शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
( १३ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी कृपाको ही सब साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना... | ६६७ | प्रतिपादन... | ६९८ |
| ४- नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन, उनका सत्कार तथा ऋषियोंके पूछनेपर वायुके द्वारा पशु, पाश एवं पशुपतिका तात्त्विक विवेचन... | ६७१ | १६- ऋषियोंके प्रश्नका उत्तर देते हुए वायुदेवके द्वारा शिवके स्वतन्त्र एवं सर्वानुग्राहक स्वरूपका प्रतिपादन... | ७०० |
| ५- महेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन... | ६७५ | १७- परम धर्मका प्रतिपादन, शैवागमके अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन... | ७०४ |
| ६- ब्रह्माजीकी मूर्च्छा, उनके मुखसे रुद्रदेवका प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्माजीके द्वारा आठ नामोंसे महेश्वरकी स्तुति तथा रुद्रकी आज्ञासे ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचना... | ६७९ | १८- पाशुपत-व्रतकी विधि और महिमा तथा भस्म-धारणकी महत्ता... | ७०८ |
| ७- भगवान् रुद्रके ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट होनेका रहस्य, रुद्रके महामहिम स्वरूपका वर्णन, उनके द्वारा रुद्रगणोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीके रोकनेसे उनका सृष्टिसे विरत होना... | ६८२ | १९- बालक उपमन्युको दूधके लिये दुःखी देख माताका उसे शिवकी आराधनाके लिये प्रेरित करना तथा उपमन्युकी तीव्र तपस्या... | ७१३ |
| ८- ब्रह्माजीके द्वारा अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा उस स्तोत्रकी महिमा... | ६८४ | २०- भगवान् शंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना, उन्हें क्षीरसागर आदि देकर बहुत-से वर देना और अपना पुत्र मानकर पार्वतीके हाथमें सौंपना, कृतार्थ हुए उपमन्युका अपनी माताके स्थानपर लौटना... | ७१५ |
| ९- महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकट्य और देवीके भ्रूमध्यभागसे शक्तिका प्रादुर्भाव... | ६८७ | वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) | |
| १०- भगवान् शिवका पार्वती तथा पार्षदोंके साथ मन्दराचलपर जाकर रहना, शुम्भ-निशुम्भके वधके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे शिवका पार्वतीको 'काली' कहकर कुपित करना और कालीका 'गौरी' होनेके लिये तपस्याके निमित्त जानेकी आज्ञा माँगना... | ६८८ | १- ऋषियोंके पूछनेपर वायुदेवका श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलनका प्रसंग सुनाना, श्रीकृष्णको उपमन्युसे ज्ञानका और भगवान् शंकरसे पुत्रका लाभ... | ७१९ |
| ११- पार्वतीकी तपस्या, एक व्याघ्रपर उनकी कृपा, ब्रह्माजीका उनके पास आना, देवीके साथ उनका वार्तालाप, देवीके द्वारा काली त्वचाका त्याग और उससे कृष्णवर्णा कुमारी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई कौशिकीके द्वारा शुम्भ-निशुम्भका वध... | ६९१ | २- उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको पाशुपत ज्ञानका उपदेश... | ७२० |
| १२- गौरीदेवीका व्याघ्रको अपने साथ ले जानेके लिये ब्रह्माजीसे आज्ञा माँगना, ब्रह्माजीका उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना, देवीका शरणागतको त्यागनेसे इनकार करना, ब्रह्माजीका देवीकी महत्ता बताकर अनुमति देना और देवीका माता-पितासे मिलकर मन्दराचलको जाना... | ६९३ | ३- भगवान् शिवकी ब्रह्मा आदि पंचमूर्तियों, ईशानादि ब्रह्ममूर्तियों तथा पृथ्वी एवं शर्व आदि अष्टमूर्तियोंका परिचय और उनकी सर्वव्यापकताका वर्णन... | ७२३ |
| १३- मन्दराचलपर गौरीदेवीका स्वागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्धपर प्रकाश तथा देवीके साथ आये हुए व्याघ्रको उनका गणाध्यक्ष बनाकर अन्तःपुरके द्वारपर सोमनन्दी नामसे प्रतिष्ठित करना... | ६९५ | ४- शिव और शिवाकी विभूतियोंका वर्णन... | ७२४ |
| १४- अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्नीषोमात्मकताका प्रतिपादन... | ६९७ | ५- परमेश्वर शिवके यथार्थ स्वरूपका विवेचन तथा उनकी शरणमें जानेसे जीवके कल्याणका कथन... | ७२९ |
| १५- जगत् 'वाणी और अर्थरूप' है—इसका | ६- शिवके शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूपका तथा उनकी प्रणवरूपताका प्रतिपादन... | ७३१ | |
| ७- परमेश्वरकी शक्तिका ऋषियोंद्वारा साक्षात्कार, शिवके प्रसादसे प्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी सेवाभक्ति तथा पाँच प्रकारके शिव-धर्मका वर्णन... | ७३३ | ||
| ८- शिव-ज्ञान, शिवकी उपासनासे देवताओंको उनका दर्शन, सूर्यदेवमें शिवकी पूजा करके अर्घ्यदानकी विधि तथा व्यासावतारोंका वर्णन... | ७३५ | ||
| ९- शिवके अवतार, योगाचार्यों तथा उनके शिष्योंकी नामावली... | ७३८ | ||
| १०- भगवान् शिवके प्रति श्रद्धा-भक्तिकी आवश्यकताका प्रतिपादन, शिवधर्मके चार पादोंका वर्णन एवं ज्ञानयोगके साधनों तथा शिवधर्मके अधिकारियोंका निरूपण, शिवपूजनके अनेक प्रकार एवं अनन्यचित्तसे भजनकी महिमा... | ७३९ |
(१४)
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ११- वर्णाश्रम-धर्म तथा नारी-धर्मका वर्णन; शिवके भजन, चिन्तन एवं ज्ञानकी महत्ताका प्रतिपादन... | ७४२ | २५- काम्य कर्मके प्रसंगमें शक्तिसहित पंचमुख महादेवकी पूजाके विधानका वर्णन... | ७८५ |
| १२- पंचाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका वर्णन... | ७४६ | २६- आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन... | ७८७ |
| १३- पंचाक्षर-मन्त्रकी महिमा, उसमें समस्त वाङ्मयकी स्थिति, उसकी उपदेशपरम्परा, देवीरूपा पंचाक्षरीविद्याका ध्यान, उसके समस्त और व्यस्त अक्षरोंके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति तथा अंगन्यास आदिका विचार... | ७४८ | २७- शिवके पाँच आवरणोंमें स्थित सभी देवताओंकी स्तुति तथा उनसे अभीष्टपूर्ति एवं मंगलकी कामना... | ७९३ |
| १४- गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा, मन्त्रगणनाके लिये विभिन्न प्रकारकी मालाओंका महत्त्व तथा अंगुलियोंके उपयोगका वर्णन, जपके लिये उपयोगी स्थान तथा दिशा, जपमें वर्जनीय बातें, सदाचारका महत्त्व, आस्तिकताकी प्रशंसा तथा पंचाक्षर-मन्त्रकी विशेषताका वर्णन... | ७५२ | २८- ऐहिक फल देनेवाले कर्मों और उनकी विधिका वर्णन, शिवपूजनकी विधि, शान्ति-पुष्टि आदि विविध काम्य कर्मोंमें विभिन्न हवनीय पदार्थोंके उपयोगका विधान... | ८०९ |
| १५- त्रिविध दीक्षाका निरूपण, शक्तिपातकी आवश्यकता तथा उसके लक्षणोंका वर्णन, गुरुका महत्त्व, ज्ञानी गुरुसे ही मोक्षकी प्राप्ति तथा गुरुके द्वारा शिष्यकी परीक्षा... | ७५६ | २९- पारलौकिक फल देनेवाले कर्म—शिवलिंग-महाव्रतकी विधि और महिमाका वर्णन... | ८१३ |
| १६- समय-संस्कार या समयाचारकी दीक्षाकी विधि... | ७५९ | ३०- योगके अनेक भेद, उसके आठ और छः अंगोंका विवेचन—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, दशविध प्राणोंको जीतनेकी महिमा, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधिका निरूपण... | ८१४ |
| १७- षडध्वशोधनकी विधि... | ७६३ | ३१- योगमार्गके विघ्न, सिद्धि-सूचक उपसर्ग तथा पृथ्वीसे लेकर बुद्धि-तत्त्वपर्यन्त ऐश्वर्यगुणोंका वर्णन, शिव-शिवाके ध्यानकी महिमा... | ८१८ |
| १८- षडध्वशोधनकी विधि... | ७६५ | ३२- ध्यान और उसकी महिमा, योगधर्म तथा शिवयोगीका महत्त्व, शिवभक्त या शिवके लिये प्राण देने अथवा शिवक्षेत्रमें मरणसे तत्काल मोक्ष-लाभका कथन... | ८२३ |
| १९- साधक-संस्कार और मन्त्र-माहात्म्यका वर्णन... | ७६९ | ३३- वायुदेवका अन्तर्धान, ऋषियोंका सरस्वतीमें अवभृथ-स्नान और काशीमें दिव्य तेजका दर्शन करके ब्रह्माजीके पास जाना, ब्रह्माजीका उन्हें सिद्धि-प्राप्तिकी सूचना देकर मेरुके कुमार-शिखरपर भेजना... | ८२७ |
| २०- योग्य शिष्यके आचार्यपदपर अभिषेकका वर्णन तथा संस्कारके विविध प्रकारोंका निर्देश... | ७७० | ३४- मेरुगिरिके स्कन्द-सरोवरके तटपर मुनियोंका सनत्कुमारजीसे मिलना, भगवान् नन्दीका वहाँ आना और दृष्टिपातमात्रसे पाशछेदन एवं ज्ञानयोगका उपदेश करके चला जाना, शिवपुराणकी महिमा तथा ग्रन्थका उपसंहार... | ८३० |
| २१- अन्तर्याग अथवा मानसिक पूजाविधिका वर्णन... | ७७२ | ||
| २२- शिवपूजनकी विधि... | ७७३ | ||
| २३- शिवपूजाकी विशेष विधि तथा शिव-भक्तिकी महिमा... | ७७७ | ||
| २४- पंचाक्षर-मन्त्रके जप तथा भगवान् शिवके भजन-पूजनकी महिमा, अग्निकार्यके लिये कुण्ड और वेदी आदिके संस्कार, शिवाग्निकी स्थापना और उसके संस्कार, होम, पूर्णाहुति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी विधि तथा हवनान्तमें किये जानेवाले कृत्यका वर्णन... | ७८० |
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चित्र-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| रेखा-चित्र | गणोंको शाप देना ...................................... | ११३ | |
| १- लिंगस्थित भगवान् शिव.... | मुखपृष्ठ | १५- नारदजीका मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्ताप-पूर्वक भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर अपनी शुद्धिका उपाय पूछना... | ११४ |
| २- शौनकजीको सूतजीका शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना... | २१ | १६- नारदजीका ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक नमस्कार करना और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछना .......................... | ११७ |
| ३- यमपुरीमें गये देवराज ब्राह्मणको विमानपर बिठाकर शिवदूतोंका कैलास जानेके लिये उद्यत होना तथा धर्मराजका अपने भवनसे बाहर निकलकर उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना करना... | २३ | १७- सदाशिवद्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका)-का प्रकटीकरण... | ११९ |
| ४- वाष्कलनगर-निवासिनी चंचुलाका गोकर्णक्षेत्रमें शिवकथा बाँचनेवाले एक पौराणिक ब्राह्मणसे अपना उद्धार करनेकी बात करना... | २५ | १८- अविमुक्तक्षेत्र (काशी)—आनन्दवनमें पार्वतीके साथ विचरण करते हुए भगवान् शिवके द्वारा अपने वामभागके दसवें अंगसे विष्णुको प्रकट करना... | १२१ |
| ५- चंचुलाका शिवपुराण सुननेके परिणामस्वरूप शिवद्वारा भेजे गये विमानपर आरूढ़ होकर शिवलोकमें आगमन तथा पार्वतीका उसे अपनी सखी स्वीकार करना... | २८ | १९- शिवका ब्रह्माका हाथ पकड़कर विष्णुको उन्हें सौंपकर संकटके समय सदा उनकी सहायता करते रहनेके लिये कहना... | १३० |
| ६- पार्वतीदेवीका चंचुलाके साथ जाकर उसके पति पिशाचयोनिवाले बिन्दुगको शिवपुराणकी कथा सुनानेका गन्धर्वराज तुम्बुरुको आदेश ... | ३० | २०- ब्रह्माजीका ऋषियों और देवताओंके साथ क्षीरसागरके तटपर विष्णुके पास आगमन... .. | १३६ |
| ७- चंचुलाके साथ विंध्यपर्वतपर जाकर गन्धर्वराज तुम्बुरुका बिन्दुग पिशाचको पाशोंद्वारा बाँधना तथा हाथमें वीणा लेकर गौरी-पतिकी कथाका गान आरम्भ करना... | ३१ | २१- कैलासके शिखरपर निवास करनेवाले साम्ब शिवका ध्यान करनेयोग्य पंचमुख-रूप... ... | १४२ |
| ८- सरस्वती नदीके तटपर तपस्यारत व्यासदेवको सनत्कुमारका सत्यवस्तु—भगवान् शिवके चिन्तनका आदेश देना... | ४१ | २२- ब्रह्माद्वारा घोर एवं उत्कृष्ट तप करनेपर उनकी दोनों भौंहों और नासिकाके मध्यभागसे शिवका अर्धनारीश्वररूपमें प्राकट्य... | १४८ |
| ९- महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका परिचय देना तथा दोनोंके मध्यमें भीषण अग्निस्तम्भके रूपमें उनका आविर्भाव... | ४४ | २३- ब्रह्माद्वारा प्रार्थना करनेपर शिवका अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि करना... ... | १४९ |
| १०- हिमालयपर्वतकी एक गुफामें नारदजीकी तपस्या......................................................... | १०६ | २४- ब्रह्माका अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त कर दो रूपवाला हो जाना तथा एकसे मनु और दूसरेसे शतरूपाको उत्पन्न करना... ...... | १५० |
| ११- नारदजीका अपनी काम-विजयका वृत्तान्त विष्णुसे कहनेके लिये विष्णुलोकमें आगमन... | १०८ | २५- काम्पिल्य-नगरमें निवास करनेवाले यज्ञदत्त ब्राह्मणके दुराचारी पुत्र गुणनिधिका शिवमन्दिरमें नैवेद्य चुरानेकी इच्छासे प्रवेश... | १५२ |
| १२- विष्णुद्वारा मायानिर्मित नगरमें राजा शीलनिधिका नारदको रत्नसिंहासनपर बिठाकर उनका पूजन करना तथा अपनी कन्या श्रीमतीको उन्हें प्रणाम करनेका आदेश देना..... | ११० | २६- कलिंगराज दमका ग्रामाध्यक्षोंको बुलाकर अपने-अपने गाँवोंके शिवालयोंमें सदा दीप जलानेका आदेश देना... | १५२ |
| १३- राजपुत्रोंसे समलंकृत राजा शीलनिधिकी स्वयंवरसभामें बैठे हुए कुरूप मुखवाले नारदजीकी ओर देखकर ब्राह्मण-वेषमें आकर बैठे हुए दो रुद्र-पार्षदोंका हँसी उड़ाना... | ११२ | २७- ब्रह्माजीसे समस्त शुभ-शिव-चरित्र सुनानेके लिये नारदकी प्रार्थना... ............................. | १५७ |
| १४- नारदका दर्पणमें अपना वानरके समान मुख देखना और उपहास करनेवाले दोनों रुद्र- | २८- ब्रह्माके हृदयसे मनोहर रूपवाली सुन्दरी नारी संध्याका उत्पन्न होना... .................... | १५७ | |
| २९- मरीचि आदि ऋषियोंद्वारा मनोभव कामदेवके मदन, मन्मथ, दर्पक, कंदर्प आदि अनेक नाम रखना... ............................................. | १५९ | ||
| ३०- दक्षका अपने ही शरीरसे प्रकट हुई ‘रति’ नामकी कन्याको कंदर्पको संकल्पपूर्वक सौंपना... | १६० |
( १६ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ३१- ब्रह्माकी प्रेरणासे वसिष्ठका एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें चन्द्रभाग पर्वतपर तपस्या करनेवाली संध्याके पास जाकर उसके निर्जन पर्वतपर आनेका प्रयोजन पूछना तथा तपस्या करनेकी विधि बताना... | १६१ |
| ३२- तपस्यामें लीन संध्याको शिवका उसीके आराध्यरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देना... | १६३ |
| ३३- संध्याद्वारा मेधातिथि मुनिके यज्ञकी अग्निमें आत्माहुति तथा उसके पुरोडाशमय शरीरके तत्काल दग्ध होनेपर यज्ञकी समाप्तिके समय अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिका तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें उसे प्राप्त करना... | १६८ |
| ३४- महाप्रजापति दक्षकी तपस्यासे प्रसन्न होकर सिंहवाहिनी जगदम्बाका चतुर्भुजरूपमें उन्हें दर्शन देना... | १७२ |
| ३५- नारदकी ही शिक्षासे अपने हर्यश्व तथा शबलाश्व आदि पुत्रोंके ऊर्ध्वगामी होनेपर दक्ष प्रजापतिका कष्टका अनुभव करना तथा दैववश अनुग्रह करनेके लिये आये हुए नारदको उनका क्रोधपूर्वक धिक्कारना... | १७६ |
| ३६- अपनी पत्नी वीरिणीसहित प्रजापति दक्षद्वारा जगदम्बाका ध्यान और प्रेमपूर्वक स्तवन करना... | १७७ |
| ३७- सब देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णु आदिका गिरिश्रेष्ठ कैलासपर महादेवके पास आगमन... | १८० |
| ३८- सतीका तपस्या करके मनोवांछित वर पानेपर घर लौटकर माता (वीरिणी) और पिता (प्रजापति दक्ष)-को प्रणाम करना तथा अपनी सखीद्वारा उनको अपनी तपस्यासम्बन्धी सब समाचार कहलवाना... | १८७ |
| ३९- ब्रह्मा, विष्णु, नारद, देवताओं और मुनियों आदिके साथ शिवकी दक्षके घरके लिये विवाहयात्रा... | १८८ |
| ४०- विवाहकृत्य सकुशल समाप्त हो जानेपर दक्षकी आज्ञासे शिवका प्रसन्नतापूर्वक सतीको वृषभकी पीठपर बिठाकर विष्णु आदि देवताओं और मुनियों आदिके साथ हिमालयपर्वतकी ओर प्रस्थान करना... | १९१ |
| ४१- शिवका अपने स्वरूपका ध्यान तोड़ना जानकर जगदम्बा सतीका कैलासपर आना तथा उदारचेता शम्भुद्वारा उन्हें अपने सामने बैठनेके लिये आसन देना... | २०२ |
| ४२- दक्षद्वारा यज्ञमें रुद्रगणोंको शाप दिया जाना तथा शिवके प्रियभक्त नन्दीका दक्षको प्रत्युत्तर... | २०४ |
| ४३- ब्राह्मणकुल और वेदोंको शाप देनेवाले नन्दीको शिवका समझाना... | २०५ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ४४- वृषभपर सवार होकर बहुसंख्यक प्रमथगणोंके साथ सतीका अपने पिता दक्षके यज्ञकी ओर प्रस्थान... | २११ |
| ४५- दक्षके यज्ञमें उपस्थित सतीके शरीरका योगाग्निसे जलकर उसी क्षण भस्म हो जाना, शिवके पार्षदोंका दक्षका प्राण लेनेके लिये आक्रमण तथा भृगुद्वारा यज्ञमें विघ्न डालनेवालोंके नाशके लिये यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक सहस्रों देवताओंको प्रकट करना और शिवके प्रमथ-गणोंका भाग खड़ा होना... | २१५ |
| ४६- नारदके मुखसे दक्षयज्ञमें सतीके योगाग्निमें भस्म होने और असंख्य प्रमथगणोंके विनष्ट हो जानेका समाचार सुनकर शिवद्वारा क्रोधपूर्वक सिरसे एक जटा उखाड़कर पर्वतपर पटकना तथा जटाके दो भाग होनेपर पूर्वभागसे वीरभद्र और दूसरे भागसे महाकालीका उत्पन्न होना... | २१९ |
| ४७- दक्षका भगवान् विष्णुकी शरणमें जाकर उनके चरणोंमें गिरना तथा यज्ञका विनाश न होनेकी प्रार्थना करना... | २२३ |
| ४८- शुक्राचार्यके आदेशसे दधीचिद्वारा महा-मृत्युंजयका कठोर तपस्यापूर्वक जप तथा शिवका उनके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन देना, दधीचिद्वारा शिवकी स्तुति और वरकी याचना... | २३१ |
| ४९- ब्रह्मा, विष्णु और देवताओंके साथ शिवका कनखलमें स्थित दक्षकी यज्ञशालामें पधारना तथा वीरभद्रद्वारा विध्वंस किये गये यज्ञ-स्थलको देखना... | २३८ |
| ५०- देवताओंद्वारा स्तुति की जानेपर परम अद्भुत दिव्य रत्नमय रथपर विराजमान जगज्जननी देवी उमाका उनके सामने प्रकट होना... | २४७ |
| ५१- मनमें संतानकी कामना लेकर तप करनेवाली हिमवान्की पत्नी मेनाके सामने प्रसन्नतापूर्वक जगदम्बाका प्रकट होकर उनपर अनुग्रह करना... | २५० |
| ५२- गिरिराज हिमालयकी प्रार्थनापर नारदजीद्वारा उमाकी जन्मकुण्डलीपर विचार करनेके लिये उनका हाथ देखा जाना... | २५४ |
| ५३- अपनी कन्या उमाका विवाह किसी सुन्दर वरके साथ कर देनेके लिये मेनाका अपने पति हिमवान्के पास जाकर विनय करना तथा हिमवान्का उन्हें समझाना... | २५७ |
| ५४- शिवका गंगावतरणतीर्थमें जाकर आत्मभूत परमात्माका चिन्तन करना तथा सेवकोंसहित गिरिराज हिमवान्का आकर उन्हें स्तवनपूर्वक प्रणाम करना... | २६० |
| ५५- शिवका दर्शन करनेके लिये अपनी पुत्री उमाके साथ नित्य आनेकी हिमवान्का उनसे |
( १७ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| आज्ञा माँगना और शिवद्वारा उन्हें अकेले ही आनेकी आज्ञा देना ................................. | २६३ | ६७-भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, गंगा-यमुनाका उन्हें सुन्दर चँवर डुलाना, आठों सिद्धियोंका उनके आगे नाचना तथा सिद्ध, उपदेवता, समस्त मुनियोंका वररूपमें शोभित शिवके साथ प्रसन्नतापूर्वक यात्रा करना... ...................................... | ३२७ |
| ५६-इन्द्रद्वारा अपना स्मरण किये जानेपर कामदेवका तत्काल ही उनके सामने आ पहुँचना... ..... | २६९ | ६८-केलिगृहमें नूतन दम्पति शिव-पार्वतीको देखनेके लिये सोलह दिव्य नारियों—सरस्वती आदिका प्रवेश तथा रत्नमय सिंहासनपर नवदम्पतिके विराजमान होनेपर भगवान् शिवके सामने रतिका हाथ जोड़कर अपने पति (कामदेव)-को जीवित करनेकी प्रार्थना करना... .................. | ३३६ |
| ५७-रुद्रकी नेत्राग्निसे कामदेवका भस्म होना... .... | २७१ | ६९-मेनाके मनोभावको जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मणपत्नीद्वारा गिरिजाको उत्तम पातिव्रत्यकी शिक्षाका उपदेश... .................................. | ३४५ |
| ५८-शिवकी क्रोधाग्निको बड़वानलकी संज्ञा देकर—घोड़ेके रूपमें परिवर्तित कर ब्रह्माका उसको स्थापित करनेके लिये समुद्रतटपर जाना तथा समुद्रका साक्षात् प्रकट होकर उनकी स्तुति कर आनेका कारण पूछना... ......................... | २७४ | ७०-ब्रह्माजीकी सत्प्रेरणासे स्वामी कार्तिकका विमानसे उतरकर हाथमें अपनी चमकीली शक्तिको लेकर तारक-असुरकी ओर पैदल दौड़ पड़ना... ......................................... | ३५२ |
| ५९-शिवकी आराधनाके लिये पार्वतीकी दुष्कर तपस्या तथा उनके तपके प्रभावसे उस स्थलपर विचरण करनेवाले एक-दूसरेके विरोधी सिंह, गौ, चूहे, बिल्ली आदिका पारस्परिक विरोधका त्याग कर देना तथा वृक्षोंका सदा फलसे लदा रहना... ................................ | २७८ | ७१-तारक-असुरका हनन करनेवाले कुमार स्कन्द (कार्तिक)-का देवताओंके साथ विमानमें बैठकर शिवजीके समीप कैलास पहुँचना... .......... | ३५४ |
| ६०-भगवान् शिवकी आज्ञासे सप्तर्षियोंका तपस्यामें तत्पर पार्वतीके आश्रमपर जाकर उनके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना... ....... | २८७ | ७२-सखियोंके समझानेपर पार्वतीद्वारा अपनी ही आज्ञामें तत्पर रहनेवाले चेतन पुरुष (गणेश)-का अपने शरीरकी मैलसे निर्माण करना तथा उन्हें अपना पुत्र कहकर द्वारपालके पदपर नियुक्त करना................................. | ३५७ |
| ६१-परीक्षाके बहाने जटिल तपस्वी ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए शंकरके सामने ही पार्वतीका अग्निमें प्रवेश करना तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे आगका उसी क्षण चन्दन-पंकके समान शीतल हो जाना और पार्वतीका आकाशमें ऊपरकी ओर उठने लगना... ................................. | २९० | ७३-द्वारपालके पदपर नियुक्त गणेशसे शिवजीका लीलापूर्वक अपने गणों और देवताओंका युद्ध करना तथा उनके पराजित न होनेपर शूलपाणिका स्वयं आकर घोर युद्धके पश्चात् त्रिशूलसे उनका (गणेशका) मस्तक काट देना तथा समाचार पाकर स्नानमें सखियोंसहित तत्पर पार्वतीका घटनास्थलपर आकर बहुत-सी शक्तियोंको उत्पन्न कर उन्हें प्रलय करनेकी आज्ञा देना तथा शिवगणोंका भयभीत होकर दूर भाग खड़ा होना... ................... | ३५८ |
| ६२-बायें हाथमें सींग और दाहिने हाथमें डमरू लेकर पीठपर कथरी रखकर तथा लाल वस्त्र पहनकर शिवजीका नटके वेषमें मेनकाके पास जाना तथा मेनकाके पास बैठी हुई स्त्रियोंकी टोलीके समीप उनका सुन्दर नृत्य करना... .. | २९९ | ७४-देवताओंद्वारा शिवके स्मरणपूर्वक वेदमन्त्रद्वारा जलको अभिमन्त्रित कर बालक (गणेश)-के शरीरपर छिड़का जाना तथा जलके स्पर्शसे बालकका शिवेच्छासे चेतनायुक्त होकर जीवित हो जाना तथा सोये हुएकी तरह उठ बैठना... | ३६० |
| ६३-देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना....................................... | ३०२ | ७५-ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आदि देवताओंका | |
| ६४-वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों तथा मेरु आदि पर्वतोंके समझानेपर मेना और हिमवान्का प्रसन्नतापूर्वक शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय करना... | ३०७ | ||
| ६५-मेनाका विलाप करना तथा अपनी पुत्री पार्वती और नारदको दुर्वचन सुनाना और धिक्कारना... | ३२३ | ||
| ६६-सप्तर्षियोंके समझानेपर भी मेनाका शिवके साथ पार्वतीका विवाह न करनेका ही हठ करना तथा हिमवान्का उन्हें समझाना और शिवके पूजनीय स्वरूपका वर्णन करना... ...... | ३२४ |
( १८ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| पार्वतीजीको प्रसन्न करनेके लिये गणेशको सर्वाध्यक्ष घोषित करना तथा शंकरका उन्हें सम्पूर्ण गणोंका अध्यक्ष बनाना... | ३६१ | वर देना तथा कमलोंकी बनी हुई अपनी शिरोमालाको उतारकर उसके गलेमें कृपापूर्वक डाल देना... | ४५१ |
| ७६- पृथ्वी-परिक्रमा करनेमें अपने-आपको असमर्थ पाकर गणेशजीद्वारा अपने माता-पिताको दो आसनोंपर बिठाकर उनकी सात बार प्रदक्षिणाकर अपने विवाहकी प्रार्थना करना... | ३६५ | ८७- शिवजीका प्रकट होकर बालक गृहपतिको अभय-दान देना तथा अग्निपदका भागी बनाना... | ४६० |
| ७७- प्रजापति विश्वरूपकी सुन्दर कन्याओं-सिद्धि और बुद्धिके साथ विश्वकर्माद्वारा गणेशजीका विवाह-संस्कार सम्पन्न कराना... | ३६७ | ८८- रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान्का सूर्यके निकट जाकर उनसे सारी विद्याएँ सीखना... | ४६४ |
| ७८- तारकके तीनों पुत्र-तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्षकी तपस्यासे अत्यन्त संतुष्ट हुए महायशस्वी ब्रह्माजीका वर देनेके लिये उनके सामने प्रकट होना और उन तीनोंका अंजलि बाँधकर पितामहके चरणोंमें प्रणिपात करना... | ३६९ | ८९- भगवान् शिवका यतिरूप धारण कर भील आहुक और उसकी पत्नी आहुकाकी परीक्षा लेना तथा पतिके हिंसक पशुओंद्वारा रातमें खा लिये जानेपर प्रातःकाल यतिसे चिता जलवाकर भीलनीके उसमें प्रवेश करते ही शिवका अपने साक्षात् रूपमें प्रकट होकर वर देना... | ४७२ |
| ७९- देवराज इन्द्र, विष्णु आदिसहित देवगणोंकी त्रिपुरवासी दैत्योंके नाशके लिये भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवका वृषभपर सवार होकर प्रकट हो जाना और नन्दीश्वरकी पीठसे उतरकर विष्णुका आलिंगनकर नन्दीपर हाथ टेककर खड़े हो जाना... | ३७५ | ९०- देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर शिवका दर्शन करनेके लिये इन्द्रका कैलास-पर्वतपर जाना तथा बीचमें ही अवधूत वेष धारण कर शिवद्वारा परीक्षा लिये जानेपर इन्द्रका उनपर वज्रसे प्रहार करना, शिवके नेत्रसे रोषवश अग्निका निकलना और बृहस्पतिकी प्रार्थनापर शिवका उस तेजको क्षारसमुद्रमें फेंकना और उसका बालक सिन्धुपुत्र जलन्धरके रूपमें परिणत हो जाना... | ४७६ |
| ८०- शिवजीद्वारा धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसपर पाशुपतास्त्र नामक बाणका संधान कर उसे त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करना... | ३८२ | ९१- ब्राह्मणपत्नीके सामने भिक्षुरूपमें शिवका प्रकट होकर उसे विदर्भदेशके सत्यरथ राजा, उनकी पत्नी तथा उनके नवजात शिशुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाकर बालकके पालन-पोषणका आदेश देना तथा ब्राह्मणीको अपने उत्तम स्वरूपका दर्शन कराना... | ४७९ |
| ८१- ब्रह्माजीके आदेशसे शंखचूड़का बदरिकाश्रममें जाकर तपस्यामें लीन तुलसीसे मधुर तथा सकाम संलाप करना... | ३८८ | ९२- व्यासजीका अर्जुनको शुक्रविद्याका उपदेश देना तथा पार्थिवलिंगके पूजनका विधान बताकर उसे इन्द्रकीलपर्वतपर जाकर जाह्नवीके तटपर बैठकर तप करनेकी प्रेरणा देना... | ४८३ |
| ८२- शिवजीकी इच्छासे विष्णुका वृद्ध ब्राह्मणका वेष धारणकर शंखचूड़से उग्र कवचकी याचना करना तथा शंखचूड़द्वारा कवचका प्रदान किया जाना... | ४०० | ९३- इन्द्रकीलपर्वतपर गंगाजीके समीप एक मनोरम स्थानपर अर्जुनद्वारा तेजोरराशि शंकरजीका ध्यान करना तथा परीक्षा करनेके लिये ब्रह्मचारी ब्राह्मणके वेषमें आये हुए इन्द्रका अपने स्वरूपमें प्रकट होना और उसे शंकरका मन्त्र बताकर जप करनेकी आज्ञा देना... | ४८४ |
| ८३- हिरण्याक्षद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये घोर तपका अनुष्ठान तथा गौरीके साथ विराजमान शंकरका प्रसन्नतापूर्वक उसे पुत्ररूपमें अन्धकासुरको प्रदान करना... | ४०६ | ९४- मूक नामक दैत्यका शूकररूप धारण करके अर्जुनके पास आना तथा किरातवेषमें शिवजीका अर्जुनकी रक्षाके लिये आगे जाना और शिव तथा अर्जुनके बाणोंसे मरकर शूकरका भूतलपर गिर पड़ना तथा देवताओंद्वारा जय-जयकारपूर्वक पुष्पवृष्टि और स्तुति किया जाना... | ४८७ |
| ८४- युद्धमें श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज बाणासुरकी बहुत-सी भुजाओंका सुदर्शनचक्रसे काटा जाना तथा उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत होनेपर उन्हें शंकरजीका समझाना... | ४३३ | ||
| ८५- शिवका प्रसन्नतापूर्वक पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदामूर्तिमें प्रविष्ट होकर अर्धनारी-नरके रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट होना तथा ब्रह्माजीका उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करना... | ४४३ | ||
| ८६- उग्र तपस्यामें रत नन्दीको वृषभध्वज शिवका |
( १९ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ९५- अर्जुनद्वारा बाण न लौटाये जानेपर किरात-वेषधारी शिवका उससे भीषण संग्राम छेड़ना. | ४८९ |
| ९६- शिवजीका अर्जुनपर प्रसन्न होकर उसे पाशुपत नामक अस्त्र प्रदान करना... | ४९२ |
| ९७- अत्रिपत्नी अनसूयापर गंगाजीकी कृपा तथा उसके द्वारा गंगाजीको अपना वर्षभरका किया हुआ पुण्य अर्पण किया जाना तथा गंगाजीका उसके परिणामस्वरूप काशीमें स्थिररूपसे निवास करनेका आश्वासन देना...... | ५०० |
| ९८- बालविधवा ब्राह्मणपत्नीपर मूढ़ नामक मायावी दुष्ट असुरकी कुदृष्टि और संयोग-याचना तथा शिवद्वारा प्रकट होकर दैत्यराजको तत्काल भस्म कर दिया जाना और ब्राह्मणीद्वारा शिवकी स्तुति......................................... | ५०२ |
| ९९- रोहिणीमें ही अधिक आसक्त होनेके कारण चन्द्रमाको क्षयरोगसे ग्रस्त होनेका दक्षद्वारा शाप तथा रोगके शमनार्थ चन्द्रमाका शिवलिंगकी स्थापना कर प्रभासक्षेत्रमें लगातार खड़े होकर मृत्युंजयमन्त्रसे भगवान् वृषभध्वजका पूजन तथा शिवका प्रसन्न होकर चन्द्रमाको प्रत्यक्ष दर्शन देना और चन्द्रमाद्वारा क्षयरोग-निवारणकी प्रार्थना... | ५०४ |
| १००- अवन्तिपर दूषण असुरकी चढ़ाईसे क्षुब्ध ब्राह्मणोंको शिवपर भरोसा रखनेके लिये कहनेपर शिवलिंगके पूजनमें ध्यानस्थ वेद-प्रियके चारों पुत्रों—देवप्रिय आदिको मार डालनेका असुरका अपनी सेनाको आदेश और शिवलिंगके स्थानके ही गड्ढेसे महाकाल शिवका प्रकट होकर दैत्यको भस्म कर देना................................................ | ५०७ |
| १०१- वानरराज हनुमान्जीका प्रकट होकर गोपकुमार श्रीकर, राजा चन्द्रसेन तथा अन्य राजाओंको कृपादृष्टिसे देखना................ | ५१० |
| १०२- विन्ध्याचलकी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवजीका योगियोंके लिये भी दुर्लभरूपमें प्रकट होना तथा देवता और निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषियोंका वहाँ आकर उनकी पूजा करके स्थिररूपसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना....................................... | ५१२ |
| १०३- नर-नारायणकी पार्थिवलिंग-पूजासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट हो जाना तथा दोनोंका उनसे हिमालयके केदारतीर्थमें स्वयंज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित होनेका अनुरोध... | ५१३ |
| १०४- कामरूप देशके राजा सुदक्षिणके पार्थिवलिंग-पूजनमें राक्षस भीमका विघ्न डालना तथा |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| शिवका उस लिंगसे भीमेश्वररूपमें प्रकट होकर राक्षससे युद्ध करना और नारदजीकी प्रार्थनापर समस्त राक्षसों और भीमको हुंकारमात्रसे भस्म कर डालना................ | ५१३ |
| १०५- रुद्रद्वारा भगवान् शिवसे काशीपुरीको अपनी राजधानी बनाकर उमासहित वहीं विराजमान होनेके लिये प्रार्थना.................................. | ५१८ |
| १०६- पत्नीसहित महर्षि गौतमकी आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान् शिवका शिवा और प्रमथगणोंके साथ प्रकट होना तथा गौतमद्वारा उनका स्तवन.............................................. | ५२६ |
| १०७- भगवान् शिवसे महर्षि गौतमकी गंगा-याचना तथा शिवदत्त गंगा-जलका स्त्रीरूप धारण करके खड़ा होना, देवता आदिका आकर गंगाजीसे तथा शिवसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना और गंगा तथा शिवका क्रमशः गौतमी और त्र्यम्बकेश्वरके रूपमें वहाँ निवास... | ५२७ |
| १०८- देवताओं, ऋषियोंके सान्निध्यमें रावणकी अपनी पत्नी मन्दोदरीसहित वैद्यनाथ शिव-लिंगकी पूजा......................................... | ५२९ |
| १०९- राक्षसी दारुकाकी स्तुतिसे देवी पार्वतीका प्रसन्न हो जाना तथा उसके द्वारा वंशकी रक्षाका वरदान माँगनेपर उनका शिवसे अनुरोध करना कि यही राक्षसोंके राज्यका शासन करे.. | ५३२ |
| ११०- श्रीरामकी पूजासे प्रसन्न होकर शिवका वामांगभूता पार्वतीसहित प्रकट होकर विजय-सूचक वर देना तथा उनके ज्योतिर्लिंग (रामेश्वर)-के रूपमें स्थित होनेके लिये श्रीरामकी प्रार्थना... | ५३३ |
| १११- घुश्माके सामने ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिवका प्रकट होना और घुश्माकी अपनी सौत सुदेहाकी प्राणरक्षाकी उनसे प्रार्थना... | ५३६ |
| ११२- बिल्वके पेड़पर बैठे हुए गुरुद्रुह भीलका मृगीपर बाण-संधान करना तथा अनजानमें उसके हाथके धक्केसे पेड़के नीचे शिवलिंगपर थोड़े-से जल और बिल्वपत्रका गिर पड़ना... | ५६९ |
| ११३- अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मृग और दोनों मृगियोंका गुरुद्रुह भीलके पास आ पहुँचना तथा शिवपूजाके प्रभावसे दुर्लभ ज्ञानसे सम्पन्न भीलका परोपकारमें लगे उन पशुओंकी दशा देखकर अपने-आपको धिक्कारना और उन्हें जानेकी आज्ञा देना... | ५७२ |
| ११४- पुत्रकी प्राप्तिके लिये श्रीकृष्णका तप करना और उनके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती, कार्तिकेय तथा गणेशके सहित शिवका प्रकट |
( २० )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| होना और श्रीकृष्णका उनसे स्तुतिपूर्वक वरदान माँगना... | ५८१ | ऋषियोंद्वारा दर्शन तथा मस्तकपर अंजलि बाँधकर स्तवन किया जाना... | ६६६ |
| ११५- शुभ कर्म करनेवाले प्राणीके यमपुरीमें जानेपर यमराजद्वारा उसे स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और अर्घ्य दिया जाना... | ५८५ | १२६- ब्रह्माद्वारा छोड़े गये सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रका पीछा करते हुए उसके शीर्ण होनेके स्थान (नैमिषारण्य)-में मुनियोंका जाना ..... | ६७० |
| ११६- क्रूर कर्म करनेवालेका यमराजको भयंकर रूपमें देखना... | ५८५ | १२७- नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन तथा महायज्ञके समाप्त होनेपर वे क्या करना चाहते हैं—इस सम्बन्धमें मुनियोंसे उनका प्रश्न... | ६७१ |
| ११७- शिवसे कालचक्रके सम्बन्धमें पार्वतीका प्रश्न पूछना ......... | ५९७ | १२८- ब्रह्माजीके द्वारा शिवके अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति... | ६८४ |
| ११८- राजा सुरथके अपने आश्रमपर आनेपर मुनीश्वर मेधाका मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उनका आदर-सत्कार करना....... | ६०५ | १२९- ब्रह्माजीकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महादेवजीका अपने शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको प्रकट करना और ब्रह्माद्वारा सर्वलोकमहेश्वरकी स्तुति... | ६८७ |
| ११९- राजा सुरथका वैश्य समाधिको साथ लेकर मेधा मुनिके पास आना तथा उनसे अपने और वैश्यके मोहपाशको काटनेकी प्रार्थना .. | ६०६ | १३०- महादेवजी और पार्वतीजीका परस्पर बातचीतके बीचमें ही देवीद्वारा आज्ञा दिये जानेपर एक सखीका देवीद्वारा ही शंकरके लिये भेंटस्वरूप लाये गये व्याघ्रको लाकर उनके सामने खड़ा कर देना... | ६९६ |
| १२०- जगज्जननी महाविद्याका त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्राकट्य... | ६०६ | १३१- भगवान् विष्णुके अनुरोधपर शिवका उमासहित इन्द्रके रूपमें ऐरावतपर आसीन होकर उपमन्यु मुनिके तपोवनमें जाना तथा मुनिका मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करना... ......... | ७१५ |
| १२१- दैत्य शुम्भासुरके दूत दानवशिरोमणि सुग्रीवका हिमालयपर देवीके पास आकर शुम्भका संदेश-निवेदन... | ६१२ | १३२- देवी पार्वतीके साथ वृषभपर आरूढ़ हुए महादेवजीका दर्शनकर उपमन्युका भक्तिविनम्र चित्तसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ जाना ... | ७१७ |
| १२२- सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शिवप्रिया उमाका वर, पाश, अंकुश और अभय धारणकर प्रकट होना तथा देवताओंद्वारा भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना... | ६१७ | १३३- नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंका वायुदेवसे श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलन तथा श्रीकृष्णके पाशुपत ज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग पूछना और वायुदेवका उसे सुनाना........... | ७१९ |
| १२३- देवताओंकी व्याकुल प्रार्थना सुनकर कृपामयी देवीका चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष-बाण, कमल तथा अनेक प्रकारके फल-मूल लिये हुए प्रकट होना और प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देखकर नौ दिन और नौ रात रोते रहना ... | ६१९ | १३४- उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको पाशुपत ज्ञानका उपदेश.......................................................... | ७२१ |
| १२४- मेरुके दक्षिण शिखर—कुमारशृंगमें कुमार स्कन्दका दर्शन और पूजनकर महामुनि वामदेवद्वारा उनका स्तवन... | ६२६ | ||
| १२५- सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर जाकर ब्रह्माजीका |
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श्रीशिवपुराण-माहात्म्य
श्रीगणेशाय नमः
श्रीशिवपुराण-माहात्म्य
भवाब्धिमग्नं दीनं मां समुद्धर भवार्णवात्। कर्मग्राहगृहीताङ्गं दासोऽहं तव शङ्कर॥
शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजीका उन्हें शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना
श्रीशौनकजीने पूछा—महाज्ञानी सूतजी! आप सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता हैं। प्रभो! मुझसे पुराणोंकी कथाओंके सारतत्त्वका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये। ज्ञान और वैराग्य-सहित भक्तिसे प्राप्त होनेवाले विवेककी वृद्धि कैसे होती है? तथा साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम-क्रोध आदि मानसिक विकारोंका निवारण करते हैं? इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः आसुर स्वभावके हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध (दैवी सम्पत्तिसे युक्त) बनानेके लिये सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? आप इस समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन बताइये, जो कल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट एवं परम मंगलकारी हो तथा पवित्र करनेवाले उपायोंमें भी सर्वोत्तम पवित्रकारक उपाय हो। तात! वह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे शीघ्र ही अन्तःकरणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा उससे निर्मल चित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवकी प्राप्ति हो जाय।
श्रीसूतजीने कहा—मुनिश्रेष्ठ शौनक! तुम धन्य हो; क्योंकि तुम्हारे हृदयमें पुराण-कथा सुननेका विशेष प्रेम एवं लालसा है। इसलिये मैं शुद्ध बुद्धिसे विचारकर तुमसे परम उत्तम शास्त्रका वर्णन करता हूँ। वत्स! वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तसे सम्पन्न, भक्ति आदिको बढ़ाने-वाला तथा भगवान् शिवको संतुष्ट करने-वाला है। कानोंके लिये रसायन—अमृतस्वरूप तथा दिव्य है, तुम उसे श्रवण करो। मुने! वह परम उत्तम शास्त्र है—शिवपुराण, जिसका पूर्वकालमें भगवान् शिवने ही प्रवचन किया था। यह कालरूपी सर्पसे प्राप्त होनेवाले महान् त्रासका विनाश करनेवाला उत्तम साधन है। गुरुदेव व्यासने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर बड़े आदरसे संक्षेपमें ही इस पुराणका प्रतिपादन किया है। इस पुराणके प्रणयनका उद्देश्य है—कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंके परम हितका साधन।
* श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * २३
सूतजी बोले—मुने! जो मनुष्य पापी, दुराचारी, खल तथा काम-क्रोध आदिमें निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं, वे भी इस पुराणके श्रवण-पठनसे अवश्य ही शुद्ध हो जाते हैं। इसी विषयमें जानकार मुनि इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापोंका पूर्णतया नाश हो जाता है।
पहलेकी बात है, कहीं किरातोंके नगरमें एक ब्राह्मण रहता था, जो ज्ञानमें अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र, रस बेचनेवाला तथा वैदिक धर्मसे विमुख था। वह स्नान-संध्या आदि कर्मोंसे भ्रष्ट हो गया था और वैश्यवृत्तिमें तत्पर रहता था। उसका नाम था देवराज। वह अपने ऊपर विश्वास करनेवाले लोगोंको ठगा करता था। उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दूसरोंको भी अनेक बहानोंसे मारकर उन-उनका धन हड़प लिया था। परंतु उस पापीका थोड़ा-सा भी धन कभी धर्मके काममें नहीं लगा था। वह वेश्यागामी तथा सब प्रकारसे आचारभ्रष्ट था।
एक दिन घूमता-घामता वह दैवयोगसे प्रतिष्ठानपुर (झूसी-प्रयाग)-में जा पहुँचा। वहाँ उसने एक शिवालय देखा, जहाँ बहुत-से साधु-महात्मा एकत्र हुए थे। देवराज उस शिवालयमें ठहर गया, किंतु वहाँ उस ब्राह्मणको ज्वर आ गया। उस ज्वरसे उसको बड़ी पीड़ा होने लगी। वहाँ एक ब्राह्मणदेवता शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे। ज्वरमें पड़ा हुआ देवराज ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुई उस शिव-कथाको निरन्तर सुनता रहा। एक मासके बाद वह ज्वरसे अत्यन्त पीड़ित होकर चल बसा। यमराजके दूत आये और उसे पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमें ले गये। इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके पार्षदगण आ गये। उनके गौर अंग कर्पूरके समान उज्ज्वल थे, हाथ त्रिशूलसे सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अंग भस्मसे उद्भासित थे और रुद्राक्षकी मालाएँ उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं। वे सब-के-सब क्रोधपूर्वक यमपुरीमें गये और यमराजके दूतोंको मार-पीटकर, बारंबार धमकाकर उन्होंने देवराजको उनके चंगुलसे छुड़ा लिया और अत्यन्त अद्भुत विमानपर बिठाकर जब वे शिवदूत कैलास जानेको उद्यत हुए, उस समय यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उस कोलाहल-को सुनकर धर्मराज अपने भवनसे बाहर
२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आये। साक्षात् दूसरे रुद्रोंके समान प्रतीत होनेवाले उन चारों दूतोंको देखकर धर्मज्ञ धर्मराजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और ज्ञानदृष्टिसे देखकर सारा वृत्तान्त जान लिया। उन्होंने भयके कारण भगवान् शिवके उन महात्मा दूतोंसे कोई बात नहीं पूछी, उलटे उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना की। तत्पश्चात् वे शिवदूत कैलासको चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस ब्राह्मणको दयासागर साम्ब शिवके हाथोंमें दे दिया।
शौनकजीने कहा—महाभाग सूतजी! आप सर्वज्ञ हैं। महामते! आपके कृपाप्रसादसे मैं बारंबार कृतार्थ हुआ। इस इतिहासको सुनकर मेरा मन अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो रहा है। अतः अब भगवान् शिवमें प्रेम बढ़ानेवाली शिवसम्बन्धिनी दूसरी कथाको भी कहिये।
श्रीसूतजी बोले—शौनक! सुनो, मैं तुम्हारे सामने गोपनीय कथावस्तुका भी वर्णन करूँगा; क्योंकि तुम शिवभक्तोंमें अग्रगण्य तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो। समुद्रके निकटवर्ती प्रदेशमें एक वाष्कल नामक ग्राम है, जहाँ वैदिक धर्मसे विमुख महापापी द्विज निवास करते हैं। वे सब-के-सब बड़े दुष्ट हैं, उनका मन दूषित विषय-भोगोंमें ही लगा रहता है। वे न देवताओंपर विश्वास करते हैं न भाग्यपर; वे सभी कुटिल वृत्तिवाले हैं। किसानी करते और भाँति-भाँतिके घातक अस्त्र-शस्त्र रखते हैं। वे व्यभिचारी और खल हैं। ज्ञान, वैराग्य तथा सद्धर्मका सेवन ही मनुष्यके लिये परम पुरुषार्थ है—इस बातको वे बिलकुल नहीं जानते हैं। वे सभी पशुबुद्धिवाले हैं। (जहाँके द्विज ऐसे हों, वहाँके अन्य वर्णोंके विषयमें क्या कहा जाय।) अन्य वर्णोंके लोग भी उन्हींकी भाँति कुत्सित विचार रखनेवाले, स्वधर्म-विमुख एवं खल हैं; वे सदा कुकर्ममें लगे रहते और नित्य विषयभोगोंमें ही डूबे रहते हैं। वहाँकी सब स्त्रियाँ भी कुटिल स्वभावकी, स्वेच्छाचारिणी, पापासक्त, कुत्सित विचारवाली और व्यभिचारिणी हैं। वे सद्व्यवहार तथा सदाचारसे सर्वथा शून्य हैं। इस प्रकार वहाँ दुष्टोंका ही निवास है।
उस वाष्कल नामक ग्राममें किसी समय एक बिन्दुग नामधारी ब्राह्मण रहता था, वह बड़ा अधम था। दुरात्मा और महापापी था। यद्यपि उसकी स्त्री बड़ी सुन्दरी थी, तो भी वह कुमार्गपर ही चलता था। उसकी पत्नीका नाम चंचुला था; वह सदा उत्तम धर्मके पालनमें लगी रहती थी, तो भी उसे छोड़कर वह दुष्ट ब्राह्मण वेश्यागामी हो गया था। इस तरह कुकर्ममें लगे हुए उस बिन्दुगके बहुत वर्ष व्यतीत हो गये। उसकी स्त्री चंचुला कामसे पीड़ित होनेपर भी स्वधर्मनाशके भयसे क्लेश सहकर भी दीर्घकालतक धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुई। परंतु दुराचारी पतिके आचरणसे प्रभावित हो आगे चलकर वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गयी।
इस तरह दुराचारमें डूबे हुए उन मूढ़ चित्तवाले पति-पत्नीका बहुत-सा समय व्यर्थ बीत गया। तदनन्तर शूद्रजातीय वेश्याका पति बना हुआ वह दूषित बुद्धिवाला दुष्ट ब्राह्मण बिन्दुग समयानुसार मृत्युको प्राप्त हो नरकमें जा पड़ा। बहुत दिनोंतक नरकके दुःख भोगकर वह मूढ़-
- श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * २५
बुद्धि पापी विन्ध्यपर्वतपर भयंकर पिशाच हुआ। इधर, उस दुराचारी पति बिन्दुगके मर जानेपर वह मूढ़हृदया चंचुला बहुत समयतक पुत्रोंके साथ अपने घरमें ही रही।
एक दिन दैवयोगसे किसी पुण्य पर्वके आनेपर वह स्त्री भाई-बन्धुओंके साथ गोकर्ण-क्षेत्रमें गयी। तीर्थयात्रियोंके संगसे उसने भी उस समय जाकर किसी तीर्थके जलमें स्नान किया। फिर वह साधारणतया (मेला देखनेकी दृष्टिसे) बन्धुजनोंके साथ यत्र-तत्र घूमने लगी। घूमती-घामती किसी देवमन्दिरमें गयी और वहाँ उसने एक दैवज्ञ ब्राह्मणके मुखसे भगवान् शिवकी परम पवित्र एवं मंगलकारिणी उत्तम पौराणिक कथा सुनी। कथावाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि 'जो स्त्रियाँ परपुरुषोंके साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरनेके बाद जब यमलोकमें जाती हैं, तब यमराजके दूत उनकी योनिमें तपे हुए लोहेका परिघ डालते हैं।' पौराणिक ब्राह्मणके मुखसे यह वैराग्य बढ़ानेवाली कथा सुनकर चंचुला भयसे व्याकुल हो वहाँ काँपने लगी। जब कथा समाप्त हुई और सुननेवाले सब लोग वहाँसे बाहर चले गये, तब वह भयभीत नारी एकान्तमें शिवपुराणकी कथा बाँचनेवाले उन ब्राह्मण देवतासे बोली।
चंचुलाने कहा—ब्रह्मन्! मैं अपने धर्मको नहीं जानती थी। इसलिये मेरे द्वारा बड़ा दुराचार हुआ है। स्वामिन्! मेरे ऊपर अनुपम कृपा करके आप मेरा उद्धार कीजिये। आज आपके वैराग्य-रससे ओतप्रोत इस प्रवचनको सुनकर मुझे बड़ा भय लग रहा है। मैं काँप उठी हूँ और मुझे इस संसारसे वैराग्य हो गया है। मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनीको धिक्कार है। मैं सर्वथा निन्दाके योग्य हूँ। कुत्सित विषयोंमें फँसी हुई हूँ और अपने धर्मसे विमुख हो गयी हूँ। हाय! न जाने किस-किस घोर कष्टदायक दुर्गतिमें मुझे पड़ना पड़ेगा और वहाँ कौन बुद्धिमान् पुरुष कुमार्गमें मन लगानेवाली मुझ पापिनीका साथ देगा। मृत्युकालमें उन भयंकर यमदूतोंको मैं कैसे देखूँगी? जब वे बलपूर्वक मेरे गलेमें फंदे डालकर मुझे बाँधेंगे, तब मैं कैसे धीरज धारण कर सकूँगी। नरकमें जब मेरे शरीरके टुकड़े-टुकड़े किये जायँगे, उस समय विशेष दुःख देनेवाली उस महायातनाको मैं वहाँ कैसे सहूँगी ? हाय! मैं मारी गयी! मैं जल गयी! मेरा हृदय विदीर्ण हो गया और मैं सब प्रकारसे नष्ट हो गयी; क्योंकि मैं हर तरहसे पापमें ही डूबी रही हूँ। ब्रह्मन्! आप
२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ही मेरे गुरु, आप ही माता और आप ही पिता हैं। आपकी शरणमें आयी हुई मुझ दीन अबलाका आप ही उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये।
सूतजी कहते हैं—शौनक ! इस प्रकार खेद और वैराग्यसे युक्त हुई चंचुला ब्राह्मणदेवताके दोनों चरणोंमें गिर पड़ी। तब उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने कृपापूर्वक उसे उठाया और इस प्रकार कहा।
(अध्याय २-३)
चंचुलाकी प्रार्थनासे ब्राह्मणका उसे पूरा शिवपुराण सुनाना और समयानुसार शरीर छोड़कर शिवलोकमें जा चंचुलाका पार्वतीजीकी सखी एवं सुखी होना
ब्राह्मण बोले—नारी ! सौभाग्यकी बात है कि भगवान् शंकरकी कृपासे शिव-पुराणकी इस वैराग्ययुक्त कथाको सुनकर तुम्हें समयपर चेत हो गया है। ब्राह्मणपत्नी ! तुम डरो मत। भगवान् शिवकी शरणमें जाओ। शिवकी कृपासे सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। मैं तुमसे भगवान् शिवकी कीर्तिकथासे युक्त उस परम वस्तुका वर्णन करूँगा, जिससे तुम्हें सदा सुख देनेवाली उत्तम गति प्राप्त होगी। शिवकी उत्तम कथा सुननेसे ही तुम्हारी बुद्धि इस तरह पश्चात्तापसे युक्त एवं शुद्ध हो गयी है। साथ ही तुम्हारे मनमें विषयोंके प्रति वैराग्य हो गया है। पश्चात्ताप ही पाप करनेवाले पापियोंके लिये सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। सत्पुरुषोंने सबके लिये पश्चात्तापको ही समस्त पापोंका शोधक बताया है, पश्चात्तापसे ही पापोंकी शुद्धि होती है। जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तवमें पापोंका प्रायश्चित्त करता है; क्योंकि सत्पुरुषोंने समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये जैसे प्रायश्चित्तका उपदेश किया है, वह सब पश्चात्तापसे सम्पन्न हो जाता है।* जो पुरुष विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके निर्भय हो जाता है, पर अपने कुकर्मके लिये पश्चात्ताप नहीं करता, उसे प्रायः उत्तम गति नहीं प्राप्त होती। परंतु जिसे अपने कुकृत्यपर हार्दिक पश्चात्ताप होता है, वह अवश्य उत्तम गतिका भागी होता है, इसमें संशय नहीं। इस शिव-पुराणकी कथा सुननेसे जैसी चित्तशुद्धि होती है, वैसी दूसरे उपायोंसे नहीं होती। जैसे दर्पण साफ करनेपर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार इस शिवपुराणकी कथासे चित्त अत्यन्त शुद्ध हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। मनुष्योंके शुद्धचित्तमें जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिव विराजमान रहते हैं। इससे वह विशुद्धात्मा पुरुष श्रीसाम्ब सदाशिवके पदको प्राप्त होता है। इस उत्तम कथाका श्रवण समस्त मनुष्योंके लिये कल्याणका बीज है। अतः यथोचित
* पश्चात्तापः पापकृतां पापानां निष्कृतिः परा । सर्वेषां वर्णितं सद्भिः सर्वपापविशोधनम् ॥
पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चित्तं करोति सः । यथोपदिष्टं सद्भिर्हि सर्वपापविशोधनम् ॥
(शिवपुराण-माहात्म्य अ० ३ श्लोक ५-६)
* श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * २७
(शास्त्रोक्त) मार्गसे इसकी आराधना अथवा सेवा करनी चाहिये। यह भवबन्धनरूपी रोगका नाश करनेवाली है। भगवान् शिवकी कथाको सुनकर फिर अपने हृदयमें उसका मनन एवं निदिध्यासन करना चाहिये। इससे पूर्णतया चित्तशुद्धि हो जाती है। चित्तशुद्धि होनेसे महेश्वरकी भक्ति अपने दोनों पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य)-के साथ निश्चय ही प्रकट होती है। तत्पश्चात् महेश्वरके अनुग्रहसे दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है। जो मुक्तिसे वंचित है, उसे पशु समझना चाहिये; क्योंकि उसका चित्त मायाके बन्धनमें आसक्त है। वह निश्चय ही संसारबन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता।
ब्राह्मणपत्नी! इसलिये तुम विषयोंसे मनको हटा लो और भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी इस परम पावन कथाको सुनो— परमात्मा शंकरकी इस कथाको सुननेसे तुम्हारे चित्तकी शुद्धि होगी और इससे तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी। जो निर्मल चित्तसे भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करता है, उसकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है—यह मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ।
सूतजी कहते हैं—शौनक! इतना कहकर वे श्रेष्ठ शिवभक्त ब्राह्मण चुप हो गये। उनका हृदय करुणासे आर्द्र हो गया था। वे शुद्धचित्त महात्मा भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये। तदनन्तर बिन्दुगकी पत्नी चंचुला मन-ही-मन प्रसन्न हो उठी। ब्राह्मणका उक्त उपदेश सुनकर उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये थे। वह ब्राह्मणपत्नी चंचुला हर्षभरे हृदयसे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके दोनों चरणोंमें गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली—‘मैं कृतार्थ हो गयी।’ तत्पश्चात् उठकर वैराग्ययुक्त उत्तम बुद्धिवाली वह स्त्री, जो अपने पापोंके कारण आतंकित थी, उन महान् शिवभक्त ब्राह्मणसे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोली।
चंचुलाने कहा—ब्रह्मन्! शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! स्वामिन्! आप धन्य हैं, परमार्थदर्शी हैं और सदा परोपकारमें लगे रहते हैं। इसलिये श्रेष्ठ साधु पुरुषोंमें प्रशंसाके योग्य हैं। साधो! मैं नरकके समुद्रमें गिर रही हूँ। आप मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये। पौराणिक अर्थतत्त्वसे सम्पन्न जिस सुन्दर शिवपुराणकी कथाको सुनकर मेरे मनमें सम्पूर्ण विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न हो गया, उसी इस शिवपुराणको सुननेके लिये इस समय मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा हो रही है।
सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर हाथ जोड़ उनका अनुग्रह पाकर चंचुला उस शिवपुराणकी कथाको सुननेकी इच्छा मनमें लिये उन ब्राह्मणदेवताकी सेवामें तत्पर हो वहाँ रहने लगी। तदनन्तर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और शुद्ध बुद्धिवाले उन ब्राह्मणदेवने उसी स्थानपर उस स्त्रीको शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनायी। इस प्रकार उस गोकर्ण नामक महाक्षेत्रमें उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मणसे उसने शिवपुराणकी वह परम उत्तम कथा सुनी, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बढ़ानेवाली तथा मुक्ति देनेवाली है। उस परम उत्तम कथाको सुनकर वह ब्राह्मणपत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी। उसका चित्त शीघ्र ही शुद्ध हो गया। फिर भगवान् शिवके अनुग्रहसे उसके हृदयमें शिवके सगुणरूपका चिन्तन होने लगा। इस प्रकार उसने भगवान् शिवमें
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लगी रहनेवाली उत्तम बुद्धि पाकर शिवके सच्चिदानन्दमय स्वरूपका बारंबार चिन्तन आरम्भ किया। तत्पश्चात् समयके पूरे होनेपर भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे युक्त हुई चंचुलाने अपने शरीरको बिना किसी कष्टके त्याग दिया! इतनेमें ही त्रिपुरशत्रु भगवान् शिवका भेजा हुआ एक दिव्य विमान द्रुत गतिसे वहाँ पहुँचा, जो उनके अपने गणोंसे संयुक्त और भाँति-भाँतिके शोभा-साधनोंसे सम्पन्न था। चंचुला उस विमानपर आरूढ़ हुई और भगवान् शिवके श्रेष्ठ पार्षदोंने उसे तत्काल शिवपुरीमें पहुँचा दिया। उसके सारे मल धुल गये थे। वह दिव्यरूपधारिणी दिव्यांगना हो गयी थी। उसके दिव्य अवयव उसकी शोभा बढ़ाते थे। मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण किये वह गौरांगी देवी शोभाशाली दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी। शिवपुरीमें पहुँचकर उसने सनातन देवता त्रिनेत्रधारी महादेवजीको देखा। सभी मुख्य-मुख्य देवता उनकी सेवामें खड़े थे। गणेश, भृंगी, नन्दीश्वर तथा वीरभद्रेश्वर आदि उनकी सेवामें उत्तम भक्तिभावसे उपस्थित थे। उनकी अंगकान्ति करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी। कण्ठमें नील चिह्न शोभा पाता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। मस्तकपर अर्द्धचन्द्राकार मुकुट शोभा देता था। उन्होंने अपने वामांग भागमें गौरी देवीको बिठा रखा था, जो विद्युत्-पुंजके समान प्रकाशित थीं। गौरीपति महादेवजीकी कान्ति कपूरके समान गौर थी। उनका सारा शरीर श्वेत भस्मसे भासित था। शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। इस प्रकार परम उज्ज्वल भगवान् शंकरका दर्शन करके वह ब्राह्मण-पत्नी चंचुला बहुत प्रसन्न हुई। अत्यन्त प्रीतियुक्त होकर उसने बड़ी उतावलीके साथ भगवान्को बारंबार प्रणाम किया। फिर हाथ जोड़कर वह बड़े प्रेम, आनन्द और सन्तोषसे युक्त हो विनीतभावसे खड़ी हो गयी। उसके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओंकी अविरल धारा बहने लगी तथा सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो गया। उस समय भगवती पार्वती और भगवान् शंकरने उसे बड़ी करुणाके साथ अपने पास बुलाया और सौम्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। पार्वतीजीने तो दिव्यरूपधारिणी बिन्दुगप्रिया चंचुलाको प्रेमपूर्वक अपनी सखी बना लिया। वह उस परमानन्दघन ज्योतिःस्वरूप सनातनधाममें अविचल निवास पाकर दिव्य सौख्यसे सम्पन्न हो अक्षय सुखका अनुभव करने लगी।
(अध्याय ४)
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| * श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * | २९ |
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चंचुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन दोनों दम्पतिका शिवधाममें सुखी होना
सूतजी बोले—शौनक! एक दिन परमानन्दमें निमग्न हुई चंचुलाने उमादेवीके पास जाकर प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति करने लगी।
चंचुला बोली—गिरिराजनन्दिनी! स्कन्दमाता उमे! मनुष्योंने सदा आपका सेवन किया है। समस्त सुखोंको देनेवाली शम्भुप्रिये! आप ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेव्य हैं। आप ही सगुणा और निर्गुणा हैं तथा आप ही सूक्ष्मा सच्चिदानन्दस्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं। आप ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हैं। तीनों गुणोंका आश्रय भी आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—इन तीनों देवताओंका आवास-स्थान तथा उनकी उत्तम प्रतिष्ठा करनेवाली पराशक्ति आप ही हैं।
सूतजी कहते हैं—शौनक! जिसे सद्गति प्राप्त हो चुकी थी, वह चंचुला इस प्रकार महेश्वरपत्नी उमाकी स्तुति करके सिर झुकाये चुप हो गयी। उसके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये थे। तब करुणासे भरी हुई शंकरप्रिया भक्तवत्सला पार्वतीदेवीने चंचुलाको सम्बोधित करके बड़े प्रेमसे इस प्रकार कहा—
पार्वती बोलीं—सखी चंचुले ! सुन्दरि! मैं तुम्हारी की हुई इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, क्या वर माँगती हो? तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।
चंचुला बोली—निष्पाप गिरिराजकुमारी! मेरे पति बिन्दुग इस समय कहाँ हैं, उनकी कैसी गति हुई है—यह मैं नहीं जानती! कल्याणमयी दीनवत्सले! मैं अपने उन पतिदेवसे जिस प्रकार संयुक्त हो सकूँ, वैसा ही उपाय कीजिये। महेश्वरि ! महादेवि! मेरे पति एक शूद्रजातीय वेश्याके प्रति आसक्त थे और पापमें ही डूबे रहते थे। उनकी मृत्यु मुझसे पहले ही हो गयी थी। न जाने वे किस गतिको प्राप्त हुए।
गिरिजा बोलीं—बेटी ! तुम्हारा बिन्दुग नामवाला पति बड़ा पापी था। उसका अन्तःकरण बड़ा ही दूषित था। वेश्याका उपभोग करनेवाला वह महामूढ़ मरनेके बाद नरकमें पड़ा अगणित वर्षोंतक नरकमें नाना प्रकारके दुःख भोगकर वह पापात्मा अपने शेष पापको भोगनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर पिशाच हुआ है। इस समय वह पिशाच-अवस्थामें ही है और नाना प्रकारके क्लेश उठा रहा है। वह दुष्ट वहीं वायु पीकर रहता और सदा सब प्रकारके कष्ट सहता है।
सूतजी कहते हैं—शौनक ! गौरीदेवीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली चंचुला उस समय पतिके महान् दुःखसे दुःखी हो गयी। फिर मनको स्थिर करके उस ब्राह्मणपत्नीने व्यथित हृदयसे महेश्वरीको प्रणाम करके पुनः पूछा।
चंचुला बोली—महेश्वरि ! महादेवि! मुझपर कृपा कीजिये और दूषित कर्म करनेवाले मेरे उस दुष्ट पतिका अब उद्धार कर दीजिये। देवि! कुत्सित बुद्धिवाले मेरे
३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
उस पापात्मा पतिको किस उपायसे उत्तम गति प्राप्त हो सकती है, यह शीघ्र बताइये। आपको नमस्कार है।
पार्वतीने कहा—तुम्हारा पति यदि शिव-पुराणकी पुण्यमयी उत्तम कथा सुने तो सारी दुर्गति को पार करके वह उत्तम गतिका भागी हो सकता है।
अमृतके समान मधुर अक्षरोंसे युक्त गौरीदेवीका यह वचन आदरपूर्वक सुनकर चंचुलाने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अपने पतिके समस्त पापोंकी शुद्धि तथा उत्तम गतिकी प्राप्तिके लिये पार्वतीदेवीसे यह प्रार्थना की कि 'मेरे पतिको शिवपुराण सुनानेकी व्यवस्था होनी चाहिये' उस ब्राह्मणपत्नीके बारंबार प्रार्थना करनेपर शिवप्रिया गौरीदेवीको बड़ी दया आयी। उन भक्तवत्सला महेश्वरी गिरिराजकुमारीने भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले गन्धर्वराज तुम्बुरुको बुलाकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार कहा— 'तुम्बुरो ! तुम्हारी भगवान् शिवमें प्रीति है। तुम मेरे मनकी बातोंको जानकर मेरे अभीष्ट कार्योंको सिद्ध करनेवाले हो। इसलिये मैं तुमसे एक बात कहती हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी इस सखीके साथ शीघ्र ही विन्ध्यपर्वतपर जाओ। वहाँ एक महाघोर और भयंकर पिशाच रहता है। उसका वृत्तान्त तुम आरम्भसे ही सुनो। मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ बताती हूँ। पूर्वजन्ममें वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था। मेरी इस सखी चंचुलाका पति था, परंतु वह दुष्ट वेश्यागामी हो गया। स्नान-संध्या आदि नित्यकर्म छोड़कर अपवित्र रहने लगा। क्रोधके कारण उसकी बुद्धिपर मूढ़ता छा गयी थी—वह कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं कर पाता था। अभक्ष्यभक्षण, सज्जनोंसे द्वेष और दूषित वस्तुओंका दान लेना—यही उसका स्वाभाविक कर्म बन गया था। वह अस्त्र-शस्त्र लेकर हिंसा करता, बायें हाथसे खाता, दीनोंको सताता और क्रूरतापूर्वक पराये घरोंमें आग लगा देता था। चाण्डालोंसे प्रेम करता और प्रतिदिन वेश्याके सम्पर्कमें रहता था। बड़ा दुष्ट था। वह पापी अपनी पत्नीका परित्याग करके दुष्टोंके संगमें ही आनन्द मानता था। वह मृत्युपर्यन्त दुराचारमें ही फँसा रहा। फिर अन्तकाल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी। वह पापियोंके भोगस्थान घोर यमपुरमें गया और वहाँ बहुत-से नरकोंका उपभोग करके वह दुष्टात्मा जीव इस समय विन्ध्यपर्वतपर पिशाच बना हुआ है। वहीं
* श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * ३१
वह दुष्ट पिशाच अपने पापोंका फल भोग रहा है। तुम उसके आगे यत्नपूर्वक शिवपुराणकी उस दिव्य कथाका प्रवचन करो, जो परम पुण्यमयी तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाली है। शिवपुराणकी कथाका श्रवण सबसे उत्कृष्ट पुण्यकर्म है। उससे उसका हृदय शीघ्र ही समस्त पापोंसे शुद्ध हो जायगा और वह प्रेतयोनिका परित्याग कर देगा। उस दुर्गतिसे मुक्त होनेपर बिन्दुग नामक पिशाचको मेरी आज्ञासे विमानपर बिठाकर तुम भगवान् शिवके समीप ले आओ।'
सूतजी कहते हैं—शौनक ! महेश्वरी उमाके इस प्रकार आदेश देनेपर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने भाग्यकी सराहना की। तत्पश्चात् उस पिशाचकी सती-साध्वी पत्नी चंचुलाके साथ विमानपर बैठकर नारदके प्रिय मित्र तुम्बुरु वेगपूर्वक विन्ध्याचल पर्वतपर गये, जहाँ वह पिशाच रहता था। वहाँ उन्होंने उस पिशाचको देखा। उसका शरीर विशाल था। ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। वह कभी हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था। उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले महाबली तुम्बुरुने उस अत्यन्त भयंकर पिशाचको पाशोंद्वारा बाँध लिया। तदनन्तर तुम्बुरुने शिवपुराणकी कथा बाँचनेका निश्चय करके महोत्सवयुक्त स्थान और मण्डप आदिकी रचना की। इतनेमें ही सम्पूर्ण लोकोंमें बड़े वेगसे यह प्रचार हो गया कि देवी पार्वतीकी आज्ञासे एक पिशाचका उद्धार करनेके उद्देश्यसे शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनानेके लिये तुम्बुरु विन्ध्यपर्वतपर गये हैं। फिर तो उस कथाको सुननेके लोभसे बहुत-से देवर्षि भी शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचे। आदरपूर्वक शिवपुराण सुननेके लिये आये हुए लोगोंका उस पर्वतपर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समाज जुट गया। फिर तुम्बुरुने उस पिशाचको पाशोंसे बाँधकर आसनपर बिठाया और हाथमें वीणा लेकर गौरी-पतिकी कथाका गान आरम्भ किया। पहली अर्थात् विद्येश्वरसंहितासे लेकर सातवीं वायुसंहितातक माहात्म्यसहित शिवपुराणकी कथाका उन्होंने स्पष्ट वर्णन किया। सातों संहिताओंसहित शिवपुराणका आदरपूर्वक श्रवण करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये। उस परम पुण्यमय शिवपुराणको सुनकर उस पिशाचने अपने सारे पापोंको धोकर उस पैशाचिक शरीरको त्याग दिया। फिर तो शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया। अंगकान्ति गौरवर्णकी हो गयी। शरीरपर श्वेत वस्त्र तथा सब प्रकारके पुरुषोचित
३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आभूषण उसके अंगोंको उद्भासित करने लगे। वह त्रिनेत्रधारी चन्द्रशेखररूप हो गया। इस प्रकार दिव्य देहधारी होकर श्रीमान् बिन्दुग अपनी प्राणवल्लभा चंचुलाके साथ स्वयं भी पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवका गुणगान करने लगा। उसकी स्त्रीको इस प्रकार दिव्य रूपसे सुशोभित देख वे सभी देवर्षि बड़े विस्मित हुए। उनका चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया। भगवान् महेश्वरका वह अद्भुत चरित्र सुनकर वे सभी श्रोता परम कृतार्थ हो प्रेमपूर्वक श्रीशिवका यशोगान करते हुए अपने-अपने धामको चले गये। दिव्यरूपधारी श्रीमान् बिन्दुग भी सुन्दर विमानपर अपनी प्रियतमाके पास बैठकर सुखपूर्वक आकाशमें स्थित हो बड़ी शोभा पाने लगा।
तदनन्तर महेश्वरके सुन्दर एवं मनोहर गुणोंका गान करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा तुम्बुरुके साथ शीघ्र ही शिवधाममें जा पहुँचा। वहाँ भगवान् महेश्वर तथा पार्वतीदेवीने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुगका बड़ा सत्कार किया और उसे अपना पार्षद बना लिया। उसकी पत्नी चंचुला पार्वतीजीकी सखी हो गयी। उस घनीभूत ज्योतिःस्वरूप परमानन्दमय सनातनधाममें अविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पति परम सुखी हो गये।
(अध्याय ५)
शिवपुराणके श्रवणकी विधि तथा श्रोताओंके पालन करनेयोग्य नियमोंका वर्णन
शौनकजी कहते हैं—महाप्राज्ञ व्यासशिष्य सूतजी! आपको नमस्कार है। आप धन्य हैं, शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं। आपके महान् गुण वर्णन करनेयोग्य हैं। अब आप कल्याणमय शिवपुराणके श्रवणकी विधि बतलाइये, जिससे सभी श्रोताओंको सम्पूर्ण उत्तम फलकी प्राप्ति हो सके।
सूतजीने कहा—मुने शौनक! अब मैं तुम्हें सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये शिवपुराणके श्रवणकी विधि बता रहा हूँ। पहले किसी ज्योतिषीको बुलाकर दान-मानसे संतुष्ट करके अपने सहयोगी लोगोंके साथ बैठकर बिना किसी विघ्न-बाधाके कथाकी समाप्ति होनेके उद्देश्यसे शुद्ध मुहूर्तका अनुसंधान कराये और प्रयत्नपूर्वक देश-देशमें—स्थान-स्थानपर यह संदेश भेजे कि 'हमारे यहाँ शिवपुराणकी कथा होनेवाली है। अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको उसे सुननेके लिये अवश्य पधारना चाहिये।' कुछ लोग भगवान् श्रीहरिकी कथासे बहुत दूर पड़ गये हैं। कितने ही स्त्री, शूद्र आदि भगवान् शंकरके कथा-कीर्तनसे वंचित रहते हैं। उन सबको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये। देश-देशमें जो भगवान् शिवके भक्त हों तथा शिवकथाके कीर्तन और श्रवणके लिये उत्सुक हों, उन सबको आदरपूर्वक बुलवाना चाहिये और आये हुए लोगोंका सब प्रकारसे आदर-सत्कार करना चाहिये। शिवमन्दिरमें, तीर्थमें, वनप्रान्तमें अथवा घरमें शिवपुराणकी कथा सुननेके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करना चाहिये। केलेके