शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* रुद्रसंहिता * ३११
सम्पादन करके हिमालय भी सर्वतोभावेन बड़े प्रसन्न हुए और अपने निमन्त्रित बन्धु-जनोंके आगमनकी उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे।
इसी बीचमें उनके निमन्त्रित बन्धु-बान्धव आने लगे। देवताओंके निवासभूत गिरिराज सुमेरु दिव्य रूप धारण करके नाना प्रकारके मणियों तथा महारत्नोंको यत्नपूर्वक साथ ले अपने स्त्री-पुत्रोंके साथ हिमालयके घर आये। मन्दराचल, अस्ताचल, उदयाचल, मलय, दर्दुर, निषद, गन्धमादन, करवीर, महेन्द्र, पारियात्र, क्रौंच, पुरुषोत्तमशैल, नील, त्रिकूट, चित्रकूट, वेंकट, श्रीशैल, गोकामुख, नारद, विन्ध्य, कालंजर, कैलास तथा अन्य पर्वत दिव्य रूप धारणकर अपने स्त्री-पुत्रोंके साथ बहुत-सी भेंट-सामग्री ले वहाँ उपस्थित हुए। दूसरे द्वीपोंमें तथा यहाँ भी जो-जो पर्वत हैं, वे सब हिमालयके घर पधारे। शिवा और शिवका विवाह है, यह जानकर सबने बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ पदार्पण किया। शोणभद्र आदि नद और सम्पूर्ण नदियाँ दिव्य नर-नारियोंके रूप धारणकर नाना प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत हो शिव-पार्वतीका विवाह देखनेके लिये आये। गोदावरी, यमुना, सरस्वती, वेणी, गंगा, नर्मदा तथा अन्य श्रेष्ठ सरिताएँ भी बड़ी प्रसन्नताके साथ हिमवान्के यहाँ आयीं। उन सबके आनेसे हिमालयकी दिव्य पुरी सब ओरसे भर गयी। वह सब प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न थी। वहाँ बड़े-बड़े उत्सव हो रहे थे। ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। बंदनवारोंसे उसकी अधिक शोभा होती थी। चारों ओर चाँदौवे तने होनेसे वहाँ सूर्यका दर्शन नहीं होता था। भाँति-भाँतिकी नीली, पीली आदि प्रभा उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी। हिमालयने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने यहाँ पधारे हुए सभी स्त्री-पुरुषोंका यथायोग्य आदर-सत्कार किया और सबको अलग-अलग सुन्दर स्थानोंमें ठहराया। अनेकानेक उपयुक्त सामग्री देकर सबको पूर्ण संतुष्ट किया।
मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर शैलराज हिमवान्ने प्रसन्न हो महान् उत्सवसे परिपूर्ण अपने नगरको विचित्र रीतिसे सजाना आरम्भ किया। सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर छिड़काव कराया। उन्हें बहुमूल्य साधनोंसे सुसज्जित एवं शोभित किया। प्रत्येक घरके दरवाजेपर केले आदि मांगलिक वृक्ष लगवाये और उन्हें मांगलिक द्रव्योंसे संयुक्त किया। आँगनको केलेके खंभोंसे सजाया। रेशमकी डोरोंमें आमके पल्लव बाँधकर बंदनवारें बनवायीं और उन्हें उन खंभोंके चारों ओर लगवा दिया। मालतीके फूलोंकी मालाएँ उस (आँगन)-के सब ओर लटका दी गयीं। सुन्दर तोरणोंसे वह आँगनका भाग अत्यन्त प्रकाशमान जान पड़ता था। चारों दिशाओंमें मंगलसूचक शुभ द्रव्य रखे गये थे, जो उस प्रांगणकी शोभा बढ़ा रहे थे। इसी प्रकार अत्यन्त प्रसन्नतासे भरे हुए गिरिराज हिमवान्ने महान् प्रभावशाली गर्गमुनिको आगे करके अपनी पुत्रीके लिये प्रस्तुत करनेयोग्य सारा उत्तम मंगलकार्य सम्पन्न किया। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर आदरपूर्वक एक मण्डप बनवाया, जिसका विस्तार बहुत अधिक था। वेदी आदिके कारण वह मण्डप बहुत मनोहर जान पड़ता था। देवर्षे! वह मण्डप कई योजन विस्तृत
३१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
था। अनेक शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके आश्चर्योंसे परिपूर्ण था। वहाँ स्थावर और जंगम सभी वस्तुएँ कृत्रिम बनी थीं; परंतु असली वस्तुओंके समान प्रतीत होती थीं। उनसे उस मण्डपकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वहाँ सब ओर ऐसी अद्भुत वस्तुएँ थीं जो उस मण्डपका सर्वस्व जान पड़ती थीं। नाना प्रकारकी निराली वस्तुओंका चमत्कार वहाँ छा रहा था। वहाँकी स्थावर वस्तुओंसे जंगम और जंगम वस्तुओंसे स्थावर पराजित हो रहे थे अर्थात् वे एक-दूसरेसे बढ़कर शोभाशाली और चमत्कारपूर्ण दिखायी देते थे। उस मण्डपकी स्थलभूमि जलसे पराजित हो रही थी। अर्थात् चतुर-से-चतुर मनुष्य भी यह नहीं जान पाते थे कि इसमें कहाँ जल है और कहाँ स्थल। कहीं कृत्रिम सिंह बने थे और कहीं सारसोंकी पंक्तियाँ। कहीं बनावटी मोर थे, जो अपनी सुन्दरतासे मनको मोहे लेते थे। कहीं कृत्रिम स्त्रियाँ थीं, जो पुरुषोंके साथ नृत्य करती हुई देखी जाती थीं। वे कृत्रिम होनेपर भी सब लोगोंकी ओर देखतीं और उनके मनको मोहमें डाल देती थीं। उसी विधिसे मनोहर द्वारपाल बने थे, जो स्थावर होनेपर भी जंगमोंके समान जान पड़ते थे। वे अपने हाथोंसे धनुष उठाकर उन्हें खींचते देखे जाते थे।
द्वारपर कृत्रिम महालक्ष्मी खड़ी थीं, जिनकी रचना अद्भुत थी। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे संयुक्त दिखायी देती थीं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो क्षीरसागरसे साक्षात् लक्ष्मी ही आ गयी हों। उस मण्डपमें स्थान-स्थानपर सजे-सजाये कृत्रिम हाथी खड़े किये गये थे, जो असली हाथियोंके समान ही प्रतीत होते थे। घुड़सवारोंसहित घोड़े और हाथीसवारों-सहित हाथी बनाये गये थे। जहाँ-तहाँ रथियोंसहित रथ बने थे, जो कृत्रिम अश्वोंसे ही खींचे जाते थे। उन्हें देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था। इनके सिवा दूसरे-दूसरे कृत्रिम वाहन भी वहाँ खड़े थे। पैदल सिपाहियोंकी कृत्रिम सेना भी वहाँ मौजूद थी। मुने! प्रसन्नचित्तवाले विश्वकर्माने देवताओं और मुनियोंको भी मोह (आश्चर्य)-में डालनेके लिये वहाँ ऐसी अद्भुत रचनाएँ की थीं। मण्डपके सबसे बड़े फाटकपर कृत्रिम नन्दी खड़ा था, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित होता था। भगवान् शिवके वाहन नन्दीकी जैसी आकृति है, ठीक वैसा ही वह भी था। उस कृत्रिम नन्दीके ऊपर रत्न-विभूषित महादिव्य पुष्पक शोभा पाता था, जो पल्लवों तथा श्वेत चामरोंसे सजाया गया था। उसके वामपार्श्वमें दो कृत्रिम हाथी खड़े थे, जिनका रंग विशुद्ध केसरके समान था। वे चार दाँतवाले बनाये गये थे और साठ वर्षके पाठोंके समान दीखते थे। वे परस्पर स्नेह करते-से प्रतीत होते थे। उनमें बड़ी चमक थी। इसी प्रकार सूर्यके समान अत्यन्त प्रकाशमान दो दिव्य अश्व भी विश्वकर्माने बनाये थे, जो चँवरसे अलंकृत और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणोंसे सम्पन्न, कवचधारी लोकपाल तथा सम्पूर्ण देवता भी वहाँ विश्वकर्माद्वारा रचे गये थे, जो ठीक उन्हीं लोकपालों और देवताओंसे मिलते-जुलते थे। इसी तरह भृगु आदि समस्त तपोधन ऋषि, अन्यान्य उपदेवता और सिद्ध भी
* रुद्रसंहिता * ३१३
उनके द्वारा वहाँ निर्मित हुए थे।
गरुड़ आदि समस्त पार्षदोंसे युक्त भगवान् विष्णुका कृत्रिम विग्रह भी विश्वकर्माने बनाया था, जिसका स्वरूप साक्षात् श्रीहरिके समान ही आश्चर्यजनक था। नारद! उसी प्रकार पुत्रों, वेदों और सिद्धोंसे घिरे हुए मुझ ब्रह्माकी भी प्रतिमा वहाँ बनायी गयी थी, जो मेरे समान ही वैदिक सूक्तोंका पाठ कर रही थी। ऐरावत हाथीपर चढ़े हुए देवराज इन्द्र भी वहाँ दल-बलके साथ खड़े थे। वे भी कृत्रिम ही बनाये गये थे और परिपूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित होते थे। देवर्षे! बहुत कहनेसे क्या लाभ? हिमाचलसे प्रेरित हुए विश्वकर्माने वहाँ शीघ्र ही सम्पूर्ण देवसमाजके कृत्रिम विग्रहोंका निर्माण कर लिया था। इस प्रकार उन्होंने दिव्य मण्डपकी रचना की थी। वह मण्डप अनेक आश्चर्योंसे युक्त, महान् तथा देवताओंको भी मोह लेनेवाला था।
तदनन्तर गिरिराज हिमवान्की आज्ञासे परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने देवता आदिके निवासके लिये उन-उनके कृत्रिम लोकोंका भी यत्नपूर्वक निर्माण किया। उन्हीं लोकोंमें उन्होंने उन देवताओंके लिये अत्यन्त तेजस्वी, परम अद्भुत और सुखदायक बड़े-बड़े दिव्य मंचों (सिंहासनों)-की रचना की। इसी तरह उन्होंने मुझ स्वयम्भू ब्रह्माके निवासके लिये क्षणभरमें अद्भुत सत्यलोककी रचना कर डाली, जो उत्तम दीप्तिसे उद्दीप्त हो रहा था। साथ ही भगवान् विष्णुके लिये भी क्षणभरमें दूसरे दिव्य वैकुण्ठधामका निर्माण कर दिया, जो परम उज्ज्वल तथा नाना प्रकारके आश्चर्योंसे परिपूर्ण था। इसी तरह विश्वकर्माने देवराज इन्द्रके लिये भी दिव्य, अद्भुत, उत्तम एवं समस्त ऐश्वर्योंसे सम्पन्न गृहकी रचना की। अन्य लोकपालोंके लिये भी उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक बड़े सुन्दर, दिव्य, अद्भुत एवं बड़े-बड़े भवन बनाये। फिर क्रमशः समस्त देवताओंके लिये भी उन्होंने क्रमशः विचित्र गृहोंका निर्माण किया। परम बुद्धिमान् विश्वकर्माको भगवान् शंकरका महान् वर प्राप्त था, इसीलिये उन्होंने शिवके संतोषके लिये क्षणभरमें इन सब वस्तुओंकी रचना कर डाली। तदनन्तर उसी प्रकार भगवान् शंकरके लिये भी उन्होंने एक शोभाशाली गृहका निर्माण किया, जो शिवके चिह्नसे युक्त तथा शिवलोकवर्ती दिव्य भवनके समान ही अनुपम था। श्रेष्ठ देवताओंने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वह परम उज्ज्वल, महान् प्रभापुंजसे उद्भासित, उत्तम और अद्भुत था। विश्वकर्माने भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये वहाँ ऐसी अद्भुत रचना की थी, जो परम उज्ज्वल होनेके साथ ही साक्षात् महादेवजीको भी आश्चर्यमें डालनेवाली थी। इस प्रकार यह सारा लौकिक व्यवहार करके हिमाचल बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् शम्भुके शुभागमनकी प्रतीक्षा करने लगे। देवर्षे! हिमालयका यह सारा आनन्ददायक वृत्तान्त मैंने तुमसे कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ३७-३८)
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३१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे बाहर निकलना
नारदजी बोले-विष्णुशिष्य महाप्राज्ञ तात विधातः! आपको नमस्कार है। कृपानिधे! आपके मुँहसे यह अद्भुत कथा मुझे सुननेको मिली है। अब मैं भगवान् चन्द्रमौलिके परम मंगलमय तथा समस्त पापराशिके विनाशक वैवाहिक चरित्रको सुनना चाहता हूँ। मंगलपत्रिका पाकर महादेवजीने क्या किया? परमात्मा शंकरकी वह दिव्य कथा सुनाइये।
ब्रह्माजीने कहा-बेटा! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। भगवान् शंकरके उत्तम यशको सुनो। मंगलपत्रिका पाकर भगवान् शंकरने जो कुछ किया, वह बताता हूँ। भगवान् शिव उस मंगलपत्रिकाको प्रसन्नतापूर्वक हाथमें लेकर हृदयमें बड़े हर्षका अनुभव करते हुए हँसने लगे। फिर उन भगवान्ने उसे लानेवालोंका सम्मान किया। तत्पश्चात् उसे बाँचकर विधिपूर्वक स्वीकार किया। इसके बाद हिमाचलके यहाँसे आये हुए लोगोंको बड़े आदर-सम्मानके साथ विदा किया। तदनन्तर उन मुनियोंसे कहा- 'आपलोगोंंने मेरे शुभकार्यका भलीभाँति सम्पादन किया, अब मैंने विवाह स्वीकार कर लिया है। अतः आपलोगोंको मेरे विवाहमें आना चाहिये।'
भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर वे ऋषि बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम एवं उनकी परिक्रमा करके अपने परम सौभाग्यकी सराहना करते हुए अपने धामको चले गये। मुने! तदनन्तर महालीला करनेवाले देवेश्वर भगवान् शम्भुने लोकाचारका सहारा ले तत्काल ही तुम्हारा स्मरण किया। तुम अपने सौभाग्यकी प्रशंसा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आये और मस्तक झुका प्रणाम कर हाथ जोड़ विनीतभावसे खड़े हो गये।
तब भगवान् शिवने कहा-नारद! तुम्हारे उपदेशसे देवी पार्वतींने बड़ी भारी तपस्या की और उससे संतुष्ट होकर मैंने उन्हें यह वर दिया कि मैं पतिरूपसे तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। पार्वतीकी भक्ति देखकर मैं उनके वशमें हो गया हूँ। इसलिये उनके साथ विवाह करूँगा। सप्तर्षियोंने लग्नका साधन और शोधन कर दिया है। अतः आजसे सातवें दिन मेरा विवाह होगा। उस अवसरपर लौकिक रीतिका आश्रय ले मैं महान् उत्सव करूँगा। मुने! तुम विष्णु आदि सब देवताओं, मुनियों और सिद्धोंको तथा अन्य लोगोंको भी मेरी ओरसे निमन्त्रित करो। सब लोग मेरे शासनकी गुरुताको समझकर प्रसन्नता और उत्साहके साथ सब प्रकारसे सज-धजकर स्त्री-पुत्रोंको साथ लिये यहाँ आयें।
ब्रह्माजी कहते हैं-मुने! भगवान् शंकरकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके तुमने शीघ्र ही सर्वत्र जाकर उन सबको निमन्त्रण दे दिया। तत्पश्चात् शम्भुके पास आकर उनकी आज्ञाके अनुसार तुम वहीं ठहर गये। भगवान् शिव भी उन सब
* रुद्रसंहिता * ३१५
देवताओंके आगमनकी उत्कण्ठापूर्वक प्रतीक्षा करते हुए अपने गणोंके साथ वहीं रहे। उनके सभी गण सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए वहाँ बड़ा भारी उत्सव मना रहे थे। इसी बीचमें भगवान् विष्णु सुन्दर वेष धारण किये अपनी पत्नी और दल-बलके साथ शीघ्र ही कैलास पर्वतपर आये और भक्तिभावसे भगवान् शिवको प्रणाम करके उनकी आज्ञा पाकर प्रसन्नतापूर्वक उत्तम स्थानमें ठहर गये। इसी प्रकार मैं अपने गणोंके साथ स्वतन्त्रतापूर्वक शीघ्र ही कैलास गया और भगवान् शम्भुको प्रणाम करके अपने सेवकोंसहित सानन्द वहाँ ठहरा। तदनन्तर इन्द्र आदि लोकपाल और उनकी स्त्रियाँ आवश्यक सामानके साथ खूब सज-धजकर वहाँ आयीं। वे सब-के-सब उत्सव मना रहे थे। तत्पश्चात् मुनि, नाग, सिद्ध, उपदेवता तथा अन्य लोग भी निमन्त्रित हो उत्सव मनाते हुए वहाँ आये। उस समय महेश्वरने वहाँ आये हुए सब देवता आदिका पृथक्-पृथक् सहर्ष स्वागत-सत्कार किया। फिर तो कैलास पर्वतपर बड़ा अद्भुत और महान् उत्सव होने लगा। देवांगनाओंने उस अवसरपर यथायोग्य नृत्य आदि किया। विष्णु आदि जो देवता भगवान् शम्भुकी वैवाहिक यात्रा सम्पन्न करानेके लिये इस समय वहाँ आये थे, वे सब यथास्थान ठहर गये। भगवान् शिवकी आज्ञा पाकर सब लोग उनके प्रत्येक कार्यको अपना ही कार्य समझकर नियन्त्रित रूपसे करने लगे और इसे शिवकी सेवा मानने लगे। उस समय सातों मातृकाएँ वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवको यथायोग्य आभूषण पहनाने लगीं। मुनिश्रेष्ठ! परमेश्वर भगवान् शिवका जो स्वाभाविक वेष था, वही उनकी इच्छासे उनके लिये आभूषणकी सामग्री बन गया। उस समय चन्द्रमा स्वयं उनके मुकुटके स्थानपर जा विराजे। उनका जो सुन्दर ललाटवर्ती तीसरा नेत्र था, वही शुभ तिलक बन गया। मुने! कानोंके आभूषणोंके रूपमें जो दो सर्प बताये गये हैं, वे नाना प्रकारके रत्नोंसे युक्त दो कुण्डल बन गये। अन्यान्य अंगोंमें स्थित सर्प उन-उन अंगोंके अति रमणीय नाना रत्नमय आभूषण हो गये। उनके शरीरमें जो भस्म लगा हुआ था, वही चन्दन आदिका अंगराग बन गया और उनके जो गजचर्म आदि परिधान थे, वे सुन्दर दिव्य दुकूल बन गये।
इस प्रकार उनका रूप इतना सुन्दर हो गया कि उसका वर्णन करना कठिन है। वे साक्षात् ईश्वर तो थे ही, उन्होंने पूरा-पूरा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। तदनन्तर समस्त देवता, यक्ष, दानव, नाग, पक्षी, अप्सरा और महर्षिगण मिलकर भगवान् शिवके समीप गये और महान् उत्सव मनाते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे बोले—'महादेव! महेश्वर! अब आप महादेवी गिरिजाको ब्याह लानेके लिये हमलोगोंके साथ चलिये, चलिये। हमपर कृपा कीजिये।' तत्पश्चात् विज्ञानसे प्रसन्न हृदयवाले भगवान् विष्णुने भगवान् शंकरको भक्तिभावसे प्रणाम करके उपर्युक्त प्रस्तावके अनुरूप ही बात कही।
भगवान् विष्णु बोले—शरणागतवत्सल देवदेव! महादेव! प्रभो! आप अपने भक्तजनोंका कार्य सिद्ध करनेवाले हैं; अतः मेरा एक निवेदन सुनिये। कल्याणकारी शम्भो! आप गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार
३१६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीके साथ अपने विवाहका कार्य कराइये। हर! आपके द्वारा विवाहकी विधिका सम्पादन होनेपर वही लोकमें सर्वत्र विख्यात हो जायगी, अतः नाथ! आप कुलधर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक मण्डपस्थापन और नान्दीमुख श्राद्ध कराइये तथा लोकमें अपने यशका विस्तार कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर लोकाचारपरायण परमेश्वर शम्भुने विधिपूर्वक सब कार्य किया। उन्होंने सारा आभ्युदयिक कार्य करानेके लिये मुझको ही अधिकार दे दिया था। अतः वहाँ मुनियोंको साथ ले मैंने आदर और प्रसन्नताके साथ वह सब कार्य सम्पन्न किया। महामुने! उस समय कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, भागुरि, गुरु, कण्व, बृहस्पति, शक्ति, जमदग्नि, पराशर, मार्कण्डेय, शिलापाक, अरुणपाल, अकृतश्रम, अगस्त्य, च्यवन, गर्ग, शिलाद, दधीचि, उपमन्यु, भरद्वाज, अकृतव्रण, पिप्पलाद, कुशिक, कौत्स तथा शिष्योंसहित व्यास—ये और दूसरे बहुत-से ऋषि जो भगवान् शिवके समीप आये थे, मेरी प्रेरणासे विधिपूर्वक वहाँ आभ्युदयिक कर्म कराने लगे। वे सब-के-सब वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। अतः वेदोक्त विधिसे वैवाहिक मंगलाचार करके ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विविध उत्तम सूक्तोंद्वारा महेश्वरकी रक्षा करने लगे। उन सब ऋषियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत-से मंगलकार्य कराये। मेरी और शम्भुकी प्रेरणासे उन्होंने विघ्नोंकी शान्तिके लिये प्रीतिपूर्वक ग्रहोंका और समस्त मण्डलवर्ती देवताओंका पूजन किया। वह सब लौकिक, वैदिक कर्म यथोचित रीतिसे करके भगवान् शिव बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने प्रसन्नता-पूर्वक ब्राह्मणोंको प्रणाम किया। तदनन्तर वे सर्वेश्वर महादेव देवताओं और ब्राह्मणोंको आगे करके उस गिरिश्रेष्ठ कैलाससे हर्षपूर्वक निकले। कैलाससे बाहर जाकर देवताओं और ब्राह्मणोंके साथ भगवान् शम्भु, जो नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं, सानन्द खड़े हो गये। उस समय वहाँ महेश्वरके संतोषके लिये देवता आदिने मिलकर बहुत बड़ा उत्सव मनाया। बाजे बजे तथा गान और नृत्य हुए। (अध्याय ३९)
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$
भगवान् शिवका बारात लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर भगवान् शम्भुने नन्दी आदि सब गणोंको अपने साथ हिमाचलपुरीको चलनेकी प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा देते हुए कहा—'तुमलोग थोड़े-से गणोंको यहाँ रखकर शेष सभी लोग मेरे साथ बड़े उत्साह और आनन्दसे युक्त हो गिरिराज हिमवान्के नगरको चलो।' फिर तो भगवान्की आज्ञा पाकर गणेश्वर शंखकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, पारिजात, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, संदारक, कन्दुक, कुण्डक, विष्टम्भ, पिप्पल, सनादक, आवेशन, कुण्ड, पर्वतकर, चन्द्रतापन, काल, कालक, महाकाल, अग्निक, अग्निमुख, आदित्यमूर्द्धा, घनावह,
* रुद्रसंहिता * ३१७
संनाह, कुमुद, अमोघ, कोकिल, सुमन्त्र, काकपादोदर, संतानक, मधुपिंग, कोकिल, पूर्णभद्र, नील, चतुर्वक्त्र, करण, अहिरोमक, यज्व्वाक्ष, शतमन्यु, मेघमन्यु, काष्ठागूढ, विरूपाक्ष, सुकेश, वृषभ, सनातन, तालकेतु, षण्मुख, चैत्र, स्वयम्प्रभु, लकुलीश, लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक, भृंगिरिटि, देवदेवप्रिय, अशनि, भानुक, प्रमथ तथा वीरभद्र अपने असंख्य कोटि-कोटि गणों तथा भूतोंको साथ लेकर चले। नन्दी आदि गणराज असंख्य गणोंसे घिरे चले तथा क्षेत्रपाल और भैरव भी कोटि-कोटि गणोंको लेकर उत्सव मनाते हुए प्रेम और उत्साहके साथ चल पड़े। वे सब सहस्त्र हाथोंसे युक्त थे। सिरपर जटाका मुकुट धारण किये हुए थे। उन सबके मस्तकपर चन्द्रमा और गलेमें नील चिह्न थे तथा वे सब-के-सब त्रिनेत्रधारी थे। उन सबने रुद्राक्षके आभूषण पहन रखे थे। सभी उत्तम भस्म धारण किये थे और हार, कुण्डल, केयूर तथा मुकुट आदिसे अलंकृत थे। इस प्रकार देवताओं तथा दूसरे-दूसरे गणोंको साथ ले भगवान् शंकर अपने विवाहके लिये हिमवान्के नगरकी ओर चले। चण्डीदेवी रुद्रदेवकी बहिन बनकर खूब उत्सव मनाती हुई बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आ पहुँचीं। वे शत्रुओंको अत्यन्त भय देनेवाली थीं। उन्होंने साँपोंके आभूषणसे अपनेको विभूषित कर रखा था। उनका वाहन प्रेत था। वे उसीपर आरूढ़ हो अपने माथेपर एक सोनेका भरा हुआ कलश लिये चल रही थीं। वह कलश महान् प्रभापुंजसे प्रकाशित हो रहा था।
मुने! वहाँ करोड़ों दिव्य भूतगण शोभा पाते थे, जिनका रूप विकराल था। उनके रूप-रंग भी अनेक प्रकारके थे। उस समय डमरूओंके डिम-डिम घोषसे, भेरियोंकी गड़गड़ाहटसे और शंखोंके गम्भीर नादसे तीनों लोक गूँज उठे थे। दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे महान् कोलाहल हो रहा था। वह जगत्का मंगल करता हुआ अमंगलका नाश करता था। देवता लोग शिवगणोंके पीछे होकर बड़ी उत्सुकताके साथ बारातका अनुसरण करते थे। सम्पूर्ण सिद्ध और लोकपाल आदि भी देवताओंके साथ थे। देवमण्डलीके मध्यभागमें गरुड़के आसनपर बैठकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चल रहे थे। मुने! उनके ऊपर महान् छत्र तना हुआ था, जो उनकी शोभा बढ़ाता था। उनपर चँवर डुलाये जा रहे थे और वे अपने गणोंसे घिरे हुए थे। उनके शोभाशाली पार्षदोंने उन्हें अपने ढंगसे आभूषण आदिके द्वारा विभूषित किया था। इसी प्रकार मैं भी मूर्तिमान् वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकादि महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा अन्यान्य परिजनोंके साथ मार्गमें चलता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था और शिवकी सेवामें तत्पर था। देवराज इन्द्र भी नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होकर अपने सेनाके बीचसे चलते हुए अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उस समय बारातके साथ यात्रा करते हुए बहुत-से ऋषि भी अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। वे शिवजीका विवाह देखनेके लिये बहुत उत्कण्ठित थे। शाकिनी, यातुधान, बेताल, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, प्रमथ आदि गण; तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गन्धर्व तथा किंनर भी बड़े हर्षसे भरकर
३१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
बाजा बजाते हुए चले। सम्पूर्ण जगन्माताएँ, सारी देवकन्याएँ, गायत्री, सावित्री, लक्ष्मी और अन्य देवांगनाएँ—ये तथा दूसरी देवपत्नियाँ जो सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं, शंकरजीका विवाह है, यह सोचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें सम्मिलित होनेके लिये गयीं। वेदों, शास्त्रों, सिद्धों और महर्षियोंद्वारा जो साक्षात् धर्मका स्वरूप कहा गया है तथा जिसकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है, वह सर्वांग-सुन्दर वृषभ भगवान् शिवका वाहन है। धर्मवत्सल महादेवजी उस वृषभपर आरूढ़ हो सबके साथ यात्रा करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवर्षियोंके समुदाय उनकी सेवामें उपस्थित थे। इन सब देवताओं और महर्षियोंके एकत्र हुए समुदायसे महेश्वरकी बड़ी शोभा हो रही थी। उनका बहुत श्रृंगार किया गया था। वे शिवाका पाणिग्रहण करनेके लिये हिमालयके भवनको जा रहे थे। नारद! इस प्रकार बारातकी यात्रा-सम्बन्धी उत्तम उत्सवसे युक्त शम्भुका चरित्र कहा गया। अब हिमालयनगरमें जो सुन्दर वृत्तान्त घटित हुआ, उसे सुनो।
(अध्याय ४०)
हिमवान्द्वारा शिवकी बारातकी अगवानी तथा सबका अभिनन्दन एवं वन्दन, मेनाका नारदजीको बुलाकर उनसे बारातियोंका परिचय पाना तथा शिव और उनके गणोंको देखकर भयसे मूर्च्छित होना
ब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान् शिवने नारदजीको हिमाचलके घर भेजा। वे वहाँकी विलक्षण सजावट देखकर दंग रह गये। विश्वकर्माने जो विष्णु, ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं तथा नारद आदि ऋषियोंकी चेतन-सी प्रतीत होनेवाली मूर्तियाँ बनायी थीं, उन्हें देखकर देवर्षि नारद चकित हो उठे। तत्पश्चात् हिमाचलने देवर्षिको बारात बुला लानेके लिये भेजा। साथ ही उस बारातकी अगवानीके लिये मैनाक आदि पर्वत भी गये। तदनन्तर विष्णु आदि देवताओं तथा आनन्दित हुए अपने गणोंके साथ भगवान् शिव हिमालयनगरके समीप सानन्द आ पहुँचे।
गिरिराज हिमवान्ने जब यह सुना कि सर्वव्यापी शंकर मेरे नगरके निकट आ पहुँचे हैं, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर उन्होंने बहुत-सा सामान एकत्र करके पर्वतों और ब्राह्मणोंको महादेवजीके साथ वार्तालाप करनेके लिये भेजा। स्वयं भी बड़ी भक्तिके साथ वे प्राणप्यारे महेश्वरका दर्शन करनेके लिये गये। उस समय उनका हृदय अधिक प्रेमके कारण द्रवित हो रहा था और वे प्रसन्नतापूर्वक अपने सौभाग्यकी सराहना करते थे। उस समय समस्त देवताओंकी सेनाको उपस्थित देख हिमवान्को बड़ा विस्मय हुआ और वे अपनेको धन्य मानते हुए उनके सामने गये। देवता और पर्वत एक-दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगे। महादेवजीको सामने देखकर हिमालयने उन्हें प्रणाम किया। साथ ही समस्त पर्वतों और ब्राह्मणोंने भी सदाशिवकी वन्दना की। वे वृषभपर
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आरूढ़ थे। उनके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी। वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे और अपने दिव्य अंगोंके लावण्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनका श्रीअंग अत्यन्त महीन, नूतन और सुन्दर रेशमी वस्त्रसे सुशोभित था। उनके मस्तकका मुकुट उत्तम रत्नोंसे जटित होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था। वे अपनी पावन प्रभाका प्रसार करते हुए हँस रहे थे। उनका प्रत्येक अंग भूषण बने हुए सर्पोंसे युक्त था तथा उनकी अंगकान्ति बड़ी अद्भुत दिखायी देती थी। दिव्य कान्तिसे सम्पन्न उन महेश्वरकी सुरेश्वरगण हाथमें चँवर लिये सेवा कर रहे थे। उनके बायें भागमें भगवान् विष्णु थे और दाहिने भागमें मैं था। पीछे देवराज इन्द्र थे और अन्य देवता आदि भी पीछे तथा अगल-बगलमें विद्यमान थे। नाना प्रकारके देवता आदि उन लोककल्याणकारी भगवान् शंकरकी स्तुति करते जाते थे। उन्होंने स्वेच्छासे ही दिव्य शरीर धारण कर रखा था। वास्तवमें वे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा, सबके ईश्वर, उपासकोंको मनोवांछित वर देनेवाले, कल्याणमय गुणोंसे युक्त, प्राकृत गुणोंसे रहित, भक्तोंके अधीन रहनेवाले, सबपर कृपा करनेवाले, प्रकृति और पुरुषसे भी विलक्षण तथा सच्चिदानन्द-स्वरूप हैं। उनके दर्शनके पश्चात् हिमवान्ने भगवान् शिवके वामभागमें अच्युत श्रीहरिका दर्शन किया, जो नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो विनतानन्दन गरुड़की पीठपर विराजमान थे। मुने! भगवान्के दाहिने भागमें उन्होंने चार मुखोंसे युक्त, महाशोभाशाली तथा अपने परिवारसे संयुक्त मुझ ब्रह्माको देखा। भगवान् शिवके सदा ही अत्यन्त प्रिय इन दोनों देवेश्वरोंका दर्शन करके परिवारसहित गिरिराजने आदरपूर्वक प्रणाम किया।
इसी प्रकार भगवान् शिवके पीछे तथा अगल-बगलमें खड़े हुए दीप्तिमान् देवता आदिको भी देखकर गिरिराजने उन सबके सामने मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् शिवकी आज्ञासे आगे होकर हिमवान् अपने नगरको गये। उनके साथ महादेवजी, भगवान् विष्णु तथा स्वयम्भू ब्रह्मा भी मुनियों और देवताओंसहित शीघ्रतापूर्वक चलने लगे। मुने! उस अवसरपर मेनाके मनमें भगवान् शिवके दर्शनकी इच्छा हुई। इसलिये उन्होंने तुमको बुलवाया। उस समय भगवान् शिवसे प्रेरित होकर उनका हार्दिक अभिप्राय पूर्ण करनेकी इच्छासे तुम वहाँ गये।
मेना तुम्हें प्रणाम करके बोलीं—मुने! गिरिजाके होनेवाले पतिको पहले मैं देखूँगी। शिवका कैसा रूप है, जिनके लिये मेरी बेटीने ऐसी उत्कृष्ट तपस्या की है।
तात! उस समय भगवान् शिव भी मेनाके भीतरके अहंकारको जानकर श्रीविष्णु और मुझसे अद्भुत लीला करते हुए बोले।
शिवने कहा—तात! आप दोनों मेरी आज्ञासे देवताओंसहित अलग-अलग होकर गिरिराजके द्वारपर चलिये। हम पीछेसे आयेंगे।
यह सुनकर भगवान् श्रीहरिने सब देवताओंको बुलाकर वैसा करनेके लिये कहा। शिवके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले समस्त देवताओंने शीघ्र वैसी ही व्यवस्था करके उत्सुकतापूर्वक वहाँसे पृथक्-पृथक् यात्रा की। मुने! मेना अपने मकानके
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सबसे ऊपरी भवनमें तुम्हारे साथ खड़ी थीं। उस समय भगवान् विश्वेश्वरने अपनेको ऐसी वेष-भूषामें दिखाया, जिससे मेनाके हृदयको ठेस पहुँचे। सबसे पहले बारातके जुलूसमें विविध वाहनोंपर विराजित खूब सजे-धजे बाजे-गाजेके साथ पताकाएँ फहराते हुए वसु आदि गन्धर्व आये; फिर मणिग्रीवादि यक्ष, तदनन्तर क्रमसे यमराज, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, देवराज इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, भृगु आदि मुनीश्वर तथा ब्रह्मा आये। ये सब उत्तरोत्तर एक-से-एक विशेष सुन्दर शोभामय रूप-गुणसे सम्पन्न थे। इनमेंसे प्रत्येक दलके स्वामीको देखकर मेना पूछती थी कि ‘क्या ये ही शिव हैं?’ नारदजी कहते—‘यह तो शिवके सेवक हैं।’ मेना यह सुनकर बड़ी प्रसन्न होतीं और हर्षमें भरकर मन-ही-मन कहतीं—ये उनके सेवक ही जब इतने सुन्दर हैं, तब वे सबके स्वामी शिव तो पता नहीं कितने सुन्दर होंगे।
इसी बीचमें वहाँ भगवान् विष्णु पधारे। वे सम्पूर्ण शोभासे सम्पन्न श्रीमान्, नूतन जलधरके समान श्याम तथा चार भुजाओंसे संयुक्त थे। उनका लावण्य करोड़ों कंदर्पोंको लज्जित कर रहा था। वे पीताम्बर धारण करके अपनी सहज प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। उनके सुन्दर नेत्र प्रफुल्ल कमलकी शोभाको छीने लेते थे। उनकी आकृतिसे शान्ति बरस रही थी। पक्षिराज गरुड़ उनके वाहन थे। शंख, चक्र आदि लक्षणोंसे युक्त मुकुट आदिसे विभूषित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण किये वे लक्ष्मीपति विष्णु अपने अप्रमेय प्रभापुंजसे प्रकाशमान थे। उन्हें देखते ही मेनाके नेत्र चकित हो गये। वे बड़े हर्षसे बोलीं—‘अवश्य ये ही मेरी शिवाके पति साक्षात् भगवान् शिव हैं इसमें संशय नहीं है।’
मुने! तुम भी लीला करनेवाले ही ठहरे। अतः मेनाकी यह बात सुनकर उनसे बोले—‘देवि! ये शिवाके पति नहीं हैं, अपितु भगवान् केशव हरि हैं। भगवान् शंकरके सम्पूर्ण कार्योंके अधिकारी तथा उनके प्रिय हैं। पार्वतीके पति जो दूल्हा शिव हैं, उन्हें इनसे भी बढ़कर समझना चाहिये। उनकी शोभाका वर्णन मुझसे नहीं हो सकता। वे ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अधिपति, सर्वेश्वर तथा स्वयम्प्रकाश परमात्मा हैं।’
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तुम्हारी इस बातको सुनकर मेनाने उन शुभलक्षणा उमाको महान् धन-वैभवसे सम्पन्न, सौभाग्यवती तथा तीनों कुलोंके लिये सुखदायिनी माना। वे मुखपर प्रसन्नता लाकर प्रीतियुक्त हृदयसे अपने सर्वाधिक सौभाग्यका बारंबार वर्णन करती हुई बोलीं।
मेनाने कहा—इस समय मैं पार्वतीको जन्म देनेके कारण सर्वथा धन्य हो गयी। ये गिरीश्वर भी धन्य हैं तथा मेरा सब कुछ परम धन्य हो गया। जिन-जिन अत्यन्त तेजस्वी देवताओं और देवेश्वरोंका मैंने दर्शन किया है, इन सबके जो पति हैं, वे मेरी पुत्रीके पति होंगे। उसके सौभाग्यका क्या वर्णन किया जाय? भगवान् शिवको पतिरूपमें पानेके कारण पार्वतीके सौभाग्यका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेनाने प्रेमपूर्ण हृदयसे ज्यों ही उपर्युक्त बात कही,
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त्यों ही अद्भुत लीला करनेवाले भगवान् रुद्र सामने आ गये। तात! उनके सभी गण अद्भुत तथा मेनाके अहंकारको चूर्ण करनेवाले थे। भगवान् शिव अपने-आपको मायासे निर्लिप्त एवं निर्विकार दिखाते हुए वहाँ आये। मुने! उन्हें आया जान तुमने मेनाको शिवाके पतिका दर्शन कराते हुए उनसे इस प्रकार कहा—'सुन्दरि! देखो, ये साक्षात् भगवान् शंकर हैं, जिनकी प्राप्तिके लिये शिवाने वनमें बड़ी भारी तपस्या की थी।'
तुम्हारे ऐसा कहनेपर मेनाने बड़ी प्रसन्नताके साथ अद्भुत आकारवाले भगवान् महेश्वरकी ओर देखा। वे स्वयं तो अद्भुत थे ही, उनके अनुचर भी बड़े अद्भुत थे। इतनेमें ही रुद्रदेवकी परम अद्भुत सेना भी आ पहुँची, जो भूत-प्रेत आदिसे संयुक्त तथा नाना गणोंसे सम्पन्न थी। उनमेंसे कितने ही बवंडरका रूप धारण करके आये थे। कितने ही पताकाकी मर्मरध्वनिके समान शब्द करते थे। किन्हींके मुँह टेढ़े थे तो कोई अत्यन्त कुरूप दिखायी देते थे। कुछ बड़े विकराल थे। किन्हींका मुँह दाढ़ी-मूँछसे भरा हुआ था। कोई लँगड़े थे तो कोई अंधे। कोई दण्ड और पाश धारण किये हुए थे तो किन्हींके हाथोंमें मुद्गर थे। कितने ही अपने वाहनोंको उलटे चला रहे थे। कोई सींग, कोई डमरू और कोई गोमुख बजाते थे, गणोंमेंसे कितनेके तो मुँह ही नहीं थे। कितनोंके मुख पीठकी ओर लगे थे और बहुतोंके बहुतेरे मुख थे। इसी तरह कोई बिना हाथके थे। किन्हींके हाथ उलटे लग रहे थे और कितनोंके बहुत-से हाथ थे। कितने ही नेत्रहीन थे, किन्हींके बहुत-से नेत्र थे। किन्हींके सिर ही नहीं थे और किन्हींके बहुत खराब सिर थे, किन्हींके कान ही नहीं थे और किन्हींके बहुत-से कान थे। इस तरह सभी गण नाना प्रकारकी वेश-भूषा धारण किये हुए थे। तात! वे विकृत आकारवाले अनेक प्रबल गण बड़े वीर और भयंकर थे। उनकी कोई संख्या नहीं थी। मुने! तुमने अँगुलीद्वारा रुद्रगणोंको दिखाते हुए मेनासे कहा—'वरानने! तुम पहले भगवान् हरके सेवकोंको देखो, फिर उनका भी दर्शन करना।' उन असंख्य भूत-प्रेत आदि गणोंको देखकर मेना तत्काल भयसे व्याकुल हो गयीं। उन्हींके बीचमें भगवान् शंकर भी थे, जो निर्गुण होते हुए भी परम गुणवान् थे। वे वृषभपर सवार थे। उनके पाँच मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र। उनके सारे अंगोंमें विभूति लगी हुई थी, जो उनके लिये भूषणका काम देती थी। मस्तकपर जटाजूट और चन्द्रमाका मुकुट, दस हाथ और उनमेंसे एकमें कपाल लिये, शरीरपर बाघंबरका दुपट्टा और हाथमें पिनाक एवं त्रिशूल, आँखें भयानक, आकृति विकराल और हाथीकी खालका वस्त्र! यह सब देखकर शिवाकी माता बहुत डर गयीं, चकित हो गयीं, व्याकुल होकर काँपने लगीं और उनकी बुद्धि चकरा गयी। उस अवस्थामें तुमने अँगुलीसे दिखाते हुए उनसे कहा—'ये ही हैं भगवान् शिव।' तुम्हारी यह बात सुनकर सती मेना दुःखसे
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३२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
भर गयीं और हवाके झोंके खाकर गिरी हुई लताके समान तुरंत भूमिपर गिर पड़ीं। ‘यह कैसा विकृत दृश्य है? मैं दुराग्रहमें पड़कर ठगी गयी।’ यों कहकर मेना उसी क्षण मूर्च्छित हो गयीं। तदनन्तर सखियोंने जब नाना प्रकारके उपाय करके उनकी समुचित सेवा की, तब गिरिराजप्रिया मेना धीरे-धीरे होशमें आयीं। (अध्याय ४१—४३)
### मेनाका विलाप, शिवके साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, देवताओं तथा श्रीविष्णुका उन्हें समझाना तथा उनका सुन्दर रूप धारण करनेपर ही शिवको कन्या देनेका विचार प्रकट करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब हिमाचलप्रिया सती मेनाको चेत हुआ, तब वे अत्यन्त क्षुब्ध होकर विलाप एवं तिरस्कार करने लगीं। पहले तो उन्होंने अपने पुत्रोंकी निन्दा की, इसके बाद वे तुम्हें और अपनी पुत्रीको दुर्वचन सुनाने लगीं।
मेना बोलीं—मुने! पहले तो तुमने यह कहा कि ‘शिवा शिवका वरण करेगी’, पीछे मेरे पति हिमवान्का कर्तव्य बताकर उन्हें आराधना-पूजामें लगाया। परंतु इसका यथार्थ फल क्या देखा गया? विपरीत एवं अनर्थकारी! दुर्बुद्धि देवर्षे! तुमने मुझ अधम नारीको सब तरहसे ठग लिया। फिर मेरी बेटीने ऐसा तप किया, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर है; उसकी उस तपस्याका यह फल मिला, जो देखनेवालोंको भी दुःखमें डालता है। हाय! मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कौन मेरे दुःखको दूर करेगा? मेरा कुल आदि नष्ट हो गया, मेरे जीवनका भी नाश हो गया। कहाँ गये वे दिव्य ऋषि ? पाऊँ तो मैं उनकी दाढ़ी-मूँछ नोच लूँ। वसिष्ठकी वह तपस्विनी पत्नी भी बड़ी धूर्ता है, वह स्वयं इस विवाहके लिये अगुआ बनकर आयी थी। न जाने किन-किनके अपराधसे इस समय मेरा सब कुछ लुट गया।
ऐसा कहकर मेना अपनी पुत्री शिवाकी ओर देखकर उन्हें कटुवचन सुनाने लगीं—‘अरी दुष्ट लड़की! तूने यह कौन-सा कर्म किया, जो मेरे लिये दुःखदायक सिद्ध हुआ? तुझ दुष्टाने स्वयं ही सोना देकर काँच खरीदा है, चन्दन छोड़कर अपने अंगोंमें कीचड़का ढेर पोत लिया! हाय! हाय ! हंसको उड़ाकर तूने पिंजड़ेमें कौआ पाल लिया। गंगाजलको दूर फेंककर कुएँका जल पीया। प्रकाश पानेकी इच्छासे सूर्यको छोड़कर यत्नपूर्वक जुगनूको पकड़ा। चावल छोड़कर भूसी खा ली। घी फेंककर मोमके तेलका आदरपूर्वक भोग लगाया। सिंहका आश्रय छोड़कर सियारका सेवन किया। ब्रह्मविद्या छोड़कर कुत्सित गाथाका श्रवण किया। बेटी! तूने घरमें रखी हुई यशकी मंगलमयी विभूतिको दूर हटाकर चिताकी अमंगलमयी राख अपने पल्ले बाँध ली; क्योंकि समस्त श्रेष्ठ देवताओं और विष्णु आदि परमेश्वरोंको छोड़कर अपनी कुबुद्धिके कारण शिवको पानेके लिये ऐसा तप किया? तुझको, तेरी बुद्धिको, तेरे रूपको और तेरे चरित्रको भी बारंबार धिक्कार है। तुझे तपस्याका उपदेश देनेवाले नारदको तथा तेरी सहायता करनेवाली दोनों सखियोंको
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भी धिक्कार है। बेटी! हम दोनों माता-पिताको भी धिक्कार है, जिन्होंने तुझे जन्म दिया। नारद ! तुम्हारी बुद्धिको भी धिक्कार है। सुबुद्धि देनेवाले उन सप्तर्षियोंको भी धिक्कार है। तुम्हारे कुलको धिक्कार है। तुम्हारी क्रिया-दक्षताको भी धिक्कार है तथा तुमने जो कुछ किया, उस सबको धिक्कार है। तुमने तो मेरा घर ही जला दिया। यह तो मेरा मरण ही है। ये पर्वतोंके राजा आज मेरे निकट न आयें। सप्तर्षि लोग स्वयं मुझे अपना मुँह न दिखायें। इन सबने मिलकर क्या साधा ? मेरे कुलका नाश करा दिया। हाय! मैं बाँझ क्यों नहीं हो गयी ? मेरा गर्भ क्यों नहीं गल गया ? मैं अथवा मेरी पुत्री ही क्यों नहीं मर गयी ? अथवा राक्षस आदिने भी आकाशमें ले जाकर इसे क्यों नहीं खा डाला ? पार्वती! आज मैं तेरा सिर काट डालूँगी, परंतु ये शरीरके टुकड़े लेकर क्या करूँगी ? हाय! हाय ! तुझे छोड़कर कहाँ चली जाऊँ ? मेरा तो जीवन ही नष्ट हो गया !'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! यह कहकर मेना मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। शोक-रोष आदिसे व्याकुल होनेके कारण वे पतिके समीप नहीं गयीं। देवर्षे ! उस समय सब देवता क्रमशः उनके निकट गये। सबसे पहले मैं पहुँचा। मुनिश्रेष्ठ! मुझे देखकर तुम स्वयं मेनासे बोले।
नारदने कहा—पतिव्रते! तुम्हें पता नहीं है, वास्तवमें भगवान् शिवका रूप बड़ा सुन्दर है। उन्होंने लीलासे ऐसा रूप धारण कर लिया है, यह उनका यथार्थ रूप नहीं है। इसलिये तुम क्रोध छोड़कर स्वस्थ हो जाओ। हठ छोड़कर विवाहका कार्य करो और अपनी शिवाका हाथ शिवके हाथोंमें दे दो। तुम्हारी यह बात सुनकर मेना तुमसे बोलीं—'उठो, यहाँसे दूर चले जाओ। तुम दुष्टों और अधमोंके शिरोमणि हो।' मेनाके ऐसा कहनेपर मेरे साथ इन्द्र आदि सब देवता एवं दिक्पाल क्रमशः आकर यों बोले—'पितरोंकी कन्या मेने ! तुम हमारे वचनोंको प्रसन्नतापूर्वक सुनो। ये शिव निश्चय ही सबसे उत्कृष्ट देवता हैं और सबको उत्तम सुख देनेवाले हैं। आपकी पुत्रीके अत्यन्त दुस्सह तपको देखकर इन भक्तवत्सल प्रभुने कृपापूर्वक उन्हें दर्शन और श्रेष्ठ वर दिया था।'
यह सुनकर मेनाने देवताओंसे बारंबार अत्यन्त विलाप करके कहा—'शिवका रूप बड़ा भयंकर है, मैं उन्हें अपनी पुत्री नहीं दूँगी। आप सब देवता प्रपंच करके क्यों मेरी इस कन्याके उत्कृष्ट रूपको व्यर्थ करनेके लिये उद्यत हैं ?'
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३२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मुनीश्वर ! उनके ऐसा कहनेपर वसिष्ठ आदि सप्तर्षियोंने वहाँ आकर यह बात कही—'पितरोंकी कन्या तथा गिरिराजकी रानी मेने! हमलोग तुम्हारा कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं। जो कार्य सर्वथा उचित और उपयोगी है, उसे तुम्हारे हठके कारण हम विपरीत कैसे मान लें? भगवान् शंकरका दर्शन सबसे बड़ा लाभ है। वे दानपात्र होकर स्वयं तुम्हारे घर पधारे हैं।'
उनके ऐसा कहनेपर भी ज्ञानदुर्बला मेनाने उनकी बात मिथ्या कर दी और रुष्ट होकर उनसे कहा—'मैं शस्त्र आदिसे अपनी बेटीके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगी, परंतु उसे शंकरके हाथमें नहीं दूँगी, तुम सब लोग दूर हट जाओ, किसीको मेरे पास नहीं आना चाहिये।'
ऐसा कह अत्यन्त विह्वल हो विलाप करके मेना चुप हो गयीं। मुने! वहाँ उनके इस बर्तावसे हाहाकार मच गया। तब हिमालय अत्यन्त व्याकुल हो वहाँ आये और मेनाको समझानेके लिये प्रेमपूर्वक तत्त्व दर्शाते हुए बोले।
हिमालयने कहा—प्रिये मेने! मेरी बात सुनो, तुम इतनी व्याकुल क्यों हो गयी? देखो तो, कौन-कौन-से महात्मा तुम्हारे घर पधारे हैं। तुम इनकी निन्दा क्यों करती हो? भगवान् शंकरको तुम भी जानती हो, किंतु नाना नामरूपवाले शम्भुके विकट रूपको देखकर घबरा गयी हो। मैं शंकरजीको भलीभाँति जानता हूँ। वे ही सबके प्रतिपालक हैं, पूजनीयोंके भी पूजनीय हैं तथा अनुग्रह एवं निग्रह करनेवाले हैं। निष्पाप प्राणप्रिये! हठ न करो, मानसिक दुःख छोड़ो। सुव्रते! शीघ्र उठो और सब कार्य करो। पहली बार विकटरूपधारी शम्भुने मेरे द्वारपर आकर जो नाना प्रकारकी लीलाएँ की थीं, मैं उनका आज तुम्हें स्मरण दिला रहा हूँ। उनके उस परम माहात्म्यको देख और समझकर उस समय मैंने और तुमने उन्हें कन्या देना स्वीकार किया था। प्रिये! अपनी उस बातको प्रमाण मानकर सार्थक करो।
इस बातको सुनकर शिवाकी माता मेना हिमालयसे बोलीं—नाथ! मेरी बात सुनिये और सुनकर आपको वैसा ही करना चाहिये। आप अपनी पुत्री पार्वतीके गलेमें रस्सी बाँधकर इसे बेखटके पर्वतसे नीचे गिरा दीजिये, परंतु मैं इसे हरके हाथमें नहीं दूँगी। अथवा नाथ! अपनी इस बेटीको ले जाकर निर्दयतापूर्वक समुद्रमें डुबा दीजिये। गिरिराज! ऐसा करके आप पूर्ण सुखी हो जाइये। स्वामिन्! यदि विकटरूपधारी
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रुद्रको आप पुत्री दे देंगे तो मैं निश्चय ही अपना शरीर त्याग दूँगी।
मेनाने जब हठपूर्वक ऐसी बात कही, तब पार्वती स्वयं आकर यह रमणीय वचन बोलीं—'माँ! तुम्हारी बुद्धि तो बड़ी शुभकारक है। इस समय विपरीत कैसे हो गयी ? धर्मका अवलम्बन करनेवाली होकर भी तुम धर्मको कैसे छोड़ रही हो ? ये रुद्रदेव सबकी उत्पत्तिके कारणभूत साक्षात् ईश्वर हैं, इनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। समस्त श्रुतियोंमें यह वर्णन है कि भगवान् शम्भु सुन्दर रूपवाले तथा सुखद हैं। कल्याणकारी महेश्वर समस्त देवताओंके स्वामी तथा स्वयंप्रकाश हैं। इनके नाम और रूप अनेक हैं। माताजी! श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि भी इनकी सेवा करते हैं। ये सबके अधिष्ठान हैं, कर्ता, हर्ता और स्वामी हैं। विकारोंकी इनतक पहुँच नहीं है। ये तीनों देवताओंके स्वामी, अविनाशी एवं सनातन हैं। इनके लिये ही सब देवता किंकर होकर तुम्हारे द्वारपर पधारे हैं और उत्सव मना रहे हैं। इससे बढ़कर सुखकी बात और क्या हो सकती है। अतः यत्नपूर्वक उठो और जीवन सफल करो। मुझे शिवके हाथमें सौंप दो और अपने गृहस्थाश्रमको सार्थक करो। माँ! मुझे परमेश्वर शंकरकी सेवामें दे दो। मैं स्वयं तुमसे यह बात कहती हूँ। तुम मेरी इतनी-सी ही विनती मान लो। यदि तुम इनके हाथमें मुझे नहीं दोगी तो मैं दूसरे किसी वरका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि जो सिंहका भाग है, उसे दूसरोंको ठगनेवाला सियार कैसे पा सकता है? माँ! मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा स्वयं हरका वरण किया है, हरका ही वरण किया है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वह करो।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीकी यह बात सुनकर शैलेश्वरप्रिया मेना बहुत ही उत्तेजित हो गयीं और पार्वतीको डाँटती हुई दुर्वचन कहकर रोने तथा विलाप करने लगीं। तदनन्तर स्वयं मैंने तथा सनकादि सिद्धोंने भी मेनाको बहुत समझाया। परंतु वे किसीकी बात न मानकर सबको डाँटती रहीं। इसी बीचमें उनके सुदृढ़ एवं महान् हठकी बात सुनकर शिवप्रिय भगवान् विष्णु भी तुरंत वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार बोले।
श्रीविष्णुने कहा—देवि! तुम पितरोंकी मानसी पुत्री एवं उन्हें बहुत ही प्यारी हो; साथ ही गिरिराज हिमालयकी गुणवती पत्नी हो। इस प्रकार तुम्हारा सम्बन्ध साक्षात् ब्रह्माजीके उत्तम कुलसे है। संसारमें तुम्हारे सहायक भी ऐसे ही हैं। तुम धन्य हो। मैं तुमसे क्या कहूँ? तुम तो धर्मकी आधारभूता हो, फिर धर्मका त्याग कैसे करती हो? तुम्हीं अच्छी तरह सोचो तो सही। सम्पूर्ण देवता, ऋषि, ब्रह्माजी और मैं—सभी लोग विपरीत बात ही क्यों कहेंगे? तुम शिवको नहीं जानती। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी हैं। कुरूप भी हैं और सुरूप भी। सबके सेव्य तथा सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। उन्हींने मूलप्रकृतिरूपा देवी ईश्वरीका निर्माण किया और उसके बगलमें पुरुषोत्तमका निर्माण करके बिठाया। उन्हीं दोनोंसे सगुण-रूपमें मेरी तथा ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। फिर लोकोंका हित करनेके लिये वे स्वयं भी रुद्र-रूपसे प्रकट हुए। तदनन्तर वेद, देवता तथा स्थावर-जंगमरूपसे जो कुछ दिखायी देता है, वह सारा जगत् भी भगवान् शंकरसे ही
३२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उत्पन्न हुआ। उनके रूपका ठीक-ठीक वर्णन अबतक कौन कर सका है? अथवा कौन उनके रूपको जानता है? मैंने और ब्रह्माजीने भी जिनका अन्त नहीं पाया, उनका पार दूसरा कौन पा सकता है? ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब शिवका ही रूप है—ऐसा जानो। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वे ही अपनी लीलासे ऐसे रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और शिवाके तपके प्रभावसे तुम्हारे द्वारपर आये हैं। अतः हिमाचलकी पत्नी! तुम दुःख छोड़ो और शिवका भजन करो। इससे तुम्हें महान् आनन्द प्राप्त होगा और तुम्हारा सारा क्लेश मिट जायगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! श्रीविष्णुके द्वारा इस प्रकार समझायी जानेपर मेनाका मन कुछ कोमल हुआ। परंतु शिवको कन्या न देनेका हठ उन्होंने तब भी नहीं छोड़ा। शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण ही उन्होंने ऐसा दुराग्रह किया था। उस समय मेनाने शिवके महत्त्वको स्वीकार कर लिया। कुछ ज्ञान हो जानेपर उन्होंने श्रीहरिसे कहा—‘यदि भगवान् शिव सुन्दर शरीर धारण कर लें, तब मैं उन्हें अपनी पुत्री दे सकती हूँ; अन्यथा कोटि उपाय करनेपर भी नहीं दूँगी। यह बात मैं सच्चाई और दृढ़ताके साथ कह रही हूँ।’
ऐसा कहकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली मेना शिवकी इच्छासे प्रेरित हो चुप हो गयीं। धन्य है शिवकी माया, जो सबको मोहमें डाल देती है!
(अध्याय ४४)
भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता और क्षमा-प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियोंका शिवके रूपका दर्शन करके जन्म और जीवनको सफल मानना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इसी समय भगवान् विष्णुसे प्रेरित हो तुम शीघ्र ही भगवान् शंकरको अनुकूल बनानेके लिये उनके निकट गये। वहाँ जाकर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा तुमने रुद्रदेवको संतुष्ट किया। तुम्हारी बात सुनकर शम्भुने प्रसन्नतापूर्वक अद्भुत, उत्तम एवं दिव्य रूप धारण कर लिया। ऐसा करके उन्होंने अपने दयालु स्वभावका परिचय दिया। मुने! भगवान् शम्भुका वह स्वरूप कामदेवसे भी अधिक सुन्दर तथा लावण्यका परम आश्रय था; उसका दर्शन करके तुम बड़े प्रसन्न हुए और उस स्थानपर गये, जहाँ सबके साथ मेना विद्यमान थीं।
वहाँ पहुँचकर तुमने कहा—विशाल नेत्रोंवाली मेने! भगवान् शिवके उस सर्वोत्तम रूपका दर्शन करो। यह रूप प्रकट करके उन करुणामय शिवने तुमपर बड़ी ही कृपा की है।
तुम्हारी यह बात सुनकर शैलराजकी पत्नी मेना आश्चर्यचकित हो गयीं। उन्होंने शिवके उस परमानन्ददायक रूपका दर्शन किया, जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, सर्वांगसुन्दर, विचित्र वस्त्रधारी तथा नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित था। वह अत्यन्त प्रसन्न, सुन्दर हास्यसे सुशोभित, ललित लावण्यसे लसित, मनोहर, गौरवर्ण,
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द्युतिमान् तथा चन्द्रलेखासे अलंकृत था। विष्णु आदि सम्पूर्ण देवता बड़े प्रेमसे भगवान् शिवकी सेवा कर रहे थे। सूर्यदेवने छत्र लगा रखा था। चन्द्रदेव मस्तकका मुकुट बनकर उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। इन सब साधनोंसे भगवान् शंकर सर्वथा रमणीय जान पड़ते थे। उनका वाहन भी अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित था। उसकी महाशोभाका वर्णन नहीं हो सकता था। गंगा और यमुना भगवान् शिवको सुन्दर चँवर डुला रही थीं और आठों सिद्धियाँ उनके आगे नाच रही थीं। उस समय मैं, भगवान् विष्णु तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने वेशको भलीभाँति विभूषित करके पर्वतवासी भगवान् शिवके साथ चल रहे थे। नानारूपधारी शिवके गण खूब सज-धजकर अत्यन्त आनन्दित हो शिवके आगे-आगे चल रहे थे। सिद्ध, उपदेवता, समस्त मुनि तथा अन्य सब लोग भी महान् सुखका अनुभव करते हुए अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक शिवके साथ यात्रा कर रहे थे। इस प्रकार देवता आदि सब लोग विवाह देखनेके लिये उत्कण्ठित हो खूब सज-धजकर अपनी पत्नियोंके साथ परब्रह्म शिवका यशोगान करते हुए जा रहे थे। विश्वावसु आदि गन्धर्व अप्सराओंके साथ हो शंकरजीके उत्तम यशका गान करते हुए उनके आगे-आगे चल रहे थे। मुनिश्रेष्ठ! महेश्वरके शैलराजके द्वारपर पधारते समय इस प्रकार वहाँ नाना प्रकारका महान् उत्सव हो रहा था। मुनीश्वर! उस समय वहाँ परमात्मा शिवकी जैसी शोभा हो रही थी, उसका विशेषरूपसे वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? उन्हें वैसे विलक्षण रूपमें देखकर मेना क्षणभरके लिये चित्रलिखी-सी रह गयीं। फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ बोलीं— 'महेश्वर! मेरी पुत्री धन्य है, जिसने बड़ा भारी तप किया और उस तपके प्रभावसे आप मेरे इस घरमें पधारे। पहले जो मैंने आप शिवकी अक्षम्य निन्दा की है, उसे मेरी शिवाके स्वामी शिव! आप क्षमा करें और इस समय पूर्णतः प्रसन्न हो जायँ।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार बात करके चन्द्रमौलि शिवकी स्तुति करती हुई शैलप्रिया मेनाने उन्हें हाथ जोड़ प्रणाम किया, फिर वे लज्जित हो गयीं। इतनेमें ही बहुत-सी पुरवासिनी स्त्रियाँ भगवान् शिवके दर्शनकी लालसासे अनेक प्रकारके काम छोड़कर वहाँ आ पहुँचीं। जो जैसे थीं, वैसे ही अस्त-व्यस्तरूपमें दौड़ आयीं। भगवान् शंकरका वह मनोहर रूप देखकर वे सब
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मोहित हो गयीं। शिवके दर्शनसे हर्षको प्राप्त हो प्रेमपूर्ण हृदयवाली वे नारियाँ महेश्वरकी उस मूर्तिको अपने मनोमन्दिरमें बिठाकर इस प्रकार बोलीं।
पुरवासिनियोंने कहा—अहो! हिमवान्के नगरमें निवास करनेवाले लोगोंके नेत्र आज सफल हो गये। जिस-जिस व्यक्तिने इस दिव्य रूपका दर्शन किया है, निश्चय ही उसका जन्म सार्थक हो गया है। उसीका जन्म सफल है और उसीकी सारी क्रियाएँ सफल हैं, जिसने सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले साक्षात् शिवका दर्शन किया है। पार्वतीने शिवके लिये जो तप किया है, उसके द्वारा उन्होंने अपना सारा मनोरथ सिद्ध कर लिया। शिवको पतिके रूपमें पाकर ये शिवा धन्य और कृतकृत्य हो गयीं। यदि विधाता शिवा और शिवकी इस युगल जोड़ीको सानन्द एक-दूसरेसे मिला न देते तो उनका सारा परिश्रम निष्फल हो जाता। इस उत्तम जोड़ीको मिलाकर ब्रह्माजीने बहुत अच्छा कार्य किया है। इससे सबके सभी कार्य सार्थक हो गये। तपस्याके बिना मनुष्योंके लिये शम्भुका दर्शन दुर्लभ है। भगवान् शंकरके दर्शनमात्रसे ही सब लोग कृतार्थ हो गये। जो-जो सर्वेश्वर गिरिजापति शंकरका दर्शन करते हैं, वे सारे पुरुष श्रेष्ठ हैं और हम सारी स्त्रियाँ भी धन्य हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसी बात कहकर उन स्त्रियोंने चन्दन और अक्षतसे शिवका पूजन किया और बड़े आदरसे उनके ऊपर खीलोंकी वर्षा की। वे सब स्त्रियाँ मेनाके साथ उत्सुक होकर खड़ी रहीं और मेना तथा गिरिराजके भूरिभाग्यकी सराहना करती रहीं। मुने! स्त्रियोंके मुखसे वैसी शुभ बातें सुनकर विष्णु आदि सब देवताओंके साथ भगवान् शिवको बड़ा हर्ष हुआ।
(अध्याय ४५)
मेनाद्वारा द्वारपर भगवान् शिवका परिच्छन, उनके रूपको देखकर संतोषका अनुभव, अन्यान्य युवतियोंद्वारा वरकी प्रशंसा, पार्वतीका अम्बिका-पूजनके लिये बाहर निकलना तथा देवताओं और भगवान् शिवका उनके सुन्दर रूपको देखकर प्रसन्न होना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर भगवान् शिव प्रसन्नचित्त हो अपने गणों, समस्त देवताओं तथा अन्य लोगोंके साथ कौतूहलपूर्वक गिरिराज हिमवान्के धाममें गये। हिमाचलकी श्रेष्ठ पत्नी मेना भी उन स्त्रियोंके साथ घरके भीतर गयीं और शम्भुकी आरती उतारनेके लिये हाथमें दीपकोंसे सजी हुई थाली लेकर सभी ऋषिपत्नियों तथा अन्य स्त्रियोंके साथ आदरपूर्वक द्वारपर आयीं। वहाँ आकर मेनाने सम्पूर्ण देवताओंसे सेवित गिरिजापति महेश्वर शंकरको, जो द्वारपर उपस्थित थे, बड़े प्यारसे देखा। उनकी अंगकान्ति मनोहर चम्पाके समान थी। उनके एक मुख और तीन नेत्र थे। प्रसन्न मुखारविन्दपर मन्द मुसकानकी छटा छा रही थी। वे रत्न और
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सुवर्ण आदिसे विभूषित थे। गलेमें मालतीकी माला पहने हुए थे। सुन्दर रत्नमय मुकुट धारण करनेसे उनका मुखमण्डल उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित हो रहा था। कण्ठमें हार आदि सुन्दर आभरण शोभा दे रहे थे। सुन्दर कड़े और बाजूबंद उनकी भुजाओंको विभूषित कर रहे थे। अग्निके समान निर्मल एवं अनुपम अत्यन्त सूक्ष्म, मनोहर, विचित्र एवं बहुमूल्य युगल वस्त्रसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। चन्दन, अगर, कस्तूरी तथा मनोहर कुंकुमके अंगरागसे उनके अंग विभूषित थे। उन्होंने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था और उनके दोनों नेत्र कज्जलसे सुशोभित थे। उन्होंने अपनी प्रभासे सबको आच्छादित कर लिया था तथा वे अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे। अत्यन्त तरुण, परम सुन्दर और आभरण-भूषित अंगोंसे सुशोभित थे। कामिनियोंको अत्यन्त कमनीय प्रतीत होते थे। उनमें व्यग्रताका अभाव था। उनका मुखारविन्द कोटि चन्द्रमाओंसे भी अधिक आह्लाददायक था। उनके श्रीअंगोंकी छवि कोटि कामदेवोंसे भी अधिक मनोहारिणी थी। वे अपने सभी अंगोंसे परम सुन्दर थे। ऐसे सुन्दर रूपवाले उत्कृष्टदेवता भगवान् शिवको जामाताके रूपमें अपने सामने खड़ा देख मेनाकी सारी शोक-चिन्ता दूर हो गयी। वे परमानन्दसिन्धुमें निमग्न हो गयीं और अपने भाग्यकी, गिरिजाकी, गिरिराज हिमवान्की और उनके समस्त कुलकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं। उन्होंने अपने-आपको कृतार्थ माना और वे बारंबार हर्षका अनुभव करने लगीं। सती मेनाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा था। वे अपने दामादकी शोभाका सानन्द अवलोकन करती हुई उनकी आरती उतारने लगीं। गिरिजाकी कही हुई बातको बारंबार याद करके मेनाको बड़ा विस्मय हो रहा था। वे हर्षोत्फुल्ल मुखारविन्दसे युक्त हो मन-ही-मन यों कहने लगीं—'पार्वतीने मुझसे पहले जैसा बताया था, उससे भी अधिक सौन्दर्य मैं इन परमेश्वर शिवके अंगोंमें देख रही हूँ। महेश्वरका मनोहर लावण्य इस समय अवर्णनीय है।' ऐसा सोचकर आश्चर्यचकित हुई मेना अपने घरके भीतर आयीं।
वहाँ आयी हुई युवतियोंने भी वरके मनोहर रूपकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। वे बोलीं—'गिरिराजनन्दिनी शिवा धन्य हैं, धन्य हैं।' कुछ कन्याएँ कहने लगीं—'दुर्गा तो साक्षात् भगवती हैं।' कुछ दूसरी कन्याएँ महारानी मेनासे बोलीं—'हमने तो कभी ऐसा वर नहीं देखा है और न कभी ध्यानमें ही ऐसे वरका अवलोकन किया है। इन्हें पाकर गिरिजा धन्य हो गयी।' भगवान् शंकरका वह रूप देखकर समस्त देवता हर्षसे खिल उठे। श्रेष्ठ गन्धर्व उनका यश गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। बाजा बजानेवाले लोग मधुर ध्वनिमें अनेक प्रकारकी कला दिखाते हुए आदरपूर्वक भाँति-भाँतिके बाजे बजा रहे थे। हिमाचलने भी आनन्दित होकर द्वारोचित मंगलाचार किया। समस्त नारियोंके साथ मेनाने भी महान् उत्सव मनाते हुए वरका परिछन किया। फिर वे प्रसन्नतापूर्वक घरमें चली गयीं। इसके बाद भगवान् शिव अपने गणों और देवताओंके साथ अपनेको दिये गये स्थान (जनवासे)-में चले गये।
इसी बीचमें गिरिराजके अन्तःपुरकी
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स्त्रियाँ दुर्गाको साथ ले कुलदेवीकी पूजाके लिये बाहर निकलीं। वहाँ देवताओंने, जिनकी पलकें कभी नहीं गिरती थीं, प्रसन्नतापूर्वक पार्वतीको देखा। उनकी अंगकान्ति नील अंजनके समान थी। वे अपने मनोहर अंगोंसे ही विभूषित थीं। उनका कटाक्ष केवल भगवान् त्रिलोचनपर ही आदरपूर्वक पड़ता था। दूसरे किसी पुरुषकी ओर उनके नेत्र नहीं जाते थे। उनका प्रसन्नमुख मन्द मुसकानसे सुशोभित था। वे कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखती थीं और बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती थीं। उनके केशोंकी चोटी बड़ी ही सुन्दर थी। कपोलोंपर बनी हुई मनोहर पत्रभंगी उनकी शोभा बढ़ाती थी। ललाटमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ ही सिन्दूरकी बिंदी शोभा दे रही थी। वक्षःस्थलपर श्रेष्ठ रत्नोंके सारभूत हारसे दिव्य दीप्ति छिटक रही थी। रत्नोंके बने हुए केयूर, वलय और कंकणसे उनकी भुजाएँ अलंकृत थीं। उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे उनके मनोहर कपोल जगमगा रहे थे। उनकी दन्तपंक्ति मणियों तथा रत्नोंकी प्रभाको छीने लेती थी और मुखकी शोभा बढ़ाती थी। मधुसे पूरित अधर और ओष्ठ बिम्बफलके समान लाल थे। दोनों पैरोंमें रत्नोंकी आभासे युक्त महावर शोभा देता था। उन्होंने अपने एक हाथमें रत्नजटित दर्पण ले रखा था और उनका दूसरा हाथ क्रीड़ाकमलसे सुशोभित था। उनके अंगोंमें चन्दन, अगर, कस्तूरी और कुंकुमका अंगराग लगा हुआ था। पैरोंमें पायजेब बज रहे थे और वे अपने लाल-लाल तलुओंके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं। समस्त देवता आदिने जगत्की आदिकारणभूता जगज्जननी पार्वतीदेवीको देखकर भक्तिभावसे मस्तक झुका मेनासहित उन्हें प्रणाम किया। त्रिलोचन शिवने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ कनखियोंसे उन्हें देखा और उनमें सतीकी आकृति देखकर अपनी विरह-वेदनाको त्याग दिया। शिवापर आँखें गड़ाकर भगवान् शिव उस समय सब कुछ भूल गये। उनके सारे अंगोंमें रोमांच हो आया। वे हर्षका अनुभव करते हुए गौरीकी ओर देखने लगे। गौरी उनकी आँखोंमें समा गयी थीं।
इधर काली पुरीसे बाहर जाकर अम्बिकादेवीकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणपत्नियोंके साथ पुनः अपने पिताके रमणीय भवनमें लौट आयीं। भगवान् शंकर भी मुझ ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंके साथ हिमाचलके बताये हुए अपने नियत स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक गये। वहाँ गिरिराजके द्वारा नाना प्रकारकी सुन्दर समृद्धिसे सम्मानित हुए वे सब लोग सुखपूर्वक ठहर गये और भगवान् शिवकी सेवा करने लगे।
(अध्याय ४६)
वरपक्षके आभूषणोंसे विभूषित शिवाकी नीराजना, कन्यादानके समय वरके साथ सब देवताओंका हिमाचलके घरके आँगनमें विराजना तथा वर-वधूके द्वारा एक-दूसरेका पूजन
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर गिरिश्रेष्ठ हिमवान्ने प्रसन्नता और उत्साहके साथ वेदमन्त्रोंद्वारा दुर्गा और शिवका उपस्नान करवाया। तत्पश्चात् गिरिराजकी प्रार्थनासे