भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)

Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)

राजीव दीक्षित द्वारा

स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

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कोला को भूरा रंग देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ई-150 जैसे डाई से शरीर में विटामिन बी-6 की कमी हो सकती है।

फिलहाल मैक्सिको में शीतल पेयों से होने वाले खतरों के प्रति सावधान करने के लिए प्रेस कांग्रेस से लेकर जगह-जगह कार्यशालाएं तक आयोजित की जा रही हैं। इन आयोजनों के मार्फत एक तरफ लोगों को पोषण संबंधी जरूरतों के बारे में जानकारी दी जा रही है, दूसरी तरफ इन कार्बोनेटेड शीतल पेयों के नुकसानों के प्रति लोगों को सावधान किया जा रहा है। शुभ संकेत यह है कि कोला विरोधी मुहिम को मैक्सिको के लोगों का जबरदस्त समर्थन मिलना शुरू हो गया है और वे कोला कंपनियों के विज्ञापनी भ्रमजाल से बाहर निकलने को कसमसाने लगे हैं।

मुश्किल हिन्दुस्तान की 'सांस्कृतिक बंदर' बनती जा रही पीढ़ी के लिए है। यह पीढ़ी तो आधुनिकता की बयार में बेरोक-टोक बही जा रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नवजवानों को 'कल्चर्ड' बनाने के लिए लाखों डॉलर विज्ञापनों पर पानी की तरह बहा रही हैं और नतीजे के तौर पर देश के नवजवानों पर कल्चर्ड होने की खुमारी भी कायदे से चढ़ने लगी है। अलबक्ता, आजादी बचाओ आंदोलन जैसे संगठन शीतल पेयों को कार्बोनेटेड जहरीला पानी, लहर पेप्सी को जहर पेप्सी और कोकाकोला को धोखा कोला की संज्ञा देकर लोगों को उनके खतरों से सावधान करने के लिए कमर कसे हुए हैं।

इस मुहिम का नतीजा कुछ तो हुआ है कि अब हिन्दुस्तान में भी तमाम लोग इन शीतल पेयों से तौबा करने का मन बनाने लगे हैं। इनमें ऐसे भी धनी टाइप के लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने घरों में पेप्सी-कोक के कैन पर कैन बतौर स्टॉक जमा कर रखे हैं। मुश्किल ये है कि जब इन्हें अहसास हुआ है कि स्टैण्डर्ड बनाने के चक्कर में पेप्सी-कोक का एक घूँट भी हलक नीचे उतारना मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं है तो ये लोग इन शीतल पेयों के जहर से अब दूर तो रहना चाहते हैं पर अपने घरों में स्टॉक के तौर पर जो जमा कर रखा है उसका क्या करें? फिलहाल, इनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल नहीं हुई है कि पेप्सी-कोक के कैन पर कैन नालियों में उड़ेले सकें। तो ऐसे सभी लोगों के लिए आजादी बचाओ आन्दोलन की सलाह है कि जिनके पास पेप्सी या कोकाकोला जैसे शीतल पेयों का स्टॉक है वे इन्हें फेंकने के बजाय संडास की सफाई के काम में ले लें। है न जोरदार सलाह ! आन्दोलन का कहना है कि आखिर लोग अपने घरों में संडास की सफाई के लिए हाइड्रोकलोरिक एसिड का इस्तेमाल करते ही हैं। पेप्सी-कोक में भी फास्फोरिक एसिड और कार्बोलिक एसिड जैसी चीजें हैं। संडास की सफाई वाले एसिड और पेप्सी-कोक का पी.एच. मान भी तीन के आस-पास लगभग एक जैसा ही है। इस पी.एच मान की चीजों को आँतों में पहुंचाना निश्चित रूप से नुकसानदेह है। ऐसे में अगर आपने गलतीवश पेप्सी या कोकाकोला खरीद ही लिया है तो पैसे और सेहत के नुकसान से बचने के लिए इनसे संडास की सफाई कर लेना ही बेहतर उपाय है।

आन्दोलन के कार्यकर्ता कोई हवा में ये बातें नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बाकायदा प्रयोग करके देखा और पाया है कि पेप्सी और कोकाकोला जैसे शीतल पेयों से संडास की गन्दगी वैसे ही चमाचम साफ होती है जैसे कि दूसरे एसिड से। तो चलिए, आप भी अपने घर में पड़े

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पेप्सी-कोक की बोतल या कैन निकालिए और फटाफट अपने संडास की सफाई में लग जाइए। आखिर पेप्सी-कोक असलियत में हैं तो इसी लायक न !

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सौन्दर्य का नाश करता है नशा

नशा, या थोड़ा और व्यापक अर्थ में कहें तो 'व्यसन', मनुष्य के मन और शरीर दोनों को ही असुंदर बनाता है। नशेड़ी या व्यसनी व्यक्ति की मानसिक शक्तियाँ कमजोर पड़ जाती हैं, स्मरणशक्ति दुर्बल हो जाती है, संकल्प-क्षमता ढीली हो जाती है और विवेक कुंद हो जाता है। व्यसनी व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ परिवार व समाज की भी तबाही का कारण बनता है।

शराब, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, गुटखा आदि व्यसन के जितने भी रूप हैं, सारे के सारे ही शरीर को जर्जर बनाते हैं और स्थिति ऐसी हो जाती है कि असाध्य किसिम के तमाम रोग बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि नशा करने वालों का सौन्दर्य धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह भी अच्छी तरह सिद्ध कर दिया है कि धूम्रपान करने वालों पर बुढ़ापा जल्दी झलकने लगता है। दरअसल धूम्रपान का धुआँ शरीर के अंदर जाकर कुछ ऐसी क्रियाओं को बढ़ावा देता है जिससे त्वचा ढीली और पतली होने लगती है। त्वचा में झुर्रियाँ भी पड़ने लगती हैं तथा कम उम्र में ही बुढ़ापे का शारीरिक झुकाव शुरू हो जाता है। लंदन के सेंट थामस नामक अस्पताल में 50 समान जोड़ों का अध्ययन करने पर मालूम हुआ कि धूम्रपान करने वालों की त्वचा धूम्रपान न करने वालों से 28 प्रतिशत पतली हो गई थी। यह एक सच्चाई है कि सिगरेट, सिगार आदि ज्यादा पीने वालों के चेहरों पर इतना स्पष्ट परिवर्तन आ जाता है कि सामान्य लोग भी दूर से देखकर ही अक्सर उनकी पहचान कर लेते हैं।

रोजमर्रा सिगरेट पीने वालों को फेफड़ों का कैंसर 90 प्रतिशत, अन्य प्रकार के कैंसर 80 प्रतिशत, ब्रोंकाइटिस 80 प्रतिशत, हृदय रोग 30 प्रतिशत और एम्फिसीमा 20 प्रतिशत तक होने की आशंका रहती है। इसके अलावा पायरिया, बहरापन, मोतियाबिंद, श्वासनलियों में सूजन, अल्सर, भाँति-भाँति के मुख व मसूड़ों के रोग, हड्डी का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर, आँतों का कैंसर, श्वासनली का कैंसर, शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, मानसिक विकार आदि भी होने की संभावना बनी रहती है। सिगरेट आदि के धुएँ में मौजूद कार्बन-मोनो-ऑक्साइड खून के ऑक्सीजन को अवशोषित करके मस्तिष्क में इसकी आपूर्ति बाधित कर देती है। इसका नतीजा यह होता है कि मनुष्य की सहनशक्ति व स्मरणशक्ति कम होने लगती है और नाना प्रकार के मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार धूम्रपान से आँखों के लेंस पर धुँधलापन छाने लगता है और मोतियाबिन्द की संभावना बढ़ जाती है। धूम्रपान के धुएँ में मौजूद हाइड्रोजन साइनाइड व अन्य हानिकारक रसायन श्वासनलिका को मोटी कर देते हैं, जिससे दमे की आशंका बढ़ जाती है। धूम्रपान से पेट में एसिड अधिक बनने लगता है, जिससे अल्सर की संभावना भी प्रबल हो जाती है। इसके अलावा धूम्रपान रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ाकर मधुमेह को भी आमंत्रण देता है। धूम्रपान का हृदय पर घातक असर होता है। सिगरेट के धुएँ की कार्बन-मोनो-ऑक्साइड गैस रक्त में हीमोग्लोबिन कम कर देती है तथा रक्त वाहिनियाँ की भीतरी सतह पर वसा का जमाव ज्यादा कर

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देती है। इसके साथ ही निकोटीन हृदय की गति को अनावश्यक रूप से बढ़ाता है तथा यह कैटा कोलामीन की मात्रा भी बढ़ाता है जिसकी वजह से रक्त में वसा की मात्रा बढ़ने लगती है। इन सब वजहों से हृदयाघात, पैरालिसिस आदि बीमारियाँ बड़ी आसानी से धर दबोचती हैं।

अनुसंधानों से यह बहुत पहले साबित हो चुका है कि सिगरेट के धुएँ में पाया जाना वाला पायरिन फेफड़ के कैंसर का कारण बनता है। इसका धुआँ फेफड़े की कार्यप्रणाली को भी अव्यवस्थित कर देता है तथा धुएँ में मौजूद टार फेफड़ों में संक्रमण, फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन तथा श्वासावरोध उत्पन्न करता है। महिलाएं अगर धूम्रपान करती हैं तो अपने साथ-साथ अपनी आने वाली संतानों का भी भविष्य बिगाड़ती हैं। धूम्रपान से गर्भपात का भय तो रहता ही है, गर्भस्थ शिशु के रोगग्रस्त पैदा होने या उसके मरने का भी डर रहता है। स्तन कैंसर या स्तन के अन्य रोग, गर्भाशय कैंसर, मासिक धर्म की गड़बड़ी, चेहरे का लावण्य खत्म होने जैसी तमाम परेशानियाँ धूम्रपान की वजह से महिलाओं को झेलनी पड़ सकती हैं। शोधों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं की मृत्युदर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है। चूंकि माताओं के स्वास्थ्य पर उनकी आने वाली संतानों का भी स्वास्थ्य बहुत हद तक निर्भर होता है इसलिए महिलाओं को नशे से बचना कहीं ज्यादा जरूरी है। धूम्रपान इतना नुकसानदेह है फिर भी चिन्ताजनक बात यह है कि इसकी गिरफ्त में लोग फँसते ही जा रहे हैं। इस समय दुनिया की लगभग 110 करोड़ की विशाल आबादी धूम्रपान की शिकार है। इसमें से 80 करोड़ लोग विकासशील देशों के हैं और 30 करोड़ लोग विकसित देशों के। एशिया में 55.8 प्रतिशत पुरुष, 3.71 प्रतिशत महिलाएं तथा 33 प्रतिशत बच्चे धूम्रपान करते हैं। रिक्शा चालक और मजदूर किस्म के लोग तो 80 से 90 प्रतिशत तक धूम्रपान के शिकार हैं। स्थिति यह है कि ये सभी नशेड़ी मिलकर पूरे साल में लगभग 60000 करोड़ सिगरेट पी जाते हैं। भारत जैसे देशों के नशेबाज 55 करोड़ सिगरेट रोज अर्थात् लगभग 20000 करोड़ सिगरेट साल भर में पीते हैं। विकसित देशों में 41 प्रतिशत पुरुष तथा 21 प्रतिशत महिलाएं नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं। विकासशील देशों में लगभग 50 प्रतिशत पुरुष और 8 प्रतिशत महिलाएं नियमित धूम्रपान के आदी हैं।

धूम्रपान तथा विभिन्न रूपों में तम्बाकू सेवन से पूरी दुनिया में हर साल लगभग 30 लाख लोग असमय मौत के मुँह में पहुँचते हैं। इसमें भी लगभग एक तिहाई संख्या तो सिर्फ विकासशील देशों के लोगों की ही होती है। भारत में कैंसर से 10 प्रतिशत, साँस की बीमारी से 70 प्रतिशत तथा दिल की बीमारी से 25 प्रतिशत मृत्यु का कारण धूम्रपान होता है। केन्द्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो के अनुसार हमारे यहाँ हर साल लगभग 2200 करोड़ रुपया तंबाकू जनित बीमारियों के इलाज पर खर्च हो जाता है। सांख्यिकी और नियोजन विभाग के एक अनुमान के अनुसार 1989-90 में तम्बाकू सेवन करने वालों द्वारा किया गया मासिक खर्च 5060 करोड़ रुपये था, जो 1991-92 में 7964 करोड़ रुपये तक जा पहुँचा। स्थिति यह है कि यदि प्रति सिगरेट एक पैसे भी दाम बढ़ा दिया जाय तो सिगरेट बनाने वाली कंपनी का सालाना मुनाफा 200 करोड़ रुपये अतिरिक्त हो जाएगा। अंदेशा यह है कि नाना रूपों में तम्बाकू सेवन के नतीजे के तौर पर सन् 2020 के बाद हर साल पूरी दुनिया में लगभग एक करोड़ लोग मरेंगे। सिगरेट को होंठों तक लाने से पहले अपने को

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विवेकवान मानने वाले लोगों को एक बार यह जरूर सोच लेना चाहिए कि आदमी का फेफड़ा सिगरेट का धुआँ भरने के लिए नहीं बनाया गया है।

इसी तरह नशे के और रूपों के ख़तरे भी भयावह हैं। तम्बाकू युक्त गुटखा व पान-मसाला की वजह से संपूर्ण भारत में, खासतौर से उत्तरी भारत में तो 'औरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस' जैसी कष्टदायी बीमारी महामारी का ही रूप लेती जा रही है। इस बीमारी में धीरे-धीरे मुँह बंद होने लगता है। इसी तरह 'ल्यूकोप्लेकिया' का प्रकोप भी बढ़ रहा है। ये बीमारियाँ कैंसर की शुरुआती स्थिति भी साबित हो सकती हैं। गुटखा, पान-मसाला खाने वालों को याद रखना चाहिए कि इनमें मिलाए जाने वाले विभिन्न पदार्थ जैसे- सैक्रिन, रंग, मेन्थॉल, इत्र आदि स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। इनमें डाली जाने वाली खालिस सुपारी भी कम नुकसानदेह नहीं है। सुपारी की टैनिन प्रोटीन के पाचन में बाधा पहुँचाती है। सुपारी के ज्यादा सेवन से शरीर में विटामिन 'ए' की भी कमी हो जाती है। कथा को प्रायः लोग हानिरहित समझते हैं, पर इसमें भी टैनिन की काफी मात्रा होती है। जब से सिन्थेटिक कथा तैयार होने लगा है तब से स्थिति को और भी ख़तरनाक ही समझिए।

शराब के नशे का तो ख़ैर पूछिए मत। इसने स्वास्थ्य और सामाजिक मूल्यों, दोनों का जितना नुकसान किया है वह आसानी से वर्णन नहीं किया जा सकता। शराब के चलते उजड़े घरों के दास्तान आये दिन सुनने-पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। अब तो सड़क दुर्घटनाओं का एक सबसे बड़ा कारण भी शराबखोरी ही बन चुका है। शराब कितनी ख़तरनाक है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सामान्य हालत में जो व्यक्ति मार-काट की बात सोच भी नहीं सकता वह शराब के नशे में आसानी से हत्या करने पर आमादा हो सकता है। शराब मस्तिष्क को इतने हद तक अनियंत्रित कर सकती है कि आदमी पागल हो जाए। वास्तव में शराब की वजह से पागलों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। पागलों के दवाखानों के सर्वेक्षण से यह चोंकाने वाला तथ्य सामने आया कि हर दस पागलों में से छः शराब की वजह से पागल हुए थे।

शराब पाचनतंत्र में गड़बड़ी तो पैदा ही करती है, यह स्नायुओं से लेकर यकृत और हृदय तक पर बहुत बुरा असर डालती है। नुकसानों का परीक्षण करने के लिए इसे भोजन में मिलाकर सियार, कुत्ता, कबूतर, उल्लू आदि पशु-पक्षियों को दिया गया तो वे अकाल ही मृत्यु के शिकार हो गए। मदिरा का मद पेड़-पौधों तक पर अपना ख़तरनाक असर छोड़ता है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि अगर मदिरायुक्त पानी पौधों की जड़ों में डाला जाए तो उनमें फल नहीं लगेंगे और वे धीरे-धीरे सूख जाएंगे। शराब मनुष्य की जिन्दगी को भी कुछ इसी तरह नष्ट करती है।

शरीर के बाह्य सौन्दर्य पर भी शराब का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। शराबी व्यक्ति की आँखों में धीरे-धीरे रक्त धँस आता है और वे रक्तितम दिखाई देने लगती हैं। अच्छी भली सुंदर आँखें भी शराब पीने से डरावनी लगने लगती हैं और उनका तेज समाप्त हो जाता है। ज्यादा शराब चेहरे को भी जल्दी ही बूढ़ों की कतार में खड़ा कर देती है। यह बात अलग है कि सम्यन् शराबी खान-पान में पोषकता का विशेष ध्यान रखकर शराब के दुष्प्रभावों पर परदा डालने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वे इसके दुष्परिणामों से भी पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं।

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धूम्रपान की तरह मदिराप्रेमियों को भी अन्ननली का कैंसर तथा यकृत व मुँह के रोग हो सकते हैं। मद्यपान से शरीर में विटामिन 'बी' की भी कमी हो सकती है। इसके अलावा शराब छोटी आँतों के थायमिन व फोलिक अम्ल का अवशोषण करने वाले स्थान को भी क्षतिग्रस्त कर देती है। इसका फल यह होता है कि शरीर की अंदरूनी कार्यप्रणाली अव्यवस्थित और जर्जर होने लगती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब का नशा शरीर में तो गड़बड़ी पैदा ही करता है, यह मन में भी गड़बड़ी फैलाता है। अगर, मन में गड़बड़ी आ जाए तो विचारों में गड़बड़ी आना लाजिमी ही है और आखिरकार शराबी की वाणी का भी लड़खड़ाना अनिवार्य हो ही जाता है।

अभी तक जिस तरह के व्यसनों की चर्चा की गई है उनसे प्रायः पूरा समाज परिचित है, परंतु अब नशे के इतने सारे नए-नए रूप पैदा हो गए हैं कि उनकी खोज-खबर रख पाना भी एक टेढ़ा काम है। इस संदर्भ में नशीली दवाइयों की चर्चा कर देना विशेष ज़रूरी है क्योंकि नशे के इस तरीके ने घर-परिवार और समाज के सीमित दायरों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर भी गम्भीर समस्याएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था 'इंटरनेशनल नारकोटिक ड्रग कंट्रोल बोर्ड' ने चेतावनी दी है कि नशीली दवाइयों की खपत जिस गति से पूरी दुनिया में बढ़ रही है, उसके चलते कई देशों की सुरक्षा के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। मौजूदा हालात ये हैं कि अमरीका, इंग्लैण्ड, जापान, चीन, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि अमीर-गरीब सभी देश ही नशे के व्यापारियों के जाल में फँसते जा रहे हैं।

एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ़ अमरीका जैसे देश में ही ग्यारह करोड़ से अधिक लोग नशीली दवाइयों के शिकार बन चुके हैं। अमरीका की संस्था 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ड्रग एव्यूस' की रिपोर्ट के मुताबिक 30 से 40 प्रतिशत अमरीकी बच्चे नशीली दवाइयों का इस्तेमाल करने लगे हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ नशीली दवाइयों के सेवन में भी बढ़ोतरी हो रही है, यह चिंताजनक और भयावह तस्वीर है। इसके अलावा अमरीका में करीब 50 लाख लोग कोकीन, 2 करोड़ लोग मार्जुआना तथा 50 लाख लोग हिरोइन का भी नशा करते हैं। अनुमान है कि हिन्दुस्तान में दस से पन्द्रह करोड़ लोग भाँग, गाँजा, चरस, हिरोइन, एल.एस.डी. तथा विभिन्न नशीली दवाइयों की आदत के शिकार हैं। आलम यह है कि अब होटल, ढाबे, स्कूल, कॉलेज से लेकर झुग्गी झोपड़ियों तक में नशीली दवाइयों के अड़डे बनते जा रहे हैं। महानगरों की स्थिति इस मामले में ज्यादा भयावह है। देश की युवा-पीढ़ी बुरी तरह दिग्भ्रमित हो रही है।

नशीली दवाइयों में अफीम, मार्फिन, पैथेडिन, हिरोइन, मैक्सिकन कैकटस, भाँग, गाँजा, चरस, एल.एस.डी., मेथम फेहाइन, शाबएफिटेमिन, कोकीन, हिरोइन ग्रुप की दवा बारविचुरेट्स, मनोदैहिक एवं नींद लाने वाली दवा कम्पोज, लारपोज, तिबरियम, वैलियम आदि का इस्तेमाल नशेबाज़ धड़ल्ले से करते हैं। ये सभी नशीली दवाइयों मूर्छा, बेहोशी, जड़ता तथा संवेदनहीनता पैदा करती हैं। इन दवाइयों की गिरफ़्त में फँसने की एक वजह यह भी है कि ये दर्द, पीड़ा एवं शूल से मुक्ति तथा जटिल समस्याओं एवं परिस्थितियों से जूझने का भ्रम पैदा करती हैं। जबकि अंतिम परिणाम यह होता है कि समस्याएँ और जटिल हो जाती हैं।

वास्तव में नशीली दवाइयों और तरह-तरह के व्यसनों का प्रचलन युवा पीढ़ी में जिस तेज़ी से बढ़ रहा है, उसके चलते स्वास्थ्य के साथ-साथ चरित्र, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पर

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खतरा मँडराने लगा है। नशेड़ियों की जमात न अपनी सुरक्षा कर सकती है, न राष्ट्रीय अस्मिता की। ज़रूरत अब व्यसन-मुक्ति के प्रति गंभीर होने की है। सरकारों से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्हें विभिन्न प्रकार के नशे के व्यवसाय से हज़ारों करोड़ रुपये सालाना राजस्व मिलता है। यही वजह है कि जनता को मूर्ख बनाने के लिए एक तरफ़ मद्य निषेध विभाग चलाया जाता है तो दूसरी ओर दारु की बिक्री बढ़ाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए जाते हैं। नशाबंदी के लिए तो जनता में ही जागरूकता लानी होगी और व्यापक जनांदोलन छेड़ना होगा। इसके अलावा और कोई सरल उपाय नज़र नहीं आता।

नशे के शिकार जो लोग इससे मुक्ति चाहते हैं उनके लिए यहाँ कुछ सुझाव अवश्य दिए जा सकते हैं। गुटखा या पान-मसाला खाने वालों की आदत कुछ ऐसी हो जाती है कि वे अक्सर मुँह में कुछ रखकर चबाते रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों को सौँफ़ चबाने की आदत डालनी चाहिए। सौँफ़ सुगंधित तो होती ही है, स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी होती है। यदि मन को मज़बूत करके गुटखा या पान-मसाला के स्थान पर 2-3 हफ़्ते तक भी सौँफ़ चबाएं तो गुटखे के व्यसन से आसानी से मुक्ति मिल सकती है। सौँफ़ के स्थान पर आँवले का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसका तरीका यह है कि ताज़े हरे आँवलों को उबाल लें और गुठली निकालकर फेंक दें। अब उबले हुए आँवलों में पिंसी हुई काली मिर्च, काला नमक और सेंधा नमक स्वाद के अनुसार डालकर खूब मसलकर मिला लें और सुपारी के टुकड़े जैसे बनाकर धूप में सुखाकर सुरक्षित रख लें। गुटखा या पान-मसाला की जगह इन टुकड़ों को जब चाहें मुँह में रखकर चूसें, व्यसन धीरे-धीरे छूटने लगेगा।

सिगरेट पीने वालों के लिए वैज्ञानिक डॉ. एडवर्ड डोमिनो का सुझाव है कि यदि 50 ग्राम आलू, 85 ग्राम पके टमाटर का रस तथा 93 ग्राम पत्तागोभी का रस दिन में दो बार नियमपूर्वक सेवन किया जाय तो सिगरेट पीने की इच्छा नहीं होगी, क्योंकि इनमें 'निकोटीन' तत्त्व प्राकृतिक रूप में मौजूद रहता है। वास्तव में यदि आहार-विहार की शुद्धि के साथ योग, ध्यान आदि की विधियाँ नियमित रूप से अपनाई जाएँ तो नशे की जटिल परिस्थितियों पर भी आसानी से काबू पाया जा सकता है। निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि आप अपना स्वास्थ्य और सौन्दर्य बचाए रखना चाहते हैं तो नशे से दूर रहिए। यह भी याद रखिए कि नशे से दूर रहकर आप अपना ही नहीं बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र का भी भला करेंगे।

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कुछ फुटकर नुस्खे

शहद

शहद सिर्फ स्वाद में ही मीठा नहीं होता अपितु अपने अन्य गुणों में भी यह अतुलनीय है। इसमें अनेक महत्वपूर्ण विटामिन, खनिज, हार्मोन्स, अमीनो एसिड और एन्जाइम मौजूद रहते हैं। इसका एक प्राकृतिक गुण यह भी है कि इसके तत्व सीधे हमारे रक्त में पहुंच सकते हैं, इसलिए यह न केवल हमें तत्काल शक्ति प्रदान करता है, बल्कि अनेक बीमारियों से भी हमें बचाता है, साथ ही इससे हमारी पाचन शक्ति भी मजबूत होती है। चिकित्सा की दृष्टि से भी यह हमारे लिये बहुत उपयोगी है। हमारे मस्तिष्क और भावनाओं पर भी इसका चमत्कारी प्रभाव पड़ता है, जिससे मन को शांति मिलती है। तंत्रिका प्रणाली को विश्राम देकर तनाव को कम करता है। गुनगुने पानी में थोड़ा शहद डालकर पीने से अनिद्रा की बीमारी में लाभ होता है। इतना ही नहीं शहद शरीर की प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करता है, जिससे यह हमें अनेक बीमारियों से बचाता है

दही

दही भी ऐसा एक प्राकृतिक भोज्य पदार्थ है, जो हमें बढ़ती उम्र में भी युवा और आकर्षक बनाए रखने में सहायक है। विटामिन 'ए' और 'बी', कैल्शियम, लौह, पोटेशियम, फास्फोरस आदि से युक्त दूध से बना होने से यह बिना कोई नुकसान पहुंचाए हमारे प्रोटीन की जरूरतों को भी पूरा करता है। इस तरह यह अधिक उम्र के ऐसे लोगों के लिए एक आदर्श भोजन है, जो मांस खाने से बचना चाहते हैं। दही एक प्राकृतिक एंटीबायोटिक भी है। यह पाचन प्रणाली में हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है और पाचन शक्ति को ठीक रखता है। बीमार लोगों के लिए भी दही बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह अत्यंत सुपाच्य है और इससे शरीर बलवान होता है। दूध की अपेक्षा यह ज्यादा सुपाच्य है और इसमें भरपूर पोषक तत्व होते हैं।

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स्वदेशी की स्थापना के लिये प्रतिबद्ध आंदोलन

हम सभी जानते हैं कि आज से 500 साल पहले 1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा ने भारत के लिये एक नये समुद्री मार्ग की खोज की और इसी समुद्री मार्ग से पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और बाद में अंग्रेज हमारे देश में आये और हमें गुलाम बनाया। वास्तव में वास्को-डी-गामा की खोज ने भारत की लूट का एक और मार्ग खोल दिया। उसके बाद अंग्रेजों ने भारत को न केवल लूटा बल्कि उसे अपना गुलाम भी बनाया। सन् 1600 में एक ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके साथ आयी अंग्रेजी फौज ने समूची भारतीय व्यवस्थाओं तथा शिक्षाप्रणाली, आर्थिक व्यवस्था, व्यावसायिक प्रणाली, कृषि प्रणाली एवं सामाजिक व्यवस्था को तोड़कर 300-350 वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर अपनी हुकूमत चलाई। उसके बाद गांधीजी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी गई और लगभग 20 करोड़ की से ज्यादा क्रान्तिकारियों की कुर्बानियाँ देकर हमने आजादी हासिल की।

आज फिर से हम गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। पहले एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी आई और उसने 300 साल तक गुलाम बनाये रखा परन्तु आज तो कई हजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं, तो कितने साल की गुलामी होगी? आपको शायद मालूम होगा कि 100-200 साल पहले अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने और उस पर अपना शासन चलाने के लिये जो कानून और नीतियाँ बनाई थीं वे देश की आजादी के 50 साल बाद भी चल रही हैं। बस अन्तर इतना ही है कि पहले गोरे अंग्रेज शासन करते थे, परन्तु आज काले अंग्रेज शासन कर रहे हैं, बाकी सारी व्यवस्थाएँ और नीतियाँ ज्यों की त्यों हैं। इतना ही नहीं, कार्यप्रणाली भी अंग्रेजी सभ्यता की ही है।

आज उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति के नाम पर पूरे देश को गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में धकेला जा रहा है। हमारे देश की संस्कृति और परम्पराओं को न बढ़ाकर पश्चिमी आतताई और शैतानी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या यही सपना देखा था हमारे शहीदों ने? क्या उन्होंने अपनी कुर्बानी इसी भारत के लिये दी थी

इन्हीं सब परिस्थितियाँ को देखकर आजादी बचाओ आंदोलन ने पूरे देश में सोये हुए युवाओं को जगाने का संकल्प लिया है। और साथ ही आजादी बचाओ आन्दोलन अपने समाज व सभ्यता के नवीनीकरण के लिये आवश्यक ज़मीन तैयार करने में लगा हुआ है। आंदोलन की कोशिश है कि हमारे मन में अपने देश, समाज, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जो अनादर और निराशा का भाव आ गया है वह ख़त्म होकर आजादी और आशा का भाव जाग्रत हो तथा अपने प्रति आत्मविश्वास पैदा हो।

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