भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * १११

ही शरीरके भिन्न-भिन्न अवयव मस्तक, ग्रीवा आदि नाम धारण करते हैं तथापि उस शरीरसे वे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार हम तीनों अंश आप परमेश्वरके ही अंग हैं। जो ज्योतिर्मय, आकाशके समान सर्वव्यापी एवं निर्लेप, स्वयं ही अपना धाम, पुराण, कूटस्थ, अव्यक्त, अनन्त, नित्य तथा दीर्घ आदि विशेषणोंसे रहित निर्विशेष ब्रह्म है, वही आप शिव हैं, अतः आप ही सब कुछ हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! भगवान् विष्णुकी यह बात सुनकर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर उस विवाह-यज्ञके स्वामी (यजमान) परमेश्वर शिव प्रसन्न हो लौकिकी गतिका आश्रय ले हाथ जोड़कर खड़े हुए मुझ ब्रह्मासे प्रेमपूर्वक बोले।

शिवने कहा—ब्रह्मन्! आपने सारा वैवाहिक कार्य अच्छी तरह सम्पन्न करा दिया। अब मैं प्रसन्न हूँ। आप मेरे आचार्य हैं। बताइये, आपको क्या दक्षिणा दूँ! सुरज्येष्ठ! आप उस दक्षिणाको माँगिये। महाभाग! यदि वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी उसे शीघ्र कहिये। मुझे आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है।

मुने! भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर मैं हाथ जोड़ विनीत चित्तसे उन्हें बारंबार प्रणाम करके बोला—‘देवेश! यदि आप प्रसन्न हों और महेश्वर! यदि मैं वर पानेके योग्य होऊँ तो प्रसन्नतापूर्वक जो बात कहता हूँ, उसे आप पूर्ण कीजिये। महादेव! आप इसी रूपमें इसी वेदीपर सदा विराजमान रहें, जिससे आपके दर्शनसे मनुष्योंके पाप धुल जायँ। चन्द्रशेखर! आपका सांनिध्य होनेसे मैं इस वेदीके समीप आश्रम बनाकर तपस्या करूँ—यह मेरी अभिलाषा है। चैत्रके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें रविवारके दिन इस भूतलपर जो मनुष्य भक्तिभावसे आपका दर्शन करे, उसके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जायँ, विपुल पुण्यकी वृद्धि हो और समस्त रोगोंका सर्वथा नाश हो जाय। जो नारी दुर्भागा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीना हो, वह भी आपके दर्शनमात्रसे ही अवश्य निर्दोष हो जाय।'

मेरी यह बात उनकी आत्माको सुख देनेवाली थी। इसे सुनकर भगवान् शिवने प्रसन्नचित्तसे कहा—'विधातः! ऐसा ही होगा। मैं तुम्हारे कहनेसे सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये अपनी पत्नी सतीके साथ इस वेदीपर सुस्थिरभावसे स्थित रहूँगा।'

ऐसा कहकर पत्नीसहित भगवान् शिव अपनी अंशरूपिणी मूर्तिको प्रकट करके वेदीके मध्यभागमें विराजमान हो गये।

तत्पश्चात् स्वजनोंपर स्नेह रखनेवाले परमेश्वर शंकर दक्षसे विदा ले अपनी पत्नी सतीके साथ कैलास जानेको उद्यत हुए। उस समय उत्तम बुद्धिवाले दक्षने विनयसे मस्तक झुका हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजकी प्रेम-

१९२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पूर्वक स्तुति की। फिर श्रीविष्णु आदि समस्त देवताओं, मुनियों और शिवगणोंने नमस्कारपूर्वक नाना प्रकारकी स्तुति करके बड़े आनन्दसे जय-जयकार किया। तदनन्तर दक्षकी आज्ञासे भगवान् शिवने प्रसन्नतापूर्वक सतीको वृषभकी पीठपर बिठाया और स्वयं भी उसपर आरूढ़ हो वे प्रभु हिमालय पर्वतकी ओर चले। भगवान् शंकरके समीप वृषभपर बैठी हुई सुन्दर दाँत और मनोहर हासवाली सती अपने नील-श्यामवर्णके कारण चन्द्रमामें नीली रेखाके समान शोभा पा रही थीं। उस समय उन नवदम्पतिकी शोभा देख श्रीविष्णु आदि समस्त देवता, मरीचि आदि महर्षि तथा दूसरे लोग ठगे-से रह गये। हिल-डुल भी न सके तथा दक्ष भी मोहित हो गये। तत्पश्चात् कोई बाजे बजाने लगे और दूसरे लोग मधुर स्वरसे गीत गाने लगे। कितने ही लोग प्रसन्नतापूर्वक शिवके कल्याणमय उज्ज्वल यशका गान करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। भगवान् शंकरने बीच रास्तेसे दक्षको प्रसन्नतापूर्वक लौटा दिया और स्वयं प्रेमाकुल हो प्रमथगणोंके साथ अपने धामको जा पहुँचे। यद्यपि भगवान् शिवने विष्णु आदि देवताओंको भी विदा कर दिया था, तो भी वे बड़ी प्रसन्नता और भक्तिके साथ पुनः उनके साथ हो लिये। उन सब देवताओं, प्रमथगणों तथा अपनी पत्नी सतीके साथ हर्षभरे शम्भु हिमालय पर्वतसे सुशोभित अपने कैलासधाममें जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने देवताओं, मुनियों तथा दूसरे लोगोंका बहुत आदर-सम्मान करके उन्हें प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। शम्भुकी आज्ञा ले वे विष्णु आदि सब देवता तथा मुनि नमस्कार और स्तुति करके मुखपर प्रसन्नताकी छाप लिये अपने-अपने धामको चले गये। सदाशिवका चिन्तन करनेवाले भगवान् शिव भी अत्यन्त आनन्दित हो हिमालयके शिखरपर रहकर अपनी पत्नी दक्षकन्या सतीके साथ विहार करने लगे।

सूतजी कहते हैं—मुनियो! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान् शंकर और सतीका जिस प्रकार विवाह हुआ, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया। जो विवाहकालमें, यज्ञमें अथवा किसी भी शुभ कार्यके आरम्भमें भगवान् शंकरकी पूजा करके शान्तचित्तसे इस कथाको सुनता है, उसका सारा कर्म तथा वैवाहिक आयोजन बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण होता है और दूसरे शुभ कर्म भी सदा निर्विघ्न पूर्ण होते हैं। इस शुभ उपाख्यानको प्रेमपूर्वक सुनकर विवाहित होनेवाली कन्या भी सुख, सौभाग्य, सुशीलता और सदाचार आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न साध्वी स्त्री तथा पुत्रवती होती है।

(अध्याय १९-२०)


सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें भगवान् शिवद्वारा ज्ञान एवं नवधा भक्तिके स्वरूपका विवेचन

कैलास तथा हिमालय पर्वतपर श्रीशिव और सतीके विविध विहारोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके पश्चात् ब्रह्माजीने कहा—मुने! एक दिनकी बात है, देवी सती एकान्तमें

* रुद्रसंहिता * । १९३

भगवान् शंकरसे मिलीं और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं। प्रभु शंकरको पूर्ण प्रसन्न जान नमस्कार करके विनीतभावसे खड़ी हुई दक्षकुमारी सती भक्तिभावसे अंजलि बाँधे बोलीं।

सतीने कहा—देवदेव महादेव! करुणासागर! प्रभो! दीनोद्धारपरायण! महायोगिन्! मुझपर कृपा कीजिये। आप परम पुरुष हैं। सबके स्वामी हैं। रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणसे परे हैं। निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं। सबके साक्षी, निर्विकार और महाप्रभु हैं। हर! मैं धन्य हूँ, जो आपकी कामिनी और आपके साथ सुन्दर विहार करनेवाली आपकी प्रिया हुई। स्वामिन्! आप अपनी भक्तवत्सलतासे ही प्रेरित होकर मेरे पति हुए हैं। नाथ! मैंने बहुत वर्षोंतक आपके साथ विहार किया है। महेशान! इससे मैं बहुत संतुष्ट हुई हूँ और अब मेरा मन उधरसे हट गया है। देवेश्वर हर! अब तो मैं उस परम तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है तथा जिसके द्वारा जीव संसार-दुःखसे अनायास ही उद्धार पा सकता है। नाथ! जिस कर्मका अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परम पदको प्राप्त कर ले और संसारबन्धनमें न बँधे, उसे आप बताइये, मुझपर कृपा कीजिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार आदिशक्ति महेश्वरी सतीने केवल जीवोंके उद्धारके लिये जब उत्तम भक्तिभावके साथ भगवान् शंकरसे प्रश्न किया, तब उनके उस प्रश्नको सुनकर स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले तथा योगके द्वारा भोगसे विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवने अत्यन्त प्रसन्न होकर सतीसे इस प्रकार कहा।

शिव बोले—देवि! दक्षनन्दिनि! महेश्वरि! सुनो; मैं उसी परमतत्त्वका वर्णन करता हूँ, जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो सकता है। परमेश्वरि! तुम विज्ञानको परमतत्त्व जानो। विज्ञान वह है, जिसके उदय होनेपर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है, ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुका स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है। प्रिये! वह विज्ञान दुर्लभ है। इस त्रिलोकीमें उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है। वह जो और जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है, साक्षात्परातत्पर ब्रह्म है। उस विज्ञानकी माता है मेरी भक्ति, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली है। वह मेरी कृपासे सुलभ होती है। भक्ति नौ प्रकारकी बतायी गयी है। सती! भक्ति और ज्ञानमें कोई भेद नहीं है। भक्त और ज्ञानी दोनोंको ही सदा सुख प्राप्त होता है। जो भक्तिका विरोधी है, उसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं ही होती। देवि! मैं सदा भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्तिके प्रभावसे जातिहीन नीच मनुष्योंके घरोंमें भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है।* सती! वह भक्ति दो प्रकारकी है—


* भक्तौ ज्ञाने न भेदो हि तत्कर्तुः सर्वदा सुखम्। विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः॥
भक्ताधीनः सदाहं वै तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि। नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशयः॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २३। १६-१७)

789 संक्षिप्त शिवपुराण—7 A

१९४ * संक्षिप्त शिवपुराण *


सगुणा और निर्गुणा। जो वैधी (शास्त्रविधिसे प्रेरित) और स्वाभाविकी (हृदयके सहज अनुरागसे प्रेरित) भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है तथा इससे भिन्न जो कामनामूलक भक्ति होती है, वह निम्नकोटिकी मानी गयी है। पूर्वोक्त सगुणा और निर्गुणा—ये दोनों प्रकारकी भक्तियाँ नैष्ठिकी और अनैष्ठिकीके भेदसे दो भेदवाली हो जाती हैं। नैष्ठिकी भक्ति छः प्रकारकी जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी एक ही प्रकारकी कही गयी है। विद्वान् पुरुष विहिता और अविहिता आदि भेदसे उसे अनेक प्रकारकी मानते हैं। इन द्विविध भक्तियोंके बहुत-से भेद-प्रभेद होनेके कारण इनके तत्त्वका अन्यत्र वर्णन किया गया है। प्रिये! मुनियोंने सगुणा और निर्गुणा दोनों भक्तियोंके नौ अंग बताये हैं। दक्षनन्दिनि! मैं उन नवों अंगोंका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमसे सुनो। देवि! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, सदा मेरा वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण—ये विद्वानोंने भक्तिके नौ अंग माने हैं।$^१$ शिवे! भक्तिके उपांग भी बहुत-से बताये गये हैं।

देवि! अब तुम मन लगाकर मेरी भक्तिके पूर्वोक्त नवों अंगोंके पृथक्-पृथक् लक्षण सुनो; वे लक्षण भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। जो स्थिर आसनसे बैठकर तन-मन आदिसे मेरी कथा-कीर्तन आदिका नित्य सम्मान करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक अपने श्रवणपुटोंसे उसके अमृतोपम रसका पान करता है, उसके इस साधनको ‘श्रवण’ कहते हैं। जो हृदयाकाशके द्वारा मेरे दिव्य जन्म-कर्मोंका चिन्तन करता हुआ प्रेमसे वाणीद्वारा उनका उच्चस्वरसे उच्चारण करता है, उसके इस भजन-साधनको ‘कीर्तन’ कहते हैं। देवि! मुझ नित्य महेश्वरको सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर जो संसारमें निरन्तर निर्भय रहता है, उसीको स्मरण कहा गया है। अरुणोदयसे लेकर हर समय सेव्यकी अनुकूलताका ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियोंसे जो निरन्तर सेवा की जाती है, वही ‘सेवन’ नामक भक्ति है। अपनेको प्रभुका किंकर समझकर हृदयामृतके भोगसे स्वामीका सदा प्रिय सम्पादन करना ‘दास्य’ कहा गया है। अपने धन-वैभवके अनुसार शास्त्रीय विधिसे मुझ परमात्माको सदा पाद्य आदि सोलह उपचारोंका जो समर्पण करना है, उसे ‘अर्चन’ कहते हैं। मनसे ध्यान और वाणीसे वन्दनात्मक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक आठों अंगोंसे भूतलका स्पर्श करते हुए जो इष्टदेवको नमस्कार किया जाता है, उसे ‘वन्दन’ कहते हैं। ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगलके लिये ही है। ऐसा दृढ़ विश्वास रखना ‘सख्य’ भक्तिका लक्षण है।$^२$ देह आदि जो कुछ


१-श्रवणं कीर्तनं चैव स्मरणं सेवनं तथा। दास्यं तथार्चनं देवि वन्दनं मम सर्वदा॥
सख्यमात्मार्पणं चेति नवाङ्गानि विदुर्बुधाः।
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २३। २२)

२-मङ्गलामङ्गलं यद् यत् करोतीतीश्वरो हि मे। सर्वं तन्मङ्गलायेति विश्वासः सख्यलक्षणम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २३। ३२)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—7 B

* रुद्रसंहिता * । १९५

भी अपनी कही जानेवाली वस्तु है, वह सब भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये उन्हींको समर्पित करके अपने निर्वाहके लिये भी कुछ बचाकर न रखना अथवा निर्वाहकी चिन्तासे भी रहित हो जाना 'आत्मसमर्पण' कहलाता है। ये मेरी भक्तिके नौ अंग हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। इनसे ज्ञानका प्राकट्य होता है तथा ये सब साधन मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। मेरी भक्तिके बहुत-से उपांग भी कहे गये हैं, जैसे बिल्व आदिका सेवन आदि। इनको विचारसे समझ लेना चाहिये।

प्रिये! इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति सबसे उत्तम है। यह ज्ञान-वैराग्यकी जननी है और मुक्ति इसकी दासी है। यह सदा सब साधनोंसे ऊपर विराजमान है। इसके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी प्राप्ति होती है। यह भक्ति मुझे सदा तुम्हारे समान ही प्रिय है। जिसके चित्तमें नित्य-निरन्तर यह भक्ति निवास करती है, वह साधक मुझे अत्यन्त प्यारा है। देवेश्वरि! तीनों लोकों और चारों युगोंमें भक्तिके समान दूसरा कोई सुखदायक मार्ग नहीं है। कलियुगमें तो यह विशेष सुखद एवं सुविधाजनक है।$^१$ देवि! कलियुगमें प्रायः ज्ञान और वैराग्यके कोई ग्राहक नहीं हैं। इसलिये वे दोनों वृद्ध, उत्साहशून्य और जर्जर हो गये हैं, परंतु भक्ति कलियुगमें तथा अन्य सब युगोंमें भी प्रत्यक्ष फल देनेवाली है। भक्तिके प्रभावसे मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ, इसमें संशय नहीं है। संसारमें जो भक्तिमान् पुरुष है, उसकी मैं सदा सहायता करता हूँ, उसके सारे विघ्नोंको दूर हटाता हूँ। उस भक्तका जो शत्रु होता है, वह मेरे लिये दण्डनीय है—इसमें संशय नहीं है।$^२$ देवि! मैं अपने भक्तोंका रक्षक हूँ। भक्तकी रक्षाके लिये ही मैंने कुपित हो अपने नेत्रजनित अग्निसे कालको भी दग्ध कर डाला था। प्रिये! भक्तके लिये मैं पूर्वकालमें सूर्यपर भी अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा था और शूल लेकर मैंने उन्हें मार भगाया था। देवि! भक्तके लिये मैंने सैन्यसहित रावणको भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई पक्षपात नहीं किया। सती! देवेश्वरि! बहुत कहनेसे क्या लाभ, मैं सदा ही भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्ति करनेवाले पुरुषके अत्यन्त वशमें हो जाता हूँ।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार भक्तका महत्त्व सुनकर दक्षकन्या सतीको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवको मन-ही-मन प्रणाम किया। मुने! सती देवीने पुनः भक्तिकाण्डविषयक शास्त्रके विषयमें भक्तिपूर्वक पूछा। उन्होंने जिज्ञासा की कि जो लोकमें सुखदायक तथा जीवोंके उद्धारके साधनोंका प्रतिपादक है, वह शास्त्र कौन-सा है। उन्होंने यन्त्र-मन्त्र, शास्त्र, उसके माहात्म्य तथा अन्य जीवोद्धारक धर्ममय


१-त्रैलोक्ये भक्तिसदृशः पन्था नास्ति सुखावहः। चतुर्युगेषु देवेशि कलौ तु सुविशेषतः॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २३। ३८)
२-यो भक्तिमान्पुमाँल्लोके सदाहं तत्सहायकृत्। विघ्नहर्ता रिपुस्तस्य दण्ड्यो नात्र च संशयः॥
(शि० पु० रु० सं० खं० २३। ४१)

789 संक्षिप्त शिवपुराण—7 C

१९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

साधनोंके विषयमें विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा प्रकट की। सतीके इस प्रश्नको सुनकर शंकरजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने जीवोंके उद्धारके लिये सब शास्त्रोंका प्रेमपूर्वक वर्णन किया। महेश्वरने पाँचों अंगोंसहित तन्त्रशास्त्र, यन्त्रशास्त्र तथा भिन्न-भिन्न देवेश्वरोंकी महिमाका वर्णन किया। मुनीश्वर ! इतिहास-कथासहित उन देवताओंके भक्तोंकी महिमाका, वर्णाश्रमधर्मोंका तथा राजधर्मोंका भी निरूपण किया। पुत्र और स्त्रीके धर्मकी महिमाका, कभी नष्ट न होनेवाले वर्णाश्रमधर्मका और जीवोंको सुख देनेवाले वैद्यकशास्त्र तथा ज्योतिषशास्त्रका भी वर्णन किया। महेश्वरने कृपा करके उत्तम सामुद्रिक शास्त्रका तथा और भी बहुत-से शास्त्रोंका तत्त्वतः वर्णन किया। इस प्रकार लोकोपकार करनेके लिये सद्गुणसम्पन्न शरीर धारण करनेवाले, त्रिलोक-सुखदायक और सर्वज्ञ सती-शिव हिमालयके कैलासशिखरपर तथा अन्यान्य स्थानोंमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते थे। वे दोनों दम्पति साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं।

(अध्याय २१—२३)


दण्डकारण्यमें शिवको श्रीरामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा श्रीरामकी परीक्षा

नारदजी बोले—ब्रह्मन्! विधे! प्रजानाथ! महाप्राज्ञ! दयानिधे! आपने भगवान् शंकर तथा देवी सतीके मंगलकारी सुयशका श्रवण कराया है। अब इस समय पुनः प्रेमपूर्वक उनके उत्तम यशका वर्णन कीजिये। उन शिव-दम्पतिने वहाँ रहकर कौन-सा चरित्र किया था?

ब्रह्माजीने कहा—मुने! तुम मुझसे सती और शिवके चरित्रका प्रेमसे श्रवण करो। वे दोनों दम्पति वहाँ लौकिकी गतिका आश्रय ले नित्य-निरन्तर क्रीडा किया करते थे। तदनन्तर महादेवी सतीको अपने पति शंकरका वियोग प्राप्त हुआ, ऐसा कुछ श्रेष्ठ बुद्धिवाले विद्वानोंका कथन है। परंतु मुने! वास्तवमें उन दोनोंका परस्पर वियोग कैसे हो सकता है? क्योंकि वे दोनों वाणी और अर्थके समान एक-दूसरेसे सदा मिले-जुले हैं, शक्ति और शक्तिमान् हैं तथा चित्स्वरूप हैं। फिर भी उनमें लीला-विषयक रुचि होनेके कारण वह सब कुछ संघटित हो सकता है। सती और शिव यद्यपि ईश्वर हैं तो भी लौकिक रीतिका अनुसरण करके वे जो-जो लीलाएँ करते हैं, वे सब सम्भव हैं। दक्षकन्या सतीने जब देखा कि मेरे पतिने मुझे त्याग दिया है, तब वे अपने पिता दक्षके यज्ञमें गयीं और वहाँ भगवान् शंकरका अनादर देख उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया। वे ही सती पुनः हिमालयके घर पार्वतीके नामसे प्रकट हुईं और बड़ी भारी तपस्या करके उन्होंने विवाहके द्वारा पुनः भगवान् शिवको प्राप्त कर लिया।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीने विधातासे शिवा और शिवके महान् यशके विषयमें इस प्रकार पूछा।

नारदजी बोले—महाभाग विष्णुशिष्य!


789 संक्षिप्त शिवपुराण—7 D

* रुद्रसंहिता * । १९७

विधातः! आप मुझे शिवा और शिवके भाव तथा आचारसे सम्बन्ध रखनेवाले उनके चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनाइये। तात! भगवान् शंकरने अपने प्राणोंसे भी प्यारी धर्मपत्नी सतीका किसलिये त्याग किया? यह घटना तो मुझे बड़ी विचित्र जान पड़ती है। अतः इसे आप अवश्य कहें। अज! आपके पुत्र दक्षके यज्ञमें भगवान् शिवका अनादर कैसे हुआ? और वहाँ पिताके यज्ञमें जाकर सतीने अपने शरीरका त्याग किस प्रकार किया? उसके बाद वहाँ क्या हुआ? भगवान् महेश्वरने क्या किया? ये सब बातें मुझसे कहिये। इन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा है।

ब्रह्माजीने कहा—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ! महाप्राज्ञ! तात नारद! तुम महर्षियोंके साथ बड़े प्रेमसे भगवान् चन्द्रमौलिका यह चरित्र सुनो। श्रीविष्णु आदि देवताओंसे सेवित परब्रह्म महेश्वरको नमस्कार करके मैं उनके महान् अद्भुत चरित्रका वर्णन आरम्भ करता हूँ। मुने! यह सब भगवान् शिवकी लीला ही है। वे प्रभु अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले, स्वतन्त्र और निर्विकार हैं। देवी सती भी वैसी ही हैं। अन्यथा वैसा कर्म करनेमें कौन समर्थ हो सकता है। परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं।

एक समयकी बात है, तीनों लोकोंमें विचरनेवाले लीलाविशारद भगवान् रुद्र सतीके साथ बैलपर आरूढ़ हो इस भूतलपर भ्रमण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे दण्डकारण्यमें आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामको देखा, जो रावणद्वारा छलपूर्वक हरी गयी अपनी प्यारी पत्नी सीताकी खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते!' ऐसा उच्चस्वरसे पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मनमें विरहका आवेश छा गया था। सूर्यवंशमें उत्पन्न, वीर भूपाल, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्दरहित हो लक्ष्मणके साथ वनमें भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय उदारचेता पूर्णकाम भगवान् शंकरने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया और जय-जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये। भक्तवत्सल शंकरने उस वनमें श्रीरामके सामने अपनेको प्रकट नहीं किया। भगवान् शिवकी मोहमें डालनेवाली ऐसी लीला देख सतीको बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी मायासे मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं।

सतीने कहा—देवदेव सर्वेश! परब्रह्म परमेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सदा सेवा करते हैं। आप ही सबके द्वारा प्रणाम करनेयोग्य हैं। सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान करना चाहिये। वेदान्त-शास्त्रके द्वारा यत्नपूर्वक जाननेयोग्य निर्विकार परमप्रभु आप ही हैं। नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथासे व्याकुल दिखायी देती है। ये दोनों धनुर्धर वीर वनमें विचरते हुए क्लेशके भागी और दीन हो रहे हैं। इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमलके समान श्याम है। उसे देखकर किस कारणसे आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था? आप इस समय भक्तके समान विनम्र क्यों हो गये थे? स्वामिन्! कल्याणकारी शिव! आप मेरे संशयको सुनें। प्रभो! सेव्य स्वामी अपने सेवकको प्रणाम करे, यह उचित नहीं जान पड़ता।

१९८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! कल्याणमयी परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवीने शिवकी मायाके वशीभूत होकर जब भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रश्न किया, तब सतीकी वह बात सुनकर लीलाविशारद परमेश्वर शंकर हँसकर उनसे इस प्रकार बोले।

परमेश्वरने कहा—देवि ! सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक यथार्थ बात कहता हूँ। इसमें छल नहीं है। वरदानके प्रभावसे ही मैंने इन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया है। प्रिये ! ये दोनों भाई वीरोंद्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं—श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंशमें हुआ है। ये दोनों राजा दशरथके विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंगके छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेषके अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैयाका नाम श्रीराम है। इनके रूपमें भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंशसे प्रकट हुए हैं। उपद्रव इनसे दूर ही रहते हैं। ये साधुपुरुषोंकी रक्षा और हमलोगोंके कल्याणके लिये इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं!

ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता भगवान् शम्भु चुप हो गये। भगवान् शिवकी ऐसी बात सुनकर भी सतीके मनको इसपर विश्वास नहीं हुआ। क्यों न हो, भगवान् शिवकी माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण त्रिलोकीको मोहमें डाल देनेवाली है। सतीके मनमें मेरी बातपर विश्वास नहीं है, यह जानकर लीलाविशारद प्रभु सनातन शम्भु यों बोले।

शिवने कहा—देवि ! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मनमें मेरे कथनपर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धिसे श्रीरामकी परीक्षा कर लो। प्यारी सती ! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तबतक मैं इस बरगदके नीचे खड़ा हूँ।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! भगवान् शिवकी आज्ञासे ईश्वरी सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी रामकी कैसे परीक्षा करूँ, अच्छा, मैं सीताका रूप धारण करके रामके पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे।' ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीरामके समीप उनकी परीक्षा लेनेके लिये गयीं। वास्तवमें वे मोहमें पड़ गयी थीं। सतीको सीताके रूपमें सामने आयी देख शिव-शिवका जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले।

श्रीरामने पूछा—सतीजी! आपको नमस्कार है। आप प्रेमपूर्वक बतायें, भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं? आप पतिके बिना अकेली ही इस वनमें क्योंकर आयीं? देवि ! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझपर कृपा करके इसका कारण बताइये।

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजीकी कही हुई बातका स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीरामको साक्षात् विष्णु जान अपने रूपको प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं—'रघुनन्दन ! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव

  • रुद्रसंहिता * १९९

मेरे तथा अपने पार्षदोंके साथ पृथ्वीपर भ्रमण करते हुए इस वनमें आ गये थे। यहाँ उन्होंने सीताकी खोजमें लगे हुए लक्ष्मणसहित तुमको देखा। उस समय सीताके लिये तुम्हारे मनमें बड़ा क्लेश था और तुम विरहशोकसे पीड़ित दिखायी देते थे। उस अवस्थामें तुम्हें प्रणाम करके वे चले गये और उस वटवृक्षके नीचे अभी खड़े ही हैं। भगवान् शिव बड़े आनन्दके साथ तुम्हारे वैष्णवरूपकी उत्कृष्ट महिमाका गान कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने तुम्हें चतुर्भुज विष्णुके रूपमें नहीं देखा तो भी तुम्हारा दर्शन करते ही वे आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूपकी ओर देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। इस विषयमें मेरे पूछनेपर भगवान् शम्भुने जो बात कही, उसे सुनकर मेरे मनमें भ्रम उत्पन्न हो गया। अतः राघवेन्द्र! मैंने उनकी आज्ञा लेकर तुम्हारी परीक्षा की है। श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि तुम साक्षात् विष्णु हो। तुम्हारी सारी प्रभुता मैंने अपनी आँखों देख ली। अब मेरा संशय दूर हो गया तो भी महामते ! तुम मेरी बात सुनो। मेरे सामने यह सच-सच बताओ कि तुम भगवान् शिवके भी वन्दनीय कैसे हो गये? मेरे मनमें यही एक संदेह है। इसे निकाल दो और शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान करो।'

सतीका यह वचन सुनकर श्रीरामके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान् शिवका स्मरण किया। इससे उनके हृदयमें प्रेमकी बाढ़ आ गयी। मुने! आज्ञा न होनेके कारण वे सतीके साथ भगवान् शिवके निकट नहीं गये तथा मन-ही-मन उनकी महिमाका वर्णन करके श्रीरघुनाथजीने सतीसे कहना प्रारम्भ किया।

(अध्याय २४)

o

श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक तथा उनके प्रति प्रणामका प्रसंग सुनाकर श्रीरामका सतीके मनका संदेह दूर करना, सतीका शिवके द्वारा मानसिक त्याग

श्रीराम बोले—देवि! प्राचीनकालमें एक समय परम स्रष्टा भगवान् शम्भुने अपने परात्पर धाममें विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशालामें एक रमणीय भवन बनवाया, जो बहुत ही विस्तृत था। उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासनका भी निर्माण कराया। उस सिंहासनपर भगवान् शंकरने विश्वकर्माद्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदाके लिये अद्भुत और परम उत्तम था। तत्पश्चात् उन्होंने सब ओरसे इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धर्वों, नागादिकों तथा सम्पूर्ण उपदेवोंको भी शीघ्र वहाँ बुलवाया। समस्त वेदों और आगमोंको, पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको, मुनियोंको तथा अप्सराओंसहित समस्त देवियोंको, जो नाना प्रकारकी वस्तुओंसे सम्पन्न थीं, आमन्त्रित किया। इनके सिवा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागोंकी सोलह-सोलह कन्याओंको भी बुलवाया, जिनके हाथोंमें मांगलिक वस्तुएँ थीं। मुने! वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकारके वाद्योंको बजवाकर सुन्दर गीतोंद्वारा महान् उत्सव रचाया। सम्पूर्ण

२०० * संक्षिप्त शिवपुराण *


ओषधियोंके साथ राज्याभिषेकके योग्य द्रव्य एकत्र किये गये। प्रत्यक्ष तीर्थोंके जलोंसे भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियोंको भगवान् शंकरने अपने पार्षदोंद्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वरसे वेदमन्त्रोंका घोष करवाया।

देवि! भगवान् विष्णुकी पूर्ण भक्तिसे महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे। इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदयसे श्रीहरिको वैकुण्ठसे बुलवाया और शुभ मुहूर्तमें श्रीहरिको उस श्रेष्ठ सिंहासनपर बिठाकर महादेवजीने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया। उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जानेके बाद महेश्वरने स्वयं ब्रह्माण्डमण्डपमें श्रीहरिका अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरोंके पास नहीं था। तदनन्तर स्वतन्त्र ईश्वर भक्तवत्सल शम्भुने श्रीहरिका स्तवन किया और अपनी पराधीनता (भक्तपरवशता)-को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए वे लोककर्ता ब्रह्मासे इस प्रकार बोले।

महेश्वरने कहा—लोकेश! आजसे मेरी आज्ञाके अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। इस बातको सभी सुन रहे हैं। तात! तुम सम्पूर्ण देवता आदिके साथ इन श्रीहरिको प्रणाम करो और ये वेद मेरी आज्ञासे मेरी ही तरह इन श्रीहरिका वर्णन करें।

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—देवि! भगवान् विष्णुकी शिवभक्ति देखकर प्रसन्नचित्त हुए वरदायक भक्तवत्सल रुद्रदेवने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वजको प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदिने भी उस समय श्रीहरिकी वन्दना की। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वरने देवताओंके समक्ष श्रीहरिको बड़े-बड़े वर प्रदान किये।

महेश बोले—हरे! तुम मेरी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और कामके दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करनेवाले दुष्टोंको दण्ड देनेवाले होओ; महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगणमें तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकारकी शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदिकी सिद्धि, दूसरी नाना प्रकारकी लीलाओंको प्रकट करनेकी शक्ति और तीसरी तीनों लोकोंमें नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करनेवाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्नपूर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो! मैं तुम्हारे भक्तोंको उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा। तुम इस मायाको भी ग्रहण करो, जिसका निवारण करना देवता आदिके लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होनेपर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाताके भी उत्पादक और पालक होओगे। मेरा हृदयरूप जो रुद्र है, वही मैं हूँ—इसमें संशय नहीं है। वह रुद्र तुम्हारा और ब्रह्मा आदि देवताओंका भी निश्चय ही पूज्य है। तुम यहाँ रहकर विशेषरूपसे सम्पूर्ण जगत्का पालन

* रुद्रसंहिता * २०१

करो। नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले विभिन्न अवतारोंद्वारा सदा सबकी रक्षा करते रहो। मेरे चिन्मय धाममें तुम्हारा जो यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नामसे विख्यात होगा। हरे! भूतलपर जो तुम्हारे अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका अवश्य दर्शन करूँगा। वे मेरे वरसे सदा प्रसन्न रहेंगे।

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—देवि! इस प्रकार श्रीहरिको अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर उमावल्लभ भगवान् हर स्वयं कैलास पर्वतपर रहते हुए अपने पार्षदोंके साथ स्वच्छन्द क्रीडा करते हैं। तभीसे भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेष धारण करके आये और गोप-गोपी तथा गौओंके अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ रहने लगे। वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो समस्त जगत्की रक्षा करने लगे। वे शिवकी आज्ञासे नाना प्रकारके अवतार ग्रहण करके जगत्का पालन करते हैं। इस समय वे ही श्रीहरि भगवान् शंकरकी आज्ञासे चार भाइयोंके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। उन चार भाइयोंमें सबसे बड़ा मैं राम हूँ, दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं और चौथे भाई शत्रुघ्न हैं। देवि! मैं पिताकी आज्ञासे सीता और लक्ष्मणके साथ वनमें आया था। यहाँ किसी निशाचरने मेरी पत्नी सीताको हर लिया है और मैं विरही होकर भाईके साथ इस वनमें अपनी प्रियाका अन्वेषण करता हूँ। जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब सर्वथा मेरा कुशल-मंगल ही होगा। माँ सती! आपकी कृपासे ऐसा होनेमें कोई संदेह नहीं है। देवि! निश्चय ही आपकी ओरसे मुझे सीताकी प्राप्तिविषयक वर प्राप्त होगा। आपके अनुग्रहसे उस दुःख देनेवाले पापी राक्षसको मारकर मैं सीताको अवश्य प्राप्त करूँगा। आज मेरा महान् सौभाग्य है जो आप दोनोंने मुझपर कृपा की। जिसपर आप दोनों दयालु हो जायँ, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है।

इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवीको प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञासे उस वनमें विचरने लगे। पवित्र हृदयवाले श्रीरामकी यह बात सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्तिपरायण रघुनाथजीकी प्रशंसा करती हुई बहुत प्रसन्न हुईं। पर अपने कर्मको याद करके उनके मनमें बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी। वे उदास होकर शिवजीके पास लौटीं। मार्गमें जाती हुई देवी सती बारंबार चिन्ता करने लगीं कि मैंने भगवान् शिवकी बात नहीं मानी और श्रीरामके प्रति कुत्सित बुद्धि कर ली। अब शंकरजीके पास जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगी। इस प्रकार बारंबार विचार करके उन्हें उस समय बड़ा पश्चात्ताप हुआ। शिवके समीप जाकर सतीने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया। उनके मुखपर विषाद छा रहा था। वे शोकसे व्याकुल और निस्तेज हो गयी थीं। सतीको दुःखी देख भगवान् हरने उनका कुशल-समाचार पूछा और प्रेमपूर्वक कहा—'तुमने किस प्रकार परीक्षा ली?' उनकी यह बात सुनकर सती मस्तक झुकाये उनके पास खड़ी हो गयीं। उनका मन शोक और विषादमें डूबा हुआ था। भगवान् महेश्वरने ध्यान लगाकर सतीका सारा चरित्र जान लिया और उन्हें मनसे त्याग दिया।

२०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

वेदधर्मका प्रतिपालन करनेवाले परमेश्वर शिवने अपनी पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाको नष्ट नहीं होने दिया। सतीका मनसे त्याग करके वे अपने निवासभूत कैलास पर्वतपर चले गये। मार्गमें महेश्वर और सतीको सुनाते हुए आकाशवाणी बोली—'परमेश्वर! तुम धन्य हो और तुम्हारी यह प्रतिज्ञा भी धन्य है। तीनों लोकोंमें तुम्हारे-जैसा महायोगी और महाप्रभु दूसरा कोई नहीं है।'

वह आकाशवाणी सुनकर देवी सतीकी कान्ति फीकी पड़ गयी। उन्होंने भगवान् शिवसे पूछा—'नाथ! मेरे परमेश्वर! आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? बताइये।' सतीके इस प्रकार पूछनेपर भी उनका हित चाहनेवाले प्रभुने पहले अपने विवाहके विषयमें भगवान् विष्णुके सामने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे नहीं बताया। मुने! उस समय सतीने अपने प्राणवल्लभ पति भगवान् शिवका ध्यान करके उस समस्त कारणको जान लिया, जिससे उनके प्रियतमने उन्हें त्याग दिया था। 'शम्भुने मेरा त्याग कर दिया' इस बातको जानकर दक्षकन्या सती शीघ्र ही अत्यन्त शोकमें डूब गयीं और बारंबार सिसकने लगीं। सतीके मनोभावको जानकर शिवने उनके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे गुप्त ही रखा और वे दूसरी-दूसरी बहुत-सी कथाएँ कहने लगे। नाना प्रकारकी कथाएँ कहते हुए वे सतीके साथ कैलासपर जा पहुँचे और श्रेष्ठ आसनपर स्थित हो चित्तवृत्तियोंके निरोधपूर्वक समाधि लगा अपने स्वरूपका ध्यान करने लगे। सती मनमें अत्यन्त विषाद ले अपने उस धाममें रहने लगीं। मुने! शिवा और शिवके उस चरित्रको कोई नहीं जानता था। महामुने! स्वेच्छासे शरीर धारण करके लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले उन दोनों प्रभुओंका इस प्रकार वहाँ रहते हुए दीर्घकाल व्यतीत हो गया। तत्पश्चात् उत्तम लीला करनेवाले महादेवजीने ध्यान तोड़ा। यह जानकर जगदम्बा सती वहाँ आयीं और उन्होंने व्यथित हृदयसे शिवके चरणोंमें प्रणाम किया। उदारचेता शम्भुने उन्हें अपने सामने बैठनेके लिये आसन दिया और बड़े प्रेमसे बहुत-सी मनोरम कथाएँ कहीं। उन्होंने वैसी ही लीला करके सतीके शोकको तत्काल दूर कर दिया। वे पूर्ववत् सुखी हो गयीं। फिर भी शिवने अपनी प्रतिज्ञाको नहीं छोड़ा। तात! परमेश्वर शिवके विषयमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। मुने! मुनिलोग शिवा और शिवकी ऐसी ही कथा कहते हैं। कुछ मनुष्य उन दोनोंमें

* रुद्रसंहिता * २०३

वियोग मानते हैं। परंतु उनमें वियोग कैसे सम्भव है। शिवा और शिवके चरित्रको वास्तविकरूपसे कौन जानता है। वे दोनों सदा अपनी इच्छासे खेलते और भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हैं। सती और शिव वाणी और अर्थकी भाँति एक-दूसरेसे नित्य संयुक्त हैं। उन दोनोंमें वियोग होना असम्भव है। उनकी इच्छासे ही उनमें लीला-वियोग हो सकता है*।
(अध्याय २५)


प्रयागमें समस्त महात्मा मुनियोंद्वारा किये गये यज्ञमें दक्षका भगवान् शिवको तिरस्कारपूर्वक शाप देना तथा नन्दीद्वारा ब्राह्मणकुलको शाप-प्रदान, भगवान् शिवका नन्दीको शान्त करना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पूर्वकालमें समस्त महात्मा मुनि प्रयागमें एकत्र हुए थे। वहाँ सम्मिलित हुए उन सब महात्माओंका विधि-विधानसे एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ। उस यज्ञमें सनकादि सिद्धगण, देवर्षि, प्रजापति, देवता तथा ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले ज्ञानी भी पधारे थे। मैं भी मूर्तिमान् महातेजस्वी निगमों और आगमोंसे युक्त हो सपरिवार वहाँ गया था। अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ वहाँ उनका विचित्र समाज जुटा था। नाना शास्त्रोंके सम्बन्धमें ज्ञानचर्चा एवं वाद-विवाद हो रहे थे। मुने! उसी अवसरपर सती तथा पार्षदोंके साथ त्रिलोकहितकारी, सृष्टिकर्ता एवं सबके स्वामी भगवान् रुद्र भी वहाँ आ पहुँचे। भगवान् शिवको आया देख सम्पूर्ण देवताओं, सिद्धों तथा मुनियोंने और मैंने भी भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। फिर शिवकी आज्ञा पाकर सब लोग प्रसन्नतापूर्वक यथास्थान बैठ गये। भगवान्‌का दर्शन पाकर सब लोग संतुष्ट थे और अपने सौभाग्यकी सराहना करते थे। इसी बीचमें प्रजापतियोंके भी पति प्रभु दक्ष, जो बड़े तेजस्वी थे, अकस्मात् घूमते हुए प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ आये। वे मुझे प्रणाम करके मेरी आज्ञा ले वहाँ बैठे। दक्ष उन दिनों समस्त ब्रह्माण्डके अधिपति बनाये गये थे, अतएव सबके द्वारा सम्माननीय थे। परंतु अपने इस गौरवपूर्ण पदको लेकर उनके मनमें बड़ा अहंकार था; क्योंकि वे तत्त्व-ज्ञानसे शून्य थे। उस समय समस्त देवर्षियोंने नतमस्तक हो स्तुति और प्रणामके द्वारा दोनों हाथ जोड़कर उत्तम तेजस्वी दक्षका आदर-सत्कार किया। परंतु जो नाना प्रकारके लीलाविहार करनेवाले, सबके स्वामी और उत्कृष्ट लीलाकारी स्वतन्त्र परमेश्वर हैं, उन महेश्वरने उस समय दक्षको मस्तक नहीं झुकाया। वे अपने आसनपर बैठे ही रह गये (खड़े होकर दक्षका स्वागत नहीं किया)। महादेवजीको वहाँ मस्तक झुकाते न देख मेरे पुत्र प्रजापति दक्ष मन-ही-मन अप्रसन्न हो गये। उन्हें रुद्रपर


* वागर्थाविव सम्पृक्तौ सदा खलु सतीशिवौ। तयोर्वियोगोऽसम्भाव्यः सम्भवेदिच्छया तयोः॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २५। ६९)

२०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

सहसा क्रोध हो आया, वे ज्ञानशून्य तथा महान् अहंकारी होनेके कारण महाप्रभु रुद्रको क्रूर दृष्टिसे देखकर सबको सुनाते हुए उच्चस्वरसे कहने लगे।

दक्षने कहा—ये सब देवता, असुर, श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा ऋषि मुझे विशेषरूपसे मस्तक झुकाते हैं। परंतु वह जो प्रेतों और पिशाचोंसे घिरा हुआ महामनस्वी बनकर बैठा है, वह दुष्ट मनुष्यके समान क्यों मुझे प्रणाम नहीं करता? श्मशानमें निवास करनेवाला यह निर्लज्ज जो मुझे इस समय प्रणाम नहीं करता, इसका क्या कारण है? इसके वेदोक्त कर्म लुप्त हो गये हैं। यह भूतों और पिशाचोंसे सेवित हो मतवाला बना फिरता है और शास्त्रीय विधिकी अवहेलना करके नीतिमार्गको सदा कलंकित किया करता है। इसके साथ रहनेवाले या इसका अनुसरण करनेवाले लोग पाखण्डी, दुष्ट, पापाचारी तथा ब्राह्मणको देखकर उद्दण्डतापूर्वक उसकी निन्दा करनेवाले होते हैं। यह स्वयं ही स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला तथा रतिकर्ममें ही दक्ष है। अतः मैं इसे शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ। यह रुद्र चारों वर्णोंसे पृथक् और कुरूप है। इसे यज्ञसे बहिष्कृत कर दिया जाय। यह श्मशानमें निवास करनेवाला तथा उत्तम कुल और जन्मसे हीन है। इसलिये देवताओंके साथ यह यज्ञमें भाग न पाये।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! दक्षकी कही हुई यह बात सुनकर भृगु आदि बहुत-से महर्षि रुद्रदेवको दुष्ट मानकर देवताओंके साथ उनकी निन्दा करने लगे।

दक्षकी बात सुनकर नन्दीको बड़ा रोष हुआ। उनके नेत्र चंचल हो उठे और वे दक्षको शाप देनेके विचारसे तुरंत इस प्रकार बोले।

नन्दीश्वरने कहा—अरे रे महामूढ़! दुष्टबुद्धि शठ दक्ष! तूने मेरे स्वामी महेश्वरको यज्ञसे बहिष्कृत क्यों कर दिया? जिनके स्मरणमात्रसे यज्ञ सफल और तीर्थ पवित्र हो जाते हैं, उन्हीं महादेवजीको तूने शाप कैसे दे दिया? दुर्बुद्धि दक्ष! तूने ब्राह्मणजातिकी चपलतासे प्रेरित हो इन रुद्रदेवको व्यर्थ ही शाप दे डाला है। महाप्रभु रुद्र सर्वथा निर्दोष हैं, तथापि तूने व्यर्थ ही उनका उपहास किया है। ब्राह्मणाधम! जिन्होंने इस जगत्की सृष्टि की, जो इसका पालन करते हैं और अन्तमें जिनके द्वारा इसका संहार होगा, उन्हीं इन महेश्वर-रूपको तूने शाप कैसे दे दिया।

नन्दीके इस प्रकार फटकारनेपर प्रजापति दक्ष रोषसे आग-बबूला हो गये

* रुद्रसंहिता *

२०५

और उन्हें शाप देते हुए बोले—'अरे रुद्रगणो! तुम सब लोग वेदसे बहिष्कृत हो जाओ। वैदिक मार्गसे भ्रष्ट तथा महर्षियोंद्वारा परित्यक्त हो पाखण्डवादमें लग जाओ और शिष्टाचारसे दूर रहो। सिरपर जटा और शरीरमें भस्म एवं हड्डियोंके आभूषण धारण करके मद्यपानमें आसक्त रहो।'

जब दक्षने शिवके पार्षदोंको इस प्रकार शाप दे दिया, तब उस शापको सुनकर शिवके प्रियभक्त नन्दी अत्यन्त रोषके वशीभूत हो गये। शिलादपुत्र नन्दी भगवान् शिवके प्रिय पार्षद और तेजस्वी हैं। वे गर्वसे भरे हुए महादुष्ट दक्षको तत्काल इस प्रकार उत्तर देने लगे।

नन्दीश्वर बोले—अरे शठ! दुर्बुद्धि दक्ष! तुझे शिवके तत्त्वका बिलकुल ज्ञान नहीं है। अतः तूने शिवके पार्षदोंको व्यर्थ ही शाप दिया है। अहंकारी दक्ष! जिनके चित्तमें दुष्टता भरी है, उन भृगु आदिने भी ब्राह्मणत्वके अभिमानमें आकर महाप्रभु महेश्वरका उपहास किया है। अतः यहाँ जो भगवान् रुद्रसे विमुख तुझ-जैसे दुष्ट ब्राह्मण विद्यमान हैं, उनको मैं रुद्रतेजके प्रभावसे ही शाप दे रहा हूँ। तुझ-जैसे ब्राह्मण कर्मफलके प्रशंसक वेदवादमें फँसकर वेदके तत्त्वज्ञानसे शून्य हो जायँ। वे ब्राह्मण सदा भोगोंमें तन्मय रहकर स्वर्गको ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ मानते हुए 'स्वर्गसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है' ऐसा कहते रहें तथा क्रोध, लोभ और मदसे युक्त हो निर्लज्ज भिक्षुक बने रहें। कितने ही ब्राह्मण वेदमार्गको सामने रखकर शूद्रोंका यज्ञ करानेवाले और दरिद्र होंगे। सदा दान लेनेमें ही लगे रहेंगे, दूषित दान ग्रहण करनेके कारण वे सब-के-सब नरकगामी होंगे। दक्ष! उनमेंसे कुछ ब्राह्मण तो ब्रह्मराक्षस भी होंगे। जो परमेश्वर शिवको सामान्य देवता समझकर उनसे द्रोह करता है, वह दुष्ट बुद्धिवाला प्रजापति दक्ष तत्त्वज्ञानसे विमुख हो जाय। यह विषयसुखकी इच्छासे कामनारूपी कपटसे युक्त धर्मवाले गृहस्थाश्रममें आसक्त रहकर कर्मकाण्डका तथा कर्मफलकी प्रशंसा करनेवाले सनातन वेदवादका ही विस्तार करता रहे। इसका आनन्ददायी मुख नष्ट हो जाय। यह आत्मज्ञानको भूलकर पशुके समान हो जाय तथा यह दक्ष कर्मभ्रष्ट हो शीघ्र ही बकरेके मुखसे युक्त हो जाय।

इस प्रकार कुपित हुए नन्दीने जब ब्राह्मणोंको और दक्षने महादेवजीको शाप दिया, तब वहाँ महान् हाहाकार मच गया। नारद! मैं वेदोंका प्रतिपादक होनेके कारण शिवतत्त्वको जानता हूँ। इसलिये दक्षका वह

२०६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शाप सुनकर मैंने बारंबार उसकी तथा भृगु आदि ब्राह्मणोंकी भी निन्दा की। सदाशिव महादेवजी भी नन्दीकी वह बात सुनकर हँसते हुए-से मधुर वाणीमें बोले—वे नन्दीको समझाने लगे।

सदाशिवने कहा—नन्दिन्! मेरी बात सुनो। तुम तो परम ज्ञानी हो। तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। तुमने भ्रमसे यह समझकर कि मुझे शाप दिया गया, व्यर्थ ही ब्राह्मण-कुलको शाप दे डाला। वास्तवमें मुझे किसीका शाप छू ही नहीं सकता; अतः तुम्हें उत्तेजित नहीं होना चाहिये। वेद मन्त्राक्षरमय और सूक्तमय है। उसके प्रत्येक सूक्तमें समस्त देहधारियोंके आत्मा (परमात्मा) प्रतिष्ठित हैं। अतः उन मन्त्रोंके ज्ञाता नित्य आत्मवेत्ता हैं। इसलिये तुम रोषवश उन्हें शाप न दो। किसीकी बुद्धि कितनी ही दूषित क्यों न हो, वह कभी वेदोंको शाप नहीं दे सकता। इस समय मुझे शाप नहीं मिला है, इस बातको तुम्हें ठीक-ठीक समझना चाहिये। महामते! तुम सनकादि सिद्धोंको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेवाले हो। अतः शान्त हो जाओ। मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही यज्ञकर्म हूँ, यज्ञोंके अंगभूत समस्त उपकरण भी मैं ही हूँ। यज्ञकी आत्मा मैं हूँ। यज्ञपरायण यजमान भी मैं हूँ और यज्ञसे बहिष्कृत भी मैं ही हूँ। यह कौन, तुम कौन और ये कौन? वास्तवमें सब मैं ही हूँ। तुम अपनी बुद्धिसे इस बातका विचार करो। तुमने ब्राह्मणोंको व्यर्थ ही शाप दिया है। महामते! नन्दिन्! तुम तत्त्वज्ञानके द्वारा प्रपंच-रचनाका बाध करके आत्मनिष्ठ ज्ञानी एवं क्रोध आदिसे शून्य हो जाओ।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् शम्भुके इस प्रकार समझानेपर नन्दिकेश्वर विवेकपरायण हो क्रोधरहित एवं शान्त हो गये। भगवान् शिव भी अपने प्राणप्रिय पार्षद नन्दीको शीघ्र ही तत्त्वका बोध कराकर प्रमथगणोंके साथ वहाँसे प्रसन्नता-पूर्वक अपने स्थानको चल दिये। इधर रोषावेशसे युक्त दक्ष भी ब्राह्मणोंसे घिरे हुए अपने स्थानको लौट गये। परंतु उनका चित्त शिवद्रोहमें ही तत्पर था। उस समय रुद्रको शाप दिये जानेकी घटनाका स्मरण करके दक्ष सदा महान् रोषसे भरे रहते थे। उनकी बुद्धिपर मूढ़ता छा गयी थी। वे शिवके प्रति श्रद्धाको त्यागकर शिवपूजकोंकी निन्दा करने लगे। तात नारद! इस प्रकार परमात्मा शम्भुके साथ दुर्व्यवहार करके दक्षने अपनी जिस दुष्टबुद्धिका परिचय दिया था, वह मैंने तुम्हें बता दी। अब तुम उनकी पराकाष्ठाको पहुँची हुई दुर्बुद्धिका वृत्तान्त सुनो, मैं बता रहा हूँ।

(अध्याय २६)


दक्षके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन, उसमें ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं और ऋषियोंका आगमन, दक्षद्वारा सबका सत्कार, यज्ञका आरम्भ, दधीचिद्वारा भगवान् शिवको बुलानेका अनुरोध और दक्षके विरोध करनेपर शिव-भक्तोंका वहाँसे निकल जाना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! एक समय दक्षने एक बहुत बड़े यज्ञका आरम्भ किया। उस यज्ञकी दीक्षा लेकर उन्होंने उस समय समस्त देवर्षियों, महर्षियों तथा देवताओंको

* रुद्रसंहिता * २०७

बुलाया। वे सभी उस यज्ञमें पधारे। अगस्त्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृगु, दधीचि, भगवान् व्यास, भारद्वाज, गौतम, पैल, पराशर, गर्ग, भार्गव, ककुष, सित, सुमन्तु, त्रिक, कंक और वैशम्पायन—ये तथा दूसरे बहुसंख्यक मुनि अपने स्त्री-पुत्रोंको साथ ले मेरे पुत्र दक्षके यज्ञमें हर्षपूर्वक सम्मिलित हुए थे। इनके सिवा समस्त देवगण, महान् अभ्युदयशाली लोकपालगण और सभी उपदेवता अपनी उपकारक सैन्यशक्तिके साथ वहाँ पधारे थे। दक्षने प्रार्थना करके सदल-बल मुझ विश्वस्रष्टा ब्रह्माको भी सत्यलोकसे बुलवाया था। इसी तरह भाँति-भाँतिसे सादर प्रार्थना करके वैकुण्ठलोकसे भगवान् विष्णु भी उस यज्ञमें बुलाये गये थे। शिवद्रोही दुरात्मा दक्षने उन सबका बड़ा सत्कार किया। विश्वकर्माने अत्यन्त दीप्तिमान्, विशाल और बहुमूल्य दिव्य भवन बनाये थे। दक्षने वे ही भवन समागत अतिथियोंको ठहरनेके लिये दिये। सभी लोग सम्मानित हो उन सम्पूर्ण भवनोंमें यथायोग्य स्थान पाकर ठहरे हुए थे। दक्षका वह महायज्ञ उस समय कनखल नामक तीर्थमें हो रहा था। उसमें दक्षने भृगु आदि तपोधनोंको ऋत्विज् बनाया। सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ स्वयं भगवान् विष्णु उसके अधिष्ठाता थे। मैं वेदत्रयीकी विधिको दिखाने या बतानेवाला ब्रह्मा बना था। इसी तरह सम्पूर्ण दिक्पाल अपने आयुधों और परिवारोंके साथ द्वारपाल एवं रक्षक बने थे और सदा कौतूहल पैदा करते थे। स्वयं यज्ञ सुन्दर रूप धारण करके दक्षके उस यज्ञमण्डलमें उपस्थित था। महामुनियोंमें श्रेष्ठ सभी महर्षि स्वयं वेदोंके धारण करनेवाले हुए थे। अग्निने भी उस यज्ञमहोत्सवमें शीघ्र ही हविष्य ग्रहण करनेके लिये अपने सहस्रों रूप प्रकट किये थे। वहाँ अठासी हजार ऋत्विज् एक साथ हवन करते थे। चौंसठ हजार देवर्षि उद्गाता थे। अध्वर्यु एवं होता भी उतने ही थे। नारद आदि देवर्षि और सप्तर्षि पृथक्-पृथक् गाथा-गान कर रहे थे। दक्षने अपने उस महायज्ञमें गन्धर्वों, विद्याधरों, सिद्धों, बारह आदित्यों, उनके गणों, यज्ञों तथा नागलोकमें विचरनेवाले समस्त नागोंका भी बहुत बड़ी संख्यामें वरण किया था। ब्रह्मर्षि, राजर्षि और देवर्षियोंके समुदाय तथा बहुसंख्यक नरेश भी उसमें आमन्त्रित थे, जो अपने मित्रों, मन्त्रियों तथा सेनाओंके साथ आये थे। यजमान दक्षने उस यज्ञमें वसु आदि समस्त गणदेवताओंका भी वरण किया था। कौतुक और मंगलाचार करके जब दक्षने यज्ञकी दीक्षा ली तथा जब उनके लिये बारंबार स्वस्तिवाचन किया जाने लगा, तब वे अपनी पत्नीके साथ बड़ी शोभा पाने लगे।

इतना सब करनेपर भी दुरात्मा दक्षने उस यज्ञमें भगवान् शम्भुको नहीं आमन्त्रित किया। उनकी दृष्टिमें कपालधारी होनेके कारण वे निश्चय ही यज्ञमें भाग पानेयोग्य नहीं थे। सती प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री थीं तो भी कपालीकी पत्नी होनेके कारण दोषदर्शी दक्षने उन्हें अपने यज्ञमें नहीं बुलाया। इस प्रकार जब दक्षका वह यज्ञ-महोत्सव आरम्भ हुआ और यज्ञ-मण्डपमें आये हुए सब ऋत्विज् अपने-अपने कार्यमें

२०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

संलग्न हो गये, उस समय वहाँ भगवान् शंकरको उपस्थित न देख शिवभक्त दधीचिका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और वे यों बोले।

दधीचिने कहा—मुख्य-मुख्य देवताओ तथा महर्षियो! आप सब लोग प्रशंसा-पूर्वक मेरी बात सुनें। इस यज्ञ-महोत्सवमें भगवान् शंकर नहीं आये हैं, इसका क्या कारण है? यद्यपि ये देवेश्वर, बड़े-बड़े मुनि और लोकपाल यहाँ पधारे हैं, तथापि उन महात्मा पिनाकपाणि शंकरके बिना यह यज्ञ अधिक शोभा नहीं पा रहा है। बड़े-बड़े विद्वान् कहते हैं कि मंगलमय भगवान् शिवकी कृपादृष्टिसे ही समस्त मंगल-कार्य सम्पन्न होते हैं। जिनका ऐसा प्रभाव है, वे पुराण-पुरुष, वृषभध्वज, परमेश्वर श्रीनीलकण्ठ यहाँ क्यों नहीं दिखायी दे रहे हैं? दक्ष! जिनके सम्पर्कमें आनेपर अथवा जिनके स्वीकार कर लेनेपर अमंगल भी मंगल हो जाते हैं तथा जिनके पंद्रह नेत्रोंसे देखे जानेपर बड़े-बड़े नगर तत्काल मंगलमय हो जाते हैं, उनका इस यज्ञमें पदार्पण होना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये तुम्हें स्वयं ही परमेश्वर शिवको यहाँ शीघ्र बुलाना चाहिये अथवा ब्रह्मा, प्रभावशाली भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, लोकपालगणों, ब्राह्मणों और सिद्धोंकी सहायतासे सर्वथा प्रयत्न करके इस समय यज्ञकी पूर्तिके लिये तुम्हें भगवान् शंकरको यहाँ ले आना चाहिये। आप सब लोग उस स्थानपर जायँ, जहाँ महेश्वरदेव विराजमान हैं। वहाँसे दक्षनन्दिनी सतीके साथ भगवान् शम्भुको यहाँ तुरंत ले आयें। देवेश्वरो! जगदम्बासहित वे परमात्मा शिव यदि यहाँ आ गये तो उनसे सब कुछ पवित्र हो जायगा; उनके स्मरणसे, उनके नाम लेनेसे सारा कार्य पुण्यमय बन जाता है। अतः पूर्ण प्रयत्न करके भगवान् वृषभध्वजको यहाँ ले आना चाहिये। भगवान् शंकरके यहाँ पदार्पण करते ही यह यज्ञ पवित्र हो जायगा; अन्यथा यह पूरा नहीं हो सकेगा—यह मैं सत्य कहता हूँ।

दधीचिका यह वचन सुनकर दुष्ट बुद्धिवाले मूढ़ दक्षने हँसते हुए-से रोष-पूर्वक कहा—'भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, जिनमें सनातन धर्म प्रतिष्ठित है। जब इनको मैंने सादर बुला लिया है तब इस यज्ञकर्ममें क्या कमी हो सकती है? जिनमें वेद, यज्ञ और नाना प्रकारके समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् विष्णु तो यहाँ आ ही गये हैं। इनके सिवा सत्यलोकसे लोकपितामह ब्रह्मा वेदों, उपनिषदों और विविध आगमोंके साथ यहाँ पधारे हैं। देवगणोंके साथ स्वयं देवराज इन्द्रका भी शुभागमन हुआ है तथा आप-जैसे निष्पाप महर्षि भी यहाँ आ गये हैं। जो-जो महर्षि यज्ञमें सम्मिलित होनेके योग्य, शान्त और सुपात्र हैं, वेद और वेदार्थके तत्त्वको जाननेवाले हैं और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं, वे सब और स्वयं आप भी जब यहाँ पदार्पण कर चुके हैं, तब हमें यहाँ रुद्रसे क्या प्रयोजन है? विप्रवर! मैंने ब्रह्माजीके कहनेसे ही अपनी कन्या रुद्रको ब्याह दी थी। वैसे मैं जानता हूँ, हर कुलीन नहीं हैं। उनके न माता हैं न पिता। वे भूतों, प्रेतों और पिशाचोंके स्वामी हैं। अकेले रहते हैं। उनका अतिक्रमण करना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है। वे आत्मप्रशंसक, मूढ़, जड,

  • रुद्रसंहिता * २०९

मौनी और ईर्ष्यालु हैं। इस यज्ञकर्ममें बुलाये जानेयोग्य नहीं हैं। इसलिये मैंने उनको यहाँ नहीं बुलाया है। अतः दधीचिजी! आपको फिर कभी ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मेरी प्रार्थना है कि आप सब लोग मिलकर मेरे इस महान् यज्ञको सफल बनावें।'

दक्षकी यह बात सुनकर दधीचिने समस्त देवताओं और मुनियोंके सुनते हुए यह सारगर्भित बात कही।

दधीचि बोले—दक्ष! उन भगवान् शिवके बिना यह महान् यज्ञ अयज्ञ हो गया—अब यह यज्ञ कहलानेयोग्य ही नहीं रह गया। विशेषतः इस यज्ञमें तुम्हारा विनाश हो जायगा।

ऐसा कहकर दधीचि दक्षकी यज्ञशालासे अकेले ही निकल पड़े और तुरंत अपने आश्रमको चल दिये। तदनन्तर जो मुख्य-मुख्य शिवभक्त तथा शिवके मतका अनुसरण करनेवाले थे, वे भी दक्षको वैसा ही शाप देकर तुरंत वहाँसे निकले और अपने आश्रमोंको चले गये। मुनिवर दधीचि तथा दूसरे ऋषियोंके उस यज्ञमण्डपसे निकल जानेपर दुष्टबुद्धि शिवद्रोही दक्षने उन मुनियोंका उपहास करते हुए कहा।

दक्ष बोले—जिन्हें शिव ही प्रिय हैं, वे नाममात्रके ब्राह्मण दधीचि चले गये। उन्हींके समान जो दूसरे थे, वे भी मेरी यज्ञशालासे निकल गये। यह बड़ी शुभ बात हुई। मुझे सदा यही अभीष्ट है। देवेश! देवताओ और मुनियो! मैं सत्य कहता हूँ—जिनके चित्तकी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है, जो मन्दबुद्धि हैं और मिथ्यावादमें लगे हुए हैं, ऐसे वेद-बहिष्कृत दुराचारी लोगोंको यज्ञकर्ममें त्याग ही देना चाहिये। विष्णु आदि आप सब देवता और ब्राह्मण वेदवादी हैं। अतः मेरे इस यज्ञको शीघ्र ही सफल बनावें।

ब्रह्माजी कहते हैं—दक्षकी यह बात सुनकर शिवकी मायासे मोहित हुए समस्त देवर्षि उस यज्ञमें देवताओंका पूजन और हवन करने लगे। मुनीश्वर नारद! इस प्रकार उस यज्ञको जो शाप मिला, उसका वर्णन किया गया। अब यज्ञके विध्वंसकी घटनाको बताया जाता है, आदरपूर्वक सुनो।

(अध्याय २७)

o

दक्षयज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ चलनेके लिये अनुरोध, दक्षके शिवद्रोहको जानकर भगवान् शिवकी आज्ञासे देवी सतीका पिताके यज्ञमण्डपकी ओर शिवगणोंके साथ प्रस्थान

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब देवर्षिगण बड़े उत्साह और हर्षके साथ दक्षके यज्ञमें जा रहे थे, उसी समय दक्षकन्या देवी सती गन्धमादन पर्वतपर चंदोवेसे युक्त धारागृहमें सखियोंसे घिरी हुई भाँति-भाँतिकी उत्तम क्रीड़ाएँ कर रही थीं। प्रसन्नतापूर्वक क्रीडामें लगी हुई देवी सतीने उस समय रोहिणीके साथ दक्षयज्ञमें जाते हुए चन्द्रमाको देखा। देखकर वे अपनी हितकारिणी प्राणप्यारी श्रेष्ठ सखी विजयासे बोलीं—'मेरी सखियोंमें श्रेष्ठ प्राणप्रिये विजये! जल्दी जाकर पूछ तो आ, ये चन्द्रदेव रोहिणीके साथ कहाँ जा रहे हैं?'

सतीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर विजया

२१० * संक्षिप्त शिवपुराण *

तुरंत उनके पास गयी और उसने यथोचित शिष्टाचारके साथ पूछा—'चन्द्रदेव ! आप कहाँ जा रहे हैं? विजयाका यह प्रश्न सुनकर चन्द्रदेवने अपनी यात्राका उद्देश्य आदरपूर्वक बताया। दक्षके यहाँ होनेवाले यज्ञोत्सव आदिका सारा वृत्तान्त कहा। वह सब सुनकर विजया बड़ी उतावलीके साथ देवीके पास आयी और चन्द्रमाने जो कुछ कहा था, वह सब उसने कह सुनाया। उसे सुनकर कालिका सती देवीको बड़ा विस्मय हुआ। अपने यहाँ सूचना न मिलनेका क्या कारण है, यह बहुत सोचने-विचारनेपर भी उनकी समझमें नहीं आया। तब उन्होंने पार्षदोंसे घिरे अपने स्वामी भगवान् शिवके पास आकर भगवान् शंकरसे पूछा।

सती बोलीं—प्रभो! मैंने सुना है कि मेरे पिताजीके यहाँ कोई बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है। उसमें बहुत बड़ा उत्सव होगा। उसमें सब देवर्षि एकत्र हो रहे हैं। देवदेवेश्वर! पिताजीके उस महान् यज्ञमें चलनेकी रुचि आपको क्यों नहीं हो रही है? इस विषयमें जो बात हो, वह सब बताइये। महादेव! सुहृदोंका यह धर्म है कि वे सुहृदोंके साथ मिलें-जुलें। यह मिलन उनके महान् प्रेमको बढ़ानेवाला होता है। अतः प्रभो! मेरे स्वामी! आप मेरी प्रार्थना मानकर सर्वथा प्रयत्न करके मेरे साथ पिताजीकी यज्ञशालामें आज ही चलिये।

सतीकी यह बात सुनकर भगवान् महेश्वरदेव, जिनका हृदय दक्षके वाग्बाणोंसे घायल हो चुका था, मधुर वाणीमें बोले—'देवि! तुम्हारे पिता दक्ष मेरे विशेष द्रोही हो गये हैं। जो प्रमुख देवता और ऋषि अभिमानी, मूढ़ और ज्ञानशून्य हैं, वे ही सब तुम्हारे पिताके यज्ञमें गये हैं। जो लोग बिना बुलाये दूसरेके घर जाते हैं, वे वहाँ अनादर पाते हैं, जो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टदायक है। अतः प्रिये! तुमको और मुझको तो विशेषरूपसे दक्षके यज्ञमें नहीं जाना चाहिये (क्योंकि वहाँ हमें बुलाया नहीं गया है)। यह मैंने सच्ची बात कही है।'

महात्मा महेश्वरके ऐसा कहनेपर सती रोषपूर्वक बोलीं—शम्भो! आप सबके ईश्वर हैं। जिनके जानेसे यज्ञ सफल होता है, उन्हीं आपको मेरे दुष्ट पिताने इस समय आमन्त्रित नहीं किया है। प्रभो! उस दुरात्माका अभिप्राय क्या है, वह सब मैं जानना चाहती हूँ। साथ ही वहाँ आये हुए सम्पूर्ण दुरात्मा देवर्षियोंके मनोभावका भी मैं पता लगाना चाहती हूँ। अतः प्रभो! मैं आज ही पिताके यज्ञमें जाती हूँ। नाथ! महेश्वर! आप मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दे दें।

देवी सतीके ऐसा कहनेपर सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, सृष्टिकर्ता एवं कल्याणस्वरूप साक्षात् भगवान् रुद्र उनसे इस प्रकार बोले।

शिवने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! यदि इस प्रकार तुम्हारी रुचि वहाँ अवश्य जानेके लिये हो गयी है तो मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र अपने पिताके यज्ञमें जाओ। यह नन्दी वृषभ सुसज्जित है, तुम एक महारानीके अनुरूप राजोपचार साथ ले सादर इसपर सवार हो बहुसंख्यक