श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
३३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या— श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति’—यहाँ संयरूप अग्नियोंमें इन्द्रियोंकी आहुति देनेको यज्ञ कहा गया है। तात्पर्य यह है कि एकांतकालमें श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण—ये पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों (क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)—की ओर बिलकुल प्रवृत्त न हों। इन्द्रियाँ संयरूप ही बन जायँ। पूरा संयम तभी समझना चाहिये, जब इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा अहम्—इन सबमेंसे राग-आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय (गीता—दूसरे अध्यायका अट्टावनवाँ, उन्सठवाँ तथा अड़सठवाँ श्लोक)।
‘शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति’ — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं। विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन करनेसे वह यज्ञ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहारकालमें विषयोंका इन्द्रियोंसे संयोग होते रहनेपर भी इन्द्रियोंमें कोई विकार उत्पन्न न हो (गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित हो जायँ। इन्द्रियोंमें राग-द्वेष उत्पन्न करनेकी शक्ति विषयोंमें रहे ही नहीं।
इस श्लोकमें कहे गये दोनों प्रकारके यज्ञोंमें राग-आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेपर ही सिद्धि (परमात्म-प्राप्ति) होती है। राग-आसक्तिको मिटानेके लिये ही दो प्रकारकी प्रक्रियाका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है—
पहली प्रक्रियामें साधक एकांतकालमें इन्द्रियोंका संयम करता है। विवेक-विचार, जप-ध्यान आदिसे इन्द्रियोंका संयम होने लगता है। पूरा संयम होनेपर जब रागका अभाव हो जाता है, तब एकांतकाल और व्यवहारकाल—दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।
दूसरी प्रक्रियामें साधक व्यवहारकालमें राग-द्वेषरहित इन्द्रियोंसे व्यवहार करते हुए मन, बुद्धि और अहम्से भी राग-द्वेषका अभाव कर देता है। रागका अभाव होनेपर व्यवहारकाल और एकांतकाल—दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगान्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
| अपरे | = अन्य (योगीलोग) | प्राणकर्माणि | = प्राणोंकी क्रियाओंको | योग (समाधियोग) | = हवन |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | ज्ञानदीपिते | = ज्ञानसे प्रकाशित | रूप अग्निमें | किया |
| इन्द्रियकर्माणि | = इन्द्रियोंकी क्रियाओंको | आत्मसंयम- | जुह्वति | करते हैं। | |
| च | = और | योगान्नौ | = आत्मसंयम- |
व्याख्या— सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे’—इस श्लोकमें समाधिको यज्ञका रूप दिया गया है। कुछ योगीलोग दसों इन्द्रियोंकी क्रियाओंका समाधिमें हवन किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि समाधि-अवस्थामें मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों—(ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों—) की क्रियाएँ रुक जाती हैं। इन्द्रियाँ सर्वथा निश्चल और शान्त हो जाती हैं।
समाधिरूप यज्ञमें प्राणोंकी क्रियाओंका भी हवन हो जाता है अर्थात् समाधिकालमें प्राणोंकी क्रियाएँ भी रुक जाती हैं। समाधिमें प्राणोंकी गति रोकनेके दो प्रकार हैं— एक तो हठयोगकी समाधि होती है, जिसमें प्राणोंको रोकनेके लिये कुम्भक किया जाता है। कुम्भकका अभ्यास बढ़ते-बढ़ते प्राण रुक जाते हैं, जो घटोतक, दिनोतक रुके
रह सकते हैं। इस प्राणायामसे आयु बढ़ती है; जैसे—वर्षा होनेपर जल बहने लगता है तो जलके साथ-साथ बालू भी आ जाती है, उस बालूमें मेढक दब जाता है। वर्षा बीतनेपर जब बालू सूख जाती है, तब मेढक उस बालूमें ही चुपचाप सूखे हुएकी तरह पड़ा रहता है, उसके प्राण रुक जाते हैं। पुनः जब वर्षा आती है, तब वर्षाका जल ऊपर गिरनेपर मेढकमें पुनः प्राणोंका संचार होता जाता है और वह टराने लग जाता है।
दूसरे प्रकारमें मनको एकाग्र किया जाता है। मन सर्वथा एकाग्र होनेपर प्राणोंकी गति अपने-आप रुक जाती है।
‘ज्ञानदीपिते’ —समाधि और निद्रा—दोनोंमें कारणशरीरसे सम्बन्ध रहता है, इसलिये बाहरसे दोनोंकी समान अवस्था दिखायी देती है। यहाँ ‘ज्ञानदीपिते’ पदसे समाधि
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
३३१
और निद्रामें परस्पर भिन्नता सिद्ध की गयी है। तात्पर्य यह कि बाहरसे समान दिखायी देनेपर भी समाधिकालमें 'एक सच्चिदानन्द परमात्मा ही सर्वत्र परिपूर्ण है' ऐसा ज्ञान प्रकाशित (जाग्रत्) रहता है और निद्राकालमें वृत्तियाँ अविद्यामें लीन हो जाती हैं। समाधिकालमें प्राणोंकी गति रुक जाती है और निद्राकालमें प्राणोंकी गति चलती रहती है। इसलिये निद्रा आनेसे समाधि नहीं लगती।
'आत्मसंयमयोगाग्नी जुह्वति'—चितवृत्तिनिरोधरूप अर्थात् समाधिरूप यज्ञ करनेवाले योगीलोग इन्द्रियों तथा प्राणोंकी क्रियाओंका समाधियोरूप अग्निमें हवन किया करते हैं अर्थात् मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणोंकी क्रियाओंको रोककर समाधिमें स्थित हो जाते हैं। समाधि-कालमें सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और प्राण अपनी चंचलता छो देते हैं। एक सच्चिदानन्दधन परमात्माका ज्ञान ही जाग्रत् रहता है।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च
योगयज्ञास्तथापरे ।
यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
| अपरे | = दूसरे (कितने ही) | तपोयज्ञाः | = (और कितने ही) |
|---|---|---|---|
| संशितव्रताः | = तीक्ष्ण व्रत करनेवाले | तपोयज्ञ करनेवाले हैं | |
| यतयः | = प्रयत्नशील साधक | तथा | = और (दूसरे कितने ही) |
| द्रव्ययज्ञाः | = द्रव्यमय यज्ञ |
| करनेवाले हैं | योगयज्ञाः | = योगयज्ञ करनेवाले हैं |
|---|---|---|
| =( और कितने ही) | च | = तथा (कितने ही) |
| तपोयज्ञ करनेवाले हैं | स्वाध्याय- | |
| = और (दूसरे कितने ही) | ज्ञानयज्ञाः | = स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं। |
व्याख्या—'यतयः संशितव्रताः' —अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (भोग-बुद्धिसे संग्रहका अभाव)—ये पाँच 'यम' हैं*, जिन्हें 'महाव्रत' के नामसे कहा गया है। शास्त्रोंमें इन महाव्रतोंकी बहुत प्रशंसा, महिमा है। इन व्रतोंका सार यही है कि मनुष्य संसारसे विमुख हो जाय। इन व्रतोंका पालन करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ 'संशितव्रताः ' पद आया है। इसके सिवाय इस श्लोकमें आये चारों यज्ञोंमें जो-जो पालनीय व्रत अर्थात् नियम हैं, उनपर दृढ़ रहकर उनका पालन करनेवाले भी सब 'संशितव्रताः ' हैं। अपने-अपने यज्ञके अनुष्ठानमें प्रयत्नशील होनेके कारण उन्हें 'यतयः ' कहा गया है।
'संशितव्रताः ' पदके साथ ('द्रव्ययज्ञाः ,' 'तपोयज्ञाः ,' 'योगयज्ञाः ' और 'ज्ञानयज्ञाः ' की तरह) 'यज्ञाः ' पद नहीं दिया जानेके कारण इसे अलग यज्ञ नहीं माना गया है।
'द्रव्ययज्ञाः —मात्र संसारके हितके उद्देश्यसे कुआँ, तालाब, मन्दिर, धर्मशाला आदि बनवाना, अभावग्रस्त लोगोंको अन्न, जल, वस्त्र, औषध, पुस्तक आदि देना, दान करना इत्यादि सब 'द्रव्ययज्ञ' है। द्रव्य-(तीनों शरीरोंसहित सम्पूर्ण पदार्थों—) को अपना और अपने लिये न मानकर निःस्वार्थभावसे उन्हींका मानकर उनकी सेवामें
लगानेसे द्रव्ययज्ञ सिद्ध हो जाता है।
शरीरादि जितनी वस्तुएँ हमारे पास हैं, उन्हींसे यज्ञ हो सकता है, अधिककी आवश्यकता नहीं है। मनुष्य बालकसे उतनी ही आशा रखता है, जितना वह कर सकता है, फिर सर्वज्ञ भगवान् तथा संसार हमसे हमारी क्षमतासे अधिककी आशा कैसे रखेंगे?
'तपोयज्ञाः —अपने कर्तव्य-(स्वधर्म—) के पालनमें जो-जो प्रतिकूलताएँ, कठिनाइयाँ आयें, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सह लेना 'तपोयज्ञ' है। लोकहितार्थ एकादशी आदिका व्रत रखना, मौन धारण करना आदि भी 'तपोयज्ञ' अर्थात् तपस्यारूप यज्ञ हैं। परन्तु प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, घटना आनेपर भी साधक प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे—अपने कर्तव्यसे थोड़ा भी विचलित न हो तो यह सबसे बड़ी तपस्या है, जो शीघ्र सिद्धि देनेवाली होती है।
गाँवभरकी गन्दगी, कूड़ा-करकट बाहर एक जगह इकट्ठा हो जाय, तो वह बुरा लगता है; परन्तु वही कूड़ा-करकट खेतमें पड़ जाय, तो खेतीके लिये खादरूपसे बढ़िया सामग्री बन जाता है। इसी प्रकार प्रतिकूलता बुरी लगती है और उसे हम कूड़े-करकटकी तरह फेंक देते हैं अर्थात् उसे महत्व नहीं देते; परन्तु वही प्रतिकूलता अपना
- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ (योगदर्शन २। ३०)
३३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कर्तव्य-पालन करनेके लिये बढ़िया सामग्री है। इसलिये प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितिको सहर्ष सहनेके समान दूसरा कोई तप नहीं है। भोगोंमें आसक्ति रहनेसे अनुकूलता अच्छी और प्रतिकूलता बुरी लगती है। इसी कारण प्रतिकूलताका महत्त्व समझमें नहीं आता।
‘योगयज्ञास्तथापे’ —यहाँ योग नाम अन्तःकरणकी समताका है। समताका अर्थ है—कार्यकी पूर्ति और अपूर्तिमें, फलकी प्राप्ति और अप्राप्तिमें, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिमें, निन्दा और स्तुतिमें, आदर और निरादरमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हलचल, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःखका न होना। इस तरह सम रहना ही ‘योगयज्ञ’ है।
‘स्वाध्यायज्ञानयज्ञः’ —केवल लोकहितके लिये गीता, रामायण, भागवत आदिका तथा वेद, उपनिषद् आदिका यथाधिकार मनन-विचारपूर्वक पठन-पाठन करना, अपनी वृत्तियोंका तथा जीवनका अध्ययन करना आदि सब स्वाध्यायरूप ‘ज्ञानयज्ञ’ है।
गीताके अन्तमें भगवान्ने कहा है कि जो इस गीता-शास्त्रका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है (अठारहवें अध्यायका सत्तरवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि गीताका स्वाध्याय ‘ज्ञानयज्ञ’ है। गीताके भावोंमें गहरे उतरकर विचार करना, उसके भावोंको समझनेकी चेष्टा करना आदि सब स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ है।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
अपरे | = दूसरे (कितने ही) | रुद्ध्वा | = रोककर (कुम्भक करके) | प्राणान् | = प्राणोंका ---|---|---|---|---|--- प्राणायाम- | = प्राणायामके | प्राणे | = (फिर) प्राणमें | प्राणेषु | = प्राणोंमें परायणाः | परायण हुए (योगीलोग) | अपानम् | = अपानका | जुह्वति | = हवन किया करते हैं। अपाने | = अपानमें | जुह्वति | = हवन (रेचक) करते हैं; | एते | = ये प्राणम् | = प्राणका (पूरक करके) | तथा | = तथा | सर्वे, अपि | = सभी (साधक) प्राणापानगती | = प्राण और अपानकी गति | अपरे | = अन्य (कितने ही) | यज्ञक्षपित- | = यज्ञों द्वारा | | नियताहाराः | = नियमित आहार करनेवाले | कल्मषाः | पापोंका नाश करनेवाले (और) | | | | यज्ञविदः | = यज्ञोंको जाननेवाले हैं।
व्याख्या—‘अपाने जुह्वति’.....‘प्राणायाम-परायणाः’ —प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) हैं। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना ‘प्राण’ का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना ‘अपान’ का कार्य है। योगीलोग पहले
बाहरकी वायुको बायीं नासिका-(चन्द्रनाड़ी-) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको ‘पूरक’ कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु—दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको ‘कुम्भक’ कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका-
१-इस (उन्तीसवें) श्लोकमें ‘अपरे’ कर्ता और ‘जुह्वति’ क्रिया एक ही आयी है; अतः यहाँ पूरक, कुम्भक और रेचकपूर्वक किया जानेवाला एक ही प्राणायामरूप यज्ञ लिया गया है।
२-हृदि प्राणः स्थितो नियमपानो गुदमण्डले। (योगचूडामण्युपनिषद् २३)
श्लोक २९-३० ]
- साधक-संजीवनी *
३३३
(सूर्यनाड़ी- ) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछे-पीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राण-वायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको 'रेचक' कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक, सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है।
इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बार-बार पूरक-कुम्भक-रेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं*।
'अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति' — नियमित आहार-विहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं। अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।
प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है—प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपने-अपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापीका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।
'सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्पषाः' — चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उनका अनुष्ठान करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ 'सर्वेऽप्येते' पद आया है। उन यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और अविनाशी परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
वास्तवमें सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही हैं—ऐसा जानेवाले ही 'यज्ञवित्' अर्थात् यज्ञके तत्त्वको जानेवाले हैं। कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। जो लोग अविनाशी परमात्माका अनुभव करनेके लिये यज्ञ नहीं
करते, प्रत्युत इस लोक और परलोक (स्वर्गादि)-के विनाशी भोगोंकी प्राप्तिके लिये ही यज्ञ करते हैं, वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले नहीं हैं। कारण कि विनाशी पदार्थोंकी कामना ही बन्धनका कारण है—'गतागतं कामकामा लभन्ते' (गीता ९।२१)। अतः मनमें कामना-वासना रखकर परिश्रमपूर्वक बड़े-बड़े यज्ञ करनेपर भी जन्म-मरणका बन्धन बना रहता है—
मिटी न मनकी वासना, नौ तत भये न नास।
तुलसी केते पच मुये, दे दे तन को त्रास॥
विशेष बात
यज्ञ करते समय अग्निमें आहुति दी जाती है। आहुति दी जानेवाली वस्तुओंके रूप पहले अलग-अलग होते हैं; परन्तु अग्निमें आहुति देनेके बाद उनके रूप अलग-अलग नहीं रहते, अपितु सभी वस्तुएँ अग्निरूप हो जाती हैं। इसी प्रकार परमात्मप्राप्तिके लिये जिन साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है, उनमें आहुति देनेका तात्पर्य यही है कि आहुति दी जानेवाली वस्तुओंकी अलग सत्ता रहे ही नहीं, सब स्वाहा हो जायें। जबतक उनकी अलग सत्ता बनी हुई है, तबतक वास्तवमें उनकी आहुति दी ही नहीं गयी अर्थात् यज्ञका अनुष्ठान हुआ ही नहीं।
इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकसे भगवान् कर्मोंके तत्त्व (कर्ममें अकर्म) का वर्णन कर रहे हैं। कर्मोंका तत्त्व है— कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधना। कर्मोंसे न बँधनेका ही एक साधन है—यज्ञ। जैसे अग्निमें डालनेपर सब वस्तुएँ स्वाहा हो जाती हैं, ऐसे ही केवल लोकहितके लिये किये जानेवाले सब कर्म स्वाहा हो जाते हैं—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' (गीता ४।२३)।
निष्कामभावपूर्वक केवल लोकहितार्थ किये गये साधारण-से-साधारण कर्म भी परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं। परन्तु सकामभावपूर्वक किये गये बड़े-से-बड़े कर्मोंसे भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना ही बाँधनेवाली है। पदार्थ और क्रियारूप संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यमात्रमें पदार्थ पाने और कर्म करनेका राग रहता है कि मुझे कुछ-न-कुछ मिलता रहे और मैं कुछ-न-कुछ करता रहूँ। इसीको 'पानेकी कामना' तथा 'करनेका वेग' कहते हैं।
मनुष्यमें जो पानेकी कामना रहती है, वह वास्तवमें
- गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च॥
३३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
अपने अंशी परमात्माको ही पानेकी भूख है; परन्तु परमात्मासे विमुख और संसारके सम्मुख होनेके कारण मनुष्य इस भूखको सांसारिक पदार्थोंसे ही मिटाना चाहता है। सांसारिक पदार्थ विनाशी हैं और जीव अविनाशी है। अविनाशीकी भूख विनाशी पदार्थोंसे मिट ही कैसे सकती है? परन्तु जबतक संसारकी सम्मुखता रहती है, तबतक पानेकी कामना बनी रहती है। जबतक मनुष्यमें पानेकी कामना रहती है, तबतक उसमें करनेका वेग बना रहता है। इस प्रकार जबतक पानेकी कामना और करनेका वेग बना हुआ है अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध बना हुआ
है, तबतक जन्म-मरण नहीं छूटता। इससे छूटनेका उपाय है—कुछ भी पानेकी कामना न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको लोकसंग्रह, यज्ञार्थ कर्म, लोकहितार्थ कर्म आदि नामोंसे कहा गया है।
केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे संसारसे सम्बन्ध छूट जाता है और असंगता आ जाती है। अगर केवल भगवान्के लिये कर्म किये जायें, तो संसारसे सम्बन्ध छूटकर असंगता तो आ ही जाती है, इसके साथ एक और विलक्षण बात यह होती है कि भगवान्का 'प्रेम' प्राप्त हो जाता है!
परिशिष्ट भाव —निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्तव्यकर्म करनेका नाम 'यज्ञ' है। यज्ञसे सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बाँधनेवाले नहीं होते। चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक कुल बारह प्रकारके यज्ञ बताये गये हैं, जो इस प्रकार हैं—
(१) ब्रह्मयज्ञ—प्रत्येक कर्ममें कर्ता, करण क्रिया, पदार्थ आदि सबको ब्रह्मरूपसे अनुभव करना।
(२) भगवददर्पणरूप यज्ञ—सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना।
(३) अभिन्नतारूप यज्ञ—असत्से सर्वथा विमुख होकर परमात्मामें लीन हो जाना अर्थात् परमात्मासे भिन्न अपनी स्वतन्त्र सत्ता न रखना।
[ कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ—केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करना। ]
(४) संयमरूप यज्ञ—एकांतकालमें अपनी इन्द्रियोंको विषयोंमें प्रवृत्त न होने देना।
(५) विषय-हवनरूप यज्ञ—व्यवहारकालमें इन्द्रियोंका विषयोंसे संयोग होनेपर भी उनमें राग-द्वेष पैदा न होने देना (गीता—दूसरे अध्यायका चौंसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
(६) समाधिरूप यज्ञ—मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणोंकी क्रियाओंको रोककर ज्ञानसे प्रकाशित समाधिमें स्थित हो जाना।
(७) द्रव्ययज्ञ—सम्पूर्ण पदार्थोंको निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवामें लगा देना।
(८) तपोयज्ञ—अपने कर्तव्यके पालनमें आनेवाली कठिनाइयोंको प्रसन्नतापूर्वक सह लेना।
(९) योगयज्ञ—कार्यकी सिद्धि-असिद्धिमें तथा फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना।
(१०) स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ—दूसरोंके हितके लिये सत्-शास्त्रोंका पठन-पाठन, नाम-जप आदि करना।
(११) प्राणायामरूप यज्ञ—पूरक, कुम्भक और रेचकपूर्वक प्राणायाम करना।
(१२) स्तम्भवृत्ति (चतुर्थ) प्राणायामरूप यज्ञ—नियमित आहार करते हुए प्राण और अपानको अपने-अपने स्थानोंपर रोक देना।
—इन सबका तात्पर्य है कि हमारी मात्र क्रियाएँ यज्ञरूप ही होनी चाहिये, तभी जीवन सफल होगा। तात्पर्य है कि हमें अपने लिये कुछ नहीं करना है। क्रिया और पदार्थके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है, जो क्रिया और पदार्थसे रहित हैं।
सम्बन्ध—चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक भगवान्ने कुल बारह प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और तीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा की। अब भगवान् आगेके श्लोकमें यज्ञ करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि बताते हैं।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
श्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
३३५
कुरुसत्तम | = हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! | ब्रह्म | = परब्रह्म परमात्माको ---|---|---|--- यज्ञशिष्टा- | = यज्ञसे बचे हुए | यान्ति | = प्राप्त होते हैं। मृतभुजः | = अमृतका अनुभव करनेवाले | अयज्ञस्य | = यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये सनातनम् | = सनातन | अयम् | = यह
| लोकः | = मनुष्यलोक (भी) |
|---|---|
| न | = (सुखदायक) नहीं |
| अस्ति | = है, |
| अन्यः | = (फिर) परलोक |
| कृतः | = कैसे (सुखदायक |
| होगा) ? |
व्याख्या—‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’— यज्ञ करनेसे अर्थात् निष्कामभावपूर्वक दूसरोंको सुख पहुँचानेसे समताका अनुभव हो जाना ही ‘यज्ञशिष्ट अमृत’का अनुभव करना है। अमृत अर्थात् अमरताका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। स्वरूपसे मनुष्य अमर है। मरनेवाली वस्तुओंके संगसे ही मनुष्यको मृत्युका अनुभव होता है। इन वस्तुओंको संसारके हितमें लगानेसे जब मनुष्य असंग हो जाता है, तब उसे स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।
कर्तव्यमात्र केवल कर्तव्य समझकर किया जाय, तो वह यज्ञ हो जाता है। केवल दूसरोंके हितके लिये किया जानेवाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है, वह कर्तव्य नहीं होता, प्रत्युत कर्ममात्र होता है, जिससे मनुष्य बँधता है। इसलिये यज्ञमें देना-ही-देना होता है, लेना केवल निर्वाहमात्रके लिये होता है (गीता— चौथे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। शरीर यज्ञ करनेके लिये समर्थ रहे—इस दृष्टिसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये वस्तुओंका उपयोग करना भी यज्ञके अन्तर्गत है। मनुष्य- शरीर यज्ञके लिये ही है। उसे मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिमें लगाना बन्धनकारक है। केवल यज्ञके लिये कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनरहित (मुक्त) हो जाता है और उसे
सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।
‘नार्य लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कृतोऽन्यः कुरुसत्तम’— जैसे तीसरे अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा, ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि यज्ञ न करनेसे तेरा यह लोक भी लाभदायक नहीं रहेगा, फिर परलोकका तो कहना ही क्या है ! केवल स्वार्थभावसे (अपने लिये) कर्म करनेसे इस लोकमें संघर्ष उत्पन्न हो जायगा और सुख-शान्ति भंग हो जायगी तथा परलोकमें कल्याण भी नहीं होगा।
अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे घरमें भी भेद और संघर्ष पैदा हो जाता है, खटपट मच जाती है। घरमें कोई स्वार्थी, पेट्ट व्यक्ति हो, तो घरवालोंको उसका रहना सुहाता नहीं। स्वार्थत्यागपूर्वक अपने कर्तव्यसे सबको सुख पहुँचाना घरमें अथवा संसारमें रहनेकी विद्या है। अपने कर्तव्यका पालन करनेसे दूसरोंको भी कर्तव्य-पालनकी प्रेरणा मिलती है। इससे घरमें एकता और शान्ति स्वाभाविक आ जाती है। परन्तु अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे इस लोकमें सुखपूर्वक जीना भी कठिन हो जाता है और अन्य लोकोंकी तो बात ही क्या है ! इसके विपरीत अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे यह लोक भी सुखदायक हो जाता है और परलोक भी।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंका तत्त्व बतानेकी प्रतिज्ञा की थी। उसका विस्तारसे वर्णन करके अब भगवान् उसका उपसंहार करते हैं।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानिवेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
एवम् | = इस प्रकार (और भी) | वितताः | = विस्तारसे कहे गये हैं। | विद्धि | = जान। ---|---|---|---|---|--- बहुविधाः | = बहुत तरहके | तान् | = उन | एवम् | = इस प्रकार यज्ञाः | = यज्ञ | सर्वान् | = सब यज्ञोंको (तू) | ज्ञात्वा | = जानकर (यज्ञ करनेसे) ब्रह्मणः | = वेदकी | कर्मजान् | = कर्मजन्म | विमोक्ष्यसे | = (तू कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा। मुखे | = वाणीमें | | | |
३३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या—‘एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे’ —चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन किया गया है, उनके सिवाय और भी अनेक प्रकारके यज्ञोंका वेदकी वाणीमें विस्तारसे वर्णन किया गया है। कारण कि साधकोंकी प्रकृतिके अनुसार उनकी निष्ठाएँ भी अलग-अलग होती हैं और तदनुसार उनके साधन भी अलग-अलग होते हैं।
वेदोंमें सकाम अनुष्ठानोंका भी विस्तारसे वर्णन किया गया है। परन्तु उन सबसे नाशवान् फलकी ही प्राप्ति होती है, अविनाशीकी नहीं। इसलिये वेदोंमें वर्णित सकाम अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकको जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मरणके बन्धनमें पड़े रहते हैं (गीता—नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ उन सकाम अनुष्ठानोंकी बात नहीं कही गयी है। यहाँ निष्कामकर्मरूप उन यज्ञोंकी बात कही गयी है, जिनके अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है—‘यान्ति ब्रह्म सनातनम् ’ (गीता ४।३१)।
वेदोंमें केवल स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप सकाम अनुष्ठानोंका ही वर्णन हो, ऐसी बात नहीं है। उनमें परमात्मप्राप्तिके साधनरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन, प्राणायाम, समाधि आदि अनुष्ठानोंका भी वर्णन हुआ है। उपर्युक्त पदोंमें उन्हींका लक्ष्य है।
तीसरे अध्यायके चौदहवें-पंद्रहवें श्लोकोंमें कहा गया है कि यज्ञ वेदसे उत्पन्न हुए हैं और सर्वव्यापी परमात्मा उन यज्ञोंमें नित्य प्रतिष्ठित (विराजमान) हैं। यज्ञोंमें परमात्मा नित्य प्रतिष्ठित रहनेसे उन यज्ञोंका अनुष्ठान केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही करना चाहिये।
‘कर्मजान्विद्धि तासर्वान्’ —चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन हुआ है तथा उसी प्रकार वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उन सब यज्ञोंके लिये यहाँ ‘तान् सर्वान् ’ पद आये हैं।
‘कर्मजान् विद्धि’ पदोंका तात्पर्य है कि वे सब-के-सब यज्ञ कर्मजन्म हैं अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले हैं। शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं, वाणीसे जो कथन होता है और मनसे जो संकल्प होते हैं, वे सभी कर्म कहलाते हैं—‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ’ (गीता १८।१५)।
अर्जुन अपना कल्याण तो चाहते हैं, पर युद्धरूप
कर्तव्य-कर्मको पाप मानकर उसका त्याग करना चाहते हैं। इसलिये ‘कर्मजान् विद्धि ’ पदोंसे भगवान् अर्जुनके प्रति ऐसा भाव प्रकट कर रहे हैं कि युद्धरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करके अपने कल्याणके लिये तू जो साधन करेगा, वह भी तो कर्म ही होगा। वास्तवमें कल्याण कर्मसे नहीं होता, प्रत्युत कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे होता है। इसलिये यदि तू युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको भी निलिप्त रहकर करेगा, तो उससे भी तेरा कल्याण हो जायगा; क्योंकि मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते, प्रत्युत (कर्मकी और उसके फलकी) आसक्ति ही बाँधती है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)। युद्ध तो तेरा सहज कर्म (स्वधर्म) है, इसलिये उसे करना तेरे लिये सुगम भी है।
‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे’ —भगवान्ने इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें बताया कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते—इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बाँधता। तात्पर्य यह है कि जिसने कर्म करते हुए भी उनसे निलिप्त रहनेकी विद्या (—कर्मफलमें स्पृहा न रखना)-को सीखकर उसका अनुभव कर लिया है, वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने इसी बातको ‘एवं ज्ञात्वा ’ पदोंसे कहा। वहाँ भी यही भाव है कि मुमुक्षु पुरुष भी इसी प्रकार जानकर कर्म करते आये हैं। सोलहवें श्लोकमें कर्मोंसे निलिप्त रहनेके इसी तत्त्वको विस्तारसे कहनेके लिये भगवान्ने प्रतिज्ञा की और ‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ’ पदोंसे उसे जाननेका फल मुक्त होना बताया। अब इस श्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ’ पदोंसे ही उस विषयका उपसंहार करते हैं। तात्पर्य यह है कि फलकी इच्छाका त्याग करके केवल लोकहितार्थ कर्म करनेसे मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
संसारमें असंख्य क्रियाएँ होती रहती हैं; परन्तु जिन क्रियाओंसे मनुष्य अपना सम्बन्ध जोड़ता है, उन्हींसे वह बाँधता है। संसारमें कहीं भी कोई क्रिया (घटना) हो, जब मनुष्य उससे अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है—उसमें राजी या नाराज होता है, तब वह उस क्रियासे बाँध जाता है। जब शरीर या संसारमें होनेवाली किसी भी क्रियासे मनुष्यका सम्बन्ध नहीं रहता, तब वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
सम्बन्ध—यज्ञोंका वर्णन सुनकर ऐसी जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंमेंसे कौन-सा यज्ञ श्रेष्ठ है? इसका समाधान भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
३३७
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
परन्तप, पार्थ = हे परन्तप अर्जुन! | श्रेयान् = श्रेष्ठ है। सर्वम् = सम्पूर्ण कर्म = कर्म (और) | ज्ञाने = ज्ञान (तत्त्वज्ञान)-में ---|---|--- द्रव्यमयात् = द्रव्यमय यज्ञात् = यज्ञसे | | परिसमाप्यते = समाप्त (लीन) हो ज्ञानयज्ञः = ज्ञानयज्ञ | अखिलम् = पदार्थ | जाते हैं।
व्याख्या —‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप’—जिन यज्ञोंमें द्रव्यों (पदार्थों) तथा कर्मोंकी आवश्यकता होती है, वे सब यज्ञ ‘द्रव्यमय’ होते हैं। ‘द्रव्य’ शब्दके साथ ‘मय’ प्रत्यय प्रचुरताके अर्थमें है। जैसे मिट्टीकी प्रधानतावाला पात्र ‘मुन्मय’ कहलाता है, ऐसे ही द्रव्यकी प्रधानतावाला यज्ञ ‘द्रव्यमय’ कहलाता है। ऐसे द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानयज्ञमें द्रव्य और कर्मकी आवश्यकता नहीं होती।
सभी यज्ञोंको भगवान्ने कर्मजन्य कहा है (चौथे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। यहाँ भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानयज्ञमें परिसमाप्त हो जाते हैं अर्थात् ज्ञानयज्ञ कर्मजन्य नहीं है, प्रत्युत विवेक-विचारजन्य है। अतः यहाँ जिस ज्ञानयज्ञकी बात आयी है, वह पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंके अन्तर्गत आये ज्ञानयज्ञ (चौथे अध्यायका अष्टाईसवाँ श्लोक)–का वाचक नहीं है, प्रत्युत आगेके (चौतीसवें) श्लोकमें वर्णित ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रक्रियाका वाचक है। पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंका वाचक यहाँ ‘द्रव्यमय यज्ञ’ है। द्रव्यमय यज्ञ समाप्त करके ही ज्ञानयज्ञ किया जाता है।
अगर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा जाय तो ज्ञानयज्ञ भी क्रियाजन्य ही है, परन्तु इसमें विवेक-विचारकी प्रधानता रहती है।
‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’—‘सर्वम्’ और ‘अखिलम्’— दोनों शब्द पर्यायवाची हैं और उनका अर्थ ‘सम्पूर्ण’ होता है। इसलिये यहाँ ‘सर्वम् कर्म ’ का अर्थ सम्पूर्ण कर्म (मात्र कर्म) और ‘अखिलम् ’ का अर्थ सम्पूर्ण द्रव्य (मात्र पदार्थ) लेना ही ठीक मालूम देता है।
जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है, तबतक उसका सम्बन्ध क्रियाओं और पदार्थोंसे बना रहता है। जबतक क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध रहता है, तभीतक अन्तःकरणमें अशुद्धि रहती है, इसलिये अपने लिये कर्म न करनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।
अन्तःकरणमें तीन दोष रहते हैं—मल (संचित पाप),
विक्षेप (चित्की चंचलता) और आवरण (अज्ञान)। अपने लिये कोई भी कर्म न करनेसे अर्थात् संसारमात्रकी सेवाके लिये ही कर्म करनेसे जब साधकके अन्तःकरणमें स्थित मल और विक्षेप—दोनों दोष मिट जाते हैं, तब वह ज्ञानप्राप्तिके द्वारा आवरण-दोषको मिटानेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके गुरुके पास जाता है। उस समय वह कर्म और पदार्थोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् कर्म और पदार्थ उसके लक्ष्य नहीं रहते, प्रत्युत एक चिन्मय तत्त्व ही उसका लक्ष्य रहता है। यही सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थोंका तत्त्वज्ञानमें समाप्त होना है।
ज्ञानप्राप्तिकी प्रचलित प्रक्रिया
शास्त्रोंमें ज्ञानप्राप्तिके आठ अन्तर्ग साधन कहे गये हैं—(१) विवेक, (२) वैराग्य, (३) शमादि षट्सम्पत्ति (शम, दम, श्रद्धा, उपरति, तितिक्षा और समाधान), (४) मुमुक्षुता, (५) श्रवण, (६) मनन, (७) निदिध्यासन और (८) तत्त्वपदार्थसंशोधन। इनमें पहला साधन विवेक है। सत् और असत्को अलग-अलग जानना ‘विवेक’ कहलाता है। सत्-असत्को अलग-अलग जानकर असत्का त्याग करना अथवा संसारसे विमुख होना ‘वैराग्य’ है। इसके बाद शमादि षट्सम्पत्ति आती है। मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे हटाना ‘शम’ है। इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाना ‘दम’ है। ईश्वर, शास्त्र आदिपर पूज्यभावपूर्वक प्रत्यक्षसे भी अधिक विश्वास करना ‘श्रद्धा’ है। वृत्तियोंका संसारकी ओरसे हट जाना ‘उपरति’ है। सरदी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहना, उनकी उपेक्षा करना ‘तितिक्षा’ है। अन्तःकरणमें शंकाओंका न रहना ‘समाधान’ है। इसके बाद चौथा साधन है—मुमुक्षुता। संसारसे छूटनेकी इच्छा ‘मुमुक्षुता’ है।
मुमुक्षुता जाग्रत् होनेके बाद साधक पदार्थों और कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाता है। गुरुके पास निवास करते हुए शास्त्रोंको सुनकर तात्पर्यका निर्णय करना तथा उसे धारण करना ‘श्रवण’ है। श्रवणसे
३३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
प्रमाणगत संशय दूर होता है। परमात्मतत्त्वका युक्ति-प्रयुक्तियोंसे चिन्तन करना 'मनन' है। मननेसे प्रमेयगत संशय दूर होता है। संसारकी सत्ताको मानना और परमात्म-तत्त्वकी सत्ताको न मानना 'विपरीत भावना' कहलाती है। विपरीत भावनाको हटाना 'निदिध्यासन' है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय और केवल एक
परिशिष्ट भाव —द्रव्यमय यज्ञमें क्रिया तथा पदार्थकी मुख्यता है; अतः वह करणसापेक्ष है। ज्ञानयज्ञमें विवेक-विचारकी मुख्यता है; अतः वह करणनिरपेक्ष है। इसलिये द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। ज्ञानयज्ञमें सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेपर कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता; क्योंकि एक परमात्मतत्त्वके सिवाय अन्य सत्ता ही नहीं रहती।
सम्बन्ध—अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं; अतः कल्याणप्राप्तिके विभिन्न साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन करके अब भगवान् ज्ञानयज्ञके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीका वर्णन करते हैं।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
| तत् | = उस (तत्त्वज्ञान) को | करनेसे, | तत्त्वदर्शिनः | = तत्त्वदर्शी (अनुभवी) |
|---|---|---|---|---|
| विद्धि | = (तत्त्वदर्शी ज्ञानी | सेवया | = (उनकी) सेवा | ज्ञानिनः |
| महापुरुषोंके पास | करनेसे (और) | महापुरुष | ||
| जाकर) समझ | परिप्रश्नेन | = सरलतापूर्वक प्रश्न | ज्ञानम् | = (तुझे उस) |
| प्रणिपातेन | = (उनको) साष्टांग | करनेसे | ||
| दण्डवत् प्रणाम | ते | = वे | उपदेश्यन्ति | = उपदेश देंगे। |
व्याख्या —'तद्विद्धि'—अर्जुनने पहले कहा था कि युद्धमें स्वजनोंको मारकर मैं हित नहीं देखता (गीता—पहले अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक); इन आततायियोंको मारनेसे तो पाप ही लगेगा (गीता—पहले अध्यायका छतीसवाँ श्लोक)। युद्ध करनेकी अपेक्षा मैं भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करना श्रेष्ठ समझता हूँ (गीता—दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। इस तरह अर्जुन युद्धरूप कर्तव्य-कर्मका त्याग करना श्रेष्ठ मानते हैं; परन्तु भगवान्के मतानुसार ज्ञानप्राप्तिके लिये कर्मोंका त्याग करना आवश्यक नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका बीसवाँ और चौथे अध्यायका पंद्रहवाँ श्लोक)। इसीलिये यहाँ भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि अगर तू कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके ज्ञान प्राप्त करनेको ही श्रेष्ठ मानता है, तो तू किसी तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषके पास
चिन्मयतत्त्व शेष रह जाय—यह 'तत्त्वपदार्थसंशोधन' है। इसे ही तत्त्व-साक्षात्कार कहते हैं*।
विचारपूर्वक देखा जाय तो इन सब साधनोंका तात्पर्य है—असाधन अर्थात् असत्के सम्बन्धका त्याग। त्याज्य वस्तु अपने लिये नहीं होती, पर त्यागका परिणाम (तत्त्वसाक्षात्कार) अपने लिये होता है।
ही जाकर विधिपूर्वक ज्ञानको प्राप्त कर; मैं तुझे ऐसा उपदेश नहीं दूँगा।
वास्तवमें यहाँ भगवान्का अभिप्राय अर्जुनको ज्ञानी महापुरुषके पास भेजनेका नहीं, प्रत्युत उन्हें चेतानेका प्रतीत होता है। जैसे कोई महापुरुष किसीको उसके कल्याणकी बात कह रहा है, पर श्रद्धाकी कमीके कारण सुननेवालेको वह बात नहीं जँचती, तो वह महापुरुष उसे कह देता है कि तू किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर अपने कल्याणका उपाय पूछ; ऐसे ही भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि अगर तुझे मेरी बात नहीं जँचती, तो तू किसी ज्ञानी महापुरुषके पास जाकर प्रचलित प्रणालीसे ज्ञान प्राप्त कर। ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणाली है—कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके, जिज्ञासापूर्वक श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास
- जो सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं, ऐसे मनुष्योंके द्वारा 'श्रवण' होता है शास्त्रोंका, 'मनन' होता है विषयोंका, 'निदिध्यासन' होता है रूपयोंका और 'साक्षात्कार' होता है दृःखोंका!
श्लोक ३४ ]
- साधक-संजीवनी *
३३९
जाकर विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करना१।
आगे चलकर भगवान्ने अद्वितीसवें श्लोकमें कहा है कि यही तत्त्वज्ञान तुझे अपना कर्तव्य-कर्म करते-करते (कर्मयोग सिद्ध होते ही) दूसरे किसी साधनके बिना स्वयं अपने-आपमें प्राप्त हो जायगा। उसके लिये किसी दूसरेके पास जानेकी जरूरत नहीं है।
‘प्रणिपातेन’ —ज्ञान-प्राप्तिके लिये गुरुके पास जाकर उन्हें साध्यां दण्डवत्-प्रणाम करे। तात्पर्य यह कि गुरुके पास नीच पुरुषकी तरह रहे—‘नीचवत् सेवेत सदगुरुम्’ , जिससे अपने शरीरसे गुरुका कभी निरादर, तिरस्कार न हो जाय। नम्रता, सरलता और जिज्ञासुभावसे उनके पास रहे और उनकी सेवा करे। अपने-आपको उनके समर्पित कर दे; उनके अधीन हो जाय। शरीर और वस्तुएँ—दोनों उनके अर्पण कर दे। साध्यां दण्डवत्-प्रणामसे अपना शरीर और सेवासे अपनी वस्तुएँ उनके अर्पण कर दे।
‘सेवया’ —शरीर और वस्तुओंसे गुरुकी सेवा करे। जिससे वे प्रसन्न हों, वैसा काम करे। उनकी प्रसन्नता प्राप्त करनी हो तो अपने-आपको सर्वथा उनके अधीन कर दे। उनके मनके, संकेतके, आज्ञाके अनुकूल काम करे। यही वास्तविक सेवा है।
सन्त-महापुरुषकी सबसे बड़ी सेवा है—उनके सिद्धान्तोंके अनुसार अपना जीवन बनाना। कारण कि उन्हें सिद्धान्त जितने प्रिय होते हैं, उतना अपना शरीर प्रिय नहीं होता। सिद्धान्तकी रक्षाके लिये वे अपने शरीरतकका सहर्ष त्याग कर देते हैं। इसलिये सच्चा सेवक उनके सिद्धान्तोंका दृढ़तापूर्वक पालन करता है।
‘परिप्रश्नेन’ —केवल परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये, जिज्ञासुभावसे सरलता और विनम्रतापूर्वक गुरुसे प्रश्न करे। अपनी विद्वत्ता दिखानेके लिये अथवा उनकी परीक्षा करनेके लिये प्रश्न न करे।
मैं कौन हूँ? संसार क्या है? बन्धन क्या है? मोक्ष क्या है? परमात्मतत्त्वका अनुभव कैसे हो सकता है? मेरे साधनमें क्या-क्या बाधाएँ हैं? उन बाधाओंको कैसे दूर किया जाय? तत्त्व समझमें क्यों नहीं आ रहा है? आदि आदि प्रश्न केवल अपने बोधके लिये (जैसे-जैसे जिज्ञासा हो, वैैसे-वैैसे) करे।
‘ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ —‘तत्त्वदर्शिनः’ पदका तात्पर्य यह है कि उस महापुरुषको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो गया हो; और ‘ज्ञानिनः’ पदका तात्पर्य यह है कि उन्हें वेदों तथा शास्त्रोंका अच्छी तरह ज्ञान हो। ऐसे तत्त्वदर्शी और ज्ञानी महापुरुषके पास जाकर ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।
अन्तःकरणकी शुद्धिके अनुसार जानके अधिकारी तीन प्रकारके होते हैं—उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ। उत्तम अधिकारीको श्रवणमात्रसे तत्त्वज्ञान हो जाता है२। मध्यम अधिकारीको श्रवण, मनन और निदिध्यासन करनेसे तत्त्वज्ञान होता है। कनिष्ठ अधिकारी तत्त्वको समझनेके लिये भिन्न-भिन्न प्रकारकी शंकाएँ किया करता है। उन शंकाओंका समाधान करनेके लिये वेदों और शास्त्रोंका ठीक-ठीक ज्ञान होना आवश्यक है; क्योंकि वहाँ केवल युक्तियोंसे तत्त्वको समझाया नहीं जा सकता। अतः यदि गुरु तत्त्वदर्शी हो, पर ज्ञानी न हो, तो वह शिष्यकी तरह-तरहकी शंकाओंका समाधान नहीं कर सकेगा। यदि गुरु शास्त्रोंका ज्ञाता हो, पर तत्त्वदर्शी न हो तो उसकी बातें वैसी ठोस नहीं होंगी, जिससे श्रोताको ज्ञान हो जाय। वह बातें सुना सकता है, पुस्तकें पढ़ा सकता है, पर शिष्यको बोध नहीं करा सकता। इसलिये गुरुका तत्त्वदर्शी और ज्ञानी—दोनों ही होना बहुत जरूरी है।
‘उपदेश्यन्ति ते ज्ञानम्’ —महापुरुषको दण्डवत्-प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और उनसे सरलता-पूर्वक प्रश्न करनेसे वे तुझे तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे—
१-आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताः क्रियाः कृत्वा समासादितशुद्धमानसः।
समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः समाश्रयेत् सदगुरुमात्मलब्धये॥ (अध्यात्मरामायण, उत्तर० ५।७)
‘सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये शास्त्रोंमें वर्णित क्रियाओंका यथावत् पालन करके चित्त शुद्ध हो जानेपर उन क्रियाओंका त्याग कर दे, फिर शम-दम आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सदगुरुकी शरणमें जाय।’
तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्याणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुण्डक० १।२।१२)
‘उस ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये वह जिज्ञासु साधक हाथमें समिधा लिये हुए विनयपूर्वक वेदशास्त्रोंके ज्ञाता और तत्त्वज्ञानी गुरुके पास जाय।’
२-उत्तम अधिकारी वही है, जिसमें तत्त्वप्राप्तिकी लगन हो, जिसको तत्त्वप्राप्तिमें भविष्य अच्छा न लगे अर्थात् जो वर्तमानमें ही तत्काल तत्त्वप्राप्ति करना चाहता हो।
३४०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
इसका यह तात्पर्य नहीं है कि महापुरुषको इन सबकी अपेक्षा रहती है। वास्तवमें उन्हें प्रणाम, सेवा आदिकी किंचिन्मात्र भी भूख नहीं होती। यह सब कहनेका भाव है कि जब साधक इस प्रकार जिज्ञासा करता है और सरलतापूर्वक महापुरुषके पास जाकर रहता है, तब उस महापुरुषके अन्तःकरणमें उसके प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं, जिससे साधकको बहुत लाभ होता है। यदि साधक इस प्रकार उनके पास न रहे, तो ज्ञान मिलनेपर भी वह उसे ग्रहण नहीं कर सकेगा।
‘ज्ञानम्’ पद यहाँ तत्त्वज्ञान अथवा स्वरूप-बोधका वाचक है। वास्तवमें ज्ञान स्वरूपका नहीं होता, प्रत्युत संसारका होता है। संसारका ज्ञान होते ही संसारसे सम्बन्ध-
विच्छेद हो जाता है और स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।
‘उपदेश्यन्ति’ पदका यह तात्पर्य है कि महापुरुष ज्ञानका उपदेश तो देते हैं, पर उससे साधकको बोध हो ही जाय, ऐसा निश्चित नहीं है। आगे उन्नतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त करता है—‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’। कारण कि श्रद्धा अन्तःकरणकी वस्तु है; परन्तु प्रणाम, सेवा, प्रश्न आदि कपटपूर्वक भी किये जा सकते हैं। इसलिये यहाँ महापुरुषके द्वारा केवल ज्ञानका उपदेश देनेकी ही बात कही गयी है और उन्नतालीसवें श्लोकमें श्रद्धावान् साधकके द्वारा ज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही गयी है।
सम्बन्ध—तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीका वर्णन करके अब भगवान् आगेके तीन (पैंतीसवें, छत्तीसवें और सैंतीसवें) श्लोकोंमें तत्त्वज्ञानका वास्तविक माहात्म्य बताते हैं।
यज्ञात्वा न पुनर्मीहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
| यत् | = जिस (तत्त्वज्ञान) - का | न | = नहीं | अशेषेण | = निःशेषभावसे (पहले) |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञात्वा | = अनुभव करनेके बाद (तू) | यास्यसि | = प्राप्त होगा (और) | आत्मनि | = अपनेमें (और) |
| पुनः | = फिर | पाण्डव | = हे अर्जुन ! | अथो | = उसके बाद |
| एवम् | = इस प्रकार | येन | = जिस (तत्त्व-ज्ञान)-से | मयि | = मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें |
| मोहम् | = मोहको | भूतानि | = (तू) सम्पूर्ण प्राणियोंको | द्रक्ष्यसि | = देखेगा। |
व्याख्या—‘यज्ञात्वा न पुनर्मीहमेवं यास्यसि पाण्डव’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि वे महापुरुष तेरेको तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे; परन्तु उपदेश सुननेमात्रसे वास्तविक बोध अर्थात् स्वरूपका यथार्थ अनुभव नहीं होता—‘श्रुत्वाप्येन वेद न चैव कश्चित्’ (गीता २।२९); और वास्तविक बोधका वर्णन भी कोई कर नहीं सकता। कारण कि वास्तविक बोध करण-निरपेक्ष है अर्थात् मन, वाणी आदिसे परे है। अतः वास्तविक बोध स्वयंके द्वारा ही स्वयंको होता है और यह तब होता है, जब मनुष्य अपने विवेक (जड़-चेतनके भेदका ज्ञान)-को महत्त्व देता है। विवेकको महत्त्व देनेसे जब अविवेक सर्वथा मिट जाता है, तब वह विवेक ही वास्तविक बोधमें परिणत हो जाता है और जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करा देता है। वास्तविक बोध होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता।
गीताके पहले अध्यायमें अर्जुनका मोह प्रकट होता है कि युद्धमें सभी कुटुम्बी, सगे-सम्बन्धी लोग मर जायेंगे तो उन्हें पिण्ड और जल देनेवाला कौन होगा? पिण्ड और जल न देनेसे वे नरकोंमें गिर जायेंगे। जो जीवित रह जायेंगे, उन स्त्रियोंका और बच्चोंका निर्वाह और पालन कैसे होगा? आदि-आदि। तत्त्वज्ञान होनेके बाद ऐसा मोह नहीं रहता। बोध होनेपर जब संसारसे मैं-मेरेपनका सम्बन्ध नहीं रहता, तब पुनः मोह होनेका प्रश्न ही नहीं रहता।
‘येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मनि’—तत्त्वज्ञान होते ही ऐसा अनुभव होता है कि मेरी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है और उस सत्ताके अन्तर्गत ही अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्नकी सृष्टिको अपनेमें ही देखता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान होनेपर मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों (जगत्)-को अपनेमें ही देखता है। छठे अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें
श्लोक ३५ ]
- साधक-संजीवनी *
३४९
आये ‘सर्वभूतानि चान्मनि’ पदोंसे भी इसी स्थितिका वर्णन किया गया है।
‘अथो मयि’—तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी जो प्रचलित प्रक्रिया है, उसीके अनुसार भगवान् कह रहे हैं कि गुरुसे विधिपूर्वक (श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक) तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेपर साधक पहले अपने स्वरूपमें सम्पूर्ण प्राणियोंको देखता है—यह ‘त्वम्’ पदका अनुभव हुआ, फिर वह स्वरूपको तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको एक सच्चिदानन्दधन परमात्मामें देखता है—यह ‘तत्’ पदका अनुभव हुआ। इस तरह उसको पहले ‘त्वम्’ (स्वरूप) का और फिर ‘तत्’ (परमात्मतत्त्व) के साथ ‘त्वम्’ की एकताका अनुभव हो जाता है। एक ब्रह्म-ही-ब्रह्म शेष रह जाता है। ऐसी अवस्थामें द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—ये तीनों ही नहीं रहते। परन्तु लोगोंकी दृष्टिमें उसके अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें जो भाव दीखता है, उसको लेकर ही भगवान् कहते हैं कि वह सबको मेरेमें देखता है।
परिशिष्ट भाव —तत्त्वज्ञान अथवा अज्ञानका नाश एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञानकी आवृत्ति नहीं होती। वह एक बार अनुभवमें आ गया तो सदाके लिये आ ही गया! कारण कि जब अज्ञानकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है, तो फिर पुनः अज्ञान कैसे होगा? अतः नित्यनिवृत्त अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है और नित्यप्राप्त तत्त्वकी ही प्राप्ति होती है।
स्वयं सत्तामात्र तथा बोधस्वरूप है। बोधका अनादर करनेसे हमने असत्को स्वीकार किया और असत्को स्वीकार करनेसे अविवेक हुआ। तात्पर्य है कि बोधसे विमुख होकर हमने असत्को सत्ता दी और असत्को सत्ता देनेसे विवेकका अनादर हुआ। वास्तवमें बोधका अनादर किया नहीं है, प्रत्युत अनादिकालसे अनादर है। अगर ऐसा मानें कि हमने बोधका अनादर किया तो इससे सिद्ध होगा कि पहले बोधका आदर था। अतः अब आदर करेंगे तो पुनः अनादर हो जायगा। परन्तु बोध एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है।
तत्त्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता; क्योंकि वास्तवमें मोह है ही नहीं। मिटता वही है, जो नहीं होता और मिलता वही है, जो होता है।
जगत् जीवके अन्तर्गत है और जीव परमात्माके अन्तर्गत है, इसलिये साधक पहले जगत्को अपनेमें देखता है—‘द्रक्ष्यस्यात्मानि’, फिर अपनेको परमात्मामें देखता है—‘अथो मयि’। ‘द्रक्ष्यस्यात्मानि’ में आत्मज्ञान (ज्ञान) है और ‘अथो मयि’ में परमात्मज्ञान (विज्ञान) है। आत्मज्ञानमें निजानन्द है और परमात्मज्ञानमें परमानन्द है। लौकिक निष्ठा (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग)—से आत्मज्ञानका अनुभव होता है और अलौकिक निष्ठा (भक्तियोग)—से परमात्मज्ञानका अनुभव होता है।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इस प्रकार समग्रका ज्ञान ‘परमात्मज्ञान’ है। आत्मज्ञानसे मुक्ति तो हो जाती है, पर सूक्ष्म अहम्की गन्ध रह जाती है, जिससे दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोनोंमें मतभेद रहता है। अगर सूक्ष्म अहम्की गन्ध न हो तो फिर मतभेद कहाँसे आया? परन्तु परमात्मज्ञानसे सूक्ष्म अहम्की गन्ध भी नहीं रहती और उससे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण दार्शनिक मतभेद समाप्त हो जाते हैं। तात्पर्य हुआ कि जबतक ‘आत्मनि’ है, तबतक दार्शनिक मतभेद हैं। जब ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव होनेपर सब मतभेद मिट जाते हैं, तब ‘अथो मयि’ हो जाता है। ‘अथो मयि’ में एक परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता नहीं रहती।
स्थूल दृष्टिसे समुद्र और लहरोंमें भिन्नता दीखती है। लहरें समुद्रमें ही उठती और लीन होती रहती हैं। परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे समुद्र और लहरोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सत्ता केवल एक जल-तत्त्वकी ही है। जल-तत्त्वमें न समुद्र है, न लहरें। पृथ्वीसे सम्बन्ध होनेके कारण समुद्र भी सीमित है और लहरें भी; परन्तु जल-तत्त्व सीमित नहीं है। अतः समुद्र और लहरोंको न देखकर एक जल-तत्त्वको देखना ही यथार्थ दृष्टि है। इसी तरह संसाररूप समुद्र और शरीररूप लहरोंमें भिन्नता दीखती है। शरीर संसारमें ही उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। परन्तु वास्तवमें संसार और शरीर-समुदायकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सत्ता केवल परमात्मतत्त्वकी ही है। परमात्मतत्त्वमें न संसार है, न शरीर। प्रकृतिसे सम्बन्ध होनेके कारण संसार भी सीमित है और शरीर भी। परन्तु परमात्मतत्त्व सीमित नहीं है। अतः संसार और शरीरोंको न देखकर एक परमात्मतत्त्वको देखना ही यथार्थ दृष्टि है (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)।
३४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
| चेत् | = अगर (तू) | पापकृतमः | = अधिक पापी | सर्वम् | = सम्पूर्ण |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वेभ्यः | = सब | असि | = हैं, (तो भी तू) | वृजिनम् | = पाप-समुद्रसे |
| पापेभ्यः | = पापियोंसे | ज्ञानप्लवेन | = ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा | सन्तरिष्यसि | = अच्छी तरह तर |
| अपि | = भी | एव | = निःसन्देह | जायगा । |
व्याख्या—‘अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः’— ‘पाप करनेवालोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—(१) ‘पापकृत’ अर्थात् पाप करनेवाला, (२) ‘पापकृतर’ अर्थात् दो पापियोंमें एकसे अधिक पाप करनेवाला और (३) ‘पापकृतम’ अर्थात् सम्पूर्ण पापियोंमें सबसे अधिक पाप करनेवाला । यहाँ ‘पापकृतमः’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि अगर तू सम्पूर्ण पापियोंमें भी अत्यन्त पाप करनेवाला है, तो भी तत्त्वज्ञानसे तू सम्पूर्ण पापोंसे तर सकता है ।
भगवानुका यह कथन बहुत आश्वासन देनेवाला है । तात्पर्य यह है कि जो पापोंका त्याग करके साधनमें लगा हुआ है, उसका तो कहना ही क्या है ! पर जिसने पहले बहुत पाप किये हों, उसको भी जिज्ञासा जाग्रत् होनेके बाद अपने उद्धारके विषयमें कभी निराश नहीं होना चाहिये । कारण कि पापी-से-पापी मनुष्य भी यदि चाहे तो इसी जन्ममें अभी अपना कल्याण कर सकता है । पुराने पाप उतने बाधक नहीं होते, जितने वर्तमानके पाप बाधक होते हैं । अगर मनुष्य वर्तमानमें पाप करना छोड़ दे और निश्चय कर ले कि अब मैं कभी पाप नहीं करूँगा और केवल तत्त्वज्ञानको प्राप्त करूँगा, तो उसके पापोंका नाश होते देरी नहीं लगती ।
यदि कहीं सौ वर्षोंसे घना अँधेरा छाया हो और वहाँ दीपक जला दिया जाय, तो उस अँधेरेको दूर करके प्रकाश करनेमें दीपकको सौ वर्ष नहीं लगते, प्रत्युत दीपक जलाते ही तत्काल अँधेरा मिट जाता है । इसी तरह तत्त्वज्ञान होते ही पहले किये गये सम्पूर्ण पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
‘चेत्’—(यदि) पद देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः
परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान्ने ‘पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः’ पदोंसे पापीकी आखिरी हद बता दी है ! यद्यपि ‘पापेभ्यः’ पद बहुवचन होनेसे सम्पूर्ण पापियोंका वाचक है, फिर भी भगवान्ने इसके साथ ‘सर्वेभ्यः’ पद दिया । ‘सर्वेभ्यः’ पद भी सम्पूर्णका वाचक है । ये दो पद देनेके बाद भी भगवान्ने ‘पापकृतमः’ पद और दिया है, जो अतिशयताका बोधक है । पहले ‘पापकृत’ होता है, फिर ‘पापकृतर’ होता है और फिर ‘पापकृतम’ होता है । तात्पर्य निकला कि सम्पूर्ण संसारमें जितने भी पापी हो सकते हैं, उन सम्पूर्ण पापियोंसे भी जो अत्यधिक पापी है, उसको भी ज्ञान प्राप्त
ऐसे पापी मनुष्य परमात्मामें नहीं लगते; परन्तु वे परमात्मामें लग नहीं सकते—ऐसी बात नहीं है । किसी महापुरुषके संगसे अथवा किसी घटना, परिस्थिति, वातावरण आदिके प्रभावसे यदि उनका ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय कि अब परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना ही है, तो वे भी सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे भलीभाँति तर जाते हैं ।
नवें अध्यायके तीसवें-इकतीसवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने ऐसी ही बात अनन्यभावसे अपना भजन करनेवालेके लिये कही है कि महान् दुराचारी मनुष्य भी अगर यह निश्चय कर ले कि अब मैं भगवानुका भजन ही करूँगा, तो उसका भी बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है ।
‘सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि’—प्रकृतिके कार्य शरीर और संसारके सम्बन्धसे ही सम्पूर्ण पाप होते हैं । तत्त्वज्ञान होनेपर जब इनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब पाप कैसे रह सकते हैं—‘मूलाभावे कृतः शाखा’ ?
परमात्माके स्वतःसिद्ध ज्ञानके साथ एक होना ही ‘ज्ञानप्लव’ अर्थात् ज्ञानरूप नौकाका प्राप्त होना है । मनुष्य कितना ही पापी क्यों न रहा हो, ज्ञानरूप नौकासे वह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे अच्छी तरह तर जाता है । यह ज्ञानरूप नौका कभी टूटती-फूटती नहीं, इसमें कभी छिद्र नहीं होता और यह कभी डूबती भी नहीं । यह मनुष्यको पाप-समुद्रसे पार करा देती है ।
‘ज्ञानयज्ञ’ (चौथे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) से ही यह ज्ञानरूप नौका प्राप्त होती है । यह ज्ञानयज्ञ आरम्भसे ही ‘विवेक’ को लेकर चलता है और ‘तत्त्वज्ञान’ में इसकी पूर्णता हो जाती है । पूर्णता होनेपर लेशमात्र भी पाप नहीं रहता ।
श्लोक ३७ ] * साधक-संजीवनी * ३४३
हो सकता है! कारण कि पाप कितने ही क्यों न हों, हैं वे असत् ही, जबकि ज्ञान सत् है। सत्के आगे असत् कैसे
टिक सकता है! पाप अपवित्र है, जबकि ज्ञान परमपवित्र है (इसी अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। अपवित्र वस्तु
पवित्र वस्तुको कैसे अटका सकती है! अतः पापोंमें ज्ञानको अटकानेकी ताकत नहीं है। ज्ञानप्राप्तिमें खास बाधा है-
नाशवान् सुखकी आसक्ति (गीता-तीसरे अध्यायके सैंतीसवेंसे इकतालीसवें श्लोकतक)। भोगासक्ति के कारण ही
मनुष्यकी पारमार्थिक विषयमें रुचि नहीं होती और रुचि न होनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति बड़ी कठिन प्रतीत होती है।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
अर्जुन = हे अर्जुन! | एधांसि = ईंधनोंको | ज्ञानाग्निः = ज्ञानरूपी अग्नि
यथा = जैसे | भस्मसात् = सर्वथा भस्म | सर्वकर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंको
समिद्धः = प्रज्वलित | कुरुते = कर देती है, | भस्मसात् = सर्वथा भस्म
अग्निः = अग्नि | तथा = ऐसे ही | कुरुते = कर देती है।
व्याख्या-'यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् | आना-जाना, भोजनका पचना आदि क्रियाएँ जिस समष्टि
कुरुतेऽर्जुन'-पीछेके श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानरूपी नौकाके | प्रकृतिसे होती हैं, उसी प्रकृतिसे खाना-पीना, चलना,
द्वारा सम्पूर्ण पाप-समुद्रको तरनेकी बात कही। उससे यह | बैठना, देखना, बोलना आदि क्रियाएँ भी होती हैं। परन्तु
प्रश्न पैदा होता है कि पापसमुद्र तो शेष रहता ही है, फिर | मनुष्य अज्ञानवश उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता
उसका क्या होगा? अतः भगवान् पुनः दूसरा दृष्टान्त देते | है अर्थात् अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है।
हुए कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि काष्ठादि सम्पूर्ण | इससे वे क्रियाएँ 'कर्म' बनकर मनुष्यको बाँध देती हैं।
ईंधनोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका | इस प्रकार माने हुए सम्बन्धसे ही कर्म होते हैं, अन्यथा
किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता, ऐसे ही ज्ञानरूप | क्रियाएँ ही होती हैं।
अग्नि सम्पूर्ण पापोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि | तत्त्वज्ञान होनेपर अनेक जन्मोंके संचित कर्म सर्वथा
उनका किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता। | नष्ट हो जाते हैं। कारण कि सभी संचित कर्म अज्ञानके
'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा'- | आश्रित रहते हैं; अतः ज्ञान होते ही (आश्रय, आधाररूप
जैसे अग्नि काष्ठको भस्म कर देती है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान- | अज्ञान न रहनेसे) वे नष्ट हो जाते हैं। तत्त्वज्ञान होनेपर
रूपी अग्नि संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-तीनों कर्मोंको | कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता; अतः सभी क्रियमाण कर्म अकर्म
भस्म कर देती है। जैसे अग्निमें काष्ठका अत्यन्त अभाव | हो जाते हैं अर्थात् फलजनक नहीं होते। प्रारब्ध कर्मका
हो जाता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञानमें सम्पूर्ण कर्मोंका अत्यन्त | घटना-अंश (अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति) तो जबतक
अभाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान होनेपर कर्मोंसे | शरीर रहता है, तबतक रहता है; परन्तु ज्ञानीपर उसका कोई
अथवा संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। | असर नहीं पड़ता। कारण कि तत्त्वज्ञान होनेपर भोक्तृत्व
सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अनुभव | नहीं रहता; अतः अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति सामने
नहीं होता, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही शेष रहता है। | आनेपर वह सुखी-दुःखी नहीं होता। इस प्रकार तत्त्वज्ञान
वास्तवमें मात्र क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं | होनेपर संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-तीनों कर्मोंसे
(गीता-तेरहवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। उन क्रियाओंसे | किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। कर्मोंसे अपना सम्बन्ध
अपना सम्बन्ध मान लेनेसे कर्म होते हैं। नाड़ियोंमें रक्त- | न रहनेसे कर्म नहीं रहते, भस्म रह जाती है अर्थात् सभी
प्रवाह होना, शरीरका बालकसे जवान होना, श्वासोंका | कर्म अकर्म हो जाते हैं।
सम्बन्ध-अब भगवान् आगे कहे श्लोकके पूर्वार्धमें तत्त्वज्ञानकी महिमा बताते हुए उत्तरार्धमें कर्मयोगकी विशेष महत्ता प्रकट करते हैं।
३४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ४
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
इह = इस मनुष्यलोकमें
ज्ञानेन = ज्ञानके
सदृशम् = समान
पवित्रम् = पवित्र करनेवाला
हि = निःसन्देह
(दूसरा कोई
साधन) = कर्मयोगी)
न = नहीं
विद्यते = है।
योगसंसिद्धः = जिसका योग
भलीभाँति सिद्ध
हो गया है, (वह
तत् = उस तत्त्वज्ञानको
कालेन = अवश्य ही
स्वयम् = स्वयं
आत्मनि = अपने-आपमें
विन्दति = पा लेता है।
व्याख्या—'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते'—
यहाँ 'इह' पद मनुष्यलोकका वाचक है; क्योंकि सब-की-
सब पवित्रता इस मनुष्यलोकमें ही प्राप्त की जाती है।
पवित्रता प्राप्त करनेका अधिकार और अवसर मनुष्य-
शरीरमें ही है। ऐसा अधिकार किसी अन्य शरीरमें नहीं
है। अलग-अलग लोकोंके अधिकार भी मनुष्यलोकसे ही
मिलते हैं।
संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको माननेसे तथा उससे सुख
लेनेकी इच्छासे ही सम्पूर्ण दोष, पाप उत्पन्न होते हैं
(गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। तत्त्वज्ञान
होनेपर जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं रहती, तब
सम्पूर्ण पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है और महान्
पवित्रता आ जाती है। इसलिये संसारमें ज्ञानके समान पवित्र
करनेवाला दूसरा कोई साधन है ही नहीं।
संसारमें यज्ञ, दान, तप, पूजा, व्रत, उपवास, जप,
ध्यान, प्राणायाम आदि जितने साधन हैं तथा गंगा, यमुना,
गोदावरी आदि जितने तीर्थ हैं, वे सभी मनुष्यके पापोंका
नाश करके उसे पवित्र करनेवाले हैं। परन्तु उन सबमें भी
तत्त्वज्ञानके समान पवित्र करनेवाला कोई भी साधन, तीर्थ
आदि नहीं है; क्योंकि वे सब तत्त्वज्ञानके साधन हैं और
तत्त्वज्ञान उन सबका साध्य है।
परमात्मा पवित्रोंके भी पवित्र हैं—'पवित्राणां पवित्रम्'
(विष्णुसहस्र० १०)। उन्हीं परमपवित्र परमात्माका अनुभव
करानेवाले होनेसे तत्त्वज्ञान भी अत्यन्त पवित्र है।
'योगसंसिद्धः'—जिसका कर्मयोग सिद्ध हो गया है
अर्थात् कर्मयोगका अनुष्ठान सांगोपांग पूर्ण हो गया है, उस
महापुरुषको यहाँ 'योगसंसिद्धः' कहा गया है, छठे
अध्यायके चौथे श्लोकमें उसीको 'योगारूढः' कहा गया
है। योगारूढ होना कर्मयोगकी अन्तिम अवस्था है। योगारूढ
होते ही तत्त्वबोध हो जाता है। तत्त्वबोध हो जानेपर
संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
कर्मयोगीकी मुख्य बात है—अपना कुछ भी न मानकर
सम्पूर्ण कर्म संसारके हितके लिये करना, अपने लिये कुछ
भी न करना। ऐसा करनेपर सामग्री और क्रिया-शक्ति-
दोनोंका प्रवाह संसारकी सेवामें हो जाता है। संसारकी
सेवामें प्रवाह होनेपर 'मैं सेवक हूँ' ऐसा (अहम्का) भाव
भी नहीं रहता अर्थात् सेवक नहीं रहता, केवल सेवा रह
जाती है। इस प्रकार जब सेवक सेवा बनकर सेव्यमें लीन
हो जाता है, तब प्रकृतिके कार्य शरीर तथा संसारसे सर्वथा
वियोग (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है। वियोग होनेपर
संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रह जाती, केवल क्रिया रह
जाती है। इसीको योगकी संसिद्धि अर्थात् सम्यक् सिद्धि
कहते हैं।
कर्म और फलकी आसक्तिसे ही 'योग'का अनुभव
नहीं होता। वास्तवमें कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद
स्वतःसिद्ध है। कारण कि कर्म और पदार्थ तो अनित्य
(आदि-अन्तवाले) हैं, और अपना स्वरूप नित्य है।
अनित्य कर्मोंसे नित्य स्वरूपको क्या मिल सकता है?
इसलिये स्वरूपको कर्मोंके द्वारा कुछ नहीं पाना है—यह
'कर्मविज्ञान' है। कर्मविज्ञानका अनुभव होनेपर कर्मफलसे
भी सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् कर्मजन्य सुख
लेनेकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है, जिसके मिटते ही
परमात्माके साथ अपने स्वाभाविक नित्य-सम्बन्धका अनुभव
हो जाता है, जो 'योगविज्ञान' है। योगविज्ञानका अनुभव
होना ही योगकी संसिद्धि है।
'तत्स्वयं कालेनात्मनि विन्दति'—जिस तत्त्वज्ञानसे
सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं और जिसके समान पवित्र
करनेवाला संसारमें दूसरा कोई साधन नहीं है, उसी तत्त्व-
ज्ञानको कर्मयोगी योगसंसिद्ध होनेपर दूसरे किसी साधनके
बिना स्वयं अपने-आपमें ही तत्काल प्राप्त कर लेता है।
श्लोक ३८ ]
- साधक-संजीवनी *
३४५
चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया था कि प्रचलित प्रणालीके अनुसार कर्मोंका त्याग करके गुरुके पास जानेपर वे तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे—‘उपदेश्यन्ति ते ज्ञानम्।’ किंतु गुरु तो उपदेश दे देंगे, पर उससे तत्त्वज्ञान हो ही जायगा—ऐसा निश्चित नहीं है। फिर भी भगवान् यहाँ बताते हैं कि कर्मयोगकी प्रणालीसे कर्म करनेवाले मनुष्यको योगसंसिद्धि मिल जानेपर तत्त्वज्ञान हो ही जाता है।
उपर्युक्त पदोंमें आया ‘कालेन’ पद विशेष ध्यान देनेयोग्य है। भगवान्ने व्याकरणकी दृष्टिसे ‘कालेन’ पद तृतीयामें प्रयुक्त करके यह बताया है कि कर्मयोगसे अवश्य ही तत्त्वज्ञान अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है*।
‘स्वयम्’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी गुरुकी, ग्रन्थकी या दूसरे किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है। कर्मयोगकी विधिसे कर्तव्य-कर्म करते हुए ही उसे अपने-आप तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।
‘आत्मनि विन्दति’ पदोंका तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर उसे अपने-आपमें ही स्वतःसिद्ध तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है।
परमात्मा सब जगह परिपूर्ण होनेसे अपनेमें भी है। जहाँ साधक ‘मैं हूँ’-रूपसे अपने-आपको मानता है, वहाँ परमात्मा विराजमान है, परन्तु परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण अपने-आपमें स्थित परमात्माका अनुभव नहीं होता। कर्मयोगका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेसे जब संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् संसारसे तादात्म्य, ममता और कामना मिट जाती है, तब उसे अपने-आपमें ही तत्त्वका सुखपूर्वक अनुभव हो जाता है—‘निर्दन्तो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५।३)।
परमात्मतत्त्वका ज्ञान करण-निरपेक्ष है। इसलिये उसका अनुभव अपने-आपसे ही हो सकता है, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि
आदि करणोंसे नहीं। साधक किसी भी उपायसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे, पर अन्तमें वह अपने-आपसे ही तत्त्वको जानेगा। श्रवण-मनन आदि साधन तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें असम्भावना, विपरीत भावना आदि ज्ञानकी बाधाओंको दूर करनेवाले परम्परागत साधन माने जा सकते हैं, पर वास्तविक बोध अपने-आपसे ही होता है; कारण कि मन, बुद्धि आदि सब जड़ हैं। जड़के द्वारा उस चिन्मय तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है, जो जड़से सर्वथा अतीत है? वास्तवमें तत्त्वका अनुभव जड़के सम्बन्ध-विच्छेदसे होता है, जड़के द्वारा नहीं। जैसे, आँखोंसे संसारको तो देखा जा सकता है, पर आँखोंसे आँखोंको नहीं देखा जा सकता; परन्तु यह कहा जा सकता है कि जिससे देखते हैं, वही आँख है। इसी प्रकार जो सबको जाननेवाला है, उसे किसके द्वारा जाना जा सकता है—‘विज्ञातारमे केन विजानीयात्’ (बृहदारण्यक० २।४।१४)? परन्तु जिससे सम्पूर्ण वस्तुओंका ज्ञान होता है, वही परमात्मतत्त्व है।
विशेष बात
इस अध्यायके तैंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक भगवान्ने ज्ञानकी जो प्रशंसा की है, उससे ज्ञानयोगकी विशेष महिमा झलकती है; परन्तु वास्तवमें उसे ज्ञानयोगकी ही महिमा मान लेना उचित प्रतीत नहीं होता। गहरा विचार करें तो इसमें अर्जुनके प्रति भगवान्का एक गूढ़ अभिप्राय प्रतीत होता है कि जो तत्त्वज्ञान इतना महान् और पवित्र है तथा जिस ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये मैं तुझे तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जानेकी आज्ञा दे रहा हूँ, उस ज्ञानको तू स्वयं कर्मयोगके द्वारा अवश्यमेव प्राप्त कर सकता है—‘तत्त्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ (गीता ४।३८)। इस प्रकार ज्ञानयोगकी प्रशंसाके ये श्लोक वास्तवमें प्रकारान्तरसे कर्मयोगकी ही विशेषता, महिमा बतानेके लिये हैं। भगवान्का अभिप्राय यह नहीं था कि अर्जुन ज्ञानियोंके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करे। भगवान्का अभिप्राय यह था
- ‘कालेन’—इस शब्दमें ‘कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे’ (पाणिनिस्मृत २।३।५)—इससे प्राप्त द्वितीया विभक्तिका निषेध करके ‘अपवर्गं तृतीया’ (वही २।३।६)—इससे तृतीया विभक्ति हुई है। तृतीया विभक्ति वहाँ होती है, जहाँ अवश्य फलप्राप्तिका अर्थात् कार्य अवश्य सिद्ध होनेका घोषित होता है। परन्तु जहाँ द्वितीया विभक्ति होती है, वहाँ अवश्य फलप्राप्तिका घोषित नहीं होता; जैसे—‘मासम् अर्थाते’ पद द्वितीयामें प्रयुक्त होता है, तो इसका अर्थ है कि एक मासमें भी पूरा न पड़ सकता। परन्तु यही पद यदि ‘मासेन अर्थाते’ इस प्रकार तृतीयामें प्रयुक्त होता है, तो इसका अर्थ है कि एक मासमें पूरा पड़ लिया। इसी प्रकार भगवान्ने यहाँ द्वितीयामें ‘कालम्’ पद न देकर तृतीयामें ‘कालेन’ पद दिया है, जिससे यह अर्थ निकलता है कि कर्मयोगसे अवश्य फलप्राप्ति (सिद्धि) होती है।
३४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कि जो ज्ञान इतनी दुर्लभतासे, ज्ञानियोंके पास रहकर उनकी सेवा करके और विनयपूर्वक प्रश्नोत्तर करके तथा उसके अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके प्राप्त करेगा, वही ज्ञान तुझे कर्मयोगकी विधिसे प्राप्त कर्तव्य-(युद्ध-) का पालन करनेसे ही प्राप्त हो जायगा। जिस तत्त्वज्ञानके लिये मैंने तत्त्वदर्शी महापुरुषोंके पास जानेकी प्रेरणा की है, वह तत्त्वज्ञान प्राप्त हो ही जायगा, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि जिस पुरुषके पास जाओगे, वह तत्त्वदर्शी ही है—इसका क्या पता? और उस महापुरुषके प्रति श्रद्धाकी कमी भी रह सकती है। दूसरी बात, इस प्रक्रियामें पहले सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें देखेगा और उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंको एक परमात्मतत्त्वमें देखेगा (गीता—चौथे
परिशिष्ट भाव—‘पवित्रमिह’ —अपवित्रता संसारके अभाव हो जाता है, तब अपवित्रता रहनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसलिये ज्ञानमें किंचिन्मात्र भी अपवित्रता, जड़ता, विकार नहीं है।
‘इह’ पद ‘लोक’ का वाचक है। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान लौकिक है, जबकि परमात्मज्ञान अलौकिक है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञान-प्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हैं।
श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
संयतेन्द्रियः | = (जो) जितेन्द्रिय (तथा) | ज्ञानम् | = ज्ञानको | अचिरेण | = तत्काल ---|---|---|---|---|--- तत्परः | = साधन-परायण है, (ऐसा) | लभते | = प्राप्त होता है (और) | पराम् | = परम श्रद्धावान् | = श्रद्धावान् मनुष्य | ज्ञानम् | = ज्ञानको | शान्तिम् | = शान्तिको | | लब्ध्वा | = प्राप्त होकर (वह) | अधिगच्छति | = प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—‘तत्परः संयतेन्द्रियः’ —इस श्लोकमें श्रद्धावान् पुरुषको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। अपनेमें श्रद्धा कम होनेपर भी मनुष्य भूलसे अपनेको अधिक श्रद्धावाला मान सकता है, इसलिये भगवान्ने श्रद्धाकी पहचानके लिये दो विशेषण दिये हैं—‘संयतेन्द्रियः’ और ‘तत्परः’। जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वशमें हैं, वह ‘संयतेन्द्रियः’ है और जो अपने साधनमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ है, वह ‘तत्परः’ है। साधनमें तत्परताकी कसीटी है—इन्द्रियोंका संयत होना। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषयभोगोंकी तरफ जाती हैं, तो साधन-परायणतामें कमी समझनी चाहिये।
‘श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्’ —परमात्मामें, महापुरुषोंमें, धर्ममें और शास्त्रोंमें प्रत्यक्षकी तरह आदरपूर्वक विश्वास
अध्यायका पैँतीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियामें संशय तथा विलम्बकी सम्भावना है। परन्तु कर्मयोगके द्वारा अन्य पुरुषकी अपेक्षाके बिना, अवश्यमेव और तत्काल उस तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है। इसलिये मैं तेरे लिये कर्मयोगको ही ठीक समझता हूँ; अतः तुझे प्रचलित प्रणालीके ज्ञानका उपदेश मैं नहीं दूँगा।
भगवान् तो महापुरुषोंके भी महापुरुष हैं। अतः वे अर्जुनको किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर ज्ञान सीखनेके लिये कैसे कह सकते हैं? आगे इसी अध्यायके इकतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगकी प्रशंसा करके बयालीसवें श्लोकमें अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है।
सम्बन्धसे आती है। तत्त्वज्ञान होनेपर जब संसारका अत्यन्त
होना ‘श्रद्धा’ कहलाती है।
जबतक परमात्मतत्त्वका अनुभव न हो, तबतक
परमात्मामें प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होना चाहिये।
वास्तवमें परमात्मासे देश, काल आदिकी दूरी नहीं है,
केवल मानी हुई दूरी है। दूरी माननेके कारण ही परमात्मा
सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी अनुभवमें नहीं आ रहे हैं।
इसलिये ‘परमात्मा अपनेमें है’ ऐसा मान लेनेका नाम ही
श्रद्धा है। कैसा ही व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह एकमात्र
परमात्माको प्राप्त करना चाहता है और ‘परमात्मा अपनेमें
है’ ऐसी श्रद्धावाला है, तो उसे अवश्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
श्लोक ३९ ]
- साधक-संजीवनी *
३४७
नहीं। उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। केवल परमात्माकी सत्तासे ही वह सत्तावान् दीख रहा है। इस तरह संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको न मानकर एक परमात्माकी सत्ताको ही मानना श्रद्धा है। ऐसी श्रद्धा होनेपर तत्काल ज्ञान हो जाता है। जबतक इन्द्रियाँ संयत न हों और साधनमें तत्परता न हो, तबतक श्रद्धामें कमी समझनी चाहिये। यदि इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ जाती हैं, तो साधनमें तत्परता नहीं आती। साधनमें तत्परता न होनेसे दूसरेकी परायणता, दूसरेका आदर होता है। जबतक साधन-परायणता नहीं होती, तबतक श्रद्धा भी पूरी नहीं होती। श्रद्धा पूरी न होनेके कारण ही तत्त्वेके अनुभवमें देरी लगती है, नहीं तो नित्यप्राप्त तत्त्वेके अनुभवमें देरीका कारण है ही नहीं।
इसी अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने गुरुके पास जाकर विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए तीन साधन बताये—प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा। यहाँ भगवान्ने ज्ञान प्राप्त करनेका एक साधन बताया है—श्रद्धा। चौंतीसवें श्लोकमें ‘उपदेश्यन्ति’ पदसे गुरुके द्वारा केवल ज्ञानका उपदेश देनेकी बात आयी है; उपदेशसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा, ऐसी बात वहाँ नहीं आयी। परन्तु इस श्लोकमें ‘लभते’ पदसे ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधनोंसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा—ऐसा निश्चित नहीं है; परन्तु इस श्लोकमें कहे साधनसे निश्चितरूपसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है। कारण यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधन बहिरंग होनेसे कपटभावसे तथा साधारणभावसे भी किये जा सकते हैं; परन्तु इस श्लोकमें कहा साधन अन्तरंग होनेसे कपटभावसे तथा साधारणभावसे नहीं किया जा सकता (गीता—सन्नहवै अध्यायका तीसरा श्लोक)। इसलिये ज्ञानकी प्राप्तिमें श्रद्धा मुख्य है।
ऐसा एक तत्त्व या बोध है, जिसका अनुभव मेरेको हो सकता है और अभी हो सकता है—यही वास्तवमें श्रद्धा है। तत्त्व भी विद्यमान है, मैं भी विद्यमान हूँ और तत्त्वका अनुभव करना भी चाहता हूँ, फिर देरी किस बातकी?
विशेष बात
बड़े आश्चर्यकी बात है कि जो नित्य-निरन्तर विद्यमान रहता है, वह तो प्रिय नहीं लगता और जो निरन्तर ही बदल रहा है, जा रहा है, वह संसार प्रिय लगता है! इसमें कारण यही है कि जिस संसारकी एक क्षण भी
स्थिति नहीं है, जो निरन्तर ही अभावमें जा रहा है, उसे हम स्थायी मान लेते हैं। स्थायी माननेके कारण ही उससे स्थायी सुख लेना चाहते हैं, जो सर्वथा असम्भव है।
सुख लेनेके लिये हम संसारमें अपनापन कर लेते हैं, जो किसी भी कालमें अपना नहीं है। अपनी वस्तु वही है, जो हमसे कभी अलग नहीं होती और जिससे हम कभी अलग नहीं होते। यदि संसार अपना होता, तो प्रत्येक परिस्थिति हमारे साथ रहती। परन्तु न तो परिस्थिति हमारे साथ रहती है और न हम ही परिस्थितिके साथ रहते हैं। इसलिये वह अपनी है ही नहीं। जिन अन्तःकरण और इन्द्रियोंसे हम संसारको देखते हैं, उन्हें भी हम भूलसे अपनी मान लेते हैं। परन्तु इनपर भी हमारा कोई अधिकार नहीं चलता। अन्तःकरण और इन्द्रियोंसहित सम्पूर्ण संसार प्रलयकी ओर जा रहा है। उसकी स्थिति है ही नहीं।
संसारकी प्रतीतिमात्र होती है, इसलिये इसकी प्राप्ति कभी हो ही नहीं सकती। संसार अपने स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकता, पर स्वरूप सब जगह सत्कारूपसे विद्यमान रहता है। संसारका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, पर अपना अस्तित्व नित्य-निरन्तर रहता है। स्वरूपका अर्थात् अपने होनेपनका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। स्वरूप अपरिवर्तनशील है। यदि वह परिवर्तनशील होता, तो संसारके परिवर्तनको कौन देखता? हमें जैसे संसारके निरन्तर परिवर्तन और अभावका अनुभव होता है, ऐसे अपने परिवर्तन और अभावका अनुभव कभी नहीं होता। ऐसा होनेपर भी परिवर्तनशील शरीरके साथ अपनेको मिलाकर उसके परिवर्तनको भूलसे अपना परिवर्तन मान लेते हैं। शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर शरीरकी अवस्थाको अपनी अवस्था मान लेते हैं। विचार करें कि यदि शरीरकी अवस्थाके साथ हम एक होते, तो अवस्थाके चले जानेपर हम भी चले गये होते। इससे सिद्ध होता है कि जानेवाली अवस्था दूसरी है और हम दूसरे हैं। इस प्रकारके अपने नित्यसिद्ध स्वरूपका अनुभव होना ‘ज्ञान’ है।
दूसरी बात, इस उन्तालीसवें श्लोकमें ‘लभते’ पद आया है, जिसका तात्पर्य है—जिस वस्तुका निर्माण नहीं होता, ऐसी नित्यसिद्ध वस्तुकी प्राप्ति। जिस वस्तुका निर्माण होता है अर्थात् जो वस्तु पहले नहीं होती, प्रत्युत बनायी जाती है, उस वस्तुकी प्राप्तिको ‘लभते’ नहीं कह सकते। कारण कि जो वस्तु पहले नहीं थी तथा बादमें भी नहीं
३४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
रहेगी, ऐसी वस्तुकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्त नहीं होती। प्रतीत होनेवाली वस्तुको प्राप्त मान लेना अपने विवेकका सर्वथा अनादर है।
जो संसारकी उत्पत्तिके पहले भी रहता है, संसारकी (उत्पन्न होकर होनेवाली) स्थितिमें भी रहता है और संसारके नष्ट होनेके बाद भी रहता है, वह तत्त्व 'है' नामसे कहा जाता है, और 'है' की प्राप्तिको ही 'लभते' कहते हैं। परन्तु जो वस्तु उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं थी और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगी तथा बीचमें भी निरन्तर नाशकी ओर जा रही है, वह वस्तु 'नहीं' नामसे कही जाती है। 'नहीं' की प्रतीति होती है, प्राप्ति नहीं। जो 'है', वह तो है ही और जो 'नहीं', वह है ही नहीं। 'नहीं' को 'नहीं'-रूपसे मानते हुए 'है' को 'है'-रूपसे मान लेना श्रद्धा है, जिससे नित्यसिद्ध ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है—'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'।
'ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति'—नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने निषेध-मुखसे कहा है
परिशिष्ट भाव— 'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'—श्रद्धा-विश्वास और विवेककी आवश्यकता सभी साधकोंके लिये हैं। हाँ, कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें विवेककी मुख्यता है और भक्तियोगमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता है। आरम्भमें 'तत्त्वज्ञान है'—ऐसी श्रद्धा होगी, तभी साधक उसकी प्राप्तिके लिये साधन करेगा।
सम्बन्ध— जो ज्ञानप्राप्तिका अपात्र है, ऐसे विवेकहीन संशयात्मा मनुष्यकी भगवान् आगेके श्लोकमें निन्दा करते हैं।
अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
| अज्ञः | = विवेकहीन | संशयात्मनः | = संशयात्मा | न | = न |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | मनुष्यके लिये | परः | = परलोक | |
| अश्रद्धातनः | = श्रद्धारहित | न | = न तो | (हितकारक) है | |
| संशयात्मा | = संशयात्मा मनुष्यका | अयम् | = यह | च | = और |
| विनश्यति | = पतन हो जाता है। | लोकः | = लोक (हितकारक) | न | = न |
| (ऐसे) | अस्ति | = है | सुखम् | = सुख (ही) है। |
व्याख्या— 'अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति'—जिस पुरुषका विवेक अभी जाग्रत् नहीं हुआ है तथा जितना विवेक जाग्रत् हुआ है, उसको महत्त्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रद्धालु है, ऐसे संशययुक्त पुरुषका पारमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है। कारण कि संशययुक्त पुरुषकी अपनी बुद्धि तो प्राकृत—शिक्षारहित है और दूसरेकी बातका आदर नहीं करता, फिर ऐसे पुरुषके संशय कैसे नष्ट हो सकते हैं? और
कि श्रद्धारहित पुरुष मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणरूप संसार-चक्रमें घूमते रहते हैं। उसी बातको यहाँ विधि-मुखसे कहते हैं कि श्रद्धावान् पुरुष परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् मेरेको प्राप्त होकर जन्म-मरणरूप संसार चक्रसे छूट जाता है।
परमशान्तिका तत्काल अनुभव न होनेका कारण है—जो वस्तु अपने-आपमें है, उसको अपने-आपमें न दूँदकर बाहर दूसरी जगह दूँदना। परमशान्ति प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। परन्तु मनुष्य परमशान्ति-स्वरूप परमात्मासे तो विमुख हो जाता है और सांसारिक वस्तुओंमें शान्ति दूँदता है। इसलिये अनेक जन्मोंतक शान्तिकी खोजमें भटकते रहनेपर भी उसे शान्ति नहीं मिलती। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें शान्ति मिल ही कैसे सकती है? तत्त्वज्ञानका अनुभव होनेपर जब दुःखरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब स्वतःसिद्ध परमशान्तिका तत्काल अनुभव हो जाता है।
संशय नष्ट हुए बिना उसकी उन्नति भी कैसे हो सकती है?
अलग-अलग बातोंको सुननेसे 'यह ठीक है अथवा वह ठीक है?'—इस प्रकार सन्देहयुक्त पुरुषका नाम संशयात्मा है। पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले साधकमें संशय पैदा होना स्वाभाविक है; क्योंकि वह किसी भी विषयको पढ़ेगा तो कुछ समझेगा और कुछ नहीं समझेगा। जिस विषयको कुछ नहीं समझते, उस विषयमें संशय पैदा
श्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
३४९
नहीं होता और जिस विषयको पूरा समझते हैं, उस विषयमें संशय नहीं रहता। अतः संशय सदा अधूरे ज्ञानमें ही पैदा होता है, इसीको अज्ञान कहते हैं। इसलिये संशयका उत्पन्न होना हानिकारक नहीं है, प्रत्युत संशयको बनाये रखना और उसे दूर करनेकी चेष्टा न करना ही हानिकारक है। संशयको दूर करनेकी चेष्टा न करनेपर वह संशय ही 'सिद्धान्त' बन जाता है। कारण कि संशय दूर न होनेपर मनुष्य सोचता है कि पारमार्थिक मार्गमें सब कुछ ढकोसला है और ऐसा सोचकर उसे छोड़ देता है तथा नास्तिक बन जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। इसलिये अपने भीतर संशयका रहना साधकको बुरा लगना चाहिये। संशय बुरा लगनेपर जिज्ञासा जाग्रत् होती है, जिसकी पूर्ति होनेपर संशय-विनाशक ज्ञानकी प्राप्ति होती है।
साधकका लक्षण है—खोज करना। यदि वह मन और इन्द्रियोंसे देखी बातको ही सत्य मान लेता है, तो वहीँ रुक जाता है, आगे नहीं बढ़ पाता। साधकको निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिये। जैसे रास्तेपर चलते समय मनुष्य यह न देखे कि कितने मील आगे आ गये, प्रत्युत यह देखे कि कितने मील अभी बाकी पड़े हैं, तब वह ठीक अपने लक्ष्यतक पहुँच जायगा। ऐसे ही साधक यह न देखे कि कितना जान लिया अर्थात् अपने जाने हुएपर सन्तोष न करे, प्रत्युत जिस विषयको अच्छी तरह नहीं जानता, उसे जाननेकी चेष्टा करता रहे। इसलिये संशयके रहते हुए कभी सन्तोष नहीं होना चाहिये, प्रत्युत जिज्ञासा अगिनकी तरह दहकती रहनी चाहिये। ऐसा होनेपर साधकका संशय सन्त-महात्माओंसे अथवा ग्रन्थोंसे किसी-न-किसी प्रकारसे दूर हो ही जाता है। संशय दूर करनेवाला कोई न मिले तो भगवत्कृपासे उसका संशय दूर हो जाता है।
विशेष बात
जीवात्मा परमात्माका अंश है—'ममैवांशो जीवलोकै' (गीता १५।७)। इसलिये जब उसमें अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी भूख जाग्रत् होती है और
उसकी पूर्ति न होनेका दुःख होता है, तब उस दुःखको भगवान् सह नहीं सकते। अतः उसकी पूर्ति भगवान् स्वतः करते हैं। ऐसे ही जब साधकको अपने भीतर स्थित संशयसे व्याकुलता या दुःख होता है, तब वह दुःख भगवान्को असह्य होता है। संशय दूर करनेके लिये भगवान्से प्रार्थना नहीं करनी पड़ती, प्रत्युत जिस संशयको लेकर साधकको दुःख हो रहा है, उस संशयको दूर करके भगवान् स्वतः उसका वह दुःख मिटा देते हैं। संशयात्मा पुरुषकी एक पुकार होती है, जो स्वतः भगवान्तक पहुँच जाती है।
संशयके कारण साधककी वास्तविक उन्नति रुक जाती है, इसलिये संशय दूर करनेमें ही उसका हित है। भगवान् प्राणिमात्रके सुदृढ़ हैं—'सुदृढं सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९), इसलिये जिस संशयको लेकर मनुष्य व्याकुल होता है और वह व्याकुलता उसे असह्य हो जाती है, तो भगवान् उस संशयको किसी भी रीति—उपायसे दूर कर देते हैं। गलती यही होती है कि मनुष्य जितना जान लेता है, उसीको पूरा समझकर अभिमान कर लेता है कि मैं ठीक जानता हूँ। यह अभिमान महान् पतन करनेवाला हो जाता है।
'नार्थ लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः'—
इस श्लोकमें ऐसे संशयात्मा मनुष्यका वर्णन है, जो 'अज्ञ' और 'अश्रद्धालु' है। तात्पर्य यह है कि भीतर संशय रहनेपर भी उस मनुष्यकी न तो अपनी विवेकवती बुद्धि है और न वह दूसरेकी बात ही मानता है। इसलिये उस संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। उसके लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
संशयात्मा मनुष्यका इस लोकमें व्यवहार बिगड़ जाता है। कारण कि वह प्रत्येक विषयमें संशय करता है, जैसे—यह आदमी ठीक है या बेठीक है? यह भोजन ठीक है या बेठीक है? इसमें मेरा हित है या अहित है? आदि। उस संशयात्मा मनुष्यको परलोकमें भी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती; क्योंकि कल्याणमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी
१-अज्ञानका अर्थ ज्ञानका अभाव नहीं है। अधूरे ज्ञानको अंश होनेसे जीवमें ज्ञानका सर्वथा अभाव हो ही नहीं सकता, केवल नाशवान् असत्की सत्ता मानकर उसे महत्त्व दे देता है, असत्को असत् मानकर भी असत्से विमुख नहीं होता—यही अज्ञान है। इसलिये मनुष्यमें जितना ज्ञान है, यदि उस ज्ञानके अनुसार वह अपना जीवन बना ले, तो अज्ञान सर्वथा मिट जायगा और ज्ञान प्रकट हो जायगा। कारण कि अज्ञानकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं।
२-कुछ श्रद्धा, कुछ दुष्टता, कुछ संशय, कुछ ज्ञान। घरका रहा न घाटका, ज्यों धोबीका श्वान॥