेषकर पाण्डुरोग नष्ट होता है। ताम्रधातु युक्त पर्वत की खान से निकली शिलाजीत नीलवर्ण, भारी और ठोस होती है यह शिलाजीत तिक्त तथा उष्ण है कफ और वात विकार से उत्पन्न रोग तथा क्षयरोग को नष्ट करती है ॥ १०४-१०६ ॥
शुद्धशिलाजतुलक्षणम्—
वह्नौ क्षिप्तं भवेद्यत्तल्लिङ्गाकारमधूमकम् ।
सलिलेऽप्यविलीनं च तच्छुद्धं हि शिलाजतु ॥ १०७ ॥
रस० ६
८२ रसरत्नसमुच्चये—
शुद्धशिलाजीतपरीक्षा— वह्नि में डालने से लिङ्गाकार हो तथा धुआं न दे और जल में न घुले किन्तु नीचे सूत्र रूप में बैठ जाय वह उत्तम है ॥ १०७ ॥
अथ गुणाः— नूनं सज्वरपाण्डुशोफशमनं मेहाग्निमान्द्यापहं मेदच्छेदकरं च यक्ष्मशमनं शूलामयोन्मूलनम् । गुल्मप्लीहविनाशनं जठरहृच्छूलभ्रमामापहम् । सर्वत्वग्गदनाशनं किमपरं देहे च लोहे हितम् ॥ १०८ ॥ रसोपरससूतेन्द्ररत्नलोहेषु ये गुणाः । वसन्ति ते शिलाधातौ जरामृत्युजिगीषया ॥ १०९ ॥
शिलाजीत ज्वर, पाण्डुरोग, शोथ (सूजन), बीस प्रकार के प्रमेह तथा अग्निमान्द्य को नष्ट करती है । बढी हुई शरीर की चर्बी ( मेद ) को काट कर निकालती है तथा राजयक्ष्मा, शूल, गुल्म, प्लीहवृद्धि और उदर रोगों को नष्ट करती है । सम्पूर्ण चर्म की व्याधियों को नष्ट करती है । शरीर को लौह सदृश करती है । रस, उपरस, पारद, रत्न तथा सप्त धातुओं में जो गुण हैं वे मनुष्यों के जरा तथा मरण को जीतने के लिये मानों शिलाजीत में निवास करते हैं ॥ १०८-१०९ ॥
अथ शोधनम्— क्षाराम्लगोजलैध्रौतं शुद्धत्येव शिलाजतु ॥ ११० ॥ शिलाधातुं च दुग्धेन त्रिफलामार्कवद्रवैः । लोहपात्रे विनिक्षिप्य शोधयेदतियत्नतः ॥ १११ ॥ क्षाराम्लगुग्गुलोपेतैः स्वेदनीयन्त्रमध्यगैः । स्वेदिता घटिकामानाच्छिलाधातुर्विशुद्ध्यति ॥ ११२ ॥
क्षार, अम्ल तथा गोमूत्र से घोट कर धोने पर शिलाजीत शुद्ध हो जाती है । अथवा दुग्ध, त्रिफलाकाथ और भांगरे के स्वरस को लौह के पात्र में डाल कर शिलाजीत डाल दे । सूर्य की गर्मी से शुद्ध भाग द्रवों के ऊपर तैरने लगता है । बुद्धिमान उस तैरने वाले अंश को काच के पात्र में एकत्र करे । अथवा दोलायन्त्र में क्षार, अम्ल और गुग्गुल डाल कर उनके साथ शिलाजीत को एक घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ११०-११२ ॥
द्वितीयोऽध्यायः। ८३
द्वितीयोऽध्यायः। ८३
अथ शिलाजतुमारणम्— शिलया गन्धतालाभ्यां मातुलुङ्गरसेन च । पुटितो हि शिलाधातुर्म्रियतेऽष्टगिरिण्डकैः ॥ ११३ ॥
शिलाजीत की मारण विधि-शिलाजीत को मनः शिला, गन्धक तथा हरताल के साथ बिजौरे निम्बू के रस से घोट कर गोला बनाकर गज पुट में आठ जङ्गली उपलों द्वारा पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है ॥ ११३ ॥
अथ प्रयोगविधिः— भस्मीभूतशिलोद्भवं समतुलं कान्तं च वैक्रान्तकं युक्तं च त्रिफलाकटुत्रिकघृतैर्वल्लेन तुल्यं भजेत् । पाण्डौ यक्ष्मगदे तथाग्निसदने मेहेषु मूलामये ॥ गुल्मप्लीहमहोदरे बहुविधे शूले च योन्यामये ॥ ११४ ॥ सेवेत यदि षण्मासं रसायनविधानतः । वलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं सुखी ॥ ११५ ॥
शिलाजीत की भस्म, कान्तलौह भस्म और वैक्रान्तभस्म इन्हें समान २ भाग में परस्पर मिलाकर घोट लें । बाद में एक रत्ती की मात्रा से त्रिफला और त्रिकटु चूर्ण तथा घृत के सङ्ग सेवन करने से पाण्डुरोग, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, प्रमेह, अर्श, गुल्म, प्लीह वृद्धि, जलोदर तथा अनेक प्रकार के उदर शूल और स्त्रियों के योनि रोग नष्ट हो जाते हैं । यदि इस रसायन को विधि पूर्वक ६ मास सेवन करे तो बालों का श्वेत होना तथा गिरना बन्द होकर सुख पूर्वक सौ वर्ष तक मनुष्य जीता रहता है ॥ ११४-११५ ॥
अथ सत्त्वपातनम्— पिष्टं द्रावणवर्गेण साम्लेन गिरिसम्भवम् । क्षिप्त्वा मूषोदरे रुद्ध्वा गाढैर्ध्मातं हि कोकिलैः ॥ सत्त्वं मुञ्चेच्छिलाधातुस्तत्क्षणाल्लोहसन्निभम् ॥ ११६ ॥
शिलाजीत को द्रावक वर्ग की गुड़, गुग्गुल, गुञ्जा, घृत इन औषधियों के साथ तथा काञ्जी इत्यादि अम्ल से पेषण करके मूषायन्त्र में डाल कर उसका मुख अवरुद्ध कर के बेर के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्व निकल जाता है । यह सत्व लौह सदृश दृढ होता है ॥ ११६ ॥
८४ रसरत्नसमुच्चये—
अथ कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्—
पाण्डुरं सिकताकारं कर्पूराद्यं शिलाजतु ।
मूत्रकृच्छ्राश्मरीमेहकामलापाण्डुनाशनम् ॥ ११७ ॥
एलातोयेन सम्भिन्नं सिद्धं शुद्धिमुपैति तत् ।
नैतस्य मारणं सत्त्वपातनं विहितं बुधैः ॥ ११८ ॥
इति शिलाजित्त्वधिकारः ।
कर्पूर गन्धवाली शिलाजीत पाण्डुवर्ण तथा वालू के आकार की होती है । इस के सेवन से मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, कामला और पाण्डुरोग नष्ट होता है । इस की शुद्धि इलायची के काथ में घोटने से होती है । आयुर्वेद के विद्वानों ने इसका मारण और सत्त्व पातन का विधान नहीं कहा है ॥ ११७-११८ ॥
अथ सस्यकः —
अथ सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्—
पीत्वा हालाहलं वान्तं पीतामृतगरुत्मता ।
विषेणामृतयुक्तेन गिरौ मरकताह्वये ।
तद्वान्तं हि घनीभूतं सञ्जातं सस्यकं खलु ॥ ११९ ॥
किसी समय अमृत पान किये हुए गरुड़ जी ने हालाहल नामक विषका पान कर लिया । इस कारण अमृत और हालाहल विष के एकत्र होने से मरकत नामक पर्वत पर उन्हें वमन होगई । कुछ समय के पश्चात् वह वमन पदार्थ घन स्वरूप होकर नील तुत्थ के रूप में परिणत होगया ॥ ११९ ॥
प्रशस्तसस्यकलक्षणम्—
मयूरकण्ठसच्छायं भाराढ्यमतिशस्यते ॥ १२० ॥
द्रव्यं विषयुतं यत्तद्द्रव्याधिकगुणं भवेत् ।
सुधाहलाहलैर्युक्ता सुधाधिकगुणा तथा ॥ १२१ ॥
जो नील तुत्थ ( सस्यक ) मयूर के कण्ठ के समान नील वर्ण और भार युक्त हो वह औषध कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है । किसी द्रव्य में विष मिल जाने से उस के गुण बढ़ जाते हैं । इसी तरह हालाहल विष से युक्त सुधा भी सुधा (अमृत) से भी अधिक गुण प्रद हो जाती है ॥ १२०-१२१ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
८५
अथ गुणाः—
निःशेषदोषविषहृद्गदशूलमूलकुष्ठाम्लपैत्तिकविबन्धहरं परञ्च ॥
रसायनं वमनरेककरं गरघ्नं श्वित्रापहं गदितमत्र मयूरतुत्थम् ॥१२२॥
नील तुत्थ कुपित वात पित्तादि सम्पूर्ण दोष, विषप्रभाव, हृदय रोग, शूल, अर्श, कुष्ठ, अम्लपित्त तथा विबन्ध (मलावरोध) को नष्ट करता है। यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है। इस से वमन तथा विरेचन कर्म होते हैं और श्वेत कुष्ठ तथा विष के आक्रमण को दूर करता है ॥ १२२ ॥
अथ शोधनम्—
सस्यकं शुद्धिमाप्नोति रक्तवर्गेण भावितम् ॥ १२३ ॥
नीलतुत्थ रक्त वर्ग में कही हुई जपाकुसुमादि औषधियों के रस की भावना से शुद्ध होता है ॥ १२३ ॥
अथ मतान्तरम्—
स्नेहवर्गेण संसिक्तं सप्तवारमदूषितम् ॥
दोलायन्त्रेण सुस्विन्नं सस्यकं प्रहरत्रयम् ।
गोमहिष्याजमूत्रेषु शुद्धयते तुत्थखर्परम् ॥ १२४ ॥
अथवा नील तुत्थ को तप्त कर स्नेह वर्गोक्त घृत, तैल, वसा आदि पदार्थों में सात बार बुझा कर शुद्ध करते हैं। केवल दोलायन्त्र में ३ प्रहर तक गौ, भैंस और बक़री के मूत्र के साथ स्वेदन करने से भी नीलतुत्थ शुद्ध हो जाता है ॥ १२४ ॥
अथ तुत्थखर्परमारणम्—
लकुचद्रावगन्धाश्मटङ्कणेन समन्वितम् ।
निरुध्य मूषिकामध्ये म्रियते कौक्कुटैः पुटैः ॥ १२५ ॥
शुद्ध नीलतुत्थ को समान गन्धक और टङ्कण के साथ बड़हल के फल के स्वरस में घोट कर मूषायन्त्र में बन्ध कर के कुक्कुट पुट देने से भस्म हो जाती है॥१२५॥
अथ तुत्थसत्त्वपातनम्—
सस्यकस्य तु चूर्णं तु पादसौभाग्यसंयुतम् ।
करञ्जतैलमध्यस्थं दिनमेकं निधापयेत् ॥ १२६ ॥
अन्धमूषास्यमध्यस्थं ध्मापयेत्कोकिलत्रयम् ।
इन्द्रगोपाकृति चैव सत्त्वं भवति शोभनम् ॥ १२७ ॥
८६ रसरत्नसमुच्चये—
नीलतुत्थ चूर्ण के साथ चौथाई भाग की मात्रा में सुहागा मिला कर घोटेँ । फिर उसको करञ्ज के तैल में एक दिन तक भिगो दे । तदनन्तर उसका गोला बनाकर अन्धमूषा में बन्दकर वैर (बदरी) काष्ठ के कोयलों की अग्नि में तीन दिन तक फूंकने से इन्द्रगोप (बीर बहूटी) के समान सुन्दर लालवर्ण का सत्व प्राप्त होता है॥ १२७॥
अथ मतान्तरम्—
निम्बुद्रवालपटङ्काभ्यां मूषामध्ये निरुध्य च ।
ताम्ररूपं परिध्मातं सत्वं मुञ्चति सस्यकम् ॥ १२८ ॥
शुद्धं सस्यं शिखिक्रान्तं पूर्वभेषजसंयुतम् ।
नानाविधानयोगेन सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ १२९ ॥
अथवा नीलतुत्थ चूर्ण के साथ कुछ टङ्कण (सुहागा) मिलाकर निम्बू के रस से घोट कर गोला बनावै । पश्चात् मूषायन्त्र में बन्दकर फूंकने से ताम्र के समान लाल वर्ण का सत्व प्राप्त होता है । शुद्ध नील तुत्थ चूर्ण को सत्त्वपातन कराने वाली पूर्वोक्त औषधियों के साथ मिला कर भिन्न २ सत्त्वपातन की विधियों द्वारा अग्नि देने से सत्व प्राप्त हो जाता है ॥ १२८-१२९ ॥
अथ प्रयोगविधिः—
सत्त्वमेतत्समादाय खरभूनागसत्त्वयुक् ।
तन्मुद्रिका कृतस्पर्शा शूलघ्नी तत् क्षणाद्भवेत् ॥ १३० ॥
चराचरं विषं भूतडाकिनीदृग्गतं जयेत् ।
मुद्रिकेयं विधातव्या दृष्टप्रत्ययकारिका ॥ १३१ ॥
नील तुत्थ का सत्व, दुरालभा और केंचूए (अर्थ वर्म) का सत्व इन को मिला कर अंगूठी बनवावे । इस के स्पर्श मात्र से शीघ्र ही शूल नष्ट हो जाता है । किसी पुस्तक में खर के स्थान में कर्ष शब्द लिखा है उस मत से एक कर्ष केंचूए का सत्व लेना चाहिए, दुरालभा नहीं लेवें । इस अंगूठी के प्रभाव से स्थावर और जङ्गम विष तथा भूत, प्रेत और डाकिनियों की दृष्टि से उत्पन्न बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा यह मुद्रिका प्रत्यक्ष विश्वास पैदा कराने वाली है ॥ १३०-१३१ ॥
अथ भालुकितन्त्रोक्तप्रयोगविधिः—
रामवत्स्रोमसेनानीर्मुद्रितेऽपि तथाऽक्षरम् ।
हिमालयोत्तरे पार्श्वे अश्वकर्णो महाद्रुमः ।