श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
५११
| स्मरति | = स्मरण करता है, | मुझमें लगे हुए | सुलभः | = सुलभ हूँ अर्थात् |
|---|---|---|---|---|
| तस्य | = उस | योगिनः | = योगीके लिये | उसको सुलभतासे |
| नित्ययुक्तस्य | = नित्य-निरन्तर | अहम् | = मैं | प्राप्त हो जाता हूँ। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें जो सगुण-साकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
'अनन्यचेताः' —जिसका चित्त भगवान्को छोड़कर किसी भी भोगभूमिमें, किसी भी ऐश्वर्यमें किंचिन्मात्र भी नहीं जाता; जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के सिवाय अन्य किसीका कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है, वह पुरुष अनन्य चित्त्वाला है। जैसे, पतिव्रता स्त्रीका पतिका ही व्रत, नियम रहता है। पतिके सिवाय उसके मनमें अन्य किसी भी पुरुषका रागपूर्वक चिन्तन कभी होता ही नहीं। शिष्य गुरुके और सुपुत्र माँ-बापके परायण रहता है, उनका दूसरा कोई इष्ट नहीं होता। इसी तरहसे भक्त भगवान्के ही परायण रहता है।
यहाँ 'अनन्यचेताः' पद सगुण-उपासना करनेवालेका वाचक है। सगुण-उपासनामें विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जो भगवान्के स्वरूप हैं, उनमेंसे जो जिस स्वरूपकी उपासना करता है, उसी स्वरूपका चिन्तन हो। परन्तु दूसरे स्वरूपोंको अपने इष्टसे अलग न माने और अपने-आपको भी अपने इष्टके सिवाय और किसीका न माने, तो उसका अन्यकी तरफ मन नहीं जाता। तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं केवल भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मेरा और कोई नहीं है तथा मैं और किसीका नहीं हूँ' ऐसा भाव होनेसे वह 'अनन्यचेताः' हो जाता है।
'सततं यो मां स्मरति नित्यशः' —'सततम् ' का अर्थ होता है—निरन्तर अर्थात् जबसे नींद खुले, तबसे लेकर गाढ़ नींद आनेतक जो मेरा स्मरण करता है; और 'नित्यशः' का अर्थ होता है—सदा अर्थात् इस बातको जिस दिनसे पकड़ा, उस दिनसे लेकर मृत्युतक जो मेरा स्मरण करता है।
'तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः' —ऐसे नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ। यहाँ 'नित्ययुक्त' पद चित्तके द्वारा निरन्तर चिन्तन करनेवालेका वाचक नहीं है, प्रत्युत ब्रह्मा-प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे खुद भगवान्में लगनेवालेका वाचक है। जैसे कोई ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपनेमें
स्थित रहता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ; क्षत्रिय, वैश्य आदि नहीं हूँ।' वह अपने ब्राह्मणपनेको याद करे या न करे, पर उसके ब्राह्मणपनेमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे ही 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस नित्य-सम्बन्धमें दृढ़ रहनेवाला ही नित्ययुक्त है। ऐसे नित्ययुक्त योगीको भगवान् सुगमतासे मिल जाते हैं।
भगवान्के सिवाय शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि अपने नहीं हैं, केवल भगवान् ही अपने हैं—ऐसा दृढ़तासे माननेपर भगवान् सुलभ हो जाते हैं। परन्तु शरीर आदिको अपना मानते रहनेसे भगवान् सुलभ नहीं होते।
भगवान्के साथ अपनी भिन्नता तथा संसारके साथ अपनी एकता कभी हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। इस रीतिसे मनुष्यकी भगवान्के साथ स्वतः—स्वाभाविक अभिन्नता है और संसारके साथ स्वतः—स्वाभाविक भिन्नता है। परन्तु भूलके कारण मनुष्य अपनेको भगवान्से और भगवान्को अपनेसे अलग मान लेता है तथा अपनेको शरीरका तथा शरीरको अपना मान लेता है। इस विपरीत धारणाके कारण ही यह मनुष्य जन्म-मरणके चक्रमें फँसा रहता है। जब यह विपरीत धारणा सर्वथा मिट जाती है, तब भगवान् स्वतः सुलभ हो जाते हैं।
आठवेंसे तेरहवें श्लोकतक सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारका स्मरण बताया गया। इन दोनों स्मरणोंमें प्राणायामकी मुख्यता रहती है, जिसको सिद्ध करना कठिन है। अन्तकाल-जैसी विकट अवस्थामें भी प्राणायामके बलसे प्राणोंको ध्रुवोंके मध्यमें स्थापित कर सकें अथवा मूर्ध्नि-(दशम द्वार-) में लगा सकें—ऐसा प्राणोंपर अधिकार रहनेकी आवश्यकता है। परन्तु भगवान्के स्मरणमें यह कठिनता नहीं है, क्योंकि यहाँ प्राणोंका खयाल नहीं है। यहाँ तो भगवान्के साथ साधकका स्वयंका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिकी भी जरूरत नहीं है। अतः इसमें अन्तकालमें प्राण आदिको लगानेकी जरूरत नहीं है। जैसे किसी वस्तुका बीमा होनेपर वस्तुके बिगड़ने, टूटने-फूटनेकी चिन्ता नहीं रहती, ऐसे ही शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देनेपर साधकको अपनी गतिके विषयमें कभी किंचिन्मात्र
६००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
भी चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह साधन क्रियाजन्य | जागृति है। अतः इसमें कठिनताका नामोनिशान नहीं है। अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्धकी | इसीसे भगवान्ने अपने-आपको सुलभ बताया है।
परिशिष्ट भाव—‘अनन्यचेताः’ —भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय अन्यकी सत्ता न होनेसे उसका मन अन्य जगह कैसे जायगा? क्यों जायगा? कहाँ जायगा? इसलिये वह स्वतः अनन्यचित्त्वाला हो जाता है।
‘सततं यो मां स्मरति नित्यशः’ —एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है। जो करते हैं, वह क्रिया है और जो अपने-आप होता है, वह स्मरण है। जैसे, गीताके अन्तमें अर्जुनने कहा—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) तो वह स्मृति क्रिया नहीं है, प्रत्युत भगवान्के साथ अपने नित्य सम्बन्धकी स्वतः होनेवाली स्मृति है। भगवान्के स्मरणमें खास हेतु उनमें अपनापन है। भगवान् ही मेरे हैं और मेरे लिये हैं—इस प्रकार भगवान्में अपनापन होनेसे स्वतः भगवान्में प्रेम होता है और जिसमें प्रेम होता है, उसका स्मरण अपने-आप और नित्य-निरन्तर होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मध्यासक्तमनाः’ पदसे अपनेमें आसक्ति अर्थात् प्रेम होनेकी बात कही है। तात्पर्य है कि केवल भगवान्को ही अपना और अपने लिये माननेसे साधककी भगवान्में प्रियता हो जाती है। भगवान्में प्रियता होनेके बाद फिर भगवान्का स्मरण स्वतः होता है।
‘नित्ययुक्तस्य’ —नित्य-निरन्तर भगवान्के साथ जुड़ा हुआ होनेसे भक्तको ‘नित्ययुक्त’ कहा गया है। सातवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’ पदोंसे भी यही बात कही गयी है। ‘नित्ययुक्तस्य’ पदसे श्लोकके पूर्वाधर्ममें आयी सभी बातोंका समाहार हो जाता है।
‘तस्याहं सुलभः पार्थ’ —भगवान्ने महात्माको तो दुर्लभ बताया है—‘स महात्मा सुदुर्लभः’ (गीता ७।१९), पर यहाँ अपनेको सुलभ बताया है। इसका तात्पर्य है कि संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत उनके तत्त्वको जानकर उनके शरण होनेवाले भक्त दुर्लभ हैं। कारण कि भगवान्को दृढ़े तो वे सब जगह मिल जायेंगे, पर भगवान्का प्यारा भक्त कहीं-कहीं ही मिलेगा—
हरि दुरलभ नहि जगतमें, हरिजन दुरलभ होय। हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहि एक होय॥
भगवान् कृपा करके जो मनुष्यशरीर देते हैं, उस शरीरसे जीव अनेक योनियोंमें तथा नरकोंमें भी जा सकता है। परन्तु भक्त कृपा करके भगवान्की ही प्राप्ति करता है—
हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत। हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥
वास्तवमें जो नित्यप्राप्त है, उसमें सुलभता-दुर्लभता कहना बनता ही नहीं। परन्तु लोगोंने उसको दुर्लभ (कठिन) मान रखा है, इस वृत्तिको हटानेके लिये भगवान्ने अपनेको सुलभ बताया है। जिसकी खुदकी सत्ता है ही नहीं, उस असत् (शरीर-संसार) को सत्ता और महत्ता देनेसे तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्यप्राप्त परमात्मा दुर्लभ हो रहे हैं। असत्को सत्ता और महत्ता न दें तो परमात्माकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। असत् है और वह अपना तथा अपने लिये है—ऐसा मानना ही असत्को सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना है।
सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें भगवान् अपनी प्राप्तिका माहात्म्य बताते हैं।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाजुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
| महात्मानः | = महात्मालोग | दुःखोंके घर | वाले |
|---|---|---|---|
| माम् | = मुझे | (और) | पुनर्जन्म = पुनर्जन्मको |
| उपेत्य | = प्राप्त करके | अशाश्वतम् = अशाश्वत अर्थात् | न, आजुवन्ति = प्राप्त नहीं होते; |
| दुःखालयम् | = दुःखालय अर्थात् | निरन्तर बदलने- | (क्योंकि वे) |
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
६०९
| परमात् | = परम | गताः | = प्राप्त हो गये हैं | प्रेमकी प्राप्ति हो |
|---|---|---|---|---|
| संसिद्धिम् | = सिद्धिको | अर्थात् उनको परम | गयी है। |
व्याख्या —‘मायुपेत्य पुनर्जन्म ’ संसिद्धि परमां गताः—‘मायुपेत्य ’ का तात्पर्य है कि भगवान्के दर्शन कर ले, भगवान्को तत्त्वसे जान ले अथवा भगवान्में प्रविष्ट हो जाय तो फिर पुनर्जन्म नहीं होता। पुनर्जन्मका अर्थ है—फिर शरीर धारण करना। वह शरीर चाहे मनुष्यका हो, चाहे पशु-पक्षी आदि किसी प्राणीका हो, पर उसे धारण करनेमें दुःख-ही-दुःख है। इसलिये पुनर्जन्मको दुःखालय अर्थात् दुःखोंका घर कहा गया है।
मरनेके बाद यह प्राणी अपने कर्मोंके अनुसार जिस योनियोंमें जन्म लेता है, वहाँ जन्म-कालमें जेसे बाहर आते समय उसको वैसा कष्ट होता है, जैसा कष्ट मनुष्यको शरीरकी चमड़ी उतारते समय होता है। परन्तु उस समय वह अपना कष्ट, दुःख किसीको बता नहीं सकता, क्योंकि वह उस अवस्थामें महान् असमर्थ होता है। जन्मके बाद बालक सर्वथा परतन्त्र होता है। कोई भी कष्ट होनेपर वह रोता रहता है,—पर बता नहीं सकता। थोड़ा बड़ा होनेपर उसको खाने-पीनेकी चीजें, खिलौने आदिकी इच्छा होती है और उनकी पूर्ति न होनेपर बड़ा दुःख होता है। पढ़ाईके समय शासनमें रहना पड़ता है। रातों जागकर अभ्यास करना पड़ता है तो कष्ट होता है। विद्या भूल जाती है तथा पढ़नेपर उत्तर नहीं आता तो दुःख होता है। आपसमें ईर्ष्या, द्वेष, डाह, अभिमान आदिके कारण हृदयमें जलन होती है। परीक्षामें फेल हो जाय तो मूर्खताके कारण उसका इतना दुःख होता है कि कई आत्महत्यातक कर लेते हैं।
जवान होनेपर अपनी इच्छाके अनुसार विवाह आदि न होनेसे दुःख होता है। विवाह हो जाता है तो पत्नी अथवा पति अनुकूल न मिलनेसे दुःख होता है। बाल-बच्चे हो जाते हैं तो उनका पालन-पोषण करनेमें कष्ट होता है। लड़कियाँ बड़ी हो जाती हैं तो उनका जल्दी विवाह न होनेपर माँ-बापकी नींद उड़ जाती है, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, हरदम बेचैनी रहती है।
वृद्धावस्था आनेपर शरीरमें असमर्थता आ जाती है। अनेक प्रकारके रोगोंका आक्रमण होने लगता है। सुखसे
उठना-बैठना, चलना-फिरना, खाना-पीना आदि भी कठिन हो जाता है। घरवालोंके द्वारा तिरस्कार होने लगता है। उनके अपशब्द सुनने पड़ते हैं। रातमें खौंसा आती है। नींद नहीं आती। मरनेके समय भी बड़े भयंकर कष्ट होते हैं। ऐसे दुःख कहाँतक कहे? उनका कोई अन्त नहीं।
मनुष्य-जैसा ही कष्ट पशु-पक्षी आदिको भी होता है। उनको शीत-घाम, वर्षा-हवा आदिसे कष्ट होता है। बहुत-से जंगली जानवर उनके छोटे बच्चोंको खा जाते हैं तो उनको बड़ा दुःख होता है। इस प्रकार सभी योनियोंमें अनेक तरहके दुःख होते हैं। ऐसे ही नरकोंमें और चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगने पड़ते हैं। इसलिये पुनर्जन्मको ‘दुःखालय’ कहा गया है।
पुनर्जन्मको ‘अशाश्वत’ कहनेका तात्पर्य है कि कोई भी पुनर्जन्म (शरीर) निरन्तर नहीं रहता। उसमें हरदम परिवर्तन होता रहता है। कहीं किसी भी योनियोंमें स्थायी रहना नहीं होता। थोड़ा सुख मिल भी जाता है तो वह भी चला जाता है और शरीरका भी अन्त हो जाता है। नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें इसी पुनर्जन्मको मौतका रास्ता कहा है—‘मृत्युसंसारवर्त्तनी ।’
यहाँ भगवान्को ‘मेरी प्राप्ति होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता’—इतना ही कहना पर्याप्त था, फिर भी पुनर्जन्मके साथ ‘दुःखालय’ और ‘अशाश्वत’—ये दो विशेषण क्यों दिये गये? ये दो विशेषण देनेसे यह एक भाव निकलता है कि जैसे भगवान् भक्तजनोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना करनेके लिये पृथ्वीपर अवतार लेते हैं, ऐसे ही भगवान्को प्राप्त हुए भक्तलोग भी साधु पुरुषोंकी रक्षा, दुष्टोंकी सेवा और धर्मका अच्छी तरहसे पालन करने तथा करवानेके लिये कारक पुरुषके रूपमें, सत्तके रूपमें इस पृथ्वीपर जन्म ले सकते हैं* अथवा जब भगवान् अवतार लेते हैं, तब उनके साथ पार्पदके रूपमें भी (गवालबालोंकी तरह) वे भक्तजन पृथ्वीपर जन्म ले सकते हैं। परन्तु उन भक्तोंका यह जन्म दुःखालय और अशाश्वत नहीं होता; क्योंकि उनका जन्म कर्मजन्य नहीं होता, प्रत्युत
- सन्तोने कहा है—
परित्राणाय साधूनां सेवां कर्तुं च दुष्कृताम्। धर्मसम्पालनार्थाय सम्भवन्ति कलौ युगे॥
६०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
भगवद्विच्छासे होता है।
जो आरम्भसे ही भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन साधकोंको भी भगवान्ने 'महात्मा' कहा है (नवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), जो भगवत्त्वसे अभिन्न हो जाते हैं, उनको भी 'महात्मा' कहा है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और जो वास्तविक प्रेमको प्राप्त हो जाते हैं, उनको भी 'महात्मा' कहा है (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि असत् शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध होनेसे मनुष्य 'अल्पात्मा' होते हैं; क्योंकि वे शरीर-संसारके आश्रित होते हैं। अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर वे 'आत्मा' होते हैं; क्योंकि उनमें अणुरूपसे 'अहम्' की गंध रहनेकी संभावना होती है। भगवान्के साथ अभिन्नता होनेपर वे 'महात्मा' होते हैं; क्योंकि वे भगवन्निष्ठ होते हैं, उनकी अपनी कोई स्वतन्त्र स्थिति नहीं होती।
भगवान्ने गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि योगोंमें 'महात्मा' शब्दका प्रयोग नहीं किया है। केवल भक्तियोगमें ही भगवान्ने 'महात्मा' शब्दका प्रयोग किया है। इससे सिद्ध होता है कि गीतामें भगवान् भक्तिको ही सर्वोपरि मानते हैं।
महात्माओंका पुनर्जन्मको प्राप्त न होनेका कारण यह है कि वे परम सिद्धिको अर्थात् परम प्रेमको प्राप्त हो गये हैं—'संसिद्धिं * परमां गताः।' जैसे लोभी व्यक्तिको जितना धन मिलता है, उतना ही उसको थोड़ा मालूम देता है और उसकी धनकी भूख उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है, ऐसे ही अपने अंशी भगवान्को पहचान लेनेपर भक्तमें प्रेमकी
परिशिष्ट भाव —गीताके सातवें अध्यायमें तो संसारको परमात्माका स्वरूप कहा गया है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), पर यहाँ उसको दुःखालय अर्थात् दुःखोंका घर कहा गया है—'दुःखालयम्'। इसका तात्पर्य है कि जो मनुष्य सांसारिक वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेता है, उसके लिये तो संसार भयंकर दुःख देनेवाला है, पर जो वस्तु और क्रियासे व्यक्तियोंकी सेवा करता है, उसके लिये संसार परमात्माका स्वरूप है। सुखकी आशा, कामना और भोग महान् दुःखोंके कारण हैं। सुख भोगनेवाला दुःखसे कभी बच सकता ही नहीं—यह अकाट्य नियम है। इसलिये वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेना ही नहीं है। जिस क्षण सुखबुद्धिका त्याग है, उसी क्षण परमात्माकी प्राप्ति है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)।
जीव उस समय परमात्माका अंश है, जिसके रोम-रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं! पर जीव फँस गया अपरा प्रकृतिके तुच्छ-से-तुच्छ अंश एक शरीरमें! इसलिये जहाँ कोरा आनन्द-ही-आनन्द है, वहाँ जीव कोरा दुःख-ही-दुःख पा रहा है। जैसे—गायके थनोंमें जहाँ केवल दूध-ही-दूध है, वहाँ रहकर चींचड़ केवल खून-ही-खून पीता है। गोस्वामी तुलसीदासजी
- यहाँ 'सिद्धि' शब्दके साथ 'सम्' उपसर्ग और 'परमाम्' विशेषण देनेका तात्पर्य है कि इससे बढ़कर कोई भी सिद्धि नहीं है। कारण कि जीव भगवान्का अंश है और जब वह सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाता है, तब कोई भी सिद्धि बाकी नहीं रहती।
भूख बढ़ती रहती है, उसको प्रतिक्षण वर्धमान, असौम्य, अगाध, अनन्त प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है। यह प्रेम भक्तिकी अन्तिम सिद्धि है। इसके समान दूसरी कोई सिद्धि है ही नहीं।
विशेष बात
गीताका अध्ययन करनेसे ऐसा असर पड़ता है कि भगवान्ने गीतामें अपनी भक्तिकी बहुत विशेषतासे महिमा गायी है। भगवान्ने भक्तको सम्पूर्ण योगियोंमें युक्ततम (सबसे श्रेष्ठ) कहा है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) और अपने-आपको भक्तके लिये सुलभ बताया है (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। परन्तु अपने आग्रहका त्याग करके कोई भी साधक केवल कर्मयोग, केवल ज्ञानयोग अथवा केवल भक्तियोगका अनुष्ठान करे तो अन्तमें वह एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाता है। इसका कारण यह है कि साधकोंकी दृष्टिमें तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन भेद हैं, पर साध्यतत्त्व एक ही है। साध्यतत्त्वमें भिन्नता नहीं है। परन्तु इसमें एक बात विचार करनेकी है कि जिस दर्शनमें ईश्वर, भगवान्, परमात्मा सर्वोपरि हैं—ऐसी मान्यता नहीं है, उस दर्शनके अनुसार चलनेवाले असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके मुक्त तो हो जाते हैं; पर अपने अंशीकी स्वीकृतिके बिना उनको परम प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती और परम प्रेमकी प्राप्तिके बिना उनको प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द नहीं मिलता। उस प्रतिक्षण वर्धमान आनन्दको, प्रेमको प्राप्त होना ही यहाँ परमसिद्धिको प्राप्त होना है।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
६०३
महाराज कहते हैं—
आनंद-सिंधु-मध्य तव बासा।
बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ (विनयपत्रिका १३६।२)
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | पुनः | लौटकर | माम् | = मुझे |
|---|---|---|---|---|---|
| आब्रह्मभुवनात्- | ब्रह्मलोकतक | संसारमें | आना | उपेत्य | = प्राप्त होनेपर |
| लोकाः | = सभी लोक | पड़ता है; | पुनर्जन्म | = पुनर्जन्म | |
| पुनरावर्तिनः | = पुनरावर्तीवाले हैं | तु | = परन्तु | न | = नहीं |
| अर्थात् वहाँ जानेपर | कौन्तेय | = हे कौन्तेय! | विद्यते | = होता। |
व्याख्या— * 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो- र्जुन'—हे अर्जुन! ब्रह्माजीके लोकको लेकर सभी लोक पुनरावर्ती हैं, अर्थात् ब्रह्मलोक और उससे नीचेके जितने लोक (सुखभोग-भूमियाँ) हैं, उनमें रहनेवाले सभी प्राणियोंको उन-उन लोकोंके प्रापक पुण्य समाप्त हो जानेपर लौटकर आना ही पड़ता है।
जितनी भी भोग-भूमियाँ हैं, उन सबमें ब्रह्मलोकको श्रेष्ठ बताया गया है। मात्र पृथ्वीमण्डलका राजा हो और उसका धन-धान्यसे सम्पन्न राज्य हो, स्त्री-पुरुष, परिवार आदि सभी उसके अनुकूल हों, उसकी युवावस्था हो तथा शरीर नीरोग हो—यह मृत्युलोकका पूर्ण सुख माना गया है। मृत्युलोकके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख मर्त्य देवताओंका है। मर्त्य देवता उनको कहते हैं, जो पुण्यकर्म करके देवलोकको प्राप्त होते हैं और देवलोकके प्रापक पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं (गीता— नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इन मर्त्य देवताओंसे सौ गुणा अधिक सुख आजीवन देवताओंका है। आजीवन देवता वे कहलाते हैं, जो कल्पके आदिमें देवता बने हैं और कल्पके अन्ततक देवता बने रहेंगे। इन आजीवन देवताओंसे सौ गुणा अधिक सुख इन्द्रका माना गया है। इन्द्रके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख ब्रह्मलोकका माना गया है। इस ब्रह्मलोकके सुखसे भी अनन्त गुणा अधिक सुख भगवत्प्राप्त, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषका माना गया है। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमण्डलसे लेकर ब्रह्मलोकतकका सुख सीमित, परिवर्तनशील और विनाशी है। परन्तु
भगवत्प्राप्तिका सुख अनन्त है, अपार है, अगाध है। यह सुख कभी नष्ट नहीं होता। अनन्त ब्रह्मा और अनन्त ब्रह्माण्ड समाप्त हो जायें, तो भी यह परमात्मप्राप्तिका सुख कभी नष्ट नहीं होता, सदा बना रहता है।
'पुनरावर्तिनः' का एक भाव यह भी है कि ये प्राणी साक्षात् परमात्माके अंश होनेके कारण नित्य हैं। अतः ये जबतक नित्य तत्त्व परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेते, तबतक कितने ही ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी इनको वहाँसे पीछे लौटना ही पड़ता है। अतः ब्रह्मलोक आदि ऊँचे लोकोंमें जानेवाले भी पुनर्जन्मको प्राप्त होते हैं।
यहाँ एक शंका होती है कि सन्तों, भक्तों, जीवन्मुक्तों और कारकपुरुषोंके दर्शनमात्रसे जीवका कल्याण हो जाता है और ब्रह्माजी स्वयं कारकपुरुष हैं तथा भगवान्के भक्त भी हैं। ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्माजीके दर्शन करते ही हैं, फिर उनकी मुक्ति क्यों नहीं होती? वे लौटकर क्यों आते हैं? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें कल्याण दर्शनमात्रसे नहीं होता, प्रत्युत अपनी भावना विशेष होनेसे होता है। इसके सिवाय सन्त, भक्त आदिके दर्शन, सम्भाषण, चिन्तन आदिका माहात्म्य इस मृत्युलोकके मनुष्योंके लिये ही है। कारण कि यह मनुष्य-शरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मनुष्यको भगवत्प्राप्तिका कोई भी और किञ्चिन्मात्र भी मुक्तिका उपाय मिल जाता है तो अपनी भावनाके अनुसार वह मुक्त हो सकता है। ऐसा मुक्तिका अधिकार अन्य लोकोंमें नहीं है, इसलिये वे मुक्त नहीं होते।
- 'आब्रह्मभुवनात्' पदमें जो 'आ' शब्द आया है, उसके दो अर्थ होते हैं—(१) अभिविधि—जैसे, ब्रह्मलोकको लेकर सभी लोक अर्थात् ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके सभी लोक। (२) मर्यादा—जैसे ब्रह्मलोकको छोड़कर नीचेके सभी लोक अर्थात् ब्रह्मलोकसे नीचेके सभी लोक। यहाँ 'आ' शब्द 'अभिविधि' अर्थमें आया है।
६०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
हाँ, उन लोकोंमें रहनेवालोंमें किसीकी मुक्त होनेके लिये
तीव्र लालसा हो जाती है तो वह भी मुक्त हो जाता है।
ऐसे ही पशु-पक्षियोंमें भी भक्त हुए हैं, पर ये दोनों ही
अपवादरूपसे हैं, अधिकारीरूपसे नहीं। अगर वहाँके
लोग भी अधिकारी माने जायें तो नरकोंमें जानेवाले
सभीकी मुक्ति हो जानी चाहिये; क्योंकि उन सभी
प्राणियोंको परम भागवत, कारकपुरुष यमराजके दर्शन
होते ही हैं? पर ऐसा शास्त्रोंमें न देखा और न सुना
ही जाता है। इससे सिद्ध होता है कि उन-उन लोकोंमें
रहनेवाले प्राणियोंका भक्त आदिके दर्शनसे कल्याण
नहीं होता।
विशेष बात
यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश है—'ममैवांश:'
और जहाँ जानेके बाद फिर लौटकर नहीं आना पड़ता,
वह परमात्मा धाम है—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम
परमं मम।' जैसे कोई अपने घरपर जाता है, ऐसे ही
परमात्माका अंश होनेसे इस जीवको वहीं (परमधाममें)
जाना चाहिये। फिर भी यह जीव मरनेके बाद लौटकर
क्यों आता है?
जैसे कोई मनुष्य सत्संग आदिमें जाता है और समय
पूरा होनेपर वहाँसे चल देता है। परन्तु चलते समय उसकी
कोई वस्तु (चद्दर आदि) भूलसे वहाँ रह जाय तो उसको
लेने लिये उसे फिर लौटकर वहाँ आना पड़ता है। ऐसे
ही इस जीवने घर, परिवार, जमीन, धन आदि जिन
चीजोंमें ममता कर ली है, अपनापन कर लिया है, उस
ममता-(अपनापन-) के कारण इस जीवको मरनेके
बाद फिर लौटकर आना पड़ता है। कारण कि जिस
शरीरमें रहते हुए संसारमें ममता-आसक्ति की थी,
वह शरीर तो रहता नहीं, न चाहते हुए भी छूट जाता है।
परन्तु उस ममता-(वासना-) के कारण दूसरा शरीर धारण
करके यहाँ आना पड़ता है। वह मनुष्य बनकर भी आ
सकता है और पशु-पक्षी आदि बनकर भी आ सकता है।
उसको लौटकर आना पड़ता है—यह बात निश्चित है।
भगवान्ने कहा है कि ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका
कारण गुणोंका संग ही है—'कारणं गुणसङ्गोऽस्य
सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१) अर्थात् जो संसारमें ममता,
आसक्ति, कामना करेगा उसको लौटकर संसारमें आना
ही पड़ेगा।
'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते'—ब्रह्मलोकतक
जानेवाले सभीको पुनर्जन्म लेना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय!
समगरूपसे मेरी प्राप्ति होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात्
मेरेको प्राप्त होनेपर फिर संसारमें, जन्म-मरणके चक्करमें
नहीं आना पड़ता। कारण कि मैं कालातीत हूँ; अतः मेरेको
प्राप्त होनेपर वे भी कालातीत हो जाते हैं। यहाँ 'मामुपेत्य'
का अर्थ है कि मेरे दर्शन हो जायँ, मेरे स्वरूपका बोध
हो जाय और मेरेमें प्रवेश हो जाय (गीता-ग्यारहवें
अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)।
मेरेको प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता अर्थात्
जीव लौटकर संसारमें क्यों नहीं आता? क्योंकि जीव मेरा
अंश है और मेरा परमधाम ही इसका वास्तविक घर है।
ब्रह्मलोक आदि लोक इसका घर नहीं है, इसलिये इसको
वहाँसे लौटना पड़ता है। जैसे रेलगाड़ीका जहाँतकका
टिकट होता है, वहाँतक ही मनुष्य उसमें बैठ सकता है।
उसके बाद उसे उतरना ही पड़ता है। परन्तु वह अगर
अपने घरमें बैठा हो तो उसे उतरना नहीं पड़ता। ऐसे ही
जो देवताओंके लोकमें गया है, वह मानो रेलगाड़ीमें बैठा
हुआ है। इसलिये उसको एक दिन नीचे उतरना ही पड़ेगा।
परन्तु जो मेरेको प्राप्त हो गया है, वह अपने घरमें बैठा
हुआ है। इसलिये उसको कभी उतरना नहीं पड़ेगा। तात्पर्य
यह है कि भगवान्को प्राप्त किये बिना ऊँचे-से-
ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी कल्याण नहीं होता। अतः
साधकको ऊँचे लोकोंके भोगोंकी किंचिन्मात्र भी इच्छा
नहीं करनी चाहिये।
ब्रह्मलोकतक जाकर फिर पीछे लौटकर आनेवाले
अर्थात् जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़नेवाले पुरुष आसुरी-
सम्पत्तिवाले होते हैं; क्योंकि आसुरी-सम्पत्तिसे ही बन्धन
होता है—'निबन्धायासुरी मता।' इसलिये ब्रह्मलोकतक
बन्धन-ही-बन्धन है। परन्तु मेरे शरण होनेवाले, मुझे प्राप्त
होनेवाले पुरुष दैवी-सम्पत्तिवाले होते हैं। उनका फिर
जन्म-मरण नहीं होता; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिसे मोक्ष होता
है—'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता १६।५)।
विशेष बात
ब्रह्मलोकमें जानेवाले पुरुष दो तरहके होते हैं—एक
तो जो ब्रह्मलोकके सुखका उद्देश्य रखकर यहाँ बड़े-बड़े
पुण्यकर्म करते हैं तथा उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोकका
सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोकमें जाते हैं; और दूसरे, जो
परमात्माप्राप्तिके लिये ही तत्परतापूर्वक साधनमें लगे हुए
हैं; परन्तु प्राणियोंके रहते-रहते परमात्मप्राप्ति हुई नहीं और
श्लोक १७ ]
- साधक-संजीवनी *
६०५
अन्तकालमें भी किसी कारण-विशेषसे साधनसे विचलित हो गये, तो वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं और वहाँ रहकर महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं। इन साधकोंका ब्रह्मलोकके सुखभोगका उद्देश्य नहीं होता; किन्तु अन्तकालमें साधनसे विमुख होनेसे तथा अन्तःकरणमें सुखभोगकी किंचिन्मात्र इच्छा रहनेसे ही उनको ब्रह्मलोकमें जाना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मलोकका सुख भोगकर ब्रह्माजीके साथ मुक्त होनेको 'क्रम-मुक्ति' कहते हैं। परन्तु जिन साधकोंको यहीं बोध हो जाता है, वे यहाँ ही मुक्त हो जाते हैं। इसको 'सद्योमुक्ति' कहते हैं।
इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनका प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर
परिशिष्ट भाव —यहाँ कोई शंका कर सकता है कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक भगवान्के ही स्वरूप हैं—'वासुदेवः सर्वम्', फिर उन लोकोंमें जानेवालोंका संसारमें पुनर्जन्म क्यों होता है? इसका समाधान है कि उन लोकोंमें जानेवाले मनुष्य उन लोकोंको भगवान्का स्वरूप नहीं समझते, प्रत्युत भोग-सामग्री समझते हैं (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। वे सुखभोगके उद्देश्यसे ही ब्रह्मलोक आदिमें जाते हैं। इसलिये उनको कर्मफलके रूपमें ब्रह्मलोकतकके लोकोंकी प्राप्ति होती है और उनका पुनर्जन्म मिटता नहीं।
पुनर्जन्म सुखासक्तिके कारण ही होता है। इसलिये यहाँ 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः' कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक सुखोंकी आखिरी हद जो 'ब्रह्मलोक' है, वहाँ जानेपर भी जीवको लौटना ही पड़ता है। अन्त ब्रह्माण्डोंका सुख मिलकर भी जीवको सुखी नहीं कर सकता, उसकी आफत, जन्म-मरण नहीं मिटा सकता। अतः संसारसे सुखकी आशा करनेवाला केवल धोखेमें रहता है।
ब्रह्मलोकमें दो प्रकारके मनुष्य जाते हैं—एक तो सुखभोगके लिये ब्रह्मलोक जाते हैं और फिर लौटकर संसारमें आते हैं और दूसरे क्रममुक्तिवाले ब्रह्मलोक जाते हैं और ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं (गीता—आठवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। वे (क्रममुक्तिवाले) लौटकर संसारमें नहीं आते तो यह उनके उद्देश्यकी महिमा है, ब्रह्मलोककी महिमा नहीं है। ब्रह्मलोक तो पुनरावर्ती ही हैं; क्योंकि वहाँ कोई भी सदा नहीं रह सकता, न भोगी सदा रहता है, न योगी (क्रममुक्तिवाला) सदा रहता है। ब्रह्मलोकतक सब कर्मफल है। जब कर्मात्रा आदि-अन्तवाला (नाशवान्) होता है तो फिर उसका फल अविनाशी कैसे हो सकता है?
'मामुपेत्य' में 'माम्' पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा—दोनोंका मालिक है। उसको प्राप्त होनेके बाद फिर दुःखालय संसारमें जन्म नहीं होता। हाँ, उनको प्राप्त हुए मनुष्य उनकी इच्छासे कारक महापुरुषके रूपमें अथवा भगवान्के अवतारके समय संसारमें आ सकते हैं। परन्तु उनका वह जन्म कर्मिके अधीन नहीं होता, प्रत्युत भगवान्की इच्छासे होता है।
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले भी पीछे लौटकर आते हैं—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्ष्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
| यत् | = जो मनुष्य | पर्यन्तम् | = एक हजार | (और) |
|---|---|---|---|---|
| ब्रह्मणः | = ब्रह्माके | चतुर्भुगीवाले | युग- | |
| सहस्रयुग- | अहः | = एक दिनको | सहस्रान्ताम् = एक हजार |
६०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
रात्रिम् | चतुर्भुगीवाली = एक रात्रिको | ते | = वे | दिन और ---|---|---|---|--- विदुः | = जानते हैं, | जनाः | = मनुष्य | रातको जानने- | | अहोरात्रविदः | = ब्रह्माके | वाले हैं।
व्याख्या—‘सहस्रयुगपर्यन्तम् ..... तेऽहोरात्रविदो जनाः’ —सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—मृत्युलोकके इन चार युगोंको एक चतुर्भुगी कहते हैं। ऐसी एक हजार चतुर्भुगी बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है और एक हजार चतुर्भुगी बीतनेपर ब्रह्माजीकी एक रात होती है*। दिन-रातकी इसी गणनाके अनुसार सौ वर्षोंकी ब्रह्माजीकी आयु होती है। ब्रह्माजीकी आयुके सौ वर्ष बीतनेपर ब्रह्माजी परमात्मामें लीन हो जाते हैं और उनका ब्रह्मलोक भी प्रकृतिमें लीन हो जाता है तथा प्रकृति परमात्मामें लीन
हो जाती है।
कितनी ही बड़ी आयु क्यों न हो, वह भी कालकी अवधिवाली ही है। ऊँचे-से-ऊँचे कहे जानेवाले जो भोग हैं, वे भी संयोगजन्य होनेसे दुःखोंके ही कारण हैं—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५। २२) और कालकी अवधिवाले हैं। केवल भगवान् ही कालातीत हैं। इस प्रकार कालके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्य ब्रह्मलोकतकके दिव्य भोगोंको किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं देते।
सम्बन्ध—ब्रह्माजीके दिन और रातको लेकर जो सर्ग और प्रलय होते हैं, उसका वर्णन अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
अव्यक्तादव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके ॥ १८ ॥
| अहरागमे | = ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमें | व्यक्तयः | = शरीर | अव्यक्तसञ्ज्ञके, | = अव्यक्त नामवाले- |
|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तात् | = अव्यक्त-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) से | प्रभवन्ति | = पैदा होते हैं (और) | एव | (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) में ही |
| सर्वाः | = सम्पूर्ण | रात्र्यागमे | = ब्रह्माकी रातके आरम्भकालमें | प्रलीयन्ते | = (सम्पूर्ण शरीर) |
| तत्र | = उस | लीन हो जाते हैं। |
- अत्यन्त सूक्ष्म काल है—परमाणु। दो परमाणुओंका एक अणु और तीन अणुओंका एक त्रसरेणु होता है। झरोखेसे आधी सूर्य-किरणोंमें त्रसरेणु उड़ते हुए दीखते हैं। ऐसे तीन त्रसरेणुओंको पार करनेमें सूर्य जितना समय लेता है, उसे त्रुटि कहते हैं। सौ त्रुटियोंका एक वंश, तीन वंशोंका एक लव, तीन लवोंका एक निषेध और तीन निषेधोंका एक क्षण होता है। पाँच क्षणोंकी एक काष्ठा, पंद्रह काष्ठाओंका एक लघु, पंद्रह लघुओंकी एक नाड़िका, छः नाड़िकाओंका एक प्रहर और आठ प्रहरोंका एक दिन-रात होता है। पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, दो पक्षोंका एक मास, छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है।
इस प्रकार मनुष्योंके एक वर्षके समान देवताओंकी एक दिन-रात है अर्थात् मनुष्योंका छः महीनोंका उत्तरायण देवताओंका दिन है और छः महीनोंका दक्षिणायन देवताओंकी रात है। इस तरह देवताओंके समयका परिमाण मनुष्योंके समयके परिमाणसे तीन सौ साठ गुणा अधिक माना जाता है। इस हिसाबसे मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रात, मनुष्योंके तीस वर्ष देवताओंका एक महीना और मनुष्योंके तीन सौ साठ वर्ष देवताओंका एक दिव्य वर्ष है। ऐसे ही मनुष्यके सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग बीतनेपर देवताओंका एक दिव्ययुग होता है अर्थात् मनुष्योंके सत्ययुगके सत्रह लाख अठ्ठाईस हजार, त्रेताके बारह लाख छियानबे हजार, द्वापरके आठ लाख चौंसठ हजार और कलिके चार लाख बत्तीस हजार—ऐसे कुल तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षोंके बीतनेपर देवताओंका एक दिव्ययुग होता है। इसको ‘महायुग’ और ‘चतुर्भुगी’ भी कहते हैं।
मनुष्यों और देवताओंके समयका परिमाण तो सूर्यसे होता है, पर ब्रह्माजीके दिन-रातका परिमाण देवताओंके दिव्य युगोंसे होता है अर्थात् देवताओंके एक हजार दिव्ययुगोंका (मनुष्योंके चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षोंका) ब्रह्माजीका एक दिन होता है और उतने ही दिव्ययुगोंकी एक रात होती है। ब्रह्माजीके इसी दिनको ‘कल्प’ या ‘सर्ग’ कहते हैं और रातको ‘प्रलय’ कहते हैं।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
६०७
व्याख्या —‘अव्यक्तादव्यक्तयः’……… तत्रैवाव्यक्त-सञ्ज्के—‘मात्र प्राणियोंके जितने शरीर हैं, उनको यहाँ ‘व्यक्तयः’ और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मूर्तयः’ कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् ‘मैं’ और ‘मेरापन’ को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टि जीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टि जीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि दीखती है, वह सब-की-सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात् प्रकृतिसे
परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं। वे पुनरावर्ती क्यों हैं? इसके उत्तरमें भगवान् सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें बताते हैं कि ऊँचे-से-ऊँचा ब्रह्मलोक भी कालकी अवधिमें है। उस अवधिका विवेचन करते हुए भगवान् बताते हैं कि ब्रह्मलोककी अवधि कितनी ही बड़ी क्यों न हो, है वह कालके अन्तर्गत ही। परन्तु भगवान् कालकी अवधिमें नहीं हैं।
जैसे हम रातको सोते हैं तो संसारको भूल जाते हैं और प्रातः जागते हैं तो संसार पुनः याद आ जाता है ऐसे ही ब्रह्माजीके रातमें सम्पूर्ण सृष्टि लीन हो जाती है और दिनमें पुनः उत्पन्न हो जाती है। यह रात और दिनकी आखिरी हद है। ब्रह्माजीके दिन और रात सूर्यसे नहीं होते, प्रत्युत प्रकृतिसे होते हैं।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ११ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ ! | अवशः | = प्रकृतिके परवश | ( और ) |
|---|---|---|---|---|
| सः, एव | = वही | हुआ | रात्र्यागमे = ब्रह्माकी रात्रिके | |
| अयम् | = यह | अहरागमे = ब्रह्माके दिनेके | समय | |
| भूतग्रामः | = प्राणिसमुदाय | समय | प्रलीयते = लीन | |
| भूत्वा, भूत्वा | = उत्पन्न हो-होकर | प्रभवति = उत्पन्न होता है | होता है। |
व्याख्या —‘भूतग्रामः स एवायम्’—अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ यह प्राणिसमुदाय वही है, जो कि साक्षात् मेरा अंश, मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होनेसे यह नित्य है। सर्ग और प्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलयमें भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसका न कभी अभाव हुआ है और न आगे कभी इसका अभाव होगा। तात्पर्य है कि यह अविनाशी है, इसका कभी विनाश नहीं होता। परन्तु भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो बदलते रहते हैं, उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, पर यह उनके सम्बन्धको पकड़ रहा है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी (सांसारिक पदार्थ) तो नहीं रहते, पर उनका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि उस सम्बन्धको स्वयंने पकड़ा है। अतः यह स्वयं जबतक उस सम्बन्धको नहीं
पैदा होती है और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माजीके जगनेपर तो ‘सर्ग’ होता है और ब्रह्माजीके सोनेपर ‘प्रलय’ होता है। जब ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी आयु बीत जाती है, तब ‘महाप्रलय’ होता है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान्में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीकी जितनी आयु होती है, उतना ही महाप्रलयका समय रहता है। महाप्रलयका समय बीतनेपर ब्रह्माजी भगवान्से प्रकट होते हैं तो ‘महासर्ग’का आरम्भ होता है (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।
छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। उस सम्बन्धको छोड़नेमें यह स्वतन्त्र है, सबल है। वास्तवमें यह उस सम्बन्धको रखनेमें सदा परतन्त्र है; क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बदलते रहते हैं, पर यह नया-नया सम्बन्ध पकड़ता रहता है। जैसे, बालकपनको इसने नहीं छोड़ा और न छोड़ना चाहा, पर वह छूट गया। ऐसे ही जवानीको इसने नहीं छोड़ा, पर वह छूट गयी। और तो क्या, यह शरीरको भी छोड़ना नहीं चाहता, पर वह भी छूट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं, पर यह जीव उन पदार्थोंके साथ अपने सम्बन्धको बनाये रखता है, जिससे इसको बार-बार शरीर धारण करने पड़ते हैं, बार-बार जन्मना-मरना पड़ता है। जबतक यह उस माने हुए सम्बन्धको नहीं छोड़ेगा, तबतक यह जन्म-मरणकी परम्परा चलती ही रहेगी, कभी मिटेगी नहीं।
६०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
भगवान्के द्वारा अकेले खेल नहीं हुआ (‘एकाकी न रमते’) तो खेल खेलनेके लिये अर्थात् प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये भगवान्ने इस प्राणिसमुदायको शरीर-रूप खिलौनेके सहित प्रकट किया। खेलका यह नियम होता है कि खेलके पदार्थ केवल खेलनेके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु यह प्राणिसमुदाय खेल खेलना तो भूल गया और खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरोंको व्यक्तिगत मानने लग गया। इसीसे यह उनमें फँस गया और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गया।
‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’—ये पद शरीरोंके लिये कहे गये हैं, जो कि उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं अर्थात् जिनमें प्रतिक्षण ही परिवर्तन होता रहता है। परन्तु जीव उन शरीरोंके परिवर्तनको अपना परिवर्तन और उनके जन्मने-मरनेको अपना जन्म-मरण मानता रहता है। इसी मान्यताके कारण उसका जन्म-मरण कहा जाता है।
यह स्वयं सत्स्वरूप है—‘भूतग्रामः स एवायम्’ और शरीर उत्पत्ति-विनाशशील हैं—‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’, इसलिये शरीरोंको धारण करना अर्थात् जन्म-मरणका होना परधर्म है और मुक्त होना स्वधर्म है।
‘रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे’—यहाँ ‘अवशः’ कहनेका तात्पर्य है कि अगर यह जीव प्रकृतिकी वस्तुओंमेंसे किसी भी वस्तुको अपनी मानता रहेगा तो उसको वहम तो यह होगा कि ‘मैं इस वस्तुका मालिक हूँ’, पर हो जायगा उस वस्तुके परवश, पराधीन। प्राकृत पदार्थोंको यह जितना ही अधिक ग्रहण करेगा, उतना ही यह महान् परतन्त्र बनता चला जायगा। फिर इसकी परतन्त्रता कभी छूटेगी ही नहीं। ब्रह्माजीके जगने और सोनेपर अर्थात् सर्ग और प्रलयके होनेपर (आठवें
परिशिष्ट भाव—एक विभाग बदलनेवाले संसारका है और एक विभाग न बदलनेवाली चिन्मय सत्ताका है। जो अनादिकालसे जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़ा हुआ है, वही यह जीव-समुदाय बार-बार उत्पन्न और लीन होता है। ब्रह्माके दिन और रातके बीचमें भी जीव निरन्तर जन्म लेता और मरता रहता है। तात्पर्य है कि जो बार-बार उत्पन्न और लीन होता है, वह संसार है और जो वही रहता है (जो पहले सर्गावस्थामें था), वह जीवका असली स्वरूप अर्थात् चिन्मय सत्ता है, जो परमात्माका साक्षात् अंश है। ब्रह्माजीके कितने ही रात-दिन बीत जायें, पर जीव स्वयं वही-का-वही रहता है।
चिन्मय सत्ता (चितिशक्ति) अर्थात् स्वयंमें स्वीकार अथवा अस्वीकार करनेकी सामर्थ्य है। इस सामर्थ्यका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् जड़ताको स्वीकार करनेसे ही वह जन्मता-मरता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। यदि वह इस सामर्थ्यका दुरुपयोग न करे तो उसका जन्म-मरण हो ही नहीं सकता। अतः जीवका खास पुरुषार्थ है—जड़ताको स्वीकार न करना अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित होना अथवा अपने अंशों भगवान्के शरण होना। जड़तामें अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थितियोंमें परिवर्तन होता है, अपनेमें (अपने होनेपनमें) कभी परिवर्तन नहीं होता—यह मनुष्यमात्रका अनुभव है। परन्तु ऐसा अनुभव होते हुए भी मनुष्य सुखासक्तिके कारण जड़तासे बँधा रहता है, जिससे
अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), ब्रह्माजीके प्रकट और लीन होनेपर अर्थात् महासर्ग और महाप्रलयके होनेपर (नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक) तथा वर्तमानमें प्रकृतिके परवश होकर कर्म करते रहनेपर (तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी यह जीव ‘जन्मना और मरना तथा कर्म करना और उसका फल भोगना’—इस आफतसे कभी छूटेगा ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, बोध नहीं होता और यह प्रकृतिके सम्बन्धको नहीं छोड़ता, तबतक परतन्त्र होनेके कारण यह दुःखरूप जन्म-मरणके चक्करसे छूट नहीं सकता। परन्तु जब इसकी प्रकृति और प्रकृतिजन्म पदार्थोंकी परवशता मिट जाती है अर्थात् इसको प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा रहित अपने शुद्ध स्वरूपका बोध हो जाता है, तो फिर यह महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होता और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होता—‘सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४।२)।
मूलमें परवशता प्रकृतिजन्म पदार्थोंको महत्त्व देने, उनको स्वीकार करनेमें ही है। इस परवशताको ही कहीं कालकी, कहीं स्वभावकी, कहीं कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशताके नामसे कहा गया है।
इस प्राणिसमुदायकी यह परवशता तभीतक रहती है, जबतक यह प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे सुख लेना चाहता है। इस संयोगजन्म सुखकी इच्छासे ही यह पराधीनता भोगता रहता है और ऐसा मानता रहता है कि यह पराधीनता छूटती नहीं, इसको छोड़ना बड़ा कठिन है। परन्तु यह परवशता इसकी ही बनायी हुई है, स्वतः नहीं है। अतः इसको छोड़नेको जिम्मेवारी इसीपर है। इसको यह जब चाहे, तभी छोड़ सकता है।
श्लोक २०]
- साधक-संजीवनी *
६०९
उसको अपने सहज स्वरूपका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत वह पशु-पक्षी आदिकी तरह अपने स्वरूपको भूला रहता है।
‘अवशः’ अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे जीव परवश, पराधीन हो जाता है—‘भूतग्राममिमं कृतन्मवशं प्रकृतेर्वशात् ’ (गीता ९।८)*। अतः प्रकृतिके साथ माना हुआ सम्बन्ध छूटनेपर यह स्वाधीन अर्थात् मुक्त हो जाता है।
हमारी सत्ता अपरा प्रकृतिके अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है। प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक व्यक्तिका जन्म (संयोग) और मरण (वियोग) होता है तथा प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इन तीनों-(वस्तु, व्यक्ति और क्रिया-) को जाननेवाली हमारी चिन्मय सत्ता-(होनेपन-) का कभी उत्पत्ति-विनाश, जन्म-मरण (संयोग-वियोग) और आरम्भ-अन्त नहीं होता। यह सत्ता नित्य-निरन्तर स्वतः ज्यों-की-त्यों रहती है—‘भूतग्रामः स एवायम् ’। इस सत्ताका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’ (गीता २।१६)। इस सत्तामें स्वतः-स्वाभाविक स्थितिके अनुभवका नाम ही मुक्ति (स्वाधीनता) है।
मनुष्यको यह वहम रहता है कि अमुक वस्तुकी प्राप्ति होनेपर, अमुक व्यक्तिके मिलनेपर तथा अमुक क्रियाको करनेपर मैं स्वाधीन (मुक्त) हो जाऊँगा। परन्तु ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति और क्रिया है ही नहीं, जिससे मनुष्य स्वाधीन हो जाय। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रिया तो मनुष्यको पराधीन बनानेवाली हैं। उनसे सर्वथा असंग होनेपर ही मनुष्य स्वाधीन हो सकता है। अतः साधकको चाहिये कि वह वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना अपनेको अकेला अनुभव करनेका स्वभाव बनाये, उस अनुभवको महत्त्व दे, उसमें अधिक-से-अधिक स्थित रहे। यह मनुष्यमात्रका अनुभव है कि सुषुप्तिके समय वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना भी हम स्वतः रहते हैं; परन्तु हमारे बिना वस्तु, व्यक्ति और क्रिया नहीं रहती। जब जाग्रतमें भी हम इनके बिना रहनेका स्वभाव बना लेंगे, तब हम स्वाधीन (मुक्त) हो जायेंगे। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके सम्बन्धकी मान्यता ही हमें स्वाधीन नहीं होने देती और हमारे न चाहते हुए भी हमें पराधीन बना देती है।
परमात्मामें अनन्त शक्तियाँ हैं, जो चित्स्वरूप हैं। माया-(प्रकृति-) में भी अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वे जड़स्वरूप तथा परिवर्तनशील हैं—‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूर्यते सचराचरम् ’ (९।१०)। सबसे विलक्षण शक्ति भगवत्प्रेममें है। परन्तु मुक्ति-(स्वाधीनता-) में सन्तोष करनेसे वह प्रेम प्रकट नहीं होता। जड़ताके सम्बन्धसे ही परवशता होती है और मुक्त होनेपर वह परवशता सर्वथा मिट जाती है और जीव स्वाधीन हो जाता है। परन्तु प्रेम इस स्वाधीनतासे भी विशेष विलक्षण है। स्वाधीनता-(मुक्ति-) में अखण्ड आनन्द है, पर प्रेममें अनन्त आनन्द है।
ज्ञानयोगी तो स्वाधीन होता है और भक्त प्रेमी होता है। भक्तियोगमें भक्त भगवान्के पराधीन नहीं होता; क्योंकि भगवान् परकीय नहीं हैं, प्रत्युत स्वकीय (अपने) हैं। स्वकीयकी अधीनतामें विशेष स्वाधीनता होती है।
भगवान् तो स्वाधीन-से-स्वाधीन हैं। जीव ही जड़ताके पराधीन हो जाता है। उस पराधीनताको मिटानेसे वह स्वाधीन हो जाता है। परन्तु भगवान्के शरण होनेसे वह स्वाधीनतापूर्वक स्वाधीन अर्थात् परम स्वाधीन हो जाता है। भगवान्की अधीनता परम स्वाधीनता है, जिसमें भगवान् भी भक्तके अधीन हो जाते हैं—‘अहं भक्तपराधीनः ’ (श्रीमद्भगवद्गीता १।४।६३)।
सम्बन्ध—अनित्य संसारका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें जीवोंके प्रापणीय परमात्माकी महिमाका विशेष वर्णन करते हैं।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽन्यत्कोऽन्यत्कात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्यस्मृ न विनश्यति ॥ २० ॥
| तु | = परन्तु | सनातनः | = अनादि | सः | = वह |
|---|---|---|---|---|---|
| तस्मात् | = उस | परः | = अत्यन्त श्रेष्ठ | सर्वेषु | = सम्पूर्ण |
| अन्यत्कात् | = अन्यत्क-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) से | भावः | = भावरूप | भूतेषु | = प्राणियोंके |
| अन्यः | = अन्य (विलक्षण) | यः | = जो | नश्यत्यस्मृ | = नष्ट होनेपर भी |
| अन्यत्कः | = अन्यत्क (ईश्वर) है, | न, विनश्यति | = नष्ट नहीं होता। |
- यहाँ (८।१९ में) और नवें अध्यायके आठवें श्लोकमें—दोनों जगह ‘भूतग्राम’ और ‘अवश’ शब्द आये हैं। फर्क इतना है कि यहाँ सर्ग तथा प्रलयका वर्णन है, वहाँ (९।८ में) महसर्ग तथा महाप्रलयका वर्णन है।
६१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
व्याख्या—‘परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्-सनातनः’ —सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके लोकोंको पुनरावर्ती कहा गया है। परन्तु परमात्मतत्त्व उनसे अत्यन्त विलक्षण है—यह बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद दिया गया है।
यहाँ ‘अव्यक्तात्’ पद ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरका ही वाचक है। कारण कि इससे पहले अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे प्राणियोंके पैदा होनेकी और प्रलयमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें प्राणियोंके लीन होनेकी बात कही गयी है। इस श्लोकमें आया ‘तस्मात्’ पद भी ब्रह्माजीके उस सूक्ष्मशरीरका द्योतन करता है। ऐसा होनेपर भी यहाँ ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर- (समष्टि मन, बुद्धि और अहंकार-) से भी पर अर्थात् अत्यन्त विलक्षण जो भावरूप अव्यक्त कहा गया है, वह ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीरके साथ-साथ ब्रह्माजीके कारण-शरीर- (मूल प्रकृति-) से भी अत्यन्त विलक्षण है।
ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पर दो तत्त्व हैं—मूल प्रकृति और परमात्मा। यहाँ प्रसंग मूल प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत परमात्माका है। अतः इस श्लोकमें परमात्माको ही पर और श्रेष्ठ कहा गया है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। आगेके श्लोकमें भी ‘अव्यक्तोऽक्षर’
परिशिष्ट भाव— एक अपरिवर्तनशील (स्थायी) तत्त्व ‘परा’ है और एक परिवर्तनशील (अस्थायी) तत्त्व ‘अपरा’ है। परामें कभी परिवर्तन होता ही नहीं और अपरामें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अपरा कभी परिवर्तनके बिना रहती ही नहीं, रह सकती ही नहीं। सर्ग और प्रलयमें तो परिवर्तन होता रहता है, महासर्ग और महाप्रलयमें भी परिवर्तन होता रहता है।
अगर परा और अपरा—दोनों ही तत्त्व अपरिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय अथवा दोनों ही परिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय! परन्तु स्वयं अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव- (परा-) ने परिवर्तनशील अपरासे सम्बन्ध जोड़ लिया, इसीसे वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गया। जगत्से अपना सम्बन्ध जोड़कर वह भी जगत् हो गया (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जैसे कोई चलती हुई गाड़ीमें बैठकर चल पड़े, ऐसे ही परिवर्तनशील संसारको पकड़कर जीव भी परिवर्तनशील बन गया—अनेक योनियोंमें भटकने लग गया!
परमात्माको ‘पर’ अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे भी श्रेष्ठ मूल प्रकृति (कारणशरीर) है और मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ परमात्मा है।
सम्बन्ध—अभीतक जो परमात्मविषयक वर्णन हुआ है, उस सबकी एकता करते हुए अनन्यभक्तिके विशेष महत्त्वका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥ २१ ॥
आदि पदोंसे उस परमात्माका ही वर्णन आया है।
गीतामें प्राणियोंके अप्रकट होनेको अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ (२।२८); ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरको भी अव्यक्त कहा गया है (८।१८); प्रकृतिको भी अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तमेव च’ (१३।५) आदि। उन सबसे परमात्माका स्वरूप विलक्षण, श्रेष्ठ है, चाहे वह स्वरूप व्यक्त हो, चाहे अव्यक्त हो। वह भावरूप है अर्थात् किसी भी कालमें उसका अभाव हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। कारण कि वह सनातन है अर्थात् वह सदासे है और सदा ही रहेगा। इसलिये वह पर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता और होनेकी सम्भावना भी नहीं है।
‘यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति’ —अब उत्तरार्धमें उसकी विलक्षणता बताते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी अर्थात् उन सम्पूर्ण शरीरोंका अभाव होनेपर भी उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता—ऐसा वह परमात्माका अव्यक्त स्वरूप है।
‘न विनश्यति’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें कार्यरूपसे अनेक तरहके परिवर्तन होनेपर भी वह परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों ही अपरिवर्तनशील रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन होता ही नहीं।
श्लोक २२]
- साधक-संजीवनी *
६११
| तम् | = उसीको | परमा् | = परम | न, निवर्तन्ते | = फिर लौटकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तः | = अव्यक्त (और) | गतिम् | = गति | (संसारमें) नहीं आते, | |
| अक्षरः | = अक्षर— | आहुः | = कहा गया है (और) | तत् | = वह |
| इति | = ऐसा | यम् | = जिसको | मम | = मेरा |
| उक्तः | = कहा गया है (तथा | ||||
| उसीको) | प्राप्य | = प्राप्त होनेपर | |||
| (जीव) | परमम् | = परम | |||
| धाम | = धाम है। |
व्याख्या —‘अव्यक्तोऽक्षर’”तद्भाम परमं मम’—भगवान्ने सातवें अध्यायके अठ्ठाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें जिसको ‘माम्’, कहा है तथा आठवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म’, चौथे श्लोकमें ‘अधियज्ञः’, पाँचवें और सातवें श्लोकमें ‘माम्’, आठवें श्लोकमें ‘परमं पुरुषं दिव्यम्’, नवें श्लोकमें ‘कविं पुराणमनुशासितारम्’ आदि, तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें ‘माम्’, बीसवें श्लोकमें ‘अव्यक्तः’ और ‘सनातनः’ कहा है, उन सबकी एकता करते हुए भगवान् कहते हैं कि उसीको अव्यक्त और अक्षर कहते हैं तथा उसीको परमगति अर्थात् सर्वश्रेष्ठ गति कहते हैं; और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है अर्थात् मेरा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। इस प्रकार जिस प्रापणीय वस्तुको अनेक रूपोंमें कहा गया है, उसकी यहाँ एकता की गयी है। ऐसे ही चौदहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भी ‘ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकात्मिक सुखका आश्रय मैं हूँ’ ऐसा कहकर भगवान्ने प्रापणीय वस्तुकी एकता की है।
लोगोंकी ऐसी धारणा रहती है कि सगुण-उपासनाका फल दूसरा है और निर्गुण-उपासनाका फल दूसरा है। इस धारणाको दूर करनेके लिये इस श्लोकमें सबकी एकताका
परिशिष्ट भाव —अव्यक्त, अक्षर आदि नामोंकी पहुँच उस प्रापणीय तत्त्वतक नहीं है। कारण कि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति दोनोंसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है। उसको प्राप्त होनेपर जीव लौटकर नहीं आता; क्योंकि उसकी अवधि नहीं है।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
पार्थ | = हे पृथानन्दन अर्जुन! | येन | = जिससे | परः | = परम ---|---|---|---|---|--- भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | इदम् | = यह | पुरुषः | = पुरुष परमात्मा यस्य | = जिसके | सर्वम् | = सम्पूर्ण संसार | तु | = तो अन्तःस्थानि | = अन्तर्गत हैं (और) | ततम् | = व्याप्त है, | अनन्यया, भक्त्या | = अनन्य भक्तिसे | | सः | = वह | लभ्यः | = प्राप्त होनेयोग्य है।
६१२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
व्याख्या —‘यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं तत्तम्’—सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने निषेधरूपसे कहा कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं, पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। यहाँ भगवान् विधिरूपसे कहते हैं कि परमात्माके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी हैं और परमात्मा सम्पूर्ण संसारमें परिपूर्ण हैं। इसीको भगवान्ने नवें अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकमें विधि और निषेध—दोनों रूपोंसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरे सिवाय किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं, अतः सब कुछ मैं ही हुआ।
वे परमात्मा सर्वोपरि होनेपर भी सबमें व्याप्त हैं अर्थात् वे परमात्मा सब जगह हैं; सब समयमें हैं; सम्पूर्ण वस्तुओंमें हैं, सम्पूर्ण क्रियाओंमें हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंमें हैं। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें पहले भी सोना ही था, गहनारूप बननेपर भी सोना ही रहा और गहनोंके नष्ट होनेपर भी सोना ही रहेगा। परन्तु सोनेसे बने गहनोंके नाम, रूप, आकृति, उपयोग, तौल, मूल्य आदिपर दृष्टि रहनेसे सोनेकी तरफ दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही संसारके पहले भी परमात्मा थे, संसाररूपसे भी परमात्मा ही हैं और संसारका अन्त होनेपर भी परमात्मा ही रहेंगे। परन्तु संसारको पांचभौतिक, ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा, अनुकूल-प्रतिकूल आदि मान लेनेसे परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।
‘पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वन्नन्यथा’ —पूर्वश्लोकमें जिसको अव्यक्त, अक्षर, परमगति आदि नामोंसे कहा गया है, उसीको यहाँ ‘पुरुषः स परः’ कहा गया है। ऐसा वह परम पुरुष परमात्मा अनन्यभक्तसे प्राप्त होता है।
परमात्माके सिवाय प्रकृतिका यावन्मात्र कार्य ‘अन्य’ कहा जाता है। जो उस ‘अन्य’ की स्वतन्त्र सत्ता मानकर उसको आदर देता है, महत्त्व देता है, उसकी अनन्य भक्ति नहीं है। इससे परमात्माकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर वह परमात्माके सिवाय किसीकी भी सत्ता और महत्ता न माने तथा भगवान्के नाते, भगवान्की प्रसन्नताके लिये प्रत्येक क्रिया करे, तो यह उसकी अनन्यभक्ति है। इसी अनन्य-भक्तिके वह परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है। परमात्माके सिवाय किसीकी भी सत्ता और महत्ता न
माने—यह बात भी प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारको सत्ता देकर ही कही जाती है। कारण कि मनुष्यके हृदयमें ‘एक परमात्मा है और एक संसार है’—यह बात जँची हुई है। वास्तवमें तो सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिके रूपमें एक परमात्मतत्त्व ही है। जैसे बर्फ, ओला, बादल, बूँदे, कोहरा, ओस, नदी, तालाब, समुद्र आदिके रूपमें एक जल ही है, ऐसे ही स्थूल, सूक्ष्म और कारण-रूपसे जो कुछ संसार दीखता है, वह सब केवल परमात्मतत्त्व ही है। भक्तकी मान्यतामें एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ रहता ही नहीं, इसलिये उसकी खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि सभी क्रियाएँ केवल उस परमात्माकी पूजाके रूपमें ही होती हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।
विशेष बात
आप अन्तकालमें कैसे जाननेमें आते हैं? (८।२)—यह अर्जुनका प्रश्न बड़ा ही भावपूर्ण मालूम देता है। कारण कि भगवान्को सामने देखते हुए भी अर्जुनमें भगवान्की विलक्षणताको जाननेकी उत्कण्ठा पैदा हो गयी। उत्तरमें भगवान्ने अन्तकालमें अपने चिन्तनकी और सामान्य कानूनकी बात बताकर अर्जुनको सब समयमें भगवच्चिन्तन करनेकी आज्ञा दी। उसके बाद आठवें श्लोकसे सोलहवें श्लोकतक सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकारकी प्राप्तिके लिये क्रमशः तीन-तीन श्लोक कहे। उनमें भी सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारकी प्राप्तिमें (प्राणोंको रोकनेकी बात साथमें होनेसे) कठिनता बतायी; और सगुण-साकारकी उपासनामें भगवान्का आश्रय लेकर उनका चिन्तन करनेकी बात होनेसे सगुण-साकारकी प्राप्तिमें बहुत सुगमता बतायी।
सोलहवें श्लोकके बाद सगुण-साकार स्वरूपकी विशेष महिमा बतानेके लिये भगवान्ने छः श्लोक कहे। उनमें भी पहलेके तीन श्लोकोंमें ब्रह्माजीकी और उनके ब्रह्मलोककी अवधि बतायी और आगेके तीन श्लोकोंमें ब्रह्माजी और उनके ब्रह्मलोकसे अपनी और अपने लोककी विलक्षणता बतायी। तात्पर्य है कि ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर (प्रकृति)-से भी मेरा स्वरूप विलक्षण है। उपासनाओंकी जितनी गतियाँ हैं, वे सब मेरे स्वरूपके अन्तर्गत आ जाती हैं। ऐसा वह मेरा सर्वोपरि स्वरूप केवल मेरे परायण होनेसे अर्थात् अनन्यभक्तिके प्राप्त हो जाता है। मेरा स्वरूप प्राप्त होनेपर
श्लोक २३ ]
- साधक-संजीवनी *
६१३
फिर साधककी न तो अन्य स्वरूपोंकी तरफ वृत्ति जाती है और न उनकी आवश्यकता ही रहती है। उसकी वृत्ति केवल मेरे स्वरूपकी तरफ ही रहती है।
इस प्रकार ब्रह्माजीके लोकसे मेरा लोक विलक्षण है,
ब्रह्माजीके स्वरूपसे मेरा स्वरूप विलक्षण है और ब्रह्मलोककी गतिसे मेरे लोक-(धाम-) की गति विलक्षण है। तात्पर्य है कि सब प्राणियोंका अन्तिम ध्येय मैं ही हूँ और सब मेरे ही अन्तर्गत हैं।
परिशिष्ट भाव —भक्तिको ‘अनन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि भक्तिके साथ थोड़ा भी जड़ताका अंश, अहम्का संस्कार, अपने मतका संस्कार न रहे अर्थात् किसी भी तरफ किंचिन्मात्र भी खिंचाव न रहे। सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करना अनन्यभक्ति है।
सुखकी वासना तो एक ही है, पर सुख-सामग्रीकी तारतम्यता अनेक लोकोंमें है। ब्रह्मलोकतकका सुख भी आकृष्ट न करे, यहाँतक कि अपनी स्वाधीनता-(मुक्ति-) का सुख भी सन्तुष्ट न कर सके, तब भक्ति प्राप्त होती है।
सातवें अध्यायमें भगवान्ने कहा था—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिचिदस्ति ’ (७।७), उसी बातको यहाँ ‘यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ’ पदोंसे कहा है। इसीको आगे नवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें विस्तारसे कहेंगे। इन सबका तात्पर्य है कि एक भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।
सम्बन्ध—सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतकको प्राप्त होनेवाले लौटकर आते हैं और मेरेको प्राप्त होनेवाले लौटकर नहीं आते। परंतु किस मार्गसे जानेवाले लौटकर नहीं आते और किस मार्गसे जानेवाले लौटकर आते हैं? यह बताना बाकी रह गया। अतः उन दोनों मार्गोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उपक्रम करते हैं।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
| तु | = परन्तु | योगिनः | = योगी | होते हैं अर्थात् पीछे |
|---|---|---|---|---|
| भरतर्षभ | = हे भरतवंशियोंमें | अनावृत्तिम् | = अनावृतिको | लौटकर आते हैं, |
| श्रेष्ठ अर्जुन! | यान्ति | = प्राप्त होते हैं अर्थात् | तम् = उस | |
| यत्र | = जिस | पीछे लौटकर | ||
| काले | = काल अर्थात् | नहीं आते | कालम् = कालको अर्थात् | |
| मार्गमें | च, एव | = और (जिस मार्गमें | दोनों मार्गोंको | |
| प्रयाता | = शरीर छोड़कर | गये हुए) | ||
| गये हुए | आवृत्तिम् | = आवृतिको प्राप्त | वक्ष्यामि = मैं कहूँगा। |
व्याख्या —[जीवित अवस्थामें ही बन्धनसे छूटनेको ‘सद्योमुक्ति’ कहते हैं अर्थात् जिनको यहाँ ही भगवत्प्राप्ति हो गयी, भगवान्में अनन्यभक्ति हो गयी, अनन्यप्रेम हो गया, वे यहाँ ही परम संसिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे जो साधक किसी सूक्ष्म वासनाके कारण ब्रह्मलोकमें जाकर क्रमशः ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं, उनकी मुक्तिको ‘क्रममुक्ति’ कहते हैं। जो केवल सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाते हैं, वे फिर लौटकर आते हैं। इसको ‘पुनरावृत्ति’ कहते हैं। सद्योमुक्तिका वर्णन तो पंद्रहवें श्लोकमें हो गया, पर क्रममुक्ति और पुनरावृत्तिका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः इन दोनोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।]
‘यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं ..... वक्ष्यामि भरतर्षभ ’—पीछे छूटे हुए विषयका लक्ष्य करनेके लिये यहाँ ‘तु’ अव्ययका प्रयोग किया गया है।
ऊर्ध्वगतिवालोंको कालाभिमानी देवता जिस मार्गसे ले जाता है, उस मार्गका वाचक यहाँ ‘काल’ शब्द लेना चाहिये; क्योंकि आगे छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें इसी ‘काल’ शब्दको मार्गके पर्यायवाची ‘गति’ और ‘सृति’ शब्दोंसे कहा गया है।
‘अनावृत्तिमावृत्तिम् ’ कहनेका तात्पर्य है कि अनावृत ज्ञानवाले पुरुष ही अनावृत्तिमें जाते हैं और आवृत ज्ञानवाले पुरुष ही आवृत्तिमें जाते हैं। जो सांसारिक पदार्थों और भोगोंसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख हो गये हैं, वे
६१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अनावृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ नहीं है, प्रत्युत जाग्रत् है। इसलिये वे अनावृतिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता। निष्कामभाव होनेसे उनके मार्गमें प्रकाश अर्थात् विवेककी मुख्यता रहती है।
सांसारिक पदार्थों और भोगोंमें आसक्ति, कामना और ममता रखनेवाले जो पुरुष अपने स्वरूपसे तथा परमात्मासे विमुख हो गये हैं, वे आवृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ है। इसलिये वे आवृतिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटकर जन्म-मरणके चक्रमें आना पड़ता।
परिशिष्ट भाव —जो परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखता है, उसको पीछे लौटकर आना पड़ता है। परन्तु जो परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ सम्बन्ध नहीं रखता, उसको पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता।
सम्बन्ध—अब उन दोनोंमेंसे पहले शुक्लमार्गका अर्थात् लौटकर न आनेवालोंके मार्गका वर्णन करते हैं।
अग्निज्योतिरहः शुक्लः षणमासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
जिस मार्गमें—
ज्योतिः = प्रकाशस्वरूप अग्निः = अग्निका अधिपति देवता, अहः = दिनका अधिपति देवता, शुक्लः = शुक्लपक्षका अधिपति देवता,
षणमासाः = (और) छः महीनोंवाले उत्तरायणम् = उत्तरायणका अधिपति देवता है, तत्र = उस मार्गसे प्रयाताः = (शरीर छोड़कर) गये हुए ब्रह्मविदः = ब्रह्मवेता
जनाः = पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माके साथ) ब्रह्म = ब्रह्मको गच्छन्ति = प्राप्त हो जाते हैं।
व्याख्या —‘अग्निज्योतिरहः शुक्लः षणमासा उत्तरायणम्’—इस भूमण्डलपर शुक्लमार्गमें सबसे पहले अग्नि देवताका अधिकार रहता है। अग्नि रात्रिमें प्रकाश करती है, दिनमें नहीं; क्योंकि दिनेके प्रकाशकी अपेक्षा अग्निका प्रकाश सीमित है। अतः अग्निका प्रकाश थोड़ी दूरतक (थोड़े देशमें) तथा थोड़े समयतक रहता है; और दिनका प्रकाश बहुत दूरतक तथा बहुत समयतक रहता है। शुक्लपक्ष पंद्रह दिनोंका होता है, जो कि पितरोंकी एक रात है। इस शुक्लपक्षका प्रकाश आकाशमें बहुत दूरतक और बहुत दिनोंतक रहता है। इसी तरहसे जब सूर्यभगवान् उत्तरकी तरफ चलते हैं, तब उसको उत्तरायण कहते हैं, जिसमें दिनका समय बढ़ता है। वह उत्तरायण छः महीनोंका होता है, जो कि देवताओंका एक दिन है। उस उत्तरायणका प्रकाश बहुत दूरतक और बहुत समयतक
रहता है।
‘तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः’— जो शुक्लमार्गमें अर्थात् प्रकाशकी बहुलतावाले मार्गमें जानेवाले हैं, वे सबसे पहले ज्योतिःस्वरूप अग्नि देवताके अधिकारमें आते हैं। जहाँतक अग्नि देवताका अधिकार है, वहाँसे पार कराकर अग्नि देवता उन जीवोंको दिनेके देवताको सौंप देता है। दिनका देवता उन जीवोंको अपने अधिकारतक ले जाकर शुक्लपक्षके अधिपति देवताके समर्पित कर देता है। वह शुक्लपक्षका अधिपति देवता अपनी सीमाको पार कराकर उन जीवोंको उत्तरायणके अधिपति देवताके सुपुर्द कर देता है। फिर वह उत्तरायणका अधिपति देवता उनको ब्रह्मलोकके अधिकारी देवताके समर्पित कर देता है। इस प्रकार वे क्रमपूर्वक ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं। ब्रह्माजीकी आयुतक वे वहाँ रहकर महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते
श्लोक २५ ]
- साधक-संजीवनी *
६१५
है—सच्चिदानन्दधन परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ ‘ब्रह्मविदः’ पद परमात्माको परोक्षरूपसे जाननेवाले मनुष्योंका वाचक है, अपरोक्षरूपसे अनुभव करनेवाले
ब्रह्मज्ञानियोंका नहीं। कारण कि अगर वे अपरोक्ष ब्रह्मज्ञानी होते, तो यहाँ ही मुक्त (सद्योमुक्त या जीवन्मुक्त) हो जाते और उनको ब्रह्मलोकमें जाना नहीं पड़ता।
परिशिष्ट भाव— पहले साधनावस्थामें जिनके भीतर ब्रह्मलोककी वासना अथवा अपने मतका आग्रह रहा है, वे क्रममुक्तिसे पहले ब्रह्मलोकमें जाते हैं और फिर महाप्रलय आनेपर ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं—
ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्॥
(कूर्मपुराण, पूर्व० ११। २८४)
‘ब्रह्माकी आयु पूर्ण होनेपर जब महाप्रलयकाल उपस्थित होता है, तब वे सम्पूर्ण शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष ब्रह्माके साथ ही परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं।’
क्रममुक्तिमें ब्रह्मलोक मार्गमें आनेवाले एक स्टेशनकी तरह है, जहाँ सुखकी वासनावाले पुरुष उतरते हैं। परन्तु जिनमें सुखकी वासना नहीं है, वे वहाँ नहीं उतरते; जैसे—हमारा कोई प्रयोजन न हो तो मार्गमें स्टेशन आये या जंगल, क्या फर्क पड़ता है!
उपनिषदोंमें शुक्लमार्गके क्रमका अलग-अलग ढंगसे वर्णन आता है; जैसे—
छान्दोग्योपनिषद्के अनुसार—अर्चिका देवता, दिनका देवता, शुक्लपक्षका देवता, उत्तरायणका देवता, संवत्सर, आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत् और फिर अमानव पुरुषके द्वारा ब्रह्मलोकमें (ब्रह्माके पास) ले जाना (४। १५। ५; ५। १०। १-२)।
बृहदारण्यकोपनिषद्के अनुसार—ज्योतिका देवता, दिनका देवता, शुक्लपक्षका देवता, उत्तरायणका देवता, देवलोक, आदित्य, विद्युत् (वैद्युत देव) और फिर मानस पुरुषके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्ति (६। २। १५)।
कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्के अनुसार—अग्निलोक, वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक और ब्रह्मलोक (१। ३)।
ब्रह्मसूत्र (४। ३। २-३)-में भी इसपर विचार किया गया है।
शुक्लमार्गको उपनिषदोंमें देवयान, अर्चिमार्ग, उत्तरमार्ग, देवपथ और ब्रह्मपथ नामसे भी कहा गया है।
सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें कृष्णमार्गका अर्थात् लौटकर आनेवालोंके मार्गका वर्णन करते हैं।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ २५॥
जिस मार्गमें—
| धूमः | = धूमका अधिपति देवता, | षण्मासाः | = छः महीनोंवाले | चान्द्रमसम् | = चन्द्रमाकी |
|---|---|---|---|---|---|
| रात्रिः | = रात्रिका अधिपति देवता, | दक्षिणायनम् | = दक्षिणायनका अधिपति देवता है, | ज्योतिः | = ज्योतिको |
| कृष्णः | = कृष्णपक्षका अधिपति देवता | तत्र | = (शरीर छोड़कर) उस मार्गसे गया हुआ | प्राप्य | = प्राप्त होकर |
| तथा | = और | योगी | = योगी (सकाम मनुष्य) | निवर्तते | = लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है। |
व्याख्या—‘धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः’ ‘‘‘‘‘ प्राप्य निवर्तते’—’ देश और कालकी दृष्टिसे जितना अधिकार अग्नि अर्थात् प्रकाशके देवताका है, उतना ही अधिकार धूम अर्थात्
अन्धकारके देवताका है। वह धूमाधिपति देवता कृष्णमार्गसे जानेवाले जीवोंको अपनी सीमासे पार करारकर रात्रिके अधिपति देवताके अधीन कर देता है। रात्रिका
६१६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अधिपति देवता उस जीवको अपनी सीमासे पार करारकर देश-कालको लेकर बहुत दूरतक अधिकार रखनेवाले कृष्णपक्षके अधिपति देवताके अधीन कर देता है। वह देवता उस जीवको अपनी सीमासे पार करारकर देश और कालकी दृष्टिसे बहुत दूरतक अधिकार रखनेवाले दक्षिणायनके अधिपति देवताके समर्पित कर देता है। वह देवता उस जीवको चन्द्रलोकके अधिपति देवताको सौंप देता है। इस प्रकार कृष्णमार्गसे जानेवाला वह जीव धूम्र, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके देशको पार करता हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको अर्थात् जहाँ अमृतका पान होता है, ऐसे स्वर्गादि दिव्य लोकोंको प्राप्त हो जाता है। फिर अपने पुण्योंके अनुसार न्यूनाधिक समयतक वहाँ रहकर अर्थात् भोग भोगकर पीछे लौट आता है।
यहाँ एक ध्यान देनेकी बात है कि यह जो चन्द्रमण्डल दीखता है, यह चन्द्रलोक नहीं है। कारण कि यह चन्द्रमण्डल तो पृथ्वीके बहुत नजदीक है, जब कि चन्द्रलोक सूर्यसे भी बहुत ऊँचा है। उसी चन्द्रलोकसे अमृत इस चन्द्रमण्डलमें आता है, जिससे शुक्लपक्षमें ओषधियाँ पुष्ट होती हैं।
अब एक समझनेकी बात है कि यहाँ जिस कृष्णमार्गका वर्णन है, वह शुक्लमार्गकी अपेक्षा कृष्णमार्ग है। वास्तवमें तो यह मार्ग ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जानेका है। सामान्य मनुष्य मरकर मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं, जो पापी होते हैं, वे आसुरी योनियोंमें जाते हैं और उनसे भी जो अधिक पापी होते हैं, वे नरकके कुण्डोंमें जाते हैं—इन सब मनुष्योंसे कृष्णमार्गसे जानेवाले बहुत श्रेष्ठ हैं। वे चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होते हैं—ऐसा कहनेका यही तात्पर्य है कि संसारमें जन्म-मरणके जितने मार्ग हैं, उन सब मार्गोंसे यह कृष्णमार्ग (ऊर्ध्वगतिका होनेसे) श्रेष्ठ है और उनकी अपेक्षा प्रकाशमय है।
कृष्णमार्गसे लौटते समय वह जीव पहले आकाशमें आता है। फिर वायुके अधीन होकर बादलोंमें आता है और बादलोंमेंसे वर्षाके द्वारा भूमण्डलपर आकर अन्नमें प्रवेश करता है। फिर कर्मानुसार प्राप्त होनेवाली योनिके पुरुषोंमें अन्तके द्वारा प्रवेश करता है और पुरुषसे स्त्री-जातिमें जाकर शरीर धारण करके जन्म लेता है। इस प्रकार वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ जाता है।
यहाँ सकाम मनुष्योंको भी 'योगी' क्यों कहा गया है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं; जैसे—
(१) गीतामें भगवान्ने मरनेवाले प्राणियोंकी तीन गतियाँ बतायी हैं—ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इनमेंसे ऊर्ध्वगतिका वर्णन इस प्रकारणमें हुआ है। मध्यगति और अधोगतिसे ऊर्ध्वगति श्रेष्ठ होनेके कारण यहाँ सकाम मनुष्योंको भी योगी कहा गया है।
(२) जो केवल भोग भोगनेके लिये ही ऊँचे लोकोंमें जाता है, उसने संयमपूर्वक इस लोकके भोगोंका त्याग किया है। इस त्यागसे उसकी यहाँके भोगोंके मिलने और न मिलनेमें समता हो गयी है। इस आंशिक समताको लेकर ही उसको यहाँ योगी कहा गया है।
(३) जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, पर अन्तकालमें किसी सूक्ष्म भोग-वासनाके कारण वे योगसे विचलितमना हो जाते हैं, तो वे ब्रह्मलोक आदि ऊँचे लोकोंमें जाते हैं और वहाँ बहुत समयतक रहकर पीछे यहाँ भूमण्डलपर आकर शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेते हैं। ऐसे योगभ्रष्ट मनुष्योंका भी जानेका यही मार्ग (कृष्णमार्ग) होनेसे यहाँ सकाम मनुष्यको भी योगी कह दिया है।
भगवान्ने पीछेके (चौबीसवें) श्लोकमें ब्रह्मको प्राप्त होनेवालोंके लिये 'ब्रह्मविदो जनाः ' कहकर बहुवचनका प्रयोग किया है और यहाँ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होनेवालोंके लिये 'योगी ' कहकर एकवचनका प्रयोग किया है। इससे ऐसा अनुमान होता है कि सभी मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके अधिकारी हैं और परमात्माकी प्राप्ति सुगम है। कारण कि परमात्मा सबको स्वतः प्राप्त हैं। स्वतःप्राप्त तत्त्वका अनुभव बड़ा सुगम है। इसमें करना कुछ नहीं पड़ता। इसलिये बहुवचनका प्रयोग किया गया है। परन्तु स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये विशेष क्रिया करनी पड़ती है, पदार्थोंका संग्रह करना पड़ता है, विधि-विधानका पालन करना पड़ता है। इस प्रकार स्वर्गादिको प्राप्त करनेमें भी कठिनता है तथा प्राप्त करनेके बाद पीछे लौटकर भी आना पड़ता है। इसलिये यहाँ एकवचन दिया गया है।
विशेष बात
(१)
जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है; परन्तु सुखभोगकी सूक्ष्म वासना सर्वथा नहीं मिटी है, वे शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। ब्रह्मलोकके भोग भोगनेपर उनकी वह
श्लोक २५ ]
- साधक-संजीवनी *
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वासना मिट जाती है तो वे मुक्त हो जाते हैं। इनका वर्णन यहाँ चौबीसवें श्लोकमें हुआ है।
जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका ही है और जिनमें न यहाँके भोगोंकी वासना है तथा न ब्रह्मलोकके भोगोंकी; परन्तु जो अन्तकालमें निर्गुणके ध्यानसे विचलित हो गये हैं, वे ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें नहीं जाते। वे तो सीधे ही योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं अर्थात् जहाँ पूर्वजन्मकृत ध्यानरूप साधन ठीक तरहसे हो सके, ऐसे योगियोंके कुलमें उनका जन्म होता है। वहाँ वे साधन करके मुक्त हो जाते हैं (गीता—छठे अध्यायका बयालीसवाँ-तैत्तालीसवाँ श्लोक)।
—उपर्युक्त दोनों साधकोंका उद्देश्य तो एक ही रहा है, पर वासनामें अन्तर रहनेसे एक तो ब्रह्मलोकमें जाकर मुक्त होते हैं और एक सीधे ही योगियोंके कुलमें उत्पन्न होकर साधन करके मुक्त होते हैं।
जिनका उद्देश्य ही स्वर्गादि ऊँचे-ऊँचे लोकोंके सुख भोगनेका है, वे यज्ञ आदि शुभ-कर्म करके ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जाते हैं और वहाँके दिव्य भोग भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पीछे लौटकर आ जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं (गीता—सातवें अध्यायके बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक, आठवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक)।
जिसका उद्देश्य तो परमात्मप्राप्तिका ही रहा है; पर सांसारिक सुखभोगकी वासनाको वह मिटा नहीं सका। इसलिये अन्तकालमें योगसे विचलित होकर वह स्वर्गादि लोकोंमें जाकर वहाँके भोग भोगता है और फिर लौटकर शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है। वहाँ वह जबर्दस्ती पूर्वजन्मकृत साधनमें लग जाता है और मुक्त हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ, चौवालीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)।
—उपर्युक्त दोनों साधकोंमें एकका तो उद्देश्य ही स्वर्गके सुखभोगका है, इसलिये वह पुण्यकर्मके अनुसार वहाँके भोग भोगकर पीछे लौटकर आता है। परन्तु जिसका उद्देश्य परमात्माका है और वह विचारद्वारा सांसारिक भोगोंका त्याग भी करता है, फिर भी वासना नहीं मिटी, तो अन्तमें भोगोंकी याद आनेसे वह स्वर्गादि लोकोंमें जाता है। उसने जो सांसारिक भोगोंका त्याग किया है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य है। इसलिये वह उन लोकोंमें बहुत समयतक भोग भोगकर यहाँ श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।
(२)
सामान्य मनुष्योंकी यह धारणा है कि जो दिनमें, शुक्लपक्षमें और उत्तरायणमें मरते हैं, वे तो मुक्त हो जाते हैं, पर जो रातमें, कृष्णपक्षमें और दक्षिणायनमें मरते हैं, उनकी मुक्ति नहीं होती। यह धारणा ठीक नहीं है। कारण कि यहाँ जो शुक्लमार्ग और कृष्णमार्गका वर्णन हुआ है, वह ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करनेवालोंके लिये ही हुआ है। इसलिये अगर ऐसा ही मान लिया जाय कि दिन आदिमें मरनेवाले मुक्त होते हैं और रात आदिमें मरनेवाले मुक्त नहीं होते, तो फिर अधोगतिवाले कब मरेंगे? क्योंकि दिन-रात, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष और उत्तरायण-दक्षिणायनको छोड़कर दूसरा कोई समय ही नहीं है। वास्तवमें मरनेवाले अपने-अपने कर्मके अनुसार ही ऊँच-नीच गतियोंमें जाते हैं, वे चाहे दिनमें मरें, चाहे रातमें; चाहे शुक्लपक्षमें मरें, चाहे कृष्णपक्षमें; चाहे उत्तरायणमें मरें, चाहे दक्षिणायनमें—इसका कोई नियम नहीं है।
जो भगवद्भक्त हैं, जो केवल भगवान्के ही परायण हैं, जिनके मनमें भगवद्दर्शनकी ही लालसा है, ऐसे भक्त दिनमें या रातमें, शुक्लपक्षमें या कृष्णपक्षमें, उत्तरायणमें या दक्षिणायनमें, जब कभी शरीर छोड़ते हैं, तो उनको लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं। पार्षदोंके साथ वे सीधे भगवद्दाममें पहुँच जाते हैं।
यहाँ एक शंका होती है कि जब मनुष्य अपने कर्मके अनुसार ही गति पाता है, तो फिर भीष्मजीने, जो तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुष थे, दक्षिणायनमें शरीर न छोड़कर उत्तरायणकी प्रतीक्षा क्यों की?
इसका समाधान यह है कि भीष्मजी भगवद्दाम नहीं गये थे। वे 'द्यौ' नामक वसु (आजान देवता) थे, जो शापके कारण मृत्युलोकमें आये थे। अतः उन्हें देवलोकमें जाना था। दक्षिणायनके समय देवलोकमें रात रहती है और उसके दरवाजे बंद रहते हैं। अगर भीष्मजी दक्षिणायनके समय शरीर छोड़ते, तो उन्हें अपने लोकमें प्रवेश करनेके लिये बाहर प्रतीक्षा करनी पड़ती। वे इच्छामृत्यु तो थे ही; अतः उन्होंने सोचा कि वहाँ प्रतीक्षा करनेकी अपेक्षा यहाँ प्रतीक्षा करनी ठीक है; क्योंकि यहाँ तो भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होते रहेंगे और सत्संग भी होता रहेगा, जिससे सभीका हित होगा, वहाँ अकेले पड़े रहकर क्या करेंगे? ऐसा सोचकर उन्होंने अपना शरीर दक्षिणायनमें न छोड़कर उत्तरायणमें ही छोड़ा।
६१८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
परिशिष्ट भाव—निष्कामभाव प्रकाश है और सकामभाव अँधेरा है।
उपनिषदोंमें कृष्णमार्गके क्रमका अलग-अलग प्रकारसे वर्णन आता है; जैसे—
छान्दोग्योपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,
आकाश, चन्द्रमा (सोम) और फिर पुनरागमनको प्राप्त होना (५।१०।३-४)।
बृहदारण्यकोपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,
चन्द्रमा और फिर पुनरागमनकी प्राप्ति (६।२।१६)।
कृष्णमार्गको उपनिषदोंमें पितृयान, धूममार्ग और दक्षिणमार्ग नामसे भी कहा गया है।
सम्बन्ध—तेईसवें श्लोकसे शुक्ल और कृष्ण-गतिका जो प्रकरण आरम्भ किया था, उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार
करते हैं।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
हि = क्योंकि जगतः = जगत्-(प्राणिमात्र-) अनावृत्तिम्, याति=जानेवालेको लौटना
शुक्लकृष्णे = शुक्ल और कृष्ण- के साथ नहीं पड़ता (और)
एते = ये दोनों (सम्बन्ध रखनेवाली) अनया = दूसरी गतिमें
गती = गतियाँ मते = मानी गयी हैं। जानेवालेको
शाश्वते = अनादिकालसे एकया = (इनमेंसे) एक गतिमें पुनः, आवर्तते = पुनः लौटना पड़ता है।
व्याख्या—'शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते देना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मप्राप्तिके लिये
मते'—शुक्ल और कृष्ण-इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध किसी भी लोकमें, योनिमें कोई बाधा नहीं है। इसका
जगत्के सभी चर-अचर प्राणियोंके साथ है। तात्पर्य है कि कारण यह है कि परमात्माके साथ किसी भी प्राणीका
ऊर्ध्वगतिके साथ मनुष्यका तो साक्षात् सम्बन्ध है और कभी सम्बन्ध-विच्छेद होता ही नहीं। अतः न जाने कब
चर-अचर प्राणियोंकी परम्परासे सम्बन्ध है। कारण कि और किस योनिमें वह परमात्माकी तरफ चल दे-इस
चर-अचर प्राणी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे कभी-न- दृष्टिसे साधकको किसी भी प्राणीको घृणाकी दृष्टिसे
कभी मनुष्य-जन्ममें आते ही हैं और मनुष्यजन्ममें किये देखनेका अधिकार नहीं है।
हुए कर्मोंके अनुसार ही ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने 'योग'को
होती है। अब वे ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करें अथवा न करें, अव्यय कहा है। जैसे योग अव्यय है, ऐसे ही ये शुक्ल
पर उन सबका सम्बन्ध ऊर्ध्वगति अर्थात् शुक्ल और और कृष्ण-दोनों गतियाँ भी अव्यय, शाश्वत हैं अर्थात् ये
कृष्ण-गतिके साथ है ही। दोनों गतियाँ निरन्तर रहनेवाली हैं, अनादिकालसे हैं और
जबतक मनुष्योंके भीतर असत् (विनाशी) वस्तुओंका जगतके लिये अनन्तकालतक चलती रहेंगी।
आदर है, कामना है, तबतक वे कितनी ही ऊँची भोग- 'एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः'—एक
भूमियोंमें क्यों न चले जायँ, पर असत् वस्तुका महत्त्व मार्गसे अर्थात् शुक्लमार्गसे गये हुए साधनपरायण साधक
रहनेसे उनकी कभी भी अधोगति हो सकती है। इसी तरह अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् ब्रह्मलोकमें जाकर
परमात्माके अंश होनेसे उनकी कभी भी ऊर्ध्वगति हो ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, बार-बार जन्म-मरणके
सकती है। इसलिये साधकको हरदम सजग रहना चाहिये चक्करमें नहीं आते; और दूसरे मार्गसे अर्थात् कृष्णमार्गसे
और अपने अन्तःकरणमें विनाशी वस्तुओंको महत्त्व नहीं गये हुए मनुष्य बार-बार जन्म-मरणके चक्करमें आते हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् दोनों मार्गोंको जाननेका माहात्म्य बतानेके लिये आगेके श्लोक कहते हैं।