भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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है। यदि शोक ही मिलता रहेगा, तो फिर वह चला जाएगा। वना जो चिपक गया है तो फिर वह छूटेगा ही नहीं न?

“एक विषय ने जीतता, जीत्यो सहु संसार, नृपति जीतता जीतिए, दल, पूर ने अधिकार ”

— श्रीमद् राजचंद्र

एक सिर्फ राजा को जीत लिया तो दल, नगर और अधिकार सबकुछ हमें मिल जाता है। उसकी पूरी सेना वगैरह सबकुछ मिल जाता है। सेना जीतने जाओगे तो राजा को नहीं जीत पाओगे। उसी तरह इस राजा (विषयरूपी) को जीत लिया कि सबकुछ अपने अधिकार में आ जाएगा। तभी तो हम मुक्त रहते हैं न! सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि जिसे जीतने पर सारा राज्य हाथ में आ जाएगा। हमें विषय का विचार तक नहीं आता।

टले ज्ञान और ध्यान...

“विषयरूप अंकुरथी, टले ज्ञान अने ध्यान, लेश मदिरापानथी, छाके ज्यम अज्ञान ”

— श्रीमद् राजचंद्र

एक ही बार यदि विषय भोगा तो सबकुछ बिगड़ जाता है। बाद में अनंत जन्मों का नुकसान होता है और नर्कगति का अधिकारी बनता है। कौन सा ऐसा विषय है कि जो नर्कगति नहीं दिलवाता? जो लोकमान्य है। कोई शादीशुदा ईंसान, उसकी स्त्री को लेकर जा रहा हो तो लोग आपत्ति उठाएँगे?

प्रश्नकर्ता : नहीं उठाएँगे।

दादाश्री : और शादीशुदा नहीं हो और जा रहा हो तो?

प्रश्नकर्ता : तो आपत्ति उठाएँगे।

दादाश्री : वह लोकमान्य नहीं कहलाएगा। वह नर्कगति का

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

अधिकारी बनेगा। दोनों को नर्क में जाना पड़ेगा, दोनों को नर्क में साथ में रहना पड़ेगा, वापस।

प्रश्नकर्ता : 'विषयरूप अंकुरथी....' मतलब?

दादाश्री : अंकुर मतलब अंदर बीज हो, वह विचार आए और उसमें तन्मयाकार हो जाए तो वह अंकुर कहलाता है। वह अंकुर फूटा कि गया... इसलिए हम तय करते हैं न कि विचार आने से पहले खींचकर बाहर फेंक देना। वह अंकुर फूटा कि फिर ज्ञान और ध्यान सबकुछ टूट जाता है, खत्म हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : इस अक्रम विज्ञान में भी ऐसा ही होता है?

दादाश्री : ज्ञान और ध्यान मिट जाता है। विचार आए न तो सिर्फ ज्ञान और ध्यान ही नहीं, लेकिन आत्मा भी चला जाता है। क्रमिक में तो ज्ञान और ध्यान चला जाता है और अक्रम में तो, जो आत्मा दिया हुआ है, वह चला जाता है। अतः अंकुर तक नहीं ले जाना चाहिए।

लिंग जारी, उसका जोखिम

इसमें है कुछ भी नहीं। ज्ञान प्राप्त हो जाने पर समझ में आ जाता है कि विषय में है कुछ भी नहीं।

प्रश्नकर्ता : आप के ज्ञान के बाद हम इसी जन्म में विषय बीज से एकदम निर्ग्रंथ हो सकते हैं?

दादाश्री : सभी कुछ हो सकता है। अगले जन्म के लिए बीज नहीं डलेंगे। ये जो भी पुराने बीज हों, उन्हें आप धो देना, नए बीज नहीं डलेंगे।

प्रश्नकर्ता : यानी अगले जन्म में विषय का एक भी विचार नहीं आएगा?

दादाश्री : नहीं आएगा। थोड़ा बहुत कच्चा रह गया होगा

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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तो पहले के थोड़े बहुत विचार आएँगे लेकिन वे विचार बहुत स्पर्श नहीं करेंगे। जहाँ पर हिसाब नहीं है, उसका जोखिम नहीं है। वह तो अगर लिंक जारी रहे तो उसका जोखिम आता है। ईसान को तो कभी यों ही खुद की माँ के प्रति भी विषय का विचार आ जाता है लेकिन लिंक नहीं होती, इसलिए फिर गायब हो जाता है।

विषय का जरा सा भी ध्यान करे तो ज्ञान भ्रष्ट हो जाता है। 'हतो भ्रष्ट, ततो भ्रष्ट' हो जाता है। जलेबी का ध्यान करने से वैसा नहीं होता। इस योनी के विषय का ध्यान करने से वैसा हो जाता है।

हार-जीत, विषय की या खुद की?

हमने तो कई जन्मों से भाव किए थे। इसलिए हमें तो विषय के प्रति बहुत ही चिढ़। ऐसा करते-करते वे छूट गए। विषय हमें मूलतः अच्छा ही नहीं लगता था लेकिन क्या करें? कैसे छूटें? लेकिन हमारी दृष्टि बहुत गहरी, बहुत विचारशील, यों कैसे भी कपड़े पहने हों, फिर भी सबकुछ आरपार दिखता था, दृष्टि की वजह से यों ही चारों ओर का बहुत कुछ दिखता था। इसलिए राग नहीं होता न? हमें और क्या हुआ कि आत्मसुख प्राप्त हुआ। जलेबी खाने के बाद चाय फीकी लगती है। उसी तरह जिसे आत्मा का सुख प्राप्त हो गया, उसे सभी विषयसुख फीके लगते हैं। तुझे फीका नहीं लगता? जैसा पहले लगता था, वैसा अब नहीं लगता न?

प्रश्नकर्ता : फीका तो लगता है, लेकिन वापस मोह उत्पन्न हो जाता है।

दादाश्री : मोह तो उत्पन्न हो सकता है। वह तो कर्म का उदय होता है। कर्म बंधे हुए हैं, वे मोह उत्पन्न करवाते हैं लेकिन आपको क्या ऐसा लगता है कि खरा सुख तो आत्मा में ही है?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा तो ठीक से लगता है। इस विषय में सुख नहीं है, यह तो पक्का समझ में आ गया है।

दादाश्री : अन्य किसी स्त्री को देखे तो तुझे विचार नहीं आता न ?

प्रश्नकर्ता : आता है कभी-कभार।

दादाश्री : ऐसा होता है, इसका मतलब अभी भी कमी है।

प्रश्नकर्ता : सिर्फ यों साधारण मोह ही होता है, और कुछ नहीं।

दादाश्री : मोह तो फिर घसीट ही ले जाएगा न! इस विषय को जीतना तो बहुत कठिन चीज है। इसे हमारे ज्ञान से जीता जा सकता है। यह ज्ञान निरंतर सुखदायी है न, इसलिए जीत सकते हैं।

उसके सेवन से पात्रता

फिर कृपालुदेव तो क्या कहते हैं, कि

“ पात्र विना वस्तु ना रहे, पात्रे आत्मिक ज्ञान, पात्र थवा सेवो सदा, ब्रह्मचर्य मति मान ”

- श्रीमद् राजचंद्र

ब्रह्मचर्य के सेवन से तो पात्र बनेगा, कृपालुदेव ऐसा कहते हैं। उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि आम मत खाना। जड़ को ही पकड़ा है पूरा। यदि सामनेवाला निर्जीव होता और दावा नहीं करता तो ब्रह्मचर्य सेवन नहीं करते जबकि ये तो दावा करते हैं।

“ जे नववाड विशुद्धथी, धरे शियळ सुखदाय ”

- श्रीमद् राजचंद्र

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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प्रश्नकर्ता : ‘नववाड विशुद्ध’ ब्रह्मचर्य की परिभाषा क्या है?

दादाश्री : ‘नववाड’ यानी ऐसा है कि, मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन करना। मन में जो सोचते हों, वैसा कुछ सोचना करना नहीं है। पहले के विषय याद आएँ तो उस घड़ी सबकुछ भुला देना है। वाणी से नहीं बोलना है, देह से बहुत दूर रहना है।

नौ बाड़ बताई हैं न, कि जहाँ स्त्री बैठी हो, वहाँ पर हमें नहीं बैठना है, उसे देखना नहीं है। कोई विषय भोग रहा हो तो छुपकर दरार में से नहीं देखना है। देखने से भी मन बिगड़ जाता है। पहले संसार जो भोगा हो, उसे याद नहीं करना है। याद करने से वापस वे विचार आ जाएँगे, इस तरह ये सब नौ बाड़ हैं।

जहाँ पर स्त्री बैठी हो उस जगह पर मत बैठना, ऐसा कहते हैं। फिर उस जगह पर क्या होगा? राग होगा या द्वेष? द्वेष होता रहेगा। बल्कि, राग-द्वेष के कारखाने बढ़ेंगे। इसलिए नौ बाड़ का हमें क्या करना है? उसके बजाय एक बाड़ कर दे, तो भी बहुत हो गया। नौ बाड़ करने जाते हुए तो दूसरे राग-द्वेष खड़े हो जाएँगे। इसके बजाय स्थूल ब्रह्मचर्य का पालन करो न और मन में जो विचार आएँ तो उनके प्रतिक्रमण करके धो देना। नौ बाड़ का पालन तो अभी किसी से भी नहीं हो सकता, एक-दो बाड़ तो टूट चुकी होती हैं। तब आप नौ बाड़ कैसे पूरी कर सकोगे? आप तो हमने जो बताया है, उसमें रहो। इतना कोई करे तो उसमें सभी नौ बाड़ आ जाएँगी। नौ बाड़ करने में अहंकार की जरूरत पड़ेगी लेकिन अपने यहाँ तो करने का मार्ग ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : तो फिर प्रतिक्रमण करते वक्त हम जो याद करते हैं, तो उससे नया बंध नहीं पड़ता?

दादाश्री : हाँ! याद आता है, लेकिन प्रतिक्रमण यानी हम

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

तो क्या करना चाहते हैं? विषय को उड़ा देना चाहते हैं और वे तो लालच के मारे याद करते हैं। दोनों के भावों में फर्क है। वह जो याद आता है, वह लालच से याद आता है और यह तो प्रतिक्रमण से याद आता है। प्रतिक्रमण करने के पीछे छोड़ने का भाव है, जबकि उसमें लालच का भाव है। दोनों के भाव में फर्क है।

“भव तेनो लव पछी रहे तत्त्व वचन ए भाई ”

—श्रीमद् राजचंद्र

‘लव पछी’ यानी थोड़े ही जन्म बाकी रहते हैं फिर। जन्म कम हो जाते हैं। वह तत्त्व वचन है, तत्त्व का सार है।

“सुंदर शियळ सुरतरु, मन-वाणी ने देह, जे नर-नारी सेवशे, अनुपम फल ले तेह ”

—श्रीमद् राजचंद्र

‘शियळ’ मतलब शीलवान। जो मन-वचन-काया से शीलवान रहे हैं, वह अनुपम फल प्राप्त करता है।

प्रश्नकर्ता : शीलवान किसे कहते हैं?

दादाश्री : विषय का विचार तक नहीं आए। जिसे क्रोध-मान-माया-लोभ नहीं हों, उसे शीलवान कहते हैं। सिर्फ यह स्त्री विषय ही नहीं, लेकिन जिसके क्रोध-मान-माया-लोभ भी खुद के वश हो चुके हों, तब वह शीलवान कहलाता है। जो क्रोध-मान-माया-लोभ खुद को दुःख दें, दूसरों को दुःख नहीं दें, वे ‘कंट्रोलैबल’ कहलाते हैं। तभी से भगवान ने उसे ‘शील’ कहा है।

प्रश्नकर्ता : अतः मन-वचन-काया से किसी भी जीव मात्र को किंचित्मात्र भी दुःख नहीं देना, वह जो भाव है, वह शीलवान?

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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दादाश्री : वह भाव तो है ही। वह तो अहिंसक भाव कहलाता है। वह चीज अलग है और यह तो जिसने स्त्री से संबंधित विषय को जीता, उसने सबकुछ जीत लिया।

प्रश्नकर्ता : मैंने ब्रह्मचर्यव्रत लेने के बाद एक महीने तक कृपालुदेव का पद ‘ निरखीने नवयौवना ’ गाया था।

दादाश्री : जो यह पद गाए न, उनका साफ हो जाता है। यह पद तो आपको रोज गाना चाहिए, दो-दो बार गाना चाहिए। सिर्फ विषय को जीत लिया तो पूरा जगत् जीत लिया, बस! भले ही फिर कुछ भी खाओ या पीओ, उसमें से कुछ भी बाधक नहीं होगा लेकिन जिसने यह जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। सिर्फ यही, इंसान यहीं पर फँसता है। विषय को जीत लिया तो फिर दुनिया का राजा न! कर्म बंधन ही नहीं होगा न! उसमें से तो निरे कर्म, भयंकर कर्म बंधते हैं। एक ही बार का विषय कितने ही जीवों को खत्म कर देता है। उन सभी जीवों के साथ ऋणानुबंध बंध जाता है। अतः इतना, सिर्फ विषय को जीत लिया तो बहुत हो गया।

मजबूरी से पाशवता

प्रश्नकर्ता : आगे आपने कहा है कि शादी करने जैसा तो सत्युग में था। कलियुग में तो शादी करने जैसा है ही नहीं।

दादाश्री : बाकी, इसमें शादी करने जैसा है ही क्या? यह तो नासमझी की वजह से शादी करते हैं, वर्ना शादी करते ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : मैंने एक चीज देखी है कि लोगों को यह मार्ग चाहिए, ब्रह्मचर्य का, लेकिन मिलता नहीं है।

दादाश्री : हाँ, नहीं मिलता। ऊपरी (बॉस, वरिष्ठ मालिक) होना चाहिए न, वचनबलवाला चाहिए। खुद अकेले अपने आप ही

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

पालन नहीं किया जा सकता। वह तो मेरा यह वचनबल और मेरा यह मार्गदर्शन, इस वजह से पालन कर सकते हैं और इसका पालन किया कि राजा! पूरी दुनिया का राजा!

प्रश्नकर्ता : क्योंकि लोग शादी करते वक्त बोलते हैं कि अब मैं गया लेकिन बेचारे के पास और कोई मार्ग नहीं है।

दादाश्री : पाशवता अच्छी नहीं लगती, लेकिन फिर क्या करे?

वहाँ मजबूरी से पाशवतावाला है यह सब। विषय तो खुली पाशवता है। चारा ही नहीं है न? इतना जीत गए तो बस हो गया। इसलिए रोज मन में ऐसा तय करना कि, एक ही बार इसे जीतना है, और कुछ नहीं। और अभी जीता जा सकता है, ऐसा। दादाजी की निश्रा में सभी लोगों द्वारा जीता जा सकता है। कभी कसौटी का मौका आए तो, उसके लिए उपवास कर लेना दो-तीन। जब कर्म बहुत जोर मारें न, तब उपवास करने से बंद हो जाएगा। उस तरह के उपवास करवाने से तो वह लकड़ी जैसा हो जाएगा। उपवास से वह मर नहीं जाएगा।

प्रश्नकर्ता : यानी उपवास करने से वे सब फोर्स कम हो जाएँगे?

दादाश्री : सभी बंद हो जाएँगे। यह सारा आहार का ही फोर्स है। दूसरे गुनाह चलाए जा सकते हैं। ऐसा है कि सिर्फ यही एक गुनाह नहीं चलाया जा सकता। यह तो अनंत जन्मों का खतम कर देता है। मिट्टी में मिला देता है। इतना जीत लिया तो बहुत हो गया।

ब्रह्मचर्य का बल हो तो फिर वह विषय की गाँठ बंद हो जाएगी। अतः बल ऐसा रखना कि ये विचार आते ही धो देना, कुचल देना।

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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प्रश्नकर्ता : विचार तो मुझे ब्रह्मचर्य के ही आते हैं।

दादाश्री : नहीं। वही कह रहा हूँ मतलब ब्रह्मचर्य के ही आते हैं? नहीं!

प्रश्नकर्ता : हाँ, हाँ।

दादाश्री : अब्रह्मचर्य के विचार नहीं आते?

प्रश्नकर्ता : वह तो मुझे बहुत गंदा लगता है।

दादाश्री : बहुत अच्छा।

प्रश्नकर्ता : और मुझे इतना समझ में आ गया है कि यह जो जन्म हुआ है, वह इस विषय की गाँठ निकालने के लिए ही हुआ है। बाकी का सब तैयार ही है मेरा!

दादाश्री : तब तो बहुत अच्छा, तब तो समझदार है। मेरी पसंद की बात आई अब। बस, बस। मुझे पसंद आई यह बात। अब ऑलराइट। इससे बहुत संतोष हुआ मुझे।

[ २ ]

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से

'रेणी चादर' के पीछे

खून में मांस के टुकड़े पड़े हों, तो आपको उन्हें देखना अच्छा लगेगा क्या?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : और इडली देखना अच्छा लगता है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, अच्छा लगता है।

दादाश्री : धनिया और हरी मिर्च की चटनी बनाई जाए तो, वह देखना अच्छा लगता है या मांस देखना अच्छा लगता है?

प्रश्नकर्ता : चटनी अच्छी लगती है।

दादाश्री : चटनी हरे खून से बनी है और यह लाल खून से। यह तो सिर्फ राग-द्वेष करता रहता है। इस पर राग करता है और मांस पर द्वेष करता है! चटनी कौन से खून से बनी है? स्थावर एकेन्द्रिय का ग्रीन कलर का खून है और अपना खून लाल है। पाँच इन्द्रिय के सभी जीवों का खून लाल कलर का होता है। लाल खून में तरह तरह के घटक होते हैं। हड्डियों को तू कभी छूता नहीं है न?

प्रश्नकर्ता : कभी कभार गलती से छू लेता हूँ।

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञान' से (खं-2-२)

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दादाश्री : खाने के साथ मांस रखा हुआ हो तो तुझे खाना भाएगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : नहीं भाएगा।

दादाश्री : लेकिन अगर वह मांस ढका हुआ हो तो?

प्रश्नकर्ता : तो गलती से शायद खा भी जाऊँ।

दादाश्री : इस देह पर चादर ढकी हुई है और वह खुला मांस है।

प्रश्नकर्ता : वह खुला तो दिखता है, लेकिन यह ढका हुआ है तो नहीं दिखता।

दादाश्री : अभी चादर हटा दें तो?

प्रश्नकर्ता : मांस आदि सब देखकर धिन आएगी।

दादाश्री : और नहीं दिखे तो?

प्रश्नकर्ता : तो फिर पता नहीं चलेगा।

दादाश्री : ये आँखें कैसी है अपनी, कि हैं फिर भी नहीं दिखता? हम जानते हैं कि यह चादर से बंधा हुआ है फिर भी वह दिखता क्यों नहीं? यों बुद्धि तो कहती है कि है अंदर, फिर भी नहीं दिखता, तो वे कैसी आँखें? यह जो चादर है, इसकी वजह से यह सब सुंदर लगता है। चादर खिसक जाए तो कैसा लगेगा?

प्रश्नकर्ता : खून-मांस जैसा।

दादाश्री : तो वहाँ धिन नहीं आएगी?

प्रश्नकर्ता : आएगी।

दादाश्री : किसी को यहाँ पर जल गया हो और पीप निकल रहा हो, तो क्या वहाँ पर हाथ फेरना अच्छा लगेगा?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : यह विषय कैसे खड़ा है, वही समझ में नहीं आता। वह खुली आँखों से सो रहा है तो, उस सोनेवाले का क्या करे? लोग तो यह नहीं जानते कि 'देह के अंदर क्या है।' तू रॉकेट(आतिशबाजी) लाए तो तुझे पता चलेगा न, कि इसमें बारूद भरा हुआ है?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : तो इसमें क्यों पता नहीं चलता? रॉकेट का तो ध्यान में रहता ही है कि यह बारूद से भरा हुआ है। यह फूटा नहीं है, अभी फूटना बाकी है और यह फूट चुका है। ऐसा पता चलता है न? और इस जीवित मनुष्य में कैसा बारूद भरा हुआ है, इसका क्यों पता नहीं चलता? इसमें कौन-कौन सा बारूद भरा है?

प्रश्नकर्ता : हड़िड़यों, खून, मांस।

दादाश्री : अंदर हड़िड़यों हैं क्या? तूने कैसे देख लीं?

प्रश्नकर्ता : देखा नहीं है लेकिन बुद्धि से पता चलता है न?

दादाश्री : बुद्धि तो परावलंबी है, स्वावलंबी नहीं है। कहीं ओर देखा होगा तो उस पर से पता चलता है कि इंसान में ऐसा-ऐसा होता है, तो वैसा ही मुझ में भी होना चाहिए। बुद्धि परावलंबी है और ज्ञान परावलंबी नहीं है। ज्ञान सीधा देखता है। जिससे गंद जैसा लगे, ऐसा और कुछ होता होगा शरीर में?

प्रश्नकर्ता : दुष्टता होती है।

दादाश्री : दुष्टता तो मान लो कि ठीक है, वह प्राकृत गुण कहलाती है, लेकिन इसमें माल क्या-क्या है?

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)

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प्रश्नकर्ता : और कुछ मालूम नहीं है।

दादाश्री : खाने में क्या-क्या खाता है?

प्रश्नकर्ता : दाल, चावल, रोटी, सब्जी।

दादाश्री : फिर जब वह गलन होता है, तब क्या होता है?

प्रश्नकर्ता : मल बन जाता है।

दादाश्री : ऐसा क्यों होता है? हम जो आहार खाते हैं न, उसमें से सभी सार खिंच जाता है और खून आदि सब बनता है और शरीर जीवित रहता है और जो असार बचता है, वह निकल जाता है। यह तो सारी मशीनरी है। खून चलता रहे, तो आखें चलती रहती है, अंदर सभी वायर कार्यरत ही हैं। आहार डालते हैं तो इलेक्ट्रिसिटि पैदा होती है। इलेक्ट्रिसिटि से श्वासोच्छ्वास चलते हैं।

अभी एक पोटली में रेशमी चादर से हड्डियाँ और मांस बाँध लिए, फिर उसे यहाँ पर लाकर रख दिया हो तो तुझे वह ध्यान तो रहेगा न, कि इसमें यह भरा हुआ है?

प्रश्नकर्ता : रह सकता है न!

दादाश्री : तो ठीक है। जिसे यह लक्ष्य में रहे, उसे बड़ा अधिपति कहा गया है, वह जागृत कहलाता है। जो जागृत हो, वह इस संसार में नहीं उतरता, और जागृत ही वीतराग बन सकते हैं।

अद्भुत प्रयोग, श्री विज्ञन का

मैंने जो प्रयोग किया था, उसी प्रयोग का उपयोग करना है। हमारे अंदर वह प्रयोग निरंतर सेट ही रहता है, इसलिए हमें ज्ञान होने से पहले भी जागृति रहती थी। यों सुंदर कपड़े पहने

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

हों, दो हजार की साड़ी पहनी हो फिर भी देखते ही तुरंत जागृति खड़ी हो जाती थी, वह नेकेड दिखती थी। फिर दूसरी जागृति उत्पन्न होती थी, तो बिना चमड़ी की दिखती और तीसरी जागृति में फिर पेट काट दिया हो तो अंदर आंते दिखती थी, आंतों में क्या-क्या होता है, वह सबकुछ दिखता था। अंदर खून की नसें दिखतीं, संडास दिखती, इस तरह सारी गंदगी दिखती। फिर विषय खड़ा होता ही नहीं था न! इनमें से सिर्फ आत्मा ही शुद्ध वस्तु है, वहाँ जाकर हमारी दृष्टि रुकती है, फिर मोह कैसे होगा? लोगों को इस तरह आरपार दिखता नहीं है न? लोगों के पास ऐसी दृष्टि नहीं है न? ऐसी जागृति लाएँ भी कहाँ से? ऐसा दिखना, वह तो बहुत बड़ी जागृति कहलाती है। एट-ए-टाइम ये तीनों प्रकार की जागृति रहती हैं। मुझे जैसी जागृति थी, वह आपको बता रहा हूँ। जिस तरीके से मैं जीता हूँ, वह तरीका आप सभी को, यह जीतने का रास्ता बता दिया। रास्ता तो होना चाहिए न? और जागृति के बिना तो ऐसा कभी होगा ही नहीं न?

यह काल तो इतना विचित्र है, पहले तो लिपस्टिक और चेहरे पर पाउडर, यह सब कहाँ लगाते थे? जबकि अभी तो ऐसा सब खड़ा किया है कि बल्कि आकृष्ट करता है लोगों को। ऐसा सारा मोहबाजार हो गया है! पहले तो अगर शरीर अच्छा होता, खूबसूरत होता था तब भी ऐसे मोह के साधन नहीं थे। अभी तो निरा मोहबाजार ही है न? उससे बदसूरत लोग भी सुंदर दिखते हैं, लेकिन इसमें देखना क्या है? यह तो निरी गंदगी!

इसलिए मुझे तो बहुत जागृति रहती है, जबरदस्त जागृति रहती है! अपना ज्ञान जागृतिवाला है, एट-ए-टाइम लाइट करनी हो तो हो सकती है! अब यदि उस समय ऐसी जागृति का उपयोग न करे तो ईसान मारा जाएगा। हम कितना भी शुद्धात्मा देखने जाएँ, फिर भी वह दृष्टि को स्थिर नहीं होने देता, अतः ऐसा उपयोग चाहिए। हमारा ज्ञान होने से पहले ऐसा उपयोग सेट था, वर्ना यह

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)

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मोहबाजार तो मार ही डाले इस काल में। यह तो स्त्रियों को देखने से ही रोग घुस जाता है न! क्या वह शादीशुदा नहीं है? शादीशुदा है फिर भी ऐसे! क्योंकि यह काल ही ऐसा है। यह श्री विज्ञन याद रहेगा या भूल जाओगे?

प्रश्नकर्ता : दृढ़ निश्चय होने के बावजूद किसी स्त्री की ओर बार-बार दृष्टि आकृष्ट होती है और श्री विज्ञन जानने के बावजूद 'जैसा है वैसा' क्यों नहीं दिखता?

दादाश्री : उसने श्री विज्ञन जाना नहीं है, श्री विज्ञन जान ले तो उसकी दृष्टि आकृष्ट ही नहीं होगी। श्री विज्ञन दिखे तो उसमें पड़ेगा ही नहीं। जबकि यह तो दृष्टि पड़े तो वापस देख लेता है।

प्रश्नकर्ता : यह जो श्री विज्ञन नहीं दिखता है, क्या वह मोह के कारण है?

दादाश्री : जानता ही नहीं है। श्री विज्ञन क्या है, वह जानता ही नहीं है। मोह के कारण भान में ही नहीं आता और मोह यानी अभानता।

प्रश्नकर्ता : तो फिर अब श्री विज्ञन दिखने का उपाय क्या है?

दादाश्री : वह दिखेगा नहीं। उसका उपाय ही क्या करना? वह जिसे दिखता है, वे इंसान अलग ही तरह के होते हैं। गजब के इंसान होते हैं।

इस काल में इंसान को इतना वैराग्य नहीं रह पाता! अतः यह श्री विज्ञन बहुत ऊँची चीज़ है, उससे फिर वैराग्य रहता है। हमने छोटी उम्र से ही ऐसा प्रयोग किया था। खोज की कि सबसे बड़ा रोग यही है। फिर इस जागृति से प्रयोग किया, बाद में तो हमें सहज हो गया। हमें यों ही सबकुछ आसानी से दिखता है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दो-चार बार गटर का ढक्कन खोलना होता है, फिर पता नहीं चलेगा कि अंदर क्या है? बाद में वैसा गटर आए तो पता नहीं चलेगा? शायद दो-चार बार गलती हो जाए, लेकिन बाद में तो ध्यान रहेगा न?

प्रश्नकर्ता : तो यह प्रयोग कन्टिन्युअस रखना है? श्री विज्ञान का?

दादाश्री : नहीं, यह ऐसा ही है! ये तो कपड़ों से ढककर घूमते हैं इसलिए सुंदर दिखते हैं, बाकी अंदर तो ऐसा ही है। यह तो, मांस को रेशमी चादर से बाँध लिया है, इसलिए मोह होता है। सिर्फ मांस होता तो भी हर्ज नहीं था, लेकिन अगर अंदर आते वगैरह सब काटें तो क्या निकलता है अंदर से? इस पर सोचा ही नहीं है। यदि इस पर सोचा होता तब तो वहाँ पर फिर से दृष्टि जाती ही नहीं। यह तो भ्रान्ति से मूर्खता में इंसान ने सुख की कल्पना की है। सभी ने कल्पना की, इसलिए इसने भी कल्पना कर ली, ऐसे चला है! सत्तर-अस्सी साल की स्त्री के साथ तू शादी करेगा क्या? क्यों नहीं? लेकिन उसके अंग आदि अच्छे दिखते हैं या नहीं? वह सब देखने का मन ही नहीं करता न?

प्रश्नकर्ता : ऐसा कोई रास्ता नहीं है, शॉर्टकट ही नहीं है कि श्री विज्ञान से पहले ही आरपार साफ दिखे?

दादाश्री : यही शॉर्टकट है! सबसे बड़ा शॉर्टकट ही यह है न! इस श्री विज्ञान से अभ्यास करते-करते आगे बढ़ेगा तो 'जैसा है वैसा' उसे दिखेगा, फिर विषय छूट जाएगा। श्री विज्ञान सिवा का रास्ता, उल्टे रास्ते पर चलने का शॉर्ट रास्ता है। वर्ना अगर शादी करनी है तो किसने मना किया है? आराम से शादी करो न! किसने बाँधा है तुम्हें?

हमें सबकुछ आरपार दिखता है। यह ज्ञान ऐसा है कि कभी

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञान' से (खं-2-२)

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न कभी आपकी ऐसी दृष्टि करवा देगा। क्योंकि ज्ञान देनेवाले की दृष्टि ऐसी है, मेरी दृष्टि ऐसी है। यानी जैसी ज्ञान देनेवाले की दृष्टि होगी वैसी ही दृष्टि हो जाएगी। जिसे आरपार दिखता है, उसे मोह कैसे होगा फिर?

खरा ब्रह्मचर्य, जागृतिपूर्वक का

प्रश्नकर्ता : स्त्री-पुरुष का भेद भूलना पड़ेगा न?

दादाश्री : भेद नहीं भूलना है। भेद तो हमें मूर्च्छा की वजह से लगता है और यों भूलने से वह भूला जा सके, ऐसा है नहीं। उसे जागना पड़ेगा, वैसी जागृति होनी चाहिए।

यह ज्ञान प्राप्त हुआ इसलिए 'आत्मदृष्टि' हुई, इसलिए अब जैसे-जैसे जागृति बढ़ेगी, वैसे-वैसे वह भी आरपार देखने लगेगा। आरपार देखने लगा कि अपने आप ही वैराग आएगा। देखा तो वैराग आएगा ही और तभी वीतराग हुआ जा सकेगा, वर्ना वीतराग हुआ जा सकता होगा क्या? और वास्तव में एक्जेक्ट ऐसा ही है।

जब जागृति 'फुल' हो जाए, तब वह जागृति ही केवलज्ञान में परिणमित होती है।

प्रश्नकर्ता : 'ब्रह्मचर्य पालन करना है' जब ऐसा निश्चय होता है न, तभी से जागृति बढ़ जाती है।

दादाश्री : नहीं। जागृति वह तो, जब हम 'ज्ञान' देते हैं तब जागृति उत्पन्न होती है। इसके अलावा जागृति का और कोई उपाय है ही नहीं। ये बाहर के लोग ब्रह्मचर्य पालन करते ही है न? लेकिन उसमें जागृति नहीं होती।

ब्रह्मचर्य इस जागृति के आधार पर है न? जागृति 'डिम' होने से ही यह मोह उत्पन्न होता है न! वर्ना इसमें क्या हड़्डी, पीप और मांस भरा हुआ नहीं है?

प्रश्नकर्ता : यानी इस विषय की तरफ कपड़ों की वजह

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

से मोह उत्पन्न होता है न? यों ऐसे दृष्टि पड़े, वह सबसे पहले कपड़ों पर पड़ती है, तो तभी से मोह उत्पन्न होता है न?

दादाश्री : मूलतः तो खुद विषयी है, इसलिए कपड़े ज्यादा मोहित करते हैं। खुद विषयी नहीं हो तो कपड़े मोहित नहीं कर पाएँगे। यहाँ अच्छे-अच्छे कपड़े बिछा दें तो क्या मोह उत्पन्न होगा? यानी खुद को विषय का मजा और आनंद है, उसकी इच्छा है, इसलिए वैसा मोह उत्पन्न होता है। जो लोग विषय की इच्छा से रहित हों, उन्हें कैसे मोह उत्पन्न होगा? यह मोह कौन उत्पन्न करता है? पिछले परिणाम मोह उत्पन्न करते हैं तो उन्हें आप धो देना। बाकी कपड़े बेचारे क्या करें? पहले का बीज डाला हुआ है, यह उसी का परिणाम आया है। लेकिन उन सभी पर मोह नहीं होता। जहाँ हिसाब हो वहीं मोह होता है। अन्यत्र मोह के नए बीज पड़ते जरूर हैं, लेकिन मोह नहीं होता। यह तो कपड़ों की वजह से मोह उत्पन्न होता है, नहीं तो अगर कपड़े निकाल दे तो काफी कुछ मोह कम हो जाएगा। सिर्फ अपनी ऊँची जाति में ही मोह कम हो जाएगा। यह तो बेचारे को कपड़ों की वजह से भ्रांति रहती है और कपड़ों के बिना देखेगा तो यों ही वैराग आ जाएगा। तभी तो दिगंबरियों की ऐसी खोज है न!

उपयोग जागृति से, टलता है मोह परिणाम

श्रीमद् राजचंद्र ने कहा है कि, 'देखत भूली टले तो सर्व दुःख नो क्षय थाय' शास्त्रों में पढ़ते हैं कि स्त्री पर राग नहीं करना चाहिए और वापस स्त्री को देखते ही भूल जाते हैं। उसे 'देखत भूली' कहते हैं। मैंने तो आपको ऐसा ज्ञान दिया है कि अब आपमें 'देखत भूली' भी नहीं रही। आपको शुद्धात्मा दिखेगा। बाहर का पैकिंग कैसा भी हो, फिर भी पैकिंग से हमें क्या लेना देना? पैकिंग तो सड़ जाएगी, जल जाएगी, पैकिंग से क्या पाओगे? इसलिए ज्ञान दिया है कि आप शुद्धात्मा देखो ताकि 'देखत भूली टले।' देखत भूली टले' यानी क्या कि यह मिथ्या दृष्टि है, वह दृष्टि बदल जाए और

दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)

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दृष्टि सम्यक हो जाए तो सभी दुःखों का क्षय हो जाएगा! फिर वह गलती नहीं होने देगी, दृष्टि आकृष्ट नहीं होगी।

कृपालुदेव ने तो कितना कुछ कहा है, फिर भी कहते हैं कि 'देखत भूली' होती है, देखते हैं और गलती हो जाती है। देखत भूली टल जाए तो सभी दुःखों का क्षय हो जाएगा। तो 'देखत भूली' टलने का मैंने यह मार्ग बताया कि 'यह जो स्त्री जा रही है, उनमें तू शुद्धात्मा देखना।' तुझे शुद्धात्मा दिखेंगे तो फिर देखने को और कुछ नहीं रहेगा। बाकी तो जंग लगा हुआ है। किसी को लाल जंग लगा होता है, किसी को पीला जंग लगा होता है, किसी को हरा जंग लगा होता है, लेकिन हमें तो सिर्फ लोहा ही देखना है न? और जंग दिख जाए तो उसके सामने उपाय दे दिया है। संयोगवश फँस जाए तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन इच्छापूर्वक नहीं होना चाहिए। संयोगवश तो ज्ञानी भी फँस सकते हैं।

यह विषय तो अविचार की वजह से है। सोचने से हमें फायदा-नुकसान का पता चलता है या नहीं? और जिसे विचार नहीं आते तो उसे फायदा-नुकसान का पता नहीं चलता न? उसी तरह यदि कोई सोचनेवाला होगा तो यह विषय तो खड़ा ही नहीं रहेगा, लेकिन यह कालचक्र ऐसा है कि जलन में उसे हिताहित का भान ही नहीं रहा कि खुद का हित किस में है और अहित किस में? दूसरा, इस विषय के स्वरूप को समझपूर्वक बहुत सोचा हो तब भी अभी जो विषय खड़ा होता है, वह पहले के अविचारों का कारण है। इसलिए 'देखत भूली' टलती नहीं है न! विषय का विचार नहीं आया हो, लेकिन कहीं पर ऐसा देखने में आ जाए, तो भी तुरंत ही भूल हो जाती है। देखे और भूल जाए, ऐसा होता है या नहीं?

'देखत भूली' का अर्थ क्या है? मिथ्यादर्शन! लेकिन बाकी सब 'देखत भूली' हो तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन इस विषय

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

से संबंधित, चारित्र से संबंधित 'देखत भूली' का उपाय क्या है? अगर ज्ञान मिला हो तो खुद को गलती का पता चलता है कि 'यहाँ पर यह गलती हुई, यहाँ मेरी दृष्टि बिगड़ गई थी।' वहाँ पर फिर खुद आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करके धो देता है। लेकिन जिसे यह ज्ञान नहीं मिला है, वह क्या करेगा बेचारा? उसे तो भयंकर झूठी चीज़ को सच मानकर चलना पड़ता है। यह आश्चर्य है न! यह तो जिसे ज्ञान मिल गया है, उसे दिक्कत नहीं है, वह तो दृष्टि बिगड़ी कि तुरंत धो देता है।

यदि आपका शुद्ध उपयोग है, तो सामनेवाले का कैसा भी भाव हो तब भी आपको छू नहीं पाएगा!

प्रश्नकर्ता : एक स्त्री को देखकर किसी पुरुष को खराब भाव हो जाए, तो इसमें स्त्री का दोष है क्या?

दादाश्री : नहीं, इसमें स्त्री का कोई दोष नहीं है! भगवान महावीर का लावण्य देखकर कई स्त्रियों को मोह उत्पन्न होता था, लेकिन उस की वजह से भगवान को कुछ भी नहीं स्पर्श करता था। यानी ज्ञान क्या कहता है कि आपकी क्रिया हेतुसहित होनी चाहिए। आपको ऐसे बाल नहीं बनाने चाहिए या ऐसे कपड़े भी नहीं पहनने चाहिए कि जिससे सामनेवाले को मोह उत्पन्न हो। अपना भाव साफ होगा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। भगवान केश का लुंचन क्यों करते थे? कि इन बालों की वजह से अगर किसी स्त्री का मुझ पर भाव बिगड़े तो? इसलिए ये बाल ही निकाल दो ताकि भाव ही नहीं बिगड़ें। क्योंकि भगवान तो बहुत रूपवान होते हैं, महावीर भगवान का रूप, पूरे वर्ल्ड में सुंदर! देवता भी बहुत रूपवान होते हैं, लेकिन उस समय तो रूप से भी रूपवान तो भगवान महावीर थे! उन पर कोई स्त्री मोहित न हो जाए, इसलिए उन्हें जागृति रखनी पड़ती थी। फिर भी कोई मोहित हो जाए तो उसके लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं थे, क्योंकि खुद की वैसी इच्छा नहीं थी न!