रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
१४६ रसरत्नसमुच्चये—
वृष्य और अग्निदीपक है। नील को शरीर में धारण करने से पाप भी नष्ट होते हैं॥५२॥
अथ गोमेदः—गोमेदधिरुक्तिः—
गोमेदः समरागत्वान्गोमेदं रत्नमुच्यते ॥ ५३ ॥
गायके मेद के समान वर्ण होने से या रत्नों के समान वर्ण होने से गोमेद को गोमेदरत्न कहते हैं ॥ ५३ ॥
प्रशस्तगोमेदलक्षणम्—
सुस्वच्छंगोजलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं समं गुरु ।
निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा ॥ ५४ ॥
जो अत्यन्त स्वच्छ और गोमूत्र के समान कान्ति युक्त हो, स्निग्ध तथा समानाकार हो, पत्ररचना रहित, मसृण, तोल में भारी तथा प्रकाशमान हो इस तरह आठ लक्षणों वाली गोमेद शुभ होती है ॥ ५४ ॥
हेयगोमेदलक्षणम्—
विच्छायं लघु रूक्षाङ्गं चिपिटं पटलान्वितम् ।
निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम् ॥ ५५ ॥
जो गोमेद तेज रहित, लघु, स्पर्श में रूक्ष, चिपटाकार, पत्र रचना युक्त, प्रभारहित और पीले काच के समान हो वह अशुभ है ॥ ५५ ॥
अथ गुणाः—
गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षयपाण्डुक्षयङ्करम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम् ॥ ५६ ॥
गोमेद कफ, पित्त, पाण्डु, तथा क्षय को नष्ट करती है और दीपन, पाचन, रुचिवर्द्धक, बुद्धिप्रबोधक तथा चर्म हितकर है ॥ ५६ ॥
अथ क्षेपकश्लोकाः—
रत्नमारणनिषेधः—
रत्नानां शोधनं श्रेष्ठं मारणं न गुणप्रदम् ।
भस्मना वीर्यहानिः स्यात्तस्मात्तानि च शोधयेत् ॥ १ ॥
कुछ विद्वानों का मत है कि रत्नों का शोधन कर गुलाब पुष्पों के स्वरस (गुलाबजल) में घोट कर पिष्टि बनाकर प्रयोग करना चाहिए । इनकी भस्म करने से विशेष लाभ नहीं होता है अपि तु इन की भस्म बनाने से इन के प्रभाव की हानि होती है ॥ १ ॥
चतुर्थोऽध्यायः । १४७
चतुर्थोऽध्यायः । १४७
रत्नप्रयोगः— रसे रसायने दाने धारणे देवतार्चने । सुलक्ष्याणि सुजातीनि सर्वाण्युक्तानि शोधयेत् ॥ २ ॥ रत्नों का प्रयोग रस, रसायन, दान, धारण, देवताओं की पूजन में श्रेष्ठजाति और शुभलक्षणों वाले रत्नों का शोधन कर प्रयोग करना चाहिये ॥ २ ॥
रत्नानां साधारणशोधनम्— शुद्धिं चरन्ति रत्नानि निम्ब्वम्बुनि तुषाम्बुनि । विशुध्यन्ति त्रिदिवसैर्विधृतानि च सर्वशः ॥ ३ ॥ प्रायः सर्व प्रकार के रत्नों को निम्बू के स्वरस या काञ्जी में तीन दिन तक भींगों देने से वे अच्छी तरह शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥
अथ वैदूर्यम्—श्रेष्ठवैदूर्यलक्षणम्— वैदूर्यं श्यामशुभ्राभं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । अभ्रशुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभमीरितम् ॥ ५७ ॥ जो वैदूर्यमणि कालापन लिये हुए श्वेत, समानाकार, निर्मल, तौल में भारी, तेज युक्त और जिसके भीतर श्वेतरंग की रेखाएं हों वह उत्तम होती है ॥ ५७ ॥
हेयवैदूर्यलक्षणम्— श्यामं तोयसमच्छायं चिपिटं लघुकर्कशम् । रक्तगर्भोत्तरीयं च वैदूर्यं नैव शस्यते ॥ ५८ ॥ जो वैदूर्य काली, जल के समान छाया वाली ( प्रभावहीन ), चिपटी, वजन रहित, स्पर्श में खुरदरी और मध्य में जिसके लाल रेखाएं हों वह अशुभ है ॥ ५८ ॥
अथ गुणाः— वैदूर्यं रक्तपित्तघ्नं प्रज्ञायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं मलमोचनम् ॥ ५६ ॥ वैदूर्यमणि रक्तपित्त और पित्त के प्रधान ( मुख्य ) रोगों (अम्लपित्त) को शान्त करती है। बुद्धि, आयु और बल को बढ़ाती है, मलावरोध को नष्ट करती है तथा पाचकाग्नि को दीप्त करती है ॥ ५९ ॥
अथ रत्नशुद्धिः— शुद्ध्यत्यम्लेन माणिक्यं जयन्त्या मौक्तिकं तथा।
१४८ रसरत्नसमुच्चये—
विद्रुमं क्षारवर्गेण तार्क्ष्यं गोदुग्धकैस्तथा ॥ ६० ॥
पुष्परागं च सन्धानैः कुलत्थक्वाथसंयुतैः ।
तण्डुलीयजलैर्वज्रं नीलं नीलीरसेन च ।
रोचनाभिश्च गोमेदं वैदूर्यं त्रिफलाजलैः ॥ ६१ ॥
माणिक्य अम्ल(१)वर्ग के द्रव्यों के रस से, मोती जयन्तीपत्र स्वरस से, प्रवाल क्षार(२)वर्ग के पदार्थों से, पन्ना गोदुग्ध से, पुष्पराग कुलत्थ क्वाथमिश्रित काञ्जी से, हीरा कांटेदार चौलाई के रस से, नीलम नीलवृक्ष (नीलापराजिता) के रस से, गोमेद गोरोचन से, वैदूर्य त्रिफला के क्वाथ से, एक प्रहर तक दोलायन्त्र द्वारा पकाने से शुद्ध होता है ॥ ६०–६१ ॥
अथ रत्नभस्मक्रमः—
लकुचद्रावसंपिष्टैः शिलागन्धकतालकैः ।
वज्रं विनान्यरत्नानि म्रियन्तेऽष्टपुटैः खलु ॥ ६२ ॥
हीरे को छोड़कर शेष समग्र रत्नों में से प्रत्येक को समान मनःशिला, शुद्ध गंधक और हरताल के साथ मिलाकर बड़हल के रस से घोट कर मूषा में बन्द कर आठ बार फूंकने से भस्म हो जाती है ॥ ६२ ॥
अथ रत्नानां द्रावणम्—
रामठं पञ्चलवणं क्षाराणां त्रितयं तथा ।
मांसद्रवोऽम्लवेतश्च चूलिकालवणं तथा ॥ ६३ ॥
स्थुलं कुम्भीफलं पक्वं तथा ज्वालामुखी शुभा ।
द्रवन्ती च रुदन्ती च पयस्या चित्रमूलकम् ॥ ६४ ॥
दुग्धं स्नुह्यास्तथाऽर्कस्य सर्वं सम्मर्द्य यत्नतः ।
( १ ) आम्लवेतसर्जम्बीरल्लुङ्गाम्लचणकाम्लकाः ।
नागरङ्गं तिन्तिडी च विञ्चापत्रञ्च निम्बुकम् ॥
चाङ्गेरी दाड़िमञ्चैव करमर्दं तथैव च ।
एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ॥ १ ॥
( २ ) सुधापलाशशिखरीचिञ्चार्कतिलनालजाः ।
स्वर्जिका यावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥ २ ॥
चतुर्थोऽध्यायः। १४९
गोलं विधाय तन्मध्ये प्रक्षिपेत्तदनन्तरम् ॥ ६५ ॥
गुणवन्नवरत्नानि जातिमन्ति शुभानि च ।
भूर्जे तं गोलकं कृत्वा सूत्रेणावेष्ट्य यत्नतः ॥ ६६ ॥
पुनर्वस्त्रेण संवेष्ट्य दोलायन्त्रे निधाय च ।
सर्वाम्लयुक्तसन्धानपरिपूर्णघटोदरे ॥ ६७ ॥
अहोरात्रत्रयं यावत्स्वेदयेत्तीव्रवह्निना ।
तस्मादाहृत्य संक्षाल्य रत्नजां द्रुतिमाहरेत् ।
रत्नतुल्यप्रभा लघ्वी देहलोहकरी शुभा ॥ ६८ ॥
हींग, पाँचो (१) लवण (सैन्धव, सामुद्र, विड़, सौवर्चल, रोमक) तीनों (२) क्षार, (सज्जीखार, यवक्षार, सुहागा) मांसद्रव = मांसरस या अम्लवेत का भेद और अम्लवेत, नौसादर, कायफल या पक्वजैपालबीज, उत्तम कलिहारी, गोरोचन, मूषाकानी या चीरितपत्र की दन्ती, रुदन्ती, दुग्धी, चित्रकजड़, सेंहुड़ और मदार का दुग्ध इन सबको घोट कर गोला बना लेवें, फिर उस गोले में जिस रत्न की द्रुति करना हो उसको (जो कि शुभ जाति का हो, नवीन हो) रख कर बन्द कर दें, फिर गोले को भोज पत्र में रखकर धागे से अच्छी तरह बांधकर और फिर ऊपर से वस्त्र लपेटकर दोला-यन्त्र की विधि से सर्व प्रकार के अम्लवर्ग के पदार्थों के साथ तीन रात दिन तक तीव्र अग्नि से स्वेदन करें। चौथे दिन पोटली को यन्त्र से बाहर निकाल कर धो डालें और उसमें से रत्न की द्रुति को ग्रहण करें। यह रत्नद्रुति रत्नों के समान तेज वाली, लघु और शरीर की सिद्धि करने वाली तथा शुभ है ॥ ६३-६८ ॥
अथ मुक्ताद्रावणे विशेषक्रमः—
मुक्ताचूर्णं तु सप्ताहं वेतसाम्लेन मर्दितम् ।
जम्बीरोदरमध्ये तु धान्यराशौ विनिक्षिपेत् ।
( १ ) सैन्धवञ्चाथ सामुद्रं विडं सौवर्चलं तथा ।
रोमकञ्चेति विज्ञेयं बुधैर्लवणपञ्चकम् ॥
( २ ) स्वर्जिक्षारो यवक्षारः क्षारद्वयमुदाहृतम् ।
सौभाग्येन समायुक्तं क्षारत्रिकमुदाहृतम् ॥
२५० | रसरत्नसमुच्चये—
सप्ताहादुद्धृतं चैव पुटं दत्वा द्रुति हरेत् ॥ ६९ ॥
मोती चूर्ण को सात दिन तक अम्लवेत के रस से घोटकर गोला बनाकर बड़े निम्बू के बीच में चीर कर रख दें, फिर उस निम्बू को डोरे से बांधकर धान के ढेर में गाड़ दें, सात दिन के बाद जम्बीर को निकाल कर मूषायन्त्र में बन्द करके गजपुट दे देवें । फिर द्रुति ग्रहण करें ॥ ६९ ॥
वज्रद्रावणविशेषविधिः— वज्रवल्ल्यन्तरस्थं च कृत्वा वज्रं निरोधयेत् । अम्लभाण्डगतं स्वेद्यं सप्ताहाद्द्रवतां व्रजेत् ॥ ७० ॥
शुद्ध हीरे को अस्थिसंहारी (हड़जोड़) के जड़के बीच में गढ़ा (खात) कर रख दें और डोरे से अच्छी प्रकार बन्द कर दें, और दोला यन्त्र में अम्लवर्ग के पदार्थों का रस भरकर सात दिन तक स्वेदन करें तो हीरे का द्रव हो जाता है ॥ ७० ॥
अथ वैक्रान्तद्रावणे विशेषक्रमः— श्वेतवर्णं तु वैक्रान्तमम्लवेतसभावितम् । सप्ताहान्नात्र सन्देहः खरघर्मे द्रुवत्यलम् ॥ ७१ ॥
श्वेत वैक्रान्त के चूर्ण को अम्लवेत के रस की भावना देकर घोट कर तीव्र धूप में सुखावें । इस तरह सात दिन भावना देकर सुखाने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७१ ॥
अन्यविधिः— केतकीस्वरसं ग्राह्यं सैन्धवं स्वर्णपुष्पिका । इन्द्रगोपकसंयुक्तं सर्वं भाण्डे विनिक्षिपेत् । सप्ताहं स्वेदयेत्तस्मिन्वैक्रान्तं द्रवतां व्रजेत् ॥ ७२ ॥
अथवा केवड़े का स्वरस, सेंधानमक, स्वर्ण क्षीरी या कटेरी और इन्द्रगोप (वीर बहूटी) इन को पीस कर भाण्ड में भर दें फिर उसमें वैक्रान्त डालकर सात दिन तक स्वेदन करने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७२ ॥
अन्यविधिः— लोहाष्टके तथा वज्रे वापनात्स्वेदनाद्द्रुतिः । जायते नात्र सन्देहो योगस्यास्य प्रभावतः ॥ ७३ ॥ कुरुते योगराजोऽयं रत्नानां द्रावणं परम् ॥ ७४ ॥
चतुर्थोऽध्यायः । १५१
चतुर्थोऽध्यायः । १५१
इस उपर्युक्त द्रुति को लोहाष्टक (स्वर्ण, रोप्य, ताम्र, वङ्ग, सीस, पित्तल, कान्तलौह, तीक्ष्ण लोह) में या हीरे की भस्म में डालकर स्वेदन करने से उन लोहों का तथा हीरे का द्रवण हो जाता है। यह इस वैक्रान्त द्रुति का प्रभाव है और यह द्रुति अन्य रत्नों का भी द्रवण कर देती है ॥ ७३-७४ ॥
अथ राजावर्तः—उत्तममध्यमराजावर्तलक्षणम्—
राजावर्तोऽल्परक्तोरुनीलिकामिश्रितप्रभः ।
गुरुश्च मसृणः श्रेष्ठस्तदन्यो मध्यमः स्मृतः ॥ ७५ ॥
राजावर्त कुछ लाल और अधिक नीले रंग का होता है जो राजावर्त वजन में भारी और कोमल या स्निग्ध हो वह श्रेष्ठ है विपरीत मध्यम होता है ॥ ७५ ॥
अथ गुणाः—
प्रमेहक्षयदुर्नामपाण्डुश्लेष्मानिलापहः ।
दीपनः पाचनो वृष्यो राजावर्तो रसायनः ॥ ७६ ॥
यह बीस प्रकार के प्रमेह, क्षय, अर्श, पाण्डु और वात तथा कफ के विकारों को नष्ट करता है तथा दीपन, पाचन, वृष्य और रसायन होता है ॥ ७६ ॥
राजावर्तादिसामान्यशोधनम्—
निम्बुद्रवैः सगोमूत्रैः सक्षारैः स्वेदिता खलु ।
द्वित्रिवारेण शुद्ध्यन्ति राजावर्तादिधातवः ॥ ७७ ॥
निम्बूके रस में यवक्षार और गोमूत्र मिलाकर दोलायन्त्र द्वारा राजावर्त तथा अन्यधातुओं को दो या तीन वार एक २ प्रहर तक स्वेदन करने से वे शुद्ध हो जाते हैं ॥ ७७ ॥
अथ राजावर्तशोधनम्—
शिरीषपुष्पार्द्ररसैः राजावर्तं विशोधयेत् ॥ ७८ ॥
राजावर्त शिरीषपुष्प और अद्रक के स्वरस में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है ॥ ७८ ॥
अथ राजावर्तमारणम्—
लुङ्गाम्बुगन्धकोपेतो राजावर्तो विचूर्णितः ।
पुटनात्सप्तवारेण राजावर्तो मृतो भवेत् ॥ ७९ ॥
राजावर्तभस्म—राजावर्त को समान भाग गन्धक के साथ निम्बू के रस से घोटकर शराव में सम्पुटकर सात वार पुट देने से मृत हो जाता है ॥ ७९ ॥
१५२ || रसरत्नसमुच्चये—
अथ सत्त्वपातनम्—
राजावर्तस्य चूर्णन्तु कुनटी घृतमिश्रितम् ।
विपचेदायसे पात्रे महिषीक्षीरसंयुक्तम् ॥ ८० ॥
सौभाग्यपञ्चगव्येन पिण्डीबद्धन्तु जारयेत् ।
धमापितं खदिराङ्गारैः सत्त्वं मुञ्चति शोभनम् ॥ ८१ ॥
इति राजावर्ताधिकारः ।
शुद्ध राजावर्त का चूर्ण कर समान मनःशिला मिला कर घृत के साथ घोट ले, पश्चात् लौहे के पात्र ( कड़ाही ) में भैंस का दुग्ध डालकर राजावर्त को पकाना चाहिए । दुग्ध के अत्यन्त गाढ़ा होने के बाद उसमें सुहागा और पञ्चगव्य मिला-कर द्रवांश का जारण कर गोला बना लेवे पश्चात् खदिर ( खैर ) के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्त्व निकल आता है ॥ ८०–८१ ॥
अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—
कुसुम्भतैलमध्ये तु संस्थाप्या द्रुतयः पृथक् ।
तिष्ठन्ति चिरकालं तु प्राप्ते कार्ये नियोजयेत् ॥ ८२ ॥
**अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—**सब द्रुतियों को पृथक् २ काच के पात्र में कुसुम्भ का तैल डाल कर रखने से वे बहुत समय तक गुणहीन नहीं होती हैं । समय पर औषधिकार्य में उनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ८२ ॥
रत्नधारणगुणाः—
सूर्यादिग्रहनिग्रहापहरणं दार्घायुरारोग्यदं
सौभाग्योदयभाग्यवश्यविभवोत्साहप्रदं धैर्यकृत् ।
दुश्छायाचलधूलिसंगतिभवाऽलक्ष्मीहरं सर्वदा
रत्नानां परिधारणं निगदितं भूतादिभिर्नाशनम् ॥ ८३ ॥
उपर्युक्त नवरत्नों की ग्रहों के नामानुसार अङ्गूठी बनाकर धारण करने से उन ग्रहों से उत्पन्न बाधाएं दूर होती हैं और दीर्घायु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा सौभाग्य ( स्त्रीप्रियत्व ) और भाग्य का उदय होता है, वशीकरण सिद्धि की प्राप्ति होती है, ऐश्वर्य और उत्साह बढ़ता है, धैर्य प्राप्त होता है, तथा भूतप्रेतों की अशुभछाया, वायु से बहने वाली धूलि समूह से उत्पन्न अशोभा, और भूत प्रेतों की बाधा आदि उपद्रव दूर होते हैं ॥ ८३ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १५३
अथ गैरिकम्–गैरिकस्य शोधनं सत्त्वपातनञ्च— अनेन क्रमयोगेन गैरिकं विमलं भवेत् । क्रमात् पीतञ्च रक्तञ्च सत्त्वं पतति शोधनम् ॥ ८४ ॥
इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रत्नानां शुद्ध्यादिनिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इसी तरह गैरिक की शुद्धि और सत्त्वपातन भी होता है। पाषाणगैरिक का सत्त्व पीतवर्ण और स्वर्ण गैरिक का सत्त्व लाल वर्ण का होता है ॥ ८४ ॥
इति श्रीकृष्णात्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायामुपरस- साधारणरसनिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।
अथ पञ्चमोऽध्यायः ।
अथ लोहानि–लोहजातिपरिगणनम्— शुद्धं लोहं कनकरजतं भानुलोहाश्मसारम् । पूतीलोहं द्वितयमुदितं नागवङ्गाभिधानम् । मिश्रं लोहं त्रितयमुदितं पित्तलं कांस्यवर्तम् । धातुर्लोहे लुह इति मतः सोऽप्यनेकार्थवाची ॥ १ ॥
जिन खनिज धातुओं के लिये लोह शब्द का प्रयोग होता है वे लोह धातु तीन प्रकार की होती हैं, जैसे १ शुद्ध लोह, २ पूति लोह, ३ मिश्रलोह, सोना, चांदी, ताम्बा और लोहा ( मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त ) ये चार शुद्ध लोह हैं और नाग ( सीस ), वङ्ग ( राङ्गा ) ये दोनों पूती लोह हैं और पित्तल, कांसो, भरत या
१५४ रसरत्नसमुच्चये—
रूक्मलोह ये तीनों तृतीय जाति के मिश्र लोह हैं। लुह धातु को लोह अर्थ (कन-करजत के लिये) में या आकर्षण अर्थ में प्रयोग करते हैं क्योंकि सप्त या अष्ट लोह (कनकादिक) भी दोषों को खींच कर निकाल देते हैं और लोह शब्द भी अगुरूलोहित सुवर्णादि अनेक अर्थों का वाचक है ॥ १ ॥
अथ स्वर्णम्—स्वर्णभेदाः—
प्राकृतं सहजं वह्निसम्भूतं खनिसम्भवम् ।
रसेंद्रवेधसञ्जातं स्वर्णं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ २ ॥
सुवर्ण १ प्राकृत, २ सहज, ३ वह्नि से उत्पन्न, ४ खनिज से उत्पन्न, रसेन्द्र के वेध (खेदनादिक) से उत्पन्न, इस प्रकार यह पाँच तरह का होता है ॥ २ ॥
अथ प्राकृतस्वर्णस्योत्पत्तिः—
ब्रह्माण्डं संवृतं येन रजोगुणभुवा खलु ।
तत्प्राकृतमिति प्रोक्तं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३ ॥
रजोगुण से उत्पन्न हुए जिस सुवर्ण से ब्रह्माजी का आधारभूत स्वर्णमय अण्ड(१)या ब्रह्माण्ड (संसार) पैदा हुआ वह प्राकृत सुवर्ण है और वह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ ३ ॥
अथ सहजस्वर्णोत्पत्तिः—
ब्रह्मा येनाऽवृता जातः सुवर्णेन जरायुणा ।
तन्मेरुरूपतां यातं सुवर्णं सहजं हि तत् ॥ ४ ॥
जिस सुवर्ण की जरायु से वेष्टित ब्रह्माजी उत्पन्न हुये वह सुवर्ण मेरुपर्वत के रूप में परिणत हुआ, उसी को स्वाभाविक (सहज) सुवर्ण कहते हैं ॥ ४ ॥
वह्निजस्वर्णोत्पत्तिः—
विसृष्टमग्निना शवं तेजः पीतं सुदुःसहम् ।
अभूत्सर्व्वसमुद्दिष्टं सुवर्णं वाह्निसम्भवम् ॥ ५ ॥
( १ ) सोऽभिध्याय शरीरात् खात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अत एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १५५
पञ्चमोऽध्यायः । १५५
महादेवजी के वीर्य को अग्निदेवता ने पान कर असह्य होने के कारण बाहर निकाल दिया वही वह्नि से उत्पन्न सुवर्ण कहलाया ॥ ५ ॥
स्वर्णत्रयगुणाः—
एतत्स्वर्णत्रयं दिव्यं वर्णैः षोडशभिर्युतम् ।
धारणादेव तत्कुर्याच्छरीरमजरामरम् ॥ ६ ॥
ये तीनों प्रकार के सुवर्ण दिव्य शक्तियों से युक्त और सोलह कलाओं से सम्पन्न हैं, इनके केवल धारण करने से शरीर अजर अमर हो जाता है ॥ ६ ॥
खनिजस्वर्णोत्पत्तितल्लक्षणगुणाश्च—
तत्र तत्र गिरीणां हि जातं खनिषु यद्भवेत् ।
तच्चतुर्दशवर्णाढ्यं भक्षितं सर्वरोगहृत् ॥ ७ ॥
विन्ध्य सुमेरु हिमालयादि पर्वतों की खानों में उत्पन्न हुआ सुवर्ण खनिज सुवर्ण कहलाता है । वह चौदह कलाओं से युक्त होता है तथा सेवन करने से सब रोगों को नष्ट करता है ॥ ७ ॥
वेधजस्वर्णोत्पत्तिर्गुणाश्च—
रसेन्द्रवेधसम्भूतं तद्वेधजमुदाहृतम् ।
रसायनं महाश्रेष्ठं पवित्रं वेधजं हि तत् ॥ ८ ॥
पारद के वेधन कर्म से उत्पन्न सुवर्ण रसेन्द्रवेधसञ्जात सुवर्ण कहलाता है । यह रसायन है, औषध कर्म में उत्तम तथा पवित्र है ॥ ८ ॥
स्वर्णरौप्ययोःसामान्यगुणाः—
आयुर्लक्ष्मीप्रभाधीस्मृतिकरमखिलव्याधिविध्वंसि पुण्यं
भूतावेशप्रशान्तिस्मरभरसुखदं सौख्यपुष्टिप्रकाशि ।
गाङ्गेयं चाथ रूप्यं गदहरमजराकारि मेहापहारी
क्षीणानां पुष्टिकारि स्फुटमतिकरणं वीर्यवृद्धिप्रकारि ॥ ९ ॥
यह स्वर्ण आयु, शोभा, कान्ति, बुद्धि और स्मृति को उत्पन्न करता है, सम्पूर्ण व्याधियों को नष्ट करता है, पवित्र है, भूत प्रेतों के आवेश को दूर करता है, भोग शक्ति को बढाता है, सौख्य और पुष्टि करता है । गाङ्गेय सुवर्ण की तरह चांदी भी रोगों को हरती है, शरीर को अजर ( बुढापारहित ) करती है और
१५६ | रसरत्नसमुच्चये—
प्रमेह को नष्ट करती है, क्षीण पुरुषों को पुष्ट करती है, बुद्धि को स्फुट करती है और वीर्य को बढाती है ॥ ९ ॥
स्वर्णगुणाः—
स्निग्धं मेध्यं विषगदहरं बृंहणं वृष्यमग्र्यं
यक्ष्मोन्मादप्रशमनपरं देहरोगप्रमाथि ।
मेधावृद्धिस्मृतिसुखकरं सर्वदोषामयघ्नं
रुच्यं दीप्तिप्रशमितरुजं स्वादुपाकं सुवर्णम् ॥ १० ॥
सुवर्ण स्निग्ध, वृष्य, बृंहण, मेध्य है और विषबाधा को नष्ट करता है, वह्नि का दीपक, यक्ष्मा का नाशक और शरीर के रोगों का नाशक, मेधा, (स्मरण शक्ति) बुद्धि, स्मृति, सुख का उत्पादक सम्पूर्ण दोष और रोगों का नाशक, रुचिकारक है और वह्नि को दीप्तकर रोगों की शान्ति करता है तथा स्वादुपाक होता है ॥ १० ॥
अशोधितामारितस्वर्णदोषाः—
सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति रोगवर्गं करोति च ।
अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं च मारयेत् ॥ ११ ॥
अशुद्ध और विना भस्म किया हुआ सुवर्ण सेवन करने से सौख्य, वीर्य और बल का नाश होता है तथा रोग समूह को उत्पन्न करता है इसलिये प्रथम शोधन कर भस्म करना चाहिए ॥ ११ ॥
स्वर्णशोधनम्—
कर्षप्रमाणं तु सुवर्णपत्रं शरावरुद्धं पटुधातुयुक्तम् ।
अङ्गारसंस्थं प्रहरार्धमानं ध्मातेन तत्स्यान्ननु पूर्णवर्णम्॥ १२॥
एक कर्ष (एक तोला) सुवर्ण के पत्र (वर्क) में गन्धक या सेंधा नमक और गेरू समान भाग मिलाकर शराव में बन्दकर आधे प्रहर तक धोंकनी से तेज अग्नि में फूंकने से सुवर्ण शुद्ध होकर श्रेष्ठ वर्ण का हो जाता है ॥ १२ ॥
लोहमारणार्थमुत्तमद्रव्यकथनम्—
लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना ।
मूलीभिर्मध्यमं प्राहुः कनिष्ठं गन्धकादिभिः ।
अरिलोहेन लोहस्य मारणं दुर्गुणप्रदम् ॥ १३ ॥
स्वर्णादि आठ प्रकार के लोहों का पारद भस्म के साथ मारण करना श्रेष्ठ है
पञ्चमोऽध्यायः । १५७
पञ्चमोऽध्यायः । १५७
और ओषधियों के साथ धातुओं का मारण मध्यम होता है तथा गन्धक मनःशिला आदि के साथ धातुओं ( लोह ) का मारण कनिष्ठ होता है और हरताल के साथ से मारण करने से लोहों में अवगुण उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥
अथ स्वर्णमारणम्— कृत्वा कण्टकवेध्यानि स्वर्णपत्राणि लेपयेत् । लुङ्गाम्बुभस्मसूतेन म्रियते दशभिः पुटैः ॥ १४ ॥ शुद्ध किये सोने के सूई से छेदन करने लायक पत्र बनाकर निम्बू के रस में घोटे हुए पारद का मर्दनविधि से उन पर लेप कर देना चाहिये । इस तरह दस पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ १४ ॥
अन्यविधिः— द्रुते विनिक्षिपेत्स्वर्णे लोहमानं मृतं रसम् । विचूर्ण्य लुङ्गतोयेन दरदेन समन्वितम् ॥ जायते कुङ्कुमच्छायं स्वर्णं द्वादशभिः पुटैः ॥ १५ ॥ अथवा स्वर्ण को पिघला कर समान पारे की भस्म मिलाकर बिजौरे निम्बू के रस से घोटकर स्वर्ण के समान हिङ्गुल मिलाकर घोटकर १२ पुट देने से स्वर्ण की केशर के समान लाल भस्म हो जाती है ॥ १५ ॥
अन्यविधिः— हेम्नः पादं मृतं सूतं पिष्टमम्लेन केनचित् । पत्रे लिप्त्वा पुटैः पच्यादष्टभिर्म्रियते ध्रुवम् ॥ १६ ॥ अथवा सुवर्ण से चतुर्थांश पारद भस्म को किसी अम्ल में घोट कर सुवर्ण के पत्रों पर लेप कर दें, फिर पुट देवें । इस तरह आठ पुट देने से निश्चय ही सुवर्ण-भस्म हो जाती है । प्रत्येक पुट में चतुर्थांश पारद भस्म डालनी चाहिये ॥ १६ ॥
स्वर्णद्रावणम्— मण्डूकास्थिवसाटङ्कहयलालेन्द्रगोपकैः । प्रतिवापेन कनकं सुचिरं तिष्ठति द्रुतम् ॥ १७ ॥ **सुवर्णद्रुतिः—**सुवर्ण को गलाकर मेंढक की हड्डी का चूर्ण और चर्बी, सुहागा, घोड़ेकी लाला ( लार ), वीर बहूटी इनके साथ घोट कर फिर अग्नि पर फूंकने से सुवर्ण की बहुत समय तक ठहरने लायक द्रुति हो जाती है ॥ १७ ॥
१५८ रसरत्नसमुच्चये—
अन्यविधिः— चूर्णं सुरेन्द्रगोपानां देवदालीफलद्रवैः । भावितं सदृशं हेम करोति जलवद्द्रुतम् ॥ १८ ॥ अथवा इन्द्रगोप के चूर्ण को देवदाली ( बन्दाल ) के रस से भावित कर इसको सोने में मिलाकर फूंकने से वह जल के समान द्रुत हो जाता है ॥ १८ ॥
स्वर्णभस्मप्रयोगविधिः— एतद्भस्म सुवर्णजं कटुघृतोपेतं द्विगुञ्जोन्मितं लीढं हन्ति नृणां क्षयाग्निसदनं श्वासं च कासारुचिम् । ओजोधातुविवर्धनं बलकरं पाण्ड्वामयध्वंसनं पथ्यं सर्वविषापहं गरहरं दुष्टग्रहण्यादिनुत् ॥ १९ ॥ सुवर्णभस्मसेवनविधि—दो रत्ती सुवर्ण भस्म को त्रिकटु और घृत के साथ सेवन करने से मनुष्यों के श्वास, कास, अरुचि, क्षय, अग्निमांद्य, पाण्डु, सर्पविषबाधा, सर्वविषबाधा, दुष्ट ग्रहणी आदि अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं तथा ओज(१) बल और सप्त (२)धातुओं की वृद्धि होती है और यह अत्यन्त हितकर है ॥ १९ ॥
अशुद्धामारित स्वर्णदोषाः— बलं च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं कोपयतीव काये । असौख्यकारं च सदैव हेमापक्वं सदोषं मरणं करोति ॥२०॥
इति स्वर्णाधिकारः—
अशुद्धस्वर्णदोषः— अशुद्ध और उत्तमविधि से अपक्व सुवर्ण के सेवनकरने से मनुष्यों के बल-
( १ ) हृदि तिष्ठति यच्छुद्धमीषद्रक्तं सपीतकम् ।
ओजः शरीरे सङ्ख्यातं तन्नाशान्न विनश्यति ॥
अष्टबिन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् ।
अग्निषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितञ्च तत् ॥
ओजश्च तेजोधातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ।
हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् ॥
( २ ) रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः ।
पञ्चमोऽध्यायः। १५९
और वीर्य्य का हरण होता है, शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं तथा बैचेनी और मरण करता है ॥ २० ॥
अथ रजतम्—रजतभेदाः— सहजं खनिजञ्जातं कृत्रिमं त्रिविधं मतम् । रजतं पूर्वपूर्वं हि स्वगुणैरुत्तरोत्तरम् ॥ २१ ॥ चान्दी सहज, खनिज और कृत्रिम भेद करके तीन तरह की होती है । तीनों में पूर्व पूर्व की चांदी अपने २ गुणों में उत्कृष्ट होती है ॥ २१ ॥
सहजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च— कैलासाद्यद्रिसम्भूतं सहजं रजतं भवेत् । तत्स्पृष्टं हि सकृद्व्याधिनाशनं देहिनां भवेत् ॥ २२ ॥ कैलासादि पर्वत में उत्पन्न होने वाली चान्दी सहज होती है । इसके स्पर्श मात्र से मनुष्यों की व्याधियां तुरन्त नष्ट हो जाती हैं ॥ २२ ॥
खनिजरौप्योत्पत्ति गुणाश्च— हिमालयाद्रिकूटेषु यद्रूप्यं जायते हि तत् । खनिजं कथ्यते तज्ज्ञैः परमं हि रसायनम् ॥ २३ ॥ हिमालय आदि पर्वतों के शिखरों की खानों से उत्पन्न चान्दी को विद्वान् लोग खनिज चान्दी कहते हैं और वह उत्तम रसायन है ॥ २३ ॥
कृत्रिमरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च— श्रीरामपाडुकान्यस्तं वङ्गं यद्रूप्यतां गतम् । तत्पादरूप्यमित्युक्तं कृत्रिमं सर्वरोगनुत् ॥ २४ ॥ श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के स्पर्श से जो वङ्ग चान्दी के रूप में परिणत हुआ उसको रामचन्द्रजी के चरण की कृत्रिम चान्दी कहते हैं। यह सर्वरोगों को नष्ट करती है॥२४॥
उत्तमरौप्यलक्षणम्— घनं स्वच्छं गुरु स्निग्धं दोहे छेदे सितं मृदु । शङ्खाभं मसृणं स्फोटरहितं रजतं शुभम् ॥ २५ ॥ श्रेष्ठ रजत के लक्षण—जो चान्दी वजनदार, खच्छ, भारी, स्निग्ध जलाने और काटने पर श्वेत, कोमल, मसृण, शङ्ख के समान और खातों से रहित हो वह औषधि में श्रेष्ठ है ॥ २५ ॥
१६० रसरत्नसमुच्चये—
निकृष्टरौप्यलक्षणम्—
दाहे रक्तं च पीतं च कृष्णं रूक्षं स्फुटं लघु ।
स्थूलाङ्गं कर्कशाङ्गं च रजतं त्याज्यमष्टधा ॥ २६ ॥
जो चान्दी तपाने से लाल, पीत और कृष्ण मालूम हो तथा रूक्ष, हलकी, खात युक्त, मोटे अङ्ग वाली और कठोर हो वह त्याज्य है ॥ २६ ॥
अथ रौप्यगुणाः—
रूप्यं विपाकमधुरं तुवराम्लसारं
शीतं सरं परमलेखनकं च रूप्यम् ।
स्निग्धं च वातकफजिज्जठराग्निदीपि
वल्यं परं स्थिरवयस्करणञ्च मेध्यम् ॥ २७ ॥
चांदी के गुण—
चांदी पाक में मधुर, कषाय, अम्लरस वाली और शीतल, दस्तावर, शरीर के भेद को नष्ट करने वाली, स्निग्ध वात और कफ के रोग को नष्ट करने वाली, जठराग्नि की दीपक, बलदायक, अत्यन्त बुद्धिवर्द्धक और अवस्था बढ़ाने वाली होती है ॥ २७ ॥
अथ गुणान्तरम्—
रौप्यं शीतं कषायाम्लं स्निग्धं वातहरं गुरु ।
रसायनविधानेन सर्वरोगापहारकम् ॥ २८ ॥
चान्दी शीतल, कषाय, अम्ल, स्निग्ध, वातहर, गुरु और रसायन विधि से सब रोगों का नाश करने वाली है ॥ २८ ॥
स्वर्णादिशोधनम्—
तैले तक्रे गवां मूत्रे ह्यारनाले कुलत्थजे ।
क्रमात्तन्निषेचयेत्तप्तं द्रावे द्रावे तु सप्तधा ॥
स्वर्णादिलोहपत्राणां शुद्धिरेषा प्रशस्यते ॥ २९ ॥
स्वर्णादि-लोह पत्रों को प्रतप्त कर तिलतैल, मट्ठा, गोमूत्र, काञ्जी, कुलत्थक्वाथ इन में से प्रत्येक में सात २ वार बुझाना चाहिए । इस तरह सोना और चान्दी के पत्रों की शुद्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २९ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १६१
पञ्चमोऽध्यायः । १६१
अथाशोधितमारितलोहस्य दोषाः— आयुः शुक्रं बलं हन्ति तापविड्बन्धरोगकृत् । अशुद्धं न मृतं तारं शुद्धं मार्यमतोबुधैः ॥ ३० ॥ अशुद्ध और भस्म न की हुई चान्दी अवस्था, बल तथा शुक्र को नष्ट करती है और मलावरोध, जलन आदि रोग पैदा करती है, इसलिये विद्वानों को चाहिये कि चांदी को शुद्ध कर भस्म करें ॥ ३० ॥
अथ रौप्यस्य विशेषशोधनम्— नागेन टङ्कणेनैव वापितं शुद्धिमृच्छति । तारं त्रिवारं निक्षिप्तं तैले ज्योतिष्मतीभवे ॥ ३१ ॥ चांदी को समान सीस भस्म और सुहागे के साथ पीसकर प्रतप्त कर के ज्योतिष्मती ( मालकांगनी ) के तैल में तीन बार बुझाने से इसकी शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥
अन्यविधिः— खर्परे भस्मचूर्णाभ्यां परितः पालिकां चरेत् । तत्र रूप्यं विनिक्षिप्य समसीससमन्वितम् ॥ ३२ ॥ जातसीसक्षयं यावद्धमेत्तावत्पुनः पुनः । इत्थं संशोधितं रूप्यं योजनीयं रसादिषु ॥ ३३ ॥ अथवा किसी मिट्टी के पात्र में भस्म (राख) और सुहागे के चूर्ण का आलवाल (क्यारी) बनाकर उसमें समान सीसभस्म और सुहागे के साथ पिसी हुई चांदी को रखकर धौंकनी से चांदी में सीसभस्म नहीं मिले तब तक धमन करना चाहिये इस तरह शुद्ध हुई चांदी का सब कार्यों में प्रयोग करना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥
अथ रौप्यमारणम्— लकुचद्रवसूताभ्यां तारपत्रं प्रलेपयेत् । ऊर्ध्वाधो गन्धकं दत्त्वा मूषामध्ये निरुध्य च ॥ ३४ ॥ स्वेदयेद्वालुकायन्त्रे दिनमेकं दृढाग्निना । स्वाङ्गशीतां च तां पिष्टिं साम्लतालेन मर्दिताम् । पुटेद्द्वादशवाराणि भस्मीभवति रूप्यकम् ॥ ३५ ॥ बड़हल वृक्ष के फल के रस में पारद को घोटकर चांदी के पत्रों पर मर्दन-विधि से लेप कर के ऊपर और नीचे गन्धक का चूर्ण रखकर मूषा यन्त्र
रस० ११
१६२ | रसरत्नसमुच्चये—
में बन्दकर दें फिर कपड़मिट्टीकर वालुकायन्त्र द्वारा तीव्र अग्नि में एक दिन तक पकावें। साङ्ग शीत होने पर चांदीके पत्रों को निकाल कर घोट लें फिर उसमें समान शुद्ध हरताल डालकर निम्बू के रस में घोट कर सम्पुट में रख फूंक दे, इस तरह १२ पुट देने से चांदी की भस्म हो जाती है ॥ ३४-३५ ॥
अन्यविधिः— माक्षीकचूर्णलुङ्गाम्लमर्दितं पुटितं शनैः । त्रिंशद्वारेण तत्त तारं भस्मसाज्जायतेतराम् ॥ ३६ ॥
अथवा चांदी का चूर्ण और समान शुद्ध सुवर्णमाक्षिक चूर्ण इन दोनों को निम्बूके रस में घोट कर सम्पुट कर के ३० पुट देने सेउत्तम भस्म हो जाती है॥३६॥
रौप्यस्यनिरुत्थभस्मीकरणम्— भाव्यं ताप्यं स्नुहीक्षीरैस्तारपत्राणि लेपयेत् । मारयेत्पुटयोगेन निरुत्थं जायते ध्रुवम् ॥ ३७ ॥
अथवा थूहर के दुग्ध से सोनामाखी को पीसकर चांदी के पत्रों पर लेप कर दें फिर पुट के विधान से फूंकने पर चांदी की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥३७॥
अन्यविधिः— तारपत्रं चतुर्भागं भागैकं शुद्धतालकम् । मद्यं जम्बीरजद्रावैस्तारपत्राणि लेपयेत् ॥ ३८ ॥ शोधयेदन्धयन्त्रे च त्रिंशदुत्पलकैः पचेत् । चतुर्दशपुटैरेवं निरुत्थं जायते ध्रुवम् ॥ ३९ ॥
अथवा चार भाग चांदी के पत्रों पर एक भाग शुद्ध हरताल को जम्बीर के रस से घोट कर लेप कर दें, फिर उन्हें अन्धमूषा में रख कर तीस उपलों की आंच में पुट देवे, इस तरह १४ पुट देने से निश्चय ही चांदी की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ ३८-३९ ॥
स्वर्णरौप्ययोर्द्रवणम्— सप्तधा नरमूत्रेण भावयेद्देवदालिकाम् । तच्चूर्णावापमात्रेण द्रुतिः स्यात्स्वर्णतारयोः ॥ ४० ॥
**सुवर्णरजतद्रुतिः—**देवदाली (वन्दाल) को मनुष्य के मूत्र में सात वार घोट कर अग्नि में पिघले सुवर्ण या रजत के अन्दर डालने से दोनों की द्रुति हो जाती है ॥ ४० ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १६३
पञ्चमोऽध्यायः । १६३
अथ रौप्यप्रयोगः—
भस्मीभूतं रजतममलं तत्समौ व्योमभानू
सर्वैस्तुल्यं त्रिकटु सवरं सारघाज्येन युक्तम् ॥
लीढं प्रातः क्षपयतितरां यक्ष्मपाण्डूदराशः
श्वासं कासं नयनजरुजः पित्तरोगानशेषान् ॥ ४१ ॥
इति रजताधिकारः ।
रजतभस्म, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म इन तीनों को समान समान भाग की मात्रा में लेकर तीनों के बराबर त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पिप्पल) का चूर्ण लेकर घोट लें, पश्चात् इस योग में से उचित मात्रा (दो रत्ती) लेकर शहद और घृत के साथ प्रातः सेवन करने से यक्ष्मा, पाण्डु, अर्श, श्वास, कास, नेत्रविकार तथा समग्र पित्तजन्य रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ४१ ॥
अथ ताम्रम्—
ताम्रभेदाः—
म्लेच्छं नेपालकं चेति तयोर्नेपालकं वरम् ।
नेपालादन्यखन्युत्थं म्लेच्छमित्यभिधीयते ॥ ४२ ॥
ताम्र के म्लेच्छ और नेपाल ये दो भेद हैं। इन दोनों में नेपाल संज्ञक ताम्र श्रेष्ठ होता है। नेपाल देश की खानों के अतिरिक्त जिन खानों से ताम्र निकलता है वह म्लेच्छ कहलाता है ॥ ४२ ॥
अथ म्लेच्छताम्रस्य लक्षणम्—
सितकृष्णारुणच्छायमतिवामि कठोरकम् ।
क्षालितं च पुनः कृष्णमेतन्म्लेच्छकताम्रकम् ॥ ४३ ॥
जो ताम्र श्वेत, कृष्ण तथा कुछ लाल हो और अत्यन्त वमन कारक तथा कठोर हो और खूब धोने पर भी काला ही रहे वह म्लेच्छ ताम्र है ॥ ४३ ॥
अथ नेपालताम्रलक्षणम्—
सुस्निग्धं मृदुलं शोणं घनाघातक्षमं गुरु ।
निर्विकारं गुणश्रेष्ठं ताम्रं नेपालमुच्यते ॥ ४४ ॥
जो ताम्र स्निग्ध, कोमल, लालवर्ण, भारी, चोट मारने पर चूर्ण न होकर
१६४ रसरत्नसमुच्चये—
बड़ता हो, वह नेपाल संज्ञक ताम्र है। यह वमनादि विकारों से रहित तथा औषध कार्य में श्रेष्ठ होता है ॥ ४४ ॥
अथ रसकर्मानर्हताम्रलक्षणम्—
पाण्डुरं कृष्णशोणं च लघुस्फुटनसंयुतम् ।
रूक्षाङ्गं सदलं ताम्रं नेष्यते रसकर्मणि ॥ ४५ ॥
जो ताम्र पाण्डुर (श्वेतपीतवर्णमिश्रित), लालिमा लिये हुए काला, वजन में हलका, पीटने से चूर्ण होने वाला और रूक्षस्पर्शवाला तथा पत्रों की रचना-युक्त हो वह रस क्रिया में वर्जित है ॥ ४५ ॥
अथ गुणा:—
ताम्रं तिक्तकषायकं च मधुरं पाकेऽथ वीर्य्योष्णकं
साम्लं पित्तकफापहं जठररुक्कुष्ठामजन्तवन्तकृत् ॥
ऊर्ध्वाधः परिशोधनं विषयकृत् स्थौल्यापहं क्षुत्करं
दुर्नामक्षयपाण्डुरोगशमनं नेत्र्यं परं लेखनम् ॥ ४६ ॥
ताम्र तीता, कसैला, पाक होने पर मधुर, उष्णवीर्य्य, स्वाद में अम्ल, पित्त और कफ का नाशक, और उदरव्याधि, कुष्ठ, आमदोष, कृमिसमूह, स्थौल्य, अर्श, क्षय, पाण्डु इन रोगों को नष्ट करता है और नेत्रों के लिये हितकर, शरीर की मेदा का नाशक, भूख को बढानेवाला, ऊर्ध्व और अधः शरीर के भागों का (वमन तथा विरेचन द्वारा) शोधक और विष बाधा तथा यकृत् वृद्धि को दूर करता है॥४६॥
अथ ताम्रस्य दोषाः—
अशुद्धं ताम्रमायुघ्नं कान्तिवीर्य्यबलापहम् ।
वान्तिमूर्च्छाभ्रमोत्क्लेदं कुष्ठं शूलं करोति तत् ॥ ४७ ॥
उत्क्लेदभेदभ्रमदाहमोहास्ताम्रस्य दोषाः खलु दुर्धरास्ते ।
विशोधनात्तद्विगतस्त्रदोषं सुधासमंस्याद्रसवीर्यपाके ॥४८॥
अशुद्ध ताम्र आयुको नष्ट करता है तथा शरीर के बल, वीर्य्य और कान्ति को नष्ट करता है तथा वमन, मूर्च्छा, भ्रम, उत्क्लेद (चित्तग्लानि), कुष्ठ तथा शूल को उत्पन्न करता है किन्तु शुद्ध कर मृत ताम्र से उपर्युक्त दोष नहीं होते हैं । तथा और भी ताम्र के उत्क्लेद, भेद, भ्रम, जलन, मूर्च्छा ये दोष हैं जोकि बहुत प्रय-त्न से दूर किये जाते हैं। यथाविधि शोधन करने से ताम्र सर्वदोषों से रहित होकर रस वीर्य और विपाक में अमृत के समान गुण करता है ॥ ४७–४८ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । | १६५
अथ ताम्रशुद्धिः—
ताम्रं क्षाराम्लसंयुक्तं द्रावितं दत्तगैरिकम् ।
निक्षिप्तं महिषीतक्रे छागणे सप्तवारकम् ।
पञ्चदोषविनिर्मुक्तं भस्मयोग्यं हि जायते ॥ ४९ ॥
ताम्र के अन्दर यवक्षार, काञ्जी या निम्बूरस और गैरिक मिला कर घोटें फिर उसे उपलों की अग्नि में द्रवित कर भैंस की तक्र ( मट्ठा ) में बुझावें । इस तरह सात बार द्रवकर बुझाने से पञ्चदोष ( उत्क्लेशभेदभ्रमदाहमोहाः ) से रहित भस्म हो जाती है ॥ ४९ ॥
मतान्तरम्—
ताम्रनिर्मलपत्राणि लिप्त्वा निम्ब्वम्बुसिन्धुना ।
ध्मात्वा सौवीरकक्षेपाद्विशुध्यत्यष्टवारतः ॥ ५० ॥
अथवा शुद्ध ताम्र के पत्रों पर निम्बू के रस में नीमक पीसकर लेप कर दें पश्चात् उन्हें प्रतप्त कर निर्गुण्डी (मेउड़ी) के स्वरस या क्वाथ में बुझावें, इस तरह आठ बार बुझाने से शुद्धि हो जाती है ॥ ५० ॥
मतान्तरम्—
निम्ब्वम्बुपटुलिप्तानि तापितान्यष्टवारकम् ।
विशुद्ध्यन्त्यर्कपत्राणि निर्गुण्ड्या रसमज्जनात् ॥ ५१ ॥
अथवा ताम्र के स्वच्छ पत्रों पर निम्बूरस से पिष्टलवण का लेप करके प्रतप्त कर उन्हें निर्गुण्डी के रस में बुझावें, इस तरह आठ बार करने से उनकी शुद्धि होती है ॥ ५१ ॥
मतान्तरम्—
गोमूत्रेण पचेद्यामं ताम्रपत्रं दृढाग्निना ।
शुद्ध्यते नात्र सन्देहो मारणं चाप्यथोच्यते ॥ ५२ ॥
अथवा ताम्र पत्रों को गोमूत्र में डालकर तीव्र अग्नि पर एक प्रहर तक पकाने से निश्चय ही वे शुद्ध हो जाते हैं, अब आगे ताम्र मारण बतलाते हैं ॥ ५२ ॥
ताम्रभस्म—
जम्बीररससम्पिष्टरसगन्धकलेपितम् ।
शुल्वपत्रं शरावस्थं त्रिपुटैर्याति पञ्चताम् ॥ ५३ ॥