भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

वैराग्य-प्रकरण ] * शरीर-निन्दा * ५५

गाढ़ निद्रारूपी सुख-शय्याके कारण जो मनोरम प्रतीत होता है तथा जिसमें दुश्चेष्टारूपिणी दग्धै दासी निवास करती है, वह देहरूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । मुनीश्वर ! जो मल आदि दोषोंसे युक्त विषय-समूहरूपी बर्तनों तथा अन्यान्य उपकरणोंसे ठसाठस भरा हुआ है तथा जिसमें अज्ञानरूपी नोनछा लगा हुआ है, वह देहरूपी गेह मुझे अभीष्ट नहीं है । गुल्फरूपी आधार-काष्ठपर स्थित जो पिंडलियाँ हैं, वे मानो खंभे हैं । घुटना उनका मस्तक है, वह भी जिसके ऊरुस्तम्भका आधार है तथा दोनों बड़ी-बड़ी भुजाएँ दो आड़ी लकड़ियोंके समान जिसे दृढ़तापूर्वक धारण करती हैं, वह देहरूपी घर मुझे इष्ट नहीं है ।

ब्रह्मन् ! जहाँ ज्ञानेन्द्रियरूपी झरोखोंके भीतर प्रज्ञारूपिणी गृहस्वामिनी क्रीडा कर रही है तथा चिन्ता-रूपिणी पुत्रियाँ खेल रही हैं, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है । जो सिरके केशारूपी छाजनसे छाया हुआ है, कानरूपी शोभाशाली चन्द्रशालाओंसे सुशोभित है तथा कुछ लम्बी अङ्गुलिरूप काष्ठचित्रोंसे सुसज्जित है, वह शरीररूपी गृह मुझे प्रिय नहीं है । जिसके समस्त अङ्गरूपी भित्तियोंके समूहमें रोमरूपी घने जौके अङ्कुर उगे हैं और जहाँ पेटका गड्ढा कभी भरता नहीं, ऐसा देहरूपी गेह मुझे नहीं चाहिये । जिसमें नखरूपी मकड़ियोंका निवास है, जहाँ भूखरूपी कुतिया निरन्तर शोर मचाये रहती है तथा जिसमें भयानक शब्द करनेवाली प्राणवायु सदा चलती रहती है, ऐसे देह-गेहकी प्राप्ति मुझे प्रिय नहीं है । जहाँ श्वास-प्रश्वासके रूपमें वायुके वेगका निरन्तर भीतर-बाहर आना-जाना लगा रहता है और जिसकी इन्द्रियरूपी खिड़कियाँ सदा खुली रहती हैं, वह देहरूपी घर मुझे कभी इष्ट नहीं है । जिसके मुखरूपी दरवाजेपर जिह्वारूपिणी वानरी सदा डटी रहती है, अतएव जो भयङ्कर दिखायी देता है तथा जिसके दाँतरूपी हड्डियोंके टुकड़े स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं, वह शरीररूपी घर मुझे नहीं चाहिये । यह देह गेह त्वचारूपी चूनेके लेप (या पलस्तर) से चिकना किया हुआ है । नाड़ीरूप यन्त्रोंके संचारसे यह चञ्चल बना रहता है और मनरूपी सुन्दर चूहेने इसमें सब ओर बिल खोद रक्खे हैं; इसलिये यह मुझे प्रिय नहीं है । जो मन्द मुसकानरूपी दीपककी प्रभासे क्षणभरके लिये उद्भासित हो उठता है, एक ही क्षणमें आनन्दोल्लाससे सुन्दर दिखायी देता है और फिर क्षणमात्रमें ही अज्ञाना-न्धकारसे व्याप्त हो जाता है, वह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । जो समस्त रोगोंका घर है, झुर्रियों तथा पके बालोंका नगर है और समस्त मानसिक चिन्ताओंका दुर्गम वन है, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है ।

यह शरीर एक भयानक वन है । इन्द्रियाँ ही इस जंगलके भालू हैं, जो अपने रोषके कारण इसे दुर्गम बनाये हुए हैं । यह भीतरसे सूना है तथा अनेकानेक निस्सार खोडरोंसे युक्त है । इसकी दिशारूपी कुंजें घोर अज्ञानान्धकारसे व्याप्त होनेके कारण गहन जान पड़ती हैं; अतः यह मुझे कदापि प्रिय नहीं है । यहाँ धन-सम्पत्ति, राज्य, शरीर, नाना प्रकारकी चेष्टाओं और मनोरथोंसे क्या लेना-देना है; क्योंकि काल कुछ ही दिनोंमें इन सबको अपना ग्रास बना लेता है । मुने ! यह शरीर केवल रक्त और मांसका ही बना हुआ है । इसका एक ही धर्म है—विनाश । फिर इसके बाहरी और भीतरी स्वरूपपर विचार करके बताइये, इसमें कौन-सी रमणीयता है ?

तात ! जो शरीर मरनेके समय जीवका अनुसरण नहीं करते—उसका साथ छोड़ देते हैं, वे कितने बड़े कृतघ्न हैं। फिर आप ही कहिये, उनपर बुद्धिमान् पुरुषोंकी क्या आस्था हो सकती है ? यह शरीर उस कोमल पल्लवके समान है, जो तनिक-सी वायुका संचार


१. दाह और घावसे पीड़ित ।
२. एड़ीके ऊपरकी गाँठ ।
सं० यो० व० अं० ३—

**१२—बाल्यावस्थाके दोष**

४६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होते ही जोर-जोरसे हिलने लगता है, यह आधिव्याधिरूपी सैकड़ों कण्टकोंसे क्षत-विक्षत होनेके कारण जर्जर हो जाता है। इसका स्वभाव क्षुद्र है तथा यह कड़वा और नीरस है; अतएव मुझे प्रिय नहीं है। चिरकालतक यत्नपूर्वक खा-पी लेनेके बाद भी नूतन पल्लवोंके समान कोमल कृशताको प्राप्त हो यह बारंबार विनाशकी ओर ही दौड़ता है। दीर्घकालतक लोगोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके धन-सम्पत्तिका सेवन करनेके बाद भी न तो यह ऊँचे उठता है और न स्थिरताको ही प्राप्त होता है, फिर इस शरीरका किसलिये पालन किया जाता है ? कोई भोग-वैभवसे सम्पन्न हो या दरिद्र—दोनोंका शरीर समान ही होता है, बुढ़ापेके समय बूढ़ा होता और मृत्युकालमें मर जाता है। उसे अपनेमें किसी विशेषताका अनुभव नहीं होता। जो लोग इन नाशवान् शरीरोंमें आस्था रखते हैं—इन्हें नित्य स्थिर रहनेवाला मानते हैं तथा जो संसारकी स्थिरतापर भी विश्वास करते हैं, वे मोहरूपी मदिराका पान करके उन्मत्त हो गये हैं। उन्हें बारंबार धिक्कार है।

मुने ! 'मैं न तो इस शरीरका कोई सम्बन्धी हूँ और न शरीर हूँ। न यह शरीर मेरा है और न मैं ही यह शरीर हूँ।' ऐसा विचार करके जिनका चित्त परमात्मामें विश्राम ले रहा है, वे ही लोग पुरुषोंमें उत्तम हैं। जो मान और अपमानसे वृद्धिको प्राप्त हुई हैं और प्रचुर लाभसे मनोरम प्रतीत होती हैं, वे दोषपूर्ण दृष्टियाँ केवल शरीरमें नित्यत्वका विश्वास रखनेवाले मनुष्यको नष्ट कर देती हैं। जो शरीररूपी गड्ढेमें सोती है और अहंकारका चमत्कारपूर्ण कार्य है, उस मनोहर अङ्गवाली (भोगतृष्णा-मयी दोषदृष्टिरूपिणी) पिशाचीने छलसे हमारा सर्वस्व हर लिया है। शरीरमें ही नित्यताका विश्वास रखनेवाली इस मिथ्या-ज्ञानरूपिणी दुष्ट राक्षसीने अकेली (असहाय) दीन-हीन प्रज्ञा (सुबुद्धि) को पूर्णरूपसे ठग लिया, यह कितने दुःखकी बात है !

कुछ ही दिनोंमें जीर्णताको प्राप्त होकर यह शरीररूपी पल्लव झरनेके जलकी बूँदोंके समान बिना किसी यत्नके अपने आप गिर पड़ता है। समुद्रमें उत्पन्न हुए पानीके बुलबुलोंकी तरह इस शरीरका बहुत शीघ्र विनाश हो जाता है। ब्रह्मन् ! यह शरीर मिथ्याभूत अज्ञानका विकार है और स्वप्नरूपी भ्रान्तियोंका भंडार है। इसका विनाश बहुत स्पष्ट दिखायी देता है। इसलिये इसमें मेरा क्षण-भरके लिये भी विश्वास नहीं है। जिस पुरुषने बिजली, शरद् ऋतुके बादल और गन्धर्व-नगरके चिरस्थायी होनेका निर्णय कर लिया है, वही इस शरीरकी नित्यतापर विश्वास करे (मैं तो नहीं कर सकता)। शीघ्रतापूर्वक नष्ट हो जानेमें हठपूर्वक अपना उत्कर्ष जतानेके लिये जो होड़ लगाकर प्रवृत्त हुए हैं, उन सतत विनाशशील पदार्थोंकी अपेक्षा भी जो अधिक क्षणभङ्गुर है, उस प्रबल दोषयुक्त शरीरकी तिनकेके समान उपेक्षा करके मैं सुखी हो गया हूँ।

(सर्ग १८)


बाल्यावस्थाके दोष

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! असमर्थता, आपत्तियाँ, तृष्णा, मूकता (बोल न सकना), मूढ़-बुद्धिता (बुद्धिके द्वारा कुछ जान न पाना), खिलौने आदिकी अभिलाषा, चञ्चलता और दीनता आदि सारे दोष बाल्यावस्थामें ही प्रकट होते हैं। बाल्यावस्थामें पशु-पक्षियोंकी-सी चेष्टाएँ होती हैं। बालक सभी लोगोंके द्वारा तिरस्कृत होता है। बालकोंकी चपल चेष्टा मृत्युसे भी बढ़कर दुःख देनेवाली होती है। बाल्यावस्थामें अज्ञानवश जल, अग्नि और वायुसे निरन्तर उत्पन्न होनेवाले भयके कारण पग-पगपर जो दुःख प्राप्त होता है, वह आपत्तिकालमें भी किसको होता होगा ? बालक भाँति-भाँतिकी लीलाओं, दुर्विलासों, दुश्चेष्टाओं तथा दूषित

**१३—युवावस्थाके दोष**

वैराग्य-प्रकरण ] * युवावस्थाके दोष * ४७

अभिप्रायमें हठात् प्रवृत्त होकर बड़े भारी मोहमें पड़ जाता है। बाल्यावस्थामें बालक जिस किसीके भी कहनेसे निष्फल कार्यमें प्रवृत्त हो जाते हैं, अनेक प्रकारकी दुश्चेष्टाएँ करते हैं तथा किसी प्रकार भी प्रतिष्ठाकी प्राप्ति उनके लिये दुर्लभ है । इस तरह मनुष्यका शैशवकाल केवल गुरुजनोंका शासन स्वीकार करनेके लिये ही है, सुख और शान्ति प्रदान करनेके लिये नहीं । जैसे उल्लू दिनमें अन्धकारसे भरे हुए दूषित गड्ढोंमें छिपे रहते हैं, उसी प्रकार जो-जो दोष, जितने दुराचार तथा जो-जो दुर्लङ्घ्य दुश्चिन्ताएँ हैं, वे सब-के-सब बाल्यावस्थामें ही जीवके हृदयमें छिपकर बैठे रहते हैं ।

ब्रह्मन् ! जो लोग 'बाल्यावस्था बड़ी रमणीय है' ऐसी कल्पना करते हैं, उन सबकी बुद्धि व्यर्थ है । उन हतचित्त मूढ़बुद्धि लोगोंको बारंवार धिक्कार है । जहाँ झूलेके समान चञ्चल मन विविध विषयोंके आकारको प्राप्त होता है तथा जो तीनों लोकोंमें अमङ्गलरूप है, वह बाल्यावस्था कैसे संतोषदायक हो सकती है ? मुने ! सभी प्राणियोंका मन अन्य सब अवस्थाओंकी अपेक्षा बाल्यावस्थामें ही दसगुना चञ्चल हो उठता है । मन स्वभावसे ही चञ्चल है और बाल्यावस्था सम्पूर्ण चञ्चल पदार्थोंमें सबसे बढ़कर है । जहाँ उन दोनोंका संयोग हो, वहाँ अन्तःकरणमें चपलताजनित अनर्थसे बचानेवाला कौन है ! बचपन और मन—ये दोनों सभी वृत्तियों ( व्यवहारों ) में सदा दो सहोदर भाइयोंके समान दृष्टिगोचर होते हैं । इन दोनोंकी ही स्थिति क्षणभङ्गुर है । बालक कुत्तेके समान थोड़ा-सा ही खाना देने या पुचकारनेसे वशमें हो जाता है और थोड़ा-सा ही घुड़कने या छड़ी आदि दिखानेसे बिगड़ जाता या डर जाता है । वह सदा अपवित्र स्थानमें ही रमता या खेलता है ।

बाल्यावस्थामें प्राणी केवल दूसरोंसे डरता और खाता-पीता रहता है । वह सदा दीन रहता है, देखी और बिना देखी सभी वस्तुओंकी इच्छा करता है । उसकी बुद्धि और शरीर दोनों चञ्चल होते हैं । ऐसी बाल्यावस्थाको मनुष्य केवल दुःख भोगनेके लिये ही धारण करता है । निर्बल बालक अपने मानसिक संकल्पसे जिन पदार्थोंको पानेकी इच्छा करता है, उन्हें न पाकर उसकी बुद्धि सदा संतप्त होती रहती है और उसे इतना दुःख होता है मानो किसीने उसके हृदयमें घाव कर दिया है, जबतक बाल्यावस्था रहती है, तबतक असत्य पदार्थोंमें ही सत्यताकी बुद्धि बनी रहती है, हृदयमें नाना प्रकारके मनोरथ उदित होते रहते हैं तथा अन्तःकरण बड़ा कोमल होता है । अतः बाल्यकाल अत्यन्त दीर्घ दुःख प्रदान करनेके लिये ही होता है, सुख देनेके लिये नहीं । परम बुद्धिमान् मुनीश्वर ! जिसके अन्तःकरणमें सर्दी, गरमीका अनुभव तो होता है, परंतु जो उनका निवारण करनेमें समर्थ नहीं होता, उस बालक और वृक्षमें क्या अन्तर है ! बाल्यकालमें गुरुसे, माता-पितासे, अन्य लोगोंसे तथा अपनी अपेक्षा बड़े बालकोंसे भी भय प्राप्त होता है । अतः बाल्यावस्था भयका मन्दिर ही है । महामुने ! बाल्यावस्थामें समस्त दोषपूर्ण दशाओंद्धारा अन्तःकरण दूषित होता है और बाल्यकाल अविवेक-नामधारी विलासीका विलासभवन है । इसलिये इस जगत्में यह बाल्यावस्था किसीके लिये भी पूर्ण संतोषदायक नहीं है ।

( सर्ग १९ )


युवावस्थाके दोष

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महर्षे ! बचपनके बाद मनुष्य बाल्यावस्थाके अनर्थोंका त्याग कर भोग भोगनेके उत्साह, भ्रान्ति अथवा कामरूप पिशाचसे दूषित-चित्त होकर नरकमें गिरनेके लिये ही यौवनारूढ होता है । यौवनावस्थामें मूर्ख मनुष्य अनन्त विलास ( चेष्टा ) वाले अपने चञ्चल चित्तकी राग-द्वेषादि वृत्तियोंका अनुभव

४८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

करता हुआ एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। अपने चित्तरूपी बिलमें स्थित हो नाना प्रकारकी भ्रान्ति पैदा करनेवाला कामरूपी पिशाच अपने वशमें हुए पुरुषका बलपूर्वक तिरस्कार करता है। मुने ! युवावस्था में स्त्री, द्यूत और कलह आदि दुर्व्यसनोंको उत्पन्न करनेवाले वे राग-लोभ आदि प्रसिद्ध एवं दुष्ट दोष वैसे (काम, चिन्ता आदिके वशीभूत) अन्तःकरणवाले पुरुषको, जो काम आदिमें तन्मय हो रहा है, यौवनके ही सहारे नष्ट कर डालते हैं। जो महान् नरकका बीज है और सदा भ्रान्ति पैदा करनेवाला है, उस यौवनके द्वारा जिनका नाश नहीं हुआ, वे मनुष्य दूसरे किसीसे नष्ट नहीं हो सकते। शृङ्गार आदि नाना प्रकारके रसोंसे पूर्ण और अनेक प्रकारके आश्चर्यजनक वृत्तान्तोंसे युक्त भीषण यौवनरूपा भूमिको जिसने पार कर लिया, वही पुरुष धीर कहलाता है । जो क्षणभरके लिये प्रकाशमान, चञ्चल मेघोंकी गम्भीर गर्जना (अभिमान-पूर्ण वचन) से व्याप्त और बिजलीकी तरह चमककर लुप्त हो जानेवाला है वह अमङ्गलमय यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता । जो भोगके समय मधुर अतएव स्वादिष्ट (मनोरम) और अन्तमें दुःखदायी होनेके कारण तिक्त प्रतीत होता है, जिसमें दोष-ही-दोष भरे हैं, जो सब दोषोंका आभूषण तथा मदिराके मद-विलासके समान मोहक है, वह यौवन मुझे कदापि अच्छा नहीं लगता । जो असत्य होकर भी सत्य-सा प्रतीत होता है, शीघ्र ही धोखा देनेवाला है तथा स्वप्नावस्थामें किये गये स्त्री-सह-वासके समान है, वह यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता । यह क्षणभरके लिये सुन्दर प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण वस्तुओंमें अग्रगण्य है। सारी आयु बीत जानेपर दिखायी देनेवाले गन्धर्वनगरके समान है। यह सब लोगोंको क्षणमात्रके लिये मनोहर प्रतीत होता है। अतः यह मुझे अच्छा नहीं लगता ।

यह यौवन ऊपरसे तो रमणीय प्रतीत होता है, किंतु भीतरसे सद्भावशून्य है । अतः वेश्या स्त्रीके समागमके समान घृणित होनेके कारण मुझे रुचिकर नहीं जान पड़ता । जैसे प्रलयकालमें सबको दुःख देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात सब ओरसे उमड़ उठते हैं, उसी प्रकार युवावस्था में सबको कष्ट प्रदान करनेवाले जो कोई भी अयोजन हैं, वे सब निकट आ जाते हैं । युवावस्थाका मोह मङ्गलमय आचारको भुला देनेवाले और बुद्धिको कुण्ठित कर देनेवाले भ्रमका अतिशय मात्रामें उत्पादन करता है । जैसे दावाग्नि वृक्षको जला देती है, उसी प्रकार युवावस्थामें जीव प्रियतमाके वियोगजनित दुःसह शोकाग्निसे मन-ही-मन जलता रहता है । जैसे अत्यन्त निर्मल, विस्तृत एवं पवित्र नदी भी वर्षा ऋतुमें मलिन हो जाती है, उसी प्रकार परम निर्मल, विशाल एवं शुद्ध बुद्धि भी युवावस्थामें कलुषित हो जाती है । बहुत-सी उत्तालतरङ्गोंसे युक्त भयानक नदी लाँघी जा सकती है, परंतु भोगतृष्णाकी चपलतासे युक्त युवावस्था नहीं लाँघी जा सकती । वह प्राणवल्लभा, उसके वे मोटे-मोटे स्तन, वे मनोहर विलास और वह सुन्दर मुख कितना मनोरम है !' युवावस्थामें इसी तरह-की चिन्ताओंसे मनुष्य जर्जर हो जाता है । रजोगुण और तमोगुणसे पूर्ण यह विषम यौवनरूप आँधी सम्पूर्ण सद्गुणोंकी स्थिरताको नष्ट करनेमें दक्ष है । मनुष्योंके यौवनका उल्लास (विकास) दोष-समूहोंको जगाता और सद्गुण-समुदायका मूलोच्छेद करता है अतएव उसे पाप-वैभवका विलास कहा गया है । शरीररूपी उपवनमें उत्पन्न हुई यौवनकी बेल बड़ी रमणीय है । वह ज्यों-ज्यों बढ़ती या ऊँचे चढ़ती है, त्यों-ही-त्यों अपनेसे सटे हुए मनरूपी भ्रमरको उन्मत्त बना देती है । शरीररूपी मरुभूमिमें कामरूपी घामके तापसे प्रकट हो भ्रान्तिरूपमें प्रतीत होनेवाली जो यौवनरूपिणी मृगतृष्णा है, उसकी ओर दौड़ते हुए मनरूपी मृग विषयोंके गड्ढे में गिर जाते हैं । यह युवावस्था देहरूपी जंगलमें कुछ दिनोंके लिये प्रकाशित होनेवाली शरद्ऋतुके समान है ।

**१४—स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण**

कल्याण


तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत

तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४)

**१५—वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता**

(इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ/श्लोक उपलब्ध नहीं है / पृष्ठ रिक्त है।)

**१६—कालके स्वरूपका विवेचन**

वैराग्य-प्रकरण ] * स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण * ४९

लोगों ! तुम इसपर विश्वास न करो । जब-जब यौवन अपनी चरम सीमापर आरूढ़ हो जाता है, तब-तब संतापयुक्त कामनाएँ केवल विनाशके लिये ही बढ़ने या नृत्य करने लगती हैं। ये राग-द्वेषरूपी पिशाच तभीतक विशेषरूपसे नाचते फिरते हैं, जबतक कि यह यौवनरूपिणी रात्रि पूर्णरूपसे नष्ट नहीं हो जाती । जो महामुग्ध पुरुष मोहवश क्षणभङ्गुर यौवनसे हर्षको प्राप्त होता है, वह मनुष्य होता हुआ भी निरा पशु ही माना गया है । जो मनुष्य अभिमान या अज्ञानके कारण मदोन्मत्त यौवनावस्थाकी अभिलाषा करता है, उस दुर्बुद्धिको शीघ्र ही पश्चात्तापका भागी होना पड़ता है । साधो !

इस भूतपर वे ही पुरुष पूजनीय और महात्मा हैं, जो यौवनरूपी संकटसे सुखपूर्वक पार हो गये हैं । बड़े-बड़े मकरोंसे भरे हुए महासागरको सुखपूर्वक पार किया जा सकता है, किंतु विषय-चिन्तन आदि महातरङ्गोंके कारण उमड़े हुए और दुर्गुण दुराचाररूप अनेक दोषोंसे भरे हुए इस निन्दनीय यौवनके पार जाना बहुत ही कठिन है। ब्रह्मन् ! विनयसे अलंकृत, श्रेष्ठ पुरुषोंको आश्रय देनेवाला, करुणासे प्रकाशित तथा शम, दम, क्षमा, दया, शान्ति, संतोष, सरलता आदि विविध गुणोंसे युक्त उत्तम यौवन इस संसारमें उसी तरह दुर्लभ है, जैसे आकाशमें वन । (सर्ग २०)


स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! इधर केश हैं, इधर रक्त और मांस है, यही तो युवती स्त्रीका शरीर है। जिसका हृदय विवेकसे विशाल हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषको इस निन्दित नारी-शरीरसे क्या काम ? आदरणीय मुने ! बहुमूल्य वस्त्र और केसर-कस्तूरी आदिके लेपसे जिन्हें बारंबार सजाकर दुलराया गया था, समस्त देहधारियोंके उन्हीं अङ्गोंको किसी समय गीध और सियार आदि मांसाहारी जीव नोचते और घसीटते हैं । जिस स्तनमण्डलपर मेरु पर्वतके शिखरप्रान्तसे सोल्लास प्रवाहित होनेवाली गङ्गाजीके जलकी धाराके समान मोतियोंके हारकी शोभा देखी गयी थी, मृत्युके पश्चात् सम्पूर्ण दिशाओंकी श्मशान-भूमियोंमें नारीके उसी स्तनका कुत्ते अन्नके छोटे-से पिण्डकी भाँति आस्वादन करते हैं। जैसे वनमें चरनेवाले गदहे या ऊँटके अङ्ग रक्त-मांस और हड्डियोंसे सम्पन्न हैं, उसी प्रकार कामिनियोंके अङ्ग भी उन्हीं उपकरणोंसे युक्त हैं। फिर नारीके प्रति ही लोगोंका इतना आग्रह या आकर्षण क्यों है ?

मुने ! लोग केवल स्त्रीके शरीरमें जिस आपात-रमणीयताकी कल्पना करते हैं, मेरी मान्यताके अनुसार वह भी उसमें है नहीं । उसमें जो रमणीयताकी प्रतीति होती है, उसका एकमात्र कारण मोह ही है। मनमें विकार उत्पन्न करनेवाली मदिरामें और युवती स्त्रीमें क्या अन्तर है ? एक जहाँ मद (नशे) के द्वारा मनुष्यको प्रचुर उल्लास प्रदान करती है, वहाँ दूसरी कामका भाव जगाकर पुरुषके लिये आनन्ददायिनी बनती है (अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषके लिये दोनों ही सामान्यरूपसे त्याज्य हैं) । जैसे धूमको ही केशके रूपमें धारण करनेवाली प्रज्वलित अग्निशिखा, जो देखनेमें सुन्दर किंतु छूनेमें दुःसह है, तिनकोंको जला डालती है, उसी प्रकार केश और काजल धारण करनेवाली तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाली नारियाँ, जिनका स्पर्श परिणाममें दुःख देनेवाला है, पुरुषको वासनाकी आगसे जलाती रहती हैं।

जैसे विषकी लता सुन्दर फूलोंसे मनोहर लगती, नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित होती, भ्रमरोंकी क्रीडास्थली

५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बननी, पुष्प-गुच्छ धारण करती, फूलोंके केसरसे पीले रंगकी प्रतीत होती, अपना सेवन करनेवाले मनुष्यको मार डालती या पागल बना देती है, उसी प्रकार कमनीया कामिनी फूलोंका शृङ्गार धारण करनेके कारण मनोहारिणी लगती, करपल्लवोंसे सुशोभित होती, भ्रमरोंके समान चञ्चल नेत्रोंके कटाक्ष-विलासका प्रदर्शन करती, पुष्प-गुच्छोंके समान स्तनोंको वक्षपर धारण करती, फूलोंके केसरकी भाँति सुनहरी गौर-कान्तिसे प्रकाशित होती, मनुष्योंके विनाशके लिये तत्पर रहती और काम-भावसे अपना सेवन करनेवालोंको उन्माद एवं मृत्यु आदिके अधीन कर देती है। मुनिश्रेष्ठ ! कामरूपी किरात (बहेलिये) ने मूढ़-चित्त मानवरूपी पक्षियोंको फँसानेके लिये स्त्रीरूपी जालको फैला रखा है। जन्म-स्थान-रूपी छोटे-छोटे जलाशयोंमें उत्पन्न हो धनरूपी पङ्कमें विचरनेवाले पुरुषरूपी मत्स्योंको फँसानेके लिये नारी बंसीके काँटेमें लगी हुई आटेकी गोलीके समान है और दुर्वासना ही उस बंसीकी डोर है।

नारीके स्तनसे, नेत्रसे, नितम्बसे अथवा भौंहसे, जिसमें सार वस्तुके नामपर केवल मांस है, अतएव जो किसी कामकी वस्तु नहीं है, मेरा क्या प्रयोजन है ? मैं वह सब लेकर क्या करूँगा ? ब्रह्मन् ! इधर मांस, इधर रक्त और इधर हड्डियाँ हैं; यही नारीका शरीर है, जो कुछ ही दिनोंमें जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। संसारके मनुष्यो ! नारीके अङ्गोंका थोड़े ही समयमें होनेवाला यह परिणाम मैंने तुम्हें बताया है, फिर तुम क्यों भ्रमके पीछे दौड़ रहे हो ? पाँच भूतोंके सम्मिश्रणसे बना हुआ अङ्गोंका संगठन ही नारी नामसे प्रसिद्ध हो रहा है; अतः विवेक-बुद्धिसे सम्पन्न कोई भी पुरुष आसक्तिसे प्रेरित होकर क्यों उसकी ओर टूट पड़ेगा ? जैसे हथिनीके लिये चञ्चल हुआ हाथी विन्ध्याचल पर्वतपर उसे फँसानेके लिये बनाये हुए गड्ढेमें गिरकर बँध जाता और परम शोचनीय अवस्थाको पहुँच जाता है, यही दशा तरुणी स्त्रीके मोहमें फँसे हुए तरुण पुरुषकी होती है। (सर्ग २१)


वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महर्षे ! जैसे हिमरूपी वज्र कमलको, आँधी ओसकणको और नदी तटवर्ती वृक्षको नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वृद्धावस्था शरीर-का नाश कर डालती है। जैसे लेशमात्र विषका भक्षण शरीरको शीघ्र ही कुरूप बना देता है, उसी प्रकार बुढ़िया जरावस्था मनुष्यके सारे अङ्गोंको जर्जर करके शीघ्र ही कुरूप कर देती है। जिनके सारे अङ्ग शिथिल होकर झुर्रियोंसे भर गये हैं और जरा-वस्थाने जिनके सारे अङ्गोंको जर्जर बना दिया है, उन समस्त पुरुषोंको कामिनियाँ ऊँटके समान समझती हैं। वृद्धावस्थाके कारण जिसके अङ्ग काँपते रहते हैं, ऐसे मनुष्यको नौकर-चाकर, स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धव तथा सुहृद्गण भी उन्मत्तके समान समझकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। जो दीनतारूपी दोषसे परिपूर्ण, हृदयमें

संताप पहुँचानेवाली तथा समस्त आपत्तियोंकी एकमात्र सहचरी है, वह विशाल तृष्णा वृद्धावस्थामें बढ़ती ही जाती है। 'हाय ! बड़े खेदकी बात है, मैं परलोकमें क्या करूँगा ?' इस प्रकारका अत्यन्त दारुण भय, जो प्रतीकारके योग्य नहीं है, वृद्धावस्थामें बढ़ता जाता है। बुढ़ापेमें 'मैं बेचारा कौन हूँ ! मेरी हस्ती ही क्या है ? मैं किस प्रकार क्या करूँ ? अच्छा, मैं चुप ही रहता हूँ।' इस प्रकारकी दीनताका उदय होता है। 'मुझे किसी स्वजनसे कब, क्या और किस प्रकारका स्वादिष्ट भोजन प्राप्त हो सकता है ?' इस प्रकार चिन्तारूपिणी दूसरी जरावस्था बुढ़ापेमें निरन्तर चित्तको जलाती रहती है। वृद्धावस्थामें मनुष्य अपनी शक्तिका संतुलन खो बैठता है—कभी खानेकी शक्ति होनेपर पचानेकी शक्ति नहीं रहती और कभी पचानेकी

**१७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता**

वैराग्य प्रकरण ] * कालके स्वरूपका विवेचन * ५१


शक्ति होनेपर खानेकी ही शक्ति नहीं रहती। इस प्रकार शक्तिह्रासके कारण भोगकी इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, परंतु उपभोग किया नहीं जा सकता। उस दशामें निश्चय ही हृदय जलता रहता है। मुने ! शरीररूपी वृक्षके सिरेपर बैठी हुई जरावस्थारूपिणी वृद्धा बगुली, जो नाना प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका अपकार करनेवाली है, रोगरूपी सर्पोंसे आक्रान्त होकर ज्यों ही चें-वें करने लगती है, त्यों ही मूर्च्छारूपी गहरे अन्धकारकी इच्छा रखनेवाला मृत्युरूपी उल्लू कहींसे झटपट आया हुआ ही दिखायी देता है।

जैसे सायंकालकी संध्याके प्रकट होते ही अन्धकार दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शरीरमें जरावस्थाको देखते ही मृत्यु दौड़ी चली आती है। सूना नगर, जिसकी लताएँ कट गयी हों वह वृक्ष तथा जहाँ वर्षा न हुई हो, वह देश भी कुछ-कुछ शोभित होता है, किंतु जरासे जर्जर हुए शरीरकी तनिक भी शोभा नहीं होती। वृद्धावस्थाकी मार खाकर जर्जर हुआ शरीर हिमसमूहसे आक्रान्त हो मुरझाये हुए कमलकी-सी शोभाको धारण करता है।

मस्तकरूपी पर्वतके शिखरपर उगी हुई यह वृद्धावस्था-रूपिणी चाँदनी वातरोग और खाँसीरूपिणी कुमुदिनी-को यत्नपूर्वक विकसित कर देती है। यह बुढ़ापारूपिणी वेगवती गङ्गा आयुके समाप्त होनेपर शरीररूपी तटवर्ती वृक्षकी जड़ोंको तुरंत ही काट गिराती है। तात ! जैसे श्वेत पत्रवाली और फूलोंसे लदी हुई पतली लता कुछ टेढ़ी हो जाती है, उसी प्रकार जिसके सारे अवयव सफेद हो गये हैं, मनुष्योंका वह दुबला-पतला शरीर वृद्धावस्थासे टेढ़ा हो जाता है—कमानकी तरह झुक जाता है। मुने ! जैसे कपूरसे सफेद हुए केलेके पेड़को हाथी क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार मृत्युरूपी गजराज वृद्धावस्थासे कपूरकी भाँति सफेद हुई देहको निश्चय ही क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है। तात ! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी जीता है, उस दुष्ट जीवनके लिये दुराग्रह रखनेसे क्या लाभ ? भूतलपर किसीसे पराजित न होनेवाली यह जरावस्था मनुष्योंकी समस्त एषणाओंका तिरस्कार कर देती है—उनकी किसी भी इच्छाको सफल नहीं होने देती। (सर्ग २२)


कालके स्वरूपका विवेचन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! 'यह मेरी भोग्य वस्तु है। मैं इसका भोक्ता हूँ। ये भोगके साधन हैं। इस साधनसे इस तरह भोग्य वस्तुको प्राप्त करके मैं चिरकालतक इसका उपभोग करूँगा। आज यह वस्तु मैंने प्राप्त कर ली और अब इस मनोरथको प्राप्त करूँगा' इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्प-विकल्पोंद्वारा जो अनन्त व्यावहारिक वचनोंका प्रयोग करते हैं तथा अन्र ( तुच्छ ) शरीरमें महत्त्व-बुद्धि ( आत्मभाव ) रखते हैं, उन मूढ़ जनोंने हेयोपादेय, शत्रु-मित्र तथा राग-द्वेषादि भेदोंद्वारा इस संसाररूपी गुफामें भ्रमको अत्यन्त गौरवपूर्ण ( दुश्छेद्य ) बना दिया है। जैसे बड़वाग्नि उमड़े हुए समुद्रको सोखती है, उसी प्रकार यह सर्वभक्षी काल भी उत्पन्न हुए जगत्को अपना ग्रास बना लेता है। भयंकर कालरूपी महेश्वर इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको निगल जानेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; क्योंकि सारी वस्तुएँ उनके लिये सामान्यरूपसे ग्रास बना लेनेके योग्य हैं। युग, वर्ष और कल्पके रूपमें काल ही प्रकट है। इसका वास्तविक रूप कोई देख नहीं सकता। वह सब संसारको अपने वशमें करके बैठा है। संसारमें जो रमणीय, शुभ कर्म करनेवाले तथा उच्चता या गौरवमें सुमेरु पर्वतके भी गुरु थे, उन सबको कालने उसी तरह

५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

निगल लिया है, जैसे गरुड़ सर्पोंको निगल जाते हैं। यह काल बड़ा निर्दय, कठोर, क्रूर, कर्कश, कृपण और अधम है। संसारमें अबतक ऐसी कोई वस्तु नहीं हुई, जिसे यह काल उदरस्थ न कर ले। इस कालका विचार सदा सबको निगल जानेका ही रहता है। यह एकको निगलता हुआ भी दूसरेको चबा जाता है। अबतक असंख्य लोग इसकी उदर-दरीमें प्रवेश कर चुके हैं, तो भी यह महाखाऊ काल तृप्त नहीं होता। यह रात्रिरूपी भौरोंसे भरी हुई और दिनरूपी मञ्जरियोंमें सुशोभित वर्ष, कल्प और कलारूपिणी लताओंको निरन्तर सृष्टि करता रहता है, किंतु कभी थकता नहीं।

मुने ! यह काल धूर्तोका शिरोमणि है। इसे कितना ही तोड़ा जाय, टूटता नहीं। जलानेपर भी जलता नहीं और दृश्य होनेपर भी दीखता नहीं। यह मनोराज्यकी भाँति फैला हुआ है। एक ही निमेषमें किसी वस्तुको उत्पन्न कर देता है और पलभरमें किसी भी वस्तुका पूर्णतः विनाश कर डालता है। काल केवल अपना ही पेट भरनेमें संलग्न रहनेके कारण तिनका, धूल, इन्द्र, सुमेरु, पत्ता और समुद्र—सबको अपने अधीन करने—निगल जानेके लिये उद्यत रहता है। केवल इस कालमें ही पर्याप्त क्रूरता भरी है, लोभ भी इसीके भीतर डेरा डाले हुए है। सारा-का-सारा दुर्भाग्य भी इसीमें निवास करता है तथा दुःसह चपलता भी इसीमें उपलब्ध होती है। यह काल महाकल्प नामक वृक्षोंसे देवता, मनुष्य और असुर आदि प्राणिसमूहरूपी फलोंके भारोंको गिराता हुआ-सा खड़ा है। सैकड़ों महाकल्प बीत जानेपर भी यह काल न तो खिन्न होता है, न किसीके द्वारा समादृत होता है, न कहीं आता है न जाता है, न अस्त होता है और न इसका उदय ही होता है। यौवनरूपी कमलिनीको संकुचित करनेके लिये यह चन्द्रमाके समान है, आयुरूपी गजराजका मस्तक विदीर्ण करनेके लिये सिंहके सदृश है। इस संसारमें तुच्छ या महान् कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे यह कालरूपी चोर चुरा न ले जाता हो; यह काल ही व्यावहारिक अवस्था में संसारका कर्ता, भोक्ता, संहार करनेवाला और स्मरणकर्ता आदि सभी पदोंपर प्रतिष्ठित होता है। किसीने भी बुद्धिकौशलद्वारा इस कालके रहस्यका निश्चय नहीं किया है। पुण्य और पापके फलभोगके अनुसार सुन्दर और कुरूप रूप धारण करनेवाले समस्त शरीरोंको काल ही उत्पन्न करता, काल ही उनकी रक्षा करता और काल ही सहसा उनका संहार कर देता है।

इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र कालका विलास देखा जाता है। मनुष्योंमें तो कालका बल प्रसिद्ध ही है।

इस कालकी पत्नी है—चण्डी (अत्यन्त कोपवती कालरात्रि), जो बड़ी चतुराईसे चलती है। इसे कालने संसाररूपी वनमें विहार करनेके लिये नियुक्त किया है, इसके साथ सारी मात्रिकाएँ (डाकिनी, शाकिनी आदि) रहती हैं। यह कालरात्रि बाघिनके समान प्राणिसमूहका विनाश करनेवाली है। कालके धनुषका नाम है—अभाव या संहार। वह निरन्तर टंकार करता रहता है, उससे दुःखरूपी बाणोंकी झड़ी लगी ही रहती है। वह धनुष सब ओर स्फुरित होता रहता है। ब्रह्मन्! यह कालरूपी राजकुमार संसारमें दौड़ते हुए प्राणियोंके पीछे दौड़ता है और उनको बाणोंसे विदीर्ण करता रहता है। इस कालसे बढ़कर शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है। यही सबसे अधिक विलास करनेमें प्रवीण है और समस्त लक्ष्यभेदियोंसे ऊपर उठकर अनुपम शोभा पाता है।

यह जो कुछ भी विस्तृत जगन्मण्डल दिखायी देता है, वह उस कालकी नाट्यशाला है। इसमें वह खुद

**१८—सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन**

वैराग्य-प्रकरण ] * कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता * ५३


जी भरकर तृप्त करता है। जैसे बालक गीली मिट्टीको लेकर नाना प्रकारके खिलौने बनाते हैं, उसी प्रकार काल भी बारंबार चौदह भुवन, विभिन्न वन, लोक-लोकान्तर, जीव-समुदाय तथा उनके नाना प्रकारके आचार-विचारोंकी सृष्टिकरता है। उन आचार-विचारोंकी प्रवृत्ति सत्ययुग और त्रेतामें अचल तथा द्वापर और कलिमें चल होती है। इन सबकी सृष्टि करनेमें काल कभी थकता नहीं।

(सर्ग २३—२५)


कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महामुने ! जब जगत्में काल आदिके चरित्र ऐसे हैं, तब आप ही बताइये इस संसार-नामधारी प्रपञ्चमें मेरे-जैसे लोगोंकी क्या आस्था हो सकती है। मुने ! इन दैव (प्रारब्धकर्म) आदिके द्वारा की हुई सुख-दुःख आदिरूप प्रपञ्च-रचनाओंसे मोहित हुए हमलोग किसीके हाथ बिके हुए दासों तथा वनके मृगोंकी भाँति पराधीन हो रहे हैं। जैसे सर्प वायुको पीता है, उसी प्रकार यह क्रूर आचरण करनेवाला काल तरुण शरीरको बुढ़ापेमें पहुँचाकर समस्त प्राणि-समुदायको निरन्तर अपना ग्रास बनाता रहता है। काल निर्दयोंका राजा है। वह किसी भी आर्त प्राणीके ऊपर दया नहीं करता। सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाला उदार पुरुष तो इस संसारमें दुर्लभ हो गया है। मुने ! जगत्में जितनी भी प्राणियोंकी जातियाँ हैं, उन सबका वैभव अल्प एवं तुच्छ है तथा जितने भी भोगके स्थान हैं, वे सभी भयंकर और परिणाममें दुरन्त दुःखकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं। प्राणियोंकी आयु अत्यन्त चपल (अस्थिर) है, मृत्यु बहुत ही निर्दय है। जवानी भी अधिक चञ्चल होती है और बाल्यावस्था मोहमें ही बीत जाती है । संसारी मनुष्य गाने-बजानेकी कलाके रस (अथवा विषया-नुसंधान) से कलङ्कित हैं । बन्धु-बान्धव संसारमें बाँधनेके लिये रस्सीके समान हैं । भोग इस जगत्के महान् रोग हैं तथा सुख आदिकी तृष्णाएँ मृगतृष्णाके समान हैं । बिना जीती हुई इन्द्रियाँ ही शत्रु हैं । सत्यस्वरूप आत्मा असत्य-सा हो गया अर्थात् जीवात्मा अज्ञानके कारण देहको ही अपना स्वरूप मानने लग गया । बिना जीता हुआ मन बन्धनका हेतु होनेसे आत्माका शत्रु है एवं अज्ञानवश यह जीवात्मा स्वयं ही अपने-आपपर उस मनके द्वारा प्रहार करता है । अहंकार ही कलङ्कका कारण है । बुद्धियाँ अत्यन्त कोमल (आत्म-निष्ठासे रहित) हैं। क्रियाएँ शास्त्रविरुद्ध होनेसे दुःखरूप फल देनेवाली हैं और लीलाएँ (शरीर और मनकी चेष्टाएँ) स्त्रीकी प्राप्तिमें ही केन्द्रित हैं, केवल स्त्रियाँ ही उनका विषय हो गयी हैं । इच्छाएँ विषयोंमें ही शोभा पाती हैं—वे भोगोंकी ओर ही दौड़ती हैं । परमात्म-स्फूर्तिरूप चमत्कार नष्ट हो गये हैं । स्त्रियाँ दोषोंकी सेनाएँ हैं तथा सम्पूर्ण विषय-रस वास्तवमें नीरस हैं ।

महात्मन् ! दूषित बुद्धिने सबके अन्तःकरणको व्याकुल कर रक्खा है। अज्ञानके कारण सभी सन्तप्त हो रहे हैं । रागरूपी रोग दिनोंदिन बढ़ रहा है और वैराग्य दुर्लभ हो रहा है । आत्मदर्शनकी शक्ति रजोगुणसे नष्ट हो गयी है । अतः सत्त्वगुण नहीं प्राप्त होता, केवल तमोगुण बढ़ रहा है। इसलिये तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्मा) अत्यन्त दूर है । जीवन अस्थिर हो गया है। मृत्यु जल्दी ही आनेके लिये उत्सुक है । धैर्य शिथिल हो गया है और तुच्छ विषय-भोगोंके प्रति लोगोंकी आसक्ति प्रतिदिन बढ़ रही है । बुद्धि मूढ़तासे मलिन हो गयी है । शरीरका अन्तिम परिणाम एकमात्र पतन (विनाश) ही है । देहमें जरावस्था प्रज्वलित हो उठी है और पापकी ही बारंबार स्फुरणा होती है । जवानी भागी जा रही है । सत्सङ्ग दुर्लभ हो गया है।

५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कभी कोई उत्तम आश्रय नहीं मिलता और सत्यभावका उदय तो कहीं हो ही नहीं रहा है। मन मोहसे आच्छन्न-सा हो रहा है। दूसरेको सुखी देखकर होनेवाला आत्म-संतोष मानो दूर चला गया है। उज्ज्वल करुणाका उदय नहीं हो रहा है और नीचता दूरसे निकट चली आ रही है। धीरता अधीरतामें परिणत हो रही है। जीवोंका काम केवल आवागमन—जन्मना-मरना रह गया है। दुष्टोंका सङ्ग पद-पदपर सुलभ है; परंतु सत्पुरुषोंका सङ्ग अत्यन्त दुर्लभ हो गया है। सम्पूर्ण पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। वासना संसारमें बाँधनेवाली है और काल प्राणियोंकी परम्पराको नित्य कहीं अज्ञात स्थानमें लिये जाता है। दिशाएँ भी नहीं दिखायी देतीं।

देश भी विदेश-सा हो जाता है और पर्वत भी बिखर-कर ढह जाते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतामें क्या विश्वास है। सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, वह काल आकाशको भी खा जाता है। चौदहों भुवनोंको भी अपना भोजन बना लेता है। पृथ्वी भी विनाशको प्राप्त हो जाती है। फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास किया जा सकता है। कालवश समुद्र भी सूख जाते हैं, तारे भी टूटकर बिखर जाते हैं, सिद्ध भी नष्ट हो जाते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या आस्था हो सकती है ? बड़े-बड़े दानव भी विदीर्ण हो जाते हैं। ध्रुव भी अध्रुवजीवी बन जाते हैं और अमर भी मरणको प्राप्त होते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास हो सकता है ? काल अपने अगणित मुखोंसे इन्द्रको भी चबा जाता है, यमराजको भी वशमें कर लेता है और उसीके प्रभावसे वायु भी अवायु हो जाता है—अपना अस्तित्व खो बैठता है; फिर मुझ-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास हो सकता है ?

सोम (चन्द्रमा) भी कालवश व्योम (आकाश) में विलीन हो जाता है। मार्तण्ड (सूर्य) के भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं और अग्नि भी भग्ना (विनाश) को प्राप्त हो जाती है; फिर मुझ-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या आस्था की जा सकती है ? जो काल (मृत्यु) को भी कवलित कर लेता है, नियतिको भी टाल देता है और अनन्त आकाशको भी अपने आपमें विलीन कर लेता है, उस महाकालके होते हुए मुझ जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास किया जा सकता है ? जिसका कानोंसे श्रवण, वाणीसे वर्णन और नेत्रोंसे दर्शन नहीं होता, ऐसे अज्ञातस्वरूप एवं मायाके उत्पादक किसी सूक्ष्म तत्त्वके द्वारा चौदहों भुवन अपने-आपमें ही मायाद्वारा दिखाये जा रहे हैं। वह तत्त्व निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। समष्टि अहंकाररूप कलाको प्राप्त होकर सबके भीतर निवास करनेवाला वह कालका भी कालरूप परमात्मतत्त्व सबसे महान् है। तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो उसके द्वारा नष्ट न किया जा सके। स्वर्गमें देवता, भूतलपर मनुष्य और पातालमें सर्पोंकी सृष्टि उसीने की है। वही अपने संकल्पमात्रसे इन सबको जर्जर दशामें पहुँचा देता है। अनुरागयुक्त कामिनियोंने अपने चञ्चल लोचनोंद्वारा कटाक्षपूर्वक जिसकी ओर देखा है, उस पुरुषके मनको महान् विवेक भी स्वस्थ नहीं कर पाता। जो दूसरोंका उपकार करनेवाली है और दूसरोंकी पीड़ा देखकर संतप्त हो उठती है, अपनी आत्माको शान्ति प्रदान करनेवाली उस शीतल बुद्धिसे युक्त ज्ञानी महात्मा ही सुखी है—ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे समुद्रमें उत्पन्न हो बड़वाग्निके मुँहमें गिरकर नष्ट होनेवाली असंख्य लहरोंको कोई गिन नहीं सकता, उसी तरह संसारमें उत्पन्न हो कालके मुँहमें पड़नेवाले अनन्त प्राणियोंकी गणना कौन कर सकता है। जैसे झाड़ियोंमें बैठे हुए मृग या पक्षी अपनी जिह्वाकी लोलुपताके कारण मोहवश जालमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह दुराशा-पाशमें बँधे हुए सभी मनुष्य दोषरूपी झाड़ियोंके मृग बने हुए हैं। सब-के-सब मोह-जालमें

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता * ५५


फँसकर पुनर्जन्मरूपी जंगलमें नष्ट हो जाते हैं। इस संसारमें लोगोंकी आयु विभिन्न जन्मोंमें किये गये कुकर्मोंसे नष्ट हो रही है। यदि आकाशमें वृक्ष हो, उस वृक्षमें लता हो और उस लतासे गलेमें फाँसी लगाकर मनुष्यको लटका दिया जाय तो उससे जो दुःख होगा, वैसा ही दुःखमय फल उन कुकर्मोंका भी बताया गया है। उस दुःखकी निवृत्तिके लिये उपाय करना तो दूरकी बात है, उस उपायका विचार करनेवाले लोग भी यहाँ हैं या नहीं, हमें इसीका पता नहीं है। मुनीश्वर ! इस संसारमें लोगोंकी बुद्धि चञ्चल और मृदु है। उसी बुद्धिसे युक्त मनुष्य व्यर्थ ही अनेक संकल्प-विकल्पोंका जाल रचते हुए कहते हैं—'आज उत्सव है।' यह बड़ी सुहावनी ऋतु है, इसमें यात्रा करनी चाहिये, ये लोग हमारे भाई-बन्धु हैं और यह सुख विशिष्ट भोगोंसे युक्त है, इन्हीं संकल्पोंमें पड़े-पड़े वे सब लोग एक दिन कालके गालमें चले जाते हैं। (सर्ग २६)


सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—तात ! मुनीश्वर ! इस जगत्का स्वरूप अत्यन्त अरमणीय (अभद्र) है, तो भी यह ऊपरसे मनोरम प्रतीत होता है। इसमें कोई ऐसा पदार्थ मेरी दृष्टिमें नहीं आता, जिसके प्राप्त होनेसे चित्त-को अत्यन्त विश्राम (परम सुख) मिल सके। बाल्यावस्था विचित्र प्रकारसे कल्पित क्रीडा-कौतुकमें ही चपलता-पूर्वक बीत जाती है। युवावस्था आनेपर मनरूपी मृग स्त्रीरूपिणी गुफाओंमें ही रमता हुआ जीर्ण हो जाता है; फिर वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर जब यह शरीर जर्जर हो जाता है, उस समय जनसमुदाय केवल दुःख-ही-दुःख भोगता रहता है (उसे कहीं कभी भी सुख-शान्ति-का लेश भी प्राप्त नहीं होता)। बुढ़ापारूपी हिमकी वर्षासे जब देहरूपिणी कमलिनी नष्ट हो जाती है, उस समय प्राणरूपी भ्रमर इसे छोड़कर दूर, बहुत दूर चला जाता है। उस दशामें उस मनुष्यके लिये यह संसार-रूपी सरोवर शुष्क (नष्ट) हो जाता है। इस संसारमें तृष्णा नामकी नदी निरन्तर बहती रहती है, जिसने अपने प्रबल प्रवाहके वेगसे यहाँके समस्त अनन्त पदार्थों-को ग्रस लिया है (नष्ट कर दिया है)। यह संतोष-रूपी तटवर्ती वृक्षकी जड खोदनेमें बड़ी दक्ष है। संसाररूपी समुद्रमें चमड़ेसे मढ़ी हुई शरीररूपिणी नौका क्षुधा, पिपासा आदि विविध तरङ्गोंसे आहत हो हिलती-डोलती हुई इधर-उधर घूम रही है। पाँच इन्द्रिय नामक ग्राह इसे टक्कर मारकर डुबानेके लिये उद्यत रहते हैं। इस तरह यह नौका क्रमशः नीचे जा रही है—डूबना चाहती है। इसमें धैर्य और वैराग्यसे सुशोभित होनेवाले विवेकी जीव नहीं बैठे हैं। जहाँ तृष्णारूपिणी लताओंका ही प्राबल्य है, ऐसे संसाररूपी वनोंमें विचरनेवाले ये मनरूपी बंदर कामरूपी वृक्षोंकी सैकड़ों शाखाओंपर भटकते हुए अपनी आयु नष्ट करते हैं, परंतु कभी मनोवाञ्छित फल नहीं पाते। महर्षे ! आपत्तियोंकी प्राप्ति होनेपर भी दुःख और मोह जिनसे दूर ही रहते हैं, स्वास्थ्य और सम्पत्तिमें भी जो अहंकार-शून्य मनसे सुशोभित होते हैं तथा सुन्दरी रमणियों जिनके अन्तःकरणमे चोट नहीं पहुँचातीं (विकार नहीं उत्पन्न करतीं), ऐसे महात्मा पुरुष इस समय अत्यन्त दुर्लभ हैं। जो हाथियोंकी सेनारूपी तरङ्गोसे उद्वेलित होनेवाले समर-सागरको अपने बल-विक्रमके द्वारा पार कर जाते हैं, मेरी दृष्टिमें वे शूरवीर नहीं हैं। मैं तो उन्हींको शूरवीर मानता हूँ, जो मनरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण इस देह और इन्द्रिय-रूपी समुद्रको विवेक, वैराग्य आदिके द्वारा बाँध जाते हैं।*


* कृच्छ्रेषु दूरास्त विषादमोहाः स्वास्थ्येषु नोत्सिक्तमनोऽभिरामाः ।
सुदुर्लभाः सम्प्रति सुन्दरीभिरनाहतान्तःकरणा महान्तः ॥
तरन्ति मातङ्गघटातरङ्गं रणाम्बुधिं ये नहि ते न शूराः ।
शूरास्त एवेह मनस्तरङ्गं देहेन्द्रियम्भोधिमिमं तरन्ति ॥
(वैराग्य० २७ । ८-९)

१९—जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन

५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जो कीर्तिसे जगत्‌को, प्रतापसे सम्पूर्ण दिशाओंके प्रदेशोंको, सम्पत्तिसे याचकोंके घरोंको और सात्त्विक बल (क्षमा, विनय, उदारता आदि) से लक्ष्मीको परिपूर्ण करते हैं तथा जिनके धैर्यका बन्धन कभी टूटता नहीं, वे महापुरुष इस पृथ्वीपर सुलभ नहीं हैं (परम दुर्लभ हैं)।* कोई पर्वतकी प्रस्तरमयी दीवारके भीतर (गहन गुफामें) निवास करता हो या वज्रनिर्मित अभेद्य दुर्गमें रहता हो, सभी मनुष्योंके पास प्रारब्धके अनुसार पुण्यके फल-स्वरूप सम्पत्तियाँ अणिमा आदि सिद्धियोंको साथ लिये सदा वेगपूर्वक चली आती हैं और पापके फलस्वरूप आपत्तियाँ भी निरन्तर अपने-आप आ जाती हैं। तात! पुत्र, स्त्री और धन—इन सबको मनुष्य भ्रमवश अपनी बुद्धिके द्वारा रसायनके समान सुखद मान लेता है; परंतु मृत्युकाल आनेपर वे सब-के-सब कोई उपकार नहीं करते, अपितु अत्यन्त रमणीय भोग भी उस समय विषपान करनेसे होनेवाली मूर्च्छाके समान दुःखदायी ही सिद्ध होते हैं। शरीरकी बाल्य और युवावस्थाओंके अन्तमें बुढ़ापेकी विषम अवस्थाको पहुँचा हुआ जराजीर्ण


* कीर्त्या जगदिकुहरं प्रतापैः श्रिया गृहं सत्त्वबलेन लक्ष्मीम् ।
ये पूरयन्त्यक्षतधैर्यबन्धा न ते जगत्यां सुलभा महान्तः ॥
(वैराग्य० २७ । ११)


शरीरवाला जीव विपद्मग्न हो इस लोकमें अपने संचित किये हुए धर्मशून्य (पापपूर्ण) भावों (कर्मों एवं विचारों) का स्मरण करके दुःसह अन्तर्ज्वालासे जलता रहता है। जीवनके प्रारम्भमें केवल काम, अर्थ और सकाम धर्मकी प्राप्तिके लिये ही जिन्होंने हृदयमें स्थान बना रखा है, उन क्रियाओंद्धारा ही अपने दिन बिताकर वृद्धावस्थाको पहुँचे हुए उन मनुष्योंका हिलते हुए मोरपंखके समान चञ्चल चित्त किस उपायसे विश्राम (सुख-शान्ति) लाभ करे ? (अर्थात् निष्काम धर्म या परमार्थ-साधनके बिना सुख-शान्तिका मिलना कठिन है)। इनको अभी करना है और उन्हें बादमें—इस प्रकार जिनके लिये चिन्ता की जाती है, वे आपात-रमणीय एवं परिणाममें अनर्थरूप सिद्ध होनेवाले कार्य स्त्रियों तथा अन्य लोगोंका मनोरञ्जनमात्र करते हुए वृद्धावस्थाके अन्ततक लोगोंके चित्तको वेगपूर्वक जीर्ण-शीर्ण (विवेकभ्रष्ट) करते रहते हैं। जैसे वृक्षोंके पत्ते उत्पन्न होकर थोड़े ही दिनोंमें पीले पड़कर झड़ जाते या नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मविवेकसे रहित मनुष्य इस लोकमें जन्म ले एक दूसरेसे मिलकर कुछ ही दिनोंमें साथ छोड़कर चल देते हैं।

भला, कौन समझदार मनुष्य दिनमें दूर-दूरतक व्यर्थ इधर-उधर घूमता हुआ ज्ञानी महापुरुषोंका सङ्ग एवं सत्कर्मका अनुष्ठान न करके सायंकाल घरमें लौटनेपर रातमें सुखकी नींद सो सकेगा ? समस्त शत्रुओंको मार भगानेपर जब चारों ओरसे धन-सम्पत्ति प्राप्त होने लगती है, उस समय पुरुष, जबतक इन विषयसुखोंके सेवनमें लगता है, तबतक ही मृत्यु कहींसे सहसा आ धमकती है। जो किसी कारणसे वृद्धिको प्राप्त होकर भी क्षणभरमें ही नष्ट होते देखे गये हैं, उन अत्यन्त तुच्छ विषय-भोगोंद्वारा इधर-उधर भटकायी जाती हुई जनता इस भूतलपर अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान

२०—श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निःसारता * ५७


पाती, यह कितने आश्चर्यकी बात है । समुद्रकी क्षणभङ्गुर लहरोंके समान यह चपल जनता इस भूतलपर निरन्तर कहींसे वेगपूर्वक आती और फिर सदा वेगसे ही चली जाती है । जैसे चञ्चल भ्रमररूपी नेत्रों और लाल पल्लवरूपी अधरोंवाली तथा विष-वृक्षपर चढ़कर फैली हुई चञ्चल विष-लताएँ देखनेमें अति सुन्दर होनेके कारण पहले मनको हर लेती हैं, पीछे सेवन करनेपर प्राणोंका नाश कर देती हैं, उसी प्रकार लाल अधरों और भ्रमरतुल्य चञ्चल नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ मनोहारिणी होनेके कारण पहले तो मनुष्योंके चित्तको चुराती हैं, फिर सर्वथा उनके प्राणोंका अपहरण करनेवाली बन जाती हैं । जैसे तीर्थयात्रा अथवा देवोत्सवमें बहुत-से मनुष्योंका मेला जुट जाता है, उसी प्रकार इस लोक और परलोकसे व्यर्थ ही आये हुए और अमुक स्थानपर हमलोगोंकी भेंट होगी, इस तरह आपसके संकेतयुक्त अभिप्रायसे एकत्र हुए लोगोंका जो स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके रूपमें यहाँ मिलन होता है, यह व्यवहार मायामय ही है। यह संसार वेगपूर्वक घूमनेवाले कुलालचक्रके समान है। यद्यपि यह वर्षा ऋतुके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभङ्गुर है, तथापि असावधान मनुष्योंकी बुद्धिमें अपनी चिरस्थायिताकी ही प्रतीति कराता है ।

जहाँ दैववश बारंबार जन्म लेकर अपने शरीरको धारण करके छाया, पत्र और पुष्प आदिके द्वारा निरन्तर प्राणियोंका उपकार करनेवाला वृक्ष भी कुल्हाड़ीसे काट दिया जाता है, उस संसारमें मनुष्य-जैसा अपराधी और उपकारशून्य प्राणी सदा जीवित ही रहेगा, ऐसा विश्वास करनेके लिये कौन-सा कारण है ? विषका वृक्ष और विषयासक्त मनुष्य दोनों ऊपरसे बड़े मनोहर लगते हैं, किंतु उनके भीतर बड़ा भारी दोष भरा रहता है । एक (विषवृक्ष) हृदयस्थित प्राणोंके विनाशके लिये खड़ा है तो दूसरा (विषयासक्त मनुष्य) आन्तरिक शान्तिके विघातके लिये तैयार रहता है। इनके सङ्गसे तत्काल मूर्छा या मूढ़ता ही प्राप्त होती है । संसारमें ऐसी कौन-सी दृष्टियाँ हैं, जिनमें दोष नहीं है ? वे कौन-सी दिशाएँ हैं, जहाँ दुःख और दाह नहीं है ? वे कौन-से जीव-शरीर हैं, जो क्षणभङ्गुर नहीं हैं ! और कौन-सी लौकिक क्रियाएँ हैं, जिनमें छल-कपट नहीं है ? बीते हुए और आनेवाले अनन्त कल्पोंकी संख्याका परिज्ञान नहीं होता । इसलिये जैसे क्षण अनन्त हैं, उसी प्रकार कल्प भी अनन्त हैं। भगवान् विष्णु और रुद्र आदिकी दृष्टिमें कल्प भी क्षण ही हैं। अतः ब्रह्मलोकके निवासी भी कल्प नामधारी एक क्षणतक ही जीनेवाले हैं । इसलिये कलाओं (विभिन्न अंशो) से सुशोभित होनेवाले कालसमूहमें लघुत्व और दीर्घत्व—चिरजीवन और क्षणजीवनकी बुद्धि भी द्रष्टाकी कल्पनाके अधीन होनेके कारण असत्य ही है । सर्वत्र पत्थरके ही पहाड़ हैं—उनमें पत्थरके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसी तरह सब जगह मिट्टीकी ही पृथ्वी हैं, काष्ठके ही वृक्ष हैं और हाड़-मांसके ही मनुष्य हैं। लोगोंके बनाये हुए संकेतके अनुसार ही उनके विशेष नाम आदि भाव नियत हो गये हैं। इस भोग्यवर्गमें कोई भी वस्तु विकारसे हीन अथवा अपूर्व नहीं है। सब कुछ विकाररूप होनेके कारण ही असत्य है । जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत ही परस्पर मिलकर घट-पट आदि नाना पदार्थोंके रूपमें अविवेकी पुरुषोंको प्रतीत होते हैं । चेतनके सान्निध्यसे ही उन्हें पदार्थोंकी प्रतीति होती है । विवेक-दृष्टिसे पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक आलोचना करनेपर यह जगत् पाँच भूतोंसे अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं सिद्ध होता ।

महात्मन् ! मिथ्या होनेपर भी इस पदार्थ-समूहके विषयमें व्यवहार-कुशलताके कारण विद्वान् पुरुषोंके भी मनमें भोगसम्बन्धी चमत्कार (चेष्टा) को उत्पन्न करनेवाली जो व्यवहार-चमत्कृति या प्रवृत्ति देखी जाती है,


१. कुम्हारका चाक ।

५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कभी-कभी स्वप्नमें मिथ्याभूत विषयको लक्ष्य करके भी किन्हीं लोगोंकी उस प्रकार चमत्कारपूर्ण प्रवृत्ति होती देखी जाती है।

जैसे पशु किसी हरी-हरी लताके फलको पानेकी इच्छासे ही आगे बढ़नेपर निस्संदेह पर्वतशिखरसे गिर जाता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुषोंके पद (स्थान या धन-वैभव आदि) को हठात् लेनेकी इच्छा रखनेवाला पुरुष राग-लोभ आदि दोषोंसे दूषित हुए अपने चित्तके द्वारा ही मारा जाकर अवश्य पतनके गर्तमें गिर जाता है।

(सर्ग २७)


जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम रूप दृश्य जगत् दिखायी देता है, वह सब सपनेमें लगे हुए मेलेके समान अस्थिर है—चिरकालतक टिकनेवाला नहीं। आज जिस शरीरको रेशमी वस्त्र, फूलोंके हार तथा भाँति-भाँतिके अनुलेपनोंसे सजाया गया है, वही कल नंगा होकर ग्राम या नगरसे बहुत दूर किसी गड्ढेमें पड़ा-पड़ा सड़ जायगा। जिस स्थानमें आज विचित्र आहार-व्यवहार और चहल-पहलसे भरा हुआ चञ्चल-सा नगर देखा गया है, वहीं कुछ ही दिनोंमें सूने वनके धर्मका उदय हो जायगा—वह भूमि गहन वनके समान निर्जन एवं अगम्य हो जायगी। जो पुरुष आज तेजस्वी है और अनेक मण्डलोंपर शासन करता है, वही कुछ दिनोंके अनन्तर राखका ढेर बन जाता है। आज जो आकाशमण्डलके समान नीला और महाभयंकर वन है, वही कुछ कालके पश्चात् ध्वजा-पताकाओंसे आकाशको ढक देनेवाला विशाल नगर बन जाता है। आज जो लता-वल्लरियोंसे आवेष्टित भयंकर वनश्रेणी दृष्टिगोचर होती है, वही कतिपय दिनोंमें ही मरुभूमि (रेगिस्तान) का स्थान ग्रहण कर लेती है। जल स्थल हो जाता है और स्थल जल। काठ, जल और तिनकोंसहित सारा जगत् ही विपरीत अवस्थाको प्राप्त होता रहता है। जवानी, बचपन, शरीर और द्रव्यसंग्रह—ये सब-के-सब अनित्य हैं और तरङ्गकी भाँति निरन्तर एक भावसे दूसरे भावको प्राप्त होते रहते हैं। इस संसारमें प्राणियोंका जीवन हवासे भरे स्थानमें रक्खे हुए दीपककी लौके समान चञ्चल (शीघ्र ही बुझ जानेवाला) है और तीनों लोकोंके सम्पूर्ण पदार्थोंकी शोभा (चमक-दमक) बिजलीकी चमकके समान क्षणिक है।

महर्षे ! वे उत्सव और वैभवसे सुशोभित होनेवाले दिन, वे महाप्रतापी पुरुष, वे प्रचुर सम्पत्तियाँ तथा वे बड़े-बड़े कर्म—सब-के-सब दृष्टिपथसे दूर हो केवल स्मरणके विषय रह गये हैं। इसी तरह हम भी क्षणभरमें अज्ञात स्थानको चले जायँगे और लोगोंके लिये केवल स्मरणीय बनकर रह जायँगे। यह संसार प्रतिदिन नष्ट होता है और प्रतिदिन पुनः उत्पन्न हो जाता है। अतः आजतक इस नष्टप्राय जले हुए संसारका अन्त नहीं हुआ। प्रभो ! मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिको प्राप्त होते हैं। पशु-पक्षी मानवजन्म धारण करते हैं तथा देवता भी देवेतर योनियोंमें जन्म लेते हैं। फिर इस संसारमें कौन-सी वस्तु स्थिर है ? स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ—ये सब-के-सब विनाशरूपी बड़वानलके लिये सूखे ईंधनके समान हैं। धन, भाई-बन्धु, भृत्यवर्ग, मित्र तथा वैभव—ये सब-के-सब विनाशके भयसे डरे हुए पुरुषके लिये नीरस ही हैं। मुनीश्वर ! जगत्‌में मनुष्य क्षणभरमें ऐश्वर्य (धन-वैभव) प्राप्त कर लेता है और क्षणभरमें दरिद्र हो जाता है। वह क्षणभरमें ही रोगी और क्षणभरमें नीरोग हो जाता है। इस प्रकार प्रतिक्षण विपरीत अवस्था प्रदान करनेवाले इस नश्वर जगत्रूपी भ्रमसे कौन


१. यहाँ बड़वानलका अर्थ अग्निमात्र समझना चाहिये।

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ५९


बुद्धिमान् मनुष्य मोहित नहीं हुए हैं ? ( इस भ्रमने सभी लोगोंको मोहमें डाल रक्खा है । )

आकाशमण्डल क्षणभरमें ही अन्धकाररूपी कीचड़से ढक जाता है, फिर क्षणभरमें ही सुवर्णद्रवके समान शीतल मृदुल चाँदनी आदिके उज्ज्वल प्रकाशसे उद्भासित हो परम सुन्दर दिखायी देने लगता है । दूसरे ही क्षण मेघरूपी नील कमलोंकी मालासे उसका अन्तःप्रदेश ( वक्ष एवं उदर ) ढक जाता है । क्षणभरमें ही वहाँ उच्चस्वरसे मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगती है और क्षणमें ही वह मूककी भाँति नीरव हो जाता है । क्षणमें ही ताराओंकी हारावलीसे अलंकृत और क्षणमें ही सूर्यरूपी मणिसे विभूषित हो जाता है । क्षणमें ही वहाँ चन्द्रमाकी चटकीली चाँदनीसे आह्लाद छा जाता है और क्षणभरमें ही वह सबसे सूना हो जाता है । इस तरह जैसे आकाशकी स्थिति क्षण-क्षणमें बदलती रहती है, उसी प्रकार संसारके सभी पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तनशील हैं । महर्षे ! संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो धीर होता हुआ भी क्षणभरमें स्थित और क्षणभरमें नष्ट होनेवाली, आवागमनकी परम्परासे युक्त इस सांसारिक स्थितिसे भयभीत नहीं होता ? मुने ! यहाँ क्षणभरमें आपत्तियाँ आती हैं और क्षणभरमें सम्पत्तियाँ । क्षणमें ही जन्म होता है और क्षणमें ही मृत्यु । इस जगत्में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो क्षणिक न हो ? भगवन् ! यहाँ उत्पन्न हुआ मनुष्य पहले कुछ और ही था और थोड़े दिनों बाद अन्य प्रकारका हो जाता है । यहाँ सदा एकरूप रहनेवाली सुस्थिर वस्तु कोई नहीं है । यहाँ कायरके द्वारा शूरवीर मारा जाता है । एक ही व्यक्तिके हाथसे सैकड़ों मनुष्य मारे जाते हैं और साधारण लोग भी राजा बन बैठते हैं । इस प्रकार यह सारा जगत् विपरीत अवस्थामें परिवर्तित होता रहता है । बाल्यावस्था थोड़े ही दिनोंमें चली जाती है, फिर यौवनकी शोभा छा जाती है और कुछ ही दिनोंमें वह भी समाप्त हो जाती है । तत्पश्चात् वृद्धावस्थाका पदार्पण होता है । जब हमारे शरीरमें भी एकरूपता ( स्थिरता ) नहीं है, तब बाह्य वस्तुओंमें एकरूपताका विश्वास क्या हो सकता है ! उत्पन्न और विनष्ट होनेवाले संसारी पुरुषोंकी न तो आपत्तियाँ स्थिर रहती हैं और न सम्पत्तियाँ ही । यह काल चतुर मनुष्योंको भी अवहेलनापूर्वक विपरीत स्थितियोंमें परिवर्तित करनेके कार्यमें अत्यन्त कुशल है । प्रायः सब लोगोंको आपत्तिमें ढकेलकर यह क्रीड़ा करता है ।

( सर्ग २८ )


श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! विषयभोग दुःख-रूप और अनित्य हैं, इस प्रकार विषयोंमें दोष-दर्शनरूपी दावानलके द्वारा मेरा चित्त दग्ध हो निर्मल एवं महान् हो गया है । अतः जैसे जलाशयोंमें मृगतृष्णाका उदय नहीं होता, उसी तरह मेरे उस चित्तमें भोगोंकी आशा अङ्कुरित नहीं होती । जैसे नीमके वृक्षपर फैली हुई रसहीन गिलोय काल पाकर उत्तरोत्तर कड़वी होती जाती है, उसी प्रकार यह सांसारिक स्थिति भी दिन-प्रति-दिन तीव्र वैराग्यके कारण मेरे लिये अधिकाधिक कटुताको प्राप्त हो रही है । मुनीश्वर ! विविध चिन्ताओंसे परिपूर्ण भोग-समूहों एवं राज्योंकी अपेक्षा चिन्तारहित महात्मा पुरुषोंद्वारा स्वीकृत एकान्त-सेवन ही मुझे अच्छा लगता है। सुन्दर उद्यान मुझे आनन्द नहीं देता, स्त्रियोंसे मुझे सुख नहीं मिलता और धनकी आशापूर्तिसे मुझे हर्ष नहीं होता । मनके साथ-साथ शान्ति मैं पाना चाहता हूँ । मैं न तो मृत्युका अभिनन्दन और न जीवनका ही स्वागत करता हूँ। जिस तरह संतापरहित होकर स्थित हूँ, उसी तरह रह रहा हूँ; मुझे राज्यसे, भोगोंसे, धनसे और नाना प्रकारकी

२१—श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्य-चकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा

६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चेष्टाओंसे भी क्या प्रयोजन है ? अहंकारवश ही मनुष्य इन राज्य आदिसे सम्बन्ध रखता है, किंतु मेरा वह अहंकार ही गल गया है (अतः मेरे लिये इनकी आवश्यकता नहीं रह गयी है) । जैसे हाथी अपने खुरोंके प्रहारसे कोमल कमलको कुचल डालता है, उसी प्रकार कामदेवने मानवती कामिनियोंके द्वारा मनुष्योंके मनको मथ डाला है । मुनीन्द्र ! यदि अभी निर्मल बुद्धिके द्वारा इस चित्तकी चिकित्सा नहीं की जाती तो फिर इसकी चिकित्साका अवसर ही कहाँ रह जायगा ? (क्योंकि रोग बढ़ जानेपर उसकी चिकित्सा कठिन हो जाती है ।) विषयोंकी विषमता ही विष है । लोकप्रसिद्ध विषको वास्तवमें विष नहीं कहा जाता, क्योंकि विष एक ही शरीरका (जिसके द्वारा उसका सेवन किया जाता है, उसीका) नाश करता है, परंतु विषय (-विष) जन्म-जन्मान्तरोंतक जीवको मौतके मुँहमें डालते रहते हैं । सुख-दुःख, मित्र, भाई-बन्धु, जीवन और मरण—ये सब (बन्धनकेकारण होते हुए भी ) ज्ञानी पुरुषके चित्तको नहीं बाँधते (अज्ञानीका ही मन इससे बँधता है) ।

ब्रह्मन् ! आप प्राचीन और अर्वाचीन बातोंके जाननेवाले महात्माओंमें श्रेष्ठ हैं । इसलिये जिस प्रकार मैं शोक, भय और खेदसे मुक्त हो यथार्थ ज्ञानसे सम्पन्न हो जाऊँ, वैसा उपदेश मुझे शीघ्र प्रदान कीजिये । अज्ञान एक भयंकर वनके समान है । जैसे वनमें मृगोंको फँसानेके लिये जाल बिछे होते हैं, काँटेदार झाड़-झंखाड़ फैले रहते हैं तथा जगह-जगह बहुत-से ऊँचे-नीचे स्थान रहते हैं, उसी प्रकार अज्ञानरूपी वन भी विषयवासनाके जालसे आवेष्टित, दुःखरूपी कण्टकोंसे व्याप्त तथा सम्पत्ति-विपत्ति-रूपी ऊँचे-नीचे स्थानोंसे युक्त है। महात्मन् ! जैसे रातमें ऐसी अन्धकार-राशि नहीं होती, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे नष्ट न हो जाती हो, उसी प्रकार संसारमें ऐसी दुश्चिन्ताएँ नहीं हैं, जो उत्तम अन्तःकरणवाले महात्मा पुरुषोंके सङ्गसे क्षीण न हो जायें । आयु वायुसे टकरायी हुई मेघोंकी घटासे झरते हुए जल-बिन्दुओंके समान क्षणभङ्गुर है । भोग मेघमालाके बीचमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं तथा युवावस्थाके मनोरञ्जन जलके वेगके समान चपल हैं—ऐसा विचारकर मैंने इन सबको त्याग दिया और तुरंत ही चिरकालतक बनी रहनेवाली शान्तिको आजसे अपने चित्तपर शासन करनेके लिये सुदृढ़ अधिकार-मुद्रा समर्पित कर दी है ।*

जैसे मृग तुच्छ तृणोंके लोभसे ठगे जाकर गड्डोंमें गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार अन्तःकरणकी वृत्तियाँ निस्सार विषयोंद्वारा ठगी जाती और विक्षेपरूपी दुःखोंको भोगनेके लिये उनके गहरे गर्तमें गिर जाती हैं । जैसे देवता विविध भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा चतुर्दश भुवनोंके भीतर विचरण करनेवाले अपने शीघ्रगामी विमानका परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार विविध भोगवासनाओंसे विस्तारको प्राप्त हुआ और समस्त लोकोंमें बे रोक-टोक विचरनेवाला मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त भी कभी चपलताको नहीं छोड़ता ।

अतः महात्मन् ! जन्म-मरण आदि दुःखोंसे रहित, देह आदि उपाधियोंसे शून्य तथा भ्रान्ति-रहित वह महान् विश्रान्तिदायक परमपद कौन-सा है, जहाँ पहुँच जानेसे शोकका अभाव हो जाता है ? समस्त कर्मोंका सुचारुरूपसे अनुष्ठान करनेवाले तथा सदा लौकिक व्यवहारमें ही तत्पर रहनेवाले जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पदको प्राप्त हुए ? दूसरोंको अधिक मान देनेवाले महामुने ! वह कौन-सा उपाय है, जिससे संसाररूपी पङ्कका अनेक अङ्गोंसे सम्पर्क हो जानेपर भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता ? किस दृष्टि (बुद्धि) का


* जैसे राजा दुष्ट अधिकारियोंसे शासनका अधिकार छीनकर किसी गुणवान्‌को उस पदपर प्रतिष्ठित करनेके लिये अधिकार-पत्र देता है, उसी प्रकार मैंने चित्तभूमिसे भोगवासना आदिका अधिकार हटाकर वहाँ शाश्वत शान्तिको प्रतिष्ठित किया है ।

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ६१


आश्रय लेकर आप-जैसे पापरहित महामना महापुरुष इस जगत्में जीवन्मुक्त होकर विचरते हैं ? जिसे मोहरूपी मतवाले हाथीने मथ डाला है, जिसके भीतर काम आदि दोषोंकी कीचड़ भरी पड़ी है, वह प्रज्ञारूपी महान् सरोवर किस उपायसे अत्यन्त निर्मल हो जाता है ? जैसे कमलके पत्तेसे जलका लगाव नहीं होता, उसी प्रकार प्रवाहरूपसे बने रहनेवाले इस संसारमें समस्त व्यवहारोंका निर्वाह करता हुआ भी मनुष्य बन्धनमें न पड़े—इसका क्या उपाय है ? सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्माके समान तथा इस समस्त भोग-प्रपञ्चको तिनकेके समान समझनेवाला और मनकी कामादि वृत्तियोंका स्पर्श न करनेवाला मनुष्य कैसे श्रेष्ठ पदको प्राप्त हो सकता है ? जिसने संसाररूपी महासागरको पार कर लिया हो, ऐसा कौन-सा महापुरुष है, जिसके चरित्रका अनुसरण करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता ? वह प्राप्त करने योग्य कल्याण और फल क्या है ? इस विषय-संसारमें (इसे पार करनेके लिये) कैसे व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! मुझे तत्त्वका कुछ उपदेश दीजिये, जिससे मैं ब्रह्माजीके द्वारा रचित इस अव्यवस्थित जगत्का पूर्वापर (आदि-अन्त) समझ सकूँ । इस संसारमें ग्रहण करने योग्य वस्तु क्या है ? त्याज्य वस्तु क्या है ? तथा इन दोनोंसे भिन्न अग्राह्य एवं अत्याज्य वस्तु क्या है ? मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त किस प्रकार पर्वतके समान स्थिरता एवं शान्तिको प्राप्त करे ? किस पावन मन्त्रसे सैकड़ों क्लेशोंकी सृष्टि करनेवाला यह दोष-युक्त संसाररूपी विसूचिका (हैजा) का रोग अनायास शान्त हो सकता है ? महात्मन् ! जैसे वनमें कुत्ते विभिन्न जन्तुओंके अधमरे शरीरको पीड़ित करते रहते हैं, उसी तरह नाना प्रकारके संशय मर्यों कुछ आनन्दमय ब्रह्म-पदमें आत्यन्तिक निष्ठासे रहित पुरुषको सदा कष्ट देते रहते हैं।

मुनीश्वर ! ऐसा कौन-सा उपाय है, क्या गति है, कौन-सा चिन्तन है, क्या आश्रय है तथा कौन-सा साधन है, जिसका अवलम्बन करनेसे यह जीवनरूपी वन भविष्यमें अमङ्गलकारी न हो ? भगवन् ! इस पृथ्वीपर, स्वर्गमें अथवा देव-समाजमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुच्छ होनेपर भी आप-जैसे परम बुद्धिमान् महात्मा रमणीय न बना दें। यह नश्वर संसार निरन्तर दुःखोंसे परिपूर्ण और नीरस है। कृपया यह बताइये कि यह किस उपायसे अज्ञानके निवारणपूर्वक परमानन्दरूप उत्तम स्वादसे युक्त हो जाता है। मुने ! यह मनरूपी चन्द्रमा कामसे कलङ्कित हो रहा है। इसे किस साधन एवं विधिसे धोया जाय कि उससे अत्यन्त निर्मल एवं परम आह्लादमयी दिव्य चाँदनीका उदय हो। जिसे संसारकी गतिका अनुभव है और जिसने निष्कामभावके द्वारा दृष्ट एवं अदृष्ट कर्मफलोंका विनाश कर दिया है, ऐसे किस महापुरुषकी भाँति हमें इस संसाररूपी वनकी गलियोंमें विचरते समय व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! किस उपायका आश्रय लिया जाय, जिससे संसाररूपी वनमें विचरनेवाले जीवको राग-द्वेषरूपी बड़े-बड़े दोष तथा भोग-समूह एवं ऐश्वर्यरूपी हिंसक जन्तु कष्ट न दे सकें ! मुनिश्रेष्ठ ! तीनों लोकोंमें मनकी जो मननशालिनी सत्ता (विषय-चिन्तनरूप अस्तित्व) है, उसे किसी साधनरूप युक्तिके बिना नष्ट नहीं किया जा सकता। अतः आप उस उत्तम युक्तिका पूर्णरूपसे उपदेश कीजिये। अथवा जिसका अवलम्बन करनेसे लोकव्यवहारमें तत्पर रहनेपर भी मुझे दुःख प्राप्त न हो सके, उस व्यवहार-सम्बन्धिनी उत्तम युक्तिका प्रतिपादन कीजिये। किस उत्तम चित्तवाले महापुरुषने पहले युक्तिके द्वारा मोहका निवारण किया था ? उसने किस प्रकार और क्या किया था; जिससे उसका मन परम पवित्र होकर शान्तिको प्राप्त हो गया ? भगवन् ! मोहकी निवृत्तिके लिये आप-जैसा, जो कुछ भी जानते हैं, उसका उसी रूपमें मुझे उपदेश कीजिये। वह कौन-सा साधन है, जिसका आश्रय लेनेसे अनेक श्रेष्ठ पुरुष दुःखरहित स्थिति (कल्याण) को प्राप्त हो गये हैं ?

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जैसे मोर महान्

६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मेघोंकी घटाओंके सम्मुख केकारव करके थक जानेके कारण चुप हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल चन्द्रमाके समान मनोहर एवं महान् तत्त्वविचारसे विकसित चित्तवाले श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठ आदि महान् गुरुजनोंके समक्ष उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये ।

( सर्ग २९–३१ )


श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्यचकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलनयन राजकुमार श्रीराम जब इस प्रकार मनके मोहका निवारण करनेवाली बात कहने लगे, तब वहाँ बैठे हुए सब लोगोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे । उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ वैराग्यकी वासनासे नष्ट हो गयीं और वे सब लोग दो घड़ीके लिये मानो अमृतमय समुद्रकी तरङ्गोंमें डूबने-उतराने लगे । श्रीरामचन्द्रजीकी वे बातें जिन लोगोंने सुनीं, वे निश्चलताके कारण चित्रलिखित-से प्रतीत होते थे । उनका हृदय आनन्दसे भर गया था । सभामें बैठकर जिन श्रवणसमर्थ पुरुषोंने श्रीरामकी बातें सुनीं, उनके नाम इस प्रकार हैं— वसिष्ठ-विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रणाकुशल जयन्त और धृष्टि आदि मन्त्री, दशरथ आदि नरेश, पुरवासी, पारशव आदि संकर जातिके लोग, विभिन्न सामन्त, लक्ष्मण आदि राजकुमार, वेदवेत्ता ब्राह्मण, भृत्य और अमात्य । अपने महलकी खिड़कियोंमें बैठी हुई महारानी कौसल्या आदि वनिताएँ भी निश्चल होकर श्रीरामकी बातें सुन रही थीं । उस समय उनके आभूषणोंकी खनखनाहटतक नहीं होती थी । आकाशचारी सिद्ध, गन्धर्व, किंनर, नारद, व्यास और पुलह आदि श्रेष्ठ मुनियोंने तथा देवता, देवराज इन्द्र, विद्याधरगण एवं महान् दिव्य नागोंने भी श्रीरामचन्द्रजीकी वे विचित्र अर्थसे परिपूर्ण और परम उदार बातें सुनी थीं ।

रघुकुलरूपी आकाशके चन्द्रमा तथा शशिसे भी सुन्दर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी जब उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये, तब 'साधुवाद' के गम्भीर घोषके साथ आकाशसे सिद्धसमूहोंद्वारा ऐसी पुष्पवृष्टि की गयी, जिससे वहाँ चंदोवा-सा तन गया । फूलोंकी उस वर्षामें ढेर-के-ढेर केवड़ेके फूल चक्कर काट रहे थे । कमलोंके गुच्छ अपनी अद्भुत छटा दिखा रहे थे । कुन्दपुष्पोंकी राशि झड़ रही थी तथा हवामें उड़ते हुए नील कमलोंके पुञ्ज बिखर रहे थे । उस महलके आँगनकी भूमि पट गयी । घर, छत और चबूतरे आच्छादित हो गये तथा नगरके सभी स्त्री-पुरुष अपनी गर्दन ऊँची करके उस पुष्पवर्षाकी शोभा निहारने लगे । आकाशमें खड़े हुए अदृश्य सिद्ध-समूहोंद्वारा की गयी वह पुष्पवृष्टि आधी घड़ीतक लगातार होती रही । सभा और उसमें बैठे हुए लोगोंको आच्छादित-सा करके जब वह पुष्पवर्षा बंद हुई, तब सभासदोंने सिद्धसमूहोंका यह वार्तालाप अपने कानोंसे सुना—

"सृष्टिके आरम्भसे लेकर अबतक सिद्धोंके समुदायमें रहकर स्वर्गके सारे प्रदेशोंमें घूमते हुए हमलोगोंने आज ही वेदोंका सारभूत एवं कानोंके लिये अमृतके समान सुखद यह अपूर्व प्रवचन सुना है । वीतराग होनेके कारण इन रघुकुलचन्द्र श्रीरामने जो उदार बातें कही हैं, उन्हें सम्भवतः बृहस्पतिजी भी नहीं जानते होंगे । अहो ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमलोगोंने श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दसे प्रकट हुआ यह परम पुण्यमय प्रवचन सुना है, जो अन्तःकरणको


१. मोरकी बोलीको केका कहते हैं ।