भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-७, ब्राह्मण-१

१२८ शतपथ ब्राह्मण माः स य॑त्रैष ए॒ताꣳ रात्रिं॒ न पु॒रस्ता॒न्न प॒श्चाद्द॑दृ॒शे तदि॒मं लो॒कमाग॑च्छति स इ॒हा- प॒श्चौष॑धीश्च॒ प्रवि॑शति॒ तदे॒नम॒द्भ्य ओष॑धिभ्यः॒ संभृ॒त्याहु॑तिभ्यो॒ऽधि ज॑नयति॒ स ए॒ष आहु॑तिभ्यो जा॒तः प॒श्चाद्द॑दृशे ॥ १५॥ तद्धाऽए॒तत् । अ॒विच्छि॑न्नमेव दे॒वानामन्नाद्यं॑ प॒रिप्ल॑वतेऽविच्छिन्नꣳ ह वाऽअ॒स्यास्मिंल्लो॒केऽन्नं॑ भवत्य॒क्षय्यम॒मुष्मिं॑ल्लो॒के सु॑कृ॒तं य॒ एव॑मे॒तद्वेद्॑ ॥ १६॥ तद्धाऽए॒ताꣳ रात्रि॑म् । दे॒वेभ्यो॒ऽन्नाद्यं॒ प्रच्य॑वते॒ तदि॒मं लो॒कमा- ग॑च्छति॒ ते दे॒वा अ॑कामयन्त क॒थं नु न इ॒दं पुन॒राग॑च्छेत्क॒थं न॒ऽइदं॑ पु॒रागे॑व न प्र- णा॒श्येदि॑ति॒ तद्य॑ऽए॒व सं॑नय॑न्ति॒ तेषा॑मे॒वैतद॒न्तर्ऋतु॒ष्वेव नः॒ संभृ॑त्य॒ प्रदा॑स्यन्तीत्या ह वाऽअ॒स्मिं॒स्त्वान्ने॑ नि॒ध्याश्च॒ शाꣳ॒सास्ते॒ य एव॑मे॒तद्वेद्॒ यो वै प॑र॒मतां॑ गच्छ॑ति॒ तस्मि॑- न्ना॒शꣳ॑स॒न्ते ॥ १७॥ तद्धाऽए॒ष ए॒वेन्द्रः॑ । य ए॒ष तप॑त्ये॒ष ए॒व वृ॒त्रो यच्च॑न्द्र॒माः सो॑ऽस्यै॒ष भ्रातृ॑व्य॒न्नमे॑व॒ तस्मा॑द्यद्य॒पि पुरा वि॒दूर॑मिवोदितो॒ऽथैन॑मे॒ताꣳ रात्रि॒मुपै॑व न्या॒प्लव॑ते॒ सो॑ऽस्य॒ व्यात्त॒माप॑द्यते ॥ १८॥ तं ग्र॑सि॒त्वेति॑ । स न पु॒रस्ता॒न्न प॒श्चा- द्ददृशे॒ ग्रस॑ते ह॒ वै द्विषन्तं॑ भ्रातृ॑व्यम॒यमे॒वास्ति॒ नास्य॑ सप॒त्नाः सन्तीत्याहु॒र्य एव॑मे- तद्वेद्॑ ॥ १९॥ तं निध॑यि॒ निर॑स्यति । स ए॒ष धी॒तः प॒श्चाद्द॑दृशे॒ स पु॒नराप्या॑यते॒ स ए॒तस्यै॒वान्नाद्या॑य पु॒नराप्या॑यते॒ यदि॑ ह॒ वाऽअ॒स्य द्विषन्भ्रातृ॑व्यो वणिज्या॑या वा केन॑चिद्वा सं॒भव॑त्ये॒तस्य॒ हैवान्नाद्या॑य पु॒नः संभ॑वति॒ य एव॑मे॒तद्वेद्॑ ॥ २०॥ तद्वैके । म॒हेन्द्रा॒येति॑ कुर्वन्तीन्द्रो वाऽए॒ष पुरा वृ॒त्रस्य॑ ब॒धाद्य॒ वृत्रꣳ ह॒त्वा यथा॑ महा॒राजो॑ वि॒जिग्या॒न ए॒वं म॒हेन्द्रोऽभ॑व॒त्तस्मान्म॒हेन्द्रा॒येति॒ तद्धिन्द्रा॒येत्ये॒व कुर्यादिन्द्रो वा ऽए॒ष पु॒रा वृ॒त्रस्य॑ ब॒धादिन्द्रो॑ वृ॒त्रं ज॑घ्नि॒वांस्तस्मा॑दिन्द्रा॒येत्ये॒व कुर्यात् ॥ २१॥ ब्रा- ह्मणम् ॥ ३ [६.४.]॥ अध्यायः ॥ ६॥ ॥ स वै॑ पर्णशाख॒या व॒त्सानपा॑करोति । तद्यत्प॑र्णशाख॒या व॒त्सानपा॑करोति॒ यत्र॑ वै गा॑यत्री सो॒ममच्छा॑पत॒त्तद॑स्याऽआ॒ह्रिय॑माणाया॒ऽपाद्स्ताम्य॑ायत्य॒ पर्णं प्रचि॑च्छेद गा॒यत्र्यै॑ वा सो॒मस्य॑ वा॒ राज्ञ॒स्तत्पति॑त्वा प॒र्णोऽभ॑व॒त्तस्मात्प॒र्णो नाम॒ तद्य॑दे॒वात्र सो॒मस्य॑

कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, कं० १५-२१ शतपथब्राह्मण / १२६ चन्द्रमा अमावस्या के दिन वनस्पति और जल में मिल जाता है)। यह जो सोम राजा देवों का भोजन है वह चन्द्रमा ही है। यह जो (अमावश्या की) रात को न पूर्व में दीखता है न पश्चिम में, वह इस लोक में आ जाता है और जलों और ओषधियों में मिल जाता है। अब ओषधियों और जलों से इकट्ठा करके उसे आहुतियों से उत्पन्न करते हैं, और यह आहुतियों से उत्पन्न होकर पश्चिम में दीखता है। तात्पर्य यह है कि अमावस्या के दिन चांद आकाश में नहीं रहता, किन्तु पृथिवीलोक में वनस्पति और जल में प्रविष्ट हो जाता है। यज्ञ करनेवाला वनस्पति और जल के बने हुए दूध से आहुति बनाता है और उस आहुति से चाँद को उत्पन्न करता है; वही चाँद दूसरे दिन पश्चिम में चमकता है ॥१५॥ यह इस प्रकार होता है। देवों का न क्षीण होनेवाला अन्न ही (मनुष्यों तक) आ सकता है। इसलिए पुरुष इस रहस्य को समझता है। वह इस लोक में अक्षय्य अन्न को प्राप्त होता और परलोक में पुण्य को पाता है ॥१६॥ इस प्रकार उस (अमावस्या की) रात को अन्न देवों से चलता है और इस लोक में आता है। अब देवों ने चाहा कि वह फिर उनके पास कैसे वापस जाय और किस प्रकार नष्ट न हो जाय, इसलिए (ये देव) उन पर विश्वास रखते हैं जो सान्नाय्य आहुति को (दूध और दही मिलाकर) तैयार करते हैं, क्योंकि जब यह तैयार करेंगे तो अवश्य ही देंगे। जो इस रहस्य को जानता है उस पर अपने और पराये सभी विश्वास करते हैं, क्योंकि जो बड़प्पन को प्राप्त हो जाता है उस पर सभी विश्वास करते हैं ॥१७॥ अब यह जो तपता है (अर्थात् सूर्य) वही इन्द्र है। और जो चन्द्रमा है वही वृत्र है, परन्तु वह इसका शत्रु-सा है। इसलिए यद्यपि इस रात को पहले बहुत दूर उदय होता है, फिर भी उसकी ओर को तैरता है और उसके (सूर्य के) मुंह में घुस जाता है ॥१८॥ (सूर्य) उस (चाँद) को ग्रस के उदय होता है। वह न पूर्व में दीखता है न पश्चिम में। जो इस रहस्य को जानता है वह अपने अहितकारी शत्रु को ग्रस लेता है और उसके लिए लोग कहते हैं कि वही वह है, उसके शत्रु हैं ही नहीं ॥१९॥ (सूर्य) उस (चाँद) को चूसकर फेंक देता है, और वह चूसा हुआ पश्चिम में दीखता है। यह फिर बढ़ता है। वह (उसी सूर्य के) भोजन के लिए फिर बढ़ता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका अहितकारी शत्रु यदि व्यापार या अन्य किसी उपाय से बढ़ता भी है तो फिर उसी का भोजन बनने के लिए बढ़ता है ॥२०॥ कुछ लोग महेन्द्र के नाम से (आहुति देते हैं), क्योंकि वृत्र के वध से पहले वह इन्द्र था। वृत्र को मारकर महेन्द्र हो गया, जैसे विजय के पश्चात् राजा महाराजा हो जाता है। इसलिए महेन्द्र के लिए (आहुति देते हैं); परन्तु इन्द्र के लिए ही दी जानी चाहिये। वह वृत्र के वध से पहले भी इन्द्र ही था, वृत्र के मारने के पीछे भी इन्द्र ही रहा। इसलिए इन्द्र के लिए ही आहुति देवें ॥२१॥ अध्याय ७-ब्राह्मण १ (अध्वर्यु) पलाश की शाखा द्वारा बछड़ों को (गायों से) अलग करता है। वह पलाश की शाखा से बछड़ों को अलग करता है। जब गायत्री सोम की ओर उड़ी तो (सोम को) लिये जाते हुए (उस गायत्री के) एक पैर-रहित निशानेबाज ने तीर चलाया और एक पर्ण (पंख) काट लिया, या तो गायत्री का या सोम का। वह गिरकर पलाश हो गया। इसलिए उसका नाम पर्ण हुआ। अब वह सोचता है कि जैसे यह सोम की प्रकृति वाला था उसी प्रकार यह यहाँ

१३० शतपथ ब्राह्मण न्यक्त॑ं तद्दिह्याद्य॒त्सदि॑ति॒ तस्मा॑त्पर्णशाखया व॒त्सानपा॑करोति ॥ १॥ तमाच्छि॑नत्ति । इ॒षे वोर्जे त्वेति॑ वृ॒ष्ट्यै तदा॒ह यदा॒हेषे त्वेत्यूर्जे त्वेति॒ यो वृ॒ष्ट्याद्र्सो जाय॑ते॒ तस्मै॑ तदा॑ह ॥ २॥ अथ॑ मातृभि॑र्व॒त्साꣳसम॑वार्तयन्ति । स वत्स॑ꣳ शाखयोपस्पृ॑शति वायव स्थेत्य॒यं वै वायुर्योऽयं पव॑तऽए॒ष वाऽइ॒दꣳ सर्व॑ प्र॒याप॑यति॒ यदि॒दं किं च॒ वर्ष॑- त्येष वाऽए॒तासां॑ प्रयापयिता तस्मादाह वायव॒ स्थेत्युपायव॒ स्थेत्यु हैकऽआहु- रूपं॒ ह्वि द्वितीयोऽप्य॑तीति॒ तदु॒ तथा॒ न ब्रूयात् ॥ ३॥ अथ मातॄणामेकां शाखयो- पस्पृ॑शति । व॒त्सेन॒ व्याकृत्य॑ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यत्विति सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवितो॑ सवितृप्रसूता य॒ज्ञाꣳ संभ॑रानिति॒ तस्मा॑दाह दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यत्वि- ति ॥ ४॥ श्रेष्ठ॑माय॒ कर्म॑णऽइति । य॒ज्ञो वै श्रेष्ठ॑तमं॒ कर्म॑ य॒ज्ञाय॒ हि तस्मा॑दाह श्रेष्ठ॑माय॒ कर्म॑णऽइति ॥ ५॥ आप्या॑यध्वमघ्न्या॒ इन्द्राय भा॒गमिति॑ । तय्य॑थैवा॒दो दे- व॒तायै ह॒विर्गृ॑ह्णन्नादिशत्येवमेवैतद्देवतायाऽआ॑दिशति॒ यदा॑ह्याप्या॑यध्वमघ्न्या॒ इन्द्राय भा॒गमिति॑ ॥ ६॥ प्र॒जाव॑तीरनमी॒वा अ॑य॒क्ष्मा इति॑ । नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति मा व स्तेन ईशत॒ माघश॑ꣳस॒ इति॑ मा वो॒ नाष्ट्रा रक्षाꣳसीशतित्ये॒वैतदा॑ह ध्रु॒वा अ- स्मिन्गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीरित्यन॑पक्रमिण्योऽस्मि॒न्यज॑माने ब॒ह्व्यः स्याति॑त्ये॒वैतदा॑ह ॥ ७॥ अथा॑हवनीयागार॒स्य वा पु॒रस्ता॑त् । गार्हपत्यागार॒स्य वा शाखामुप॑गूहति यज॑मानस्य प॒शून्पाह्यीति॒ तद्गृह्णन्ने॒वैतद्यज॑मानस्य प॒शून्प॑रिददाति गु॒प्त्यै ॥ ८॥ त- स्यां प॒वित्रं॑ करोति । वसोः॑ प॒वित्र॑मसीति य॒ज्ञो वै वसु॒स्तस्मा॑दाह वसोः॑ पवि- त्रमसीति॑ ॥ ९॥ अथ यवा॒ग्वैताꣳ रा॒त्रिम॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॑ । आ॒दिष्टं॒ वाऽए॒तद्देव॑- ता॑यै ह॒विर्भव॑ति॒ यत्पयः॑ स॒ यत्पय॑सा जुहुयाद्ध्यायान्यास्यै दे॒वता॑यै ह॒विर्गृहीतं॒ तद- न्यस्यै॑ जुहुयादे॒वं तत्तस्माद्यवा॒ग्वैताꣳ रा॒त्रिमग्निहोत्रं॑ जु॒होति जु॒हूत्य॒ग्निहोत्र॒मुप॑- कॢप्तोखा भवत्यथाहा॑पस्पृष्टां प्रब्रूतादिति यदा प्राहोप॑स्पृष्टिति ॥ १०॥ अथोखाम॑- दत्ते । द्यौर॑सि पृथि॒व्यसीत्युप॑स्तौत्ये॒वैनामेतन्म॒हत्येव यदा॑ह द्यौर॑सि पृथि॒व्यसी-

कां० १, अ० ७, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १३१ भी होवे। इसलिए पलाश की शाखा से बछड़ों को हाँकता है ॥१॥ उस शाखा को यह मंत्र पढ़कर काटता है—‘‘इषे त्वोर्जे त्वा’’(यजु० १।१)—‘‘रस के लिए तुझे, अन्न के लिए तुझे।’’ जब वह कहता है ‘रस के लिए’ तो उसका तात्पर्य होता है ‘वृष्टि के लिए’, और जब कहता है ‘अन्न के लिए’ तो उसका तात्पर्य होता है उस भोजन से जो वृष्टि से उत्पन्न होता है ॥२॥ अब वह बछड़ों को अपनी माओं से मिला देते हैं। अब वह शाखा से बछड़े को छूता अर्थात् हाँकता है यह पढ़कर ‘‘वायव स्थ’’ (यजु० १।१)--‘‘तुम वायु हो।’’ यह जो चलता है (पवते) वही वायु है। यह वह है जो उस सबको लाता है, जो बरसता है। यह (शाखा) भी गायों को लाता है इसलिए कहा—‘तुम वायु हो।’ कुछ लोग कहते हैं—‘उपायव स्थ’—‘तुम निकटस्थ हो।’ परन्तु ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि इससे दूसरा (शत्रु) (यजमान के पास) आ जाता है ॥३॥ माओं में से एक को बछड़े से अलग करके उसको एक शाखा से यह मंत्र पढ़कर छूता है—‘‘देवो वः सविता प्रार्पयतु’’ (यजु० १।१)‘‘सविता देवता तुमको प्रेरणा करे।’’ सविता देवों का प्रसविता (प्रेरक) है। सविता की प्रेरणा से प्रेरित होकर वे यज्ञ करें। ऐसा सोचकर वह कहता है—‘सविता देव तुमको प्रेरणा करे’—॥४॥ श्रेष्ठतम कर्म के लिए। यज्ञ ही श्रेष्ठतम कर्म है। ‘यज्ञ ही के लिए’ कहने से तात्पर्य है ‘श्रेष्ठतम कर्म के लिए’ ॥५॥ ‘‘आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागम्’’ (यजु० १।१)—‘‘हे अघ्न्याः (अर्थात् गौओ), इन्द्र के भाग के लिए फूलो-फलो।’’ जिस प्रकार आदि में देवता के लिए हवि लेकर आदेश देता है उसी प्रकार इस (दूध की आहुति) को देने में भी देवता का आदेश करता है जब कहता है कि- ‘हे गौओ, इन्द्र के भाग के लिए फूलो-फलो’ ॥६॥ ‘‘प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा’’ (यजु० १।१) —‘‘प्रजा वाली, रोगरहित और यक्ष्मा- रहित।’’ यह तो स्पष्ट ही है। ‘‘मा व स्तेन ईशत माघशꣳस’’(यजु० १।१)—‘‘तुम पर चोर या पाप की चर्चा करनेवाला शासन न करे।’’ इससे उसका तात्पर्य यह है कि ‘तुम पर कोई दुरात्मा राक्षस शासन न करे।’ ‘‘ध्रुवा अस्मिन् गोपतो स्यात बह्वीः’’ (यजु० १।१)—‘‘इस गौओं के स्वामी में अवश्य ही बहुत होओ (फूलो-फलो)।’ यह कहने का तात्पर्य यह है कि ‘बिना त्यागे हुए इस यजमान के लिए बहुत होओ’ ॥७॥ अब वह आहवनीय अग्नि के सामने या गार्हपत्य अग्नि के सामने शाखा को छिपाता है यह कहकर—‘यजमानस्य पशून् पाहि’ (यजु० १।१)। इस प्रकार वह ब्रह्म के द्वारा यजमान के पशुओं को रक्षा के लिए इसके हवाले करता है ॥८॥ उसमें पवित्रा बाँधता है यह मंत्रांश पढ़कर ‘‘वसोः पवित्रमसि’’ (यजु० १।१)—‘‘तू यज्ञ का पवित्रा है।’’ यज्ञ ही वसु है इसलिए कहा ‘तू यज्ञ का पवित्रा है’ ॥६॥ अब इस रात को यवागू (जौ और गुड़ से बनता है) से अग्निहोत्र करता है। इस रात को जो दूध दुहता है वह तो देवता के लिए निर्दिष्ट हो चुकता है। इसलिए यदि उस दूध से हवन करे तो जो एक देवता के लिए हवि है वह दूसरे देवता के लिए दे देवे। इसलिये वह इस रात को यवागू से अग्निहोत्र करता है। जब अग्निहोत्र कर चुकते हैं तब तक बर्तन तैयार हो जाता है। इस पर (अध्वर्यु) कहता है—‘कहो कि वह (गाय) छोड़ दी गई।’ जब कहता है तो (गाय) छूट जाती है ॥१०॥ अब वह बर्तन को (गार्हपत्य अग्नि पर) मन्त्रांश पढ़कर रखता है—‘‘द्यौरसि पृथिव्यसि’’ (यजु०१।२)—‘‘तू द्यौ है। तू पृथिवी है।’’ ‘तू द्यौ है। तू पृथिवी है’ ऐसा कहकर वह उसकी बड़ाई

१३२ शतपथ ब्राह्मण ति मा॒तरि॑श्वनो घ॒र्मोऽसीति॑ य॒ज्ञमे॒वैतत्क॑रोति॒ यथा॑ घ॒र्मं प्र॒वृञ्ज्या॑दे॒वं प्र॒वृण॑क्ति वि॒- श्रुथा॒ असि॑ पर॒मेण॒ धाम्ना दृंह॑स्व॒ मा ह्वा॒रिति॑ दृंह॒त्ये॒वैन॑मेतद॒शिथि॑लां करो- ति॒ मा ते॑ यज्ञप॒तिर्ह्वा॒र्षीदि॑ति॒ यज॑मानो॒ वै य॒ज्ञप॑तिस्तद्यज॑मानायै॒वैतद॒ह्वला॒मा- शास्ते॑ ॥ ११॥ अथ॑ प॒वित्रं॑ निद॒धाति॑ । तद्वै प्राङ्गोदञ्चा॒त्राची॒ हि दे॒वानां॒ दिग्थो ऽउदगुदीची॒ हि म॑नु॒ष्याणां॒ दिग्थं वै प॒वित्रं॒ योऽयं पव॑ते॒ सोऽय॒मिमांल्लो॒कांस्ति॒- र्यङ्ङनुपव॑ते॒ तस्मा॑दु॒दङ्ङि॒दध्या॑त् ॥ १२॥ तद्य॒थैवा॒दः । सोमं॑ राजा॒नं प॒वित्रे॑ण संपा- वयन्त्ये॒वमे॒वैतत्सं॑पावयत्युदीची॒नद॑शं॒ वै तत्प॒वित्रं॑ भवति॒ येन॒ तत्सोमं॑ राजा॒नं संपा॒वय॑न्ति॒ तस्मा॑दु॒दङ्ङि॒दध्या॑त् ॥ १३॥ तन्नि॒दधा॑ति । वसोः॒ पवि॑त्रमसीति य॒ज्ञो वै व्यसु॒स्तस्मा॑दाह॒ वसोः॒ पवि॑त्रमसीति शत॒धारं॑ स॒हस्र॑धारमित्युपस्तौत्ये॒वैन॑देतन्म- ह्यत्ये॒व यदा॑ह शत॒धारं॑ स॒हस्र॑धार॒मिति॑ ॥ १४॥ अथ वाचं॒यमो भवति । आ तिसृणां॑ दोग्धो॒र्वाचो॑ य॒ज्ञोऽवि॑नु॒ब्ध्यो य॒ज्ञं तन॑वा॒ऽइति॑ ॥ १५॥ तदानी॒यमान॑मभि॒- मन्त्र॑यते । दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता पु॑नातु॒ वसोः॑ प॒वित्रे॑ण श॒तधा॑रेण सु॒ष्वेति॑ तद्य॒थैवा॒दः सोमं॑ राजा॒नं प॒वित्रे॑ण संपा॒वय॑न्त्ये॒वमे॒वैतत्सं॑पावयति ॥ १६॥ अथाह॒ काम॑धुक्ष॒ इति॑ । अ॒मूमिति॑ सा वि॒श्वायु॒रित्य॑ द्वि॒तीयां॑ पृ॒च्छति काम॑धुक्ष॒ इत्य॒मूमिति॑ सा वि॒- श्वकर्मेत्य॑ तृ॒तीयां॑ पृ॒च्छति काम॑धुक्ष॒ इत्य॒मूमिति॑ सा वि॒श्वधाया॒ इति॒ तद्यत्पृ॒च्छति वी॒र्या॑ण्ये॒वास्वि॒तद्द॑धाति ति॒स्रो दो॑ग्धि॒ त्रयो॒ वाऽइ॒मे लो॒का ए॒भ्य ए॒वैन॑देतल्लो॒के- भ्यः॒ संभ॑रत्यथ॒ कामं॑ वदति ॥ १७॥ अथोत्त॒मां दो॒हयि॑त्वा । येन॒ दोहय॑ति॒ पात्रे॑ण तस्मि॑न्नुदस्तो॒कमाने॑य पत्न्यङ्क॒ प्रत्यन॑यति॒ यदत्र॒ पय॑सो॒ऽह्या॒यि तद्दि॒ह्याप्य॑सदिति॒ रस॑स्यो चैव॒ सर्व॑त्वायै॒तद्धि यदा॑ व॒र्षत्यथौषधयो जायन्त॒ऽओष॑धीर्ह्यग्धा॒पः पी॒त्वा तत॑ ए॒ष रसः॒ संभ॑वति॒ तस्मा॒द् रस॑स्यो चैव॒ सर्व॑त्वाय॒ तदु॑द्धास्या॒तन॑क्ति ती॒व्रीक॑- रोत्ये॒वैन॑देत॒त्तस्मा॑दुद्धास्या॒तन॑क्ति॒ ॥ १८॥ आ॒तन॑क्ति । इन्द्र॑स्य वा भा॒गं सो- मे॒नातन॑च्मीति॒ तद्य॒थैवा॒दो दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॑ह्णन्नादिश॒त्येव॑मे॒वैतद्दे॑वताया॒ऽआदिश॑-

कां० १, अ० ७, ब्रा० १, क० ११-१६ शतपथब्राह्मण / १३३ करता है-“मातरिश्वनो धर्मोऽसि” (यजु० १।२)-“मातरिश्वान् की घर्म (कड़ाही) है ।” ऐसा कहकर वह इस यज्ञ अर्थात् यज्ञ का साधन बनाता है, और जैसे प्रवर्ज्य-पात्र रखता है, इसी प्रकार इसे भी रखता है। अब कहता है-“विश्वधा असि परमेण धाम्ना दृꣲहस्व मा ह्वाः” (यजु० १।२) “तू विश्वधा अर्थात् सबको धारण करनेवाला है। परम धाम के सहारे दृढ़ हो। चलायमान न हो ।” इस प्रकार निश्चल कर देता है। “मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्’ (यजु० १।२)-“तेरा यज्ञपति चलायमान न हो ।” यजमान ही यज्ञपति है। इसलिये वह इस प्रकार यजमान को ही निश्चल करता है ॥११॥ अब वह पवित्रा को रखता है। उसका पूर्व को मुख करके रखता है। पूर्व देवों की दिशा है। या उत्तर की ओर क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। वह वायु जो इन लोकों में आरपार बहता है वह पवित्र करनेवाला है। इसलिये (पवित्रे को) उत्तर की ओर रखता है ॥१२॥ जिस प्रकार पहले वह सोमराजा को पवित्रे से साफ करते थे उसी प्रकार वह (दूध को) साफ करता है। जिस पवित्रे से सोमराजा छाना जाता है उसका मुख उत्तर को होता है, इसलिये इस पवित्रे को भी उत्तर की ओर मुंह करके रखता है ॥१३॥ वह इसको यह मन्त्रांश पढ़कर रखता है-“वसोः पवित्रमसि” (यजु० १।३)। यज्ञ ही वसु है, इसलिये कहा-“वसु का पवित्रा है ।” ‘शतधारं’ ‘सहस्रधारं’ (यजु० १।३)। उसकी प्रशंसा और बड़ाई करता है जब कहता है कि-“तू सौ धारावाला, हजार धारावाला है” ॥१४॥ अब वह मौन रखता है जब तक तीन गौओं को न दुहे। वाणी ही यज्ञ है। इसका आशय है कि वह यज्ञ को निर्विघ्न करना चाहता है ॥१५॥ उस (दूध) को लाकर (पवित्रे में से छानता है तो) यह मन्त्र पढ़ता है-“देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा” (यजु० १।३)-“देव सविता तुझको यज्ञ के सौ धारवाले और अच्छी तरह पवित्र करनेवाले पवित्रे के द्वारा शुद्ध करे ।” जैसे पहले सोमराजा को पवित्रे से छानते हैं उसी प्रकार उसको भी छानते हैं ॥१६॥ अब पूछता है-“कामधुक्षः” (यजु० १।३)-“(काम्) किसको (अधुक्षः) तूने दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको ।” “सा विश्वायुः”(यजु० १।४)-“यह सब चीजों की आयु या जीवन है ।” अब दूसरी (गाय) के विषय में पूछता है-“कामधुक्षः ।’-“किसको दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको।” “सा विश्वकर्मा”(यजु० १।४)-“वह विश्व को रचनेवाली है ।” अब तीसरी (गाय) के विषय में पूछता है-‘कामधुक्षः”-“किसको दुहा ?” वह उत्तर देता है-“अमूम्”-“इसको।” “सा विश्वधाया” (यजु० १।४) “वह संसार को धारण करनेवाली है ।” यह जो पूछता है तो मानो उनमें वीर्य (शक्ति) का संचार करता है। तीन (गायों) को दुहता है। तीन लोक हैं। इस प्रकार वह इनको लोकों के योग्य बनाता है। अब वह (मौन को तोड़कर) इच्छानुसार बोल सकता है ॥१७॥ आखिरी (गाय) को दुहकर जिस पात्र में गाय दुहाई थी उसी में एक बूंद जल डालकर और हिलाकर ले आता है कि इसमें जो कुछ दूध का अंश बचा था वह भी इसी में आ जाय। यह उस रस को पूर्ण करने के लिए करता है। जब वर्षा होती है तो वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। वनस्पतियों को खाकर और जल को पीकर यह रस बनता है। इसलिये रस की पूर्णता के लिए (जल डालता है)। अब वहाँ से (आग पर से) लाकर उसको गाढ़ा करता है, तेज करता है। इसीलिये वह उसको (आग पर से) लाकर गाढ़ा करता है ॥१८॥ वह नीचे के मन्त्र से गाढ़ा करता है-“इन्द्रस्य त्वा भागं सोमेनातनच्मि” (यजु० १।४)-“इन्द्र के तुझ भाग को सोम से गाढ़ा करता हूँ ।” जैसे पहले देवता के लिए हवि देते हुए

अध्याय-७, ब्राह्मण-२

१३४. शतपथ ब्राह्मण ति॒ यदाइ॒न्द्रस्य॑ वा॒ भागमि॑ति सोमे॑नात॒नच्मीति॑ स्व॒दय॑त्ये॒वैन॑दे॒तद्दे॒वेभ्यः॑ ॥ १९ ॥ अथो॑दकवतोत्ताने॑न पात्रे॒णापि॑दधाति । नेदे॑नदुपरि॒ष्टा॒न्नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॒स्यव॑मृशा॒निति॑ वज्रो वाऽआपस्तद्वज्रे॑णैवैत॒न्नाष्ट्रा॒ रक्षाँ॒स्यतो॑ऽपह॒न्ति तस्मा॑दुदकवतोत्ताने॑न पा- त्रे॒णापि॑दधाति ॥ २० ॥ सोऽपि॑दधाति । विष्णो ह॒व्यँ॒ रक्षेति॑ य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तद्य- ज्ञायै॒वैतद्ध॒विः परि॑ददाति गु॒प्त्यै तस्मा॑दाह विष्णो ह॒व्यँ॒ रक्षेति॑ ॥ २१ ॥ ब्राह्म- णम् ॥ ४ [७. १.] ॥ ॥ ऋणँ ह॒ वै जायते योऽस्ति॑ । स जाय॑मान एव दे॒वेभ्य॒ ऋषि॑भ्यः पितृभ्यो॑ म- नु॒ष्येभ्यः॑ ॥ १ ॥ स य॑दे॒व यजे॑त । तेन॑ दे॒वेभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोति य- दे॑नान्यन॒क्ति य॑देभ्यो जु॒होति॑ ॥ २॥ अथ य॑दे॒वानु॒ब्रुवी॑त । तेन॒र्षिभ्य॒ ऋणं॑ जायते तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोत्यृषीणां निधिगोप इ॒ति ह्य॑नूचा॒नमा॑हुः ॥ ३॥ अथ य॑दे॒व प्र॒जा- मिच्छे॑त । तेन॑ पितृभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒तत्क॑रोति॒ यदे॑षा॒ संत॑तावव्यवच्छिन्ना प्र॒जा भव॑ति ॥ ४॥ अथ य॑दे॒व वास॑येत । तेन॑ मनु॒ष्येभ्य॒ ऋणं॑ जायते॒ तद्ध्ये॑भ्य ए॒त- त्क॑रोति॒ यदे॑नान्वासय॑ते॒ यदे॑भ्यो॒ऽशनं॑ द॒दाति॒ स य॒ एता॑नि॒ सर्वा॑णि क॒रोति॒ स कृ॒तकर्मा॒ तस्य॒ सर्व॒माप्तँ॒ सर्वं॑ जि॒तम् ॥ ५॥ स येन दे॒वेभ्य॒ ऋणं॑ जाय॑ते । तद्दे॒र्ना- स्तदव॑दयते॒ यद्यजे॑ते॒ऽथ यद॒ग्नौ जु॒होति॒ तद्दे॒नाँस्तदव॑दयते॒ तस्मा॒द्यत्किं चा॒ग्नौ जु॒- ह्वति॒ तद॑व॒दानं॒ नाम॑ ॥ ६॥ तद्वै च॑तुर॒वत्तं॑ भवति । इ॒दं वाऽअनु॑वाक्याथ याज्याथ वषट्का॒रोऽथ॒ सा दे॒वता॑ चतु॒र्थी यस्यै॑ दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑त्ये॒वँ हि दे॒वता॒ अव॑दा- नान्यन्वाय॑त्ता॒ अव॑दानानि वा दे॒वता॒ अन्वाय॑त्तान्यतिरि॒क्तँ ह॒ तद॑व॒दानं॒ यत्य- क्षमं॒ कस्मा॒ऽड हि तदव॑द्येत्तस्माच्च॑तुर॒वत्तं॑ भवति ॥ ७॥ उ॒तो प॑ञ्चाव॒त्तमे॒व भ॑व- ति । पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः प॒ञ्चर्तवः॑ संवत्स॒रस्यैषो प॑ञ्चाव॒त्तस्य॒ संप॒दङ्ग॒र्हैव॑ प्र॒- जया॑ प॒शुभि॑र्भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुषः॑ पञ्चाव॒त्तं क्रिय॑त॒ऽएत॒द्वे॒ न्वेव प्र॒ज्ञातं॑ कौरूपा- ञ्चा॒लं यच्च॑तुर॒वत्तं॒ तस्मा॑च्चतुर॒वत्तं॑ भवति ॥ ८॥ स वै यावन्मा॒त्रमि॑वैवाव॒द्येत् ।

कां० १, अ० ७, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १३५ कहा था, इसी प्रकार इस देवता के लिए भी कहता है कि 'इन्द्र के तुझ भाग को सोम से गाढ़ा करता हूँ।' वह इसको देवताओं के लिए स्वादिष्ट कर देता है ॥१६॥ अब वह उसको ऐसे पात्र से, जो ऊपर को खुला हो और जिसमें पानी हो, ढक देता है कि ऊपर से दुष्ट राक्षस उसे छू न लें। जल वज्र है। इस प्रकार वह वज्र से दुष्ट राक्षसों को उससे दूर भगा देता है। इसीलिए जल से भरे हुए पात्र से उसे ढकता है ॥२०॥ वह यह मन्त्र पढ़कर ढकता है—"विष्णो हव्यꣳ रक्ष" (यजु० १।४)—"हे विष्णु ! हवि की रक्षा कर।" यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार वह इस हवि को रक्षा के लिए यज्ञ के हवाले कर देता है। इसलिये कहा—'विष्णु, हवि की रक्षा कर' ॥२१॥ अध्याय ७-ब्राह्मण २ जो कोई मनुष्य है वह उत्पन्न होते ही देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों का ऋणी हो जाता है ॥१॥ उनको यज्ञ करना चाहिए। क्योंकि देवों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा करता है— उनके लिए यज्ञ करता है, उनके लिए आहुति देता है ॥२॥ अब उसको (वेद) पढ़ना चाहिए। क्योंकि ऋषियों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा करता है। जो वेद पढ़ता है उसको ऋषियों के कोष का रक्षक (ऋषीणाम् निधि-गोप) कहते हैं ॥३॥ अब उसको सन्तान की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि पितरों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा करता है जिससे उसके वंश का सिलसिला (परम्परा) बराबर जारी रहे ॥४॥ अब उसको (लोगों का) सत्कार करना चाहिए। क्योंकि मनुष्यों का ऋणी होता है, इसलिये ऐसा करता है कि उनको बसाता है, उनको खाना देता है, वह उनके लिए सब-कुछ करता है। इससे वह अपने कर्तव्य को पूरा करता है। उसको सब-कुछ मिल जाता है, वह विजयी हो जाता है ॥५॥ क्योंकि वह देवताओं का ऋणी होता है, इसलिये देवताओं को प्रसन्न करता है (अवदयते) यज्ञ करता है, अग्नि में आहुति देता है, उनको प्रसन्न करता है। इसलिये जो कुछ अग्नि में आहुति दी जाती है उसको अवदान कहते हैं ॥६॥ इस यज्ञ के चार टुकड़े होते हैं—पहला अनुवाक्य, दूसरा यज्ञ, तीसरा वषट्कार, चौथा वह देवता जिसके लिए हवि दी जाती है। इस प्रकार अवदान के अधीन देवता है या अवदान देवता के अधीन हैं। (कुछ लोग पाँचवाँ भाग बताते हैं) यह पाँचवाँ भाग व्यर्थ है क्योंकि वह किसके लिए है ? इसलिये अवदान के चार भाग ही होते हैं ॥७॥ परन्तु (कुछ लोगों के मत में) पाँच टुकड़े भी होते हैं। पाँच भाग वाला यज्ञ होता है, पाँच भाग वाला पशु, वर्ष में पाँच ऋतुएँ—ये पाँच भाग पूरे हुए। जो इस रहस्य को जानकर पाँच भाग करता है उसके सन्तान और पशु बहुत होते हैं। परन्तु कुरु और पांचालों में चार ही टुकड़े होते हैं। इसलिये (हमारे मत में भी) चार टुकड़े ही होते हैं ॥८॥ उनको मात्रा के अनुकूल ही काटना चाहिए। यदि मात्रा से अधिक काटेगा तो यज्ञ को

मानु॑ष॒ꣳ ह कुर्याद्यन्महदवद्येद्यद्वै॒ तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं॒ नेद्य॒ज्ञं य॒ज्ञे क॒रवा॒णीति॑ तस्माद्यावन्मात्रमिवैवावद्येत् ॥ ९॥ स आज्यस्योपस्तीर्य । द्विरु॑विषो॒ऽवदा॒याथो॑- परि॒ष्टादा॒ज्यस्या॑भिघा॒रयति द्वे वाऽआहुती सोमाहुति॒रिवान्याऽहुति॒रन्या तत ए॒षा केव॑ली यत्सोमाहुति॒स्तैषाऽप्याहुतिर्यद्धविर्यज्ञो यत्पशुस्तदाज्यमे॒वैतत्क॒रोति तस्मादुभयत॒ आज्यं॑ भवत्येतद्धि जुष्टं॑ दे॒वानां॒ यदाज्यं॑ तज्जुष्टमे॒वैतद्दे॒वेभ्यः॑ करोति तस्मादुभयत॒ आज्यं॑ भवति ॥ १०॥ असौ वाऽअनुवा॒क्यैयं याज्या॑ । ते॒ऽउभे योषे तयोर्मिथुनमस्ति वषट्कार एव तद्वाऽएष एव वषट्कारो य एष तपति स उद्यन्न्ने॒- वामूम॒भिद्र॑वत्यस्तं यन्निमा॒मभिद्र॑वति तदि॒तेन वृष्टिमां॑ प्र॒जातिं॑ प्र॒जन॑यति॒ येनयोरियं॑ प्र॒जातिः॑ ॥ ११॥ सोऽनु॑वा॒क्यामनूच्य॑ । याज्या॑मनुद्रुत्य प॒श्चाद्वषट्करोति प॒श्चाद्धि प॒- रीत्य॑ वृषा॒ योषा॑मभि॒द्रव॑ति तदेने॒ऽउभे पु॒रस्ता॒त्कृत्वा॒ वृषा॑ वषट्कारेणाभि॒द्राव॑यति तस्मादु सहै॒ वैव वषट्कारेण जुहुयाद्वषट्कृते वा ॥ १२॥ दे॒वपात्रं॒ वाऽए॒ष यद्व- षट्कारः॑ । तय॑था पात्र॒ऽउद्धृ॑त्य प्रय॒च्छेदेवं तद्यत्पुरा वषट्काराज्जुहुयाद्याथो भू- मौ निदि॒ग्धं तद॒मुषा स्यादे॒वं तत्त्तस्मादु सहै॒ वैव वषट्कारेण जुहुयाद्वषट्कृते वा ॥ १३॥ ॥ शतम् ६०० ॥ ॥ तय॑था योनौ॒ रेतः॑ सिञ्चे॒त् । एवं तद्यत्पुरा वष- ट्काराज्जुहुयाद्याथा योनौ॒ रेतः॑ सिक्तं तद॒मुषा स्यादे॒वं तत्त्तस्मादु सहै॒ वैव वषट्का॒रे- ण जुहुयाद्वषट्कृते वा ॥ १४॥ असौ वाऽअनूवा॒क्यैयं याज्या॑ । सा वै गायत्री॑यं त्रि॒ष्टुब॒सौ स वै गायत्रीमन्वाह तदमुमनुब्रुवन्न॒सौ ह्यनुवा॒क्यैमामन्वा॒ह्येयं॑ हि गायत्री ॥ १५॥ अथ त्रि॒ष्टुभा यज॑ति । तद॒नया यज॑न्निय॒ꣳ हि याज्यामुष्या॒ अधि॒ वषट्करोत्यसा॒वु हि त्रि॒ष्टुत्तदि॑ने सयुजौ करोति॒ तस्मा॑दि॒मे संभु॑ञ्जाते॒ऽअनयो॒रनु संभो॒गम॒िमाः प्र॒जा अनु॑ संभुञ्जते ॥ १६॥ स वाऽअ॒ङ्गुष्ठपर्वमात्रैवा॒नुवा॒क्यामनु॑- ब्रूयात् । असौ ह्यनुवा॒क्या बृ॒हत्य॒सौ बा॑र्हत॒ꣳ हि तद्रू॒पं क्षिप्र॒ऽएव याज्या त्व- रेतिय॒ꣳ हि याज्या रथन्त॒रꣳ ह्ये॑त॒ꣳ रा॑थन्त॒रꣳ हि तद्रू॒पं ह्वय॑ति वाऽअनुवा॒क्या

कां० १, अ० ७, ब्रा० २, कं० ९-१७ शतपथब्राह्मण / १३७ मानुषी कर देगा। वह यज्ञ ऋद्धि-शून्य हो जायगा। इसलिये मात्रा के अनुकूल ही काटना चाहिए ॥९॥ (आज्य) अर्थात् घी की एक तह नीचे रखकर दो बार हवि काटकर उस पर घी डालता है। दो आहुतियां होती हैं-एक सोम की, दूसरी घी की। जो सोम-आहुति है वह तो स्वयं है ही। और जो आज्य आहुति है वह हवि है, वह पशु है। इसलिये दोनों ओर घी होता है। आज्य अर्थात् घी देवों को प्रिय है। इसलिये घी को दोनों ओर इसलिये लगाते हैं कि देवता प्रसन्न हो जायें ॥१०॥ वह (अर्थात् द्यौ) अनुवाक्य है, यह (अर्थात् पृथिवी) याज्य है। ये दोनों स्त्रीलिंग हैं। उनमें से हर एक का जोड़ा वषट्कार है। अब वषट्कार वही सूर्य है जो तपता है। जब वह निकलता है तो उस (द्यौ) से सम्पर्क होता है; जब डूबता है तो इस (पृथिवी) से सम्पर्क होता है। इसलिये जो कुछ ये दोनों (द्यौ और पृथिवी) उत्पन्न करते हैं, उस नर (सूर्य) की सहायता से ही उत्पन्न करते हैं ॥११॥ अनुवाक्य को बोलकर और याज्य को करके वषट्कार को करता है। पीछे से ही घूमकर नर मादा के पास जाता है। इसलिये उन दोनों को पहले रखके पुंल्लिङ्ग वषट्कार से पीछे से उनको मिलाता है। इसलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दे या वषट्कार के पीछे ॥१२॥ वषट्कार देवताओं का पात्र है। जैसे (भोजन) पात्र में निकालकर दिया करते हैं उसी प्रकार यहाँ भी। यदि वषट्कार के पहले ही आहुति देवे तो वह ऐसा (निरर्थक) हो जाय जैसे जमीन पर गिरकर (भोजन) हो जाता है। इसीलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दे या वषट्कार के पीछे ॥१४॥ जैसे योनि में वीर्य-सिंचन होता है वैसे ही यहाँ भी। यदि वषट्कार से पहले आहुति दे तो ऐसा हो जाय मानो योनि में वीर्य गया ही नहीं। इसलिये या तो वषट्कार के साथ आहुति दें या वषट्कार के पीछे ॥१४॥ वह (अर्थात् द्यौ) अनुवाक्य है। यह (पृथिवी) याज्य है। यह (पृथिवी) गायत्री है। यह (द्यौ) त्रिष्टुभ् है। यह जो गायत्री पढ़ता है वह मानो द्यौ को पढ़ता है, क्योंकि अनुवाक्य द्यौ है। इस (पृथिवी) को पढ़ता है क्योंकि गायत्री यह (पृथिवी) है ॥१५॥ त्रिष्टुभ् से यज्ञ करता है। इस प्रकार इस (पृथिवी) से यज्ञ करता है, क्योंकि याज्य पृथिवी है। उस (द्यौ) के ऊपर वषट्कार को रखता है, क्योंकि द्यौ त्रिष्टुभ् है। इस प्रकार वह इन दोनों (पृथिवी और द्यौ) को सयुज कर देता है, और इस प्रकार वे सह-भोजी हो जाते हैं। इन्हीं के सहभोज के पश्चात् सब प्रजा भोजन प्राप्त करती है ॥१६॥ अब वह लड़खड़ाती हुई वाणी से अनुवाक्य को बोलता है। वह (द्यौ) ही अनुवाक्य है। बृहत् (साम) भी वही (द्यौ) है, क्योंकि उसका बृहत् रूप है। याज्य को जल्दी-जल्दी पढ़े। याज्य यही (पृथिवी) है और रथन्तर भी यही (पृथिवी) है, क्योंकि इसका रूप रथन्तर है। अनुवाक्य से वह आवाहन करता है और याज्य से देता है, इसीलिये अनुवाक्य में ऐसे शब्द होते

१३८ शतपथ ब्राह्मण प्र॒यज॑ति॒ याज्या॑या तस्मा॒दनु॑वा॒क्या॑यै रू॒पं ह्वे ह्वाम॒हेऽआग॑ही॒दं ब॒र्हिः सी॑दे॒ति यद्व॑यति॒ हि॒ तया॒ प्र॒यज॑ति॒ याज्या॑या तस्मा॒द्याज्या॑यै रू॒पं वी॒हि ह॒विर्जु॒षस्व॑ ह॒वि- र्वृ॑धाय स्वाहि पिव॒ प्रेति॒ यत्र॒ हि॒ तया॒ यज॑ति ॥ १७॥ सा या पु॒रस्ता॑ल्लक्षणा । सानु॑वा॒क्या स्याद॒सौ ह्यनु॑वा॒क्या॒ तस्या॒ अमु॒ष्या अ॒वस्ता॑ल्ल॒क्ष्म च॒न्द्रमा॒ नक्ष॑त्राणि सूर्य॑ः ॥ १८॥ अथ॒ योप॑रि॒ष्टा॑ल्लक्षणा । सा याज्या स्यादि॒यं हि॒ याज्या॒ तस्या॒ अस्या॒ उप॑रि॒ष्टा॑ल्ल॒क्ष्मौषधयो वन॒स्पत॑य॒ आपो॑ऽग्निरि॒माः प्र॒जाः ॥ १९॥ सा॒ ह॒ न्वेव समृ॑- द्धानु॑वा॒क्या । यस्यै प्रथम॒ात्पदा॑द्देव॒ताम॑भि॒व्याह॑रति॒ सोऽए॒व समृ॑द्धा॒ याज्या॒ यस्या॒ ऽउत्तमा॒त्पदा॑द्देव॒ताया॒ अधि॒ वष॑ट्करोति वी॒र्यं वै दे॒वत॒ार्थंस्तद॒भयत॑ ए॒वैतद्वी॒र्येण॑ प॒रिगृह्य॒ यस्यै दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑ति॒ तस्यै॑ प्र॒यज॑ति ॥ २०॥ स वै वौगिति॑ करो- ति । वाग्वै वषट्कारो वागेतो रेत॑ ए॒वैतत्सि॑ञ्चति षदित्यृतवो वै षट्तदृ॒तुष्वे- तद्रेतः सिच्यते॒ तदृत॑वो रेतः सि॒क्तमि॒माः प्र॒जाः प्र॒जनय॑न्ति॒ तस्मा॑दे॒वं वष॑ट्करोति ॥ २१॥ दे॒वाश्च॒ वा॒ऽसुरा॑श्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प्र॒जाप॑तेः पि॒तुर्दाय॑मु॒पेयु॒रेत॑द्वि॒वा- र्धमासौ य॒ श्वापूर्यते॒ तं दे॒वा उ॒पाय॒न्योऽप॑क्षीयते॒ तम॑सु॒राः ॥ २२॥ ते दे॒वा अ॑- कामयन्त । क॒थं न्वि॒मम॑पि॒ संवृ॑ञ्जीमहि॒ योऽय॒मसु॑राणामिति॒ तेऽर्च॑न्तः श्राम्य॑न्तश्चे- रुस्तऽए॒तत् ह॒विर्य॒ज्ञं द॑दृशुर्दर्शपूर्णमासौ ताभ्यामयजन्त ताभ्यामिष्ट्वैतमपि॒ सम॑वृ- ञ्जत ॥ २३॥ य ए॒षोऽसु॑राणामासीत् । यदा वाऽए॒ताऽउ॒भौ परि॒प्लवेतेऽअथ॒ मासो॑ भ॑वति मासशः संवत्स॒रः सर्वं वै सं॑वत्स॒रः सर्व॑मेव॒ तद्दे॒वा अ॑सुराणाँ संम॑वृञ्जत सर्वस्मात्सपत्नानसुरा॒न्निर॑भज॒न्सर्व॑म्वे॒वैष ए॒तत्त्सप॑त्नानाँ संवृ॑ङ्क्ते॒ सर्व॑स्मात्सप॒त्नान्नि॑- र्भज॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २४॥ स यो दे॒वाना॑मासी॒त् । स यवा॑युवत॒ हि ते॑न दे॒वा योऽसु॑राणाँ॒ सोऽय॑वा॒ न हि तेना॑सुरा॒ अयु॑वत ॥ २५॥ अथो॑ऽइ॒तर॒थाहुः॑ । य ए॒व दे॒वाना॑मासीत्स॒ोऽय॑वा॒ न हि तम॑सुरा॒ अयु॑वत॒ योऽसु॑राणाँ॒ स यवा॑युवत हि॒ तं दे॒वाः स॒ङ्क्रमः स॒गरा रात्रिरि॒यव्या मासाः सुमेकाः संवत्सरः इ॒को ह॒ वै

कां० १, अ० ७, ब्रा० २, क० १७-२६ शतपथब्राह्मण / १३६ हैं—'हुवे' (मैं बुलाता हूँ), 'हवामहे' (हम बुलाते हैं), 'आगच्छ' (आ), 'इदं बर्हिः सीद' (इस आसन पर बैठो)। क्योंकि इन शब्दों द्वारा बुलाता है, याज्य से देता है, इसलिये याज्य में ऐसे शब्द आते हैं—'वीहि हविः' (हवि को स्वीकार करो), 'जुषस्व हविः' (हवि को ग्रहण करो), 'आवॄषा यस्व' (ग्रहण करो), 'अद्धि' (खाओ), 'पिब' (पियो), 'प्र' (वहाँ), क्योंकि इसी (याज्या) द्वारा तो वह उसको देता है जो 'प्र' अर्थात् दूर हैं ॥१७॥ अनुवाक्य को 'पुरस्ताल्लक्षण' अर्थात् आदि में सामने लक्षणवाला होना चाहिए। वह (द्यौ) ही अनुवाक्य हैं और उस (द्यौ) के नीचे के चिह्न हैं—चाँद, नक्षत्र (सूर्य) ॥१८॥ 'याज्य' को 'उपरिष्टाल्लक्षण' अर्थात् ऊपर लक्षणवाला होना चाहिए। याज्य यही (पृथिवी) है और इसके ऊपर के लक्षण हैं-ओषधि, वनस्पति, जल, अग्नि और यह प्रजा ॥१९॥ वही अनुवाक्य श्रेष्ठ होता है जिसके पहले पद में देवता का नाम आता है। याज्य वही श्रेष्ठ होती है जिसके अन्तिम पद में देवता के लिए वषट् किया जाता है। देवता ऋक् ही वीर्य है। मानो दोनों ओर से बल से पकड़कर हवि को उस देवता के अर्पण करता है जिसके लिए वह हवि होता है ॥२०॥ अब कहता है 'वौक्'। वाणी ही वषट्कार है। वाणी ही वीर्य है। इस प्रकार वह वीर्य- सिंचन करता है। फिर कहता है 'षट्', क्योंकि छः ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं में हीं वीर्य-सिंचन करता है। ऋतुओं से सींचा हुआ यह वीर्य इन प्रजाओं को उत्पन्न करता है, इसलिये वषट् करता है ('वषट्' के दो भाग हैं—'व' और 'षट्') ॥२१॥ अब प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर अपने पिता के दायभाग अर्थात् दोनों अर्द्धमासों (पक्षों) को प्राप्त हुए। जो बढ़ता है उसको देव, जो घटता है उसको असुर ॥२२॥ देवों ने चाहा कि किस प्रकार उस भाग को भी ले लें जिसको असुर लिये हुए हैं। वे पूजा और परिश्रम करते रहे। उन्होंने इस हविर्यज्ञ अर्थात् दर्शपूर्णमास यज्ञ को देखा और उनको किया। इनको करके उन्होंने उस एक को ले लिया— ॥२३॥ जो असुरों का था। जब ये दोनों चलते हैं तो महीना होता है। महीने से साल होता है। संवत्सर का अर्थ है 'सब'। इसलिये इस प्रकार देवों ने असुरों का सब लेकर मानो अपने शत्रु असुरों का सब ले लिया। इस प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है अपने शत्रुओं का सब-कुछ ले लेता है। अपने शत्रुओं को सबसे वंचित कर देता है ॥२४॥ जो देवों का अर्द्धमास था उसे 'यवा' कहते हैं, क्योंकि देव उससे युक्त थे ('यु' का अर्थ हैं जुड़ना)। जो असुरों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उससे युक्त न रह सके ॥२५॥ परन्तु अन्यथा भी कहते हैं। जो देवों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उसको न ले सके, और जो असुरों का था उसे 'यवा' कहते हैं क्योंकि देवों ने उसे ले लिया। दिन को 'सब्द' कहते हैं, रात्रि को 'सागरा', महीने को 'ग्रव्य', और वर्ष को 'सुमेक'। 'स्वेक' ही 'सुमेक'

अध्याय-७, ब्राह्मण-३

नामैतद्यत्स॒मेक॒ इति॒ यथा॑ च॒ हि वाऽअ॒न्यवा य॑वेतीवाथ॒ येनैतेषाग्ँ होता भव॑ति तद्यावि॒होत्र॑मित्याचक्ष॑ते ॥ २६॥ ब्राह्मणम् ॥५[७.२.]॥ ॥ पञ्चमः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥ य॒ज्ञेन॒ वै देवाः॑ । दि॒वमुपोद॑क्रामन्नथ योऽयं दे॒वः प॑शूनामीष्टे॒ स इ॒हाही॑यत तस्माद्वास्तव्य॒ इत्या॒हुर्वास्तौ॒ हि तद॒ही॑यत ॥ १॥ स॒ येनैव॒ देवा॑ दि॒वमुपोद॑क्रा- मन् । तेनोऽए॒वार्च॑न्तः श्राम्यन्तश्चेरुर॒थ योऽयं दे॒वः प॑शूनामीष्टे॒ य इ॒हाही॑यत ॥२॥ स॒ ऐक्षत । अ॒हास्य॒ हार्त्ये॒म्यु मा॑ य॒ज्ञादिति॒ सोऽनू॒त्थक्राम॒ स आ॒यतयोत्त- र॒त उ॒पोत्से॒दे स ए॒ष स्विष्टकृतः कालः॑ ॥३॥ ते देवा॑ अब्रुवन् । मा विस्रंक्षी- रिति॒ ते वै मा य॒ज्ञान्मान्त॒र्गाताहु॑तिं मे कल्पयतेति॒ तथेति॑ स समबृहत्स॒ नास्य॑त्त न॒ कं च॒नाहिनत् ॥४॥ ते देवा॑ अब्रुवन् । याव॑न्ति नो ह॒वीग्ँषि गृहीता॒न्यभू- व॒न्त्सर्वेषां तेषाग्ँ हुतमुपजानीत॒ यथास्माऽआहु॑तिं कल्पयामेति॑ ॥५॥ तेऽध्व॒र्युम- ब्रुवन् । यथा॒पूर्वग्ँ॑ ह॒वीग्ष्य॑भिघा॒र्यैकस्मा॒ऽअवदानाय पुन॒राप्या॑ययायातयामानि कुरु॒ तत॒ एकैकमवदा॒नमव॒द्येति॑ ॥६॥ सोऽध्व॒र्युः॑ । यथा॒पूर्वग्ँ॑ ह॒वीग्ष्य॑भ्य॒घारय॑दे- कस्मा॒ऽअवदानाय पुन॒राप्याययदयातयामान्यकरोत्तत॒ एकैकमवदान॒मवा॑द्यत्तस्मा- द्वास्तव्य॒ इत्या॒हुर्वास्तु॒ हि तद्य॒ज्ञस्य॒ यद्धुतेषु॑ ह॒विःषु तस्मा॒द्यस्यै॒ कस्यै॑ च दे॒व- ता॑यै ह॒विर्गृ॒ह्यते सर्वत्रैव स्विष्ट॒कृदन्वा॑भक्तः सर्व॑त्र ह्येवैनं देवा॒ अन्वा॑भजन् ॥७॥ तद्वाऽअ॒ग्नय॒ऽइति॑ क्रियते । अ॒ग्निर्वै स दे॒वस्तस्यैतानि॒ नामा॑नि श॒र्व इति॒ यथा॑ प्राच्या॑ आचक्ष॑ते भ॒व इति॒ यथा॑ बाहीकाः पशूनां॑ प॒ती रु॒द्रोऽग्निरिति॒ तान्यस्या- शान्ता॒न्येवेतरा॑णि॒ नामा॒न्यग्निरित्येव शा॑न्ततमं॒ तस्माद॒ग्नय॒ऽइति॑ क्रियते॒ स्विष्टकृ॒- त॒ऽइति॑ ॥८॥ ते होचुः । यद॒द्य्यमुत्र॒ स॒त्यम॒द॑न्महि॒ तन्नः॑ स्विष्टं॑ कु॒र्विति॒ तद्देभ्यः॑ स्विष्टम॑करोत्त्तस्मात्स्विष्टकृत्त॒ऽइति॑ ॥९॥ सोऽनुवाक्यामनू॒च्य संप्रेष्य॑ति । ये त्था- ग्रिग्ँ स्विष्टकृ॑तम॒याऽड्भिर॒ग्नेः प्रि॒या धामा॒नीति॒ तद॒ग्नेर्यमाज्य॑भागमा॒ह्वाथाट्ठ्सो॑मस्य

का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / १४१ है। यवा और अयवा, जिसको 'यवा' भी कहते हैं, इससे ही 'होता' सम्बन्धित होता है, इसलिये उसको 'याविहोत्र' कहते हैं ॥२६॥ अध्याय ७—ब्राह्मण ३ यज्ञ से ही देवों ने द्यौलोक को प्राप्त किया। जो देव पशुओं का अधिष्ठाता था वह यहीं रह गया, इसलिए उसको 'वास्तव्य' कहा, क्योंकि वह वहाँ 'वास्तु' अर्थात् वेदि में रह गया ॥१॥ जिस यज्ञ के द्वारा देव द्यौलोक को चढ़े थे, उसी यज्ञ से वे पूजा और परिश्रम करते रहे। अब जो पशुओं का अधिष्ठाता देव था और जो यहीं रह गया था—॥२॥ उसने देखा 'अरे ! मैं यहाँ रह गया, ये मुझे यज्ञ से निकाले दे रहे हैं !' वह उनके पीछे- पीछे चढ़ा और अपने (शस्त्र को) उठाकर उत्तर की ओर चला। यह स्विष्टकृत् आहुति का समय था ॥३॥ वे देव बोले—' (शस्त्र) मत मार।' (उन्होंने कहा) 'मुझे यज्ञ से बहिष्कृत न करो। मेरे लिए आहुति दो।' देवों ने कहा—'अच्छा।' उसने शस्त्र हटा लिया; न मारा, न किसी को सताया ॥४॥ ये देव बोले—'जितनी हवियां हमारे लिए ली गईं, वे सब दी जा चुकीं। अब सोचो जिससे इसके लिए एक आहुति दे सकें' ॥५॥ उन्होंने अध्वर्यु से कहा—'पूर्व की भांति हवियों के ऊपर घी छोड़ो (अभिधारय)। एक अवदान (भाग) के लिए फिर पूरा करो। और फिर एक-एक भाग अलग-अलग कर दो' ॥६॥ अध्वर्यु ने पूर्व की भाँति हवियों पर घी छोड़ा, एक भाग के लिए फिर पूरा किया और तैयार करके एक-एक भाग को अलग किया। इसलिये उस रुद्र को वास्तव्य कहा, क्योंकि यज्ञ में दी हुई आहुतियों की हवि में से जो कुछ बच रहता है उसको 'वास्तु' कहते हैं। इसलिये जिस किसी देवता के लिए 'हवि' दी जाती है, सब जगह 'स्विष्टकृत्' (अर्थात् अग्नि) को पीछे से आहुति देते हैं, क्योंकि सर्वत्र ही देवों ने अग्नि को पीछे से भाग दिया ॥७॥ वह अग्नि के लिए ही दी जाती है। अग्नि ही वह देव है। उसके ये नाम हैं—'शर्व' पूर्व के लोग कहते हैं, 'भव' बाहीक लोग कहते हैं, 'पशुओं का पति', 'रुद्र', 'अग्नि'। उसमें और नाम अशान्त अर्थात् अशुभ हैं। केवल 'अग्नि' एक नाम ही शान्त या शुभ है, इसलिये यह आहुति 'अग्नि' (स्विष्टकृत्) के लिए दी जाती है ॥८॥ उन्होंने कहा—'जो आहुति हमने तुझ दूर ठहरे हुए को दी, उसे तू हमारे लिए स्विष्ट (हितकर) बना दे।' उसने उनके लिए उस आहुति को शुभ कर दिया, इसलिये उसका नाम 'स्विष्टकृत्' हुआ ॥९॥ वह (होता) अनुवाक्य को बोलकर देखता है कि किन्हों ने अग्नि स्विष्टकृत् को लिया। 'अग्नि, अग्नि के प्रिय धामों को दे।' इससे अग्नि के आज्य भाग का तात्पर्य है 'सोम के प्रिय धामों

प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्सौ॑म्य॒माज्य॑भागमा॒हाया॑ऽग्नेः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद्य॑ ए॒ष उ॒भ- य॒त्राच्यु॑त॒ आग्ने॒यः पु॒रोडाशो॑ भव॒ति तमा॑ह ॥ १०॥ अथ॒ यथा॑दैवतम् । अया॒डिद॑- वा॒नामाज्य॑पानां प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्प्र॑याजा॒ननु॑याजा॒नाह॑ प्रयाजा॒ननु॑याजा॒ वै देवा॑ आज्य॑पा॒ यद्यद॑ग्नेर्होतुः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद॒ग्नि॑ होता॑रमाह॒ तद॑स्मा॒ऽए॒तां देवा॑ आहु॑तिं कल्पयित्वा॒थैनैतद्यू॒तः स॒मशा॑म्यन्प्रि॒यऽए॒नं धाम॑न्नुपा॒ह्वयन्त॒ तस्मा॑दे॒वꣳ सं- प॑श्यति ॥ ११॥ तद्वैके॑ । दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रम॑ग्नेरया॒ट्सोम॑स्याया॒डिति॒ तदु॑ तथा॒ न कु॑र्याद्विलोम ह॒ ते य॒ज्ञे कु॑र्वन्ति॒ ये दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रादि॒द्ध ह्य॑ प्र॒थम॒मभिव्या॑हरन्नथा॒घा॒रमे॒वाभि॑व्याहरति॒ तस्मा॑दघा॒रमे॒व पू॒र्वं कु॑र्यात् ॥ १२॥ यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑ । यत्र॒ वाऽअ॒दो दे॒वता॒ आवा॑हयति॒ तदपि॒ स्वं म॑हि॒मा- न॒मावा॑हयति॒ तद॑तः प्रा॒ङ्ङिव॒ किं चन स्वाय॑ महि॒म्नऽइ॑ति क्रियते॒ तद॑त्र॒ तं प्रीणा॑- ति तथो॒ हास्यैषो॒ऽमोघा॒यावा॑हितो भवति॒ तस्मा॑दाह यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑ ॥ १३॥ आ यज॑ता॒मेड्या॒ इष॒ इति॑ । प्र॒जा वाऽइष॒स्ता ए॒वैतद्याज॑युकाः करोति॒ ता इ॒माः प्र॒जा यज॑माना॒ अर्च॑न्त्यः श्रा॒म्यन्त्यश्चर॑न्ति ॥ १४॥ सोऽअ॑ध्व॒रा जा॒तवे॑दा जुष॒- ताꣳ ह॒विरिति॑ । तय्य॒द्वैवैतत्समृ॑द्धिमा॒शास्ते॒ यदि॒ देवा॑ ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म- ङ्क्ष्यति॒ तस्मा॑दाह जुष॒ताꣳ ह॒विरिति॑ ॥ १५॥ तय्य॒देते॒ऽअत्र॑ । याज्यानुवाक्ये॑ ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतस्तृतीयसवनं वै स्विष्टकृद्वैश्वदेवं वै तृतीयसवनं पिप्रीहि॑ दे॒- वांशा॒ऽउश॑तो यविष्ठेति तदनुवाक्यायै वैश्वदेवमग्ने॒ यद॒द्य विशो॒ऽअ॑ध्व॒रस्य॑ होत॒- रिति तय्याज्यायै वैश्वदेवं तय्य॒देते॒ऽए॒वꣳरू॑पे भवतस्तेनो॒ऽए॒ते तृतीयसवनस्य रूपं तस्मा॒द्वाऽए॒ते॒ऽअत्र॑ याज्यानुवाक्ये॒ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतः ॥ १६॥ ते वै त्रि॒ष्टुभौ भ॑- वतः । वास्तु॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ यत्स्वि॑ष्ट॒कृद्वीर्यं॑ वै वा॒स्त्विन्द्रि॒यं वीर्यं॑ त्रि॒ष्टुबिन्द्रि॒- य॑मे॒वैतद्वीर्यं॑ वा॒स्तौ स्वि॑ष्ट॒कृति॑ दधाति॒ तस्मात्ति॒ष्टुभौ भ॑वतः ॥ १७॥ उ॒तोऽअनु॑- ष्टुभावे॒व भ॑वतः । वा॒स्त्वनु॑ष्टुब्वा॒स्तु स्वि॑ष्ट॒कृदास्तावे॒वैतदा॑स्तु दधाति॒ पेसुकं॑ वै

का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / १४३ को दे।' इससे सोम आज्य का तात्पर्य है। 'अग्नि के प्रिय धामों को दे'—इससे जो अग्नि का पुरोडाश है उससे तात्पर्य है ॥१०॥ अब देवताओं के लिए—'वह आज्य पीनेवाले देवों के लिए प्रिय धामों को देवे।' इससे प्रयाज और अनुयाज से तात्पर्य है, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान करनेवाले देव हैं। 'वह होता अग्नि के प्रिय धामों का यज्ञ करे।' यहाँ अग्नि का होता के रूप में तात्पर्य है। क्योंकि जब देवों ने उसके लिए अलग आहुति विचार कर ली, उन्होंने उसको इसके द्वारा शान्त किया, और उसको उसके प्रिय धाम (पदार्थ) के लिए बुलाया। इसी प्रयोजन से वह इस प्रकार सोचता है ॥११॥ कुछ लोग अयाट्कार से पहले देवताओं का नाम लेते हैं। इस प्रकार—'अग्नेः अयाट्' (अग्नि का [भाग] देवें)। 'सोमस्य अयाट्' (सोम का [भाग] देवें)। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो 'अयाट्' से पहले देवता का नाम लेते हैं, वे यज्ञ का क्रम बिगाड़ देते हैं। क्योंकि 'अयाट्' पहले कहकर ही यज्ञ में जो पहले कहना चाहिए वह कहा जाता है, इसलिये पहले अयाट्कार ही कहना चाहिए॥१२॥ अब होता अग्नि को सम्बोधन करके कहता है- "यज्ञत् स्वं महिमानम्"- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे।" जहाँ इस प्रकार अग्नि के द्वारा देवताओं का आवाहन करता है वह (अग्नि की) निज महिमा का भी आवाहन करता है। इससे पहले उसकी निज महिमा के लिए कुछ नहीं किया गया, इसलिये इस प्रकार उसको प्रसन्न करता है। इसलिये (अग्नि की स्थापना) विद्या निवारण के लिए होती है। इसलिये कहा- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे' ॥१३॥ अब कहता है- "आ यजतामेज्या इषः"- "यज्ञ के योग्य अन्न का यज्ञ किया जाय।" इष (अन्न) का अर्थ है यहाँ 'प्रजा' से। इस प्रकार प्रजाओं को यज्ञ करने के प्रति उत्साही बनाता है। ये प्रजा के लोग यज्ञ, पूजा और श्रम करते रहते हैं। ('प्रजा' का अर्थ उत्पन्न हुए प्राणी आदि) ॥१४॥ अब कहता है- "अध्वरा जातवेदा जुषताꣳ हविः"- "हानि न पहुँचानेवाले और सब उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देव) पवित्र हवि को करें।" इस प्रकार वह यज्ञ की समृद्धि को चाहता है। क्योंकि यदि देवों ने हवि ले ली तो मानो उसकी बड़ी सफलता हो गई, इसलिये कहता है- 'हवि को ले' ॥१५॥ यहाँ 'याज्य' और 'अनुवाक्य' बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं। स्विष्टकृत् तृतीय सवन (सायंकाल का यज्ञ) है। तृतीय सवन विश्वे देवों का होता है। "पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ।"— "हे सबसे युवा ! तुम इच्छुक देवों को प्रसन्न करो।" यह अंश अनुवाक्य का वैश्वदेव के लिए है। "अग्ने यदद्य विशोऽध्वरस्य होतः"- "हे यज्ञ के होता अग्नि ! जो तुम आज लोगों के पास (आओ)।" याज्य का यह भाग वैश्व देवों के लिए है। चूंकि इन दोनों का ऐसा रूप है इसलिये यह तृतीय सवन का रूप है। इसीलिये इस स्थान पर याज्य और अनुवाक्य बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं ॥१६॥ ये दोनों त्रिष्टुभ् के होते हैं। यज्ञ में जो स्विष्टकृत् है वह वास्तु के समान है। वास्तु वीर्यहीन अर्थात् निर्बल होती है। त्रिष्टुभ् वीर्यवान् है। इस प्रकार स्विष्टकृत् में वीर्य (बल) धारण कराता है। इसीलिये ये दोनों त्रिष्टुभ् हैं ॥१७॥ या वे दोनों अनुष्टुभ् होते हैं। अनुष्टुभ् वास्तु है। स्विष्टकृत् वास्तु है। इस प्रकार वास्तु

तिभिः स॒म॑सृजे॒तैत॑स्य गृ॒हाः प॒शव॒ उ॒पमूर्य॑माणा ई॑यु॒स्तस्मा॑द॒भ्यर्ध॒ऽइवे॑तराभ्य॒ आहु॑तिभ्यो जुहोति ॥ २१ ॥ ए॒ष वै य॒- ज्ञः । येन॒ तद्दे॑वा दि॒वमुपोद॑क्राम॒न्नेष आ॑हवनी॒योऽथ॒ य इ॒हाही॑यत॒ स गार्हप- त्य॒स्तस्मा॑दे॒तं गार्हपत्यात्प्राञ्च॒मुद्ध॑रन्ति ॥ २२ ॥ तं वाऽअ॒ष्टासु॒ विक्र॑मेष्वाद॒धीत॑ । अ॒ष्टाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्री गा॑य॒त्र्यैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २३ ॥ एका॑दशस्वाद॒धीत॑ । ए॒- काद॑शाक्षरा॒ वै त्रि॒ष्टुप्त्रिष्टुभैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २४ ॥ द्वाद॑शस्वाद॒धीत॑ । द्वाद॑- शाक्षरा वै जग॑ती॒ जग॑त्यैवैत

कां० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १८-२८ शतपथब्राह्मण / १४५ में वास्तु रखता है। उसका घर फूलता-फलता है, उसकी सन्तान और पशु फूलते-फलते हैं, जो इस रहस्य को समझता है और जिसके (अनुवाक्य तथा याज्य) अनुष्टुभ् होते हैं ॥१८॥ भाल्लबेय ने अनुवाक्य को अनुष्टुभ् छन्द में किया और याज्य को त्रिष्टुभ् में, जिससे दोनों का फल मिल जाय । वह रथ से गिर गया और बाहु टूट गये। उसने सोचा--'कोई काम मुझसे ऐसा हुआ है जिसके कारण यह गति हुई ।' इसपर उसने समझा कि 'मैंने यज्ञ के क्रम को विलोम (उलटा) कर दिया।' इसलिये यज्ञ के क्रम को विलोम नहीं करना चाहिए । (याज्य और अनुवाक्य) एक ही छन्द में होना चाहिए चाहे अनुष्टुभ् में या त्रिष्टुभ् में ॥१९॥ वह (स्विष्टकृत् के लिए हवियों को) उत्तरी भाग में से काटता है और (कुण्ड के) उत्तरी भाग में आहुति देता है। इस देव की यही दिशा है। इसलिये वह उत्तरी भाग में से काटता है और उत्तरी भाग में आहुति देता है। इसी दिशा में वह उत्पन्न हुआ और इसी दिशा में शान्त किया गया। इसलिये उत्तरी भाग से काटकर उत्तरी भाग में आहुति देता है ॥२०॥ वह इन आहुतियों के इसी ओर (सामने ही) आहुति देता है और आहुतियों के पश्चात् ही प्रजाएं होती हैं। स्विष्टकृत् रुद्र की शक्ति (रुद्रियः) है। यदि वह (स्विष्टकृत् आहुति को) अन्य आहुतियों से मिला दे तो मानो वह पशु पर रुद्र की शक्ति को लाये और उसके घर और पशु नष्ट हो जायें। इसलिए स्विष्टकृत् (आहुति) को अन्य आहुतियों के इधर ही देता है ॥२१॥ यह वही यज्ञ था जिससे देव द्यौलोक को चढ़ गये, अर्थात् यह आहवनीय अग्नि। जो पीछे वहां रह गई वह गार्हपत्य अग्नि है। इसलिये वे इस (आहवनीय अग्नि) को गार्हपत्य अग्नि से लेते हैं जिससे वह उसकी पूर्व की ओर रहे (उसका प्राथम्य हो) ॥२२॥ उस (आहवनीय अग्नि) को (गार्हपत्य अग्नि से) आठ पग की दूरी पर रक्खे। आठ अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार वह गायत्री के द्वारा द्यौ को चढ़ता है ॥२३॥ या वह ग्यारह पग पर रक्खे। ग्यारह अक्षर का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार वह त्रिष्टुभ् के द्वारा द्यौ लोक को चढ़ता है ॥२४॥ या बारह पगों की दूरी पर रक्खे। बारह अक्षर की जगती होती है। जगती के द्वारा ही वह द्यौलोक को चढ़ता है। यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जहाँ मन चाहे वहीं रख दे। थोड़ा ही पूर्व की ओर भी रक्खे तो उससे भी द्यौलोक को चढ़ सकता है ॥२५॥ कुछ लोग कहते हैं कि आहवनीय पर ही हवियों को पकावे, क्योंकि इसी से देव द्यौलोक को चढ़े थे और इसी से ये पूजा और श्रम करते रहे। उसी में हम हवियों को पकावें, उसी में यज्ञ करें। यदि गार्हपत्य पर पकावेंगे तो अपस्खल होगा (अनुचित होगा)। यह आहवनीय यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ में यज्ञ को करते हैं ॥२६॥ परन्तु गार्हपत्य पर भी पकाते हैं। (उनकी युक्ति यह है कि) यह तो आहवनीय है। यह इस काम के लिए तो है नहीं कि उस पर बिना पकाया हुआ पकाया जाय। यह तो इसलिए है कि उस पर पकाये हुए की आहुति दी जाय। इसलिए (हमारी सम्मति में) जहाँ इच्छा हो वहाँ पकावे ॥२७॥ यज्ञ ने कहा 'मुझे नंगेपन से डर लगता है।' (उससे पूछा गया कि) 'तेरे लिए अ-नंगापन

अध्याय-७, ब्राह्मण-४

१४६ शतपथ ब्राह्मण का॒ तेऽन॒मति॒त्यभि॑त ए॒व मा॒ परि॑स्तृणी॒युरि॑ति॒ तस्मा॑दे॒तद॒ग्निम॑भि॒तः परि॑स्तृणन्ति तृ॒ष्णायै॒ वै बि॑भेमीति॒ का ते॑ तृप्ति॒रिति॑ ब्राह्म॒णस्ये॑व तृप्ति॒मनु॑तृप्येय॒मिति॒ तस्मा॑- त्सं॑स्थिते य॒ज्ञे ब्रा॑ह्म॒णं त॑र्पयित॒वै ब्रू॑याद्य॒ज्ञमे॒वैतत्त॑र्पयति ॥ २८ ॥ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [७. ३.] ॥ ॥ प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वै स्वां दु॑हि॒तर॑मभिद॒ध्यौ । दि॒वं वो॒षसं॑ वा मिथु॒न्येना॑या स्यामि॒- ति ताꣳ सं॑बभूव ॥ १ ॥ तद्धै दे॒वाना॒माग॑ आस । य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒ स्वसा॑रं करो॒तीति॑ ॥ २ ॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । योऽयं दे॒वः प॑शूना॒मीष्टे॑ऽति॒संधं॑ वा ऽअय॑ चरति॒ य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒ स्वसा॑रं करो॒ति वि॒ध्येम॒मिति॒ तꣳ रु॒द्रोऽभ्या॒यत्य॑ विव्याध॒ तस्य॑ सा॒मि रेत॑: प्रचस्कन्द॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॑ ॥ ३ ॥ तस्मा॑दे- तदृषि॒णाभ्य॑नूक्तम् । पि॒ता यत्स्वां दु॑हि॒तर॒मधि॒ष्कन् क्ष्म॒या रेत॑: संजग्मा॒नो निषि॑- ञ्च॒दिति॑ तदाग्निमारु॒तमित्यु॒क्त्यं॒ तस्मिं॒स्तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथा॒ तद्दे॒वा रेत॑: प्राज॑नयं॒स्तेषां॑ य॒दा दे॒वानां॑ क्रो॒धो व्यै॒दथ॑ प्रजा॒पति॑मभिषज्यं॒स्तस्य॒ तꣳ श॒ल्यं निर॑कृन्त॒न्त्स वै य॒ज्ञ ए॒व प्र॒जाप॑तिः ॥ ४ ॥ ते हो॑चुः । उप॑जानीत॒ यथे॒दं नामु॒यासत्क॒नीयो॒ ह्यङ्गैत॑र्य॒थे- दꣳ स्या॒दिति॑ ॥ ५ ॥ ते हो॑चुः । भगा॑यैनद्दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ परि॑हरत॒ तद्भग॑: प्रा- शि॒ष्यति॒ तथ्याथा॑ऽङ्गतमे॒वं भ॑वि॒ष्यती॑ति॒ तद्भगा॑य दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ पर्या॑जह्रु॒स्तद्- गोऽवेक्षां॑ चक्रे तस्या॒क्षिणी॑ निर्ददाह॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तो भग॒ इति॑ ॥ ६ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वात्रा॑शमत्पू॒ष्ण ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तत्पू॒ष्णे पर्या॑जह्रु॒स्तत्पूषा॒ प्राश॒ तस्य॒ दतो॒ निर्ज॑घान॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तः पू॒षेति॒ तस्मा॒द्यं पू॒ष्णे च॒रुं कुर्व॑न्ति प्रपि॒ष्टाना॑मे॒व कुर्व॑न्ति यथाद॒न्तक॑यै॒वम् ॥ ७ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वा- त्राश॑मद्बृह॒स्पतय॑ ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तद्बृह॒स्पत॑ये॒ पर्या॑जह्रुः स॒ बृह॒स्पति॑: सवि॒तार॑- मे॒व प्रस॒वायोपा॑धावत्सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वीति॒ तद॑स्मै सवि॒ता प्र॒सवि॒ता प्रासु॑वत्त॒देनꣳ॑ सवि॒तृप्र॑सूतं॒ नाहि॑न॒त्ततो॒ऽर्वाची॑नꣳ शा॒न्तं तदे॒तन्निदा॑नेन

कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / १४७ क्या है ?' (उसने उत्तर दिया) 'मेरे चारों ओर कुशा दो।' इसलिए यज्ञ के चारों ओर कुश बिछाते हैं। (यज्ञ ने कहा), 'मुझे प्यास से डर लगता है।' (उन्होंने पूछा) 'तेरी तृप्ति कैसे होती है?' (उसने उत्तर दिया) 'ब्राह्मण की तृप्ति से मेरी तृप्ति होती है।' इसलिए यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् ब्राह्मण की तृप्ति करने के लिए बोलना चाहिए, क्योंकि इससे यज्ञ की तृप्ति होती है ॥२८॥ अध्याय ७—ब्राह्मण ४ प्रजापति अपनी लड़की अर्थात् द्यौ या उषा पर मोहित हो गये और प्रसंग की इच्छा हुई; उससे प्रसंग किया ॥१॥ देवों के लिए यह पाप था कि यह अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता है ॥२॥ उन देवों ने उस देव से जो पशुओं का अधिष्ठाता (रुद्र) है कहा कि यह जो पाप करता है कि अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता है, उसको बांध दो। रुद्र ने निशाना ताककर उसे बींध दिया। उसका आधां वीर्य गिर पड़ा। यह ऐसे हुआ ॥३॥ इसीलिए ऋषि ने ऐसा कहा, 'जब पिता ने अपनी ही लड़की से प्रसंग किया तो उसका वीर्य भूमि पर गिर पड़ा' (ऋग्वेद १०।६१।७)। यह अग्नि-मारुत् उक्थ (गीत) हो गया। इसी सम्बन्ध में आख्यायिका है कि किस प्रकारदेवों ने इस वीर्य को उपजाया। जब देवों का क्रोध कम हुआ तो प्रजापति का इलाज किया और उस (रुद्र) का तीर निकाला, क्योंकि यज्ञ ही प्रजापति है ॥४॥ उन्होंने कहा, 'कोई ऐसा उपाय सोचना चाहिए कि यह (यज्ञ अर्थात् प्रजापति के शरीर का वह भाग जो तीर से छिद गया था) नष्ट न हो जाय। छोटी-सी आहुति से यह काम कैसे हो ? ॥५॥ उन्होंने कहा, 'दक्षिण की ओर बैठे हुए 'भग' के पास इसे ले जाओ। भग इसको खा लेगा। यह आहुति दिये हुए के समान हो जायगा।' बस वे उसको दक्षिण की ओर बैठे हुए भग के पास ले गये। भग ने उसकी ओर देखा। उसने (भग की) आँखें जला दीं। ऐसा ही हुआ। इसीलिए कहते हैं कि भग अन्धा है ॥६॥ उन्होंने कहा, 'यह अभी शान्त नहीं हुआ। इसको पूषा के पास ले जायेंगे।' वे पूषा के पास ले गये। पूषा ने उसे चखा। उसने (पूषा का) दाँत तोड़ दिया। यह ऐसा ही हुआ। इसीलिए कहते हैं कि पूषा (अदन्तक) बिना दाँतवाला है। इसीलिए पूषा के लिए जो चरु बनाते हैं वह पिसे हुए अन्न की बनाते हैं जैसे बिना दाँतवालों के लिए बनाया जाता है ॥७॥ उन्होंने कहा, 'वह अभी शान्त नहीं हुआ। बृहस्पति के पास इसे ले जाओ।' ये बृहस्पति के पास ले गये। बृहस्पति ने सविता के पास प्रसव (प्रेरणा) के लिए भेज दिया। सविता ही देवों का प्रेरक (प्रसविता) है। उसने कहा, 'इसकी मुझे प्रेरणा करो।' प्रेरक सविता ने उसकी उसके लिए प्रेरणा की। चूंकि वह सविता से प्रसूत अर्थात् प्रेरित हुआ था, इसीलिए उसने सविता को हानि नहीं पहुँचाई। इसीलिए अब वह शान्त हो गया। निदान में यह वही है जो प्राशित्र (पहला