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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * ३४१

सहस्रों अपराधोंको भी क्षमा कीजियेगा। मेरी बच्ची जन्म-जन्ममें आपके चरणारविन्दोंकी भक्त रही है और रहेगी। उसे सोते और जागते समय भी अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सुध नहीं रहती। मृत्युंजय ! आपके प्रति भक्तिभावकी बातें सुनते ही यह हर्षके आँसू बहाती हुई पुलकित हो उठती है और आपकी निन्दा सुनकर ऐसा मौन साध लेती है, मानो मर ही गयी हो !

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! ऐसा कहकर मेनकाने अपनी बेटी शिवको सौंप दी और उन दोनोंके सामने ही उच्चस्वरसे रोती हुई वह मूर्च्छित हो गयी। तब महादेवजीने मेनाको समझाकर सचेत किया और उनसे विदा ले देवताओंके साथ महान् उत्सवपूर्वक यात्रा की। वे सब देवता अपने स्वामी शिव तथा सेवकगणोंके साथ चुपचाप कैलास पर्वतकी ओर प्रस्थित हुए। वे मन-ही-मन शिवका चिन्तन कर रहे थे। हिमाचलपुरीके बाहरी बगीचेमें आकर शिवसहित सब देवता हर्ष और उत्साहके साथ ठहर गये और शिवाके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे। मुनीश्वर ! इस प्रकार देवताओंसहित शिवकी श्रेष्ठ यात्राका वर्णन किया गया। अब शिवाकी यात्राका वर्णन सुनो, जो विरहव्यथा और आनन्द दोनोंसे संयुक्त है।

(अध्याय ५३)


मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नीका पार्वतीको पतिव्रतधर्मका उपदेश देना

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर सप्तर्षियोंने हिमालयसे कहा—‘गिरिराज ! अब आप अपनी पुत्री पार्वतीदेवीकी यात्राका उचित प्रबन्ध करें।’ मुनीश्वर ! यह सुनकर पार्वतीके भावी विरहका अनुभव करके गिरिराज कुछ कालतक अधिक प्रेमके कारण विषादमें डूबे रह गये। कुछ देर बाद सचेत हो शैलराजने ‘तथास्तु’ कहकर मेनाको संदेश दिया। मुने ! हिमवान्‌का संदेश पाकर हर्ष और शोकके वशीभूत हुई मेना पार्वतीको विदा करनेके लिये उद्यत हुईं। शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने विधिपूर्वक वैदिक एवं लौकिक कुलाचारका पालन किया और उस समय नाना प्रकारके उत्सव मनाये। फिर उन्होंने नाना प्रकारके रत्नजटित सुन्दर वस्त्रों और बारह आभूषणोंद्वारा राजोचित श्रृंगार करके पार्वतीको विभूषित किया। तत्पश्चात् मेनाके मनोभावको जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मणपत्नीने गिरिजाको उत्तम पातिव्रत्यकी शिक्षा दी।

ब्राह्मणपत्नी बोली—गिरिराजकिशोरी ! तुम प्रेमपूर्वक मेरा यह वचन सुनो। यह धर्मको बढ़ानेवाला, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द देनेवाला तथा श्रोताओंको भी सुखकी प्राप्ति करानेवाला है। संसारमें पतिव्रता नारी ही धन्य है, दूसरी नहीं। वही विशेषरूपसे पूजनीय है। पतिव्रता सब लोगोंको पवित्र करनेवाली और समस्त पापराशिको नष्ट कर देनेवाली है। शिवे ! जो पतिको परमेश्वरके समान मानकर प्रेमसे उसकी सेवा करती है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें

३४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

कल्याणमयी गतिको पाती है।$^{१}$ सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिली, शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना और स्वाहा—ये तथा और भी बहुत-सी स्त्रियाँ साध्वी कही गयी हैं। यहाँ विस्तारभयसे उनका नाम नहीं लिया गया। वे अपने पातिव्रत्यके बलसे ही सब लोगोंकी पूजनीया तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं मुनीश्वरोंकी भी माननीया हो गयी हैं। इसलिये तुम्हें अपने पति भगवान् शंकरकी सदा सेवा करनी चाहिये। वे दीनदयालु, सबके सेवनीय और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। श्रुतियों और स्मृतियोंमें पातिव्रत्यधर्मको महान् बताया गया है। इसको जैसा श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसा दूसरा धर्म नहीं है—यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।

पातिव्रत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाली स्त्री अपने प्रिय पतिके भोजन कर लेनेपर ही भोजन करे। शिवे! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्रीको भी खड़ी ही रहनी चाहिये। शुद्धबुद्धिवाली साध्वी स्त्री प्रतिदिन अपने पतिके सो जानेपर सोये और उसके जागनेसे पहले ही जग जाय। वह छल-कपट छोड़कर सदा उसके लिये हितकर कार्य ही करे। शिवे! साध्वी स्त्रीको चाहिये कि जबतक वस्त्राभूषणोंसे विभूषित न हो ले तबतक वह अपनेको पतिकी दृष्टिके सम्मुख न लाये। यदि पति किसी कार्यसे परदेशमें गया हो तो उन दिनों उसे कदापि शृंगार नहीं करना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कभी पतिका नाम न ले। पतिके कटुवचन कहनेपर भी वह बदलेमें कड़ी बात न कहे। पतिके बुलानेपर वह घरके सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाय और हाथ जोड़ प्रेमसे मस्तक झुकाकर पूछे—'नाथ! किसलिये इस दासीको बुलाया है? मुझे सेवाके लिये आदेश देकर अपनी कृपासे अनुगृहीत कीजिये।' फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदयसे पालन करे। वह घरके दरवाजेपर देरतक खड़ी न रहे। दूसरेके घर न जाय। कोई गोपनीय बात जानकर हर एकके सामने उसे प्रकाशित न करे। पतिके बिना कहे ही उनके लिये पूजन-सामग्री स्वयं जुटा दे तथा उनके हितसाधनके यथोचित अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे। पतिकी आज्ञा लिये बिना कहीं तीर्थयात्राके लिये भी न जाय। लोगोंकी भीड़से भरी हुई सभा या मेले आदिके उत्सवोंका देखना वह दूरसे ही त्याग दे। जिस नारीको तीर्थयात्राका फल पानेकी इच्छा हो, उसे अपने पतिका चरणोदक पीना चाहिये। उसके लिये उसीमें सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं है।$^{२}$

पतिव्रता नारी पतिके उच्छिष्ट अन्न आदिको परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रसाद मानकर शिरोधार्य करे। देवता, पितर, अतिथि, सेवकवर्ग,


१. धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषतः। पावनी सर्वलोकानां सर्वपापौघनाशिनी ॥
सेवते या पतिं प्रेम्णा परमेश्वरवच्छिवे। इह भुक्त्वाखिलान्भोगानन्ते पत्या शिवां गतिम् ॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ९-१०)
२. तीर्थार्थिनी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत्। तस्मिन् सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्राणि च न संशयः ॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। २५)

* रुद्रसंहिता * ३४३

गौ तथा भिक्षुसमुदायके लिये अन्नका भाग दिये बिना कदापि भोजन न करे। पातिव्रत-धर्ममें तत्पर रहनेवाली गृहदेवीको चाहिये कि वह घरकी सामग्रीको संयत एवं सुरक्षित रखे। गृहकार्यमें कुशल हो, सदा प्रसन्न रहे और खर्चकी ओरसे हाथ खींचे रहे। पतिकी आज्ञा लिये बिना उपवासव्रत आदि न करे, अन्यथा उसे उसका कोई फल नहीं मिलता और वह परलोकमें नरकगामिनी होती है। पति सुखपूर्वक बैठा हो या इच्छानुसार क्रीडाविनोद अथवा मनोरंजनमें लगा हो, उस अवस्थामें कोई आन्तरिक कार्य आ पड़े तो भी पतिव्रता स्त्री अपने पतिको कदापि न उठाये। पति नपुंसक हो गया हो, दुर्गतिमें पड़ा हो, रोगी हो, बूढ़ा हो, सुखी हो अथवा दुःखी हो, किसी भी दशामें नारी अपने उस एकमात्र पतिका उल्लंघन न करे। रजस्वला होनेपर वह तीन रात्रितक पतिको अपना मुँह न दिखाये अर्थात् उससे अलग रहे। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जाय, तबतक अपनी कोई बात भी वह पतिके कानोंमें न पड़ने दे। अच्छी तरह स्नान करनेके पश्चात् सबसे पहले वह अपने पतिके मुखका दर्शन करे, दूसरे किसीका मुँह कदापि न देखे अथवा मन-ही-मन पतिका चिन्तन करके सूर्यका दर्शन करे। पतिकी आयु बढ़नेकी अभिलाषा रखनेवाली पतिव्रता नारी हल्दी, रोली, सिन्दूर, काजल आदि; चोली, पान, मांगलिक आभूषण आदि; केशोंका सँवारना, चोटी गूँथना तथा हाथ-कानके आभूषण—इन सबको अपने शरीरसे दूर न करे। धोबिन, छिनाल या कुलटा, संन्यासिनी और भाग्यहीना स्त्रियोंको वह कभी अपनी सखी न बनाये। पतिसे द्वेष रखनेवाली स्त्रीका वह कभी आदर न करे। कहीं अकेली न खड़ी हो। कभी नंगी होकर न नहाये। सती स्त्री ओखली, मूसल, झाडू, सिल, जाँत और द्वारके चौखटके नीचेवाली लकड़ीपर कभी न बैठे। मैथुनकालके सिवा और किसी समयमें वह पतिके सामने धृष्टता न करे। जिस-जिस वस्तुमें पतिकी रुचि हो, उससे वह स्वयं भी प्रेम करे। पतिव्रता देवी सदा पतिका हित चाहनेवाली होती है। वह पतिके हर्षमें हर्ष माने। पतिके मुखपर विषादकी छाया देख स्वयं भी विषादमें डूब जाय तथा वह प्रियतम पतिके प्रति ऐसा बर्ताव करे, जिससे वह उन्हें प्यारी लगे। पुण्यात्मा पतिव्रता स्त्री सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके लिये एक-सी रहे। अपने मनमें कभी विकार न आने दे और सदा धैर्य धारण किये रहे। घी, नमक, तेल आदिके समाप्त हो जानेपर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे सहसा यह न कहे कि अमुक वस्तु नहीं है। वह पतिको कष्ट या चिन्तामें न डाले। देवेश्वरि ! पतिव्रता नारीके लिये एकमात्र पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवसे भी अधिक माना गया है। उसके लिये अपना पति शिवरूप ही है*। जो पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिके नियमका पालन करती है, वह पतिकी आयु हर लेती है और मरनेपर नरकमें जाती है। जो स्त्री पतिके कुछ


* विधेर्विष्णोर्हराद्वापि पतिरेकोऽधिको मतः। पतिव्रताया देवेशि स्वपतिः शिव एव च॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ४३)

३४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

कहनेपर क्रोधपूर्वक कठोर उत्तर देती है वह गाँवमें कुतिया और निर्जन वनमें सियारिन होती है। नारी पतिसे ऊँचे आसनपर न बैठे, दुष्ट पुरुषके निकट न जाय और पतिसे कभी कातर वचन न बोले। किसीकी निन्दा न करे। कलहको दूरसे ही त्याग दे। गुरुजनोंके निकट न तो उच्चस्वरसे बोले और न हँसे। जो बाहरसे पतिको आते देख तुरंत अन्न, जल, भोज्य वस्तु, पान और वस्त्र आदिसे उनकी सेवा करती है, उनके दोनों चरण दबाती है, उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतमके खेदको दूर करनेवाले अन्यान्य उपायोंसे प्रसन्नतापूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है, उसने मानो तीनों लोकोंको तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया। पिता, भाई और पुत्र परिमित सुख देते हैं, परंतु पति असीम सुख देता है। अतः नारीको सदा अपने पतिका पूजन— आदर-सत्कार करना चाहिये। पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है; इसलिये सबको छोड़कर एकमात्र पतिकी ही आराधना करनी चाहिये।$^१$

जो दुर्बुद्धि नारी अपने पतिको त्यागकर एकान्तमें विचरती है (या व्यभिचार करती है), वह वृक्षके खोखलेमें शयन करनेवाली क्रूर उलूकी होती है। जो पराये पुरुषको कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखती है, वह ऐंचातानी देखनेवाली होती है। जो पतिको छोड़कर अकेले मिठाई खाती है, वह गाँवमें सूअरी होती है अथवा बकरी होकर अपनी ही विष्ठा खाती है। जो पतिको तू कहकर बोलती है, वह गूँगी होती है। जो सौतसे सदा ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पतिकी आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुषपर दृष्टि डालती है, वह कानी, टेढ़े मुँहवाली तथा कुरूपा होती है। जैसे निर्जीव शरीर तत्काल अपवित्र हो जाता है, उसी तरह पतिहीना नारी भलीभाँति स्नान करनेपर भी सदा अपवित्र ही रहती है। लोकमें वह माता धन्य है, वह जन्मदाता पिता धन्य है तथा वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता देवी वास करती है। पतिव्रताके पुण्यसे पिता, माता और पतिके कुलोंकी तीन-तीन पीढ़ियोंके लोग स्वर्गलोकमें सुख भोगते हैं।$^२$ जो दुराचारिणी स्त्रियाँ अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनोंके कुलोंको नीचे गिराती हैं तथा इस लोक और परलोकमें भी दुःख भोगती हैं। पतिव्रताका पैर जहाँ-जहाँ पृथ्वीका स्पर्श करता है, वहाँ-वहाँकी भूमि पापहारिणी तथा परम पावन बन जाती है।$^३$ भगवान् सूर्य, चन्द्रमा तथा वायुदेव भी अपने-आपको पवित्र करनेके लिये ही पतिव्रताका


१-भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च। तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ५१)
२-सा धन्या जननी लोके स धन्यो जनकः पिता। धन्यः स च पतिर्यस्य गृहे देवी पतिव्रता॥
पितृवंश्या मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः। पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्गे सौख्यानि भुञ्जते॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ५८-५९)
३-पतिव्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद्वुवम्। तत्र तत्र भवेत् सा हि पापहन्त्री सुपावनी॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६१)

* रुद्रसंहिता * ३४५

स्पर्श करते हैं और किसी दृष्टिसे नहीं। जल भी सदा पतिव्रताका स्पर्श करना चाहता है और उसका स्पर्श करके वह अनुभव करता है कि आज मेरी जड़ताका नाश हो गया तथा आज मैं दूसरोंको पवित्र करनेवाला बन गया। भार्या ही गृहस्थ-आश्रमकी जड़ है, भार्या ही सुखका मूल है, भार्यासे ही धर्मके फलकी प्राप्ति होती है तथा भार्या ही संतानकी वृद्धिमें कारण है।$^१$

क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्य-पर गर्व करनेवाली स्त्रियाँ नहीं हैं? परंतु पतिव्रता स्त्री तो विश्वनाथ शिवके प्रति भक्ति होनेसे ही प्राप्त होती है। भार्यासे इस लोक और परलोक दोनोंपर विजय पायी जा सकती है। भार्याहीन पुरुष देवयज्ञ, पितृयज्ञ और अतिथियज्ञ करनेका अधिकारी नहीं होता। वास्तवमें गृहस्थ वही है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। दूसरी स्त्री तो पुरुषको उसी तरह अपना ग्रास (भोग्य) बनाती है, जैसे जरावस्था एवं राक्षसी। जैसे गंगास्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीका दर्शन करनेपर सब कुछ पावन हो जाता है।$^२$ पतिको ही इष्टदेव माननेवाली सती नारी और गंगामें कोई भेद नहीं है। पतिव्रता और उसके पतिदेव उमा और महेश्वरके समान हैं, अतः विद्वान् मनुष्य उन दोनोंका पूजन करे। पति प्रणव है और नारी वेदकी ऋचा; पति तप है और स्त्री क्षमा; नारी सत्कर्म है और पति उसका फल। शिवे! सती नारी और उसके पति—दोनों दम्पती धन्य हैं$^३$।

गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मैंने तुमसे पतिव्रताधर्मका वर्णन किया है। अब तुम सावधान हो आज मुझसे प्रसन्नतापूर्वक पतिव्रताके भेदोंका वर्णन सुनो। देवि! पतिव्रता नारियाँ उत्तमा आदि भेदसे चार प्रकारकी बतायी गयी हैं, जो अपना स्मरण करनेवाले पुरुषोंका सारा पाप हर लेती हैं। उत्तमा, मध्यमा, निकृष्टा और


१-भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च। भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या संतानवृद्धये॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६४)
२-यथा गङ्गावगाहेन शरीरं पावनं भवेत्। तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सकलं पावनं भवेत्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ६८)
३-तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तपः। फलं पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० ५४। ७०)

३४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

अतिनिकृष्टा—ये पतिव्रताके चार भेद हैं। अब मैं इनके लक्षण बताती हूँ। ध्यान देकर सुनो। भद्रे! जिसका मन सदा स्वप्नमें भी अपने पतिको ही देखता है, दूसरे किसी परपुरुषको नहीं, वह स्त्री उत्तमा या उत्तम श्रेणीकी पतिव्रता कही गयी है। शैलजे! जो दूसरे पुरुषको उत्तम बुद्धिसे पिता, भाई एवं पुत्रके समान देखती है, उसे मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है। पार्वती! जो मनसे अपने धर्मका विचार करके व्यभिचार नहीं करती, सदाचारमें ही स्थित रहती है, उसे निकृष्टा अथवा निम्नश्रेणीकी पतिव्रता कहा गया है। जो पतिके भयसे तथा कुलमें कलंक लगनेके डरसे व्यभिचारसे बचनेका प्रयत्न करती है, उसे पूर्वकालके विद्वानोंने अतिनिकृष्टा अथवा निम्नतम कोटिकी पतिव्रता बताया है। शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ समस्त लोकोंका पाप नाश करनेवाली और उन्हें पवित्र बनानेवाली हैं। अत्रिकी स्त्री अनसूयाने ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंकी प्रार्थनासे पातिव्रत्यके प्रभावका उपभोग करके वाराहके शापसे मरे हुए एक ब्राह्मणको जीवित कर दिया था। शैलकुमारी शिवे! ऐसा जानकर तुम्हें नित्य प्रसन्नतापूर्वक पतिकी सेवा करनी चाहिये। पतिसेवन सदा समस्त अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। तुम साक्षात् जगदम्बा महेश्वरी हो और तुम्हारे पति साक्षात् भगवान् शिव हैं। तुम्हारा तो चिन्तन-मात्र करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जायँगी। देवि! यद्यपि तुम्हारे आगे यह सब कहनेका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि आज लोकाचारका आश्रय ले मैंने तुम्हें सती-धर्मका उपदेश दिया है।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-पत्नी शिवादेवीको मस्तक झुका चुप हो गयी। इस उपदेशको सुनकर शंकरप्रिया पार्वतीदेवीको बड़ा हर्ष हुआ।

(अध्याय ५४)

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शिव-पार्वती तथा उनकी बारातकी विदाई, भगवान् शिवका समस्त देवताओंको विदा करके कैलासपर रहना और पार्वतीखण्डके श्रवणकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ब्राह्मणीने देवी पार्वतीको पतिव्रत-धर्मकी शिक्षा देनेके पश्चात् मेनाको बुलाकर कहा—'महारानीजी! अब अपनी पुत्रीकी यात्रा कराइये—इसे विदा कीजिये।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे प्रेमके वशीभूत हो गयीं। फिर धैर्य धारण करके उन्होंने कालीको बुलाया और उसके वियोगके भयसे व्याकुल हो वे बेटीको बारंबार गलेसे लगाकर अत्यन्त उच्चस्वरसे रोने लगीं। फिर पार्वती भी करुणाजनक बात कहती हुई जोर-जोरसे रो पड़ीं। मेना और शिवा दोनों ही विरह-शोकसे पीड़ित हो मूर्च्छित हो गयीं। पार्वतीके रोनेसे देवपत्नियां भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। सारी स्त्रियाँ वहाँ रोने लगीं। वे सब-की-सब अचेत-सी हो गयीं। उस यात्राके समय परम प्रभु साक्षात् योगीश्वर शिव भी रो पड़े, फिर दूसरा कौन

* रुद्रसंहिता * ३४७

चुप रह सकता था? इसी समय अपने समस्त पुत्रों, मन्त्रियों और उत्तम ब्राह्मणोंके साथ हिमालय शीघ्र वहाँ आ पहुँचे और मोहवश अपनी बच्चीको हृदयसे लगाकर रोने लगे। 'बेटी! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली जा रही हो?' ऐसा कहकर सारे जगत्को सूना मानते हुए वे बारंबार विलाप करने लगे। तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुरोहितने अन्य ब्राह्मणोंके सहयोगसे कृपापूर्वक अध्यात्मविद्याका उपदेश देते हुए सबको सुखद रीतिसे समझाया। पार्वतीने भक्ति-भावसे माता-पिता तथा गुरुको प्रणाम किया। वे महामाया होकर भी लोकाचारवश बार-बार रो उठती थीं। पार्वतीके रोनेसे ही सब स्त्रियाँ रोने लगती थीं। माता मेना तो बहुत रोयीं। भौजाइयाँ भी रोने लगीं। यही दशा भाइयोंकी थी। शिवाकी माँ, भाभियाँ तथा अन्य युवतियाँ बार-बार रोदन करने लगीं। भाई और पिता भी प्रेम और सौहार्दवश रोये बिना न रह सके। उस समय ब्राह्मणोंने मिलकर सबको आदरपूर्वक समझाया और यह सूचित किया कि यात्राके लिये यही सबसे उत्तम तथा सुखद लग्न है।

तब हिमालय और मेनाने विवेकपूर्वक धैर्य धारण करके शिवाके बैठनेके लिये पालकी मँगवायी, ब्राह्मणोंकी पत्नियोंने शिवाको उसपर चढ़ाया और सबने मिलकर आशीर्वाद दिया। पिता-माता और ब्राह्मणोंने भी अपनी शुभ कामना प्रकट की। मेना और हिमालयने पार्वतीको ऐसे-ऐसे सामान दिये, जो महारानीके योग्य थे। नाना प्रकारके द्रव्योंकी शुभ राशि भेंट की, जो दूसरोंके लिये परम दुर्लभ थी। शिवाने समस्त गुरुजनोंको, माता-पिताको, पुरोहित और ब्राह्मणोंको तथा भौजाइयों और दूसरी स्त्रियोंको प्रणाम करके यात्रा की। पुत्रोंसहित बुद्धिमान् हिमाचल भी स्नेहके वशीभूत हो पीछे-पीछे गये और उस स्थानपर पहुँचे, जहाँ देवताओंसहित भगवान् शिव प्रसन्नतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे। वहाँ सब लोग बड़े प्रेम और आनन्दसे परस्पर मिले। उन सबने भगवान्‌को प्रणाम किया और उनकी प्रशंसा करते हुए वे पुरीको लौट गये।

तदनन्तर कैलास पहुँचकर भगवान् शिवने पार्वतीसे कहा—'देवेश्वरि! तुम सदासे ही मेरी प्राणप्रिया हो। तुम्हें लीला-पूर्वक इस बातकी याद दिला रहा हूँ। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है। अतः मेरे और अपने नित्य सम्बन्धका यदि तुम्हें स्मरण हो तो बताओ।' अपने प्राणनाथ महेश्वरकी यह बात सुनकर शंकरकी नित्य प्रिया पार्वती मुसकराती हुई बोलीं—'प्राणेश्वर! मुझे सब बातोंका स्मरण है, किंतु इस समय आप चुप रहिये और इस अवसरके अनुरूप जो कार्य हो, उसीको शीघ्र पूर्ण कीजिये।'

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! प्रिया पार्वतीके सैकड़ों सुधा-धाराओंके समान मधुर वचनको सुनकर लोकाचारपरायण भगवान् विश्वनाथ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुत-सी सामग्रियाँ एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको भाँति-भाँतिकी मनोहर भोज्य वस्तुएँ खिलायीं। इसी तरह अपने विवाहमें पधारे हुए दूसरे लोगोंको भी भगवान् शंकरने प्रेमपूर्वक सुमधुर रससे युक्त नाना प्रकारका अन्न भोजन कराया। भोजन करनेके पश्चात् उन सब देवताओंने

३४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

नाना रत्नोंसे विभूषित हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंके साथ आकर प्रभु चन्द्रशेखरको प्रणाम किया। फिर प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति एवं परिक्रमा करके शिव-विवाहकी प्रशंसा करते हुए वे सब लोग अपने-अपने धामको चले गये। मुने! साक्षात् भगवान् शिवने लोकाचारवश भगवान् विष्णुको और मुझको भी प्रणाम किया—ठीक उसी तरह, जैसे वामनरूपधारी श्रीहरिने महर्षि कश्यपको नमस्कार किया था। तब मैंने और श्रीविष्णुने शिवको हृदयसे लगाकर उनको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर श्रीहरिने उन्हें परब्रह्म परमात्मा मानकर उनकी उत्तम स्तुति की। इसके बाद मेरेसहित भगवान् विष्णु शिवसे विदा ले शिवा और शिवको प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़ उनके विवाहकी प्रशंसा करते हुए अपने उत्तम धामको गये। भगवान् शिव भी पार्वतीके साथ सानन्द विहार करते हुए अपने निवासभूत कैलास पर्वतपर रहने लगे। समस्त शिवगणोंको इस विवाहसे बड़ा सुख मिला। वे अत्यन्त भक्तिपूर्वक शिवा और शिवकी आराधना करने लगे।

तात! इस प्रकार मैंने परम मंगलमय शिव-विवाहका वर्णन किया। यह शोकनाशक, आनन्ददायक तथा धन और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो पुरुष भगवान् शिव और शिवामें मन लगाकर पवित्र हो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता अथवा नियमपूर्वक दूसरोंको सुनाता है, वह शिवलोक प्राप्त कर लेता है। यह अद्भुत आख्यान कहा गया, जो मंगलका आवासस्थान है। यह सम्पूर्ण विघ्नोंको शान्त करके समस्त रोगोंका नाश करनेवाला है। इसके द्वारा स्वर्ग, यश, आयु तथा पुत्र और पौत्रोंकी प्राप्ति होती है। यह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करता, इस लोकमें भोग देता और परलोकमें मोक्ष प्रदान करता है। इस शुभ प्रसंगको सुननेसे अपमृत्युका शमन होता है और परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। यह समस्त दुःस्वप्नोंका नाशक तथा बुद्धि एवं विवेक आदिका साधक है। अपने शुभकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको शिव-सम्बन्धी सभी उत्सवोंमें प्रसन्नताके साथ प्रयत्नपूर्वक इसका पाठ करना चाहिये। यह भगवान् शिवको संतोष प्रदान करनेवाला है। विशेषतः देवता आदिकी प्रतिष्ठाके समय तथा शिवसम्बन्धी सभी कार्योंके प्रसंगमें प्रसन्नतापूर्वक इसका पाठ करना चाहिये अथवा पवित्र हो शिव-पार्वतीके इस कल्याणकारी चरित्रका श्रवण करना चाहिये। ऐसा करनेसे समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। (अध्याय ५५)

$$\sim\sim\circ\sim\sim$$ ॥ रुद्रसंहिताका पार्वतीखण्ड सम्पूर्ण ॥ $$\sim\sim\circ\sim\sim$$

रुद्रसंहिता: चतुर्थ (कुमार) खण्ड

रुद्रसंहिता, चतुर्थ (कुमार) खण्ड

देवताओंद्वारा स्कन्दका शिव-पार्वतीके पास लाया जाना, उनका लाड़-प्यार, देवोंके माँगनेपर शिवजीका उन्हें तारक-वधके लिये स्वामी कार्तिकको देना, कुमारकी अध्यक्षतामें देव-सेनाका प्रस्थान, महीसागर-संगमपर तारकासुरका आना और दोनों सेनाओंमें मुठभेड़, वीरभद्रका तारकके साथ घोर संग्राम, पुनः श्रीहरि और तारकमें भयानक युद्ध

वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं
पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वर्यैकवासं शिवम्।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं
विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयापात्ताकृतिं शंकरम्॥

वन्दना करनेसे जिनका मन प्रसन्न हो जाता है, जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्यारा है, जो प्रेम प्रदान करनेवाले, पूर्णानन्दमय, भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके एकमात्र आवासस्थान और कल्याणस्वरूप हैं, सत्य जिनका श्रीविग्रह है, जो सत्यमय हैं, जिनका ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित है, जो सत्यप्रिय एवं सत्यप्रदाता हैं, ब्रह्मा और विष्णु जिनकी स्तुति करते हैं, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाले उन भगवान् शंकरकी मैं वन्दना करता हूँ।

श्रीनारदजीने पूछा—देवताओंका मंगल करनेवाले देव! परमात्मा शिव तो सर्वसमर्थ हैं। आत्माराम होकर भी उन्होंने जिस पुत्रकी उत्पत्तिके लिये पार्वतीके साथ विवाह किया था, उनके वह पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुआ? तथा तारकासुरका वध कैसे हुआ? ब्रह्मन्! मुझपर कृपा करके यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये।

इसके उत्तरमें ब्रह्माजीने कथाप्रसंग सुनाकर कुमारके गंगासे उत्पन्न होने तथा कृत्तिका आदि छः स्त्रियोंके द्वारा उनके पाले जाने, उन छहोंकी संतुष्टिके लिये उनके छः मुख धारण करने और कृत्तिकाओंके द्वारा पाले जानेके कारण उनका ‘कार्तिकेय’ नाम होनेकी बात कही। तदनन्तर उनके शंकर-गिरिजाकी सेवामें लाये जानेकी कथा सुनायी। फिर ब्रह्माजीने कहा—भगवान् शंकरने कुमारको गोदमें बैठाकर अत्यन्त स्नेह किया। देवताओंने उन्हें नाना प्रकारके पदार्थ, विद्याएँ, शक्ति और अस्त्र-शस्त्रादि प्रदान किये। पार्वतीके हृदयमें प्रेम समाता नहीं था, उन्होंने हर्षपूर्वक मुसकराकर कुमारको परमोत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया, साथ ही चिरंजीवी भी बना दिया। लक्ष्मीने दिव्य सम्पत् तथा एक विशाल एवं मनोहर हार अर्पित किया। सावित्रीने प्रसन्न होकर सारी सिद्धविद्याएँ प्रदान कीं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार वहाँ महोत्सव मनाया गया। सभीके मन प्रसन्न थे। विशेषतः शिव और पार्वतीके आनन्दका पार नहीं था। इसी बीच देवताओंने भगवान् शंकरसे कहा—प्रभो! यह तारकासुर कुमारके हाथों ही मारा जानेवाला है, इसीलिये ही यह (पार्वती-परिणय तथा कुमारोत्पत्ति आदि) उत्तम चरित घटित हुआ है। अतः हमलोगोंके सुखार्थ उसका काम तमाम

३५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

करनेके हेतु कुमारको आज्ञा दीजिये। हमलोग आज ही अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर तारकको मारनेके लिये रण-यात्रा करेंगे।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर भगवान् शंकरका हृदय दयार्द्र हो गया। उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके उसी समय तारकका वध करनेके लिये अपने पुत्र कुमारको देवताओंको सौंप दिया। फिर तो शिवजीकी आज्ञा मिल जानेपर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता एकत्र होकर गुहको आगे करके तुरंत ही उस पर्वतसे चल दिये। उस समय श्रीहरि आदि देवताओंके मनमें पूर्ण विश्वास था (कि ये अवश्य तारकका वध कर डालेंगे); वे भगवान् शंकरके तेजसे भावित हो कुमारके सेनापतित्वमें तारकका संहार करनेके लिये (रणक्षेत्रमें) आये। उधर महाबली तारकने जब देवताओंके इस युद्धोद्योगको सुना, तब वह भी एक विशाल सेनाके साथ देवोंसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही चल पड़ा। उसकी उस विशाल वाहिनीको आती देख देवताओंको परम विस्मय हुआ। फिर तो वे बलपूर्वक बारंबार सिंहनाद करने लगे। उसी समय तुरंत ही भगवान् शंकरकी प्रेरणासे विष्णु आदि सम्पूर्ण देवताओंके प्रति आकाशवाणी हुई।

आकाशवाणीने कहा—देवगण! तुमलोग जो कुमारके अधिनायकत्वमें युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हो, इससे तुम संग्राममें दैत्योंको जीतकर विजयी होओगे।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! उस आकाशवाणीको सुनकर सभी देवताओंका उत्साह बढ़ गया। उनका भय जाता रहा और वे वीरोचित गर्जना करने लगे। उनकी युद्धकामना बलवती हो उठी और वे सब-के-सब कुमारको अग्रणी बनाकर बड़ी उतावलीके साथ महीसागर-संगमको गये। उधर बहुसंख्यक असुरोंसे घिरा हुआ वह तारक भी बहुत बड़ी सेनाके साथ शीघ्र ही वहाँ आ धमका, जहाँ वे सभी देवता खड़े थे। उस असुरके आगमन-कालमें प्रलयकालीन मेघोंके समान गर्जना करनेवाली रणभेरियाँ तथा अन्यान्य कर्कश शब्द करनेवाले रणवाद्य बज रहे थे। उस समय तारकासुरके साथ आनेवाले दैत्य ताल ठोंकते हुए गर्जना कर रहे थे। उनके पदाघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। उस अत्यन्त भयंकर कोलाहलको सुनकर भी सभी देवता निर्भय ही बने रहे। वे एक साथ मिलकर तारकासुरसे लोहा लेनेके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय देवराज इन्द्र कुमारको गजराजपर बैठाकर सबसे आगे खड़े हुए। वे लोकपालोंसे घिरे हुए थे और उनके साथ देवताओंकी महती सेना थी। तत्पश्चात् कुमारने उस गजराजको तो महेन्द्रको ही दे दिया और वे स्वयं एक ऐसे विमानपर आरूढ़ हुए, जो परमाश्चर्यजनक तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। उस समय उस विमानपर सवार होनेसे सर्वगुणसम्पन्न महायशस्वी शंकर-पुत्र कुमार उत्कृष्ट शोभासे संयुक्त होकर सुशोभित हो रहे थे। उनपर परम प्रकाशमान चँवर डुलाये जा रहे थे। इसी बीच बलाभिमानी एवं महावीर देवता और दैत्य क्रोधसे विह्वल होकर परस्पर युद्ध करने लगे। उस समय देवताओं और दैत्योंमें बड़ा घमासान युद्ध हुआ। क्षणभरमें ही सारी रणभूमि रुण्ड-मुण्डोंसे व्याप्त हो गयी।

* रुद्रसंहिता * ३५१

तब महाबली तारकासुर बहुत बड़ी सेनाके साथ देवताओंसे युद्ध करनेके लिये वेगपूर्वक आगे बढ़ा। उस रणदुर्मद तारकको युद्धकी कामनासे आगे बढ़ते देखकर इन्द्र आदि देवता तुरंत ही उसके सामने आये। फिर तो दोनों सेनाओंमें महान् कोलाहल होने लगा। तत्पश्चात् देवों तथा असुरोंका विनाश करनेवाला ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ हुआ, जिसे देखकर वीरलोग हर्षोत्फुल्ल हो गये और कायरोंके मनमें भय समा गया। इसी समय वीरभद्र कुपित होकर महाबली प्रमथगणोंके साथ वीराभिमानी तारकके समीप आ पहुँचे। वे बलवान् गणनायक भगवान् शिवके कोपसे उत्पन्न हुए थे, अतः समस्त देवताओंको पीछे करके युद्धकी अभिलाषासे तारकके सम्मुख डट गये। उस समय प्रमथगणों तथा सारे असुरोंके मनमें परमोल्लास था, अतः वे उस महासमरमें परस्पर गुत्थमगुत्थ होकर जूझने लगे। तदनन्तर वीरभद्रसे तारकका भयानक युद्ध हुआ। इसी बीच असुरोंकी सेना रणसे विमुख हो भाग चली। इस प्रकार अपनी सेनाको तितर-बितर हुई देख उसका नायक तारकासुर क्रोधसे भर गया और दस हजार भुजाएँ धारण करके सिंहपर सवार हो देवगणोंको मार डालनेके लिये वेगपूर्वक उनकी ओर झपटा। वह युद्धके मुहानेपर देवों तथा प्रमथगणोंको मार-मारकर गिराने लगा। तब प्रमथगणोंके नेता महाबली वीरभद्र उसके उस कर्मको देखकर उसका वध करनेके लिये अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने भगवान् शिवके चरण-कमलका ध्यान करके एक ऐसा श्रेष्ठ त्रिशूल हाथमें लिया, जिसके तेजसे सारी दिशाएँ और आकाश प्रकाशित हो उठे। इसी अवसरपर महान् कौतुक प्रदर्शन करनेवाले स्वामिकार्तिकने तुरंत ही वीरबाहुद्वारा कहलाकर उस युद्धको रोक दिया। तब स्वामीकी आज्ञासे वीरभद्र उस युद्धसे हट गये। यह देखकर असुर-सेनापति महावीर तारक कुपित हो उठा। वह युद्ध-कुशल तथा नाना प्रकारके अस्त्रोंका जानकार था, अतः देवताओंको ललकार-ललकारकर उनपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय बलवानोंमें श्रेष्ठ असुरराज तारकने ऐसा महान् कर्म किया कि सारे देवता मिलकर भी उसका सामना न कर सके। उन भयभीत देवताओंको यों पिटते हुए देखकर भगवान् अच्युतको क्रोध हो आया और वे शीघ्र ही युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये। उन भगवान् श्रीहरिने अपने आयुध सुदर्शनचक्र और शार्ङ्गधनुषको लेकर युद्धस्थलमें महादैत्य तारकपर आक्रमण किया। मुने! तदनन्तर सबके देखते-देखते श्रीहरि और तारकासुरमें अत्यन्त भयंकर एवं रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया। इसी बीच अच्युतने कुपित होकर महान् सिंहनाद किया और धधकती हुई ज्वालाओंके-से प्रकाशवाले अपने चक्रको उठाया। फिर तो श्रीहरिने उसी चक्रसे दैत्यराज तारकपर प्रहार किया। उसकी चोटसे अत्यन्त व्यथित होकर वह असुर पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु वह असुरनायक तारक अत्यन्त बलवान् था, अतः तुरंत ही उठकर उस दैत्यराजने अपनी शक्तिसे चक्रके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। मुने! भगवान् विष्णु और तारकासुर दोनों बलवान् थे और दोनोंमें अगाध बल था, अतः युद्धस्थलमें वे परस्पर जूझने लगे।

(अध्याय १—८)

३५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ब्रह्माजीकी आज्ञासे कुमारका युद्धके लिये जाना, तारकके साथ उनका भीषण संग्राम और उनके द्वारा तारकका वध, तत्पश्चात् देवोंद्वारा कुमारका अभिनन्दन और स्तवन, कुमारका उन्हें वरदान देकर कैलासपर जा शिव-पार्वतीके पास निवास करना

तब ब्रह्माजीने कहा—शंकरसुवन स्वामी कार्तिकेय ! तुम तो देवाधिदेव हो। पार्वती-सुत ! विष्णु और तारकासुरका यह व्यर्थ युद्ध शोभा नहीं दे रहा है; क्योंकि विष्णुके हाथों इस तारककी मृत्यु नहीं होगी। यह मुझसे वरदान पाकर अत्यन्त बलवान् हो गया है। यह मैं बिलकुल सत्य बात कह रहा हूँ। पार्वतीनन्दन ! तुम्हारे अतिरिक्त इस पापीको मारनेवाला दूसरा कोई नहीं है, इसलिये महाप्रभो ! तुम्हें मेरे कथनानुसार ही करना चाहिये। परंतप ! तुम शीघ्र ही उस दैत्यका वध करनेके लिये तैयार हो जाओ; क्योंकि पार्वतीपुत्र ! तारकका संहार करनेके निमित्त ही तुम शंकरसे उत्पन्न हुए हो।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! यों मेरा कथन सुनकर शंकरनन्दन कुमार कार्तिकेय ठठाकर हँस पड़े और प्रसन्नतापूर्वक बोले—‘तथास्तु—ऐसा ही होगा।’ तब महान् ऐश्वर्यशाली शंकरसुवन कुमार तारकासुरके वधका निश्चय करके विमानसे उतर पड़े और पैदल हो गये। जिस समय महाबली शिवपुत्र कुमार अपनी अत्यन्त चमकीली शक्तिको, जो लपटोंसे दमकती हुई एक बड़ी उल्का-सी जान पड़ती थी, हाथमें लेकर पैदल ही दौड़ रहे थे, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। उनके मनमें तनिक भी व्याकुलता नहीं थी। वे परम प्रचण्ड और अप्रमेय बलशाली थे। उन षण्मुखको अपनी ओर आते देखकर तारक सुरश्रेष्ठोंसे बोला—‘क्या शत्रुओंका संहार करनेवाला कुमार यही है? मैं अकेला वीर इसके साथ युद्ध करूँगा और मैं ही समस्त वीरों, प्रमथगणों, लोकपालों तथा श्रीहरि जिनके नायक हैं, उन देवोंको भी मार डालूँगा।’

तदनन्तर देवताओंको दुर्वचन कहकर वह असुर तारक भीषण युद्ध करने लगा। उस समय बड़ा विकट संग्राम हुआ। तब शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुमारने शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके तारकके वधका विचार किया। फिर तो

* रुद्रसंहिता * ३५३

महातेजस्वी एवं महाबली कुमार रोषावेशमें आकर गर्जना करने लगे और बहुत बड़ी सेनाके साथ युद्धके लिये डटकर खड़े हो गये। उस समय समस्त देवताओंने जय-जयकारका शब्द किया और देवर्षियोंने इष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति की। तब तारक और कुमारका संग्राम प्रारम्भ हुआ, जो अत्यन्त दुस्सह, महान् भयंकर और सम्पूर्ण प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था। कुमार और तारक दोनों ही शक्ति-युद्धमें परम प्रवीण थे, अतः अत्यन्त रोषावेशमें वे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। परम पराक्रमी वे दोनों नाना प्रकारके पैंतरे बदलते हुए गर्जना कर रहे थे और अनेक प्रकारसे दाव-पेंचसे एक-दूसरेपर आघात कर रहे थे। उस समय देवता, गन्धर्व और किन्नर—सभी चुपचाप खड़े होकर वह दृश्य देखते रहे। उन्हें परम विस्मय हुआ—यहाँतक कि वायुका चलना बंद हो गया, सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और पर्वत एवं वन-काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसी अवसरपर हिमालय आदि पर्वत स्नेहाभिभूत होकर कुमारकी रक्षाके लिये वहाँ आये। तब उन सभी पर्वतोंको भयभीत देखकर शंकर एवं गिरिजाके पुत्र कुमार उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले।

कुमारने कहा—'महाभाग पर्वतो ! तुमलोग खेद मत करो। तुम्हें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं आज तुम सब लोगोंकी आँखोंके सामने ही इस पापीका काम तमाम कर दूँगा।' यों उन पर्वतों तथा देवगणोंको ढाढ़स बँधाकर कुमारने गिरिजा और शम्भुको प्रणाम किया तथा अपनी कान्तिमती शक्तिको हाथमें लिया। शम्भुपुत्र कुमार महाबली तथा महान् ऐश्वर्यशाली तो थे ही। जब उन्होंने तारकका वध करनेकी इच्छासे शक्ति हाथमें ली, उस समय उनकी अद्भुत शोभा हुई। तदनन्तर शंकरजीके तेजसे सम्पन्न कुमारने उस शक्तिसे तारकासुरपर, जो समस्त लोकोंको कष्ट देनेवाला था, प्रहार किया। उस शक्तिके आघातसे तारकासुरके सभी अंग छिन्न-भिन्न हो गये और सम्पूर्ण असुरगणोंका अधिपति वह महावीर सहसा धराशायी हो गया। मुने ! सबके देखते-देखते वहीं कुमारद्वारा मारे गये तारकके प्राणपखेरू उड़ गये। उस उत्कृष्ट वीर तारकको महासमरमें प्राणरहित होकर गिरा हुआ देखकर वीरवर कुमारने पुनः उसपर वार नहीं किया। उस महाबली दैत्यराज तारकके मारे जानेपर देवताओंने बहुत-से असुरोंको मौतके घाट उतार दिया। उस युद्धमें कुछ असुरोंने भयभीत होकर हाथ जोड़ लिये, कुछके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये और हजारों दैत्य मृत्युके अतिथि बन गये। कुछ शरणार्थी दैत्य अंजलि बाँधकर 'पाहि-पाहि—रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' यों पुकारते हुए कुमारके शरणापन्न हो गये। कुछ मार डाले गये और कुछ मैदान छोड़कर भाग गये। सहस्रों दैत्य जीवनकी आशासे भागकर पातालमें घुस गये। उन सबकी आशाएँ भग्न हो गयी थीं और मुखपर दीनता छायी हुई थी।

मुनीश्वर ! इस प्रकार वह सारी दैत्यसेना विनष्ट हो गयी। देवगणोंके भयसे कोई भी वहाँ ठहर न सका। उस दुरात्मा तारकके मारे जानेपर सभी लोक निष्कण्टक हो गये और इन्द्र आदि सभी देवता


789 संक्षिप्त शिवपुराण—12 A

३५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

आनन्दमग्न हो गये। यों कुमारको विजयी देखकर एक साथ ही सम्पूर्ण देवताओं तथा त्रिलोकीके समस्त प्राणियोंको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। उस समय भगवान् शंकर भी कार्तिकेयकी विजयका समाचार पाकर प्रसन्नतासे भर गये और पार्वतीजीके साथ गणोंसे घिरे हुए वहाँ पधारे। तब जिनके हृदयमें स्नेह समाता नहीं था, वे पार्वतीजी परम प्रेमपूर्वक सूर्यके समान तेजस्वी अपने पुत्र कुमारको अपनी गोदमें लेकर लाड़-प्यार करने लगीं। उसी अवसरपर अपने पुत्रोंसे घिरे हुए हिमालयने बन्धु-बान्धवों तथा अनुयायियोंके साथ आकर शम्भु, पार्वती और गुहका स्तवन किया। तत्पश्चात् सम्पूर्ण देवगण, मुनि, सिद्ध और चारणोंने शिवनन्दन कुमार, शम्भु और परम प्रसन्न हुई पार्वतीकी स्तुति की। उस समय उपदेवोंने बहुत बड़ी पुष्प-वर्षा की। सभी प्रकारके बाजे बजने लगे। विशेषरूपसे जयकार और नमस्कारके शब्द बारंबार उच्चस्वरसे गूँजने लगे। उस समय वहाँ एक महान् विजयोत्सव मनाया गया, जिसमें कीर्तनकी विशेषता थी और वह स्थान गाने-बजानेके शब्द तथा अधिकाधिक ब्रह्मघोषसे व्याप्त था। मुने! समस्त देवगणोंने प्रसन्नतापूर्वक गा-बजाकर तथा हाथ जोड़कर भगवान् जगन्नाथकी स्तुति की। तत्पश्चात् सबसे प्रशंसित तथा अपने गणोंसे घिरे हुए भगवान् रुद्र जगज्जननी भवानीके साथ अपने निवासस्थान कैलास पर्वतको चले गये।

इधर तारकको मारा गया देखकर सभी देवताओं तथा अन्य समस्त प्राणियोंके चेहरेपर हँसी खेलने लगी। वे भक्तिपूर्वक शंकरसुवन कुमारकी स्तुति करने लगे—'देव! तुम दानवश्रेष्ठ तारकका हनन करनेवाले हो, तुम्हें नमस्कार है। शंकरनन्दन! तुम बाणासुरके प्राणोंका अपहरण करनेवाले तथा प्रलम्बासुरके विनाशक हो। तुम्हारा स्वरूप परम पवित्र है, तुम्हें हमारा अभिवादन है।'

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जब विष्णु आदि देवताओंने इस प्रकार कुमारका स्तवन किया, तब उन प्रभुने सभी देवोंको क्रमशः नया-नया वर प्रदान किया। तत्पश्चात् पर्वतोंको स्तुति करते देखकर वे शंकर-तनय परम प्रसन्न हुए और उन्हें वर देते हुए बोले।

स्कन्दने कहा—भूधरो! तुम सभी पर्वत तपस्वियोंद्वारा पूजनीय तथा कर्मठ और ज्ञानियोंके लिये सेवनीय होओगे। ये जो मेरे मातामह (नाना) पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हैं, ये महाभाग आजसे तपस्वियोंके लिये फलदाता होंगे।

तब देवता बोले—कुमार! यों

789 संक्षिप्त शिवपुराण—12 B

* रुद्रसंहिता * ३५५

असुरराज तारकको मारकर तथा देवोंको वर प्रदान करके तुमने हम सबको तथा चराचर जगत्को सुखी कर दिया। अब तुम्हें परम प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिता पार्वती और शंकरका दर्शन करनेके लिये शिवके निवासभूत कैलासपर चलना चाहिये।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने ! तदनन्तर सब देवताओंके साथ विमानपर चढ़कर कुमार स्कन्द शिवजीके समीप कैलास पहुँच गये। उस समय शिव-शिवाने बड़ा आनन्द मनाया। देवताओंने शिवजीकी स्तुति की। शिवजीने उन्हें वरदान तथा अभयदान देकर विदा किया। मुने ! उस अवसरपर देवताओंको परम आनन्द प्राप्त हुआ। वे शिव, पार्वती तथा शंकरनन्दन कुमारके रमणीय यशका बखान करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। इधर परमेश्वर शिव भी शिवा, कुमार तथा गणोंके साथ आनन्दपूर्वक उस पर्वतपर निवास करने लगे। मुने ! इस प्रकार जो शिव-भक्तिसे ओतप्रोत, सुखदायक एवं दिव्य है, कुमारका वह सारा चरित्र मैंने तुमसे वर्णन कर दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो ?

(अध्याय ९—१२)


शिवाका अपनी मैलसे गणेशको उत्पन्न करके द्वारपाल-पदपर नियुक्त करना, गणेशद्वारा शिवजीके रोके जानेपर उनका शिवगणोंके साथ भयंकर संग्राम, शिवजीद्वारा गणेशका शिरश्छेदन, कुपित हुई शिवाका शक्तियोंको उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको प्रसन्न करना, उनके द्वारा पुत्रको जिलाये जानेकी बात कही जानेपर शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड़से जोड़कर उन्हें जीवित करना

सूतजी कहते हैं—तारकारि कुमारके उत्तम एवं अद्भुत वृत्तान्तको सुनकर नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने पुनः प्रेमपूर्वक ब्रह्माजीसे पूछा।

नारदजी बोले—देवदेव ! आप तो शिव-सम्बन्धी ज्ञानके अथाह सागर हैं। प्रजानाथ ! मैंने स्वामी कार्तिकके सद्वृत्तान्तको जो अमृतसे भी उत्तम है, सुन लिया। अब गणेशका उत्तम चरित्र सुनना चाहता हूँ। आप उनका जन्म-वृत्तान्त तथा दिव्य चरित्र, जो सम्पूर्ण मंगलोंके लिये भी मंगल-स्वरूप है, वर्णन कीजिये।

सूतजी कहते हैं—महामुनि नारदका ऐसा वचन सुनकर ब्रह्माजीका मन हर्षसे गद्गद हो गया। वे शिवजीका स्मरण करके बोले।

ब्रह्माजीने कहा—नारद ! पहले जो मैंने विधिपूर्वक गणेशकी उत्पत्तिका वर्णन किया था कि शनिकी दृष्टि पड़नेसे गणेशका मस्तक कट गया था, तब उसपर हाथीका


789 संक्षिप्त शिवपुराण—12 C

३५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मुख लगा दिया गया था, वह कल्पान्तरकी कथा है! अब श्वेतकल्पमें घटित हुई गणेशकी जन्म-कथाका वर्णन करता हूँ, जिसमें कृपालु शंकरने ही उनका मस्तक काट लिया था। मुने! इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि भगवान् शम्भु कल्याणकारी, सृष्टिकर्ता और सबके स्वामी हैं। वे ही सगुण और निर्गुण भी हैं। उन्हींकी लीलासे सारे विश्वकी सृष्टि, रक्षा और विनाश होता है। मुनिश्रेष्ठ! अब प्रस्तुत विषयको आदरपूर्वक श्रवण करो।

एक समय पार्वतीजीकी जया-विजया नामवाली सखियाँ उनके पास आकर विचार करने लगीं—'सखी! सभी गण रुद्रके ही हैं। नन्दी, भृंगी आदि जो हमारे हैं, वे भी शिवके ही आज्ञापालनमें तत्पर रहते हैं। जो असंख्य प्रमथगण हैं, उनमें भी हमारा कोई नहीं है। वे सभी शिवाज्ञापरायण होकर द्वारपर खड़े रहते हैं। यद्यपि वे सभी हमारे भी हैं, तथापि उनसे हमारा मन नहीं मिलता; अतः पापरहिते! आपको भी हमारे लिये एक गणकी रचना करनी चाहिये।'

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जब सखियोंने पार्वतीजीसे ऐसा सुन्दर वचन कहा, तब उन्होंने उसे हितकारक माना और वैसा करनेका विचार भी किया। तदनन्तर किसी समय जब पार्वतीजी स्नान कर रही थीं, तब सदाशिव नन्दीको डरा-धमकाकर घरके भीतर चले आये। शंकरजीको आते देखकर स्नान करती हुई जगज्जननी पार्वती उठकर खड़ी हो गयीं। उस समय उनको बड़ी लज्जा आयी। वे आश्चर्यचकित हो गयीं। उस अवसरपर उन्होंने सखियोंके वचनको हितकारक तथा सुखप्रद माना। उस समय ऐसी घटना घटित होनेपर परमाद्या परमेश्वरी शिवपत्नी पार्वतीने मनमें ऐसा विचार किया कि मेरा कोई एक ऐसा सेवक होना चाहिये, जो परम शुभ, कार्यकुशल और मेरी ही आज्ञामें तत्पर रहनेवाला हो, उससे तनिक भी विचलित होनेवाला न हो। यों विचारकर पार्वतीदेवीने अपने शरीरकी मैलसे एक ऐसे चेतन पुरुषका निर्माण किया, जो सम्पूर्ण शुभलक्षणोंसे संयुक्त था। उसके सभी अंग सुन्दर एवं दोषरहित थे। उसका वह शरीर विशाल, परम शोभायमान और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। देवीने उसे अनेक प्रकारके वस्त्र, नाना प्रकारके आभूषण और बहुत-सा उत्तम आशीर्वाद देकर कहा—'तुम मेरे पुत्र हो। मेरे अपने ही हो। तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है।' पार्वतीके ऐसा कहनेपर वह पुरुष उन्हें नमस्कार करके बोला।

गणेशने कहा—'माँ! आज आपको कौन-सा कार्य आ पड़ा है? मैं आपके कथनानुसार उसे पूर्ण करूँगा।' गणेशके यों पूछनेपर पार्वतीजी अपने पुत्रको उत्तर देते हुए बोलीं।

शिवाने कहा—तात! तुम मेरे पुत्र हो, मेरे अपने हो। अतः तुम मेरी बात सुनो। आजसे तुम मेरे द्वारपाल हो जाओ। सत्पुत्र! मेरी आज्ञाके बिना कोई भी हठपूर्वक मेरे महलके भीतर प्रवेश न करने पाये, चाहे वह कहींसे भी आये, कोई भी हो। बेटा! यह मैंने तुमसे बिलकुल सत्य बात कही है।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! यों कहकर पार्वतीने गणेशके हाथमें एक सुदृढ़ छड़ी दे

789 संक्षिप्त शिवपुराण—12 D

* रुद्रसंहिता * ३५७

दी। उस समय उनके सुन्दर रूपको निहारकर पार्वती हर्षमग्न हो गयीं। उन्होंने परम प्रेमपूर्वक अपने पुत्रका मुख चूमा और कृपापरवश हो छातीसे लगा लिया। फिर दण्डधारी गणराजको अपने द्वारपर स्थापित कर दिया। बेटा नारद! तदनन्तर पार्वतीनन्दन महावीर गणेश पार्वतीकी हित-कामनासे हाथमें छड़ी लेकर गृह-द्वारपर पहरा देने लगे। उधर शिवा अपने पुत्र गणेशको अपने दरवाजेपर नियुक्त करके स्वयं सखियोंके साथ स्नान करने लगीं। मुनिश्रेष्ठ! इसी समय भगवान् शिव, जो परम कौतुकी तथा नाना प्रकारकी लीलाएँ रचनेमें निपुण हैं, द्वारपर आ पहुँचे। गणेश उन पार्वतीपतिको पहचानते तो थे नहीं, अतः बोल उठे—'देव! माताकी आज्ञाके बिना तुम अभी भीतर न जाओ। माता स्नान करने बैठ गयी हैं। तुम कहाँ जाना चाहते हो? इस समय यहाँसे हट जाओ।'

यों कहकर गणेशने उन्हें रोकनेके लिये छड़ी हाथमें ले ली। उन्हें ऐसा करते देख शिवजी बोले—'मूर्ख! तू किसे रोक रहा है? दुर्बुद्धे! क्या तू मुझे नहीं जानता? मैं शिवके अतिरिक्त और कोई नहीं हूँ।'

फिर महेश्वरके गण उसे समझाकर हटानेके लिये वहाँ आये और गणेशसे बोले—सुनो, हम मुख्य शिवगण ही द्वारपाल हैं और सर्वव्यापी भगवान् शंकरकी आज्ञासे तुम्हें हटानेके लिये यहाँ आये हैं। तुम्हें भी गण समझकर हमलोगोंने मारा नहीं है, अन्यथा तुम कबके मारे गये होते। अब कुशल इसीमें है कि तुम स्वतः ही दूर हट जाओ। क्यों व्यर्थ अपनी मृत्यु बुला रहे हो?

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! यों कहे जानेपर भी गिरिजानन्दन गणेश निर्भय ही बने रहे। उन्होंने शिवगणोंको फटकारा और दरवाजेको नहीं छोड़ा। तब उन सभी शिवगणोंने शिवजीके पास जाकर सारा वृत्तान्त उन्हें सुनाया। मुने! उनसे सब बातें सुनकर संसारके गतिस्वरूप अद्भुत लीलाविहारी महेश्वर अपने उन गणोंको डाँटकर कहने लगे।

महेश्वरने कहा—'गणो! यह कौन है, जो इतना उच्छृंखल होकर शत्रु की भाँति बक रहा है? इस नवीन द्वारपालको दूर भगा दो। तुमलोग नपुंसककी तरह खड़े होकर उसका वृत्तान्त मुझे क्यों सुना रहे हो।' विचित्र लीला रचनेवाले अपने स्वामी शंकरके यों कहनेपर वे गण पुनः वहीं लौट आये। तदनन्तर गणेशद्वारा पुनः रोके जानेपर शिवजीने गणोंको आज्ञा दी कि 'तुम पता लगाओ, यह कौन है और क्यों

३५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

ऐसा कर रहा है?' गणोंने पता लगाकर बताया कि 'ये श्रीगिरिजाके पुत्र हैं तथा द्वारपालके रूपमें बैठे हैं।' तब लीलारूप शंकरने विचित्र लीला करनी चाही तथा अपने गणोंका गर्व भी गलित करना चाहा। इसलिये गणोंको तथा देवताओंको बुलाकर गणेशजीसे भीषण युद्ध करवाया। पर वे कोई भी गणेशको पराजित न कर सके। तब स्वयं शूलपाणि महेश्वर आये।

गणेशजीने माताके चरणोंका स्मरण किया, तब शक्तिने उन्हें बल प्रदान कर दिया। सभी देवता शिवजीके पक्षमें आ गये, घोर युद्ध हुआ। अन्ततोगत्वा स्वयं शूलपाणि महेश्वरने आकर त्रिशूलसे गणेशजीका सिर काट दिया। जब यह समाचार पार्वतीजीको मिला, तब वे क्रुद्ध हो गयीं और बहुत-सी शक्तियोंको उत्पन्न करके उन्होंने बिना विचारे उन्हें प्रलय करनेकी आज्ञा दे दी। फिर तो शक्तियोंके द्वारा प्रलय मचायी जाने लगी। उन शक्तियोंका वह जाज्वल्यमान तेज सभी दिशाओंको दग्ध-सा किये डालता था। उसे देखकर वे सभी शिवगण भयभीत हो गये और भागकर दूर जा खड़े हुए।

मुने ! इसी समय तुम दिव्यदर्शन नारद वहाँ आ पहुँचे। तुम्हारा वहाँ आनेका अभिप्राय देवगणोंको सुख पहुँचाना था। तब तुमने मुझ देवताओंसहित शंकरको प्रणाम करके कहा कि इस विषयमें सबको मिलकर विचार करना चाहिये। तब वे सभी देवता तुझ महामनाके साथ सलाह करने लगे कि इस दुःखका शमन कैसे हो सकता है। फिर उन्होंने यही निश्चय किया कि जबतक गिरिजादेवी कृपा नहीं करेंगी तबतक सुख नहीं प्राप्त हो सकेगा। अब इस विषयमें और विचार करना व्यर्थ है। ऐसी धारणा करके तुम्हारे सहित सभी देवता और ऋषि भगवती शिवाके निकट गये और क्रोधकी शान्तिके लिये उन्हें प्रसन्न करने लगे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें प्रसन्न करते हुए अनेकों स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके बारंबार उनके चरणोंमें अभिवादन किया। फिर देवगणकी आज्ञासे ऋषि बोले।

देवर्षियोंने कहा—जगदम्बे ! तुम्हें नमस्कार है। शिवपत्नि! तुम्हें प्रणाम है। चण्डिके! तुम्हें हमारा अभिवादन प्राप्त हो। कल्याणि! तुम्हें बारंबार प्रणाम है। अम्बे! तुम्हीं आदि- शक्ति हो। तुम्हीं सदासारी सृष्टिकी निर्माणकर्त्री, पालिकाशक्ति और संहार करनेवाली हो। देवेशि ! तुम्हारे कोपसे सारी त्रिलोकी विकल हो रही है, अतः अब प्रसन्न हो जाओ और क्रोधको शान्त करो। देवि! हमलोग तुम्हारे

* रुद्रसंहिता * ३५९

चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! यों तुम सभी ऋषियोंद्वारा स्तुति किये जानेपर भी परादेवी पार्वतीने उनकी ओर क्रोधभरी दृष्टिसे ही देखा, किंतु कुछ कहा नहीं। तब उन ऋषियोंने पुनः उनके चरणकमलोंमें सिर झुकाया और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर पार्वतीजीसे निवेदन किया।

ऋषियोंने कहा—देवि! अभी संहार होना चाहता है; अतः क्षमा करो, क्षमा करो। अम्बिके! तुम्हारे स्वामी शिव भी तो यहीं स्थित हैं, तनिक उनकी ओर तो दृष्टिपात करो। हमलोग, ये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा सारी प्रजा—सब तुम्हारे ही हैं और व्याकुल होकर अंजलि बाँधे तुम्हारे सामने खड़े हैं। परमेश्वरि! इन सबका अपराध क्षमा करो। शिवे! अब इन्हें शान्ति प्रदान करो।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! सभी देवर्षियों कहकर अत्यन्त दीनभावसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर चण्डिकाके सम्मुख खड़े हो गये। उनका ऐसा कथन सुनकर चण्डिका प्रसन्न हो गयीं। उनके हृदयमें करुणाका संचार हो आया। तब वे ऋषियोंसे बोलीं।

देवीने कहा—ऋषियो! यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाय और वह तुमलोगोंके मध्य पूजनीय मान लिया जाय तो संहार नहीं होगा। जब तुमलोग उसे 'सर्वाध्यक्ष' का पद प्रदान कर दोगे तभी लोकमें शान्ति हो सकती है, अन्यथा तुम्हें सुख नहीं प्राप्त हो सकता।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! पार्वतीके यों कहनेपर तुम सभी ऋषियोंने उन देवताओंके पास आकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर इन्द्र आदि सभी देवताओंके चेहरेपर उदासी छा गयी। वे शंकरजीके पास गये और हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें नमस्कार करके सारा समाचार निवेदन कर दिया। देवताओंका कथन सुनकर शिवजीने कहा—'ठीक है, जिस प्रकार सारी त्रिलोकीको सुख मिल सके वही करना चाहिये। अतः अब उत्तरदिशाकी ओर जाना चाहिये और जो जीव पहले मिले, उसका सिर काटकर उस बालकके शरीरपर जोड़ देना चाहिये।'

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर शिवजीकी आज्ञाका पालन करनेवाले उन देवताओंने वह सारा कार्य सम्पन्न किया। उन्होंने उस शिशु-शरीरको धो-पोंछकर विधिवत् उसकी पूजा की। फिर वे उत्तर दिशाकी ओर गये। वहाँ उन्हें पहले-पहल एक दाँतवाला एक हाथी मिला। उन्होंने उसका सिर लाकर उस शरीरपर जोड़ दिया। हाथीके उस सिरको संयुक्त कर देनेके पश्चात् सभी देवताओंने भगवान् शिव आदिको प्रणाम करके कहा कि हमलोगोंंने अपना काम पूरा कर दिया। अब जो करना शेष है, उसे आपलोग पूर्ण करें।

ब्रह्माजी कहते हैं—तब शिवाज्ञापालन-सम्बन्धिनी देवताओंकी बात सुनकर सभी देवों और पार्षदोंको महान् आनन्द हुआ। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता अपने स्वामी निर्गुणस्वरूप भगवान् शंकरको प्रणाम करके बोले—'स्वामिन्! आप महात्माके जिस तेजसे हम सभी उत्पन्न हुए हैं, आपका वही तेज वेदमन्त्रके अभियोगसे इस बालकमें प्रवेश करे।' इस प्रकार सभी देवताओंने मिलकर वेदमन्त्रद्वारा

३६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

जलको अभिमन्त्रित किया, फिर शिवजीका स्मरण करके उस उत्तम जलको बालकके शरीरपर छिड़क दिया। उस जलका स्पर्श होते ही वह बालक शिवेच्छासे शीघ्र ही चेतनायुक्त होकर जीवित हो गया और सोये हुएकी तरह उठ बैठा। वह सौभाग्यशाली बालक अत्यन्त सुन्दर था। उसका मुख हाथीका-सा था। शरीरका रंग हरा-लाल था। चेहरेपर प्रसन्नता खेल रही थी। उसकी आकृति कमनीय थी और उसकी सुन्दर प्रभा फैल रही थी। मुनीश्वर ! पार्वतीनन्दन उस बालकको जीवित देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग आनन्दमग्न हो गये और सारा दुःख विलीन हो गया। तब हर्ष-विभोर होकर सभी लोगोंने उस बालकको पार्वतीजीको दिखाया। अपने पुत्रको जीवित देखकर पार्वतीजी परम प्रसन्न हुईं।
(अध्याय १३—१८)


पार्वतीद्वारा गणेशजीको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्ष-पद प्रदान और गणेशचतुर्थीव्रतका वर्णन, तत्पश्चात् सभी देवताओंका उनकी स्तुति करके हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट जाना

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जब विकृत स्वरूपवाले गिरिजा-पुत्र गजानन व्यग्रतारहित होकर जीवित हो उठे, तब गणनायक देवोंने उनका अभिषेक किया। अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवी आनन्दमग्न हो गयीं और उन्होंने हर्षातिरेकसे उस बालकको दोनों हाथोंसे पकड़कर छातीसे लगा लिया। फिर अम्बिकाने प्रसन्न होकर अपने पुत्र गणेशको अनेक प्रकारके वस्त्र और आभूषण प्रदान किये। तदनन्तर सिद्धियोंने अनेकों विधि-विधानसे उनका पूजन किया और माताने अपने सर्वदुःखहारी हाथसे उनके अंगोंका स्पर्श किया। इस प्रकार शिव-पत्नी पार्वतीदेवीने अपने पुत्रका सत्कार करके उसका मुख चूमा और प्रेमपूर्वक उसे वरदान देते हुए कहा—‘बेटा! इस समय तुझे बड़ा कष्ट झेलना पड़ा है। किंतु अब तू कृतकृत्य हो गया है। तू धन्य है। अबसे सम्पूर्ण देवताओंमें तेरी अग्रपूजा होती रहेगी और तुझे कभी दुःखका सामना