भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता * ५५


फँसकर पुनर्जन्मरूपी जंगलमें नष्ट हो जाते हैं। इस संसारमें लोगोंकी आयु विभिन्न जन्मोंमें किये गये कुकर्मोंसे नष्ट हो रही है। यदि आकाशमें वृक्ष हो, उस वृक्षमें लता हो और उस लतासे गलेमें फाँसी लगाकर मनुष्यको लटका दिया जाय तो उससे जो दुःख होगा, वैसा ही दुःखमय फल उन कुकर्मोंका भी बताया गया है। उस दुःखकी निवृत्तिके लिये उपाय करना तो दूरकी बात है, उस उपायका विचार करनेवाले लोग भी यहाँ हैं या नहीं, हमें इसीका पता नहीं है। मुनीश्वर ! इस संसारमें लोगोंकी बुद्धि चञ्चल और मृदु है। उसी बुद्धिसे युक्त मनुष्य व्यर्थ ही अनेक संकल्प-विकल्पोंका जाल रचते हुए कहते हैं—'आज उत्सव है।' यह बड़ी सुहावनी ऋतु है, इसमें यात्रा करनी चाहिये, ये लोग हमारे भाई-बन्धु हैं और यह सुख विशिष्ट भोगोंसे युक्त है, इन्हीं संकल्पोंमें पड़े-पड़े वे सब लोग एक दिन कालके गालमें चले जाते हैं। (सर्ग २६)


सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—तात ! मुनीश्वर ! इस जगत्का स्वरूप अत्यन्त अरमणीय (अभद्र) है, तो भी यह ऊपरसे मनोरम प्रतीत होता है। इसमें कोई ऐसा पदार्थ मेरी दृष्टिमें नहीं आता, जिसके प्राप्त होनेसे चित्त-को अत्यन्त विश्राम (परम सुख) मिल सके। बाल्यावस्था विचित्र प्रकारसे कल्पित क्रीडा-कौतुकमें ही चपलता-पूर्वक बीत जाती है। युवावस्था आनेपर मनरूपी मृग स्त्रीरूपिणी गुफाओंमें ही रमता हुआ जीर्ण हो जाता है; फिर वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर जब यह शरीर जर्जर हो जाता है, उस समय जनसमुदाय केवल दुःख-ही-दुःख भोगता रहता है (उसे कहीं कभी भी सुख-शान्ति-का लेश भी प्राप्त नहीं होता)। बुढ़ापारूपी हिमकी वर्षासे जब देहरूपिणी कमलिनी नष्ट हो जाती है, उस समय प्राणरूपी भ्रमर इसे छोड़कर दूर, बहुत दूर चला जाता है। उस दशामें उस मनुष्यके लिये यह संसार-रूपी सरोवर शुष्क (नष्ट) हो जाता है। इस संसारमें तृष्णा नामकी नदी निरन्तर बहती रहती है, जिसने अपने प्रबल प्रवाहके वेगसे यहाँके समस्त अनन्त पदार्थों-को ग्रस लिया है (नष्ट कर दिया है)। यह संतोष-रूपी तटवर्ती वृक्षकी जड खोदनेमें बड़ी दक्ष है। संसाररूपी समुद्रमें चमड़ेसे मढ़ी हुई शरीररूपिणी नौका क्षुधा, पिपासा आदि विविध तरङ्गोंसे आहत हो हिलती-डोलती हुई इधर-उधर घूम रही है। पाँच इन्द्रिय नामक ग्राह इसे टक्कर मारकर डुबानेके लिये उद्यत रहते हैं। इस तरह यह नौका क्रमशः नीचे जा रही है—डूबना चाहती है। इसमें धैर्य और वैराग्यसे सुशोभित होनेवाले विवेकी जीव नहीं बैठे हैं। जहाँ तृष्णारूपिणी लताओंका ही प्राबल्य है, ऐसे संसाररूपी वनोंमें विचरनेवाले ये मनरूपी बंदर कामरूपी वृक्षोंकी सैकड़ों शाखाओंपर भटकते हुए अपनी आयु नष्ट करते हैं, परंतु कभी मनोवाञ्छित फल नहीं पाते। महर्षे ! आपत्तियोंकी प्राप्ति होनेपर भी दुःख और मोह जिनसे दूर ही रहते हैं, स्वास्थ्य और सम्पत्तिमें भी जो अहंकार-शून्य मनसे सुशोभित होते हैं तथा सुन्दरी रमणियों जिनके अन्तःकरणमे चोट नहीं पहुँचातीं (विकार नहीं उत्पन्न करतीं), ऐसे महात्मा पुरुष इस समय अत्यन्त दुर्लभ हैं। जो हाथियोंकी सेनारूपी तरङ्गोसे उद्वेलित होनेवाले समर-सागरको अपने बल-विक्रमके द्वारा पार कर जाते हैं, मेरी दृष्टिमें वे शूरवीर नहीं हैं। मैं तो उन्हींको शूरवीर मानता हूँ, जो मनरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण इस देह और इन्द्रिय-रूपी समुद्रको विवेक, वैराग्य आदिके द्वारा बाँध जाते हैं।*


* कृच्छ्रेषु दूरास्त विषादमोहाः स्वास्थ्येषु नोत्सिक्तमनोऽभिरामाः ।
सुदुर्लभाः सम्प्रति सुन्दरीभिरनाहतान्तःकरणा महान्तः ॥
तरन्ति मातङ्गघटातरङ्गं रणाम्बुधिं ये नहि ते न शूराः ।
शूरास्त एवेह मनस्तरङ्गं देहेन्द्रियम्भोधिमिमं तरन्ति ॥
(वैराग्य० २७ । ८-९)

१९—जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन

५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जो कीर्तिसे जगत्‌को, प्रतापसे सम्पूर्ण दिशाओंके प्रदेशोंको, सम्पत्तिसे याचकोंके घरोंको और सात्त्विक बल (क्षमा, विनय, उदारता आदि) से लक्ष्मीको परिपूर्ण करते हैं तथा जिनके धैर्यका बन्धन कभी टूटता नहीं, वे महापुरुष इस पृथ्वीपर सुलभ नहीं हैं (परम दुर्लभ हैं)।* कोई पर्वतकी प्रस्तरमयी दीवारके भीतर (गहन गुफामें) निवास करता हो या वज्रनिर्मित अभेद्य दुर्गमें रहता हो, सभी मनुष्योंके पास प्रारब्धके अनुसार पुण्यके फल-स्वरूप सम्पत्तियाँ अणिमा आदि सिद्धियोंको साथ लिये सदा वेगपूर्वक चली आती हैं और पापके फलस्वरूप आपत्तियाँ भी निरन्तर अपने-आप आ जाती हैं। तात! पुत्र, स्त्री और धन—इन सबको मनुष्य भ्रमवश अपनी बुद्धिके द्वारा रसायनके समान सुखद मान लेता है; परंतु मृत्युकाल आनेपर वे सब-के-सब कोई उपकार नहीं करते, अपितु अत्यन्त रमणीय भोग भी उस समय विषपान करनेसे होनेवाली मूर्च्छाके समान दुःखदायी ही सिद्ध होते हैं। शरीरकी बाल्य और युवावस्थाओंके अन्तमें बुढ़ापेकी विषम अवस्थाको पहुँचा हुआ जराजीर्ण


* कीर्त्या जगदिकुहरं प्रतापैः श्रिया गृहं सत्त्वबलेन लक्ष्मीम् ।
ये पूरयन्त्यक्षतधैर्यबन्धा न ते जगत्यां सुलभा महान्तः ॥
(वैराग्य० २७ । ११)


शरीरवाला जीव विपद्मग्न हो इस लोकमें अपने संचित किये हुए धर्मशून्य (पापपूर्ण) भावों (कर्मों एवं विचारों) का स्मरण करके दुःसह अन्तर्ज्वालासे जलता रहता है। जीवनके प्रारम्भमें केवल काम, अर्थ और सकाम धर्मकी प्राप्तिके लिये ही जिन्होंने हृदयमें स्थान बना रखा है, उन क्रियाओंद्धारा ही अपने दिन बिताकर वृद्धावस्थाको पहुँचे हुए उन मनुष्योंका हिलते हुए मोरपंखके समान चञ्चल चित्त किस उपायसे विश्राम (सुख-शान्ति) लाभ करे ? (अर्थात् निष्काम धर्म या परमार्थ-साधनके बिना सुख-शान्तिका मिलना कठिन है)। इनको अभी करना है और उन्हें बादमें—इस प्रकार जिनके लिये चिन्ता की जाती है, वे आपात-रमणीय एवं परिणाममें अनर्थरूप सिद्ध होनेवाले कार्य स्त्रियों तथा अन्य लोगोंका मनोरञ्जनमात्र करते हुए वृद्धावस्थाके अन्ततक लोगोंके चित्तको वेगपूर्वक जीर्ण-शीर्ण (विवेकभ्रष्ट) करते रहते हैं। जैसे वृक्षोंके पत्ते उत्पन्न होकर थोड़े ही दिनोंमें पीले पड़कर झड़ जाते या नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मविवेकसे रहित मनुष्य इस लोकमें जन्म ले एक दूसरेसे मिलकर कुछ ही दिनोंमें साथ छोड़कर चल देते हैं।

भला, कौन समझदार मनुष्य दिनमें दूर-दूरतक व्यर्थ इधर-उधर घूमता हुआ ज्ञानी महापुरुषोंका सङ्ग एवं सत्कर्मका अनुष्ठान न करके सायंकाल घरमें लौटनेपर रातमें सुखकी नींद सो सकेगा ? समस्त शत्रुओंको मार भगानेपर जब चारों ओरसे धन-सम्पत्ति प्राप्त होने लगती है, उस समय पुरुष, जबतक इन विषयसुखोंके सेवनमें लगता है, तबतक ही मृत्यु कहींसे सहसा आ धमकती है। जो किसी कारणसे वृद्धिको प्राप्त होकर भी क्षणभरमें ही नष्ट होते देखे गये हैं, उन अत्यन्त तुच्छ विषय-भोगोंद्वारा इधर-उधर भटकायी जाती हुई जनता इस भूतलपर अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान

२०—श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निःसारता * ५७


पाती, यह कितने आश्चर्यकी बात है । समुद्रकी क्षणभङ्गुर लहरोंके समान यह चपल जनता इस भूतलपर निरन्तर कहींसे वेगपूर्वक आती और फिर सदा वेगसे ही चली जाती है । जैसे चञ्चल भ्रमररूपी नेत्रों और लाल पल्लवरूपी अधरोंवाली तथा विष-वृक्षपर चढ़कर फैली हुई चञ्चल विष-लताएँ देखनेमें अति सुन्दर होनेके कारण पहले मनको हर लेती हैं, पीछे सेवन करनेपर प्राणोंका नाश कर देती हैं, उसी प्रकार लाल अधरों और भ्रमरतुल्य चञ्चल नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ मनोहारिणी होनेके कारण पहले तो मनुष्योंके चित्तको चुराती हैं, फिर सर्वथा उनके प्राणोंका अपहरण करनेवाली बन जाती हैं । जैसे तीर्थयात्रा अथवा देवोत्सवमें बहुत-से मनुष्योंका मेला जुट जाता है, उसी प्रकार इस लोक और परलोकसे व्यर्थ ही आये हुए और अमुक स्थानपर हमलोगोंकी भेंट होगी, इस तरह आपसके संकेतयुक्त अभिप्रायसे एकत्र हुए लोगोंका जो स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके रूपमें यहाँ मिलन होता है, यह व्यवहार मायामय ही है। यह संसार वेगपूर्वक घूमनेवाले कुलालचक्रके समान है। यद्यपि यह वर्षा ऋतुके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभङ्गुर है, तथापि असावधान मनुष्योंकी बुद्धिमें अपनी चिरस्थायिताकी ही प्रतीति कराता है ।

जहाँ दैववश बारंबार जन्म लेकर अपने शरीरको धारण करके छाया, पत्र और पुष्प आदिके द्वारा निरन्तर प्राणियोंका उपकार करनेवाला वृक्ष भी कुल्हाड़ीसे काट दिया जाता है, उस संसारमें मनुष्य-जैसा अपराधी और उपकारशून्य प्राणी सदा जीवित ही रहेगा, ऐसा विश्वास करनेके लिये कौन-सा कारण है ? विषका वृक्ष और विषयासक्त मनुष्य दोनों ऊपरसे बड़े मनोहर लगते हैं, किंतु उनके भीतर बड़ा भारी दोष भरा रहता है । एक (विषवृक्ष) हृदयस्थित प्राणोंके विनाशके लिये खड़ा है तो दूसरा (विषयासक्त मनुष्य) आन्तरिक शान्तिके विघातके लिये तैयार रहता है। इनके सङ्गसे तत्काल मूर्छा या मूढ़ता ही प्राप्त होती है । संसारमें ऐसी कौन-सी दृष्टियाँ हैं, जिनमें दोष नहीं है ? वे कौन-सी दिशाएँ हैं, जहाँ दुःख और दाह नहीं है ? वे कौन-से जीव-शरीर हैं, जो क्षणभङ्गुर नहीं हैं ! और कौन-सी लौकिक क्रियाएँ हैं, जिनमें छल-कपट नहीं है ? बीते हुए और आनेवाले अनन्त कल्पोंकी संख्याका परिज्ञान नहीं होता । इसलिये जैसे क्षण अनन्त हैं, उसी प्रकार कल्प भी अनन्त हैं। भगवान् विष्णु और रुद्र आदिकी दृष्टिमें कल्प भी क्षण ही हैं। अतः ब्रह्मलोकके निवासी भी कल्प नामधारी एक क्षणतक ही जीनेवाले हैं । इसलिये कलाओं (विभिन्न अंशो) से सुशोभित होनेवाले कालसमूहमें लघुत्व और दीर्घत्व—चिरजीवन और क्षणजीवनकी बुद्धि भी द्रष्टाकी कल्पनाके अधीन होनेके कारण असत्य ही है । सर्वत्र पत्थरके ही पहाड़ हैं—उनमें पत्थरके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसी तरह सब जगह मिट्टीकी ही पृथ्वी हैं, काष्ठके ही वृक्ष हैं और हाड़-मांसके ही मनुष्य हैं। लोगोंके बनाये हुए संकेतके अनुसार ही उनके विशेष नाम आदि भाव नियत हो गये हैं। इस भोग्यवर्गमें कोई भी वस्तु विकारसे हीन अथवा अपूर्व नहीं है। सब कुछ विकाररूप होनेके कारण ही असत्य है । जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत ही परस्पर मिलकर घट-पट आदि नाना पदार्थोंके रूपमें अविवेकी पुरुषोंको प्रतीत होते हैं । चेतनके सान्निध्यसे ही उन्हें पदार्थोंकी प्रतीति होती है । विवेक-दृष्टिसे पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक आलोचना करनेपर यह जगत् पाँच भूतोंसे अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं सिद्ध होता ।

महात्मन् ! मिथ्या होनेपर भी इस पदार्थ-समूहके विषयमें व्यवहार-कुशलताके कारण विद्वान् पुरुषोंके भी मनमें भोगसम्बन्धी चमत्कार (चेष्टा) को उत्पन्न करनेवाली जो व्यवहार-चमत्कृति या प्रवृत्ति देखी जाती है,


१. कुम्हारका चाक ।

५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कभी-कभी स्वप्नमें मिथ्याभूत विषयको लक्ष्य करके भी किन्हीं लोगोंकी उस प्रकार चमत्कारपूर्ण प्रवृत्ति होती देखी जाती है।

जैसे पशु किसी हरी-हरी लताके फलको पानेकी इच्छासे ही आगे बढ़नेपर निस्संदेह पर्वतशिखरसे गिर जाता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुषोंके पद (स्थान या धन-वैभव आदि) को हठात् लेनेकी इच्छा रखनेवाला पुरुष राग-लोभ आदि दोषोंसे दूषित हुए अपने चित्तके द्वारा ही मारा जाकर अवश्य पतनके गर्तमें गिर जाता है।

(सर्ग २७)


जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम रूप दृश्य जगत् दिखायी देता है, वह सब सपनेमें लगे हुए मेलेके समान अस्थिर है—चिरकालतक टिकनेवाला नहीं। आज जिस शरीरको रेशमी वस्त्र, फूलोंके हार तथा भाँति-भाँतिके अनुलेपनोंसे सजाया गया है, वही कल नंगा होकर ग्राम या नगरसे बहुत दूर किसी गड्ढेमें पड़ा-पड़ा सड़ जायगा। जिस स्थानमें आज विचित्र आहार-व्यवहार और चहल-पहलसे भरा हुआ चञ्चल-सा नगर देखा गया है, वहीं कुछ ही दिनोंमें सूने वनके धर्मका उदय हो जायगा—वह भूमि गहन वनके समान निर्जन एवं अगम्य हो जायगी। जो पुरुष आज तेजस्वी है और अनेक मण्डलोंपर शासन करता है, वही कुछ दिनोंके अनन्तर राखका ढेर बन जाता है। आज जो आकाशमण्डलके समान नीला और महाभयंकर वन है, वही कुछ कालके पश्चात् ध्वजा-पताकाओंसे आकाशको ढक देनेवाला विशाल नगर बन जाता है। आज जो लता-वल्लरियोंसे आवेष्टित भयंकर वनश्रेणी दृष्टिगोचर होती है, वही कतिपय दिनोंमें ही मरुभूमि (रेगिस्तान) का स्थान ग्रहण कर लेती है। जल स्थल हो जाता है और स्थल जल। काठ, जल और तिनकोंसहित सारा जगत् ही विपरीत अवस्थाको प्राप्त होता रहता है। जवानी, बचपन, शरीर और द्रव्यसंग्रह—ये सब-के-सब अनित्य हैं और तरङ्गकी भाँति निरन्तर एक भावसे दूसरे भावको प्राप्त होते रहते हैं। इस संसारमें प्राणियोंका जीवन हवासे भरे स्थानमें रक्खे हुए दीपककी लौके समान चञ्चल (शीघ्र ही बुझ जानेवाला) है और तीनों लोकोंके सम्पूर्ण पदार्थोंकी शोभा (चमक-दमक) बिजलीकी चमकके समान क्षणिक है।

महर्षे ! वे उत्सव और वैभवसे सुशोभित होनेवाले दिन, वे महाप्रतापी पुरुष, वे प्रचुर सम्पत्तियाँ तथा वे बड़े-बड़े कर्म—सब-के-सब दृष्टिपथसे दूर हो केवल स्मरणके विषय रह गये हैं। इसी तरह हम भी क्षणभरमें अज्ञात स्थानको चले जायँगे और लोगोंके लिये केवल स्मरणीय बनकर रह जायँगे। यह संसार प्रतिदिन नष्ट होता है और प्रतिदिन पुनः उत्पन्न हो जाता है। अतः आजतक इस नष्टप्राय जले हुए संसारका अन्त नहीं हुआ। प्रभो ! मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिको प्राप्त होते हैं। पशु-पक्षी मानवजन्म धारण करते हैं तथा देवता भी देवेतर योनियोंमें जन्म लेते हैं। फिर इस संसारमें कौन-सी वस्तु स्थिर है ? स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ—ये सब-के-सब विनाशरूपी बड़वानलके लिये सूखे ईंधनके समान हैं। धन, भाई-बन्धु, भृत्यवर्ग, मित्र तथा वैभव—ये सब-के-सब विनाशके भयसे डरे हुए पुरुषके लिये नीरस ही हैं। मुनीश्वर ! जगत्‌में मनुष्य क्षणभरमें ऐश्वर्य (धन-वैभव) प्राप्त कर लेता है और क्षणभरमें दरिद्र हो जाता है। वह क्षणभरमें ही रोगी और क्षणभरमें नीरोग हो जाता है। इस प्रकार प्रतिक्षण विपरीत अवस्था प्रदान करनेवाले इस नश्वर जगत्रूपी भ्रमसे कौन


१. यहाँ बड़वानलका अर्थ अग्निमात्र समझना चाहिये।

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ५९


बुद्धिमान् मनुष्य मोहित नहीं हुए हैं ? ( इस भ्रमने सभी लोगोंको मोहमें डाल रक्खा है । )

आकाशमण्डल क्षणभरमें ही अन्धकाररूपी कीचड़से ढक जाता है, फिर क्षणभरमें ही सुवर्णद्रवके समान शीतल मृदुल चाँदनी आदिके उज्ज्वल प्रकाशसे उद्भासित हो परम सुन्दर दिखायी देने लगता है । दूसरे ही क्षण मेघरूपी नील कमलोंकी मालासे उसका अन्तःप्रदेश ( वक्ष एवं उदर ) ढक जाता है । क्षणभरमें ही वहाँ उच्चस्वरसे मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगती है और क्षणमें ही वह मूककी भाँति नीरव हो जाता है । क्षणमें ही ताराओंकी हारावलीसे अलंकृत और क्षणमें ही सूर्यरूपी मणिसे विभूषित हो जाता है । क्षणमें ही वहाँ चन्द्रमाकी चटकीली चाँदनीसे आह्लाद छा जाता है और क्षणभरमें ही वह सबसे सूना हो जाता है । इस तरह जैसे आकाशकी स्थिति क्षण-क्षणमें बदलती रहती है, उसी प्रकार संसारके सभी पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तनशील हैं । महर्षे ! संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो धीर होता हुआ भी क्षणभरमें स्थित और क्षणभरमें नष्ट होनेवाली, आवागमनकी परम्परासे युक्त इस सांसारिक स्थितिसे भयभीत नहीं होता ? मुने ! यहाँ क्षणभरमें आपत्तियाँ आती हैं और क्षणभरमें सम्पत्तियाँ । क्षणमें ही जन्म होता है और क्षणमें ही मृत्यु । इस जगत्में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो क्षणिक न हो ? भगवन् ! यहाँ उत्पन्न हुआ मनुष्य पहले कुछ और ही था और थोड़े दिनों बाद अन्य प्रकारका हो जाता है । यहाँ सदा एकरूप रहनेवाली सुस्थिर वस्तु कोई नहीं है । यहाँ कायरके द्वारा शूरवीर मारा जाता है । एक ही व्यक्तिके हाथसे सैकड़ों मनुष्य मारे जाते हैं और साधारण लोग भी राजा बन बैठते हैं । इस प्रकार यह सारा जगत् विपरीत अवस्थामें परिवर्तित होता रहता है । बाल्यावस्था थोड़े ही दिनोंमें चली जाती है, फिर यौवनकी शोभा छा जाती है और कुछ ही दिनोंमें वह भी समाप्त हो जाती है । तत्पश्चात् वृद्धावस्थाका पदार्पण होता है । जब हमारे शरीरमें भी एकरूपता ( स्थिरता ) नहीं है, तब बाह्य वस्तुओंमें एकरूपताका विश्वास क्या हो सकता है ! उत्पन्न और विनष्ट होनेवाले संसारी पुरुषोंकी न तो आपत्तियाँ स्थिर रहती हैं और न सम्पत्तियाँ ही । यह काल चतुर मनुष्योंको भी अवहेलनापूर्वक विपरीत स्थितियोंमें परिवर्तित करनेके कार्यमें अत्यन्त कुशल है । प्रायः सब लोगोंको आपत्तिमें ढकेलकर यह क्रीड़ा करता है ।

( सर्ग २८ )


श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! विषयभोग दुःख-रूप और अनित्य हैं, इस प्रकार विषयोंमें दोष-दर्शनरूपी दावानलके द्वारा मेरा चित्त दग्ध हो निर्मल एवं महान् हो गया है । अतः जैसे जलाशयोंमें मृगतृष्णाका उदय नहीं होता, उसी तरह मेरे उस चित्तमें भोगोंकी आशा अङ्कुरित नहीं होती । जैसे नीमके वृक्षपर फैली हुई रसहीन गिलोय काल पाकर उत्तरोत्तर कड़वी होती जाती है, उसी प्रकार यह सांसारिक स्थिति भी दिन-प्रति-दिन तीव्र वैराग्यके कारण मेरे लिये अधिकाधिक कटुताको प्राप्त हो रही है । मुनीश्वर ! विविध चिन्ताओंसे परिपूर्ण भोग-समूहों एवं राज्योंकी अपेक्षा चिन्तारहित महात्मा पुरुषोंद्वारा स्वीकृत एकान्त-सेवन ही मुझे अच्छा लगता है। सुन्दर उद्यान मुझे आनन्द नहीं देता, स्त्रियोंसे मुझे सुख नहीं मिलता और धनकी आशापूर्तिसे मुझे हर्ष नहीं होता । मनके साथ-साथ शान्ति मैं पाना चाहता हूँ । मैं न तो मृत्युका अभिनन्दन और न जीवनका ही स्वागत करता हूँ। जिस तरह संतापरहित होकर स्थित हूँ, उसी तरह रह रहा हूँ; मुझे राज्यसे, भोगोंसे, धनसे और नाना प्रकारकी

२१—श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्य-चकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा

६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चेष्टाओंसे भी क्या प्रयोजन है ? अहंकारवश ही मनुष्य इन राज्य आदिसे सम्बन्ध रखता है, किंतु मेरा वह अहंकार ही गल गया है (अतः मेरे लिये इनकी आवश्यकता नहीं रह गयी है) । जैसे हाथी अपने खुरोंके प्रहारसे कोमल कमलको कुचल डालता है, उसी प्रकार कामदेवने मानवती कामिनियोंके द्वारा मनुष्योंके मनको मथ डाला है । मुनीन्द्र ! यदि अभी निर्मल बुद्धिके द्वारा इस चित्तकी चिकित्सा नहीं की जाती तो फिर इसकी चिकित्साका अवसर ही कहाँ रह जायगा ? (क्योंकि रोग बढ़ जानेपर उसकी चिकित्सा कठिन हो जाती है ।) विषयोंकी विषमता ही विष है । लोकप्रसिद्ध विषको वास्तवमें विष नहीं कहा जाता, क्योंकि विष एक ही शरीरका (जिसके द्वारा उसका सेवन किया जाता है, उसीका) नाश करता है, परंतु विषय (-विष) जन्म-जन्मान्तरोंतक जीवको मौतके मुँहमें डालते रहते हैं । सुख-दुःख, मित्र, भाई-बन्धु, जीवन और मरण—ये सब (बन्धनकेकारण होते हुए भी ) ज्ञानी पुरुषके चित्तको नहीं बाँधते (अज्ञानीका ही मन इससे बँधता है) ।

ब्रह्मन् ! आप प्राचीन और अर्वाचीन बातोंके जाननेवाले महात्माओंमें श्रेष्ठ हैं । इसलिये जिस प्रकार मैं शोक, भय और खेदसे मुक्त हो यथार्थ ज्ञानसे सम्पन्न हो जाऊँ, वैसा उपदेश मुझे शीघ्र प्रदान कीजिये । अज्ञान एक भयंकर वनके समान है । जैसे वनमें मृगोंको फँसानेके लिये जाल बिछे होते हैं, काँटेदार झाड़-झंखाड़ फैले रहते हैं तथा जगह-जगह बहुत-से ऊँचे-नीचे स्थान रहते हैं, उसी प्रकार अज्ञानरूपी वन भी विषयवासनाके जालसे आवेष्टित, दुःखरूपी कण्टकोंसे व्याप्त तथा सम्पत्ति-विपत्ति-रूपी ऊँचे-नीचे स्थानोंसे युक्त है। महात्मन् ! जैसे रातमें ऐसी अन्धकार-राशि नहीं होती, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे नष्ट न हो जाती हो, उसी प्रकार संसारमें ऐसी दुश्चिन्ताएँ नहीं हैं, जो उत्तम अन्तःकरणवाले महात्मा पुरुषोंके सङ्गसे क्षीण न हो जायें । आयु वायुसे टकरायी हुई मेघोंकी घटासे झरते हुए जल-बिन्दुओंके समान क्षणभङ्गुर है । भोग मेघमालाके बीचमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं तथा युवावस्थाके मनोरञ्जन जलके वेगके समान चपल हैं—ऐसा विचारकर मैंने इन सबको त्याग दिया और तुरंत ही चिरकालतक बनी रहनेवाली शान्तिको आजसे अपने चित्तपर शासन करनेके लिये सुदृढ़ अधिकार-मुद्रा समर्पित कर दी है ।*

जैसे मृग तुच्छ तृणोंके लोभसे ठगे जाकर गड्डोंमें गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार अन्तःकरणकी वृत्तियाँ निस्सार विषयोंद्वारा ठगी जाती और विक्षेपरूपी दुःखोंको भोगनेके लिये उनके गहरे गर्तमें गिर जाती हैं । जैसे देवता विविध भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा चतुर्दश भुवनोंके भीतर विचरण करनेवाले अपने शीघ्रगामी विमानका परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार विविध भोगवासनाओंसे विस्तारको प्राप्त हुआ और समस्त लोकोंमें बे रोक-टोक विचरनेवाला मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त भी कभी चपलताको नहीं छोड़ता ।

अतः महात्मन् ! जन्म-मरण आदि दुःखोंसे रहित, देह आदि उपाधियोंसे शून्य तथा भ्रान्ति-रहित वह महान् विश्रान्तिदायक परमपद कौन-सा है, जहाँ पहुँच जानेसे शोकका अभाव हो जाता है ? समस्त कर्मोंका सुचारुरूपसे अनुष्ठान करनेवाले तथा सदा लौकिक व्यवहारमें ही तत्पर रहनेवाले जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पदको प्राप्त हुए ? दूसरोंको अधिक मान देनेवाले महामुने ! वह कौन-सा उपाय है, जिससे संसाररूपी पङ्कका अनेक अङ्गोंसे सम्पर्क हो जानेपर भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता ? किस दृष्टि (बुद्धि) का


* जैसे राजा दुष्ट अधिकारियोंसे शासनका अधिकार छीनकर किसी गुणवान्‌को उस पदपर प्रतिष्ठित करनेके लिये अधिकार-पत्र देता है, उसी प्रकार मैंने चित्तभूमिसे भोगवासना आदिका अधिकार हटाकर वहाँ शाश्वत शान्तिको प्रतिष्ठित किया है ।

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ६१


आश्रय लेकर आप-जैसे पापरहित महामना महापुरुष इस जगत्में जीवन्मुक्त होकर विचरते हैं ? जिसे मोहरूपी मतवाले हाथीने मथ डाला है, जिसके भीतर काम आदि दोषोंकी कीचड़ भरी पड़ी है, वह प्रज्ञारूपी महान् सरोवर किस उपायसे अत्यन्त निर्मल हो जाता है ? जैसे कमलके पत्तेसे जलका लगाव नहीं होता, उसी प्रकार प्रवाहरूपसे बने रहनेवाले इस संसारमें समस्त व्यवहारोंका निर्वाह करता हुआ भी मनुष्य बन्धनमें न पड़े—इसका क्या उपाय है ? सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्माके समान तथा इस समस्त भोग-प्रपञ्चको तिनकेके समान समझनेवाला और मनकी कामादि वृत्तियोंका स्पर्श न करनेवाला मनुष्य कैसे श्रेष्ठ पदको प्राप्त हो सकता है ? जिसने संसाररूपी महासागरको पार कर लिया हो, ऐसा कौन-सा महापुरुष है, जिसके चरित्रका अनुसरण करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता ? वह प्राप्त करने योग्य कल्याण और फल क्या है ? इस विषय-संसारमें (इसे पार करनेके लिये) कैसे व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! मुझे तत्त्वका कुछ उपदेश दीजिये, जिससे मैं ब्रह्माजीके द्वारा रचित इस अव्यवस्थित जगत्का पूर्वापर (आदि-अन्त) समझ सकूँ । इस संसारमें ग्रहण करने योग्य वस्तु क्या है ? त्याज्य वस्तु क्या है ? तथा इन दोनोंसे भिन्न अग्राह्य एवं अत्याज्य वस्तु क्या है ? मनुष्योंका यह चञ्चल चित्त किस प्रकार पर्वतके समान स्थिरता एवं शान्तिको प्राप्त करे ? किस पावन मन्त्रसे सैकड़ों क्लेशोंकी सृष्टि करनेवाला यह दोष-युक्त संसाररूपी विसूचिका (हैजा) का रोग अनायास शान्त हो सकता है ? महात्मन् ! जैसे वनमें कुत्ते विभिन्न जन्तुओंके अधमरे शरीरको पीड़ित करते रहते हैं, उसी तरह नाना प्रकारके संशय मर्यों कुछ आनन्दमय ब्रह्म-पदमें आत्यन्तिक निष्ठासे रहित पुरुषको सदा कष्ट देते रहते हैं।

मुनीश्वर ! ऐसा कौन-सा उपाय है, क्या गति है, कौन-सा चिन्तन है, क्या आश्रय है तथा कौन-सा साधन है, जिसका अवलम्बन करनेसे यह जीवनरूपी वन भविष्यमें अमङ्गलकारी न हो ? भगवन् ! इस पृथ्वीपर, स्वर्गमें अथवा देव-समाजमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुच्छ होनेपर भी आप-जैसे परम बुद्धिमान् महात्मा रमणीय न बना दें। यह नश्वर संसार निरन्तर दुःखोंसे परिपूर्ण और नीरस है। कृपया यह बताइये कि यह किस उपायसे अज्ञानके निवारणपूर्वक परमानन्दरूप उत्तम स्वादसे युक्त हो जाता है। मुने ! यह मनरूपी चन्द्रमा कामसे कलङ्कित हो रहा है। इसे किस साधन एवं विधिसे धोया जाय कि उससे अत्यन्त निर्मल एवं परम आह्लादमयी दिव्य चाँदनीका उदय हो। जिसे संसारकी गतिका अनुभव है और जिसने निष्कामभावके द्वारा दृष्ट एवं अदृष्ट कर्मफलोंका विनाश कर दिया है, ऐसे किस महापुरुषकी भाँति हमें इस संसाररूपी वनकी गलियोंमें विचरते समय व्यवहार करना चाहिये ? प्रभो ! किस उपायका आश्रय लिया जाय, जिससे संसाररूपी वनमें विचरनेवाले जीवको राग-द्वेषरूपी बड़े-बड़े दोष तथा भोग-समूह एवं ऐश्वर्यरूपी हिंसक जन्तु कष्ट न दे सकें ! मुनिश्रेष्ठ ! तीनों लोकोंमें मनकी जो मननशालिनी सत्ता (विषय-चिन्तनरूप अस्तित्व) है, उसे किसी साधनरूप युक्तिके बिना नष्ट नहीं किया जा सकता। अतः आप उस उत्तम युक्तिका पूर्णरूपसे उपदेश कीजिये। अथवा जिसका अवलम्बन करनेसे लोकव्यवहारमें तत्पर रहनेपर भी मुझे दुःख प्राप्त न हो सके, उस व्यवहार-सम्बन्धिनी उत्तम युक्तिका प्रतिपादन कीजिये। किस उत्तम चित्तवाले महापुरुषने पहले युक्तिके द्वारा मोहका निवारण किया था ? उसने किस प्रकार और क्या किया था; जिससे उसका मन परम पवित्र होकर शान्तिको प्राप्त हो गया ? भगवन् ! मोहकी निवृत्तिके लिये आप-जैसा, जो कुछ भी जानते हैं, उसका उसी रूपमें मुझे उपदेश कीजिये। वह कौन-सा साधन है, जिसका आश्रय लेनेसे अनेक श्रेष्ठ पुरुष दुःखरहित स्थिति (कल्याण) को प्राप्त हो गये हैं ?

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जैसे मोर महान्

६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मेघोंकी घटाओंके सम्मुख केकारव करके थक जानेके कारण चुप हो जाता है, उसी प्रकार निर्मल चन्द्रमाके समान मनोहर एवं महान् तत्त्वविचारसे विकसित चित्तवाले श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठ आदि महान् गुरुजनोंके समक्ष उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये ।

( सर्ग २९–३१ )


श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्यचकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलनयन राजकुमार श्रीराम जब इस प्रकार मनके मोहका निवारण करनेवाली बात कहने लगे, तब वहाँ बैठे हुए सब लोगोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे । उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ वैराग्यकी वासनासे नष्ट हो गयीं और वे सब लोग दो घड़ीके लिये मानो अमृतमय समुद्रकी तरङ्गोंमें डूबने-उतराने लगे । श्रीरामचन्द्रजीकी वे बातें जिन लोगोंने सुनीं, वे निश्चलताके कारण चित्रलिखित-से प्रतीत होते थे । उनका हृदय आनन्दसे भर गया था । सभामें बैठकर जिन श्रवणसमर्थ पुरुषोंने श्रीरामकी बातें सुनीं, उनके नाम इस प्रकार हैं— वसिष्ठ-विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रणाकुशल जयन्त और धृष्टि आदि मन्त्री, दशरथ आदि नरेश, पुरवासी, पारशव आदि संकर जातिके लोग, विभिन्न सामन्त, लक्ष्मण आदि राजकुमार, वेदवेत्ता ब्राह्मण, भृत्य और अमात्य । अपने महलकी खिड़कियोंमें बैठी हुई महारानी कौसल्या आदि वनिताएँ भी निश्चल होकर श्रीरामकी बातें सुन रही थीं । उस समय उनके आभूषणोंकी खनखनाहटतक नहीं होती थी । आकाशचारी सिद्ध, गन्धर्व, किंनर, नारद, व्यास और पुलह आदि श्रेष्ठ मुनियोंने तथा देवता, देवराज इन्द्र, विद्याधरगण एवं महान् दिव्य नागोंने भी श्रीरामचन्द्रजीकी वे विचित्र अर्थसे परिपूर्ण और परम उदार बातें सुनी थीं ।

रघुकुलरूपी आकाशके चन्द्रमा तथा शशिसे भी सुन्दर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी जब उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये, तब 'साधुवाद' के गम्भीर घोषके साथ आकाशसे सिद्धसमूहोंद्वारा ऐसी पुष्पवृष्टि की गयी, जिससे वहाँ चंदोवा-सा तन गया । फूलोंकी उस वर्षामें ढेर-के-ढेर केवड़ेके फूल चक्कर काट रहे थे । कमलोंके गुच्छ अपनी अद्भुत छटा दिखा रहे थे । कुन्दपुष्पोंकी राशि झड़ रही थी तथा हवामें उड़ते हुए नील कमलोंके पुञ्ज बिखर रहे थे । उस महलके आँगनकी भूमि पट गयी । घर, छत और चबूतरे आच्छादित हो गये तथा नगरके सभी स्त्री-पुरुष अपनी गर्दन ऊँची करके उस पुष्पवर्षाकी शोभा निहारने लगे । आकाशमें खड़े हुए अदृश्य सिद्ध-समूहोंद्वारा की गयी वह पुष्पवृष्टि आधी घड़ीतक लगातार होती रही । सभा और उसमें बैठे हुए लोगोंको आच्छादित-सा करके जब वह पुष्पवर्षा बंद हुई, तब सभासदोंने सिद्धसमूहोंका यह वार्तालाप अपने कानोंसे सुना—

"सृष्टिके आरम्भसे लेकर अबतक सिद्धोंके समुदायमें रहकर स्वर्गके सारे प्रदेशोंमें घूमते हुए हमलोगोंने आज ही वेदोंका सारभूत एवं कानोंके लिये अमृतके समान सुखद यह अपूर्व प्रवचन सुना है । वीतराग होनेके कारण इन रघुकुलचन्द्र श्रीरामने जो उदार बातें कही हैं, उन्हें सम्भवतः बृहस्पतिजी भी नहीं जानते होंगे । अहो ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमलोगोंने श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दसे प्रकट हुआ यह परम पुण्यमय प्रवचन सुना है, जो अन्तःकरणको


१. मोरकी बोलीको केका कहते हैं ।

१—विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्यचकित होना, आकाशसे पुष्पवर्षा * ६३


परम आह्लाद प्रदान करनेवाला है। इन रघुनन्दनने इस समय आदरपूर्वक जो उचित भाषण किया है, वह शान्तिरूपी अमृतसे भरा होनेके कारण परम मनोहर है। इस भाषणने श्रेष्ठताका पद प्राप्त कर लिया है—यह प्रवचन सर्वोत्तम सिद्ध हुआ है। इसके द्वारा हमें भी तत्काल यह ज्ञान हो गया कि स्वर्ग आदिके सुख भी निस्सार हैं।

'रघुकुलतिलक श्रीरामके द्वारा उठाये गये इन पावन प्रश्नवाक्योंका महर्षिलोग जो निर्णय करेंगे, उसे भी सुनना उचित होगा। नारद, व्यास और पुलह आदि मुनीश्वरो ! आप सभी महर्षि उस निर्णयको निर्विघ्नरूपसे सुननेके लिये शीघ्र यहाँ पधारें। जैसे केसरकी शोभासे परिपूर्ण हो सुवर्णकी भाँति उद्दीप्त होनेवाली कमलिनीपर भ्रमर चारों ओरसे टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार हम भी धन-वैभवसे पूर्ण तथा सुवर्णमयी सामग्रियोंसे प्रकाशित होनेवाली राजा दशरथकी इस पुण्यमयी सभामें सब ओरसे प्रवेश करें।'

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! सिद्धोंके ऐसा कहनेपर विमानोंमें निवास करनेवाले दिव्य महर्षियोंकी वह सारी मण्डली उस राजसभामें उतरी। उस मण्डलीमें सबसे आगे मुनीश्वर नारद थे, जो अपनी बजती हुई वीणाको उस समय भी छोड़ न सके थे और सबसे पीछे सजल जलधरके समान श्याम कान्तिवाले महर्षि व्यास थे। इन दोनोंके बीचमें शेष ऋषियोंकी मण्डली थी। भृगु, अङ्गिरा और पुलस्त्य आदि मुनीश्वर उस मण्डलीकी शोभा बढ़ाते थे। च्यवन, उद्दालक, उशीर तथा शरलोम आदि महर्षियोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था।

एक दूसरेके शरीरकी रगड़से उन सबके मृगचर्म अपने स्थानसे खिसककर अस्त-व्यस्त हो गये थे। उन महर्षियोंके हाथोंमें बल पाकर रुद्राक्षमाला हिल रही थी तथा उन सबने सुन्दर कमण्डलु धारण कर रखे थे। आकाशमें अपने तेजःपुञ्जके प्रसारसे श्वेत एवं रक्त प्रभा धारण करनेवाली वह मुनिमण्डली तारोंकी पङ्क्तिके समान प्रकाशित हो रही थी। परस्परके तेजसे उन सबके मुखमण्डल ऐसे उद्भासित हो रहे थे, मानो अनेक सूर्योंकी पङ्क्तियाँ प्रकट हो गयी हों। उस मण्डलीमें व्यासजी ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो तारोंके समुदायमें श्याम मेघ घिर आया हो और देवर्षि नारद तारिकाओंके समूहमें शीतरश्मि चन्द्रमाकी-सी शोभा धारण करते थे। महर्षि पुलस्त्य देवमण्डलीके बीच देवराज इन्द्रके समान विराज रहे थे। महर्षि अङ्गिरा ऐसे प्रकाशित होते थे, मानो देवताओंके समूहमें साक्षात् सूर्य उपस्थित हों। आकाशमण्डलसे वह सिद्ध-सेना ज्यों ही भूतलपर उतरी त्यों ही मुनियोंसे भरी हुई दशरथ-सभाके सभी लोग उठकर खड़े हो गये। वसिष्ठ और विश्वामित्रने अर्घ्य-पाद्य तथा मधुर वचनोंद्वारा क्रमशः उन सभी आकाशचारी सिद्धों तथा महर्षियोंकी पूजा की। आकाशचारी सिद्ध आदिके उस महान् समुदायने भी अर्घ्य-पाद्य एवं मधुर वचनोंद्वारा वसिष्ठ और विश्वामित्रका आदरपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् भूपाल दशरथने सम्पूर्ण आदरभावके साथ उस सिद्ध-समुदायका पूजन किया। फिर उस सिद्ध-समुदायने भी कुशल-प्रश्न-सम्बन्धी वार्तालापद्वारा महाराज दशरथका सत्कार किया। उस समय प्रेमोचित दान, मान आदि क्रियाओंद्वारा एक दूसरेसे सत्कार पाकर सभी आकाशचारी तथा भूमण्डलमें विचरनेवाले महर्षि यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उन लोगोंने सामने नत-मस्तक होकर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीका चारों ओरसे मधुर भाषण, फूलोंकी वर्षा और साधुवादके द्वारा पूर्ण सत्कार किया।

श्रीरामचन्द्रजी राज्यलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए वहीं बैठे तथा विश्वामित्र, वसिष्ठ, वामदेव, राजमन्त्रीगण, ब्रह्माके पुत्र नारदजी, मुनिवर व्यास, मरीचि, दुर्वासा, अङ्गिरा और उनके पुत्र आङ्गिरस मुनि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मुनीश्वर शरलोमा, वात्स्यायन, भरद्वाज, मुनिवर वाल्मीकि, उद्दालक, ऋचीक, शर्याति और च्यवन—ये तथा और भी बहुत-से वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्

६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तत्त्वज्ञानी महात्मा, जो उन सबमें प्रधान थे, वहाँ विराजमान हुए। तत्पश्चात् वसिष्ठ और विश्वामित्रजीके साथ नारद आदि, जो साङ्गवेदोंका अध्ययन कर चुके थे, मस्तक झुकाये हुए श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके इस प्रकार बोले—'अहो ! बड़े आश्चर्यकी बात है कि राजकुमार श्रीरामने इस प्रकार अनेक कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित वैराग्यरससे पूर्ण तथा परम उदारतासे युक्त बातें कही हैं। श्रीरामके भाषणमें वक्तव्य अर्थ 'इदमित्थम्' रूपसे व्यवस्थापूर्वक निहित है। उसे ऐसी सुबोध भाषामें कहा गया है, जिसे सुनते ही श्रोता वास्तविक अभिप्रायको समझ ले। जो बात कही गयी है, वह सर्वथा उचित और स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादित है। श्रीरामकी यह वाणी उदार है—इसके भीतर बहुत-से उत्कृष्ट अभिप्राय छिपे हुए हैं। यह सुननेमें प्रिय और श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य है। इसमें जो कुछ कहा गया है, वह चञ्चल चित्तसे नहीं, स्थिरबुद्धिसे विचारकर व्यक्त किया गया है। इसका भाव स्पष्टरूपसे समझमें आ जाता है। इस भाषणका प्रत्येक पद अभिव्यक्त (व्याकरण-विशुद्ध) तथा सुस्पष्ट—ग्रस्त आदि दोषोंसे रहित है। यह वाणी इष्ट (प्रिय एवं हितकर) तथा आन्तरिक सन्तोष-की सूचक है। श्रीरघुनाथजीके मुखसे निकला हुआ यह वचन किसको आश्चर्यमें नहीं डाल देता ? सैकड़ोंमें किसी एक पुरुषकी ही वाणी सम्पूर्णतः उत्कृष्ट, चमत्कारपूर्ण और अभीष्ट अर्थको प्रकट करनेमें समर्थ होती है।

'राजकुमार ! आपके सिवा दूसरा कौन है, जिसकी बाणके समान सूक्ष्म अर्थका भेदन करनेवाली कुशाग्र बुद्धिरूपिणी लता विवेकरूपी फलसे सुशोभित हो विचार-वैराग्यरूपी उत्तम विकासको प्राप्त हो रही हो। श्रीरामकी भाँति जिसके हृदयमें अनुपम प्रकाश फैलानेवाली प्रज्ञा-रूपिणी दीप-शिखा प्रज्वलित हो रही हो, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा जाता है। जिनमें ऐसी प्रज्ञा नहीं है, वे मनुष्य रक्त, मांस और हड्डियोंके यन्त्ररूपी देहमें आत्मबुद्धि रखनेके कारण रक्त-मांसादिरूप ही बहुत-से शब्द-स्पर्शादि पदार्थोंका उपभोग करते रहते हैं। ऐसा लगता है, उनके भीतर कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं—वे जड़के तुल्य हो गये हैं। जो लोग सर्वथा मोहाच्छन्न होनेके कारण संसारका विचार नहीं करते, वे निरे पशु हैं। वे ही बारंबार जन्म, मृत्यु और जरा आदि रूपोंको प्राप्त होते हैं। जैसे लोकमें सर्वोत्तम मधुर फल और सुन्दर आकृतिवाले आमके वृक्ष विरले ही होते हैं, उसी प्रकार उत्कृष्ट चमत्कारसे पूर्ण तत्त्व-साक्षात्काररूप फलसे सम्पन्न एवं सुन्दर शरीरवाले भव्य पुरुष इने-गिने ही होते हैं। इन आदरणीय बुद्धिवाले श्रीराममें अभी इसी अवस्थामें अपने ही विवेकके कारण उस तत्त्वदर्शनरूप चमत्कारका उदय देखा जाता है, जिसके द्वारा जगत्‌के व्यवहारका सम्यक्‌रूपसे समीक्षण हुआ है। जो देखनेमें सुन्दर हों, जिनपर सरलतासे चढ़ा जा सके तथा जो उत्तम फलों और पल्लवोंसे सुशोभित हों, ऐसे वृक्ष प्रायः सभी देशोंमें उत्पन्न होते हैं; परंतु चन्दनके वृक्ष सर्वत्र नहीं होते (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। फल और पल्लवोंसे भरे-पूरे वृक्ष प्रत्येक वनमें सदा सुलभ होते हैं। परंतु अपूर्व चमत्कारसे युक्त लौंगका वृक्ष सदा और सर्वत्र सुलभ नहीं है (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। जैसे चन्द्रमासे शीतल चाँदनी उत्पन्न होती है, सुन्दर वृक्षसे मञ्जरी प्रकट होती है और फूलसे सुगन्धका प्रवाह प्रादुर्भूत होता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीसे यह तत्त्वदर्शनरूपी चमत्कारका आविर्भाव देखा गया है। जो लोग सदा तत्त्वचिन्तनमें तत्पर हो विवेकके द्वारा आत्मज्ञान या परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सार पदार्थके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, वे ही सुयशके भंडार, सत्पुरुषोंमें अग्रगण्य, धन्य एवं समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। तीनों लोकोंमें श्रीरामचन्द्रजीके समान विवेकशील और उदारचित्त पुरुष न तो अबतक कोई देखा गया है और न भविष्यमें ही कोई होगा, ऐसी हमारी मान्यता है।' (सर्ग ३२-३३)

वैराग्य-प्रकरण सम्पूर्ण


१. अर्द्धोच्चारित शब्द या वाक्य, जिससे पूरी बात समझमें नहीं आती, ग्रस्तदोषसे युक्त माना गया है।

६५

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण

विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! इस प्रकार सभामें आये हुए सिद्ध पुरुषोंने जब उच्चस्वरसे श्रीरामके भाषणकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, तब विश्वामित्रजीने अपने सामने बैठे हुए श्रीरामसे प्रेमपूर्वक कहा—'ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! तुम्हारे लिये और कुछ जानना शेष नहीं है। तुम अपनी ही सूक्ष्मबुद्धिसे सब कुछ जान चुके हो—सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माको तत्त्वसे जानते हो। तुम्हारी बुद्धि भगवान् व्यासके पुत्र शुकदेवजीकी-

सी है। उसे जाननेयोग्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो चुका है। श्रीराम ! मैं तुमसे व्यासपुत्र शुकदेवजीका यह वृत्तान्त कह रहा हूँ, जो तुम्हारे अपने ही वृत्तान्तके समान है, इसे सुनो। यह सुननेवाले मनुष्योंके जन्म-

मरणरूप संसारके अन्त ( मोक्ष ) का कारण है। वे जो तुम्हारे पिताके बगलमें अञ्जनगिरिके समान श्याम तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान् व्यास बैठे हैं, इनके शुकदेव नामसे प्रसिद्ध एक महाज्ञानी पुत्र हुआ, जिसका मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। शुकदेवजी सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे। वे एक दिन मन-ही-मन इस लोकयात्रा ( जागतिक व्यवहार ) पर विचार कर रहे थे। उस समय उनके हृदयमें भी तुम्हारी ही तरह विवेकका उदय हुआ। उन महामना शुकदेवने अपने विवेकसे स्वयं ही चिरकालतक विचार करके जो परम मनोहर परमार्थ सत्य वस्तु ( या परमार्थ—साधनकी उच्च स्थिति ) है, उसे प्राप्त कर लिया। उसे प्राप्त करके भी उनके हृदयमें 'यही परमार्थ वस्तु ( सच्चिदानन्दघन परमात्मा ) है' ऐसा पूर्ण विश्वास नहीं हुआ; इसलिये उस परम वस्तुके स्वतः प्राप्त हो जानेपर भी उनके मनको शान्ति नहीं मिली। इतना अवश्य हुआ कि उनके चित्तकी चञ्चलता दूर हो गयी और जैसे चातक वर्षाकी जलधाराके अतिरिक्त अन्य जलधाराओंसे मुँह मोड़ लेता है, उसी प्रकार उनका मन अत्यन्त क्षणभङ्गुर भोगोंसे विरत हो गया।

एक दिन निर्मल बुद्धिवाले शुकदेवजीने मेरुगिरि-पर एकान्त स्थानमें बैठे हुए अपने पिता मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे भक्तिभावके साथ पूछा—'मुने ! यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है ? कैसे इसकी शान्ति या नाश होता है ? यह कितना बड़ा है ? किसका है ? और कबतक रहेगा ?' पुत्रके इस प्रकार प्रश्न करने-पर आत्मज्ञानी मुनिवर व्यासने उन्हें जो कुछ बताने योग्य

२—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना

६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बात थी, वह सब यथावत् एवं विशुद्ध रूपसे बता दी। उनका उपदेश सुननेके अनन्तर शुकदेवजीने सोचा, यह तो मैं पहले ही जान गया था। ऐसा विचारकर उन्होंने पिताजीके उस उपदेश-वाक्यका अपनी शुभ बुद्धिके द्वारा अधिक आदर नहीं किया। भगवान् व्यास भी अपने पुत्रके इस अभिप्रायको समझकर उससे बोले—'बेटा! भूतलपर जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं, जो जाननेयोग्य तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्माको) यथार्थरूपसे जानते हैं। उनसे तुम्हें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।'

पिताके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी सुमेरु पर्वतसे उतरकर पृथ्वीपर आये और महाराज जनकके द्वारा पालित विदेहपुरीमें जा पहुँचे। वहाँ छड़ीदार द्वारपालोंने महात्मा जनकको यह सूचना दी—'राजन्! राजद्वारपर व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी खड़े हैं।' उन्होंने शुकदेवजीकी परीक्षा लेनेके लिये द्वारपालोंसे अवहेलनापूर्वक कहा—'शुकदेवजी आये हैं तो वहीं ठहरें।' ऐसा कहकर

राजा सात दिनोंतक चुपचाप बैठे रहे--उनकी कोई खोज-खबर नहीं ली। तत्पश्चात् राजा जनकने शुकदेवजीको राजमहलके आँगनमें बुलवाया। वहाँ आनेपर भी शुकदेवजी पूरे सात दिनोंतक उसी प्रकार उपरत होकर बैठे रहे। इसके बाद जनकने शुकदेवजीको अन्तःपुरमें ले आनेकी आज्ञा दी, किंतु वहाँ भी राजाने सात दिनोंतक उन्हें दर्शन नहीं दिया। वे चन्द्रमाके समान मुखवाले शुकदेवजीका अन्तःपुरमें यौवनके मदसे उन्मत्त कमनीय कान्तिवाली सुन्दरियोंद्वारा भाँति-भाँतिके भोजनों तथा भोगसामग्रियोंसे लालन-पालन कराते रहे।

परंतु जैसे मन्द गतिसे बहनेवाली वायु दृढ़मूल अविचल वृक्षको नहीं उखाड़ सकती, उसी प्रकार वे भोग तथा अनादर एवं उपेक्षाजनित दुःख भी व्यासपुत्रके मनको अपनी ओर खींच न सके, उसमें विकार पैदा न कर सके। शुकदेव वहाँ पूर्ण चन्द्रमाके समान निर्विकार, भोग और अनादरमें भी समान (हर्ष-विषादसे रहित), स्वस्थ, मौन तथा प्रसन्न-चित्त बने रहे।

३—जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्र-नियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विश्वामित्रजीका श्रीरामके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना * ६७


इस प्रकार परीक्षाद्वारा शुकदेवजीके स्वभावको जानकर राजा जनकने उन्हें सादर अपने पास बुलवाया और प्रसन्नचित्त देखकर प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्रतापूर्वक उनका स्वागत करके राजाने उनसे कहा—'ब्रह्मन् ! जगत्में परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो-जो आवश्यक कर्तव्य हैं, वे सब आपने पूर्ण कर लिये हैं । सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लिया है (इस तरह आप कृतकृत्य तथा आप्तकाम हो चुके हैं)। अब आपको किस वस्तुकी इच्छा है ?'

श्रीशुकदेवजीने कहा —महाराज ! मैं जानना चाहता हूँ कि यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है और इसकी शान्ति या विनाश कैसे होता है। आप शीघ्र ही मुझसे इस विषयका यथावत् रूपसे प्रतिपादन कीजिये ।

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—महाराज ! इस प्रकार पूछे जानेपर राजा जनकने शुकदेवजीको उस समय वही बात बतायी, जो पहले उनके महात्मा पिता व्यासजीके द्वारा बतायी गयी थी।

तब शुकदेवजीने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज ! मैंने पहले विवेकसे स्वयं ही यह बात जान ली थी। फिर जब पिताजीसे इसके विषयमें पूछा, तब उन्होंने भी मुझे यही बात बतायी और आज आपने भी यही बात कही है। शास्त्रोंमें भी महावाक्योंका यही अर्थ दृष्टिगोचर होता है। वह इस प्रकार है—'यह विनाशशील संसार अपने संकल्पसे उत्पन्न हुआ है और संकल्पका आत्यन्तिक विनाश होनेसे नष्ट हो जाता है अतः सर्वथा निःसार है। यही शास्त्रोंका निश्चय है।' महाबाहो ! क्या यही अविचल सत्य है ? यदि हाँ, तो इसका इस तरह उपदेश कीजिये, जिससे यह मेरे हृदयमें अचल—असंदिग्धरूपसे बैठ जाय । संसारके विषयोंमें भटकते हुए चित्तके द्वारा इधर-उधर भटकाया जाता हुआ मैं आज आपसे शान्ति लाभ करना चाहता हूँ।

राजा जनकने कहा—मुने ! इस ब्रह्माण्डमें एक अखण्ड चिन्मय परम पुरुष परमात्माके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपने स्वयं विवेकके द्वारा इस तत्त्वको जाना है और फिर गुरुरूप पिताके मुखसे इसको सुना है। इससे बढ़कर दूसरा कोई निश्चय (जानने योग्य तत्त्व) नहीं है। मुनिकुमार ! आप बालक होते हुए भी विषयभोगोंके त्यागमें शूरवीर होनेके कारण महान् वीर हैं। आपकी बुद्धि दीर्घ कालतक बने रहनेवाले रोगरूपी भोगोंसे पूर्णतः विरक्त हो गयी है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ! ब्रह्मन् ! जो प्राप्त करने योग्य वस्तु है, उसे पूर्णरूपसे आपने पा लिया है। आपका चित्त पूर्णकाम हो गया है। आप दृश्य वस्तु (बाह्य विषय) की ओर दृष्टिपात नहीं करते हैं, अतः मुक्त हैं। अभी और कुछ पाना या जानना शेष रह गया है, इस भ्रमको त्याग दीजिये।

(विश्वामित्रजी कहते हैं—श्रीराम !) महात्मा जनकके द्वारा इस प्रकार उपदेश पाकर शुकदेवजी अत्यन्त शुद्ध परम वस्तु परमात्मामें चुपचाप स्थित हो गये। उनके शोक, भय और श्रम—सभी नष्ट हो गये। वे सर्वथा निरीह एवं संशयरहित हो गये। तदनन्तर वे मेरुगिरिके प्रशस्त शिखरपर समाधि लगानेके लिये चले गये। वहाँ दस हजार वर्षोतक निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और जैसे तेल समाप्त होनेपर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार वे प्रारब्ध क्षीण हो जानेपर परमात्मामें लीन हो गये ।

(सर्ग १)

६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजीने ज्ञातव्य वस्तुको पूर्णतः जान लिया है; क्योंकि इन शुद्ध-बुद्धिवाले श्रीरामको भोग अच्छे नहीं लगते। वे इन्हें रोगके समान प्रतीत होते हैं। जिसने ज्ञेय वस्तुको जान लिया है, उसके मनका अवश्य ही यही लक्षण है कि उसे सारे भोगसमूह फिर कभी रुचिकर नहीं जान पड़ते हैं। भोगोंके चिन्तनसे अज्ञान-जनित बन्धन दृढ़ होता है और भोग-वासनाके शान्त हो जानेपर संसार-बन्धन क्षीण हो जाता है।*

श्रीराम ! विद्वान् लोग भोगवासनाके क्षयको ही मोक्ष कहते हैं और विषयोंमें होनेवाली सुदृढ़ वासनाको ही बन्धन बताते हैं। जिसकी दृष्टि राग आदि दोषोंसे रहित है, वही तत्त्वज्ञ है। उसीने जाननेयोग्य वस्तुको जाना है और वही विद्वान् है। उस महात्मा पुरुषको भोग हठात् अच्छे नहीं लगते। जैसे मरुभूमिमें लता नहीं उगती, उसी प्रकार जबतक जाननेयोग्य तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता, तबतक मनुष्यके हृदयमें विषयोंकी ओरसे वैराग्य नहीं होता। अतः मुनिवृन्द ! आपलोग यह निश्चितरूपसे समझ लें कि रघुकुलतिलक श्रीरामको ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो गया है; क्योंकि इन्हें ये भोगोंके रमणीय स्थान आनन्दित नहीं कर रहे हैं। मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजी जिस तत्त्वको बुद्धिके द्वारा जानते हैं, उसके विषयमें जब सद्गुरुके मुखसे यह सुन लेंगे कि 'यही परमार्थ वस्तु है' तब इनके चित्तको अवश्य विश्राम प्राप्त होगा। जैसे शरत्कालकी शोभा मेघरहित निर्मल आकाशमात्रकी अपेक्षा रखती है, उसी तरह श्रीरामचन्द्रजीकी बुद्धिको केवल अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परमात्माके तत्त्वमें विश्रामकी अपेक्षा है। अतः महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके चित्तके विश्रामके लिये ये पूज्यपाद श्रीवसिष्ठजी ही यहाँ युक्तिका प्रतिपादन करें; क्योंकि ये समस्त रघुवंशियोंके ही (नहीं, समूचे इक्ष्वाकुवंशियोंके) सदासे प्रभु (नियन्ता एवं शिक्षक) और कुलगुरु हैं। इसके सिवा ये सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी तथा तीनों कालोंमें मोह आदिसे रहित निर्मल दृष्टिवाले हैं।

पूज्यपाद वसिष्ठजी ! क्या वह पहलेकी बात आपको स्मरण है, जब कि हम दोनोंके वैरकी शान्ति तथा परम बुद्धिमान् मुनियोंके कल्याणके लिये देवदारुके वृक्षोंसे आवृत्त निषद पर्वतके शिखरपर साक्षात् पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने महत्त्वपूर्ण ज्ञानका उपदेश दिया था ? ब्रह्मन् ! उस युक्तियुक्त ज्ञानसे यह सांसारिक वासना अवश्य उसी तरह नष्ट हो जाती है, जैसे भगवान् भास्करके उदयसे अँधेरी रात। विप्रवर ! आप उसी युक्तियुक्त ज्ञेय वस्तुका


* भोगभावनया याति बन्धो दार्ढ्यमवस्तुजः।
तयोपशान्त्या याति बन्धो जगति तानवम्॥

४—शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण * ६९


अपने शिष्य श्रीरामको शीघ्र उपदेश दीजिये, जिससे ये विश्राम ( शान्ति ) को प्राप्त हों । इसमें आपको अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी सर्वथा निष्पाप हैं । अतः जैसे निर्मल दर्पणमें बिना यत्नके ही मुँहका प्रतिबिम्ब दिखायी देने लगता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको अनायास ही ज्ञेय वस्तुका बोध एवं विश्राम प्राप्त हो जायगा । महात्मन् ! वही ज्ञान, वही शास्त्रार्थ और वही पाण्डित्य सार्थक एवं प्रशंसित है, जिसका वैराग्ययुक्त उत्तम शिष्यके लिये उपदेश दिया जाता है । जिसमें वैराग्य नहीं है तथा जो शिष्यभावसे रहित है, उसे जो कुछ भी उपदेश दिया जाता है, वह कुत्तेके चमड़ेसे बने हुए कुप्पेमें रखे हुए गायके दूधकी भाँति अपवित्रताको प्राप्त हो जाता है । जहाँ आप-जैसे वीतराग, निर्भय, क्रोधशून्य, अभिमानरहित तथा निष्पाप महापुरुष तत्त्वज्ञानका उपदेश देते हैं, वहाँ तत्काल बुद्धिको विश्राम प्राप्त होता है ।

गाधिनन्दन विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर व्यास और नारद आदि उन सभी मुनियोंने साधु-साधु कहकर उनके उस कथनकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजा दशरथके बगलमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो ब्रह्माजीके समान ही ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न थे, कहा ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—मुने ! आप जिस कार्यके लिये मुझे आज्ञा दे रहे हैं, उसे मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आरम्भ कर रहा हूँ । शक्तिशाली होकर भी संतोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ! पूर्वकालमें निषध पर्वतपर पूजनीय पद्मयोनि ब्रह्माजीने संसाररूपी भ्रमको दूर करनेके लिये जिस ज्ञानका उपदेश किया था, वह सब अविकलरूपसे मुझे याद है । ( सर्ग २ )


जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्रनियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन

श्रीवसिष्ठजीने कहा—पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भके समय भगवान् ब्रह्माने संसाररूपी भ्रमके निवारणके लिये जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, उसीका मैं यहाँ वर्णन करता हूँ । यह जगत् सङ्कल्पके निर्माण, मनोराज्यके विलास, इन्द्रजालद्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानीके अर्थके प्रतिभास, वातरोगके कारण प्रतीत होनेवाले भूकम्प, बालकको डरानेके लिये कल्पित पिशाच, निर्मल आकाशमें कल्पित मोतियोंके ढेर, नावके चलनेसे तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षोंकी गति, स्वप्नमें देखे गये नगर अन्यत्र देखे गये फूलोंके स्मरणसे आकाशमें कल्पित हुए पुष्पकी भाँति भ्रमद्वारा निर्मित हुआ है । मृत्युकालमें पुरुष स्वयं अपने हृदयमें इसका अनुभव करता है ।

इस प्रकार जगत् मिथ्या होनेपर भी चिरकालतक अत्यन्त परिचयमें आनेके कारण घनीभाव ( दृढ़ता ) को प्राप्त होकर जीवके हृदयाकाशमें प्रकाशित हो बढ़ने लगता है । यही 'इहलोक' कहलाता है । जन्मसे लेकर मृत्युतककी चेष्टाओं तथा मरण आदिका अनुभव करनेवाला जीव वही ( हृदयाकाशमें ही ) इहलोककी कल्पना करता है, जैसा कि ऊपर कहा गया है । फिर मरनेके अनन्तर वह वहीं परलोककी कल्पना करता है । वासनाके भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे शरीर—ये इस संसारमें केलेके वृक्षकी त्वचा ( छिलके वा वल्कल ) के समान एकके पीछे एक प्रतीत होते हैं ( वस्तुतः इस संसारमें कोई सार नहीं है ) । न तो पृथिवी आदि पञ्च महाभूतोंके समुदाय हैं और न जगत्‌की सृष्टिका कोई क्रम ही है । ये सब-के-सब मिथ्या हैं। तथापि मृत और जीवित जीवोंको

७०* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

इनमें संसारका भ्रम होता है। यह अविद्यारूपिणी नदी ही है, जिसका कहीं अन्त नहीं है। यह विभिन्न धाराओंके रूपमें फैलती हुई शोभा पाती है। मूढ़ पुरुषोंके लिये यह इतनी विशाल है कि वे इसे पार नहीं कर सकते। सृष्टिरूपी चञ्चल तरङ्गोंसे ही यह तरङ्गवती जान पड़ती है।

श्रीराम ! परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी विशाल महासागरमें बारंबार वे पुरानी और नयी सृष्टिरूप असंख्य तरङ्गों उठती और विलीन होती रहती हैं। इस समय ब्रह्मकल्पका अवयवभूत बहत्तरवाँ त्रेतायुग चल रहा है। यह पहले भी अनेक बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। यह वही पहलेवाला त्रेतायुग है और उससे विलक्षण भी। ये जितने लोक हैं, वे भी पूर्ववत् हुए हैं और उनकी अपेक्षा नवीन भी हैं। इसी प्रकार तुम श्रीराम भी अनेक वार त्रेतायुगमें अवतार ले चुके हो और भविष्यमें भी लोगे। मैं भी कितनी ही बार वसिष्ठ-रूपमें उत्पन्न हो चुका हूँ और आगे भी होऊँगा। हमारे ये सभी रूप पूर्वके तुल्य होंगे और उनसे भिन्न भी। इस बातको मै अच्छी तरह जानता हूँ। सभी प्राणी कभी धन-वैभव, बन्धु-बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान और चेष्टाओंमें पूर्वकल्पोंके समान होते हैं और कभी नहीं भी होते। जो अविद्यारूपी आवरणसे रहित है, जिसका अन्तःकरण एकाग्र हो चुका है, जिसके सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो चुके हैं तथा जो स्वरूपभूत सारतत्त्व (सच्चिदानन्दघन)—मय हो गया है, वह विद्वान् पुरुष परम शान्तिरूपी अमृतसे तृप्त रहता है।

सौम्य श्रीराम ! समुद्रकी जलराशि शान्त हो या उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त, दोनों दशाओंमें उसकी जलरूपता समान ही है—उसमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। उसी तरह देहके रहते हुए और उसके न रहनेपर भी मुक्त महात्मा मुनिकी स्थिति एक-सी ही होती है, उसमें कोई भेद नहीं होता है। सदेह मुक्ति हो या विदेहमुक्ति, उसका विषयोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है। जिसने सत्य मानकर भोगोंका आस्वादन ही नहीं किया, उस पुरुषमें भोगोंकी अनुभूति कहाँसे होगी? जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त दोनों ही प्रकारके महात्मा बोधस्वरूप हैं। उनमें क्या भेद है? (इन दोनोंमें भेद करानेवाला है अज्ञान। उसके नष्ट हो जानेपर जब केवल ज्ञान ही अवशिष्ट रह जाता है, तब उन दोनोंमें भेद कौन हो सकता है !) जैसे समुद्रकी तरङ्गावस्थामें जो जल है, वही उसकी प्रशान्तावस्थामें भी है—उसमें कोई अन्तर नहीं है। सदेह और विदेहमुक्तमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं हैं। पवन सस्पन्द (वेगवान्) हो या निष्पन्द (शान्त अथवा वेगहीन), दोनों ही दशाओंमें वह है वायु ही।

अतः अब मैं जिसका प्रकरण चल रहा है, उस उत्तम ज्ञानका ही उपदेश कर रहा हूँ, तुम इसका निरूपण सुनो। यह ज्ञान कानोंका आभूषण है और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है। रघुनन्दन ! इस संसारमें सदा अच्छी तरह पुरुषार्थ (प्रयत्न) करनेसे सबको सब कुछ मिल जाता है। (जहाँ कहीं किसीको असफल देखा जाता है, वहाँ उसके सम्यक् प्रयत्नका अभाव ही कारण है।) साधनके परिपक्व होनेपर हृदयमें, जैसे चन्द्रमासे शीतलतायुक्त आह्लाद प्राप्त होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय शीतल आनन्दका उदय होता है। यह आत्यन्तिक आनन्द पुरुषके प्रयत्नसे ही प्राप्त हो सकता है, अन्य हेतु (प्रारब्ध) से नहीं। (इसलिये पुरुषको प्रयत्नपर ही निर्भर रहना चाहिये।) शास्त्रज्ञ सत्पुरुषोंके बताये हुए मार्गसे चलकर अपने कल्याणके लिये जो मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा की जाती है, वही पुरुषार्थ है और वही सफल चेष्टा है। उससे भिन्न जो शास्त्र-विपरीत मनमाना आचरण है, वह पागलोंकी-सी चेष्टा है। जो मनुष्य जिस पदार्थको पाना चाहता है, उसकी

५—ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन * ७१


प्राप्तिके लिये यदि वह क्रमशः यत्न करता है और बीचमें ही उससे मुँह नहीं मोड़ लेता तो अवश्य उसे प्राप्त कर लेता है। कोई एक विशेष प्राणी ही पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे युक्त होनेके कारण परम सुन्दर प्रतीत होनेवाली इन्द्रपदवीको प्राप्त हो गया है। निरन्तर यत्नमें लगे रहकर सुदृढ़ अभ्यासमें तत्पर हुए बुद्धिमान् और साहसी पुरुष मेरुपर्वतको भी निगल जानेकी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। श्रुति-स्मृति आदि शास्त्रसे नियन्त्रित पुरुषार्थके सम्पादनमें तत्पर जो पुरुषका पौरुष (उद्योग) है, वही मनोवाञ्छित फलकी सिद्धिका कारण होता है। शास्त्रके विपरीत किया हुआ प्रयत्न अनर्थकी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। कोई पुरुष जब शास्त्रीय प्रयत्नको शिथिल कर देता है, तब स्वयं दरिद्रता, रोग और बन्धन आदि अपनी दुर्दशाके कारण वह ऐसी अवस्थामें पहुँच जाता है, जहाँ उसके लिये पानीकी एक बूँद भी बहुत समझी जाती है। (दुर्लभ हो जाती है); परंतु किसीको शास्त्रानुसार आचरणके प्रभावसे ऐसी उत्तम अवस्था प्राप्त होती है, जहाँ समुद्र, पर्वत, नगर और द्वीपोंसे व्याप्त विशाल भूमण्डलका साम्राज्य भी अधिक नहीं समझा जाता (वह अनायास सुलभ हो जाता है)।

(सर्ग ३-४)


शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे नीले, पीले आदि भिन्न-भिन्न रंगोंकी अभिव्यक्तिमें प्रकाश ही मुख्य कारण है, उसी प्रकार शास्त्रके अनुसार मन, वाणी और शरीरद्वारा व्यवहार करनेवाले अधिकारी पुरुषोंके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धिमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्ति ही प्रधान साधन है। मनुष्य केवल मनसे किसी वस्तुकी इच्छा करता है, शास्त्रानुसार कर्मसे नहीं, वह पागलोंकी-सी चेष्टा करता है। उसकी वह चेष्टा केवल मोहमें डालनेवाली है, पुरुषार्थको सिद्ध करनेवाली नहीं। जो मनुष्य जैसा प्रयत्न (कर्म) करता है, वह वैसा ही फल भोगता है, (जो यह कहते हैं कि दैववश फलमें विपरीतता भी आ जाती है तो उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि) अपना पूर्वकृत कर्म ही फल देनेके लिये उन्मुख होनेपर दैव कहलाता है। उससे अतिरिक्त दैव नामकी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती। पुरुषार्थ दो प्रकारका है—एक शास्त्रानुमोदित (पुण्य-कर्म) और दूसरा शास्त्रविरुद्ध (पाप-कर्म)। इन दोनोंमें जो शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ है, वह अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुमोदित पौरुष परमार्थ वस्तुकी प्राप्तिमें कारण है। इसलिये पुरुषको शास्त्रीय प्रयत्नसे तथा साधु पुरुषोंके सङ्गसे ऐसा उद्योग करना चाहिये कि इस जन्मका पौरुष पूर्वजन्मके पौरुष (प्रारब्ध) को शीघ्र जीत ले। अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लेकर दाँतोंसे दाँतोंको पीसते हुए (तत्परतापूर्वक प्रयत्नमें लगे हुए) पुरुषको अपने शुभ पौरुषके द्वारा विघ्न करनेके लिये उद्यत पूर्वजन्मके अशुभ पौरुषको जीत लेना चाहिये। 'यह पूर्व जन्मका पुरुषार्थ (प्रारब्ध) मुझे प्रेरित करके विशेष परिस्थितिमें डाल देता है, इस प्रकारकी बुद्धिको बलपूर्वक कुचल डालना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष प्रयत्नसे अधिक प्रबल नहीं है। तबतक प्रयत्नपूर्वक उत्तम पुरुषार्थके लिये सचेष्ट रहना चाहिये, जबतक कि पूर्वजन्मका अशुभ पौरुष स्वयं पूर्णतः शान्त न हो जाय। अर्थात् जबतक पहले जन्मोंका किया हुआ अशुभ कर्म समूल नष्ट न हो जाय, तबतक तत्परतासे उत्साहपूर्वक साधन करते रहना चाहिये।

जैसे अपने द्वारा कल घटित हुए दोषका आज

६—विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन

७२ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्रायश्चित्त कर लेनेपर नाश हो जाता है, उसी प्रकार इस जन्मके गुणोंसे ( शुभ पौरुषसे ) पूर्व-जन्मका दोष ( अशुभ पौरुष ) अवश्य नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। पूर्वजन्मके अशुभ या दुःखदायक प्रारब्धको इस जन्मके शुभ कर्मोंसे विशुद्ध एवं पुष्ट हुई बुद्धिके द्वारा तिरस्कृत करके संसार-सागरसे पार होनेके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये अपने भीतर दैवी सम्पत्तिके संग्रहके निमित्त सदा यत्न करना चाहिये। उद्योगशून्य आलसी मनुष्य गदहोंके समान गये-बीते हैं। अतः स्वयं भी उद्योग छोड़कर उन्हींकी श्रेणी या तुलनामें नहीं जाना चाहिये। शास्त्रके अनुसार किया हुआ उद्योग इहलोक और परलोक दोनोंकी सिद्धिमें कारण है। मनुष्यको पुरुषार्थरूपी प्रयत्नका आश्रय लेकर इस संसाररूपी गड्ढेसे स्वयं बलपूर्वक निकल जाना चाहिये। अपने शरीरको प्रतिदिन नाश होता हुआ समझे। पशुओं-के समान आचरणका त्याग करे और सत्पुरुषोंके योग्य आचार-व्यवहारका आश्रय ले। जैसे कीड़ा घावमें पीब आदिका आस्वादन करके ही अपना जीवन समाप्त कर देता है, उसी तरह मनुष्यको घरमें स्त्री, अन्न, पान आदि द्रव्ययुक्त एवं कोमल तुच्छ पदार्थोंका किंचित् आस्वाद लेकर सम्पूर्ण पुरुषार्थोंके साधनभूत आयुको भस्म नहीं कर देना चाहिये (मानव-जीवनको व्यर्थ नहीं गवाँ देना चाहिये)। शुभ पुरुषार्थसे शीघ्र ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है और अशुभ पुरुषार्थसे सदा अशुभ फल ही मिलता है। इन शुभ-अशुभ पुरुषार्थोंके सिवा दैव नामकी दूसरी कोई वस्तु नहीं है (इन्हींका नाम दैव या प्रारब्ध है)। इसलिये पहले पुरुषार्थके द्वारा विवेकका आश्रय लेकर आत्मज्ञानरूपी महान् प्रयोजनवाले शास्त्रोंका विचार करना चाहिये। जो शास्त्रके अनुसार अपनी श्रवण, मनन आदि चेष्टाओंके द्वारा साधन नहीं करते और चित्तमें विषयोंका ही चिन्तन करते रहते हैं, उन मूढ़ पुरुषोंकी अत्यन्त दूषित भोगेच्छाको धिक्कार है। पूर्वोक्त पुरुषप्रयत्न यदि सत्-शास्त्रके अनुकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे युक्त होता है तो वह परमात्मसाक्षात्काररूप अपने फलको देता है। यह उसका स्वभाव है। अन्यथा (सत्-शास्त्रके प्रतिकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे रहित होनेपर) उससे परमात्म-साक्षात्काररूप परम फलकी सिद्धि नहीं होती। यही पौरुषका स्वरूप है। इस प्रकार व्यवहार करनेवाले किसी भी पुरुषका प्रयत्न कभी विफल नहीं होता। बाल्यावस्था-से लेकर भलीभाँति अभ्यासमें लाये हुए सत्-शास्त्रानुशीलन और सत्पुरुषोंके सङ्ग आदि सद्गुणोंद्वारा पुरुषार्थ करनेसे परम स्वार्थरूप परमात्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष देखी हुई, अनुभवमें आयी हुई, सुनी हुई और साधनोंद्वारा प्राप्त की हुई परमार्थ वस्तुको जो लोग दैवके अधीन मानते हैं, उनकी बुद्धि कुत्सित है और वे साधनसे नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं। निरन्तर कल्पित क्रीड़ाओं (खेल-कूद) के कारण अत्यन्त चञ्चलतापूर्ण बाल्यावस्थाके व्यतीत हो जानेपर जब (दुखी और गुरुजनोंकी सेवामें समर्थ) बाहुदण्डसे अलंकृत यौवन-अवस्थाका आरम्भ हो जाय, तभीसे मनुष्यको पद-पदार्थके ज्ञानसे विशुद्ध-बुद्धि होकर सत्पुरुषोंके सङ्गसे अपने गुणों और दोषोंका विचार करना चाहिये। तात्पर्य यह कि विचारपूर्वक दोषोंको त्याग करके गुणोंको ग्रहण करना चाहिये।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार प्रवचन करनेपर वह दिन व्यतीत हो गया। सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये तथा उस सभाके लोग वसिष्ठजीको नमस्कार करके सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये चले गये और रात्रि व्यतीत होनेपर पुनः सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही उस सभाभवनमें आ गये। (सर्ग ५)

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण * ७३


ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! पूर्वजन्मके पौरुषसे भिन्न दैव कोई वस्तु नहीं है ( पूर्वजन्मोंका पुरुषार्थ ही दैव है ) । इसलिये 'मैं दैवके अधीन हूँ, कर्म करनेमें स्वतन्त्र नहीं हूँ' ऐसी बुद्धि या विचारधाराको सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रके अभ्यासद्वारा मनसे दूर करके जीवात्माका इस संसार सागरसे बलपूर्वक उद्धार करे ( आलस्यवश सत्कर्म अथवा साधन कभी नहीं छोड़े ) । जैसे-जैसे प्रयत्न होगा, वैसे-ही-वैसे शीघ्रतापूर्वक फल प्राप्त होगा। इसीका नाम पौरुष है । पूर्वजन्मके उस पौरुषको ही कोई दैवकी संज्ञा देना चाहे तो दे सकता है । जो तुच्छ विषय-सुखोंके क्षणिक लोभमें फँसकर उस पूर्वकृत पौरुष या दैवको वर्तमान जन्मके पुरुषार्थद्वारा जीतनेका प्रयत्न नहीं करते और सदा दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे दीन, पामर और मूढ़ हैं ( क्योंकि पुरुषार्थके बिना आत्म-कल्याण सिद्ध नहीं होता ) । पूर्वजन्मके तथा इस जन्मके पुरुषार्थ (कर्म) दो मेढ़ोंकी तरह आपसमें लड़ते हैं । उनमें जो भी बलवान् होता है, वही दूसरेको क्षणभरमें पछाड़ देता है* । इस जन्ममें किया गया प्रबल पुरुषार्थ अपने बलसे पूर्वजन्मके पौरुष या दैवको नष्ट कर देता है और पूर्वजन्मका प्रबल पौरुष इस जन्मके पुरुषार्थको अपने बलसे दबा देता है । पूर्वकृत कर्मोंके फलरूप प्रारब्ध


* जैसे पूर्वजन्मके किसी प्रतिबन्धक कर्मके कारण किसी मनुष्यको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होनेवाली है; परन्तु यदि वह पुत्र-प्राप्तिके लिये शास्त्रीय विधानके साथ पुत्रेष्टि-यज्ञ अथवा उसी कोटिके दूसरे किसी सत्कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाती है । यहाँ पूर्वजन्मके प्रतिबन्धक कर्मसे इस जन्मका पुरुषार्थ अधिक बलवान् होनेके कारण नवीन प्रारब्धका निर्माण करके विजयी हो जाता है । इसी प्रकार पूर्वजन्मके कर्मानुसार यदि किसीकी मृत्यु अवश्यम्भावी है तो उसके प्रतीकारके लिये अनेक प्रकारके उपाय करनेपर भी मनुष्य उसे टाल नहीं पाता । अतः यहाँ पूर्वकृत कर्म ( दैव या प्रारब्ध ) ही प्रबल होनेके कारण विजयी होता है ।


और वर्तमान जन्मके पुरुषार्थ--इन दोनोंमें वर्तमान जन्मका पुरुषार्थ ही प्रत्यक्षतः बलवान् है, इसलिये अधिकारी मनुष्यको पुरुषार्थका सहारा लेकर सत्-शास्त्रोंके अभ्यास और सत्सङ्गद्वारा बुद्धिको निर्मल बनाकर संसार-सागरसे अपना उद्धार कर लेना चाहिये । इस जन्मके और पूर्व-जन्मके दोनों पुरुषार्थ पुरुषरूपी वनमें उत्पन्न हुए फल देनेवाले वृक्ष हैं । उन दोनोंमें जो अधिक बलवान् होता है, वही विजयी होता है (अर्थात् धर्माचरण और मुक्तिके विषयमें तो इस जन्मका पुरुषार्थ बलवान् है और अर्थ एवं कामके विषयमें पूर्वजन्मका फलदानोन्मुख कर्म या दैव प्रबल है । )

जो पुरुष उदार स्वभावसे युक्त एवं सत्कर्मके लिये प्रयत्न करनेमें कुशल है, सदाचार ही जिसका लीला-विहार है, वह जगत्‌के मोहरूपी फंदेसे उसी प्रकार निकल जाता है, जैसे सिंह पिंजड़ेसे । जो मनुष्य दृष्ट (पुरुषार्थ या परम कल्याणके लिये प्रयत्न) का त्याग करके 'मुझे तो कोई ऐसा करनेके लिये प्रेरित कर रहा है,' ऐसी अनर्थकारिणी कुत्सित कल्पनामें स्थित हैं, उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये; क्योंकि वह मनुष्योंमें अधम हैं । संसारमें सहस्रों व्यवहार हैं, जो आते-जाते रहते हैं । उनमें सुख और दुःख बुद्धि (अनुकूलता तथा प्रतिकूलताजनित राग-द्वेष) का त्याग करके शास्त्रके अनुसार आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको सारी अभीष्ट वस्तुएँ उसी प्रकार प्राप्त होती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्न । सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्ति—यही मनुष्यका स्वार्थ है । उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले जो आवश्यक कर्तव्य या साधन हैं, एकमात्र उन्हींमें तत्पर रहनेको ही विद्वान् लोग पौरुष कहते हैं । वह तत्परता यदि शास्त्रसे नियन्त्रित हो तो परम पुरुषार्थकी

७—पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा

७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्राप्ति करानेवाली होती है। कर्तव्यपालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रिया (श्रवण-मनन आदि साधन) से, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है। विद्वान्लोग अन्तरहित, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को जानते हैं। जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उनका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये। वे साधन हैं शास्त्रोंका स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक आत्म-कल्याणके साधनमें संलग्न होता है, उसे अपने पुरुषार्थसे ही हाथपर रखे हुए आँवलेकी भाँति वह अभीष्ट फल प्रत्यक्ष दिखायी देता है। जो इस प्रत्यक्ष पुरुषार्थको छोड़कर दैवरूपी मोहमें निमग्न होता है, वह मूढ़ है।

अतः शुभाशय श्रीराम ! अपनी कोरी कल्पनाके बलसे उत्पन्न, मिथ्याभूत तथा सम्पूर्ण कारण और कार्यसे रहित दैवकी अपेक्षा न रखकर आत्मकल्याणके लिये अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लो। शास्त्रोंद्वारा तथा महापुरुषोंके सदाचारसे विस्तारको प्राप्त हुए विविध देश धर्मोंद्वारा समर्थित जो परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय प्रसिद्ध फल है, उसके लिये हृदयमें अत्यन्त उत्कट अभिलाषा होनेपर उसकी प्राप्तिके लिये चित्तमें स्पन्दन या चेष्टा होती है। तत्पश्चात् इन्द्रियों और हाथ-पैर आदि अङ्गोंमें क्रिया होती है—इनके द्वारा श्रवण-मनन आदि एवं यम-नियमादि साधनोंका आरम्भ होता है, इसीको उत्तम पुरुषार्थ कहते हैं। अधिकारी पुरुषका जन्म पुरुषार्थके सिद्ध होनेपर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं—ऐसा जानकर सदा आत्मकल्याणके प्रयत्नमें ही संलग्न रहना चाहिये। तत्पश्चात् साधनविषयक उस तत्परताको सत्-शास्त्रोंके अभ्यास एवं संत-महात्माओं तथा ज्ञानी पुरुषोंके सेवनद्वारा आत्मज्ञानरूप फलकी प्राप्तिसे सफल बनाना चाहिये। आत्मकल्याणके विषयमें यदि परम पुरुषार्थका आश्रय लिया जाय तो वह अवश्य दैवको जीत लेता है, ऐसी धारणा रखकर दैव और पौरुषके बलाबलका विचार करनेके कारण जो परम सुन्दर प्रतीत होते हैं तथा जिनमें शम, दम आदि साधन भी विद्यमान हैं एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवासे जिनका अन्त करण सदा भावित रहता है, ऐसे अधिकारी पुरुषोंको तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये अवश्य उद्यम करना चाहिये। इस जन्ममें सम्पादन करनेयोग्य स्वाभाविक प्रयत्न ही परम पुरुषार्थकी सिद्धिका हेतु है, ऐसा निश्चितरूपसे जानकर यह अधिकारी जीव नित्य संतुष्ट एवं उत्तम ज्ञानीजनोंकी सेवारूप अमोघ, मधुर और उत्कृष्ट औषधसे जन्म मरणकी परम्परारूप भवरोगको शान्त करे। (सर्ग ६)

विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन

जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे आलसी मनुष्य स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका नाश कर डालते हैं।* बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियोंके द्वारा की जानेवाली चेष्टाएँ पौरुषके रूप हैं। इन्हींसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। साक्षी चेतनमें पहले जैसी विषयकी अनुभूति होती है, मन वैसी ही चेष्टा करता है। मनके व्यापारके अनुसार शरीर चलता है—शारीरिक क्रिया होती है और उसके अनुसार ही फलकी सिद्धि होती है। लोकमें जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है, वहाँ-वहाँ वैसे-ही-वैसे पौरुषके उपयोगसे तदनुरूप लौकिक या वैदिक फलकी सिद्धि होती है। पुरुषार्थसे ही बृहस्पति देवताओंके गुरु बने हुए हैं और पुरुषार्थसे शुक्राचार्यने दैत्यराजोंके गुरुका पद प्राप्त किया


* ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु० ७। ३)