भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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सन्तति-शास्त्र ।

पसृताका चाहिये । परन्तु कपड़े सब नए हों, यदि नए न हों ओ इतने थोपे हों कि उनमें बन्दू न रहे । कपड़े चाहे नए हों या पुराने, कमसे कम चार दिन धूपमें सुखलाना जरूर चाहिये, इसलिये कि जूहरीले और मामान्य जीव न रहे । ऐसे जीव अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करते हैं ।

इस विषयमें सबसे पहले यह बात स्त्रियोंको निश्चय कर लेनी चाहिये कि बच्चा पैदा होनेमें कितनी देर है ? यह बात प्रायः एक सप्ताह पहले ही स्त्रीके लक्षणोंसे मालूम हो सकती है । वैद्यककामत है कि एक सप्ताह पहलेसे पेट हलका हो जाता है । बच्चा कुछ नीचे उतर आता है, आमाशयपर दबाव नहीं रहता, पेशाब जल्दी जल्दी उतरता है । पाखाना जानेमें कुछ कष्ट होता है । पैंसा होनेके एक दो दिन बाद एक प्रकारका पानी योनिसे निकलने लगता है और कभी कभी मीठा मीठा दर्द भी होता है । ऐसी दशा आठ दस दिनतक प्रायः रहती है । इन्हीं दिनोंमें पैदा होनेका दर्द उठता है । ऐसा दर्द दो प्रकारका होता है—सच्चा और और भूठा । भूठा दर्द प्रारम्भ होते ही खिया संमभ लेनी हैं कि अब बच्चा होनेवाला है । इसमें पीडा और योनिका सकोचन नियमके अनुसार नहीं होता और न बढ़ता है । ऐसा दर्द पेटके अगले हिस्सेमें होता है । सच्चा दर्द यह एक खास दर्द है । यह गर्भाशयके पिछले हिस्सेसे प्रारम्भ होकर आगे आता है । इसमें जरायुका मुख चौड़ा हो जाता है । भूठा दर्द होनेका कारण पाखाना और पेशाबका रुकना है । जब पाखाना पेशाब हो जाता है तब भूठा दर्द शान्त हो जाता है । सच्चे दर्दमें पहले जरायु और इसके बांट उबरके पेगी तन्तुओंमें सकोचनके दवावसे बालक नीचे उतरता है । योनिका मुख फैलता और दर्द चढ़ता चला जाता

बच्चेकी दौदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है। जब बालक योनि-द्वारसे नीचे उतरता है तब जो पीड़ा होती है वह सहन करने योग्य नहीं होती। ऐसी पीड़ा उन स्त्रियोंमें कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, कठिन होती है, परन्तु जिनके दो चार बार बच्चा हो चुका है, उनके कुछ कम होती है।

सबसे पहला काम प्रसवमे जरायुका मुख चौड़ा होना है। इसमें प्रायः दस बारह घंटे लगते हैं। परन्तु जब पहले पहल बच्चा होता है तो और भी देर लगती है। गर्भाशयका मुख चौड़ा होनेके बाद बच्चा पैदा होनेमें दो तीन घंटे उन स्त्रियोंको लगते हैं कि जिनके बच्चा कई बार हो चुका है, नयी स्त्रियोंको कुछ और देर लगती है।

जैसे जैसे गर्भाशयका मुख फैलता जाता है तैसे तैसे भिल्लीकी थैली जिसमे कि बच्चा रहता है आगेको निकलती चली आती है। जब गर्भाशयका मुख अच्छी तरह फैल जाता है तब जरायु और योनिका रास्ता एक हो जाता है। ऐसी दशामें तेज पीड़ा होती है। इसका कारण वह है कि बच्चा नीचे उतरता है। इस समय स्त्रियां बहुत बड़ी असामधानियां करती हैं। प्रायः देखा गया है कि स्त्रियां खड़ी होती हैं, उठती बैठती और बार बार चलती फिरती हैं। उकरूँ बैठकर काँख-ती, खांसती और जोर लगाती हैं। कभी दूसरी स्त्रियां पेट मसलती और दबाती, हैं इससे बड़ी हानियां होती है। ऐसे ही कर्म बच्चेको कभी कभी टेंहा कर देते हैं। अंगरेंजोंके यहां पलंगपर लिटा कर बच्चा जमाया जाता है। इस विषयमें वैद्य-कका मत है कि लेटकर बच्चा जानानेसे किसी अवयवमें आघात नहीं पहुंचता (१० क०) और यही धन्वन्तरिमहाजका भी मत है। बच्चा पैदा होनेमें स्त्रीको दर्द क्यों होता है ? इसका

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सन्तति-शास्त्र ।

कारण यह है कि बच्चा फिलीको फाड़कर निकलता है । दूसरा कारण यह कि गर्भाशयमें चिपटी हुई खेडी वच्चेके साथ बाहरको खिचती है । पहले पहल बच्चा होनेवाली स्त्रियोंको विशेष पीडा इस कारण होती है कि उनके श्रवयोंका फैलाव कमी नहीं हुआ है । स्त्रीके पास जिस समय दाई पहुँचे उसे पहले हाथके नार्वून काट डालना चाहिये । सफेद कपड़े कि जिनमें कुछ भी गन्धगी न हो पहनना चाहिये, हाथमें किसीप्रकारका जेवरा जैसे अँगूठी इत्यादि जिससे प्रसूताको चोट लगनेका भय हो, निकाल देना चाहिये । दाईके अतिरिक्त दो चतुर स्त्रियाँ और भी हों । इनको भी दाईके अनुसार सफाईसे श्रन्दर जाना चाहिये । प्रायः पैंसी नासमभू और वैहदी दाइयाँ या अन्य स्त्रिया प्रसूताको डराती और धमकाती हैं । यह बहुत बुरी बात है । पैंसा करनेसे बच्चा रुक जाता है । जिस समय दाई प्रसूताके पास पहुँचे उसको सबसे पहले यह देखना चाहिये कि गर्भाशयका मुख खुला है या नहीं । यदि मुख नहीं खुला है तो कोई बात नहीं । अगर मुख खुला है तो बच्चा श्रवण्य होगा । पैंसी दशामें अंगरेजी रीतिके अनुसार पलंगपर लेटा देना चाहिये । जब स्त्री चित्त लेट जावे तो दोनों कोखोंको टटोलकर यह देखना चाहिये कि बच्चा किस ओर और किस तरफ है । यह ईश्वरका नियम है कि हमेशा बच्चेका सर नीचे और पैर ऊपरको होते हैं, परन्तु कभी कभी इसका उलटा भी हो जाता है । कभी बच्चा टेढ़ा होकर आडा हो जाता है । ये कठिन दशार्थ ह ।

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जब गर्भाशयमें बच्चेका सर ऊपर होता है, तब पहले पैर निकलते हैं । जब बच्चा टेढ़ा हो जाता है, तो वह पैरके बल न सिर के बल पैदा होता है । पैंसी दशामें चतुर दाइयोंसे काम

वच्चेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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लेना चाहिये । पेटमें हाथ डाल कर वच्चेको सींथा कर देना परस कर्तव्य है । दाईको यह ज़रूर जान लेना चाहिये कि बच्चा किस तरह पैदा होगा । जब बच्चा दाहनी बगलमें कुलबुलावे और चाई कोख भारी हो तो जान लेना चाहिये कि पहले बच्चेका सर निकलेगा । जब चाई कोख फड़के और उसी श्रोर वालक कुलबुलाता जान पड़े और दहिनी कोख भारी हो, तो बालकका पैर पहले निकलना समझना चाहिये; परन्तु यह बात याद रहे कि दहिनी कोखकी कुलबुलाहट तो साफ जान पड़ती है; परन्तु चाई ओरकी बहुत कम । इसलिये जब चाई ओरकी कुलबुलाहट न जान पड़े तो खीसे पूछना चाहिये, क्योंकि खीको ऐसी कुलबुलाहट अच्छी तरह मालूम होती है । इस प्रकार दाईको स्वयं देखकर दहिने चाई दोनों ओरकी वावत खीसे पूछकर निश्चय कर लेना कर्तव्य है । यदि बालक आड़ा या तिरछा आ गया है तो ऐसी दशामें पहले वच्चेका हाथ निकलेगा । इस मौकेपर यह बतलाना बहुत जरूरी है कि पेटमें पैदा होते समय बच्चा क्यों तिरछा हो जाता है ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि अत्यन्त करवट सोने, उलटे लेटने, दौड़ने, तेज चलने, नीचे ऊँचे चढ़ने, गर्मके वन्धनोंके हीले पड़ने, और भारी चीजके उठानेसे पैदा होते समय बच्चा पेटमें टेढ़ा होता है ।

( श० श० )

पहले पहल गर्मसे पैर, निकलना भी नियमके विरुद्ध है । जब बालक पेटमें ही मर गया हो, या उसका सर बहुत भारी हो गया हो, या खीको ऐसा रोग हो गया हो कि जिससे वच्चेकी आकृतिमें अन्तर पड़ गया हो, या वच्चेको अपने स्थानसे हट जाना पड़ा हो, या खीको सख्त चोट लग जावे कि जिससे उससे उसके कमर ऐसे स्थानमें परिवर्तन हो गया हो, या

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सन्तति-शाल ।

पेटमें एकधारगी चोड लगी हो, ऐसी दशाओंमें गर्भगत बालक टेढा हो जाता है। परन्तु बालक टेढा होता कब है? इस विषयमें अनेक मत हैं। कोई यह कहते हैं कि पैदा होते समयमें, कोई यह कहते हैं कि पैदा होने समयके दो तीन मास पहले। प्रायः यह देखा गया है कि जब छः मास तकका गर्भ गिरता है, तब या तो पहले हाथ निकलता है या पैर। कारण इसका यह है कि सातवें महीनेमें बच्चे का सर बोकके कारण नीचे और पैर ऊपरको हो जाते हैं। इससे यह मालूम होता है कि छः महीनेतक गर्भमें बच्चेके रहनेका कोई ढंग ठीक तौरसे नहीं रहता। इसलिये जो समय बच्चेके ऊपर पैर और नीचे सर होनेका है यदि उस समय माताको ऊपर कहे हुए कारणोंमेंसे कुछ हो जाय तो बच्चा पेटमें तिरछा या टेढ़ा हो जाता है। प्रायः ऐसा भी देखा गया है कि जब पैर निकलता है तो यातो दोनों पैर निकलते हैं, या एक ही निकलता है। यह दशा भी एक हाथ निकलनेके समान समझनी चाहिये। किसी किसी के सर और हाथ या सर एक पाँव या चारों हाथ पाँव एक साथ निकलते हैं। यह भयङ्कर दशा है। इसका भी वही कारण है जो पहले लिखा गया है।

जब ऐसा हो कि बालक तिरछा पड़ जाय तो उसका सर सीधे रास्ते पर लाना चाहिये। सबसे पहले बालक गर्भगारके दहिने व्यासमें आता है, इससे कुछ दूर हट कर पिछला भाग सामने और मूलाधारकी बाई ओर रहता है। बालककी पीठ माताके पेटके सामने और बाई ओर रहती है। बालकका मुँह और पेट माँकी पीठकी ओर दहिने तरफ होता है। इसके बाद बालकका सर गर्भगारके बाएँ व्यासमें रहता है। सरका पिछला भाग सामने मूला धारके दहिने तरफ रहता है।

वच्चोंकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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बालककी पीठ माताके पेटके सामने और दाहिनी ओर होती है । मुँह और पेट माताकी पीठकी ओर वायुँ तरफ रहता है ।

इसके बाद वच्चोंका सर माताके कोखमें आ जाता है और फिर धीरे धीरे बालकका सर ठीक सीधे रास्तेपर आता है और सरका पिछला भाग माताकी बाईं जाँघ और मुख दहिनी जाँघकी ओर रहता है । ऐसी दशामें सर निकलता है और गरीरकन्धेसे अटक जाता है । दहिना कन्धा सामने मूलाधारकी हड्डीपर जा लगता है और बायाँ कन्धा धीरे धीरे बाहर निकलता है । इसके निकलते ही दहिना कन्धा बाहर निकल आता है और वच्चा पैदा हो जाता है । गर्भाशयके भीतर एक फिल्लीदार वारीक चमड़ेकी थैलीसी होती है जिसमें जल भरा रहता है । इसीमें बालक रहता है । ज्यों ज्यों गर्भाशयका मुख फैलता चला आता है, त्यों त्यों वह थैली कि जिसमें बालक रहता है निकलती जाती है । कभी कभी बिना थैली फटे ही थैली सहित बालक उत्पन्न होता है, परन्तु ऐसा कम होता है । प्रकृतिका नियम यही है कि बालकके निकलनेके साथ ही फिल्ली फट जाती है । जब फिल्ली मजबूत होती है तो उसे फाड़ना पड़ता है, परन्तु जब तक गर्भाशयका मुख अच्छी तरह न फैले, उस समय तक फिल्ली न फाड़ना चाहिये । प्रायः अनजान दाइयाँ गर्भाशयका मुख अच्छी तरह फैलनेके पहले ही फिल्ली फाड़ देनी हैं । ऐसी दशा बड़ी भयङ्कर होती है ।

वच्चा जिस समय गर्भसे बाहर होने लगता है उस समय दाईको बहुत बड़ी सावधानी करनी चाहिये । जब वच्चोंका सर निकले तो उस समय यह भी देखना चाहिये कि सरके साथ और तो कुछ नहीं निकलता है, क्योंकि प्रायः सरके साथ नाल भी कभी कभी लिपट कर निकलने लगता है । यदि ऐसा

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सन्तति-शास्त्र ।

हो तो वच्चके गलेमेंसे नालको निकाल देना चाहिये । पैदा होते समयमें सरको दहिने हाथसे सँभालना और वार्प हाथसे गर्भाशयको पेटके ऊपरसे दवाते रहना चाहिये । ऐसा करनेसे बच्चा पैदा होनेमें सहारा लगाता है और गर्भाशय सिकुड़ता जाता है । इस प्रकार करनेसे बच्चा सुख पूर्वक स्वयं निकलता चला आचेगा । जब पैदा होनेमें देर लगे तो समझना चाहिये कि बच्चेका सर बड़ा है या कोई विकार उत्पन्न हो गया है ।

वैद्यकका मत है कि जब बच्चा पैदा होनेमें देर लगे या न पैदा होता हो, तो ऐसे समयमें काले सर्पकी कँचुलकी धूनी देनी चाहिये । ( श० क० )

एक आचार्यका मत है कि गऊका मस्तक जिसमें मांस और चमड़ा न हो केवल हड्डी ही हड्डी हों उसको बच्चा पैदा होनेवाले मकानकी छतके ऊपर रखनेसे सुखपूर्वक बच्चा उत्पन्न होता है । ( रतिनाम्न )

नहीं रोशनीके लोग ऐसे प्रयोगोंको व्यर्थ समझते हैं, परन्तु जहाँ यह प्रयोग किया गया है सफलता हुई है । प्रायः नास-भम दार्यों बच्चेको खींचकर निकालनेकी कोशिश करती हैं । ऐसा करना भयङ्कर है । इससे हाथ पैर उखड़ जानेका भय रहता है ।

जब बच्चा पैदा हो जावे तो उस समय बहुत बड़ी सावधानीसे काम लेना चाहिये । सबसे पहले बच्चेके मुँह, आँख कान, नाक और नखोंको साफ़ कपड़ेसे नुब स्वच्छ करना और मुखमें अँगुली डालकर भाग कि जो भीतर तक भरा रहता है साफ़ करके नाल काटना चाहिये । नाल वह चीज़ है कि जिससे गर्भमें बच्चेका पोषण होता है । यह बच्चेको नाभी में लगा रहता है और पैदा होने पर बच्चेके साथ बाहर निकल

वच्चेकी पैडाइशके समयका कर्तव्य।

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आता है। आजकल नाल काटनेमें हमारे यहां कैसी लापरवाही की जाती है। बच्चा जानने और नाल काटनेके लिये पेसी वेहरी दायरा आती हैं कि जिनके कपड़े बदबूदार और सड़े होते हैं। पेसी चमारिन्, या दायरां स्थावरमें आनेके लिये एक ही कपड़ा रखती हैं, जिसे पहन कर ऐसे समयमें वह हर जगह जाया करती हैं। लौट कर उनको धोती भी नहीं। हर जगहका खून, आमर इत्यादिकी गन्दगी और फिझीका पानी उसमें लगा करता है। आनेके साथ ही चमारिन् दू दूई स्थावरमें सीधी चली जाती हैं। यह न तो हाथ धोती व कपड़े उतार कर दूसरे कपड़े पहनती हैं। इनके पास एक औजार नाल काटनेके लिये होता है। इसको सबके यहां ले जाती हैं। यह कभी और कहाँ धोया नहीं जाता। इस औजारमें हर जाति और अनेक रोगके माना-पितासे उत्पन्न बच्चोंके कटे हुए नालका खून लगा रहता है। यही कारण है कि आजकल बच्चोंके अनेक प्रकारके रोग ऐसे गन्दे औजारसे नाल काटने पर हो जाते हैं। ऐसी दशामें एक खास तरहका रोग कि जिसको 'टिडेनेस' कहते हैं बच्चोंको हो जाता है। इसको 'थनुस्तम्भ' और 'जमोगा' कहते हैं। इस रोगका असर बच्चोंमें कटे हुए नालपर औजारकी गन्दगी लगनेसे पहुँचता है। इस रोगमें बच्चा रोता, शरीर पेंटता और चल बसता है। यदि इसका प्रमाण यह है कि नाल काट कर यदि उस हिस्से पर कि जो बच्चेके शरीरसे लगा रहता है कोई जहरीली चीज लगा दी जाय तो बच्चा तुरन्त मर जायगा। कारण इसका यह है कि नाल और बच्चेके शरीरसे बराबर रक्तका प्रवाह रहता है। इसी प्रकार कटे हुए नाल पर औजारकी गन्दगी

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सन्तति-शास्त्र ।

लगनेसे तुरन्त बच्चेमें उस गन्दागीका विष पहुँच जाता है । अतएव नालको एक बहुत अच्छे साफ गरम पानीसे खूब धोये हुए तेज चाकूसे काटना चाहिये । विचारी प्रसूता भी ऐसी गन्दागीकी बदौलत मरनेसे बचती है । इसको अनेक रोग प्रसूत ज्वर सरीखे हो जाते हैं । याद रहे कि ऐसी चमारिन गन्दी रह कर कभी अन्दर न घुसने पावे । इनके हाथ पाँच और शरीर खूब साफ करा देना चाहिये । हाथोंकी सबसे ज्यादा सफाई होती जरूरी है । नाखून कटवा कर उनके अन्दरका मेल कुचीसे साफ करा देना चाहिये । यह भी ध्यान रहे कि चमारिन रजोधर्मसे न हो । नाल कैसे काटना चाहिये यह एक सामूही बात है । नालको नाभीसे चार अँगुल छोड़कर एक ऐशमी तागेसे गाँठ लगाकर बाघे और दूसरी गाँठ पहिली गाँठसे दो इञ्च ऊपर लगावे और उन दोनोंके बीचसे नालको रोज चाकू या कैंचीसे काट देना चाहिए ।

इस विषयमें भी हमारे देशमें तरह तरहके रिवाज हैं । कहीं टेकरेसे रमाड़ कर, कहीं पतली लकडीसे, कहीं हँसिया, (घास काटनेका औजार) से काटते हैं । इस तरहसे नाल काटना बहुत बुरा है । इससे बच्चेको बहुत बड़ा दुःख होता है । जहाँ तक हो नाल काटनेमें जल्दी करनी चाहिये क्योंकि जब-तक नाल नहीं कटता बच्चेको ग्यांस लेनेमें बड़ा दुःख होता है । नाल कटते ही बच्चा फुस फुस करके ग्यांस लेने लगता है । इसके बाद बच्चेको गरम पानीसे साफ करके नाल पर स्वच्छ और नरम कपड़ा लगा देना चाहिये । बच्चेको गरम पानीसे साफ करनेका मतलब यह है कि जो कुछ उसके बदन्म लगा है वह सब साफ हो जाय । कई जगह तो यह रवाज है कि बच्चेको साफ करनेके लिये उसके शरीरमें गरम राम लपेटने

वच्चकेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है। इससे बड़ी हानि होती है। कभी कभी राख श्वाँस द्वारा पेट, नाक और मस्तकमें पहुँच जाती है। इसलिये गरम पानी-से नहलाना उत्तम है। जब वच्चा साफ हो जाय और यदि जाड़ेके दिन हो तो फलालैनमे और गरमीके दिनोंमें साफ कपडेंमें लपेट कर पलंगपर सुला देना चाहिये।

वच्चा उत्पन्न होनेके बाद स्त्रीको कठिन पीड़ा होती है। प्रायः देखा गया है कि अनजान दाई प्रसूता को खड़ी भी करती है, इस कारण कि स्त्रुत गिर जावे। ऐसा न करना चाहिये। दाइयाँ गर्भाशयके अन्दर भी हाथ डाल देती हैं। इससे मर्मस्थान बिगड़ जाता है। वच्चा पैदा होनेके साथ या उससे थोड़ी देर बाद आमर गिरती है। यदि न गिरे तो गिरानेकी कोशिश करनी चाहिये; परन्तु पकड़ कर न खींचा जावे, इससे रक्त ज्यादा गिरता है। पैदा होनेके समयसे लेकर जब तक आमर न गिरे पेट दबाये रहना चाहिये। इससे गर्भाशय सिकुड़ जाता है और आमर जल्दी निकल आती है। ऐसे समयमें वच्चका रोना जरूरी है। जब वच्चा कष्ट के साथ होता है तब वह घबड़ा जाता है। प्रायः थाली बजानेका रिवाज है इसका कारण यही है कि बाजेसे बच्चा रोचे। बच्चेका रोना इस बातको बतलाता है कि वह निरोग है। यदि बच्चा न रोवे तो उसे थपथपाना चाहिये। बच्चा पैदा हो जानेपर प्रसूताको कुछ बेहोशी सी आ जाती है और चेत होनेपर कठिन दर्द होता है। ऐसे दर्द से आमर निकल आती है। यदि न निकले तो पेड़ धीरे धीरे मसलना उत्तम है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि आमर का जरा सा भी टुकड़ा गर्भाशयमें न रहने पावे। वही स्त्रियाँ प्रसव के रोगोंमें अधिक फँसती हैं कि जिनके पेटमें आमरका टुकड़ा रह जाता है। ऐसी दशामें जब

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सन्ततिशस्त्र ।

कि आमर निकल जाती है, गर्भाशयको बहुत काम करना पड़ता है। बच्चा पैदा होनेके बाद गर्भाशय सिकुड़ता है, परन्तु आन्दर खेडी रह जानेसे नहीं सिकुड़ने पाता और बहुतसा रक्त निकल जाता है। जब आमर का टुकड़ा आन्दर रह जाता है तो वह सड़ता है और प्रसूत ज्वर सरीखे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। आमर को तुरन्त गाड़ देना चाहिये, रूखे रहनेसे दुर्गंध फैल जाती है। इसके बाद प्रसूताको तुरन्त साफ कर देना चाहिये और एक पट्टी जो दो गज लम्बी और १२ इञ्च चौड़ी हो, पेट के ऊपर कसकर बांध देना हितकार है। उसकी गांठ दूसरे कपडेके लपेटनेसे बगलमें लगा देनी चाहिये और प्रसूता के शीनि-सुख पर एक कपडे की गद्दी बना कर लगा देना जरूरी है। जो पट्टी पेटके ऊपर बाँधी है उसमेंसे एक लँगोटी ऐसी बांध देना चाहिये कि जिससे वह गद्दी न गिरे। ऐसा करनेसे पेट और गर्भाशय दोनों ठीक रहते हैं। यदि लेटे लेटे बच्चा हुआ हो तो उठाने की आवश्यकता नहीं है। यदि बैठ कर हुआ हो तो बांध कर तुरन्त चित्त लेटा देना चाहिये। जितनी डेर आरामसे प्रसूता लेडी रहेगी, उतना ही अच्छा है। उठने बैठनेसे रक्त अधिक निकल जाता है। जब गर्भाशयमें आमरका टुकड़ा रह जाता है तब फिरसे दर्द प्रारम्भ होता है। कभी कभी रक्त गर्भाशयमें जम जाता है। ऐसी दशामें हाथ पांवके जख पीले पड़ जाते हैं। इनकी परीक्षा करते रहना जरूरी है। इससे कम दस दिन प्रसूताको उठने न देना चाहिये। पाखाना पेशाब यदि चारपाईपर ही हो तो हरज नहीं, परन्तु इस बान्को हमारे देशमें स्त्रियाँ कभी स्वीकार न करेंगी। वे पाखाना पेशाबके लिये अवश्य उठेंगी।

बुढीके दिन तो उठना और नहाना आवश्यक माना जाता

बच्चोंकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है, परन्तु अंगरेजोंमें इस बातकी कड़ी मनाही है कि प्रसूता न उठे । कारण इसका यह है कि उठने बैठनेसे गर्भाशय टल जाता है । उसकी वनावटमें कुछ देढ़ापन आ जाता है । रक्त-स्त्रावका डर रहता है । इसलिये चार दिनतक तो उठ कर बैठना भी न चाहिये, करवट बदल कर लेटना या तकियेका बदला करना हानिकारक नहीं है ।

बच्चा पैदा होते ही गर्भाशय सिकुड़ने लगता है और दस दिनमें आधा रह जाता है । धीरे धीरे घटकर दो महीनेमें ठीक पहले कासा हो जाता है ।

जिस दिन बच्चा उत्पन्न हो उस दिन सूज आना अच्छा है । यदि दस्त न हो तो कोई हरज नहीं । यहाँ पर यह एक बड़ा भारी प्रश्न है कि प्रसूता को कब और क्या खाना चाहिये ? इस बातको प्रायः सबही मानते हैं कि बच्चा उत्पन्न होनेके दिन तो अन्न कुछ भी न देना चाहिये, क्योंकि दबाव पड़ने और बेचैनी होनेसे इन्द्रियाँ इस योग्य नहीं रहतीं कि वे पचा सकें । इसलिये गरम गरम गायका दूध देना हितकर है । पाँच दिन और कोई चीज न देते हुए केवल गायका दूध ही देना हितकर प्रतीत हुआ है । इसके पीछे सावधाना देते हुए दस दिनके बाद दालका पानी इत्यादि देना उत्तम है, परन्तु हमारे देशमें प्रायः प्रसूता बहुत जल्दी गुण साँठ खाना प्रारम्भ कर देती है । चाहे वह पचे या न पचे, परन्तु उन्हें खानेसे मतलब । इसी कारण दस्त आने लगते हैं और अनेक रोग खड़े हो जाते हैं । जब भोजन पचने लगे तो पौष्टिक पदार्थ खानेमें कोई हरज नहीं है । कहीं कहीं प्रसूताको तीन तीन दिन कुछ नहीं देते । यह बहुत बुरी बात है, पानी तो किसी दशामें न देना चाहिये । इसके स्थान पर गरम दूध देना हितकर है ।

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सन्तति-शास्त्र ।

नहाना अत्यंत बुरा है, परन्तु जाति और समाज में प्रायः कुछ दिन नहाने का रिवाज है। सरदीके दिनोंमें इसी नहानेकी बदौलत कितनी ही स्त्रियां कालके मुखमें पहुँचती हैं। अतएव इस दिनतक नहाने, चलने, उठने, बैठने इत्यादिसे बहुत बड़ी हानि पहुँचती है। अतएव देसी देशओंमें स्त्रियाँको सावधानी से काम लेना चाहिये।

(६०) जन्म लेनेपर बच्चेको दूध

कब पिलाना चाहिये ?

इस विषयमें अनेक रवाज और विचार हैं। सब अपने रवाज और विचारोंको उत्तम समझते हैं। कोई तुरन्त कोई कुछ देर में दूध पिलाना पसन्द करती हैं। कोई आठ आठ घण्टेतक खबर ही नहीं लेतीं। अनेक श्रुतुभवशील विद्वानोंकी राय है कि प्रसूताके साफ़ होने और चारपाई पर लेटनेके पीछे तुरन्त बच्चेको स्तनोंमें लगा देना चाहिये। परन्तु यह याद रहे कि तीन घण्टेसे अधिक इस काममें न लगें जब बच्चा स्तनोंसे लगेगा तो उसे दूध पीनेसे की वान्त पड़ेगी। स्तनोंमें जल्दी लगानेका कारण यह है कि बच्चेको यह बतलानेकी जरूरत है कि उसका आहार स्तनोंमें है। बच्चेके पेटमें जो गन्दी भरी रहती है वह दूध पीनेपर साफ़ हो जाती है। पहले पहलका दूध बच्चेके लिये उद्योगका काम करता है।

वैद्यकका मत है कि स्त्रियाँमें दूध पुत्रके छूने, देखने और स्पर्श करने तथा बालकके स्तन पकड़नेसे चीर्थकी तरह उत्तरता है। इसमें मुख्य हेतु माताका स्नेह है। (आ० वा० प्र० ९)

जिन स्त्रियाँके पहले पहल बच्चा होता है उनका तीसरे दिन अच्छी तरह दूध उतरने लगता है, परन्तु जो कई बच्चोंकी

60. जन्म लेनेपर वचको दूध कब पिलाना चाहिये ?

जन्म लेनेपर वच्चको दूध कव पिलाना चाहिये ? २४६

मातापैँ हो चुकी हैं, उनके प्रायः उसी दिनसे उत्तर आता है। जब दूध न उत्तरे तो गाय या बकरीका दूध पिलाना चाहिये। परन्तु दूध न उत्तरनेपर भी वच्चको चार बार स्तनोंमें लगाना जरूरी है। इसलिये कि बच्चा अपने दूधका स्थान न भूले और दूधके प्रवाहकी उत्तेजना होती रहे। प्रायः देखा गया है कि स्तनोंमें भरपूर दूध भरा रहनेपर भी बच्चा दूध नहीं पिता। धरके लोग माताकी असावधानी और भूत प्रेतका अनुमान करते हैं, परन्तु कारण कुछ और ही होता है। प्रायः मुँहके अंदर भाग इत्यादिकी सफाई न होनेसे बच्चा छाती नहीं दवा सकता। किसी किसीके जीभके नीचे एक प्रकारकी भिल्ली लगी होती है, उससे बच्चा दूध नहीं खाँच सकता। ऐसी दशामें इन बातों को देख लेना जरूरी है। ऐसी भिल्ली काट देनेसे बच्चा दूध पीने लगता है। जिन स्त्रियोंमें छोटी भिटनी होती है उनसे बच्चे ठीक तौरसे दूध नहीं खाँच सकते। भिटनी छोटी पड़ जानेका कारण यह है कि जो स्त्रियां स्तनोंको खूब कस कर रखती हैं तो दवाव के कारण भिटनी छोटी पड़ जाती है। ऐसी दशाओंमें बच्चको दूध पीना कठिन पड़ जाता है। बहुत सी मातापैँ बच्चको लगातार देरतक दूध पिलाती हैं। ऐसा न होना चाहिये। इससे बच्चा अधिक दूध पी जाता है। ज्यादासे ज्यादा एक बारमें दस मिनटसे अधिक दूध न पिलाना चाहिये।

प्रायः विलासप्रिय मातापैँ अपना दूध नहीं पिलाती, उनके स्तनोंमें दूध सूख जाता है, नसँ कड़ी पड़ जाती हैं। यदि दूसरा बच्चा होनेपर वे पिलाना चाहें तो दूध उत्तरनेमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिन माताओंके बच्चे बार बार मर जाते हैं, उनके दूधमें एक प्रकारका विष होता है। ऐसी माताओंके

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सन्तति-शास्त्र ।

बच्चे धायके यहां पाले जाने उचित है। परन्तु पैदा होनेके साथ ही धायका दूध पिलाना ठीक नहीं। कमसे कम एक मास गाय या बकरीका दूध पिलाकर जब कि बच्चेकी पाचन-शक्ति ठीक हो जाय, तब धायका दूध पिलवाना चाहिये। सब से उत्तम तो यह है कि धायका दूध न पिलाया जाय। गाय और बकरी के दूधपर बच्चा अच्छी तरह पाला जा सकता है।

(६१) बच्चोंकी तौल ।

हमारे देशमें इस बातको अशुभ मानते हैं कि पैदा होते ही बच्चेको तौला जावे। परन्तु इसके अतिरिक्त और कोई रीति तौल जाननेकी नहीं है। तौलनेसे बच्चेके स्वास्थ्यका पता ठीक लग सकता है। जो बालक जितना हलका होगा उसको उतना ही रोगी समझना चाहिये। पैदा हुए बच्चेको तौल ३ सेरसे ५सेर तक जरूर होना चाहिये। कहीं कहीं इससे कुछ अधिक तौलके भी उत्पन्न होते हैं। बच्चा जब पैदा होता है उसमें जितनी तौल उस समय होती है वह दो तीन दिन पीछे नहीं रह जाती। प्रायः ३ सेरकी कमी अवश्य हो जाती है। इसके दो कारण हैं—पक तो यह कि पैदा होनेके बाद बच्चा पाखाना पेशाब करता है, दूसरा यह कि दो तीन दिन ठीक ठीक दध नहीं मिलता। यहाँपर यह शंका होती है कि गर्भमें दध कहीं मिलता था कि जिससे उसका पालन होता? इस विषय में आचार्योंका मत है कि गर्भमें बच्चेका पालन माताके भोजन किये हुए रससे होता है और पैदा होनेके बाद दधसे पलता है। इसलिये तीसरे दिन बच्चेको तौलना चाहिये। जब बच्चेको दध मिलने लगता है तो उसको तौलव दूने लगती है। हमारे देश की अपेक्षा यूरोपमें बच्चोंकी तौल अधिक होती है।

61. वच्चोंकी तौल

वच्चोंकी तौल ।

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कारण यह है कि गर्भावस्थामे यहाँ माताएँ भोजनपर किञ्चित् विचार नहीं रखतीं, परन्तु यूरोपकी माताएँ गर्भावस्थामे अच्छे से अच्छा, पुष्ट, बलकारी भोजन करती हैं । उत्पन्न होनेके दिन से बारह वर्षतक वच्चोंकी तौलपर ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि प्रारम्भसे ही शरीरकी उन्नति होना आवश्यक है । इस विषयमें विद्वानोंकी रायके अनुसार एक सूची नीचे दी जाती है ।

उत्पन्न होनेपर वच्चोंकी तौल कमसे कम आयुके अनुसार निम्नलिखित क्रोकेके अनुसार होनी चाहिये ।

वच्चोंकी आयुतौलवच्चोंकी आयुतौल
पैदा होते ही३ सेर६ मास१० सेर
१५ दिन३½ " "१० "१०½ "
१ मास४ " "११ "१०¾ "
१½ " "४½ " "१२ "११ " "
२ " "५ " "१ वर्ष१२ " "
२½ " "५½ " "१½ " "१२½ " "
३ " "५¾ " "१ " "१३ " "
३½ " "६ " "२ " "१४½ " "
४ " "६½ " "३ " "१६ " "
४½ " "७ " "४ " "१७½ " "
५ " "७½ " "५ " "१८½ " "
५½ " "८ " "६ " "२० " "
६ " "८½ " "७ " "२२ " "
६½ " "९ " "८ " "२५ " "
७ " "९½ " "९ " "२८ " "
७½ " "१० " "१० " "३२ " "
८ " "१०½ " "११ " "३६ " "
८½ " "११ " "१२ " "

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सन्तति-शास्त्र ।

कमसे कम इतना वजन बच्चोंमें होना आवश्यक है । यदि इससे कम हो तो वे निरोग नहीं कहे जा सकते ।

इन दिनोंमें माताओंको अनेक पुरुष पदार्थ खाने चाहियें; क्योंकि जो माताएँ खाने पीनेपर ध्यान नहीं रखतीं उनके बच्चे डुबले पतले और कम वजनके बने रहते हैं । बच्चा जब तक दूधके ही आसरे रहता है उस समयतक माताके आहारपर ही उसका जीवन होता है । इसलिये माता जैसा भोजन करेगी उसीके अनुसार बच्चेका वजन बढ़ेगा । जब बचपनमें वजनकी कमी रह जाती है तो वह पूरी नहीं होती । यदि होती भी है तो वर्षों लगते हैं । इसलिये बच्चोंको प्रारम्भसे ही चलवाना चनाना हमारा कर्तव्य है ।

(६२) धाय कैसी होनी चाहिये ?

बच्चोंकी जीवन-यात्राके लिये यह एक बड़ा प्रश्न है कि धाय कैसी हो ? प्रायः माताएँ स्तनोंमें दूध न होने या बच्चा पैदा होकर बारम्बार मर जाने या अपने स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाए रखनेके कारण दूध नहीं पिलातीं । ऐसी दशामें बच्चे गाय, भैंस और बकरियों या धायोंके दूधपर पाले जाते हैं । धाय कैसी होनी चाहिये ? यह एक बड़े महत्वका प्रश्न है ।

वैद्यकशास्त्रके एक विद्वान्ने कहा है कि धायको माताके समान होना चाहिये । ( १० क० )

इसका तात्पर्य यह है कि जो कार्य माताका बालकके प्रति है वही धायका भी है । अतएव धायका सर्व-गुण-संपन्न होना आवश्यक है । विद्वानोंने इस विषयका अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया है ।

62. धाय कैसी होनी चाहिये ?

धाय कैसी होनी चाहिये ?

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वैयक्तिक मत ।

१. धाय अपने जातिकी जवान हो, उदंड रोगी न हो, सब अंगोंसे युक्त हो, कुरूप न हो, किसी प्रकारका न्यसन न रखती हुई खोटी न हो, अपने देशकी हो, तुच्छ स्वभाववाली न हो, नीच कामोंके करनेवाली नीच जातिकी न हो, जिसके सन्तान हो और निरोग रहती हो, गोदमें पुत्र हो, बहुत दूधवाली बिना समयके न सोनेवाली, जो जातिके बाहर न हो, अच्छे कामोंकी करनेवाली, पवित्र हो अपवित्रतासे घृणा करनेवाली, जिसके स्तन अच्छे और उत्तम हो, स्तन न बहुत ऊँचे न बहुत लम्बे, न बहुत छोटे हों न पीपलके पत्तेके समान, स्तनोंका अगला हिस्सा पतला हो और बिना परिश्रमके पीनेमें दूध आ जावे । ऐसे स्तनोंकी गुणयुक्त धाय होनी चाहिये । (च० श० अ० ८ श्ल० १०५ व १०६)

२. धाय अपने वर्णके अनुसार जैसे ब्राह्मणको ब्राह्मणी क्षत्रियको क्षत्रिया, वैश्यको वैश्या और शुद्रको शुद्धी होनी चाहिये । वर्ण शब्दसे यह बात भी कही जा सकती है कि धाय माताके रंगके अनुसार हो, ओसत दर्जेके डील-डौल की, न बहुत लम्बी न तिनगी, मध्यम अवस्थावाली अर्थात् सोलह वर्षसे ३५ वर्षतककी निरोग, शीलस्वभाववाली चपल और लोलुप अर्थात् जिसका चित्त रुक न सके, अत्यन्त डुबली या अत्यन्त मोटी न हो, जिसका शुद्ध दूध हो, जिसके हाँठ, लम्बे न हों, स्तन ऊँचे और लम्बे न हों, जिसका शरीर कम बेसी न हो, जैसे ऊ अंगुली होना या एक ही आँख इत्यादि, जिसमें कोई दुर्ब्यसन (दिव) न हो, बालकपर प्रेम रखनेवाली,

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सन्तति-शास्त्र ।

जिसके बालक जीते रहते हों, दग्धवाली, नीच कर्म न करनेवाली, अच्छे कुलकी, बहुतेर गुणोंसे युक्त श्यामा अथवा सुन्दर रूपवती होनी चाहिये। ऐसी धाय बालकको निरोग रखती हुई बलको बढ़ाती है।

(सु० श० अ० ५० श्ल० ३८ व ३९)

३ जवान, सुन्दर, सुगौल, मधुरभाषिणी, निरोग जिसमें सुहृदयताका प्राकृतिक गुण हो, चतुर, श्रद्धाप्रिय, सुडौल गरीरवाली और उत्तम विचारकी पढी लिखी धाय होनी चाहिये। (श० क०)

ऐसे गुणोंसे युक्त धाय के होनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मानाके दग्धका अस्तर बालकोंपर होता है इसी प्रकार धायके दूधका भी होता है। क्रोध करने, बुरे कामोंमें फँसिरहने और निन्दनीय बातोंके विचार करनेसे दूध भ्रष्ट हो जाता है। अन्नपत्र मूत्र परीक्षा करके धाय रखनी चाहिये।

( ६३ ) वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

यह बड़े महत्वका पक्ष है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। जिनको स्त्री और वस्त्रके जीवनका विचार है वे तो कुछ ध्यान भी देते हैं। परन्तु जो विषय-वासनाके प्रेमी हैं, उन्हें कुछ विचार नहीं। इसमें कई मत हैं।

१. वैधकका मत।

१ वच्चा होनेके ऐसे समयतक जब तक कि वह दूध पीता रहे, संयोग न करना चाहिये। (श० क०)

63. वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

बच्चोंका मल मूत्र और नींद ?

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२ जब तक बच्चा अच्छी तरह अन्न न खाने लगे संयोग न करना चाहिये। ( रविशास्त्र )

२. धर्मशास्त्रका मत ।

१. दांत निकलनेके बाद संयोग करना चाहिये। ( शक्तिगृति १६२ )

२. बच्चेके दूध पीनेके समयतक संयोगा न होना चाहिये। ( प्रा० ४० )

इस विषयमें प्रायः सबका मत एक ही सा है। बच्चा प्रायः दो साल दूध पीता है। इसके बाद अन्न खाने लगता है। यदि बच्चेके दूध पीनेके समय संयोग किया जाय तो दूध विगड़ जानेका भय रहता है। एक विद्वान की राय है कि बच्चा पैदा होनेके एक सालतक भीतरी अवयव पुष्ट होते हैं ( श० ६० )

इसलिये दो वर्ष बच्चेको दूध पिलाकर जब वह अन्न खाने लागे इसके बाद संयोग होना चाहिये, नहीं तो बच्चे और माता दोनोंको बहुत बड़ी हानि होनी है।

( ६४ ) बच्चोंका मल मूत्र और नींद ।

बच्चोंकी स्वास्थ्य-परीक्षा करनेके लिये तीन बातें देखनी आवश्यक हैं। मल, मूत्र और नींद। जब ये बातें ठीक हों, तो बच्चोंको निरोग समझना चाहिये। इन बातोंपर पैदा होते समयसे ही ध्यान रखना आवश्यक है। सबसे पहले बच्चे के पेशाबको देखना जरूरी है। प्रायः दूध पीनेके बाद पेशाब होता है। जब पेशाबके मुकासपर मैल लगा हो, तो बड़ा कष्ट होता है। उस समय उसको पेशाबका वेग सहना पड़ता है। इस-