भारतकोश
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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पञ्चमोऽध्यायः । १६७

कज्जलीं ताम्रपत्राणि पर्यायेण विनिक्षिपेत् ।
प्रपंचेद्यामपर्यन्तं स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ॥ ६० ॥

पारद से द्विगुण ताम्रपत्र लेकर दोनों को घृतकुमारी के रस से घोटकर एक हण्डिका में ताम्र के वरावर गन्धक डालकर उस गन्धक के बीच में ताम्र पत्र रख दें पश्चात् एक सकोरे से उस ताम्र को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्दकर हण्डी के शेष भाग को नमक से भरकर हण्डिका का मुख दूसरे सकोरे से कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर दें पश्चात् चूल्हे पर चार प्रहर तक पकाके निकाल कर ताम्र का चूर्ण कर लें । इस चूर्ण को पिप्पली और शहद के साथ एक रत्ती की मात्रा से सब रोगों के लिये प्रयोग करें ॥ ५८-६० ॥

ताम्रभस्मगुणाः—
तत्तद्रोगहरानुपानसहितं ताम्रं द्विवल्लोन्मितं
संलीढं परिणामशूलमुदरं शूलं च पाण्डुज्वरम् ।
गुल्मप्लीहयकृत्क्षयाग्निसदनं मेहं च मूलामयं
दुष्टां च ग्रहणीं हरेद् ध्रुवमिदं श्रीसोमनाथाभिधम् ॥ ६१ ॥

इति ताम्राधिकारः ।

**ताम्रभस्म के गुण—**यह भस्म श्वास, कास, क्षय, पाण्डु, मन्दाग्नि, अग्निमांद्य, अरुचि, गुल्म, प्लीह, यकृत्, मूर्च्छा, शूल, परिणामशूल सप्तधातुगत ज्वर और वातादिदोषत्रय प्रकोप से उत्पन्न समस्त रोगों को अनुकूल अनुपान के साथ सेवन करने से नष्ट करती है तथा रस और रसायन कार्य के लिये भी उचित मात्रा से ताम्र का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥

ग्रन्थान्तरोक्तताम्रप्रयोगः—
सूताद् द्विगुणितं ताम्रपत्रं कन्यारसैः प्लुतम् ।
पिष्ट्वा तुल्येन बलिना भाण्डमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ ६२ ॥
छन्नं शरावकेणैतत्तदूर्ध्वं लवणं त्यजेत् ।
मुखे शरावकं दत्त्वा वह्निं यामचतुष्टयम् ॥ ६३ ॥
अवचूर्ण्यैव तच्छुल्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् ।
पिप्पलीमधुना सार्धं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥
श्वासं कासं क्षयं पाण्डुमग्निमांद्यमरोचकम् ।

१६८

रसरत्नसमुच्चये-

गुल्मप्लीहयकृन्मूर्च्छाशूलपक्त्यर्थमुत्तमम् ॥ ६५ ॥
दोषत्रयसमुद्भूतानामयाञ्जयति ध्रुवम् ।
रोगानुपानसहितं जयेद्धातुगतं ज्वरम् ।
रसे रसायने ताम्रं योजयेद्युक्तमात्रया ॥ ६६ ॥

ताम्र के बराबर पारद और उतना ही गन्धक तथा ताम्र की आधी हरताल और हरताल की आधी मनःशिला इन चारों की उत्तम कजली वना कर एक शराव में नीचे आधी कजली रखकर ताम्र पत्र रख दे तथा ऊपर से फिर कज्जली रख-कर गर्भयन्त्र के अन्दर एक प्रहर तक पकावैं । स्वाङ्गशीत होने पर पक्व ताम्र निकाल कर चूर्ण करलें । इस विधि से बनी हुई ताम्रभस्म को सोमनाथोक्तताम्रभस्म कहते हैं । इसके सेवन के गुण-इस भस्म को भिन्न २ रोगहरण करने वाले अनु-पानों के साथ दो रत्ती की मात्रा के रूप में सेवन करने से परिणामशूल, उदररोग (जलोदर) पाण्डु, ज्वर, गुल्म, प्लीह, यकृत, वृद्धि, क्षय, मन्दाग्नि, प्रमेह, अर्श और दुष्टसंग्रहणी रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ६२-६६ ॥

अथ लौहम्-
लौहभेदाः-
मुण्डं तीक्ष्णं च कान्तं च त्रिप्रकारमयः स्मृतम् ॥ ६७ ॥
मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त, इन भेदों से लौह तीन प्रकार का होता है ॥ ६७ ॥

मुण्डलौहभेदाः-
मृदु कुण्ठं कडारं च त्रिविधं मुण्डमुच्यते ॥ ६८ ॥
मुण्डलौह भी तीन प्रकार का है यथा-मृदु, कुण्ठ, कडार ॥ ६८ ॥

मृदुमुण्डलक्षणम्-
द्रुतद्रावमविस्फोटं चिकणं मृदु तच्छुभम् ॥ ६९ ॥
जो लौह अग्नि में तपाने से शीघ्र गल जाय और हथौड़े या घन से पीटने पर चूर्ण होकर विखरे नहीं तथा मृदु और कोमल हो उसको मृदुलौह कहते हैं॥६९॥

कुण्ठमुण्डलक्षणम्-
हतं यत्प्रसरेद् दुःखात्तत्कुण्ठं मध्यमं स्मृतम् ॥ ७० ॥
जो लौह घन से पीटने पर बहुत देर में कठिनता से बढ़े या चूर्ण हो जाय उसको कुण्ठ लौह कहते हैं । यह मध्यम होता है ॥ ७० ॥

पञ्चमोऽध्यायः। १६९

कडारमुण्डलक्षणम्—

यद्धतं भज्यते भङ्गे कृष्णं स्यात्तत्कडारकम् ॥ ७१ ॥
जो लौह घन से पीटने पर जल्दी चूर्ण हो जाय और तोड़ने पर भीतर से काले रंग का हो वह कडारक लौह कहलाता है ॥ ७१ ॥

मुण्डगुणाः—

मुण्डं परं मृदुलकं कफवातशूलमूलाममेहगदकामलपाण्डुहारि ।
गुल्मामवातजठरार्तिहरं प्रदीपं शोफापहं रुधिरकृत्खलु कोष्ठशोधि ॥ ७२ ॥
मुण्ड लौह के तीन भेदों में जो अत्यन्त मृदु लौह होता है वह कफ, वात, शूल, अर्श या शिरो रोग, आम, प्रमेह, कामला, पाण्डु, गुल्म, आमवात, उदर-रोग, शोथ इन रोगों को नष्ट करता है, जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, रुधिर को बढ़ाता है और कोष्ठ की शुद्धि करता है ॥ ७२ ॥

अथाशुद्धलौहस्य दोषाः—

अशुद्धलोहं न हितं निषेवणादायुर्बलं कान्तिविनाशि निश्चितम् ॥
हृदि प्रपीडां तनुते ह्यपाटवं रुजं करोत्येव विशोध्य मारयेत् ॥ ७३ ॥
अशुद्ध लौह सेवन करना अहितकर है। इसके सेवन से आयु, बल और कान्ति नष्ट होती है। यह हृदय में अत्यन्त वेदना और रोग तथा शरीर में शिथिलता उत्पन्न करता है इसलिये इसको शुद्ध कर के पश्चात् इसकी भस्म करनी चाहिये ॥ ७३ ॥

अथ तीक्ष्णलौहम्—

तीक्ष्णलौहभेदाः—

खरं सारं च हृन्नालं तारावट्टं च वाजिरम् ।
काललोहाभिधानं च षड्विधं तीक्ष्णमुच्यते ॥ ७४ ॥
खर, सार, हृन्नाल, तारावट्ट, वाजिर और काललौह ये तीक्ष्ण लौह के छ भेद हैं ॥ ७४ ॥

खरलोहलक्षणम्—

परुषं पोगरोन्मुक्तं भङ्गे पारदवच्छवि ।
नमने भङ्गुरं यत्तत्खरलोहमुदाहृतम् ॥ ७५ ॥
जो लौह कठोर, तरङ्गसदृश रेखाओं से रहित तथा तोड़ने पर पारद के समान चमकदार तथा मोड़ने से भङ्गुर हो वह खर लौह कहलाता है ॥ ७५ ॥

१७० | रसरत्नसमुच्चये—

सारलौहलक्षणम्—

वेगभङ्गुरधारं यत्सारलोहं तदीरितम् ।
पोगराभासकं पाण्डुभूमिजं सारमुच्यते ॥ ७६ ॥

जिस लौह की धार प्रबल आघात से टूट या मुड़ जाय उसे सार लौह कहते हैं। इसमें टेढ़ी रेखाएं स्पष्ट प्रतीत होती हैं तथा यह पीली भूमि से उत्पन्न होता है ॥७६॥

हृन्नाललौहलक्षणम्—

कृष्णपाण्डुवपुश्चञ्चुबीजतुल्लोरुपोगरम् ।
छेदने चातिपरुषं हृन्नालमिति कथ्यते ॥ ७७ ॥

जो लौह कुछ अथवा पूर्ण कृष्णता लिये पाण्डुवर्ण का हो तथा एरण्ड (रेड़ी) के बीज के छिलके की रेखाओं के समान स्पष्ट रेखाओं से युक्त हो और तोड़ने पर अत्यन्त कठिन हो उसको हृन्नाल लौह कहते हैं ॥ ७७ ॥

सपर्यायपोगरलक्षणम्—

अङ्गक्षया च वङ्गं च पोगरस्याभिधात्रयम् ।
चिकुरं भङ्गुरं लोहात्पोगरं तत्परं मतम् ॥ ७८ ॥

उपर्युक्त पोगर के अङ्ग, क्षय (छाया) और वङ्ग ये तीन पर्याय वाचक शब्द हैं। लौह में पोगर टूटने वाला और चमकदार होता है ॥ ७८ ॥

वाजीरलौहलक्षणम्—

पोगरैर्वज्रसङ्काशैः सूक्ष्मरेखैश्च सान्द्रकैः ।
निचितं श्यामलाङ्गं च वाजीरं तत्प्रकीर्त्यते ॥ ७९ ॥

जिस लौह में पोगर वज्र के समान कठिन, चमकदार और सान्द्र (अत्यन्त मिली हुई) छोटी २ रेखाओं से युक्त हो और जिसका वर्ण श्याम हो उसको वाजीर लौह कहते हैं ॥ ७९ ॥

काललौहलक्षणम्—

नीलकृष्णप्रभं सान्द्रं मसृणं गुरु भासुरम् ।
लोहाघातेऽप्यभङ्गात्मधारं कालायसं मतम् ॥ ८० ॥

जो लौह नीलिमा लिये काले वर्ण का हो तथा भारी, चिकना, कान्ति युक्त और लौह के घन के आघात से भी जिसकी धार न टूटे उसको काल लौह कहते हैं ॥ ८० ॥

पञ्चमोऽध्यायः । १७१

खरलौहगुणाः— रूक्षं स्यात्खरलोहकं समधुरं पाकेऽथ वीर्ये हिमं तिक्तोष्णं कफपित्तकुष्ठजठरप्लीहामपाण्ड्वर्तिनुत् ॥ सद्यः शूलयकृद्गदक्षयजरामेहामवातापहं दीप्तं चातिरसायनं बलकरं दुर्नामदाहापहम् ॥ ८१ ॥

खर लौह के गुण—यह रूक्ष, पाक में मधुर, शीतवीर्य, तिक्त और उष्ण होता है तथा कफ, पित्त, कुष्ठ, उदररोग, प्लीहा, आन, पाण्डु, शूल, यकृत, राजयक्ष्मा, जरा, प्रमेह, आमवात, अर्श और दाह को नष्ट करता है तथा यह अत्यन्त रसायन, अग्नि दीपक और बल कारक होता है ॥ ८१ ॥

अन्यसारादितीक्ष्णलौहगुणाः— खरलोहात्परं सर्वमेकैकस्माच्छतोत्तरम् ॥ ८२ ॥

तीक्ष्ण लौह के अन्यभेद खरसंज्ञक लौह की अपेक्षा क्रमशः सौ सौ गुना अधिक गुणप्रद होते हैं ॥ ८२ ॥

कान्तलौहभेदाः— भ्रामकं चुम्बकं चैव कर्षकं द्रावकं तथा । एवं चतुर्विधं कान्तं रोमक़ान्तं च पञ्चमम् ॥ ८३ ॥ एकद्वित्रिचतुष्पञ्चसर्वतोमुखमेव तत् । पीतं कृष्णं तथा रक्तं त्रिवर्णं स्यात्पृथक् पृथक् । क्रमेण देवतास्तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ ८४ ॥

भ्रामक, चुम्बक, कर्षक, द्रावक ये कान्तलोहे के चार भेद हैं तथा पांचवां भेद रोमक है। किसी के एक मुख, किसी के दो मुख, किसी के तीन मुख और किसी के चार तथा पाँच मुख होते हैं और किसी के सबमुख होते हैं। इस तरह मुखभेद से कान्त लौह के छ भेद हैं और प्रत्येक पीत, कृष्ण, रक्त वर्ण भेद से तीन तीन तरह का होता है और क्रम से पीत वर्ण के लौह के ब्रह्मा, कृष्णवर्ण लोहे के विष्णु और रक्तवर्ण लोहे के महेश्वर अधिष्ठातृ देवता हैं ॥ ८३-८४ ॥

वर्णानुसारकार्यभेदाः— स्पर्शवेधि भवेत्पीतं कृष्णं श्रेष्ठं रसायने । रक्तवर्णं तथा चापि रसबन्धे प्रशस्यते ॥ ८५ ॥

१७२ रसरत्नसमुच्चये-

पीतवर्ण का लौह स्पर्शमात्र से पारद का वेधाख्यसंस्कार कर देता है तथा रसायन में कृष्णवर्ण का लौह श्रेष्ठ है और रक्तवर्ण का कान्त लौह पारद के बन्धन में श्रेष्ठ है ॥ ८५ ॥

अधमादिकथनम्—

भ्रामकं तु कनिष्ठं स्याच्चुम्बकं मध्यमं तथा ।
उत्तमं कर्षकं चैव द्रावकं चोत्तमोत्तमम् ॥ ८६ ॥

ऊपर कहे हुए कान्त लौह के भेदों में भ्रामकसंज्ञक लौह औषध कर्म में कनिष्ठ ( त्याज्य ) है, चुम्बक मध्यम है, कर्षक उत्तम है तथा द्रावक संज्ञक कान्त लौह सर्वोत्तम कहा गया है ॥ ८६ ॥

भ्रामककान्तलक्षणम्—

भ्रामयेल्लोहजातं यत्तत्कान्तं भ्रामकं मतम् ॥ ८७ ॥

जो लौह अपने प्रभाव से अन्य लौह समूह को भ्रमाता ( चञ्चल या गति-युक्त करता ) है उसे भ्रामककान्त लौह कहते हैं ॥ ८७ ॥

चुम्बककर्षकलक्षणम्—

चुम्बयेच्चुम्बकं कान्तं कर्षयेत्कर्षकं तथा ॥ ८८ ॥

जो अपने प्रभाव से अन्य लौह को खींचकर चुम्बित कर लेता है वह चुम्बक कहा जाता है और जो केवल अन्य लौह को अपनी ओर खींचता है उसे कर्षक कहते हैं ॥ ८८ ॥

द्रावककान्तलक्षणम्—

साक्षाद्यद्द्ावयेल्लोहं तत्कान्तं द्रावकं भवेत् ॥ ८९ ॥

और जो अपने संयोगसे अन्य लौह को द्रवित कर देता है उस कान्त लौह को द्रावक कहते हैं ॥ ८९ ॥

रोमकान्तलक्षणम्—

तद्रोमकान्तं स्फुटिताद्यतो रोमोद्गमो भवेत् ॥ ९० ॥

तथा जिस कान्त लौह के तोड़ने पर बालों के समान रेखाओं का अविर्भाव हो वह रोमकान्त कहलाता है ॥ ९० ॥

मुखभेदेन श्रेष्ठाश्रेष्ठत्वकथनम्—

कनिष्ठं स्यादेकमुखं मध्यं द्वित्रिमुखं भवेत् ।
चतुष्पञ्चमुखं श्रेष्ठमुत्तमं सर्वतोमुखम् ॥ ९१ ॥

. पञ्चमोऽध्यायः । १७३

जिस कान्त लौह में एक मुख हो वह कनिष्ठ है। दो या तीन मुखवाला मध्यम, चार और पाँच मुखोंवाला उत्तम और सर्वमुख वाला अत्यन्त उत्तम है ॥९१॥

भ्रामकादिलौहकार्यनिर्देशः—

भ्रामकं चुम्बकं चैव व्याधिनाशे प्रशस्यते ।
रसे रसायने चैव कर्षकं द्रावकं हितम् ॥ ९२ ॥

भ्रामक और चुम्बक कान्त लौह व्याधिविनाश के लिये प्रशस्त हैं तथा रसायन के लिये कर्षक और द्रावक हितकर है ॥ ९२ ॥

रसक्रमेण कान्तस्य विशेषता—

मदोन्मत्तगजः सूतः कान्तमङ्कुशमुच्यते ॥ ९३ ॥

जिस तरह मदोन्मत्त हस्ती को अङ्कुश वश में कर लेता है उसी तरह चापल्यादि मदोन्मत्त पारद के बन्धन के लिये कान्त लौह एक तरह का अङ्कुश है, अर्थात् इससे पारद का बन्धन हो जाता है ॥ ९३ ॥

कान्तलौहस्य ग्राह्याग्राह्यनिर्देशः—

क्षेत्रं ज्ञात्वा गृहीतव्यं तत्प्रयत्नेन धीमता ।
मारुताऽऽतपविक्षिप्तं वर्जयेन्नात्र संशयः ॥ ९४ ॥

बुद्धिमान को चाहिए कि उत्तम खान से प्रयत्न पूर्वक कान्त लौह को ग्रहण करे। जो लौह दूषितवायु और धूप से आक्रान्त हुआ हो उसे त्याग दें ॥ ९४ ॥

कान्तलोहलक्षणम्—

पात्रे यस्य प्रसरति जले तैलबिन्दुर्न लिप्ता
गन्धं हिङ्गु त्यजति च तथा तिक्ततां निम्बकल्कः ।
पाके दुग्धं भवति शिखराकारकं नैति भूमौ
कान्तं लौहं तदिदमुदितं लक्षणोक्तं च नान्यत् ॥ ९५ ॥

जल से भरे जिस कान्त लौह के पात्र में तैल डालने पर फैले नहीं और उसी कान्त लौह के पात्र में हींग और निम्ब के कल्क का लेप करने पर वे अपनी गन्ध और कटुता को त्याग दें और जिसके पात्र में दुग्ध के पकाने पर वह शिखराकृति हो जाय और उबल कर पात्र से बाहर पृथ्वी पर न गिरे, इन्हीं लक्षणों वाले लौह को कान्तलौह कहते हैं अन्य को नहीं ॥ ९५ ॥

१७४ | रसरत्नसमुच्चये—

अथ कान्तलौहगुणाः—

कान्तायोऽतिरसायनोत्तरतरं स्वस्थे चिरायुःप्रदं
स्निग्धं मेहहरं त्रिदोषशमनं शूलाऽऽममूलापहम् ।
गुल्मप्लीहयकृत्क्षयामयहरं पाण्डूदरव्याधिनु-
त्तिक्तोष्णं हिमवीर्यकं किमपरं योगेन सर्वार्त्तिनुत् ॥ ९६ ॥

कान्त लौह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है, स्वस्थ शरीर वाले मनुष्य की आयु को बढाता है, स्निग्ध है तथा प्रमेह, त्रिदोष प्रकोप, शूल, आम, बवासीर, गुल्म, प्लीहा, यकृत, क्षय, पाण्डु तथा उदररोग को नष्ट करता है। यह स्वाद में तिक्त, उष्ण तथा शीतवीर्य है और भिन्न २ योगों के साथ मिलाकर सेवन करने से सब रोगों को नष्ट करता है। इससे बढकर दूसरा कोई श्रेष्ठ रसायन नहीं है ॥ ९६ ॥

लौहकल्पश्रेष्ठता—

सम्यगौषधकल्पानां लोहकल्पः प्रशस्यते ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शुद्धं लोहं च मारयेत् ॥ ९७ ॥

अच्छे २ औषध कल्पो में लौह कल्प ही प्रशस्त है इसलिये यत्नपूर्वक कान्त लौह की साधारण और विशेष शुद्धि कर के मारण करना चाहिये ॥ ९७ ॥

अथ मारणार्थं लोहस्य परिमाणनिर्देशः—

नाधः पचेत्पञ्चपलादर्वागूर्ध्वं त्रयोदशात् ॥ ९८ ॥

पाञ्च पल से कम और तेरह पल से ज्यादा लौह को एक वार में भस्म के लिये नहीं लेना चाहिये ॥ ९८ ॥

अथ लोहमारणे मन्त्रः(१)—

आदौ मन्त्रस्ततः कर्म कर्त्तव्यं मन्त्र उच्यते ॥ ९९ ॥

लौह मारण के प्रथम मन्त्र का जप कर के फिर मारण कर्म करना चाहिए नीचे मन्त्र कहा जाता है ॥ ९९ ॥

अथ लौहत्रयाणामुत्तरोत्तरगुणाधिक्यम्—

लक्षोत्तरगुणं सर्वं लोहं स्यादुत्तरोत्तरम् ।


( १ ) “ॐ अमृतोद्भवाय स्वाहा”
अनेन मन्त्रेण लोहमारणम् ।
“ॐ अमृतोद्भवाय स्वाहा” इस मन्त्र का जप कर के लौह का मारण करना चाहिए।

पञ्चमोऽध्यायः । १७५

कान्तं कोटिगुणं तत्रं तदप्येवं गुणोत्तरम् ॥ १०० ॥ मुण्डादि प्रत्येक लौह उत्तरोत्तर एक दूसरे से लक्षाधिक गुणों वाले हैं और उनमें कान्त लौह करोड़ से भी अधिक गुण वाला है। इसमें भी मन्त्रजप पूर्वक मारित कान्त लौह करोड़ गुण से भी अधिक गुण प्रद होता है ॥ १०० ॥

अथ सर्वलौहशुद्धिः शशक्षतजसंलिप्तं त्रिवारं परितापितम् । मुण्डादिसकलं लोहं सर्वदोषान्विमुञ्चति ॥ १०१ ॥ मुण्ड आदि सर्व प्रकार के लौह के छोटे २ टुकड़ों को खरगोश के रुधिर से लिप्त-कर अग्नि में तपाने से उनकी शुद्धि हो जाती है। यह क्रिया तीन बार करनी चाहिए ॥१०१॥

लोहस्थगिरिजदोषनाशनविधिः— क्वाथ्यमष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ १०२ ॥ कृत्वा पत्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् । एवं प्रलीयते दोषोगिरिजो लोहसम्भवः ॥ १०३ ॥ अथवा १६ पल (६७ तो० त्रिफला) (क्वाथ्य) को आठगुने ( १२८ पल का ५१२ तो० या ६ सेर डेढ़ पाव २ तोले) जल में उबाल कर चतुर्थांश (३२ पल) शेष रख कर क्वाथ बना लो, पश्चात् ५ पल लौहे के सूक्ष्मपत्र या टुकड़े कर उन्हें प्रतप्त कर उस क्वाथ में बुझा लो । इस तरह सात बार बुझाने से लौहे के सर्व दोष(१) नष्ट हो जाते हैं ॥ १०२–१०३ ॥

ध्यान रहे कि ३२ पल क्वाथ के सात भाग करके उसमें लौह को सात बार बुझाना चाहिए, प्रथम बार बुझाये क्वाथको फेंककर दूसरा क्वाथ लेकर उसमें दूसरी बार बुझाना चाहिए । सात भाग करने पर प्रत्येक भागमें क्वाथ की मात्रा ९ तोले के करीब होती है । किसी आचार्य के मत से एक पल आठ तोले का होता है ।

मतान्तरम्— सामुद्रलवणोपेतं तप्तं निर्वापितं खलु । त्रिफलाक्वथिते नूनं गिरिदोषमयस्त्यजेत् ॥ १०४ ॥


( १ ) यथा-गुरुता हृद्योत्क्लेदः कश्मलं दाहकारिता ।
,, अश्मदोषः सुदुर्गन्धो दोषाः सप्तायसस्य तु ॥

१७६रसरत्नसमुच्चये—

चिञ्चाफलजलक्वाथादयो दोषमुदस्यति ॥ १०५ ॥

अथवा लौह के पत्रों को जल से पीसे निमक से लिप्त कर अग्नि में प्रतप्त कर लें, फिर उपर्युक्त विधि से बने हुए त्रिफला क्वाथ में बुझा लें । इस तरह सात वार करने से लौह शुद्ध हो जाता है । अथवा लौह को प्रतप्त कर इमली के पत्तोंके स्वरस या क्वाथमें सात वार बुझाने से भी वह शुद्ध हो जाता है॥१०४-१०५॥

मतान्तरेण शोधनं मारणञ्च—

यद्वा फलत्रयोपेतं गोमूत्रे कथितं क्षणम् ।
रेचितं घृतसंयुक्तं क्षिप्त्वाऽयःखर्परे पचेत् ॥ १०६ ॥
चालयेल्लोहदण्डेन यावत्क्षिप्तं तृणं दहेत् ।
पिष्ट्वा पिष्ट्वा पचेदेवं पञ्चवारमतः परम् ॥ १०७ ॥
धात्रीफलरसैैर्यद्वा त्रिफलाक्वथितोदकैः ।
पुटैर्लोहं चतुर्वारं भवेद्वारितरं खलु ॥ १०८ ॥

अथवा १६ पल त्रिफला का आठगुने गोमूत्र में क्वाथ बनाकर पाच पल लौह को उस क्वाथ में खूब पकाले, फिर उस लौह का रेती से चूर्ण करके उसमें समान या द्विगुण घृत मिलाकर खर्परमें (कड़ाही) पकावे और लौहकी कलच्छी से चलाता रहे । जब पकाते २ लौह पर तृण डालने से वह जलने लगे तब उतार ले । इस तरह लौह को खरल में पीस पीसकर पाच वार पकाना चाहिये । फिर त्रिफला के क्वाथ से या आंवलों के रस में खूब खरल कर चार पुट देने चाहिए । इस तरह करने से लौह की जल में तैरने लायक भस्म हो जाती है ॥ १०६-१०८ ॥

मतान्तरेण मारणम्—

स्नेहाक्तं लोहरजो मूत्रे स्वरसेऽपि रात्रिधात्रीणाम् ।
पृथगेवं सप्तकृत्वो भर्जितमखिलामये योज्यम् ॥ १०९ ॥

अथवा लौह चूर्ण को घृत से लिप्त कर गोमूत्र, हरिद्रास्वरस और आंवले के खरस में पृथक् २ सातवार पकाकर पुटविधि से भस्म बना के सम्पूर्ण रोगों में प्रयोग करना चाहिए ॥ १०९ ॥

अथ तीक्ष्णलौहस्य मारणम्—

तीक्ष्णलौहस्य पत्राणि निर्दलानि दृढेऽनले ।
ध्मात्वा क्षिपेज्जले सद्यःपाषाणोलूखलोदरे ॥ ११० ॥

  • पञ्चमोऽध्यायः । १७७

कण्डयेद्दृढनिर्घातैः स्थूलया लोहपारया । तन्मध्यात्स्थूलखण्डानि रुद्ध्वा मल्लद्वयान्तरे ॥ १११ ॥ ध्मात्वा क्षिप्त्वा जले सम्यक् पूर्ववत्कण्डयेत्खलु । तच्चूर्णं सूतगन्धाभ्यां पुटेद्विंशतिवारकम् ॥ ११२ ॥ पुटे पुटे विधातव्यं पेषणं दृढवत्तरम् । एवं भस्मीकृतं लौहं तत्तद्रोगेषु योजयेत् ॥ ११३ ॥

तीक्ष्ण लौह के ( जो कि दलरहित हों ) छोटे २ पत्रों को तीव्र अग्नि में अत्यन्त प्रतप्त कर पत्थरी की ओखली में भरे हुए जल में बुझावे, फिर उस जल में से तुरन्त निकालकर लौह की ओखली ( उलूखल या इमामदस्ता ) में डाल-कर स्थूल लौह के दण्ड ( बत्थे ) से चूर्ण करे। फिर उस चूर्ण में से बड़े २ लौह के पत्रों को सम्पुट में बन्दकर के अत्यन्त लाल कर जल में बुझा लेवे, फिर पूर्ववत् चूर्ण करले इस प्रकार उस लौहचूर्ण में समान भाग पारद और गन्धक की कजली मिलाकर सम्पुट में बन्दकर फूके इस तरह प्रत्येक पुट में समान नवीन कज्जली मिलाकर खूब खरल में घोटकर बीसवार पुट देना चाहिए। इस तरह भस्म किये हुए लौह का सर्व रोगों में प्रयोग करना चाहिए ॥ ११०-११३ ॥

अथ कान्तलौहस्य गुणाः—

कान्तायः कमनीयकान्तिजननं पाण्ड्वामयोन्मूलनम् । यक्ष्मव्याधिनिबर्हणं गरहरं दोषत्रयोन्मूलनम् ॥ नानाकुष्ठनिबर्हणं बलकरं वृष्यं वयस्तम्भनम् । सर्वव्याधिहरं रसायनवरं भौमामृतं नापरम् ॥ ११४ ॥

कान्त लौह शरीर की सुन्दर आकृति को उत्पन्न करता है और पाण्डु, राज-यक्ष्मा, विषबाधा, त्रिदोषविकार तथा सर्व प्रकार के कुष्ठ को नष्ट करता है, बल को बढ़ाता है, वृष्य और वयः स्थापक है ओर यह सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है, अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है, इससे बढकर पृथ्वी पर कोई अन्य अमृत नहीं है ॥ ११४ ॥

लौहस्य मारणान्तरम्—

हिङ्गुलस्य पलान्पञ्च नारीस्तन्येन पेषयेत् । तेन लोहस्य पत्राणि लेपयेत्पलपञ्चकम् ॥ ११५ ॥

रस० १२

१७८ रसरत्नसमुच्चये—

रुद्ध्वा गजपुटे पच्यात्कषायैस्त्रैफलैः पुनः । जम्बीरैरारनालैर्वा विंशत्यंशेन हिङ्गुलम् ॥ ११६ ॥ पिष्ट्वा रुद्ध्वा पचेल्लोहं तद्द्रवैः पाचयेत्पुनः । चत्वारिंशत्पुटैरेवं कान्तं तीक्ष्णं च मुण्डकम् प्रियते नात्र सन्देहो दत्त्वा दत्तैव हिङ्गुलम् ॥ ११७ ॥

पाञ्चपल लौह के पत्रोंको स्त्री के दुग्ध में पीसे हुए पाञ्च पल हिङ्गुल से लिप्त कर शरावसम्पुट में बन्दकर गज पुट में फूंक दें, फिर काञ्जी, त्रिफलाक्वाथ और निम्बू-रस से २० तोले हिङ्गुल को घोट कर लौह पत्र पर लेपकर फूंकदे, फिर उक्त रसों में लौह को पकाना चाहिए इस तरह वार २ हिङ्गुलडालकर ४० पुट देने से कान्त, मुण्ड, तीक्ष्ण लौहों की भस्म हो जाती है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥११५-११७॥

अथ तीक्ष्णलौहस्य विशेषमारणम्—

अथ पूर्वोदितं तीक्ष्णं वसुभल्लकवासयोः । पुटितं पत्रतोयेन त्रिंशद्वारानि यत्नतः ॥ शोणितं जायते भस्म कृतसिन्दूरविभ्रमम् ॥ ११८ ॥

तीक्ष्ण लौह को श्वेत पुनर्नवा के रस से भावित कर तथा अडूसे के पत्रों के स्वरस या क्वाथ से भावित कर ३० पुट देने से सिन्दूर के समान लाल भस्म हो जाती है ॥ ११८ ॥

मतान्तरम्—

यद्वा तीक्ष्णदलोद्भूतं रजश्च त्रिफलाजलैः । पिष्ट्वा दत्त्वौदनं किञ्चिच्चक्रिकां प्रविधाय च ॥ ११९ ॥ शोषयित्वाऽतियत्नेन प्रपचेत्पञ्चभिः पुटैः । रक्तवर्णं हि तद्भस्म योजनीयं यथायथम् ॥ १२० ॥

अथवा लौह चूर्ण को त्रिफला क्वाथ से घोटकर कुछ भात मिलाकर टिकिया बना लें, सूख जाने पर सम्पुट में बन्द कर पुट दे दें। इस तरह पांच पुट देने से लाल वर्ण की लौह भस्म हो जाती है, उसको रोगानुसार प्रयोग करना चाहिये ॥११९-१२०॥

मतान्तरे सर्वलौहानां मारणम्—

मत्स्याक्षीगन्धवाहीकैर्लकुचद्रवपेषितैः । विलिप्य सकलं लोहं मत्स्याक्षीकल्कलेपितम् ॥ १२१ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । | १७९

भस्त्राभ्यां सुदृढं ध्मात्वा त्रिशुलीनिर्गमावधि ।
अथोद्धृत्य क्षिपेत्क्वाथे त्रिफलागोजलात्मके ॥ १२२ ॥
तस्मादाहृत्य सन्ताड्य मृतमादाय लोहकम् ।
पुनश्च पूर्ववद् ध्मात्वा मारयेदखिलायसम् ॥ १२३ ॥
खण्डयित्वा ततो गन्धगुडत्रिफलया सह ।
पुटेत्त्रिंशतिवाराणि निरुत्थं भस्म जायते ॥ १२४ ॥

सर्व प्रकार के लौह चूर्ण को बड़हल के फल के रस से पीसे हुए गण्डदूर्वा, गन्धक, हींग, इन पदार्थों से लिप्तकर, फिर गण्डदूर्वा के कल्क को ऊपर नीचे रखकर लौह का गोला बना कर सुखा लें, फिर धौंकनी द्वारा जब तक विविध रंग की ज्वाला न निकले तब तक फूँकता रहे, बाद में पत्रों को निकाल कर त्रिफला क्वाथ और गोमूत्र में उन्हें बुझावें, फिर उसमें से निकालकर चूर्ण करके पूर्वानुसार फूँक के बुझाकर खरल में चूर्ण कर लें, पश्चात् लौह चूर्ण के समान गन्धक, गुड़ और त्रिफला चूर्ण ले कर सबको खरल में घोटकर के गोला बनाकर गजपुट में फूँक देवें, इस प्रकार ३० पुट देने से लौह की निरुत्थ भस्म हो जाती है॥१२१-१२४॥

अन्यविधिः—
समगंधमयश्चूर्णं कुमारीवारिभावितम् ।
पुटीकृतं कियत्कालमवश्यं म्रियते ह्ययः ॥ १२५ ॥

अथवा गन्धक और लौह चूर्ण बराबर २ लेकर घृत कुमारी के स्वरस में घोटकर के सम्पुट में बन्द कर आठ या दस पुट देने से अवश्य ही भस्म हो जाती है ॥१२५॥

अन्यविधिः—
जम्बीररससंयुक्तं दरदे तप्तमायसम् ।
बहुवारं विनिक्षिप्तं म्रियते नात्र संशयः ॥ १२६ ॥

निम्बू के रस में कुछ हिङ्गुल मिलाकर घोल बनालो, फिर इस घोल ( विलयन ) में लौह को प्रतप्त कर बुझावें, इस तरह २० या २५ बार बुझाने से लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२६ ॥

अन्यविधिः—
गोमूत्रस्त्रिफला काथ्या तत्कषायेण भावयेत् ।
त्रिःसप्ताहं प्रयत्नेन दिनकं मर्दयेत्पुनः ॥ १२७ ॥

१८० रसरत्नसमुच्चये—

रुद्ध्वा गजपुटे पच्याद्दिनं क्वाथेन मर्दयेत् ।
दिवा मर्द्यं पुटेद्रात्रावेकविंशदिनावधि ।
एकविंशत्पुटैरेवं म्रियते त्रिविधं ह्ययः ॥ १२८ ॥

गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर उससे २१ दिन तक लौह को भावित करें, फिर उसी क्वाथ से उस लौह को एक दिन तक खूब घोट करके सम्पुट कर गजपुट द्वारा रात्रि में पुट दे देवें, फिर निकालकर उसी क्वाथ से दिन में घोटकर रात्रि में पुट देवें इस तरह २१ पुट देने से तीनों प्रकार के लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥

अथ कान्तलोहस्य रामराजीप्रोक्तशोधनम्—

यत्पात्राध्युषिते तोये तैलबिन्दुर्न सर्पति ।
तारेणावर्तते यत्तत्कान्तलोहं तनूकृतम् ॥ १२६ ॥
अयसामुत्तमं सिञ्चेत्तप्तं तप्तं वरारसे ।
एवं शुद्धानि लोहानि पिष्टान्यम्लेन केनचित् ॥ १३० ॥
मृतसूतस्य पादेन प्रलिप्तानि पुटानले ।
पचेत्तुल्यस्य वा ताप्यगन्धाश्महरतेजसा ॥ १३१ ॥
तप्तं क्षाराम्लसंलिप्तं शशरक्तेन भावितम् ।
कान्तलोहं भवेद्भस्म सर्वदोषविवर्जितम् ॥ १३२ ॥

जिस लौह के जल से भरे हुए पात्र में तैल की बूंद छोड़ने पर वह फैले नहीं और जो लौहचूर्ण रजत चूर्ण के साथ मिश्रित हो जाय या उसको चारों ओर घेरले उस सर्वलौहो में उत्तम कान्त लौह के छोटे २ पत्र या टुकड़े बना करके प्रतप्त कर त्रिफला के क्वाथ में सात वार बुझाकर शुद्ध करलें, पश्चात् उसे निम्बू के रस या किसी अम्लरस से घोट करके चतुर्थांश पारदभस्म से मर्दनद्वारा लिप्तकर पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। अथवा लौह चूर्ण या पत्र को अम्लरस में घोटे हुयेक्षार से लिप्त करके तपाकर खरगोश के रुधिर में सातवार बुझालें, पश्चात् लौह के बराबर सुवर्णमाक्षिक, गन्धक और पारद इनके साथ लौह पत्रों को घोटकर सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूंक दें, इस तरह लौह को सर्वदोष रहित भस्म हो जाती है ॥ १२९-१३२ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । १८१

अन्यविधिः— शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं खल्लेन कृतकज्जलम् । द्वयोः समं लौहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ १३३ ॥ यामद्वयात्समुद्धृत्य यद्गोलं ताम्रपात्रके । आच्छाद्यैरण्डपत्रैश्च यामार्धेऽत्युष्णतां व्रजेत् ॥ १३४ ॥ धान्यराशौ न्यसेत्पश्चात्रिदिनान्ते समुद्धरेत् । सम्पेष्य गालयेद्वस्त्रे सत्यं वारितरं भवेत् । कान्तं तीक्ष्णं च मुण्डं च निरुत्थं जायते मृतम् ॥ १३५ ॥ स्वर्णादीन्मारयेदेवं चूर्णं कृत्वा च लौहवत् । सिद्धयोगो ह्ययं ख्यातः सिद्धानां सुमुखांगतः ॥ १३६ ॥ अनुभूतं मया सत्यं सर्वरोगजरापहम् । त्रिफलामधुसंयुक्तं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ १३७ ॥

**अन्यविधि—**शुद्ध पारद से द्विगुण गन्धक लेकर खरल में कजली बनालें, इस कजली के बराबर लौह चूर्ण लेकर उसको घृत कुमारी के रस में दो प्रहर तक घोट करके गोला बनालेवें, पश्चात् उस गोले को ताम्र के पात्र में रख कर रेड़ी के पत्रों से ढककर आधे प्रहर तक अग्नि में या सूर्य की धूप में रहने दें, फिर उस गोले को तीन दिन तक धान्य के ढेर में गाड़ना चाहिए, चौथे दिन निकाल कर लौह चूर्ण को पीसकर वस्त्र से छान लें, इस तरह कान्त, तीक्ष्ण और मुण्ड लौह की जल में तैरने लायक निरुत्थ भस्म हो जाती है। इसी विधि से सुवर्णादि धातुओं की भी भस्म हो जाती है। यह योग सिद्धों के मुख से कहा हुआ है इसलिये उसको सिद्धयोग कहते हैं और मैंने भी इसकी सत्यता का अनुभव किया है। यह सर्व व्याधियों को नष्ट करता है। इसको त्रिफला और शहद के साथ सर्व रोगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३३–१३७ ॥

अथ लौहप्रयोगः— एतत्स्यादपुनर्भवं हि भसितं लोहस्य दिव्यामृतं सम्यक् सिद्धरसायनं त्रिकटुकीवेल्लाज्यमध्वन्वितम् । हन्त्यान्निष्क-मितं जरामरणजन्याधींश्च सत्पुत्रदं दिष्टं श्रीगिरिशेन कालयवनोद्भूतौ पुरा तत्पितुः ॥ १३८ ॥

१८२रसरत्नसमुच्चये—

लौहभस्म के गुण—यह निरुत्थ लौह भस्म अमृत के समान गुणकारी और सिद्ध रसायन है। इस भस्म को चार मासे की मात्रा में त्रिकटु, वायविडङ्ग, शहद और घृत के साथ सेवन करने से जरा, मरण तथा सर्व व्याधियां नष्ट हो जाती हैं और सत्पुत्र को देती है। किसी समय महादेवजी ने कालयवन के पिता को पुत्र की प्राप्ति के लिये इस भस्म के सेवन का उपदेश दिया था॥ १३८॥

अथ लौहानां रामराजीप्रोक्तगुणाः—
लौहं जन्तुविकारपाण्डुपवनक्षीणत्वपित्तामय-
स्थौल्यार्शोग्रहणीज्वरार्तिकफजिच्छ्लोफप्रमेहप्रणुत्।
गुल्मप्लीहविषापहं बलकरं कुष्ठाग्निमान्द्यप्रणुत्
सौख्यालं विरसायनं मृतिहरं किट्टं च कान्तादिवत् ॥१३६॥
मृतानि लोहानि रसीभवन्ति निघ्नन्ति युक्तानि महामयांश्च।
अभ्यासयोगाद् दृढदेहसिद्धिं कुर्वन्ति रुज्जन्मजराविनाशम् ॥ १४० ॥

लौहभस्म कृमि से उत्पन्न विकार, पाण्डु, वायुरोग, क्षीणता, पित्तजन्यरोग, स्थूलता, बवासीर, संग्रहणी, ज्वर, कफ, शोथ, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा, विषबाधा, कुष्ठ और मन्दाग्नि को नष्ट करती है, बल को बढ़ाती है, सुखकारक, उत्तम रसायन है और मृत्यु को नष्ट करती है। लौह का किट्ट भी कान्त लौह के समान गुणकारक होता है।

सर्वप्रकार के मृत लौह रस के समान गुणकारी और बड़े-२ भयङ्कर रोगों को नष्ट करते हैं। इनके सेवन करने से देह दृढ और स्थिर हो जाती है और ये लौह रोग की उत्पत्ति और जरा को नष्ट करते हैं ॥ १३९–१४० ॥

अथ श्रेष्ठकान्तलौहस्य लक्षणम्—
पक्वजम्बूफलच्छायं कान्तलोहं तदुत्तमम् ॥ १४१ ॥
जो कान्तलोह पके हुए जामुन के समान वर्ण वाला हो वह श्रेष्ठ है ॥१४१॥

अथ लोहद्रुतिः—
त्रिःसप्तकृत्वो गोमूत्रे जालिनोभस्मभावितम्।
शोषयेत्तस्य वातेन तीक्ष्णं मूषागतं द्रवेत् ॥ १४२ ॥
सुरदालिभस्मगलितं त्रिःसप्तकृत्वोऽथ गोजले शुष्कम्।
वापेन सलिलसदृशं करोति मूषागतं तीक्ष्णम् ॥१४३ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । १८३

कड़वी तरोई की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर के उसे सुखा लेवें फिर उस राख को मूषा में रखकर लौह भस्म को भर दें, ऊपर से लौह पर फिर शेष राख रखकर बन्द करके अग्नि से धमन करने से लौह का द्रवण हो जाता है। अथवा देवदाली की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर सुखा लें, पश्चात् मूषा में वह भस्म रख कर के उस में लौहभस्म भर कर ऊपर से फिर लौह को देवदाली भस्म से ढक कर मूषा का मुख बन्दकर अग्नि से तपावे' । इस विधि से लौह की जल के सदृश द्रुति हो जाती है ॥ १४२-१४३ ॥

अथ कान्तलौहस्य विशेषमारणम्— सुरदालिभवं भस्म नरमूत्रेण गालितम् । त्रिःसप्तवारं तत्क्षारवापात्कान्तद्रुतिर्भवेत् ॥ १४४ ॥ देवदाली की राख को नरमूत्र से २१ वार भावितकर क्षारविधि से देवदाली भस्म का क्षार निकाल करके मूषायन्त्र में इस क्षार को और लौह भस्म को रख-कर बन्द करके तीव्र अग्नि देने से कान्तलौह की द्रुति हो जाती है ॥ १४४ ॥

अथाष्टलोहानां द्रावणम्— गन्धकं कान्तपाषाणं चूर्णयित्वा समं समम् । द्रुते लोहे प्रतीवापो देयो लोहाष्टकं द्रवेत् ॥ १४५ ॥ सुवर्णादि अष्ट प्रकारके किसी भी लोह को पिघला कर गन्धक और कान्तलौह या चुम्बक पत्थर का चूर्ण डालता जाय तो उन सब की द्रुति होजाती है॥१४५॥

मतान्तरम्— देवदाल्याद्रवैर्भाव्यं गन्धकं दिनसप्तकम् । तेन प्रवापमात्रेण लोहं तिष्ठति सूतवत् ॥ १४६ ॥ अथवा गन्धक को सात दिन तक देवदाली (हस्तीघोषक) के रस से भावित करके चूर्ण करलें, फिर लौहों के अग्नि में पिघलते समय इस चूर्ण का प्रतिवाप (प्रक्षेपण) देने से वे पारद की तरह सर्वदा द्रुत अवस्था में ही रहते हैं ॥१४६॥

अशुद्धापक्वलोहदोषाः— अशुद्धलोहं न हितं निषेवणादायुर्बलं कान्तिविनाशि निश्चितम् । हृदि प्रपीडां तनुते ह्यपाटवं रुजं करोत्येव विशोष्य मारयेत् ॥१४७॥ अशुद्ध लोह का सेवन करना हितकर नहीं है, यह कान्ति, आयु और बल को

१८४ | रसरत्नसमुच्चये—

नष्ट करता है और हृदय में पीड़ा उत्पन्न करता है, शरीर को शिथिल कर देता है और रोग उत्पन्न करता है, इसलिये प्रथम लौह का उत्तम शोधनकर पश्चात् मारण करना चाहिए ॥ १४७ ॥

अथोत्तरोत्तरमधिकगुणकरं लोहम्—

किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शतोन्मितम् ।
तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणान् ।
तस्मात्कान्तं सदा सेव्यं जरामृत्युहरं नृणाम् ॥ १४८ ॥
आयुष्प्रदाता बलवीर्यकर्ता रोगप्रहर्ता मदनस्य कर्ता ।
अयःसमानं न हि किञ्चिदन्यद्रसायनं श्रेष्ठतमं हि जन्तोः ॥ १४९ ॥

किट्ट लौह से मुण्ड दसगुना लाभ कारक है और मुण्ड से तीक्ष्ण सौगुना अधिक लाभ करता है और तीक्ष्ण से कान्त लौह के सेवन के करने से लक्षगुणाधिक फल करता है, इसलिये सर्वदा जरा और मृत्यु को हरण करने वाले कान्त लौह का ही मनुष्यों को सेवन करना चाहिए । कान्त लौह आयु को बढाता है, बल, वीर्य और काम शक्ति को उत्पन्न करता है, रोगों को नष्ट करता है, इसलिये प्राणिमात्र के लिये लौह के समान गुणकारी अन्य कोई रसायन नहीं है ॥ १४८–१४९ ॥

अथ मण्डूरम्—

मण्डूरशोधनम्—

अक्षाङ्गारैर्धमेत्किट्टं लोहजं तद्गवां जलैः ।
सेचयेत्तत्पात्रान्तः सप्तवारं पुनः पुनः ।
मण्डूरोऽयं समाख्यातश्चूर्णं श्लक्ष्णं प्रयोजयेत् ॥ १५० ॥

लौह से उत्पन्न किट्ट (मल) को बहेड़े की अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र से भरे हुए बहेड़े के पात्र में सात वार बुझाने से मण्डूर शुद्ध होजाता है पश्चात् इसका महीन चूर्ण करके भस्म बनाकर योगों में प्रयोग करे ॥ १५० ॥

मतान्तरम्—

गोमूत्रैस्त्रिफला काथ्या तत्क्वाथे सेचयेच्छनैः ।
लोहकिट्टं सुसन्तप्तं यावज्जीर्यति तत्स्वयम् ।
तच्चूर्णं जायते पेष्यं मण्डूरोऽयं प्रयोजयेत् ॥ १५१ ॥

अथवा गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर इस क्वाथ में मण्डूर को अत्यन्त

पञ्चमोऽध्यायः । | १८५

प्रतप्त कर तब तक बुझावैं जबतक वह स्वयं चूर्ण न हो जाय, बाद में इसे पीसकर भस्म बनाकर प्रयोग करें, यही मण्डूर भस्म है ॥ १५१ ॥

लौहमण्डूरयोर्गुणसाम्यता—

ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टे ।
तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ १५२ ॥
इत्ययोऽधिकारः ।

जो गुण भस्म किये हुये मुण्ड लोह के सेवन से होते हैं वे ही गुण मुण्ड के किट्ट (मण्डूरभस्म) के सेवन से होते हैं, इसलिये सब जगह रोग की शान्ति के लिये मण्डूरभस्म का प्रयोग करना चाहिए ॥ १५२ ॥

अथ वङ्गनिरूपणम्—वङ्गस्य द्वैविध्यनिर्देशः—

खुरकं मिश्रकं चेति द्विविधं वङ्गमुच्यते ।
खुरं तत्र गुणैः श्रेष्ठं मिश्रकं न हितं मतम् ॥ १५३ ॥

खुरक और मिश्रक भेद से वङ्ग दो प्रकार का होता है, इन दोनों भेदों में से खुरक नाम का वङ्ग श्रेष्ठ है, किन्तु मिश्रक नाम का वङ्ग औषध कार्य में हितकर नहीं है ॥ १५३ ॥

अथ खुरकवङ्गस्य मिश्रकवङ्गस्य च लक्षणम्—

धवलं मृदुलं स्निग्धं द्रुतद्रावं सगौरवम् ।
निःशब्दं खुरवङ्गं स्यात् ; मिश्रकं श्यामशुभ्रकम् ॥ १५४ ॥

जो वङ्ग श्वेत, कोमल, स्निग्ध, वजन में भारी और अग्नि में तपाने पर शीघ्र द्रवित होने वाला तथा औषधियों के स्वरस में तपाकर बुझाने के समय अधिक शब्द न करे वह खुरक नाम का वङ्ग होता है । जो वङ्ग उक्त लक्षणों से विपरीत और श्वेत तथा काले रङ्ग का हो वह मिश्रक कहलाता है ॥ १५४ ॥

अथ वङ्गगुणाः—

वङ्गं तिक्तोष्णकं रूक्षमीषद्वातप्रकोपनम् ।
मेहश्लेष्मामयघ्नं च मेदोघ्नं कृमिनाशनम् ॥ १५५ ॥

वङ्ग तिक्त, उष्ण, रूक्ष और कुछ वात को कुपित करने वाला है तथा प्रमेह, श्लेष्मा (कफ) के विकार, क्रिमिजन्यरोग और मेदा को नष्ट करता है ॥ १५५ ॥

१८४ | रसरत्नसमुच्चये—


अथ खुरकवङ्गशोधनम्—

द्रावयित्वा निशायुक्ते क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे ।
विशुद्ध्यति त्रिवारेण खुरवङ्गं न संशयः ॥ १५६ ॥

खुरक वङ्ग को अग्नि पर स्थित कड़ाही के अन्दर पिघला (द्रुत) कर हरिद्रा के चूर्ण से युक्त निर्गुण्डी के रस में तीन वार बुझाने से शुद्ध हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १५६ ॥


अथ मिश्रकवङ्गशोधनम्—

अम्लतक्रविनिक्षिप्तं वर्षाभूविषतिन्दुभिः ।
कट्फलाम्बुगतं वङ्गं द्वितीयं परिशुद्ध्यति ॥ १५७ ॥

मिश्रक वङ्ग को कड़ाही में पिघलाकर श्वेत पुनर्नवा और कुचले के चूर्ण से मिले हुए खट्टी तक्र (मट्ठे) में अथवा कायफल के क्वाथ में बुझाने से शुद्ध हो जाता है ॥ १५७ ॥


अथ नागवङ्गकांस्यताम्राणां सामान्यशोधनम्—

शुद्ध्यति नागो वङ्गो घोषो रविरातपेऽपि मुनिसङ्ख्यैः ।
निर्गुण्डीरससेकैस्तन्मूलरजःप्रवापैश्च ॥ १५८ ॥

नाग, वङ्ग, कांसे और ताम्र को निर्गुण्डी के रस से भरे हुए पात्र में डाल कर सात दिन तक धूप में रखना चाहिए अथवा उपर्युक्त नागादिकों को कड़ाही में अग्नि से द्रुत कर निर्गुण्डीचूर्ण में पकावें, इस तरह सात वार करने से वे शुद्ध हो जाते हैं ॥ १५८ ॥


अथ वङ्गभस्म—

सतालेनार्कदुग्धेन लिप्त्वा वङ्गदलानि च ।
बोधिचिञ्चात्वचःक्षारैर्दद्याल्लघुपुटानि च ।
मर्दयित्वा चरेद्भस्म तद्रसादिषु शस्यते ॥ १५६ ॥

शुद्ध वङ्ग के छोटे २ पत्र बनाकर उन्हें मदार के दुग्ध से पीसी हुई हरताल से लिप्त करदें, फिर उन्हें सकोरे में रखकर ऊपर और नीचे पीपल और इमली की छाल का क्षार रखकर दूसरे सकोरे के साथ कपड़ मिट्टी कर पुट देवें फिर इस को निकाल करके चूर्णकर भस्म बनालें, यह भस्म सर्वरसायनादि कार्यों में श्रेष्ठ है॥ १५९ ॥


मतान्तरम्—

प्रद्राव्य खर्परे वङ्गं षोडशांशं रसं क्षिपेत् ।